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ऐसे अखबार के मालिकान को कुछ तो शर्म आनी चाहिए

[caption id="attachment_20667" align="alignleft" width="122"]योगेश कुमार गुप्त ''पप्पू''योगेश कुमार गुप्त ”पप्पू”[/caption]: आप एक-एक साल में करोड़ों के वाहन खरीद डालते हैं… हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का सालाना कारोबार करने वाले जागरण के देशभर में कितने संस्करण हैं, यह बताने की जरूरत नहीं… आपने अन्य कितने क्षेत्रों में पैर पसार रखे हैं, यह सच्चाई किसी से छुपी नहीं है… अब तो आपने अन्य अखबारों को भी खरीदना शुरू कर दिया है…  एक ही कर्मचारी से अखबार, वेबसाइट, मोबाइल तक के लिए खबरें लिखवा रहे हैं… फिर भी आप नहीं चाहते कि… :

योगेश कुमार गुप्त ''पप्पू''

योगेश कुमार गुप्त ”पप्पू”

: आप एक-एक साल में करोड़ों के वाहन खरीद डालते हैं… हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का सालाना कारोबार करने वाले जागरण के देशभर में कितने संस्करण हैं, यह बताने की जरूरत नहीं… आपने अन्य कितने क्षेत्रों में पैर पसार रखे हैं, यह सच्चाई किसी से छुपी नहीं है… अब तो आपने अन्य अखबारों को भी खरीदना शुरू कर दिया है…  एक ही कर्मचारी से अखबार, वेबसाइट, मोबाइल तक के लिए खबरें लिखवा रहे हैं… फिर भी आप नहीं चाहते कि… :

कथित तौर पर विश्व के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले समाचार पत्र दैनिक जागरण के कार्यकारी अध्यक्ष संदीप गुप्त का 21 जून 2011 के अंक में संपादकीय आलेख पढ़कर लगा मानो ‘बापू’ ने अपनी धोती व लाठी आधुनिक युग के अखबारी सौदागरों को ही सौंप दी है। सच्चाई यह है कि तिलक व बापू सरीखे भारत मां के सपूत स्वर्ग में बैठे आंसुओं के बीच यह कहते हुए इन मीडिया माफिया को कोस रहे होंगे……अरे मूर्खों, हम लोगों ने तो देश की आजादी के लिए अपना बलिदान दिया था और खून बहाया था। लेकिन तुम लोग तो कर्मचारी रूपी गुलामों का खून पीकर अपनी झोली भर रहे हो और अखबारों के बहाने अपनी आजादी पर आघात का रोना रो रहे हो।

मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश न हुई…..दफा 302 का मुकदमा दर्ज हो गया है। ऐसे प्रतीत हो  रहा है कि केंद्र सरकार द्वारा वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू करते ही अखबार मालिकों को फांसी हो जाएगी। सचमुच, संदीप जी ने वेज बोर्ड की खिलाफत जिस बनियउटी अंदाज में की है, वह शर्मनाक है। इतिहास गवाह है कि अब तक लागू वेज बोर्डों की सिफारिशों का जितना खुल्लमखुल्ला उल्लंघन दैनिक जागरण प्रबंधन ने किया है, देश में शायद ही ऐसा कोई दूसरा बड़ा अखबार घराना होगा। वेज बोर्ड की सिफारिशों के खिलाफ अदालत की शरण लेना इस अखबार की फितरत रही है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण मणिसाना वेज बोर्ड द्वारा 1996 में घोषित अंतरिम राहत है, जिसमें जागरण का वाराणसी प्रबंधन फौरन इलाहाबाद उच्च न्यायालय चला गया था। इसके खिलाफ काशी पत्रकार संघ एवं समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन के आठ वर्षों के संघर्ष का नतीजा यह रहा कि 75 स्थायी कर्मचारियों के बीच दस लाख रुपये बांटने में दैनिक जागरण वाराणसी के निदेशक श्री वीरेंद्र कुमार के सीने पर सांप लोट गया था।

उक्त राशि तो सिर्फ अंतरिम एवं उसका एरियर थी। वेज बोर्ड की अंतिम रिपोर्ट जारी होने के बाद हाईकोर्ट में जागरण प्रबंधन यह हलफनामा देकर छूटा कि उसने वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू कर दी हैं। लेकिन हकीकत यह है कि आज तक मणिसाना वेजबोर्ड की अंतिम सिफारिशें इस अखबार में लागू नहीं हैं और यदि वेज डिफरेंस का मुकदमा कर दिया जाय तो प्रबंधन कुछ करोड़ रुपये की चपत तो खा ही सकता है।

मेरे कहने का मतलब यह कि कर्मचारियों को तनख्वाह देने के मामले में जागरण प्रबंधन शुरू से ही फटे पायजामे की मानिंद रहा है, जिसमें लगातार पैबंद लगाकर कंजूस बनिया तन ढकने की कोशिश करता रहता है। कर्मचारियों के खून-पसीने पर अय्याशी कर रहे जागरण के मालिकानो की ख्वाहिश शायद यही है कि वेज बोर्ड रूपी आधा-अधूरा बंधन भी उनपर से हट जाय ताकि उनके यहां कार्यरत गुलामों की बेड़ियां पूरी तरह जकड़ जायं। ये गुलाम दिनभर अपना खून पसीना बहायें, अखबार परिसर में प्रस्तावित निःशुल्क अन्नपूर्णा भोजनालय में सपरिवार पेट भरें और फिर टाट-पट्टी बिछाकर वहीं सो जायं। ऐसे में नहीं लगता कि इन गुलामों को वेतन की भी जरूरत रह जाएगी।

अरे, संदीप बाबू आपने वाराणसी में बैठे अपने आदरणीय चाचाजी (वीरेंद्र बाबू) से तनिक भी ज्ञान लिया होता तो शायद ऐसा संपादकीय आलेख लिखने का आपमें कदापि साहस न उपजता। आप किस अखबार को आजादी दिलाने की बात कर रहे हैं, जिसके वाराणसी संस्करण में डेढ़ दशक पूर्व तक कर्मचारियों की बेसिक (मूल वेतन) की गणना पैसे में की जाती थी। जहां मंहगाई के नाम पर चूरन थमाया जाता था और मंहगाई का एरियर तो वीरेंद्र बाबू और उनके परम प्रिय प्रबंधक (मेरे मुंहबोले चचा) अनवार अली (जो अब स्वर्ग सिधार चुके हैं) की डिक्शनरी में था ही नहीं।

रात्रि पाली भत्ता के बारे में तो इस संस्थान के कर्मचारी आज तक नहीं जानते कि वह किस चिड़िया का नाम है। इन सबसे बढ़कर “ऐज पर एग्रीमेंट“ की मुहर लगी वेतनपर्ची किसी कर्मचारी को इस डर से नहीं दी जाती कि कहीं वह अदालत में उसे चुनौती न दे दे। जो वेतन पर्ची कर्मचारियों को दिखाने के लिए तैयार की जाती है, उसमें बेसिक, डीए, एचआरए, सीसीए या अंतरिम सहित अन्य भत्तों का कोई उल्लेख नहीं है। 10 से 15 साल पुराने अधिकतर पत्रकार साथी मिल जाएंगे, जिनका कुल वेतन अब तक 10-12 हजार रुपये का बैरियर नहीं पार कर सका है। ……….ऐसे अखबार के मालिकान सरकार से चौथे खम्भे की आजादी की बात कह रहे हैं…… उन्हें कुछ तो शर्म आनी चाहिए।

संदीप जी, आपने अपने आलेख में लिखा है कि मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों की स्वीकृति के बाद केंद्र सरकार के निर्देश पर अखबारों को जनवरी 2008 से अंतरिम राहत के तौर पर बेसिक की 30 प्रतिशत राशि कर्मचारियों को देनी पड़ रही है। मेरा आपसे सीधा सवाल है कि और अखबार प्रबंधन क्या कर रहे हैं, उनकी छोड़िए, आपकी किस यूनिट में अंतरिम लागू है, यही सार्वजनिक कर दीजिए।

जागरण के कार्यकारी अध्यक्ष महोदय, अपने वाराणसी वाले आदरणीय चाचा जी से पूछिए कि उन्होंने क्या गुल खिला रखा है। हालांकि पता यही चलता है कि वे बेचारे तो सबकुछ देना चाहते हैं, कानपुर वाले ही रोड़ा अटकाते रहते हैं। यह किसी से छिपने-छिपाने वाली बात नहीं है कि अंतरिम मामले में काशी पत्रकार संघ एवं समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन के मंत्री अजय मुखर्जी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मई, 2009 के निर्देश पर स्थानीय श्रम कार्यालय में वाराणसी से प्रकाशित सभी प्रमुख अखबारों के खिलाफ प्रत्यावेदन दाखिल किया।

लगभग दो वर्षों  की कश्मकश में अमर उजाला, हिन्दुस्तान, आज के साथ-साथ गांडीव जैसे छोटे अखबार के कर्मचारियों को भी कुछ न कुछ फायदा हुआ। लेकिन जागरण वाराणसी ने तमाम फर्जी दस्तावेज लगाने के बाद अंत में क्या किया? प्रबंधन ने अपने दस्तावेजों से यह दर्शाने की कोशिश की कि वह अपने कर्मचारियों को पहले से ही ज्यादा भुगतान कर रहा है। फिर अपने सभी पत्रकार कर्मचारियों को धमकाकर सिर्फ इसलिए काशी पत्रकार संघ की सदस्यता से इस्तीफा दिलवा दिया कि जब वे सदस्य ही नहीं रहेंगे तो संघ किसके लिए लड़ेगा। इसपर भी मन नहीं भरा तो दस-दस रुपये के स्टाम्प पेपर पर 97 कर्मचारियों का हलफनामा श्रम कार्यालय में यह कहते हुए दाखिल करा दिया गया कि उसके कर्मचारी मिल रहे वेतन से संतुष्ट हैं और संघ व यूनियन के पदाधिकारी बेवजह संस्थान में तनाव पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। सोचने वाली बात है कि कर्मचारियों के इस कदर शोषण के बाद भी जागरण प्रबंधन निर्लज्जता की पराकाष्ठा पार करते हुए सरकार से वेज बोर्ड मामले पर दो-दो हाथ करने के लिए तैयार है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि अखबार प्रबंधनों से लड़ाई बहुत कठिन होती जा रही है। लेकिन हम भी हैं कि हार मानने को तैयार नहीं। श्रम कार्यालय वाराणसी ने अंतरिम मामले में अखबारों के खिलाफ वसूलयाबी प्रमाणपत्र जारी करने का संघ व यूनियन का प्रत्यावेदन हाल ही में यह कहते हुए खारिज कर दिया कि जिस कर्मचारी को अंतरिम चाहिए, वह खुद आवेदन करे या संघ या यूनियन के नेता को अपनी लड़ाई के लिए अधिकृत करे। इसके खिलाफ संघ व यूनियन ने मई, 2011 में दूसरी याचिका इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दाखिल की और हाईकोर्ट ने अपर श्रमायुक्त का कर्मचारी विरोधी आदेश स्टे करते हुए मामले में प्रभावी कदम उठाने का निर्देश दिया है। देखने वाली बात होगी कि यह लड़ाई कहां तक खिंचती है।

फिलहाल….संदीप बाबू, आपने यह आलेख लिखने से पूर्व यह तो सोचा होता कि शुरुआती वेज बोर्ड के गठन के वक्त आपके परमपूज्य दादाजी स्व. पूर्णचंद गुप्त, परम आदरणीय पिताश्री स्व. नरेंद्र मोहन एवं संप्रति राज्यसभा सदस्य महेंद्र मोहन सहित अन्य चाचाओं ने छोटी पूंजी से ही अखबारी जगत में कदम रखा होगा। आज क्या स्थिति है? पूर्वजों द्वारा खड़े किये गये महल पर आप जैसे न जाने कितने भाई भतीजे ऐश काट रहे हैं। आप एक-एक साल में करोड़ों के वाहन तक खरीद डालते हैं। बाकी अय्याशी की बात ही छोड़ दीजिए। एक हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का सालाना कारोबार करने वाले जागरण के देशभर में कितने संस्करण हैं, यह बताने की जरूरत नहीं। अखबार के अलावा आपने अन्य कितने क्षेत्रों में पैर पसार रखे हैं, यह सच्चाई किसी से छुपी नहीं है। अब तो आपने अन्य अखबारों को भी खरीदना शुरू कर दिया है। क्षेत्रीय भाषाओं के संस्करण निकाल रहे हैं। एक ही कर्मचारी से अखबार, वेबसाइट, मोबाइल तक के लिए खबरें लिखवा रहे हैं। फिर भी आप नहीं चाहते कि आपके कर्मचारियों की माली हालत कम से कम जीने लायक तो सुधर जाय। मेरी विनम्र प्रार्थना है कि इतने निष्ठुर न बनें और ईश्वर से डरें……..

बातें तो बहुत हैं…….लेकिन फिर कभी

आपका

योगेश कुमार गुप्त ”पप्पू”

लेखक योगेश कुमार गुप्त ”पप्पू” वरिष्ठ पत्रकार हैं. दैनिक जागरण, वाराणसी में काम कर चुके हैं. हिंदुस्तान सहित कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. मीडियाकर्मियों के मुद्दे पर बिना डरे बिना झुके सतत लड़ने वाले. इन दिनों काशी पत्रकार संघ के अध्यक्ष के रूप में अखबारकर्मियों के कई मसलों पर संघर्षरत.

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0 Comments

  1. Nitin Pushkarna

    June 23, 2011 at 6:36 am

    Jiyo Pappu bhai , bahut dino ke bad li angrai .
    best wishes.

  2. avadh

    June 23, 2011 at 6:51 am

    waah…. yogesh ji kamal ka likha hai…kaas aap jese ye log ho jaye to koi b journalist bhukhmari ki kagar pr na aaye…mujhe aapka lekh bahut achha laga,….
    mene jese hi aapka lekh padana start kiya …to fir padata hi gya….
    ye jo top pr bethe huye aaka hai..khud ko khuda samjh bethe hain..
    aapki naseehat sayad inke kam aaye…

  3. kumar

    June 23, 2011 at 9:35 am

    excellent utari hai bhaisb., par jane kis mati ke bane hai yeh akbharwale, ju tak nahi rangti……..phir do din bad vapas shuru ho jayege

  4. ajay kumar

    June 23, 2011 at 12:50 pm

    sahi juta mara hai bhai.hum tumhare sath hai.

  5. atul dubey

    June 23, 2011 at 1:52 pm

    utar diiiiiiiiiiiiiiii

  6. rajesh kumar

    June 23, 2011 at 5:04 pm

    best of luck Pappu Bhai,
    kash yeh jajbat press me kam karna wala har employee me aa jay. wasa jagran se umeed karna bekar hai.

  7. sudhir awasthi

    June 24, 2011 at 6:41 am

    aapke vichoron se prbhavit hokr yh pnktee————-likee hkeekt btn dbakr, kre byan klesh, sangharshmyee ko abhinandn, sath me hum yogesh. sudhir awasthi (hardoi)up

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