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जीता कोई भी हो, हारा पाकिस्तान ही है

शेष नारायण सिंहकरीब 10 साल की कोशिश के बाद अमरीका ने ओसामा बिन लादेन को मार डाला. पूरी दुनिया में आतंक का पर्याय बन चुके ओसामा बिन लादेन को अमरीका ने ही बन्दूक के रास्ते पर डाला था और उसका इस्तेमाल किया था. जब पाकिस्तान में जनरल जिया उल हक का राज था तो अमरीका ने अफगानिस्तान में घुस आये सोवियत फौजियों को भगाने के लिए जो योद्धा तैयार किये थे, ओसामा बिन लादेन उसके मुखिया थे.

शेष नारायण सिंहकरीब 10 साल की कोशिश के बाद अमरीका ने ओसामा बिन लादेन को मार डाला. पूरी दुनिया में आतंक का पर्याय बन चुके ओसामा बिन लादेन को अमरीका ने ही बन्दूक के रास्ते पर डाला था और उसका इस्तेमाल किया था. जब पाकिस्तान में जनरल जिया उल हक का राज था तो अमरीका ने अफगानिस्तान में घुस आये सोवियत फौजियों को भगाने के लिए जो योद्धा तैयार किये थे, ओसामा बिन लादेन उसके मुखिया थे.

अमरीका ने उनकी खूब मदद की. खूब हथियार दिया, आर्थिक सहायता भी खूब किया और अपने काम के लिए इस्तेमाल किया. इस दौर में जनरल जिया उल हक ने भी अमरीका से खूब माल खींचा. लेकिन जब सोवियत रूस टूट गया और रूसी फौजें अफगानिस्तान से भाग गयीं तो वहां अमरीका की रूचि ख़त्म हो गयी. अमरीका ने पाकिस्तान को भी फ्रीज़र में लगा दिया और ओसामा बिन लादेन को भुला दिया. दाना पानी बंद हो गया. ओसामा ने गुस्से में अमरीका के खिलाफ काम करना शुरू कर दिया. इस बीच अफगानिस्तान में रूसियों के खिलाफ युद्ध में उसके साथ रहे तालिबान ने अफगानिस्तान की सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया.

इस तरह ओसामा को रहने का ठिकाना तो मिल गया लेकिन अफगानिस्तान खुद एक गरीब मुल्क था. आर्थिक गुज़र नहीं हो सकता था. ओसामा ने अमरीकी हितों को नुकसान पंहुचाने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया.  इस तरह का पहला बड़ा हमला १९९३ में उसी वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर किया जिसे सितम्बर  २००१ में ज़मींदोज़ किया गया. सितम्बर २००१ के पहले और बाद में भी अल कायदा ने अमरीकी हितों को बहुत नुकसान पंहुचाया. इस तरह से अमरीका की कृपा से ही आतंक की दुनिया में प्रवेश करने वाले ओसामा बिन लादेन को अमरीका ने अपना दुश्मन नंबर एक घोषित कर दिया. पिछले दस साल से अमरीका ने ओसामा को मार डालने  या जिंदा पकड़ लेने के लिए खरबों डालर खर्च किया है.

ओसामा को पकड़ने और आतंकवाद से लड़ने के नाम पर पाकिस्तान ने ही अमरीका से करीब बीस अरब डालर की रक़म दस्तयाब की है. लेकिन अब तक कोई सफलता नहीं मिली थी. पाकिस्तान ने ओसामा बिन लादेन को तलाशने के लिए वजीराबाद के कबायली इलाके में अपनी फौज लगा रखा है, वहां उसकी फौज को बहुत सारी मुश्किलात पेश आ रही हैं लेकिन ओसामा को तलाशने का अभियान चल रहा है. बहरहाल अमरीकी खुफिया एजेंसी, सीआईए ने स्वतंत्र रूप से पता लगाने की कोशिश की और ओसामा मिल गया. वह पाकिस्तान के एक हिल स्टेशन पर आराम की ज़िन्दगी गुज़ार रहा था.

जब अमरीका को पता चला कि पाकिस्तानी फौज के इतने महत्वपूर्ण शहर में ओसामा रह रहा है और पाकिस्तानी सेना के मुखिया  अमरीका से मिलने वाली आर्थिक सहायता के बदले उसकी तलाश देश के उत्तरी दुर्गम इलाकों में करवा रहे हैं, तो अमरीकी हुकूमत की समझ में फ़ौरन खेल आ गया. उनको पूरी तरह से पता लग गया कि पाकिस्तान के असली हुक्मरान वहां के फौजी अफसर हैं और वे ओसामा बिन लादेन को किसी भी सूरत में अमरीका के हवाले नहीं करने वाले हैं. शायद उसी के बाद सीआईए ने तय किया कि ओसामा प्रोजेक्ट पर बिना पाकिस्तानी सहयोग के काम किया जाएगा. ओसामा को ख़त्म करने में अमरीका को सफलता केवल इसी रणनीतिक सोच की वजह से मिली है.

ओसामा बिन लादेन के मारे जाने का दुनिया के अलग अलग देशों में अलग अलग असर पड़ेगा. मसलन अमरीका में तो राष्ट्रपति ओबामा को दुबारा राष्ट्रपति बनने में आसानी होगी. जहां तक अमरीका के खिलाफ अल कायदा के आतंकवाद का सवाल है उस पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला है. पिछले दस साल से वैसे भी ओसामा बिन लादेन का सीधे तौर पर अलकायदा के काम में दखल नहीं था लेकिन अल कायदा की गतिविधियों में कहीं कोई कमी नहीं आई थी. इस घटना का सबसे ज्यादा असर पाकिस्तान में महसूस किया जाएगा. इस बात की पूरी संभावना है कि अब अमरीका पाकिस्तान को वह रक़म देना भी बंद कर देगा जो अब तक प्रोजेक्ट ओसामा के नाम पर बंधी हुई थी.

यह कोई मामूली दौलत नहीं थी. इससे एक बार फिर पाकिस्तान के सामने आर्थिक संकट के हालात पैदा हो सकते हैं. लेकिन पाकिस्तान के लिए इससे भी बुरा होने वाला है. पिछले दस साल से मुशर्रफ से लेकर ज़रदारी तक पूरी दुनिया में बताते रहे हैं कि ओसामा पाकिस्तान में नहीं है. अगर होगा भी तो कहीं उत्तर के वजीरिस्तान इलाके में होगा. अब जब ओसामा को एबटाबाद जैसे अहम शहर में पकड़कर मार दिया गया है तो पाकिस्तानी हुकूमत के लिए बहुत ही मुश्किल पेश आने वाली है. उसकी विश्वसनीयता पर संकट पैदा हो चुका है. हालांकि इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि ज़रदारी, गीलानी और रहमान मलिक जैसे राजनीतिक नेताओं को पाकिस्तानी फौज ने बताया ही न हो कि ओसामा उनकी हिफाज़त में है लेकिन यह तो और भी बुरा है. दुनिया के सामने तो फौज भी सिविलियन सरकार को ही सामने करके बात करती है.

हाँ इस बात में कोई दम नहीं कि पाकिस्तानी फौज़ को भी नहीं मालूम था कि ओसामा पाकिस्तान की मिलटरी अकेडमी वाले शहर में ही रह रहा है. वह लगभग पूरी तरह से सेना की कृपा से ही रह रहा था. इसके कई कारण हैं. ओसामा के नाम पर ही पाकिस्तान को अमरीकी मदद मिलती थी. इतने कीमती आदमी को सहेज कर रखना किसी के लिए भी ज़रूरी होता है. हालांकि यह बात भी भरोसे लायक नहीं लगती कि बिना पाकिस्तानी मदद के इतना बड़ा कारनामा किया जा सकता है.

हाँ यह हो सकता हो कि आपरेशन शुरू होने के ठीक पहले अमरीकी फौज के कुछ बड़े अफसर पाकिस्तानी सेना प्रमुख के पास चले गए हों और उन्हें कहा हो कि  वे लोग एबटाबाद में कुछ बड़ा काम करने वाले हैं, उसमें पूरी मदद करें. ज़ाहिर है कि जनरल परवेज़ कयानी को मौक़ा ही नहीं मिला होगा को वे ओसामा बिन लादेन को कहीं और शिफ्ट कर सकें.  बिना पाकिस्तानी फौज़ को भरोसे में लिए यह काम किसी भी सूरत में नहीं किया जा सकता था. इसे पूरी तरह से अमरीकी आपरेशन बता कर पाकिस्तान आने वाले दिनों में ओसामा के समर्थकों से आ रहे खतरों से बचने की सोच रहा होगा. जो भी हो एक राष्ट्रके रूप में पाकिस्तान के सामने भविष्य में बहुत ही मुश्किल पेश आने वाली है.

लेखक शेष नारायण सिंह जाने-माने पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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0 Comments

  1. Nitin Kumar srivastava

    May 3, 2011 at 4:19 pm

    अल-कायदा सरगना ओसामा बिन लादेन को अमेरिकी कार्रवाई में मौत से राष्ट्रपति बराक ओबामा को 2012 के राष्ट्रपति चुनाव में काफी बढ़ावा मिला है।घरेलू मोर्चे पर आलोचना झेल रहे ओबामा के लिए ओसामा की मौत एक ऐसी उपलब्धि है जिसे वह चुनावी मुद्दा बना सकते हैं…पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने स्वीकार किया है कि दुनिया के अति वांछित आतंकवादी ओसामा बिन लादेन पर पाकिस्तान के एबटाबाद शहर में हमला कर उसे मार गिराना, संयुक्त कार्रवाई नहीं थी। जरदारी ने कहा कि लादेन उस किसी भी स्थान पर नहीं था, जहां हमने उसके होने का अनुमान लगाया था।..

  2. धीरेन्द्र

    May 4, 2011 at 1:46 am

    नितिन भैया, अमेरिकियों की मानसिकता क्यों हम लोगों की तरह आंकते हो… कभी अमेरिका जाना हुआ है. संयोग से एक बार अपना वास्ता पड़ चुका है. इसलिये थोड़ा वहां के लोगों की मानसिकता समझें. चुनाव अभी नहीं है, अभी काफी समय बाकी है. हमारे यहां की तरह होता तो तीन महीने पहले कराया जाता. यह सत्य है कि ओबामा की लोकप्रियता बढ़ जायेगी लेकिन यह मत मानिये कि इतना फर्क पड़ जायेगा कि हार और जीत का अंतर हो जाये, फिर डेढ़ साल में देखिये कौन कौन से मुद्दे आते हैं…

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