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उस एसपी को अपने किए पर पश्चाताप है!

मैंने जब भड़ास पर अपनी आने वाली किताब ”तीस आईपीएस अफसरों की जिंदगी पर किताब लिखेंगे अमिताभ” के बारे में जानकारी दी तो मुझे इस सम्बन्ध में कई सारी टिप्पणियां मिलीं. दोस्तों ने इसे एक सराहनीय कार्य बताया और इस कृत्य के लिए मेरी प्रशंसा की एवं शुभकामनाएं दीं. स्वाभाविक है अपने सभी मित्रों के प्रति मेरे मन में भी उतनी ही शुभिक्षा जाग्रत हुई जितनी उन्होंने अपने शब्दों से व्यक्त की.

मैंने जब भड़ास पर अपनी आने वाली किताब ”तीस आईपीएस अफसरों की जिंदगी पर किताब लिखेंगे अमिताभ” के बारे में जानकारी दी तो मुझे इस सम्बन्ध में कई सारी टिप्पणियां मिलीं. दोस्तों ने इसे एक सराहनीय कार्य बताया और इस कृत्य के लिए मेरी प्रशंसा की एवं शुभकामनाएं दीं. स्वाभाविक है अपने सभी मित्रों के प्रति मेरे मन में भी उतनी ही शुभिक्षा जाग्रत हुई जितनी उन्होंने अपने शब्दों से व्यक्त की.

इन्ही टिप्पणियों में एक टिप्पणी अखिलेश कृष्ण मोहन की थी. मैं उन्हें स्मरण नहीं कर पा रहा हूँ क्योंकि यह नाम मुझे एकदम से दिमाग में आ नहीं पा रहा है. पर उनकी बातों से इतना अवश्य प्रतीत होता है कि वे बस्ती के होंगे. इन्होने एक घटना का जिक्र किया है और इसके लिए तत्कालीन एसपी को दोषी ठहराया है. इन्होने कहा- “क्या आप को याद है कि बस्ती जिले का एसपी जब आप थे तो किस तरह खुलेआम गुंडई के बल पर एक दबंग नेता की मां को जिला पंचायत अध्यक्ष बनवाने के लिये सारे नियम कानून ताक पर रख दिये थे.  अमित जी याद रखिये बस्ती में अमिताभ ठाकुर के एसपी रहते जो प्रशासनिक नकारापन दिखा था वह हमने कभी भी नहीं देखा.”

मैं यहाँ उनकी बात उस एसपी का बचाव करने या उसको पाक-साफ़ दिखने के लिए नहीं कर रहा हूँ. वैसे चूँकि अपने यहाँ आँखों के सामने भी गलती कर के उससे इनकार कर देने की परंपरा रही है, अतः वह एसपी भी इस काफी पहले बीत चुकी घटना को बड़े आराम से गलत करार कर सकता है, झूठा बता सकता है और अखिलेश जी को किसी प्रकार से अपना विरोधी कह कर इनको गलत या प्रायोजित दोषारोपित करने का आरोप लगा सकता है. थोडा ज्यादा सक्रीय होना चाहे तो वह व्यक्ति तुरंत मानहानि का मुकदमा भी दर्ज करा सकता है जैसा आज-कल का एक अच्छा रिवाज है. यह कह देना बहुत मुश्किल भी नहीं है. आरोप-प्रत्यारोप के खेल में मूल बात समाप्त हो जाती है और सामने केवल मनोरंजन बच जाता है. दुर्भाग्य ऐसा कि हमारे यहाँ कई बार आरोपों को ले कर जो जांच हुआ करते हैं वे इतने लंबे समय तक चलते हैं कि उनका नतीजा निकलने से पहले ही आरोपित व्यक्ति ही दुनिया से निकल पड़ता है. फिर तो वही कहावत शेष रह जाती है-“ना रहेगा बांस, ना बजेगी बांसुरी.” जब जिस व्यक्ति पर आरोप लगा, वही रुखसत हो गया तो मुक़दमा किस पर चलाओ, अदालतों में बहस किस पर होगी और जेल किसे भेजोगे. इसीलिए आदमी निश्चिन्त रहता है और सच और झूठ के उहापोह का फायदा उठाते हुए अपना समय निकाल लेता है. एक और बहुत महत्वपूर्ण फैक्टर यहाँ काम करता है- मुद्दों की बहुतायत का. चूँकि काफी बड़ा देश है, काफी तरह की समस्याएं हैं. काफी सारे लोग हैं, इनमे कई सारे शूरमा और खलीफा भी हैं जो ऐसे बड़े धमाके करते ही रहते हैं जिन पर आज तो सारी दुनिया की निगाह चली जाती है और कल होते ही किसी और मामले के सामने आ जाने पर वह बात अतीत की गुमनाम गर्त का हिस्सा बन जाता है.

अरे, अपने देश में तो मैंने और आपने आँखों के सामने टीवी के परदे पर दिन-दहाड़े देश की संसद में सवाल के लिए पैसे मांगने के कार्यक्रम देखे, रक्षा मंत्री के आवास पर एक कथित रक्षा सौदे के लिए पैसे के आदान-प्रदान की बात सुनी, कई सारे बड़े राजनेताओं को आकर्षक और पुष्टिवर्धक नव-यौवानाओं के साथ विभिन्न लोलुप अवस्थाओं में देखा और अत्यंत गण-मान्य और परम आदरणीय संत-महंतों को उनके पेशे से इतर कुत्सित कर्मों में पकडे जाते देखा है. बड़ा हल्ला मचा, बहुत शोर-गुल हुआ पर संभवतः इनमे से किसी भी मामले में प्रकरण अपनी परिणति तक नहीं पहुँच सका. उससे भी मजेदार बात यह कि मैंने इनमे से किसी भी प्रकरण में ऐसा नहीं देखा कि किसी व्यक्ति ने इतना भर भी ईमान दिखाया हो कि हाँ, वह मैं था अथवा हाँ, उसमे कुछ बात सच्ची है. मुझे तो जहां तक याद है कि एक बड़े नेता को एक महिला के साथ आपत्तिजनक स्थिति में जब कैमरे में कैद कर लिया गया था तो उनका उत्तर था- “हाँ, यह सही है कि ऊपर वाला हिस्सा मेरा था, पर नीचे वाला हिस्सा मेरा नहीं था. लगता है बाद में जोड़ दिया गया था.” अर्थात कि चेहरा तो उनका है, यह सही है, पर बाकी जो भाव-भंगिमाएं दिखाई जा रही हैं उससे उनका कोई मतलब नहीं है.

वह व्यक्ति चाह कर भी इस परंपरा का निर्वहन नहीं कर पाता क्योंकि पता नहीं क्यों वह दूसरे लोगों से ज्यादा, सारी दुनिया से ज्यादा अपने आप से डरता है. मैं आपको तो बड़े आराम से बेवकूफ बना सकता हूँ, बनाता भी रहता हूँ, वैसे ही जैसे आप मुझे बना रहे हैं और हम सब एक-दूसरे को बेवकूफ बनाते हुए दिख रहे हैं और खुद पर प्रसन्न भी हो रहे हैं. पर मेरा प्रश्न है कि आदमी अपने आप को कैसे धोखा दे सकता है. ठीक है, अखिलेश कृष्ण जी ने जो बात कही, यदि वह एसपी उसे एक शब्द में कह दे- “गलत”, तो क्या उस एसपी का मन भी इस बात को मान लेना. तो क्या ऐसा कह देने से उसका अच्छा- बुरा समाप्त हो जाएगा, यह ठीक है कि उस घटना को घटे कई साल हो गए हैं, यह भी ठीक है कि अब उस घटना को शायद बहुत सारे लोग याद नहीं करते हों. पर अंत में बात तो इतनी ही है कि सत्य हमेशा एक ही होता है, सत्य हमेशा एक ही रहेगा, चाहे हम उसे किसी भी रूप में प्रत्यारोपित करने का प्रयास करें और बहुत संभव है, कर भी लें.

मैंने पढ़ा है, हिटलर का एक मंत्री था गोएबल्स, जो इस बात का बड़ा पुरोधा था कि कैसे सच को झूठ और झूठ को सच बनाया जाए. उसके नाम दुनिया का एक बहुत बड़ा आविष्कार दर्ज है- “यदि एक झूठ को हम सौ बार सच बोलें तो यह सच ही मान लिया जाता है.” यद्यपि मैं समझता हूँ कि वह इसका प्रयोग करने वाला पहला व्यक्ति नहीं होगा पर इस वाक्य पर पेटेंट तो आज उसी का है. यह अलग बात है कि आज हमारे देश में ना जाने कितने हो लोग इस पेटेंट को अपना ब्रह्मसूत्र माने घूमते रहते हैं.

लेकिन गोएबल्स के सिद्धांत में भी यही है कि झूठ सत्य मान लिया जाता है, झूठ सच हो नहीं जाता है. वह सम्बंधित व्यक्ति यदि यह कह देगा कि एसपी के रूप में जिला पंचायत चुनावों के दौरान उसकी बहुत शानदार भूमिका थी और इस बात को हर समय कहता रहेगा और कई लोगों से कहलवाने लगेगा और कई सारे प्रमाण दे देगा तो जाहिर है लोग इसे सच मानेंगे ही. लेकिन बात सच मानी ही जायेगी, मात्र मान लेने से सच नहीं हो जायेगी. सच तो वही रहेगा जो हुआ था. सच तो वही रहेगा जैसा नहीं होता तो बेहतर था. और सच तो यही रहेगा कि इस बात का एहसास, इस बात का कष्ट, इस बात की कसक, इस बात की तकलीफ, इस बात का दैत्य हमेशा उस आदमी के मन में बसा रहेगा, भले वह इसे कहे या नहीं कहे.

वह व्यक्ति अपनी इस भूल के कई कारण बता सकता है, एक कथित दोस्ती की खातिर कर्तव्यपथ पर चूक जाने की बात कह सकता है, एक बड़े से व्यवस्था में कई लोगों के बीच चाह  कर भी  कुछ नहीं कर पाने की बात कर सकता है, पर क़यामत के दिन का इन्साफ का निर्मोही तराजू यही कहेगा कि ऐसे बहानों से धरती के इन्साफ बदल सकते हैं, इन बहानों से ईश्वर का न्याय नहीं बदलता. मैं अखिलेश कृष्ण मोहन जी को धन्यावाद देता हूँ, उनका सम्मान करता हूँ कि उन्होंने मुझे इस व्यक्ति ने सच से सामना कराया. यदि आपकी आँखों से “वो मंजर कभी भी नहीं भूल सकता जो एक एसपी कर रहा था” तो विश्वास मानिए, उस व्यक्ति के ह्रदय में भी वह दृश्य उसी तरह सतत अपनी उपस्थिति बनाए रखता है कि – “ये ना होता तो अच्छा था.”

लेखक अमिताभ आईपीएस अधिकारी हैं, इन दिनों मेरठ में पदस्थ हैं.

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0 Comments

  1. Indian citizen

    April 19, 2011 at 7:22 pm

    एक ही शब्द कहूंगा “वाह”, साफगोई के लिये..

  2. beeru maurya varanasi

    September 7, 2011 at 10:23 am

    bhaiya aap ne emaandari se apni galti maan li ye aapki mahaanta hai yah such hai ki aap chahate to yah baat jhutla sakte the magar jo aadmi andar se emaandaar ho wo khud apni aatama k sawaal jawaab se darta hai…..aap k prti mere man me aur sardha badh gayi. jai hind

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