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आलोक जी को अभी जाना नहीं था!

जीवन की भरी दोपहर में ऐन पचास साल की उम्र में आलोक तोमर को अभी जाना नहीं था, लेकिन नियति को क्या कहिए कि कैंसर के इलाज के बहाने से घर से उठाकर वह उन्हें बत्रा अस्पताल ले गई और वहां वेंटिलेटर पर दो बार हृदयाघात के बाद उन्हें नहीं, उनके नश्वर शरीर को घरवालों को लौटाया।

जीवन की भरी दोपहर में ऐन पचास साल की उम्र में आलोक तोमर को अभी जाना नहीं था, लेकिन नियति को क्या कहिए कि कैंसर के इलाज के बहाने से घर से उठाकर वह उन्हें बत्रा अस्पताल ले गई और वहां वेंटिलेटर पर दो बार हृदयाघात के बाद उन्हें नहीं, उनके नश्वर शरीर को घरवालों को लौटाया।

खबर मिली तो हिम्मत नहीं हुई कि उनकी पत्रकार पत्नी सुप्रिया रॉय जी को फोन करके सांत्वना दी जाए। उनके शोक के बारे में सोचकर ही हृदय कांप जाता है। अब हम जानते हैं कि फोन करने पर आलोक जी के मोबाइल से तबले के द्रुत ताल वाली रिंगटोन कभी नहीं सुनाई देगी। मगर उन्होंने जाने का दिन भी क्या खूब चुना- होली का दिन, रंग-गुलाल का दिन। क्या उन्होंने अपने सभी चाहने वालों को यह चुनौती पेश की कि अब जरा चुनो- शोक का रंग कैसा होता है?

आलोक तोमर का जाना मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति भी है और डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट ही नहीं, समूची हिन्दी पत्रकारिता की एक बड़ी क्षति है। सच्चाई के साथ डटकर खड़े होने वाले आलोक तोमर ने पत्रकारिता में समझौता विहीन साहस के उदाहरण के रूप में अपने को हमेशा साबित किया। आखिर वे यों ही पत्रकारिता के सजग प्रहरी नहीं कहे जाते थे। डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट को अपनी संघर्ष यात्रा में उनका सिर्फ नैतिक समर्थन ही नहीं मिला, बल्कि यथासंभव आखिर तक उनका बहुत ही अपनापा भरा सक्रिय सहयोग मिलता आया है। दरअसल आलोक जी मंझली पीढ़ी के कुछेक गिने-चुने उन पत्रकारों में शीर्ष पर थे जिन्होंने अपनी पूर्ववर्ती और अपने बाद की युवा पीढ़ी के बीच पत्रकारिता-सेतु के रूप में काम किया।

पत्रकारिता के सभी अंगों यानी संपादन से लेकर रिपोर्टिंग तक और प्रिंट से लेकर टीवी और वेब मीडिया तक में पारंगत आलोक तोमर अपने को बुनियादी तौर पर एक रिपोर्टर ही मानते थे। इसलिए चंबल के बीहड़ वाले भिंड-मुरैना से निकला कलम का यह सिपाही जहां भी झूठ-फरेब और बेईमानियों का ढूह देखता था, उसे ढहाकर समतल करने में लग जाता था। सच्चे अर्थों में अपने पत्रकारीय कर्म से और व्यक्तिगत तौर पर भी अपने संपर्क में आने वाले युवा पीढ़ी के पत्रकारों के वे गाइड रहे। इसीलिए जनसरोकारों वाली संघर्षशील पत्रकारों की युवा पीढ़ी वास्तव में एक रिक्तता महसूस कर रही है। पत्रकारिता के प्रहरी को अलविदा- डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट की तरफ से विनम्र श्रद्धांजलि!

निशीथ राय

डॉ. निशीथ राय डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट के चेयरमैन हैं. उनका यह लेख डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट के पहले पन्‍ने पर प्रकाशित हुआ है.

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0 Comments

  1. santosh jain

    March 22, 2011 at 4:53 pm

    abhi kuch din pahle cancer ki Dawai par machi loot ke barey mein bhadas me tomarji ka lekh padha,lekin kise maloom tha khud cancer unhe loot lega.,kalam ke is sipahi ko hamara salam

  2. sadaab hameed

    March 23, 2011 at 6:17 am

    pakad sake na haat, na thaam sdake daman
    bade kareeb se uthkar cahala gya koi

  3. arvind kumar singh

    March 23, 2011 at 8:49 am

    adarniya dr sahib
    apne kamse kam alokji jaise nirbhik patrkar ko pahle page par samman diya.bahut se akhbaron ne to khabar tak nahi chhapi. lekin isse ve chhote nahin honge. alok ji lakhon yuva patrkaron ke liye prernastrot bane rahenge.

  4. pushpesh sharma

    March 23, 2011 at 8:14 pm

    unki bebak or suljhi lekhan shaili hamesaha unki yad dilaegi…us mahan vibhuti ko shat-shat naman

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