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अपने पर लगे आरोपों का हेमंत तिवारी ने पत्र भेजकर दिया जवाब

लखनऊ : सभी मान्यता प्राप्त पत्रकार साथियों, उत्तर प्रदेश के राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त संवाददाताओं की एक समिति दशकों से प्रभावी है। उक्त समिति का काम मान्यता प्राप्त संवाददाताओं के काम काज को सरल सुगम बनाना रहा है। समिति के अंतिम चुनाव बीते साल जनवरी में विवादास्पद माहौल में संपन्न कराए गए। इसमें कई मान्यता प्राप्त पत्र प्रतिनिधियों को गैर कानूनी तरीके से मतदान के अधिकार से वंचित किया गया।

लखनऊ : सभी मान्यता प्राप्त पत्रकार साथियों, उत्तर प्रदेश के राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त संवाददाताओं की एक समिति दशकों से प्रभावी है। उक्त समिति का काम मान्यता प्राप्त संवाददाताओं के काम काज को सरल सुगम बनाना रहा है। समिति के अंतिम चुनाव बीते साल जनवरी में विवादास्पद माहौल में संपन्न कराए गए। इसमें कई मान्यता प्राप्त पत्र प्रतिनिधियों को गैर कानूनी तरीके से मतदान के अधिकार से वंचित किया गया।

और फिर एक कथित कमेटी का गठन कर लिया गया। कमेटी का गठन आज भी सवालों के घेरे में है। मतदान से वंचित किए एक दर्जन के लगभग मान्यता प्राप्त पत्रकार, लोकतंत्र में आस्था रखने वाले कई मान्यता प्राप्त पत्रकार इस कमेटी को अवैध मानते हैं और इसके गठन को हर स्तर पर चुनौती दे चुके हैं। चुनाव के तरीके, मान्यता प्राप्त पत्रकारों को मतदान से वंचित करने व इस कथित कमेटी के गठन व वैधता के सवालों पर सारी बात पहले सभी के संज्ञान में आ चुकी है। लिहाजा इन्हे दोहराना सामयिक न होगा।

गत 15 मई को मान्यता प्राप्त कथित संवाददाता समिति के स्वंयभू अध्यक्ष की ओर से पत्रकार साथियों को लिखे गए एक पत्र में जहां एक तरफ मुझ पर अनर्गल आरोप लगाए गए हैं वहीं दूसरी तरफ साल 2010 में हुए समिति के चुनाव को वैध ठहरा कर मान्यता प्राप्त संवाददाताओं का बेशर्मी से मखौल उड़ाया गया है। हालांकि मैं कथित अध्यक्ष के पत्र का जवाब देना इस लिहाज से भी उचित नही समझता था कि चुनाव वैध थे अथवा अवैध, यह तो संवाददाताओं का बहुमत भलीभांति जानता है और सरकार ने भी इसे अब तक मान्यता नही दी है। यह अपने आप में पुख्ता साक्ष्य है। पर व्यक्तिगत तौर पर मेरे उपर लगाए गए आरोपों के चलते बिंदुवार जवाब देना जरूरी समझता हूं। ”बहुचर्चित महान पत्रकार” कौन हैं, ये हमारे सभी साथी जान लें।

11 मान्यता प्राप्त पत्रकारों को मतदान से वंचित रखना न केवल अलोकतांत्रिक बल्कि कथित कमेटी की साजिश का एक हिस्सा रहा है। अगर ये साजिश नही थी तो कथित कमेटी 11 मान्यता प्राप्त पत्रकारों का मतदान कराने से आज भी क्यों बच रही है। कथित कमेटी के अध्यक्ष स्वंय कहते हैं कि यह संस्था परंपराओं और व्यवहार के आधार पर चलती रही है एसे में उनकों यह बताना जरूरी है पूर्व के चुनावों यथा 2007, 2005 एवं 2003 में मतदान की पूर्व संध्या तक मान्यता हासिल करने वालों को भी मतदान का अवसर दिया गया था और यह संख्या 1, 2 नही बल्कि 10-12 तक रही है। मेरा ही नही अधिकांश मान्यता प्राप्त पत्रकारों का साफ मानना है कि 11 नही अगर एक भी मान्यता प्राप्त पत्रकार को मतदान से वंचित रखा जाता है तो परंपराओं और व्यवहार का  खुला उल्लंघन है।

कथित कमेटी के अध्यक्ष के पत्र में कहा गया है कि 11 संवाददाताओं को वोट न डालने की आपत्ति केवल हेमंत को ही क्यों। यहां स्पष्ट कर दूं कि यह आपत्ति निर्वाचन अधिकारी जेपी शुक्ला को मैने ही लिखित रूप से नही बल्कि खुद मतदान से वंचित किए गए संवाददाताओं ने भी लिखित दर्ज करायी थी। मान्यवर लोकतंत्र में मतदाता से बड़ा कोई नही होता। यहां तक कि कथित कमेटी का अध्यक्ष भी नही। लिहाजा मेरी आपत्ति को भले दरकिनार कर दें पर मतदाताओं का तो अपमान न करें।

कथित कमेटी के अध्यक्ष को अगर जरा सी भी शर्म हो तो किसी पर निजी इल्जाम लगाने से पहले खुद को आइने में देख लें। उन्होंने कार्यकारिणी के चुनाव में सबसे ज्यादा वोट पाकर जीते निजाम के जाली हस्ताक्षर बनाने का इल्जाम मेरे ऊपर लगाया है। पहले तो उन्हें निजाम अली से खुद इस बात की तस्दीक कर लेनी चाहिए थी। मै चाहंूगा कि सभी मान्यता प्राप्त साथी इस बात को खुद निजाम अली से पूंछ लें। कथित कमेटी को मान्यता न दिए जाने संबंधी प्रदेश शासन को भेजे गए इस पत्र में श्री निजाम सहित कई दर्जन मान्यता प्राप्त पत्रकारों के न सिर्फ हस्ताक्षर हैं बल्कि भौतिक रूप से उपस्थित होकर भी इसका विरोध कई बार किया जा चुका है।

कथित अध्यक्ष महोदय ने अपने पत्र में यह भी लिखा है कि मुख्य निर्वाचम अधिकारी जेपी शुक्ला ने 16 दिसंबर 2009 को बुलायी गयी आम सभा के बाद 17 दिसंबर 2009 को सूचना निदेशक को पत्र लिख कर 16 दिसंबर 2009 तक राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त पत्रकारों की सूची मांगी थी जिसमें 30 दिसंबर को चुनाव कराने की बात कही गयी थी। जबकि 18 दिसंबर को कमेटी के अध्यक्ष प्रमोद गोस्वामी की ओर से बुलायी गयी आधिकारिक आम सभा ने 16 दिसंबर को चंद लोगों की कथित आम सभा की न केवल सर्वसम्मति से भर्त्सना की गयी बल्कि उसे अवैध करार दिया गया। इस आम सभा में हुयी भर्त्सना के प्रस्ताव पर हालिया कथित कमेटी के अध्यक्ष ने भी हस्ताक्षर हैं।

मेरी ओर से 18 दिसंबर को बुलायी बैठक में 16 दिसंबर की बैठक को अमान्य करार दिया गया था। कारवाई रजिस्टर देख लें खुद कथित कमेटी के अध्यक्ष सहित अन्य कई पदाधिकारियों के हस्ताक्षर उस पर हैं। यहां कथित अध्यक्ष को यह याद दिलाना जरूरी है कि 18 दिसंबर की आम सभा में हालांकि बहुमत श्री जेपी शुक्ल को मुख्य निर्वाचन अधिकारी बनाने के पक्ष में नही था मगर उनकी वरिष्ठता व विवाद से बचने के लिए उन्हे उक्त जिम्मेदारी पर बनाए रखा गया। श्री शुक्ल  के सहयोगी के तौर पर अंबरीश कुमार व गोलेश स्वामी को बैठक ने स्वीकृति दी थी। फिर किस अधिकार से मतदान कक्ष में बतौर सहयोगी विजय शंकर पंकज व नरेंद्र श्रीवास्तव को रखा गया। क्या यह सुनियोजित साजिश का एक दूसरा हिस्सा नही था?

कथित अध्यक्ष का यह आरोप कि हेमंत ने समिति को प्रमुख सचिव सूचना और सरकार के चरणों में गिरवी रख दिया, बेहूदा ही नही हास्यास्पद भी है। यदि समिति संवाददाताओं और सरकार के बीच बेहतर समांजस्य के लिए प्रमुख सचिव सूचना से संपर्क नही साधेगी तो क्या केंद्रीय मंत्री गुलाम नबी आजाद अथवा मरहूम अर्जुन सिंह के पास जाएगी। जहां तक मैं समझता हूं कि संवाददाताओं और सरकार के बीच समिति प्रमुख सचिव सूचना से सामंजस्य बैठा कर ही समाचार संकलन एवं अन्य दिक्कतें सुलझाती रही है। समिति को तो कोई भी गिरवी नही रख सकता अलबत्ता 11 वैध मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने षडयंत्र चुनाव अधिकारी को साथ लेकर कथित समिति ने जरूर किया।

कथित अध्यक्ष महोदय ने अपने पत्र में मुझे पद का लालची तक करार दे दिया है। यहां स्पष्ट करना चाहंगा कि लोकतंत्र के सभी पैमानों पर खारिज हो जाने के बाद भी खुद को कथित कमेटी का अध्यक्ष बता कर अपने पत्र के लिए सरकारी विज्ञापन जुटाने वाले कथित अध्यक्ष  लालची है या मैं। इसका अंदाजा इसी बात से लग सकता है कि मेरे सचिव के कार्यकाल में जब उनकी मान्यता सरकार ने नहीं की तो वे बराबर अधिकारियों के सामने गिड़गिड़ाते रहे और यदि इन जनाब को याद हो तो उस समय उनकी मान्यता लंबे अरसे तक कनीकी कमियों के चलते नही हो पायी थी तो मैंने ही तत्कालीन अध्यक्ष प्रमोद गोस्वामी के साथ दर्जनों बार तत्कालीन अधिकारियों से मिल कर ये तर्क रखे थे कि हिसाम सिद्दीकी साहब वरिष्ठ पत्रकार हैं अगर कुछ औपचारिकताओं में कमी है तो उसमें व्यवहारिक शिथिलता लाकर मान्यता दी जाए।

इतना ही नहीं,  दर्जनों मान्यता के एसे प्रकरणों में हमारी समिति ने पूरी ताकत से पैरवी की और अधिकारियों की हठधर्मिता के बावजूद मान्यताएं करायीं। मगर हिसाम साहब के मामले में शायद मैं इन तथ्यों से भिज्ञ नही था कि ये जनाब केंद्र सरकार की कुछ समितियों शामिल रहते हुए आर्थिक लाभ एवं भत्ते पा रहे थे और मान्यता के हकदार नही थे। हां कथित अध्यक्ष की मान्यता कराने का आरोप तो मुझ पर किसी हद तक लगाया जा सकता है ऐसा पिक एंड चूज मैं स्वीकार करता हूं।

पत्र में कथित कमेटी ने एकमात्र काम के रूप में सभी मान्यता प्राप्त पत्रकारों की मान्यता का नवीनीकरण दो साल के लिए किया जाना बताया है। कथित कमेटी ने अगर इस संदर्भ में कोई पत्र लिखा है तो सार्वजानिक करें। जबकि इस बारे में मेरी ओर से लिखा गया पत्र आपके सामने प्रस्तुत किया जा सकता है। हकीकत तो यह है कि कथित कमेटी जिस मान्यता के नवीनीकरण को अपनी उपलब्धि बता रही है उसे मूर्तरूप देने का काम उसी अधिकारी ने किया है जिससे माननीय सिद्दीकी जी मेरी सांठगाठ बताते हैं। मेरी इस कथित कमेटी के पदाधिकारियों को खुली चुनौती है कि नवीनीकरण के संदर्भ में किए गए अपने पत्र व्यवहार का खुलासा करें।

कथित कमेटी के अध्यक्ष कहते हैं कि हेमंत तिवारी पिक एंड चूज के आधार पर लोगों की मान्यता दिए जाने के हामी थे। हकीकत यह है कि मैनें तो सभी की मान्यता के नवीनीकरण के लिए पत्र लिखा था। पिक एंड चूज के स्वंय कथित कमेटी के अध्यक्ष कितने पैरोकार हैं इसका पता इसी बात से चलता है कि जिस पत्र का जवाब मैं फिलवक्त दे रहा हूं उसे कुछ चुनिंदा पत्रकारों को ही भेजा गया था। अभी एक दिन पहले कुछ और पत्रकार साथियों को उस पत्र की कापियां भेजी गयी हैं। स्वंय मुझे जिसके बारे में पत्र का 90 फीसदी हिस्सा संबोधित है उसे फिर भी कापी नही भेजी गयी है।

मुझ पर बहुचर्चित महान पत्रकार, विशेष किस्म की मानसिकता रखने वाला जैसे आरोपों से नवाजने वाले और अपने आप को मूर्धन्य कलमघसीट पत्रकारिता के स्कूल के विद्यार्थी बताने वाले साथी से जानना चाहूंगा कि नीचे उठाए गए बिंदुओं का भी जवाब दें तो बेहतर होगा।

1.  हेमंत तिवारी को सरकारी अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त है या पत्रकारिता के कलमघसीट विद्यार्थी को जो केंद्र सरकार की ओर से गठित कमेटी के सदस्य रहे हैं और सरकारी आवभगत व भत्तों का आहरण करते रहे हैं।

2. हेमंत तिवारी पद के लालची हैं या पत्रकारिता के कलमघसीट विद्यार्थी केंद्र में सत्तासीन राजनैतिक दल के न केवल सक्रिय सदस्य हैं, पेरोल पर हैं और और कांग्रेस के ताकतवर मंत्रियों व नेताओं के लिए सेमिनार एवं कांफ्रेस कराकर वोट जुटाने का काम करते रहे हैं।

3. हेमंत तिवारी बहुचर्चित महान पत्रकार हैं अथवा पत्रकारिता के कलमघसीट विद्यार्थी जो स्वतंत्र पत्रकार का मुखौटा पहनने के साथ साथ भारत सरकार के मानव संसाधन विकास एवं सूचना प्रसारण मंत्रालय की समितियों में सालों तक शामिल रह लालबत्ती के दौरे व सरकारी धन का दोहन करते रहे हैं। मान्यवर ये कैसी  कलमघसीट पत्रकारिता है कि एक तरफ पत्रकारों को नैतिकता की दुहाई और दूसरी तरफ सरकारी सहूलियतों का उपभोग।

4. हेमंत तिवारी विशेष किस्म की मानसिकता रखने वाले हैं तो कथित कमेटी के अध्यक्ष ने अपने तीन चौथाई कार्यकाल में पत्रकारों के हितों और सहूलियतों के लिए तो धेला भर कुछ नही किया अलबत्ता अपने पत्र के लिए अध्यक्षी के प्रभाव में उत्तर प्रदेश सरकार से लाखों का विज्ञापन लेने में जरूर सफल रहे। क्या यही कथित कमेटी की उपलब्धि मानी जाए।

कथित कमेटी अब तक किए गए कामों का कोई विवरण नही दे पा रही है और हर आरोप के जवाब में मेरी किसी अधिकारी से सांठ-गाठ का हवाला दे रही है। मीडिया सेंटर में बोर्ड उखड़ जाता है। कमेटी प्रेस रूम का इस्तेमाल तक नही कर पाती है और प्रेस कांफे्रस के समय पर व मंजूरी पर इसका कोई नियंत्रण नही। कवरेज को सुगम बनाने के लिए इसकी ओर से कोई प्रयास नही हो पाते। अगर उक्त सारे काम मैंने रोक रखे हैं तो मुझसे शक्तिशाली कोई नही और ऐसे में तो मुझे चुनाव मैदान में आने की जरूरत नही थी। कथित अध्यक्ष महोदय आप 350 से ज्यादा मान्यता प्राप्त पत्रकारों के अगुवा होने का दावा करते हैं और एक आदमी के आगे खुद को बेबस दिखाते हैं। ऐसे व्यवहार की आपसे उम्मीद नही की जाती है।

अगर मैं इतना प्रभावी और असरदार हूं कि कथित कमेटी पत्रकारों के हित में कुछ नही कर पा रही है तो नैतिकता का तकाजा है कि कथित अध्यक्ष तुरंत इस्तीफा दे दें और पत्रकार साथियों को गुमराह न करें।

जहां तक मेरे कार्यकाल में किए गए कामों का सवाल है उसे सभी पत्रकार साथी भलीभांति जानते हैं। मीडिया सेंटर को नया स्वरूप दिलाने की मेरी कोशिशों का लगातार विरोध करने वाले यही लोग हैं। चाहे मीडिया सेंटर का वर्तमान स्वरूप हो अथवा विधान भवन  का प्रेस रूम, पत्रकार हित में किए गए कामों की कदाचित गिनती कराने की आवश्यकता नही है, सच्चाई को गवाही की जरूरत नही है।

आपका साथी

हेमंत तिवारी

बटलर पैलेस, लखनऊ

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0 Comments

  1. Mahendra

    June 5, 2011 at 1:27 am

    Abey Fraud, Tu Kya Safai Dega… Sarkaari makaan Me Rahta Hai Sarkaar Ke Maal Par Palta Hai.. Har Roj Hawai Jahaaj Se Safar Karta Hai.. Wo bhi Sab Janne Walo Se Ticket Le Lekar.. Nahi Nahi Unko Murga SamajhKar Katta Hai Bakwaas Karta Hai… Apne Girebaan Me Jhankna .. Ph Bhi Sirf Unhi Ko Karta Hai Jin SE Kaam Hotta Hai

  2. rahul singh

    June 10, 2012 at 9:59 pm

    i agree wd d comment above which is 500 % correct..
    the latest is of drinking and fighting with children haf of his age and getting them harassed by the use of his power.
    how can he be so disgraceful and make a issue out of a small thing in which he himself is at fault..
    sad but they have 2 suffer bcoz he is the gr8 senior reporter mr HEMANT TEWARI..

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