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अपनों के ठुकराए इंद्र भूषण रस्‍तोगी किसे याद हैं?

: बदहाली में जीवन गुजारने को मजबूर है यह पूर्व संपादक :  ये इन्द्र भूषण रस्तोगी,  कोई गुमनामी बाबा नहीं हैं जो देश-भर में इनको कोई जानने वाला न हो. राजेश श्रीनेत जी के अमर उजाला, बरेली में सीनियर रह चुके श्री रस्तोगी देश भर में पत्रकारिता जगत खासकर संपादक मंडली में कभी परिचय के मोहताज नहीं रहे. उनका एक भरा-पूरा सम्पादकीय जीवन का इतिहास रहा है, यदि अभी भी उनके शेष जीवन का संरक्षण हो गया तो देश के भविष्य के निर्माण में इनका महत्वपूर्ण योगदान होगा.

: बदहाली में जीवन गुजारने को मजबूर है यह पूर्व संपादक :  ये इन्द्र भूषण रस्तोगी,  कोई गुमनामी बाबा नहीं हैं जो देश-भर में इनको कोई जानने वाला न हो. राजेश श्रीनेत जी के अमर उजाला, बरेली में सीनियर रह चुके श्री रस्तोगी देश भर में पत्रकारिता जगत खासकर संपादक मंडली में कभी परिचय के मोहताज नहीं रहे. उनका एक भरा-पूरा सम्पादकीय जीवन का इतिहास रहा है, यदि अभी भी उनके शेष जीवन का संरक्षण हो गया तो देश के भविष्य के निर्माण में इनका महत्वपूर्ण योगदान होगा.

आज जब देश भर में अक्षय तृतीया को कार्पोरेटीय अवसर बनाते हुए सोने की खरीद में सारे पूंजीपति व्यस्त थे तब मैं अपने वरिष्ठ साथी राजेश श्रीनेत जी के साथ आज के हृदयहीन समाज के लिए इस गुमनाम हो चुके व्यक्ति के खंडहरनुमा घर में दस्तक दे रहे थे. उनसे जब मिला तो लगा उनमें अभी पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने की आग ज्वालामुखी के फूटने के ठीक पहले की जैसी अपने चरम पर विद्यमान है. बातों में ऊष्मा का स्तर ऐसा जैसे अभी उनका श्रेष्ठ कार्य आना बाकी है. परन्तु आज का समाज क्या उन्हें इस काबिल मानता है. एक तरफ इसी कानपुर से निकल कर राज्यसभा के सदस्य बने पत्रकार और मालिकान हैं और दूसरी तरफ अपने निवास स्थल पर टिमटिमाते बल्ब की रोशनी में अपनी पहचान और अस्तित्व की लड़ाई लड़ते सूरज जैसे श्री रस्तोगी हैं. पत्रकारिता के कार्यकाल में पेशे के सभी संभावित बड़े पदों पर रह चुके इस व्यक्ति का आज का जीवन देखकर उसकी दशा पर कोई भी व्याख्या और विवेचना के लिए मेरे जैसे शब्दवीर के मन में चलती उथल-पुथल अकल्पनीय है.

1976 में पत्रकारिता का करियर अपनाने वाले श्री रस्तोगी ने कानपुर में दैनिक जागरण के अंग्रेजी अखबार से करियर शुरू किया. फिर ‘पायनिअर दैनिक’ से होते हुए ‘समाचार’ न्यूज एजेंसी में चले गए. यहाँ से काम करते-करते वे ‘ट्रिब्यून’ में काम करने लगे. यहाँ से ‘पंजाब केसरी’ में अस्सिटेंट एडिटर के पद पर तैनात हुए. फिर वे अमर उजाला में बरेली एडिशन के चीफ बनाए गए. भास्कर के शुरुआती दिनों की बात है जब वे अमर उजाला की प्रतिष्ठित नौकरी छोड़कर दैनिक भास्‍कर के भोपाल एडिशन के प्रमुख संपादक बनाए गए. तब के दैनिक भास्‍कर के सुधार और उत्थान में आपकी महती भूमिका थी. इसी बीच इन्हें लकवे का अटैक पड़ा. मालिकानों ने इनका इलाज कराया और कम महत्वपूर्ण और कम व्यस्त एडिशन ग्वालियर का काम सौंप दिया. परन्तु वे मालिकानों की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सके. शीघ्र ही इन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ा. हिसाब-किताब के बाद मिले धन को इनकी पत्नी और बेटियों ने ले लिया. इनके किये गए कामों के प्रतिफल के रूप में मालिकानों ने इनकी एक बेटी को अखबार में काम दे दिया. बाद में पत्नी भी उसी दैनिक भास्‍कर अखबार में काम करने लगीं. उन सभी ने ग्वालियर की जगह भोपाल में रहना शुरू कर दिया.

इसके बाद बेघर और बेसहारा अपंग श्री रस्तोगी ने कई छोटे-मोटे अखबारों और पत्रिकाओं में काम किया. परन्तु अपेक्षाओं के चरम के कारण आज के प्रतियोगी युग में वे टिक नहीं पाए. पत्नी, बेटे और बेटी आज उनकी बनादग्‍ स्थिति से मजे कर रहे हैं. राजेश जी बताते हैं बरेली में सानिध्य के दौरान उनका वैभवपूर्ण जीवन पत्रकारों के लिए ईर्ष्या का कारण होता था. वे अपने और अपने परिवार के रहन-सहन पर दिल खोलकर खर्च करते थे. परिवार के मन में उनके व्यवहार के प्रति कोई मलाल नहीं होना चाहिए था.परन्तु ये उनकी दूसरी पत्नी का परिवार था. पहली पत्नी के बेटे आज भी कानपुर में हैं. परन्तु वे स्वयं ही बदहाली में हैं. ऐसे में उनका मदद कर पाना अत्यंत दुष्कर है. खाने के लाले हैं. ऐसे में दैनिक दवाओं का खर्च भी कोढ़ में खाज जैसा ही है. संभव है की अपनी जवानी में उनसे भी कोई गलतियाँ हुयी हों, जिन्हें वे आज हम सभी से साझा नहीं कर पा रहे हों.

परन्तु उस परिवार की निस्पृहता और संवेदनशून्यता का ये चरम है की जीवन भर जिसके लिए उन्होंने काम किया और पाला, वो आज उन्हें पूरी तरह से भूल गया. ऐसा तो कोई रास्ते के फकीर के साथ नहीं करता जैसा उनके अपनों ने किया. उनकी काया की तरह ही उनका आवास भी अपनी बदहाली के आंसू रो रहा है. सालों से साफ़-सफाई का मोहताज आवास किसी भी दृष्टिकोण से आवासीय सुविधाओं से हीन है. छत लगता है की अब गिरी तो तब गिरी. बदबू का झोंका ऐसा की दम घुट जाए. कपडे़ ऐसे की लगता ही नहीं की ये वही रस्तोगी जी हैं जो अपने सम्पादकीय कार्य-काल में लांग-कोट और गले में महंगी टाई के लिए मशहूर थे. उनकी पीढ़ी के साथी उनका साथ छोड़कर अपने कामों में व्यस्त हैं. और वे शून्य को ताकते हुए हालात ठीक करने का प्रयास कर रहे हैं.

ऎसी हालत  में जब कोई दूसरा व्यक्ति आत्महत्या जैसी तैयारी करता वे आज भी नौकरी की तलाश में हैं. ये उनकी खुद्दारी का चरम है. इस स्थिति में भी उन्हें चाय न पिला पाने का मलाल है. देश भर में मानवीय संवेदनाओं को झकझोर देने वाली नोएडा की दो बहनों की कहानी अभी भुलाई नहीं गयी है. आज के महानगरीय समाज में पड़ोस में होने वाली मौतों से भी अनजान रहने वाला आज का समाज अगली पीढ़ी को क्या ऐसे ही संस्कार देकर जाएगा? आज भी उनके दिमाग में सैकड़ों ख़बरें अधूरी रह जाने का दुःख है. उनका जीवन जीने का उत्साह अदम्य है. कानपुर और देश के पत्रकारों और संपादकों से अनुरोध है कि उनकी आज की स्थिति के लिए उनका संवेदनशून्य रहना मानवता के साथ नाइंसाफी होगा. आशा करता हूँ की कानपुर का मालदार प्रेस क्लब स्वयं या फिर जिलाधिकारी के विवेकाधीन कोष सहित विभिन्न मदों से इस वरिष्ठ संपादक के मान-सम्मान और प्राणों की रक्षा में आगे बढ़कर सहयोग करेगा. उनके मालिकान रह चुके पूंजीपतियों से भी उनकी इस दशा में सहयोग की आशा करता हूँ.

लेखक अरविंद त्रिपाठी कानपुर में पत्रकार हैं तथा चौथी दुनिया से जुड़े हुए हैं.

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0 Comments

  1. vimal dixit

    May 10, 2011 at 11:46 am

    imaandaar patrakaro ka yahi anjaam hota h.kanpur k patrakaro ko inki madad ko aage aana chahiye..vimal dixit .

  2. Harishankar Shahi

    May 9, 2011 at 5:39 am

    अरविन्द त्रिपाठी सर का यह लेख अधिकतर लोगो को झकझोर गया होगा. गलतियाँ तो हर पेशे में होती हैं. लेकिन पत्रकार को इतनी सजा वाकई एक दर्द का सत्य है. अरविन्द जी ने हमसे कुछ समय पूर्व कहा था कि उनकी खबर कुछ अलग होगी. वाकई यह खबर अलग है क्योंकि खबर रखने वाले पत्रकार की खबर है.

  3. Jitendra Singh

    May 9, 2011 at 9:06 am

    Rastogiji paralysis ke shikar hone ke karan kaam nahi kar sakte, Unki ye sthiti 8 saal se he. PF va anya paisa dusri wife va uske beti-beton ne hadap ke unhe bahar kar diya. Rastogiji ek yogya va karmath patrakar rahe he. 1989 se 1995 tak unke saath kaam karne wale sabhi aaj achche jane-maane patrakar he, inme Sunil Shah, Palash Biswas, Indra Kant Mishra, Deshpal Singh Pawar bhi shamil rahe he. Yeh sabhi us time Amar Uajala Bareilly and Moradabad ke stambh hua karte the. Kumaon yani Uttarakhand ke 6 districts me Bareilly se hi paper chapkar jata tha. Mai Bareilly edition me us time Sub Editor tha. Sunil Shah va Indra Kant to malikanon ke ekdam khas uha karte the. In dono ne us time Rastogiji ko Amar Ujala Bareilly me hi bane rahne ka agrah kiya tha, lekin woh nahi maane, aur resign karke chale gaye. Amar Ujala se jaane ke baad hi unki health kharab rahne lagi thi. Dusri wife se tension rahti thi, Bhaskar me Dophar 12 se lekar raat 2 baje tak kaam karte rahte the. Tension and workload se wahi hua, jiska khatara tha. Paralysis ka attack Gwalior me pada tha. Staff ne kafi help ki thi.
    Ek vidambana patrakaron ke saath he, jab sankat aata he, muflisi ke din aate he, to kuch dino tak to help mil jaati he, baad me bahut bure din kaatne padte he. Is professsion me aaj bhi future ki safty ki guarantee nahi he. Rastogiji ne 8 saal kaat liye, abhi unki age 54-55 hi hogi, baaki din achche se katen, meri ISHWAR se yahi prarthan he.
    Jitendra Singh

  4. भारतीय नागरिक

    May 14, 2011 at 8:04 pm

    इस समय रस्तोगी जी कहां हैं…[email protected] पर बताने की कृपा करें…

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