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आगरा के डीएम अजय चौहान को रिश्वत में पचास लाख रुपये चाहिए!

पुण्य प्रसून बाजपेयी: आगरा का ताजमहल, जूता और कलेक्टर : ताजमहल ने अगर आगरा को पहचान दिलायी तो आगरा के जूतों ने आगरा के कलेक्टर को। और आगरा के कलेक्टर का एक मतलब है स्टाम्प ड्यूटी का ऐसा खेल, जिसके शिकंजे में जूतो का जो उघोगपति फंसा तो या तो उसका धंधा चौपट हुआ या फिर करोड़ों रुपये का हार कलेक्टर को पहनाया गया।

पुण्य प्रसून बाजपेयी: आगरा का ताजमहल, जूता और कलेक्टर : ताजमहल ने अगर आगरा को पहचान दिलायी तो आगरा के जूतों ने आगरा के कलेक्टर को। और आगरा के कलेक्टर का एक मतलब है स्टाम्प ड्यूटी का ऐसा खेल, जिसके शिकंजे में जूतो का जो उघोगपति फंसा तो या तो उसका धंधा चौपट हुआ या फिर करोड़ों रुपये का हार कलेक्टर को पहनाया गया।

करोड़ों का इसलिये क्योंकि आगरा के जूतों की पहचान समूचे यूरोप-अमेरिका में है। आगरा का कलेक्टर आगरा के जूते नहीं बल्कि आगरा के जूता मालिको के रुतबे को देखता है। और अपने मुताबिक नियमों का खेल कर सालाना पांच सौ करोड़ बनाना कोई बड़ी बात होती नहीं। सिर्फ फंसाने का अंदाज सरकारी होना चाहिये। इसमें नियम-कायदे सरकारी नहीं कलक्टर के चलें। और जांच से लेकर डराने-वसूलने तक जूता मालिक खुद के जूते पहनने तक झुके नहीं, तब तक खेल चलाना आना चाहिये।

जाहिर है इसमें जूता मालिक पर डीएम यानी जिलाअधिकारी का रौब और एसपी का खौफ रेंगना चाहिये। और कलेक्टर के इस खेल के नये शिकार हैं महाशय शाहरु मोहसिन। आगरा के बिचपुरी रोड पर मटगई गांव में जूता उघोग मै. यंगस्टाइल ओवरसीज के नाम से चलाते हैं। इनके जूते इटली, जर्मनी और फ्रांस में साल्ट एंड पीपर के नाम से बिकते हैं। विदेशी बाजार में धाक है। आगरा के जूतों को लेकर अंतर्र्राष्ट्रीय साख है तो कलेक्टर का खेल तो जम ही सकता है।

बस, फांसने का खेल शुरु हुआ। शाहरु मोहसिन जिस किराये के घर-जमीन पर इंटस्ट्री चलाते थे, उस जगह के मालिक ने बैंक से करोड़ों का लोन लिया था। चुकता नहीं किया। तो कैनरा और ओवरसिज बैंक ने उस जगह को बेचने की निविदा अखबारों में निकाल दी। छह खरीदार पहुंचे। चूंकि शाहरु मोहसिन उसी जमीन पर इंडस्ट्री चला रहे थे तो बैंक ने उन्हें प्राथमिकता दी। और ढाई हजार वर्ग मीटर की इस जमीन की कीमत दो करोड़ दो लाख रुपए तय हुई। बैंक ने शहरु मोहसिन को नया मालिक बना दिया और अखबारों में विज्ञापन के जरीये जानकारी निकाल दी कि दो करोड दो लाख में मडगई ग्राम की गाटा संख्या 191-192 बेच दी गयी।

बस नजरें कलेक्टर की पड़ीं। सरकारी काम शुरु हुआ। जमीन को लेकर सरकारी दस्तावेजों के साथ नोटिस जूतों के मालिक के घर पहुंचा। इसमें लिखा गया कि सरकारी निरीक्षण में पाया गया कि जमीन लगभग चार हजार वर्ग मीटर की है। और जमीन निर्धारित बाजार रेट से बेहद कम पर खरीदी गई। लिहाजा जमीन की कीमत दो करोड़ दो लाख नहीं बल्कि 39 करोड़ 91 लाख 31 हजार 180 रुपया होना चाहिये। और कम कीमत में जमीन खरीद कर सरकारी स्टाम्प ड्यूटी की चोरी की गई है। ऐसे में दो करोड़ 65 लाख 24 हजार 940 रुपये स्टाम्प रुपये और अलग से दो लाख रु दंड के तौर पर चुकाये जाने चाहिये।

साफ है कि ऐसे में कोई भी उघोगपति दो ही काम कर सकता है। एक तो जमीन की माप की सरकारी जांच कराने की दरख्वास्त कर जमीन की कीमत, जो कलक्टर ने ही पहले से तय कर रखी होगी, उसकी कॉपी निकलवाकर दिखाये। या फिर कलक्टर के आगे नतमस्तक होकर पूछे-आपको क्या चाहिये। तो शाहरु मोहसिन ने पहला रास्ता चुना और यहीं से आगरा के बाबूओं के उस गुट को लगने लगा कि उनके ही जिले में कोई उनकी माफियागिरी को चुनौती दे रहा है। डीएम के नोटिस में जमीन की कीमत 19 हजार रुपये प्रति वर्ग मीटर बताया गया। जबकि कलेक्टर के ही दस्तख्त से जमीन की कीमत 3500 रुपये वर्ग मीटर पहले से निर्धारित थी।

मामला यहां गड़बड़ाया तो झटके में कलेक्ट्रेट ऑफिस ने जमीन को व्यवसायिक करार दिया। लेकिन चूक यहां भी हो गई। क्योंकि यूपी सरकार के नियम तले व्यवसायिक जमीन की परिभाषा में उघोग आता नहीं है। लेकिन उसके बाद जमीन की माप को गलत बताया गया। लेकिन यहां भी बैंक के दस्तावेज ने बाबूओ की नींद उड़ा दी। फिर जमीन को मापने की बात कहकर जिस तरह सरकारी बाबू यानी तत्कालिन एडीएम अपर जिलाधिकारी उदईराम ने लगभग चार हजार वर्ग मीटर का जिक्र किया, उससे कलेक्टर का खेल और गड़बड़ाया। लेकिन कलेक्टर तो कलेक्टर है। उसने न आव देखा न ताव। तुरंत स्टाम्प ड्यूटी ना चुकाने पर जूता फैक्ट्री में ही ताला लगाने के आदेश दे दिये।

शहरु मोहसिन ने तुरंत लखनऊ के दरवाजे पर दस्तक दी। लखनऊ तुरंत हरकत में आया। कमिश्नर को पत्र लिख कर पूछा कि यह स्टाम्प ड्यूटी का मामला क्या है। इस पर कमिश्नर ने अपर आयुक्त प्रमोद कुमार अग्रवाल को चिठ्टी लिखी। फिर प्रमोद अग्रवाल ने 19 जुलाई 2011 को आगरा के जिलाधिकारी अजय चौहान को चिठ्टी [पत्र संख्या 844] लिखकर 15 दिन के भीतर समूची जानकारी मांगी। लेकिन खेल तो पैसा वसूली का था और दांव पर आगरा के नौकरशाहों की दादागिरी लगी थी, जो आपस में चिठ्टी का खेल खेल रहे थे। तो नतीजा चिट्ठी को फाइल में ही दबा दिया गया। लेकिन लखनऊ से दुबारा 30 अगस्त को जब दुबारा पत्र आया कि जांच रिपोर्ट अभी तक नहीं आयी है, जिसे पन्द्रह दिनों में आना चाहिए था। अब हफ्ते भर में रिपोर्ट दें कि सच है क्या।

जाहिर है सच बताने के काम का मतलब सरकारी नियम-कायदो से लेकर बैंक द्वारा बेची गई फैक्ट्री की जमीन पर उठायी अंगुली को लेकर भी फंसना था। और स्टाम्प ड्यूटी की चिंता कर जूता फैक्ट्रियों के मालिक से अवैध वसूली के धंधे पर से भी पर्दा उठना था। ऐसे में जिलाधिकारी ने अपनी दादागिरी का आखिरी तुरुप का पत्ता फैक्ट्री के मालिक के खिलाफ गिरफ्तारी का आदेश देकर फैक्ट्री पर ताला लगवाकर फेंका। आनन फानन में एसडीएम ने नोटिस निकाला और 22 सितंबर को नेशनल बैंक में फैक्ट्री के बैंक अकाउंट को सीज कर लिया। चूंकि ज्यादातर ट्रांजेक्शन यूरोपीय देशों में होते हैं तो झटके में सबकुछ रुक गया। इस दौर में फैक्ट्री के मालिक शहरु मोहसिन इटली में आगरा के जूतों की मार्केटिंग में व्यस्त थे तो खबर मिलते ही उल्टे पांव दौड़े।

दो दिन में दिल्ली पहुंचे। तो आगरा से पत्नी ने फोन कर बताया कि फैक्ट्री का अकाउंट भी सील कर दिया गया है। और पुलिस घर और फैक्ट्री के बाहर डीएम के आदेश का डंडा गाढ़ कर बैठी है कि शहरु मोहसिन आगरा में पहुंचे तो उन्हें गिरफ्तार कर ले। अब शहरु मोहसिन दिल्ली में बैठे हैं। हर दस्तावेज दिखाने और समूची कहानी कहने के बाद इतना ही कहते हैं- मैंने सिर्फ इतनी ही गलती की कि उनको पैसा नहीं दिया। यह उसी की सजा है। 50 लाख की मांग अधिकारी सौदेबाजी में अपने कमीशन के तौर पर कर रहे थे। लेकिन मैंने गलत क्या किया। अन्ना के बारह दिन के उपवास के बाद भरोसा हमारा भी जागा था। लेकिन यह तो अत्याचार है।

आगरा में घुस नहीं सकता। बीबी, बच्चो से मिल नहीं सकता । बूढ़े अब्बा आगरा से बार बार फोन पर कहते हैं डीएम- कलेक्टर तो खुदा से बढ़कर हैं। अम्मी कहती हैं खुदा पर भरोसा रखूं। अब लखनऊ जा रहा हूं । देखूं वहा सेक्रेटिएट की पांचवीं मंजिल से न्याय मिलता है या नहीं । वहां से आगरा जाने का रास्ता बनता है या नहीं। जहां पूरा परिवार खौफ में है।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी देश के जाने-माने जर्नलिस्ट हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

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0 Comments

  1. manish srivastava

    September 28, 2011 at 9:18 pm

    dekhna lajmi hoga dm sahab ka rasookh kahi pancham tal pe hi na bhari pad jaye kyoki uttar pradesh ko milkar yahi IAS LOOT RAHE LOOT ME EMAANDAARI PURI RAHTI HAI tabhi commisioner par dm bhari pad gaya jab up k pramukh sachiv niyukti n home fatehbahadur khud 300 crore ki vijilence jaanch me fanse ho IAS CHANCHAL TIWARI VIJAY SHANKAR PANDEY ALOK TANDON NETRAM MAHESH GUPTA S DHANLAKSHMI SATYAJEET THAKUR DEEPAL SINGHAL DR GURDEEP SINGH SACCHIDANAND CHANDRIKA PRASAD TIWARI JAISE EK SE BADKAR EK GHOTALEBAAK OFFICERS K HATH ME SATTA KI CHABI HO TO PANCHAM TAL B KYA KAR LEGA..PRASOON SIR SALAAM 4 DIS ARTICLE KYOKI KISI NE TO MAYA RAAZ KA ASAL SACH KHOLA…

    MANISH SRIVASTAVA
    BUREAU CHIEF
    NISHPAKSH PRATIDIN
    LUCKNOW

  2. prashant

    September 29, 2011 at 3:08 am

    koi bhi dm itni badi himakat nahi kar sakta. nischit roop se kuchh tathya honge.

  3. Harishankar Shahi

    September 29, 2011 at 4:38 am

    काश अजय चौहान किसी चैनल के स्ट्रिंगर होते तो कितना अच्छा होता. 60 हज़ार अपने जेब से कैमरा और आईडी में खर्च करके बिना किसी सैलरी के चार पहिया नई नई गाड़ियों पर चलते. रोज थानों में चाय पार्टी और मौका मिले तो दारु पार्टी उड़ाते. जमीनों पर कब्ज़ा करते वह भी अधिकारीयों के ही बूते तब शायद इन पर कोई आरोप ना लगता क्योंकि लग्गिधारी चैनल वाले होते तो कोई आरोप ना लगता.
    हाँ अगर अजय चौहान IAS होने की जगह कोटेदार और ठेकेदार होते और साथ ही एजेंसी और विज्ञापन के बूते अखबार लाते और साथ ही अवैतनिक होकर लाखो करोडो के ठेके लेते. साथ डीएम के बगल बैठकर पूरे जिले में डीएम वाला रोब ग़ालिब करते तो शायद इन पर कोई आरोप नहीं लगता.
    सरकारी विभाग के या अधिकारियों के ऊपर कितना आसान है आरोप लगाना परन्तु अपने यहाँ हो रहे गडबडी को कौन देखता है. बड़े आदमी से पैसा माँगा गया तो उसकी बेचारगी सबको दिख रही है. परन्तु अगर कलेक्टर इतना घूसखोर है तो फिर उसने किसी को भी नहीं छोडा होगा तो कभी गरीबों की भी आवाज़ उठानी चाहिए. पर हो सकता है कुछ कारण होगा कि बड़ी मीडिया सिर्फ बड़े लोगो की आवाज़ उठाता होगा.
    वैसे डीएम गलत हो सकता है और इस मामले में अगर गलती हो तो उन्हें सजा मिलनी चाहिए. पर इतनी बड़ी रिश्वत का मामला अभी तक बवाल नहीं बना यह भी सोचने वाली बात है. एक एक रेप की घटना को खूब दिखाने वाले लोग इस पर चुप क्यों बैठे हैं. वैसे एक बात और भी है इतने बड़े उद्योगपति हैं और एक वकील या जमानत या कोर्ट का रास्ता नहीं अपना रहें हैं यह भी उनकी बहादुरी ही है. बेचारे ने डीएम के करतूतों की जानकारी मीडिया को तो दे दी परन्तु अपने वकील की व्यवस्था नहीं की यह भी उन उद्योगपति महाशय की दिलेरी का ही नमूना है.
    यह घूसखोरी और भ्रष्टाचार पूरी तरह से मिटना चाहिए और ऐसे डीएम के खिलाफ जाँच होनी चाहिए. जिससे आगे यह भी पता लग सके की कैसे एजेंसी और विज्ञापन तथा आईडी और कैमरा वाले तथाकथित स्ट्रिंगर पत्रकार लोग कैसे लखपति और करोड़पति बन जाते हैं. आखिर भ्रष्टाचार तो भ्रष्टाचार है.

  4. rk singh

    September 29, 2011 at 4:21 pm

    अजय चौहान per arop lagane se pale pata karlo Bareilly jalaun,pilibhit ,Bagpat aur Shahjahanpur me kaya wah Bhrast the. yadi nahi to Agra me Bhrast kion honge.अजय चौहान honest bap ka beta hai. Arop lagne walo apne girewan me dekho.yah yad rakho khabarchi bhi lokpal bill me laye jayenge.

  5. आगरावासी

    October 4, 2011 at 12:28 pm

    अजय चौहान के बारे में मैंने यह निहायत ही भद्दी तरह से लिखा गया लेख पढ़ा….. पढकर ताज्जुब हुआ कि कहीं ऐसा भी हो सकता है? जो जिला मंडल मुख्यालय हो और जिस जिले का कमिश्नर बादशाह हो वहाँ कोई कलक्टर इस तरह खुलेआम कमिश्नर से पंगा ले सकता है? खुद ही सोचिये.
    अजय चौहान को आगरा का कलक्टर बने महीनों बीत गए, हमने बेचारे की शक्ल तक ठीक से नहीं देखी और आप लगे हैं उसे भ्रष्ट घोषित करने में? भ्रष्ट होता तो हर चौराहे पर कलक्टर के नाम पर वसूली हो रही होती.

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