मैंने क़सम ली- मैं फासिस्ट राजनीति और उसके कारिंदों के खिलाफ कुछ नहीं लिखूंगा

शेष नारायण सिंहप्रशांत भूषण की पिटाई के बाद इस देश की राजनीति ने करवट नहीं कई, पल्थे खाए हैं. जिन लोगों को अपना मान कर प्रशांत भूषण क्रान्ति लाने चले थे, उन्होंने उनकी विधिवत कुटम्मस की. टीवी पर उनकी हालत देख कर मैं भी डर गया हूँ. जिन लोगों ने प्रशांत जी की दुर्दशा की, वही लोग तो पोर्टलों पर मेरे लेख पढ़कर गालियाँ लिखते हैं.

चैनल मालिकों के व्यापारिक हित के लिए काम न करें जर्नलिस्ट : जस्टिस ज्ञान सुधा

शेषजी: हर मीडियाकर्मी के अंदर एक मुख्य न्यायाधीश होता है : सुप्रीम कोर्ट की जज न्यायमूर्ति श्रीमती ज्ञान सुधा मिश्रा ने कहा है कि मीडिया में काम करने वालों अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को सुनकर ही काम करना चाहिए. उन्होंने ख़ास तौर से टेलिविज़न वालों  को संबोधित करते हुए कहा कि मीडियाकर्मी भी एक तरह के जज हैं.

जीता कोई भी हो, हारा पाकिस्तान ही है

शेष नारायण सिंहकरीब 10 साल की कोशिश के बाद अमरीका ने ओसामा बिन लादेन को मार डाला. पूरी दुनिया में आतंक का पर्याय बन चुके ओसामा बिन लादेन को अमरीका ने ही बन्दूक के रास्ते पर डाला था और उसका इस्तेमाल किया था. जब पाकिस्तान में जनरल जिया उल हक का राज था तो अमरीका ने अफगानिस्तान में घुस आये सोवियत फौजियों को भगाने के लिए जो योद्धा तैयार किये थे, ओसामा बिन लादेन उसके मुखिया थे.

सुरेश कलमाड़ी गिरफ्तार, मीडिया और जनता जीती

भ्रष्टाचार के कुछ मामलों में सुरेश कलमाड़ी की गिरफ्तारी देश में चल रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान को ज़बरदस्त ताक़त देगा. आम तौर पर होता यह रहा है कि किसी भी केस में सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी अपने सदस्यों या सहयोगियों को गिरफ्तार नहीं करती. कहीं से बलि के बकरे तलाशे जाते हैं और उन्हें ही शील्ड की तरह इस्तेमाल करके नेता को बचा लिया जाता है. ऐसे सैकड़ों मामले हैं.

जो इस बकरीवाद से बच गया वो महान हो गया, जो फंसा वो दुकान हो गया

बकरी में में करती है। पत्रकार मैं मैं करने लगे हैं। हमारे एक पूर्व वरिष्ठ सहयोगी शेष नारायण सिंह कहा करते थे। कहते थे- पत्रकारिता में जो इस बकरीवाद से बच गया वो महान हो गया और जो फंस गया वो दुकान हो गया। मुझे तब यह बात अजीब लगती थी। शेष जी क्या क्या बोलते रहते हैं। अब उनकी बात समझ में आने लगी है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम का पहला राउंड सोनिया गाँधी ने जीता

शेष नारायण सिंह: एक विश्लेषण : अन्ना हजारे का आन्दोलन उच्चकोटि की राजनीति का उदाहरण है : पर आसानी से हार नहीं मानने वाले हैं हमारे देश के प्रोफेशनल नेता : अन्ना हजारे के अनिश्चितकालीन अनशन के दौरान मैं अस्पताल में पड़ा था. मुझे तो पीड़ा थी लेकिन डाक्टरों ने कहा कि बहुत ही मामूली बीमारी है. जो भी हो उस दौर में कुछ लिख नहीं पाया.

रवीश ने शेषजी को समर्पित किया आज का ब्लाग वार्ता

शेष नारायण सिंह भले 60 पार के हैं लेकिन उनके तेवर नौजवानों से कम नहीं. हरदम ताल ठोंककर ललकारने और लिखने को तैयार. प्रिंट और इलेक्ट्रानिक वालों ने जिन दिनों शेष नारायण सिंह को उनके तेवर के कारण किनारे कर दिया था, उन मुश्किल दिनों में न्यू मीडिया के लोगों ने उन्हें राष्ट्रीय फलक में स्थापित किया. और, उन्हीं दिनों की ट्रेनिंग में शेषजी ने अपना एक ब्लाग भी बना लिया.

अस्सी के पप्पू की असली दुकान मुंबई शिफ्ट

: ”काशी का अस्सी” पर फिल्म बना रहे डॉ चन्द्र प्रकाश द्विवेदी पूरी दुकान खरीद कर ट्रक में लाद मुंबई की फिल्म सिटी में स्थापित कर दिया :  नामवर सिंह और काशीनाथ सिंह देख आए शूटिंग, दोनो हैं प्रसन्न : पड़ाइन का रोल कर रही हैं साक्षी तंवर : रामदेई के रोल को सीमा आजमी कर रही हैं जीवंत : बनारसी पण्डे का रोल कर रहे हैं सनी देओल : रवि किशन कन्नी के रोल में हैं, मिथिलेश चतुर्वेदी बने हैं डॉ गया सिंह :

नाम नई दिल्ली, उम्र अस्सी साल

शेष नारायण सिंहआज से ठीक अस्सी साल पहले, 10 फरवरी 1931 के दिन नयी दिल्ली को औपचारिक रूप से ब्रिटिश भारत की राजधानी बनाया गया. उस वक़्त के वाइसराय लार्ड इरविन ने नयी दिल्ली शहर का विधिवत उदघाटन किया. १९११ में जार्ज पंचम के राज के दौरान दिल्ली में दरबार हुआ और तय हुआ कि राजधानी दिल्ली में बनायी जायेगी. उसी फैसले को कार्यरूप देने के लिए रायसीना की पहाड़ियों पर नए शहर को बसाने का फैसला हुआ और नयी दिल्ली एक शहर के रूप में विकसित हुआ.

आगे बढ़ती दुनिया में पिछड़ कर हांफती मीडिया

शेष नारायण सिंह: राजनीति की बारीक समझ को टीवी न्यूज़ का स्थायी भाव बनाना पड़ेगा : मिस्र में जनता सड़कों पर है. अमरीकी हुकूमत की समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करे. दुविधा की स्थिति है. होस्नी मुबारक का जाना तो तय है लेकिन उनकी जगह किसको दी जाए, यह अमरीका की सबसे बड़ी परेशानी है.

महात्मा गांधी ऐसी ही मौत चाहते थे!

shesh jiआज से ठीक तिरसठ साल पहले एक धार्मिक आतंकवादी की गोलियों से महात्मा गाँधी की मृत्यु हो गयी थी. कुछ लोगों को उनकी हत्या के आरोप में सज़ा भी हुई लेकिन साज़िश की परतों से पर्दा कभी नहीं उठ सका. खुद महात्मा जी अपनी हत्या से लापरवाह थे. जब २० जनवरी को उसी गिरोह ने उन्हें मारने की कोशिश की जिसने ३० जनवरी को असल में मारा तो सरकार चौकन्नी हो गयी थी लेकिन महात्मा गाँधी ने सुरक्षा का कोई भारी बंदोबस्त नहीं होने दिया.

घर से 15 और दुनिया से 80 की उम्र में भागे

[caption id="attachment_19325" align="alignleft" width="122"]प्रभाकर पणशीकरप्रभाकर पणशीकर[/caption]: मरने वाला महाराष्ट्र के ग्रामीणों का औरंगजेब था : प्रभाकर पणशीकर का जाना मराठी थियेटर का एक बड़ा नुकसान है : मराठी थियेटर के बड़े अभिनेता प्रभाकर पणशीकर नहीं रहे. १३ जनवरी को पुणे में उन्होंने अंतिम सांस ली. साठ से भी ज्यादा वर्षों तक मराठी थियटर में जीवन बिताने के बाद उन्होंने अलविदा कहा लेकिन इस बीच उनकी ज़िंदगी बहुत ही नाटकीय रही.

अलविदा ब्रायन हनरहन

बीबीसी के कूटनीतिक सम्पादक ब्रायन हनरहन की 61 साल की उम्र में लन्दन में मृत्यु हो गयी. उन्हें कैंसर हो गया था. 1970 में बीबीसी से जुडे ब्रायन हनरहन ने हालांकि क्लर्क के रूप में काम शुरू किया था लेकिन बाद वे बहुत नामी रिपोर्टर बने. भारत में उन्हें पहली बार 1984 में नोटिस किया गया जब वे मार्क टली और सतीश जैकब के साथ इंदिरा गाँधी की हत्या की रिपोर्ट करने वाली टीम के सदस्य बने.

उन्होंने पाकिस्तान के खूंखार जनरल जिया उल हक से पंगा लेने की तमीज सिखाई थी

[caption id="attachment_18322" align="alignleft" width="103"]भाई मंसूरभाई मंसूर[/caption]: भाई मंसूर की याद : इस साल भी उनका जन्मदिन मनेगा लेकिन वो न होंगे : कई लोगों ने कई वर्षों तक नहीं माना कि जवाहर लाल नेहरू भी पाखाने जाते होंगे : भाई मंसूर को विदा हुए धीरे धीरे छः महीने हो गए. इतने महीनों में कई बार उनका जिक्र हुआ लेकिन कोई यह मानने को तैयार नहीं है कि भाई मंसूर को जाना चाहिए था. बताते हैं कि भाई मंसूर आख़िरी वक़्त तक अपनी आदत से बाज़ नहीं आये थे. वे अपने चाहने वालों को खुश रखने के लिए कुछ भी कर सकते थे. यहाँ तक कि झूठ भी बोल सकते थे. मैं ऐसे दसियों लोगों को जानता हूँ जो इस बात की गवाही दे देंगे कि भाई मंसूर ने उनकी खुशी के लिए झूठ बोला था. जिस आदमी में कभी किसी फायदे के लिए झूठ बोला ही न हो उसके लिए यह बहुत बड़ी बात है. लेकिन कभी कोई उनके झूठ को पकड़ नहीं पाया. अपने भाई सुहेल हाशमी के लिए ही उन्होंने सुहेल के टीचर से झूठ बोला था लेकिन टीचर मियाँ को पता नहीं चला. मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूँ जो आजकल 55 से 60 साल की उम्र हासिल कर चुके हैं और माशा अल्ला बड़े दानिश्वर हैं या कम से कम दानिश्वरी की एक्टिंग तो करते ही हैं और अपने बचपन में भाई मंसूर के चेलों में शामिल थे.

पेड न्यूज : मालिक पकड़ा जाए, पत्रकार नहीं

शेष नारायण सिंह: क्योंकि पैसा तो मालिक खाता है, माध्यम बनता है पत्रकार : चुनाव में पेड न्यूज के चलते लोकशाही पर मुसीबत संभव : सोमवार को सभी पार्टियों के नेताओं के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त ने नयी दिल्ली में बैठक की और उनसे पैसा लेकर खबर लिखने और प्रकाशित करने की समस्या पर बात की.

तो ये है पत्रकारिता में टैलेंट संकट का राज!

शेष नारायण सिंहदूरदर्शन में भर्ती किये गए 25 पत्रकारों को नौकरी देने में पक्षपात के सबूत मिलने के बाद केंद्रीय प्रशासनिक पंचाट ने उनकी नौकरी रद्द कर दी है. जिन लोगों की नौकरी ख़त्म हुई है उसमें दिल्ली की एक कांग्रेसी नेता की बेटी भी है. यह नेता जी आजकल केंद्र सरकार में मंत्री हैं. चलता किए गए लोगों में एक अन्य मंत्री के रिश्तेदार भी हैं.

सरकारी आतंक और ‘शोले’ की सफलता

35 साल पहले 1975 के स्वतंत्रता दिवस पर फिल्म शोले रिलीज़ हुई थी. इस फिल्म की शुरुआत तो बहुत मामूली थी लेकिन कुछ ही दिनों में यह फिल्म पूरे देश में चर्चा का विषय बन गयी. देखते ही देखते सुपर हिट और फिर ऐतिहासिक फिल्म हो गई शोले. अब सोचता हूं तो लगता है कि शोले की सफलता व सरकारी आतंक के बीच गजब का रिश्ता है.

यह लड़की आज़मगढ़ की है

[caption id="attachment_17841" align="alignleft" width="241"]सीमा आजमीसीमा आजमी[/caption]: सीमा आजमी- भारतीय सिनेमा की नयी आजमी : मुंबई में शाहिद अनवर के नाटक, सारा शगुफ्ता का मंचन होना था. थोड़ा विवाद भी हो गया तो लगा कि अब ज़रूर देख लेना चाहिए. बान्द्रा के किसी हाल में था. हाल में बैठ गए. सम्पादक साथ थे तो थोडा शेखी भी बनाकर रखनी थी कि गोया नाटक की विधा के खासे जानकार हैं. सारा को मैंने दिल्ली के हौज़ ख़ास में २५ साल से भी पहले अमृता प्रीतम के घर में देखा था. बाजू में प्रीतम सिंह का मकान था, वहीं पता लगा कि पाकिस्तानी शायरा, सारा शगुफ्ता आई हुई हैं तो स्व. प्यारा सिंह सहराई की अचकन पकड़ कर चले गए.  इस हवाले से सारा शगुफ्ता से मैं अपने को बहुत करीब मानता था. लेकिन एक बार की, एक घंटे की मुलाकात में जितने करीब आ सकते थे, थे उतने ही क़रीब.

इस हिंदी वेब पत्रकारिता को सलाम

[caption id="attachment_17430" align="alignleft" width="89"]शेष नारायण सिंहशेष नारायण सिंह[/caption]पत्रकारिता के जनवादीकरण का युग : सच्चाई को कम खर्च में आम आदमी तक पहुंचाने का दौर : ये ऐसे अभिमन्यु हैं जो शासक वर्ग के खेल को समझते हैं : वेब मीडिया ने वर्तमान समाज में क्रान्ति की दस्तक दे दी है और उसका नेतृत्व कर रहे हैं आधुनिक युग के कुछ अभिमन्यु. मीडिया के महाभारत में वेब पत्रकारिता के यह अभिमन्यु शहीद नहीं होंगे.