लखनऊ में अरविंद केजरीवाल पर चप्पल फेंकने वाला युवक जालौन निवासी जितेंद्र पाठक है

फिर हुआ टीम-अण्‍णा पर हमला। प्रशांत भूषण के बाद अब अरविंद केजरीवाल पर हमला हो गया है। लखनऊ के झूलेलाल पार्क में चल रही एक जनसभा में उन पर चप्‍पल से हमला हुआ। हमलावर जालौन का निवासी जितेंद्र पाठक है। हमलावर जितेंद्र पाठक को पकड़कर लोगों ने धुना और पुलिस के हवाले कर दिया। अरविंद केजरीवाल लखनऊ में देर शाम एक जनसभा में आये थे।

इस सभा का आयोजन इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शन की ओर से आयोजित किया गया था।  अरविंद केजरीवाल अभी बोलने के लिए खड़े ही हुए कि भीड़ में शांति से बैठे एक युवक ने उनकी ओर चप्‍पल खींच कर दे मारी। मंच समेत पूरे सभास्‍थल पर भगदड़ सी मच गयी। इसके पहले कि वहां मौजूद पुलिसवाले कुछ समझ पाते, एक झुंड उस युवक की ओर बढ़ा और जमीन पर पटक कर उस युवक को रौंदना शुरू कर दिया।

लात-घूंसों से उसकी पिटाई हुई और उसके कपड़े भी फाड़ दिये गये। बाद में पुलिस ने हस्‍तक्षेप करके उसे बचाया और अपनी हिरासत में ले लिया। इस घटना से पूरे सभास्‍थल का माहौल तनावग्रस्‍त हो गया। पुलिस हमलावर युवक को थाने ले जाकर पूछताछ कर रही है। भाजपा, सपा और कांग्रेस समेत कई दलों ने इस घटना को दुर्भाग्‍यपूर्ण बताते हुए इसकी कड़ी निन्‍दा की है। राजद के अध्‍यक्ष लालू प्रसाद ने इस हादसे को डिस-एप्रूव करते हुए कहा है कि टीम-अण्‍णा को भी अपनी जुबान पर लगाम देनी चाहिए।

लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर की इस रिपोर्ट के लिए भड़ास4मीडिया टीम आभारी है.

बीसी खंडूरी की ईमानदारी पर विकीलीक्स का तमाचा

घपले-घोटालों को लेकर निशंक की घेराबंदी करने में बीसी खंडूरी ने हर वो दांव चला जो उन्हें सीएम की कुर्सी पर पुनः बैठा सकता था। सो उत्तराखंड में भाजपा में कथित तौर पर ईमानदार चेहरे के रूप में जाने जाने वाले खंडूरी इन दिनों राज्य को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के दावे दर दावे कर रहे हैं। लेकिन खंडूरी खुद दूध के धुले नहीं है। जी हां, यह पूरी तरह सच है।

इस बात की तस्दीक दुनियाभर में अपने खुलासों से तहलका मचाने वाले विकीलीक्स द्वारा हाल में जारी किए गए केबल से भी होता है। अमेरिका के नई दिल्ली दूतावास की ओर से वाशिंगटन को भेजे गए एक केबल में कहा गया कि 2007 में बीसी खंडूरी की नेतृत्व वाली उत्तराखंड सरकार भ्रष्टाचार में डूबी हुई थी। यह केबल 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान भेजा गया था। केबल में कहा गया-  ”BJP-run state government as ideologically bankrupt and only focused on making money. He alleged the government had claimed falsely that Maoist insurgents were coming into the state, rounded up some Nepalese citizens to support these claims, and then requisitioned security supplies from the center to fight the threat the government had engineered.”

अमेरिकी दूतावास ने अपने केबल में 2002 से 2007 तक सत्ता संभालने वाली कांग्रेस पर भी तल्ख टिप्पणी करते हुए उसे भी भ्रष्ट करार दिया। लेकिन राज्य के विकास के लिए एनडी तिवारी की सराहना भी की। केबल में कहा गया कि जनता इस पूर्व सीएम को मिस कर रही है। केबल में कुछ इस तरह गया गया-  ”Many of our interlocutors said that the previous Congress Party state government was horribly corrupt, but it also made progress in the development of the state during its tenure. They claimed that the public misses former Congress Chief Minister N. D. Tiwari, saying that he was the only one who had a vision for the state and could move initiatives forward. Now the state has a government that is corrupt but doesn’t follow through on what it has been bribed to do.”

दस साल पहले जन्म लेने वाले उत्तराखंड में भ्रष्टाचार पिछले कुछ सालों में एक केन्द्रीय मुददा बनकर उभरा है। भाजपा और कांग्रेस पर समान रूप से भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे रहने का आरोप लगता रहा। यही वजह रही कि 2002 में जब राज्य का पहला आम चुनाव हुआ तो भाजपा का सूपड़ा साफ हो गया। इसके बाद पूरे पांच साल तक कांग्रेस एनडी तिवारी के नेतृत्व में सत्ता में रही। अपने लम्बे राजनीतिक अनुभव के चलते एनडी तिवारी के नेतृत्व में राज्य का मुख्य रूप से औद्यौगिक क्षेत्र में खूब विकास भी हुआ, लेकिन साथ में भ्रष्टाचार की भी खूब फसल बोई और काटी गई। भ्रष्टाचार और घपले-घोटाले सभी मुख्यमंत्रियों के आगे-पीछे लहलहाता रहा। 2007 के विधानसभा चुनाव में इसी मुददे पर कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा।

इसके बाद भाजपा सत्ता में आई। कमंडल आंदोलन की पैदाइश पूर्व फौजी बीसी खंडूडी को भाजपा ने राज्य का सीएम बनाया। सीएम बनते ही भ्रष्टाचार के छींटे प्रत्यक्ष न सही तो अप्रत्यक्ष तौर पर खंडूरी पर भी पड़ने शुरू हो गए। देहरादून में संगमरमर और जमीनों के कारोबारी लाला उमेश अग्रवाल और आजकल यूपी में नौकरी बजा रहा नौकरशाह सारंगी उस दौरान खंडूरी के गले की फांस बने रहे। लाला तो अभी भी खंडूरी के गले की हार हैं। नतीजन 2009 के लोकसभा चुनाव तक राज्य में सियासी गलियारों में खूब सारंगी बजती रही। आखिरकार लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हार का मुंह देखने के बाद भाजपा आलाकमान ने खंडूरी को ठिकाने लगा दिया। फिर निशंक सीएम बने तो उन्होंने सारी हदें ही पार कर दी। भ्रष्टाचार और निशंक एक दूसरे के पर्याय बन गए। कुर्सी से हटाने से बौखलाये खंडूरी ने भ्रष्टाचार के मुददे पर अब निशंक की घेराबंदी करनी शुरू कर दी।

एक पत्रकार मित्र ने खंडूरी को उत्तराखंड का अन्ना बनाने के लिए जी जान एक कर दी। बाकायदा, भ्रष्टाचार के खिलाफ देशव्यापी अन्ना आंदोलन के ज्वार-भाटे में खंडूरी को अन्ना टोपियां भेंट की गई। आखिरकार निशंक का पत्ता काट दिया गया। सत्ता में लौटते ही खंडूरी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाने का ऐलान किया, लेकिन आज तक वे घपले-घोटालों में फंसे किसी भी नेता या नौकरशाह के खिलाफ रत्तीभर कार्रवाई भी नहीं कर पाये। कुछ नौकरशाहों को तो उन्होंने निशंक से भी दो कदम आगे बढ़कर और भी मलाईदार महकमें सौंप दिए। विकीलीक्स की ओर से पिछले दिनों जारी किए गए अमेरिकी दूतावास के इस केबल से खंडूरी की मुश्किले बढ़ सकती हैं। इस केबल की महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिका की नजर में 2009 के लोकसभा चुनाव तक खंडूरी सरकार वैचारिक रूप से पतित और पैसा बनाने में जुटी हुई थी।

माओवाद के नाम पर भी खंडूरी सरकार केन्द्रीय अनुदान पाने के लिए हवा खड़ी कर रही थी। वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत राही समेत आधा दर्जन से अधिक जनवादी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी इसी दौर में हुई। राही पिछले दिनों ही साढ़े तीन साल जेल में रहने के बाद जमानत पर रिहा हो पाए। निशंक के पतन के बाद पिछले एक माह से खंडूरी फिर राज्य में सीएम की कुर्सी पर बैठे हुए हैं। खंडूरी के आगे-पिछवाड़े आज भी कई बदनाम चेहरे घूम रहे हैं। जो लोग निशंक के दौर में तड़ीपार किए गए थे, आज वे सत्ता के गलियारों में मंडराते देखे जा सकते हैं। विकीलीक्स का यह खुलासा जहां खंडूरी के लिए परेशानी पैदा करने वाला हैं, वहीं एनडी तिवारी के लिए यह थोड़ी राहत देने वाला है, साथ ही उस कांग्रेस के लिए भी जो चुनाव की इस गहमागहमी के बीच अभी तक खंडूरी को निशाना बनाने से बचने की कोशिश करती रही है।

…ये है उत्‍तराखंड के बारे में जारी विकीलीक्‍स केबल…

विकीलीक्स की वेबसाइट पर प्रकाशित केबल का स्क्रीनशाट. वेबसाइट पर प्रकाशित केबल को आप यहीं नीचे पढ़ सकते हैं या फिर उपर के स्क्रीनशाट पर क्लिक करके या फिर इस लिंक http://wikileaks.org/cable/2009/05/09NEWDELHI987.html पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं.


Viewing cable 09NEWDELHI987, BHARAT BALLOT 2009: UTTARAKHAND SUFFERING FROM

 

ID 09NEWDELHI987

SUBJECT BHARAT BALLOT 2009: UTTARAKHAND SUFFERING FROM

DATE 2009-05-15 00:00:00

CLASSIFICATION UNCLASSIFIED//FOR OFFICIAL USE ONLY

ORIGIN Embassy New Delhi

TEXT UNCLAS SECTION 01 OF 03 NEW DELHI 000987

SENSITIVE

SIPDIS

E.O. 12958: N/A

TAGS: PGOV, PTER, PREL, PINR, KDEM, IN

SUBJECT: BHARAT BALLOT 2009: UTTARAKHAND SUFFERING FROM

LACK OF DEVELOPMENT, DIVISION AMONG ITS PEOPLE

REF: NEW DELHI 933

1. (SBU) Summary: PolOff and PolFSN traveled north to UTTARAKHAND on May 11 to assess the political landscape of this small state with five parliamentary seats up for grabs. In discussions with a mix of local journalists, academics, business leaders, and state civil servants, the themes that we heard over and over again were a need for jobs and development, the damage of corruption, and how the state needs an integrated plan to meet the different needs of the hill districts and the plains region to move the entire state forward. Another recurring topic was how both the Congress and the BJP treated UTTARAKHAND as a hill state instead of a composite of the two regions. Some of our interlocutors claimed that the state government has exacerbated the differences between the regions by favoring people from the hills when it came to the disbursement of development funds and hiring for government jobs. The conventional wisdom of political watchers was that the BJP and Congress would maintain control of the two parliamentary seats that each has in the state and one seat may switch from the Samajwadi Party to the Bahujan Samaj Party. End Summary.

2. (U) Driving into the capital city of Dehradun from its airport, PolOff noticed a distinct difference in the quality of life compared to that of western Uttar Pradesh, the state that UTTARAKHAND broke away from in 2000. Most houses looked  like they had been stuccoed and freshly painted, instead of made of raw brick. Many of them were two stories. Trees are  abundant and the air is fresher. The wide flat valley is surrounded on one side by forested hills, and on the other, by much higher mountains, a sharp reminder that we were in the foothills of the Himalayas. The two-lane road wound through forest for much of our thirty-minute journey to the capital.

Looks Like An Election

3. (SBU) Another noticeable difference from Uttar Pradesh was that in UTTARAKHAND the political parties had decided to  put some of their limited campaign money – the amount they can spend is restricted by the Election Commission — into the traditional party banners, posters, and billboards. Most pictured their national party leaders with the local candidate to ensure that the cost of the advertising will come out of the national party’s funds, not the candidate’s. The regional Bahujan Samaj Party and Samajwadi Party had put up some posters and billboards, but most belonged to the Congress party and the BJP. On May 11, the last day allowed for campaigning, we saw that the BJP and Congress had sound trucks out in one of the roadside villages. In Dehradun, a BJP motorcycle rally passed by our hotel a few times, with flags flying and the riders chanting their party’s name. Rental cars were scarce in the capital because the political parties had rented them for campaigning; we paid twice the normal rate for ours.

Desperately Desiring Development

4. (SBU) Our interlocutors in Dehradun said the highest priority in the state is the need for development. Many places further up in the hills need schools, health care, and public transportation. The government-run hospital in Dehradun lacks the facilities to diagnose and treat cancer. Many roads are inadequate and lack guard rails, an important safety feature in an area where many roads have precipitous drop-offs at their sides. This issue was brought home on the two-lane road to Mussoorie, a hill station established by the British in the 1800s and one of UTTARAKHAND’s main tourist attractions today; carved out of the hillside, the road has guardrails and small concrete barriers but little else to keep one from plummeting over the edge for thousands of feet should the driver’s skills fail going around many of its NEW DELHI 00000987 002 OF 003 hairpin curves. There is no shoulder next to the road for the most part.

5. (SBU) One journalist characterized the BJP-run state government as ideologically bankrupt and only focused on making money. He alleged the government had claimed falsely that Maoist insurgents were coming into the state, rounded up some Nepalese citizens to support these claims, and then requisitioned security supplies from the center to fight the threat the government had engineered. The government has also closed down three power plant projects because of environmental concerns and political pressure from Hindu nationalists opposed to disrupting the flow of the Ganges, which they consider sacred. The government supposedly wants to make UTTARAKHAND a tourism-focused state, but our journalist interlocutor said it has no policy for bringing more tourists into the state.

6. (SBU) Many of our interlocutors said that the previous Congress Party state government was horribly corrupt, but it also made progress in the development of the state during its tenure. They claimed that the public misses former Congress Chief Minister N. D. Tiwari, saying that he was the only one who had a vision for the state and could move initiatives forward. Now the state has a government that is corrupt but doesn’t follow through on what it has been bribed to do.

7. (SBU) The assessment we received in Dehradun was that the BJP candidates are not talking about development during the parliamentary election campaign, but instead are making emotional speeches designed to appeal to voters’ caste or religious identities. The Congress Party candidates aren’t talking about the party’s vision for the state either. Their campaigns are based on criticism of the BJP state government. If the BJP loses the electoral race, it will be a vote against the party’s control of the state, not a vote for Congress. Currently, the BJP holds two seats in parliament, the Congress Party has two seats, and the Samajwadi Party controls the remaining one. A Dehradun business leader and former BJP supporter said that Congress is the only party qualified to rule India because the Prime Minister is an economist and former Finance Minister. He had doubts about the BJP’s abilities to handle such issues.

BSP Making Inroads

8. (SBU) Many of our interlocutors took note of the race for the Haridwar seat, which has been designated as a reserved seat — one set aside for scheduled caste or scheduled tribe candidates — through the recent nation-wide redistricting exercise. If the Dalits and the Muslims – combined the two groups make up around half of Haridwar’s electorate – support the BSP, Uttar Pradesh Chief Minister Mayawati’s party is likely to win the seat because the other half of the electorate will be split between Congress and the BJP. One of our interlocutors said that the BSP candidate, who is a Muslim, is best qualified because he is a former member of the legislative assembly and he “talks sense.” It was not yet clear to our contacts, however, that the Muslim and Dalit communities would vote as a block.

9. (U) The Nainital-Udhamsingh Nagar parliamentary district features a three-cornered fight between the BJP, the BSP, and the Congress. Our interlocutors said that both the BJP and Congress Party were running strong candidates. The Congress candidate is the incumbent, K. C. Singh Baba. The BSPcandidate has been working the constituency for two years. With Nainital as with Haridwar, the race will depend upon how cohesive the minority communities are in casting their votes.

Holy City of Haridwar Full of Resentment

10. (SBU) Haridwar, considered one of the holiest places in NEW DELHI 00000987 003 OF 003 India, has many temples, with saffron-clad pilgrims walking along the road, billboards of Lord Ram, a large statue of the god Shiva near the river, and a profusion of ghats — steps along the riverbank — to ease the way for ritualistic bathing where the Ganges flows through the town. BJP campaign flags and billboards dominated the area; there were few Congress posters to be seen. Haridwar also has a noticeable population of people living in lean-tos made up of scrap material. Apparently not all of Haridwar’s residents can afford to enjoy “Fun Valley,” the water park sporting depictions of Winnie the Pooh and Shrek on its walls that is located among farmland and lumber yards on the road between Haridwar and Dehradun.

11. (SBU) We sat down with a group of community leaders, including professors, a businessman and a religious instructor who all supported the BJP, claiming only a national party like the BJP can run the country. They criticized the regional parties, such as the BSP and the Samajwadi Party, for caring only about parochial interests, saying that they are ill-equipped to take care of India’s external affairs. Their ideal candidate for Parliament would be someone who adhered to the ideology of the national party, who led a clean life with no hint of corruption, but who was from the area and in touch with the grass roots. They assessed that the BJP candidate for Haridwar was close enough to that ideal to gain their support.

12. (SBU) Nevertheless, the discussants were quite dissatisfied with the BJP’s running of the state and they said they’ve made that clear to the party. When UTTARAKHAND split from Uttar Pradesh, much of the impetus behind that fight was to break away from a capital that ignored the hill region. Now the reverse is happening and both the BJP and Congress treat UTTARAKHAND as a hill state and ignore the plains region, according to our interlocutors from plains-city Haridwar. They said that this is breeding resentment among the public towards the state government in the three plains districts. They claimed that the BJP sidelines any up and comers from the plains in its party; all of the political leadership is from the hills. Government jobs primarily go to applicants from the hills. Even development funds from the central government that were specifically designated for the plains region have gone to waste because the state government refused to use them, instead demanding more money for the hills region.

13. (SBU) When UTTARAKHAND became a state, a regulation was instituted that no one can be considered a native of the state unless they can prove that they or their ancestors lived there before 1930. Otherwise, they are considered a permanent resident and receive fewer benefits from the state. This exacerbates the hills/plains divide because most of the people who moved into the state after 1930 settled in the plains region. Our interlocutors assessed that this growing resentment toward the BJP and Congress is opening up an opportunity for the BSP to win the Haridwar seat, which has fielded a local Muslim. No one gave the Samajwadi Party much chance of maintaining control of the seat.

14. (SBU) Comment: UTTARAKHAND’s natural beauty and holy sites attract religious tourists as well as people trying to escape the heat of the great Gangetic plain. The young state has a long way to go before it can reap the fruits that were envisioned in 2000 when it became a separate state. Despite the poor development record and many resentments among the voters, the BJP is likely to maintain its control over two seats with the Congress keeping its two seats. The one seat that is most likely to change hands is Haridwar, if Mayawati and her candidate can consolidate the Dalit and Muslim vote.

लेखक दीपक आजाद उत्तराखंड के युवा और बेबाक पत्रकार हैं. कई अखबारों-पत्रिकाओं में काम कर चुके हैं. साफ-साफ और खरी-खरी बात लिखने के लिए जाने जाते हैं. उनसे संपर्क deepakazad09@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

मैंने क़सम ली- मैं फासिस्ट राजनीति और उसके कारिंदों के खिलाफ कुछ नहीं लिखूंगा

शेष नारायण सिंहप्रशांत भूषण की पिटाई के बाद इस देश की राजनीति ने करवट नहीं कई, पल्थे खाए हैं. जिन लोगों को अपना मान कर प्रशांत भूषण क्रान्ति लाने चले थे, उन्होंने उनकी विधिवत कुटम्मस की. टीवी पर उनकी हालत देख कर मैं भी डर गया हूँ. जिन लोगों ने प्रशांत जी की दुर्दशा की, वही लोग तो पोर्टलों पर मेरे लेख पढ़कर गालियाँ लिखते हैं.

लिखते हैं कि मेरे जैसे देशद्रोहियों को देश से निकाल दिया जाएगा… मार डाला जाएगा… काट डाला जाएगा…. कुछ ऐसी गालियाँ लिखते हैं जिनका उल्लेख करना असंभव है. मुझे मुगालता था. मैं समझता था कि यह बेचारे किसी ऐसी राजनीतिक पार्टी में नौकरी करते हैं जिसको हमारी बातें कभी नहीं अच्छी लगीं. उसी पार्टी को खुश करने के लिए इस तरह की बातें लिखी जा रही हैं. मुझे इस बात का बिलकुल अंदाज़ नहीं था कि यह लोग बाकायदा तशरीफ़ लाकर शारीरिक रूप से कष्ट भी दे सकते हैं. प्रशांत भूषण की पिटाई का मेरे ऊपर यह असर हुआ है कि अब मैं फासिस्ट राजनीति के खिलाफ कुछ नहीं लिखूंगा. मैं दहशत में हूँ. यह भाई लोग कभी भी पहुंच सकते हैं और धुनाई कर सकते हैं. मुझे ऐसा इसलिए लगता है कि प्रशांत जी की कुटाई कोई हादसा नहीं था. बाकायदा योजनाबद्ध तरीके से उन्हें घेरकर लतियाया गया था. यह भी हो सकता है कि जिस टीवी चैनल वाले उनसे बात कर रहे थे, वहां भी इन मारपीट वालों का कोई बंदा रहा हो जिसने पिटाई वाली सेना को एडवांस में खबर कर दी हो.

अब यहाँ यह कहकर कि जिन लोगों ने पिटाई की वे सब आरएसएस के अधीन संगठनों से किसी न किसी रूप में जुड़े हैं, मैं अपनी शामत नहीं बुलाना चाहता हूँ. लेकिन जिन लोगों को पिटने का डर नहीं है, वे यह बात खुलेआम कह रहे हैं. मेरी हिम्मत तो नहीं है कि मैं लिख सकूं लेकिन बताने वाले बता रहे हैं कि पिटाई करने पहुंचे लोग बीजेपी के बड़े नेताओं के साथ भी अक्सर फोटो खिंचवाते रहते थे. और उनके बहुत भरोसे के बन्दे थे. श्री राम सेना के कर्नाटक राज्य के अधिपति श्री प्रमोद मुथालिक ने भी कहलवा भेजा है कि प्रशांत भूषण को पीटने वाले लोग उनके अपने बन्दे नहीं थे. उन्हें तो प्रमोद जी ने केवल टेक्नीकल ज्ञान मात्र सिखाया था. वह भी खुद प्रमोद जी का इन योद्धाओं से कुछ लेना देना नहीं था. उनके किसी मातहत अफसर ने दिल्ली की श्रीराम सेना को फ़्रैन्चाइज़ी दी थी जिसकी जानकारी मुथालिक श्री को नहीं थी. भगत सिंह के नाम पर धंधा कर रहे भारतीय जनता युवा मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के पूर्व सदस्य का बीजेपी या उसकी किसी सहयोगी पार्टी से कोई लेना देना नहीं है. वह कभी भी बीजेपी में नहीं था क्योंकि अगर वह बीजेपी में कभी भी रहा होता तो उसे अपने पराये की पहचान होती और अपनी ही पार्टी के पूर्व सदस्य के बेटे को सरेआम देश की सबसे बड़ी अदालत के आसपास इतनी बेरहमी से न पीटता. ऐसी बहुत सी बातें हैं जो आरएसएस के विरोधी लिख रहे हैं लकिन अपनी हिम्मत नहीं है कि मैं यह लिख दूं कि जिन लोगों ने प्रशांत भूषण को पीटा वे आरएसएस या उसके अधीन काम करने वाले किसी संगठन से किसी तरह से सम्बंधित रहे होंगे.

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण की पिटाई का मैं अपनी पूरी ताक़त से विरोध करता हूँ. उनके बहुत सारे विचारों से सहमत नहीं हुआ जा सकता लेकिन विचारों से असहमत होने पर किसी को पीटना बिकुल गलत है. इसलिए मेरे अलावा जो भी चाहे, उन लोगों की भरपूर भर्त्सना कर सकता है. वैसे सही बात यह है कि उन लोगों की जितनी निन्दा की जाए कम है. पिटाई करने वाले निंदनीय लोग हैं.  जिन लोगों ने “मैं अन्ना हूँ” की टोपी पहनकर नई दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में टीवी कैमरों को धन्य करने की कोशिश की, उनकी पिटाई करने वालों की भी सभी निंदा कर ही रहे हैं. वह निंदा बिलकुल सही है. लेकिन मैं उन लोगों की कोई निंदा नहीं कर सकता. क्योंकि कई बार मैं भी पटियाला हाउस कोर्ट के बगल वाली पुराना किला रोड से अपने घर जाता हूँ. लेकिन प्रशांत भूषण को भी आरएसएस प्रायोजित किसी आन्दोलन में शामिल होने के पहले यह सोच लेना चाहिए था कि अगर वे अन्ना हजारे के साथ आरएसएस वालों के आन्दोलन का संचालन करने के प्रोजेक्ट में शामिल हो रहे हैं तो उन्हें आरएसएस की हर बात को मानना पड़ेगा.

आरएसएस के कई बड़े नेताओं ने बार बार बताया है कि वे लोग बहुत ही लोकतांत्रिक सोच के लोग हैं, लोगों के विरोध करने के अधिकार को सम्मान देते हैं लेकिन वे यह बात कभी नहीं बर्दाश्त कर सकते कि अपना कोई बंदा उनकी मंज़ूर शुदा राजनीतिक लाइन से हटकर कोई बात कहे. इसका सबसे पहला शिकार प्रो. बलराज मधोक बने थे. किसी ज़माने में वे पार्टी के बहुत बड़े नेता थे. भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष थे. पं. दीन दयाल उपाध्याय के साथ पार्टी को आगे ले जाने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन कुछ मंचों पर उन्होंने अपने विचार रख दिए और पार्टी से निकाल दिए गए. यह जो अपने डॉ सुब्रमण्यम स्वामी हैं. बड़े विद्वान हैं. नानाजी देशमुख जैसा बड़ा नेता उनको अमरीका से पकड़ कर जनसंघ में लाया था. १९७४ में उत्तर प्रदेश में जो विधानसभा का चुनाव हुआ था, उसमें इनकी खासी भूमिका थी. बहुत ही सुरुचिपूर्ण पोस्टर बनाए गए थे. आज़ादी के छब्बीस साल के बाद कांग्रेस की नाकामियों को बहुत ही अच्छे तरीके से उभारा गया था लेकिन निकाल दिए गए. केएन गोविन्दाचार्य की बात तो बहुत ही ताज़ा है. उनको राजनीति के दूध और मक्खी वाले चैप्टर के हवाले से सारी बारीकियां समझा दी गयीं. बेचारे आजकल व्यवस्था परिवर्तन की राजनीति के मैदान में फ्रीलांसिंग कर रहे हैं. हाँ, यह लोग प्रशांत भूषण से ज्यादा भाग्यशाली थे क्योंकि इनको टीवी कैमरों के सामने बैठाकर पीटा नहीं गया.

इसलिए प्रशांत भूषण को समझ लेना चाहिए था कि अगर वे आरएसएस वालों से घनिष्ठता जोड़ रहे हैं तो उन्हें बाकी जीवन बहुत आनंद रहेगा, बशर्ते वे संघ की हर बात को अपनी बात कहकर प्रचारित करते रहते. देश के कई बड़े अखबारों के पत्रकारों ने भी आरएसएस की शरण ग्रहण कर ली है. हमेशा मौज करते रहते हैं. लेकिन उनको मालूम है कि अगर बीच में पत्रकारिता की शेखी बघारेंगे तो वही हाल होगा जो प्रशांत भूषण का हुआ है. ऐसा कुछ पत्रकारों के साथ हो चुका है. प्रशांत जी को भी चाहिए था कि वे अगर आरएसएस वालों के साथ जुड़ रहे थे तो बाकी ज़िंदगी उनके कानूनी विशेषज्ञ बने रहते और मौज करते. लेकिन उन्होंने अन्य बुद्धिजीवियों की तरह अपनी स्वतंत्र राय का इज़हार किया तो उनके नए आका लोग इस बात को कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे.

हाँ आजकल ज़माना ऐसा है कि कुछ छिपता नहीं. यह संभव नहीं है कि आप किसी पार्टी या संगठन के साथ गुपचुप काम करने लगें और बात में फायदा उठा लें. लालू प्रसाद यादव ने सबको बता दिया कि किरण बेदी चांदनी चौक से टिकट के चक्कर में हैं. कांग्रेस वाले दिग्विजय सिंह भी बहुत गलत आदमी हैं, उन्होंने सारी दुनिया को बता दिया कि अपने अन्ना जी राष्ट्रपति बनना चाहते हैं. दिग्विजय सिंह को पता ही नहीं है कि देवतास्वरूप अन्ना जी की पोल खोल कर उन्होंने देश और समाज का बहुत नुकसान किया है. हालांकि यह भी सच है कि अन्ना हजारे और उनकी टीम ने भी देश के साथ दग़ा किया है. भ्रष्टाचार से त्राहि त्राहि कर रही देश की जनता सड़कों पर आने का मन बना रही थी.

शासक वर्गों का वही हाल होने वाला था जो चेकोस्लोवाकिया में १९९० में हुआ था, या चिली के तानाशाहों के खिलाफ जनता ने मैदान ले लिया था. जनता तो उस मूड में थी कि वह सत्ता के सभी दलालों को हमेशा के लिए खत्म कर देती लेकिन शासक वर्गों की कृपा के साथ साथ कांग्रेस और बीजेपी के सहयोग से अन्ना हजारे ने रामलीला मैदान में जनता के बढ़ रहे तूफ़ान को मोड़ दिया. अब पता नहीं इतिहास के किस मोड़ पर जनता इतनी तैयारी के साथ भ्रष्टाचार को चुनौती दे पायेगी.  लेकिन २०११ वाला जनता का गुस्सा तो निश्चित रूप से अन्ना वालों ने दफ़न कर दिया है. और अब हिसार में उस भजनलाल की राजनीति को समर्थन दे रहे हैं जिसने भ्रष्टाचार के तरह तरह के प्रयोग किये थे. या उस चौटालावाद को बढ़ावा दे रहे हैं जो हरियाणा में भ्रष्ट राजनीति के पुरोधा के रूप में किसी सूरत में भजनलाली परंपरा से कम नहीं हैं. जहां तक कांग्रेस की बात है वह तो पिछले चुनाव में भी वहां तीसरे स्थान पर थी, और इस चुनाव में भी तीसरे पर ही रहेगी. वहां भी लगता है कि अन्ना के चेला नंबर वन राजनीतिक सपने देखने की तैयारी कर रहे हैं.

मैं अपने पूरे होशो हवास में घोषणा करता हूँ कि ऊपर जो कुछ भी लिखा है, उसे मैंने बिलकुल नहीं लिखा है. यह सारी बातें सुनी सुनायी हैं और अगर कोई भगवा वस्त्रधारी मुझे पीटने आया तो मैं साफ़ कह दूंगा कि यह सब बकवास मैंने नहीं लिखी है.

लेखक शेष नारायाण सिंह देश के जाने-माने पत्रकार और स्तंभकार हैं.

हालत विकट है, संस्थानों की प्रतिष्ठा ध्वस्त होने का दौर है

आलोक कुमारहम उस दौर में प्रवेश करते जा रहे हैं जहां समाज में सही-गलत की दिशा तय करने वाले पारंपरिक तंत्र की प्रतिष्ठा बचाए नहीं बच रही। सदैव आपके साथ होने का दंभ भरने वाली दिल्ली पुलिस हो। या सच्चाई सामने लाने के लिए बनी सीबीआई, या फिर भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने वाली सीवीसी हो या न्याय के मंदिर का प्रतीक सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट या निचली अदालत।

इन सभी संस्थानों की प्रतिष्ठा पर सियासत प्रहार कर रही हैं। बारी बारी से प्रतिष्ठित संस्थाओं की छवि धूल धूसरित होती जा रही है। सुप्रीम कोर्ट के कालेधन की जांच की निगरानी के लिए विशेष जांच दल बनाने के प्रस्ताव को सरकार ने सियासी जिरह से ठुकरा दिया। सरकार के आगे सुप्रीम कोर्ट विवश है। हालत विकट है। सीवीसी और सीबीआई जैसी शीर्ष संस्था के प्रमुखों को लोकपाल की संरचना तय करने वाली संसदीय समिति के समक्ष गुहार लगानी पड़ रही है। चित्कार कर याद दिलाना पड़ रहा है कि चोरों को बेनकाब करने और सजा दिलाने की सफलता में उनका ट्रेक रिकार्ड का ख्याल किया जाए। इन संस्थाओं के स्वायत्त स्वरूप की रक्षा की जाय।

लोकपाल के दायरे में लाकर बौना बना देने की कोशिश को खत्म किया जाय। देश की इन दो सुनामी संस्थाओं को लोकपाल के दायरे में लाने की पुरजोर कोशिश हो रही है। यह जरूरी है कि देश और समाज के गलत तत्व को रोकने के लिए कारगर तंत्र बने। बदलते वक्त की जरूरत के साथ नए उपयोगी तंत्र बनाई जाए। लेकिन नए को बनाए बगैर पुराने की छवि मलीन की जा रही है। ऐसा क्यों हो रहा है ? क्या यह किसी साजिश के किया जा रहा है ? इस पर संजीदगी से सोचने की जरूरत है।

इसके तहकीकात के लिए एक तथ्य है। 1997 में प्रधानमंत्री एचडी देवगौडा के पद से हटने की एक बडी वजह बोफोर्स मामले की जांच कर रही है सीबीआई की बढी सक्रियता थी। सीबीआई की टीम ने स्विट्जरलैंड जाकर बोफोर्स दलाली प्रकरण से जुड़े स्विस बैंक खातों की प्रमाणिक दस्तावेज लाने के साथ दस जनपथ जाकर कांग्रेस नेता सोनिया गांधी से पूछताछ करने की जुर्रत तक की थी। क्या यही जुर्रत अब सीबीआई की टोपी उछाले जाने की वजह बन रही है ? हकीकत को समझने के लिए आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि बीते सात सालों के यूपीए शासन में सीबीआई की प्रतिष्ठा लगातार नीचे गिरती जा रही है। सिर्फ सीबीआई ही नहीं देश की अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों की खराब होती छवि के अनंत मिसालें हैं। उनमें से हिल्कोर मारने वाली कुछ मिसालें इस तरह हैं।

एक, दिल्ली पुलिस ने वोट के लिए कैश मामले की जांच में अदालत से कहा है कि आरोपी अमर सिंह के खाते में कोई अनियमितता नहीं है। यह वहीं दिल्ली पुलिस है,जो किसी को पकड़ ले तो अपराध कबूल करवाने के लिए कुख्यात है। इसका चार्जशीट इतना ठोस होता है कि अदालत के सामने पकड़े गए शख्स को बेकसूर साबित करने का गुंजाईश नहीं के बराबर रहती है।

दूसरा, सीबीआई ने टूजी घोटाले की सुनवाई के दौरान विशेष अदालत से सांसद कनिमोझी पर महिला होने की वजह से रहम करने का आग्रह किया है। सीबीआई का ताजा रुख अदालत में बाकी आरोपियों के जमानत का विरोध और केंद्र सरकार की प्रमुख सहयोगी दल के नेता की बेटी कनिमोझी को स्कूल जाने वाले छोटे बच्चे की देखरेख के नाम पर रियायत दिलाने का है।

तीसरा, प्रर्वतन निदेशालय के दिखावटी हाय तौबा के बीच बॉम्बे हाईकोर्ट काला धन विदेश पहुंचाने वाले मामले के प्रमुख आरोपी हसन अली को जमानत दे देती है। सुप्रीम कोर्ट से जब फटकार लगती है,तो प्रर्वतन निदेशालय के विधिक प्रकोष्ठ के निर्लज्जता की पोल खुल जाती है। हसन अली- हसन अली के शोर में सह आरोपी काशीराम तडपुडिया के जेल में बरकरार ऐशो आराम की बात दबकर रह जाती है।

चौथा, नंबर 2008 के बाद से हुए आतंकी वारदाताओं का खुलासा करने में हमारे आतंरिक सुरक्षा का निगरानी तंत्र विफल है। नई बनी एनआईए का ट्रेक रिकार्ड बुरा है। आतंकी हमलों की जांच और आतंकियों की धडपकड के लिए कुख्यात सीबीआई की आतंकवाद विरोधी प्रकोष्ठ एनआईए बनने के बाद से पंगु पड़ा है। इसपर कोई चूं चपड़ नहीं कर रहा।

पांचवां, सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता की वजह से काले धन विदेश भेजने की जोर पकड़ी रफ्तार कम होती नजर आ रही है। कानून मंत्री बदलने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट में ईडी और सीबीआई जैसी संस्थाओं ने अडियल रूख का इजहार करना शुरू कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट को मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल बनाने का फैसला वापस लेने को मजबूर कर दिया गया है।

छठां, काले धन की जांच में सुप्रीम कोर्ट की निर्देश पर कूद रही सीबीआई और ईडी को औकात में लाने के लिए इसी साल अप्रैल में पांडुचेरी ले जाकर सबक सिखाया गया। कालेधन के मामले में सबूत मिलने के बाद एजेंसियां आरोपी इकबाल सिंह से पूछताछ करना चाहती थी। इकबाल सिंह को आरोप के बावजूद लेफ्टीनेंट गवर्नर से नहीं हटाया गया। सीबीआई और ईडी के जांचकर्ताओं को लेफ्टीनेंट गवर्नर दफ्तर के अर्दली की हैसियत में बौनापन रखकर पूछताछ करनी पड़ी। इस नायाब मिसाल ने लेफ्टीनेंट गवर्नर जैसे सत्ता प्रतिष्ठान की इज्जत को मटियामेट कर दिया।

सातवां, सीबीआई ने अदालत में 2006 के एक एफआईआर की जांच बंद करने की रिपोर्ट पेश कर दी। एफआईआऱ इजराइली फर्म सोल्तम से हुए हथियार सौदे की दलाली का था। सीबीआई ने जांच की शुरूआत मीडिया चैनल की टीम के साथ नई दिल्ली के आलीशान बंगलों पर दबिश के साथ शुरू की थी। बारी बारी से खुलासा किया कि मामले के आरोपी सुधीर चौधरी ने दलाली की रकम से नई दिल्ली और दक्षिण दिल्ली के पॉश इलाकों में अरबों की अचल संपत्ति बनाई है। ब्रिटिश पासपोर्टधारी सुधीर चौधरी गिरफ्त में नहीं आए। अदालत में क्लोजर रिपोर्ट पेश होने के तीन हफ्ते के बाद सुधीर चौधरी के दिल्ली में मौजूदगी का पता लगा है।

इन चंद मिसालों से साफ है कि मौजूदा दौर में रसूखदारों के आगे साख वाली संस्थानों की प्रतिष्ठा बौनी बनाई जा रही है। यह वह दौर है जब पारदर्शिता का दंभ भरा जा रहा है। दलील दी जा रही है कि सबकुछ दिखने की स्थिति में शर्म के मारे लोग गलत करना बंद कर देंगे। लेकिन जो शर्मसार करेंगे या कर रहे हैं उनको दंडित करने का तंत्र दंतहीन हुआ जा रहा है। हम खतरनाक दौर में प्रवेश करते जा रहे हैं कि समाज के गलत तत्व को रोकने के लिए जिस कारगर तंत्र की जरूरत है वह मलीन होती जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट करप्शन के कोढ से अकेले दम पर मुकाबला कर रही है। अन्ना हजारे के सहारे समाज में नैतिक उत्थान की कोशिश हो रही है। इन कोशिशों से फलितार्थ की उम्मीद के बीच सवाल है कि जब व्यवस्था बहाल रखने वाले संस्थानों की प्रति प्रतिष्ठा नहीं बचेगी तब क्या होगा? साफ नजर आ रहा है कि संस्थानों की प्रतिष्ठा खत्म करने से हमारा आधार खोखला हुआ जा रहा है। इसी बिना पर जन लोकपाल बहाल करने की मुहिम के खिलाफ सीबीआई के नए पुराने मुखियाओं ने बैठक प्रस्ताव पारित किया है। दलील दी गई है कि केंद्र में लोकपाल या जनलोकपाल जैसी व्यवस्था लागू होने के बाद करप्शन के खिलाफ लड़ रही संस्था सीबीआई के बौने हो जाने का खतरा है।

मौजूदा व्यवस्था में केंद्र सरकार के संस्थानों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों की सीबीआई सीधे जांच कर लेती है। और राज्य सरकार व हाईकोर्ट के निर्देश पर भेजी गई मामलों की जांच सीबीआई से कराई जाती है। उलटपेंच के दावों से होने वाली बदनामी के बावजूद सीबीआई के विधिक प्रकोष्ठ की साख अच्छी है। विधिक प्रकोष्ठ की मदद से ही सीबीआई की जांच रिपोर्ट या चार्जशीट को एयरटाईट किया जाता है ताकि अदालत में चार्जशीट की पेशी के बाद आरोपी के छूटने की उम्मीद ना के बराबर बन जाए। इस खूबी की वजह से भ्रष्टाचारियों में सीबीआई को लेकर एक दहशत है।

सीबीआई में मौजूद आईपीएस अफसर की फौज की प्रतिष्ठा इसी खूबी से बनी है कि वो मुख्यमंत्री और मंत्रियों की जी हजूरी करके अकूत दौलत बनाने वाले आईपीएस से अलग हैं। सीबीआई में तैनात आईपीएस के पास सियासत दां को यस सर कहने की मजबूरी से बचने और कर्तव्यनिष्ठा पेश करने का शानदार मौका रहता है। आने वाले दिनों में लोकपाल अथवा जनलोकपाल रुपी व्यवस्था बन जाने से भ्रष्टाचार की जांच करने वाली अलग संस्था और न्याय कर सजा देने वाली दूसरी संस्था का फासला खत्म हो जाएगा। जांच के साथ लोकपाल ही सजा सुना दिया करेंगे। इससे सीबीआई में आकर प्रतिष्ठा बचाने वाले आईपीएस अफसरों का ठौर खत्म हो जाएगा।

लेखक आलोक कुमार करीब दो दशक से मीडिया में सक्रिय हैं. विभिन्न न्यूज चैनलों, अखबारों, मैग्जीनों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे. झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. उनसे संपर्क aloksamay@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

आगरा के डीएम अजय चौहान को रिश्वत में पचास लाख रुपये चाहिए!

पुण्य प्रसून बाजपेयी: आगरा का ताजमहल, जूता और कलेक्टर : ताजमहल ने अगर आगरा को पहचान दिलायी तो आगरा के जूतों ने आगरा के कलेक्टर को। और आगरा के कलेक्टर का एक मतलब है स्टाम्प ड्यूटी का ऐसा खेल, जिसके शिकंजे में जूतो का जो उघोगपति फंसा तो या तो उसका धंधा चौपट हुआ या फिर करोड़ों रुपये का हार कलेक्टर को पहनाया गया।

करोड़ों का इसलिये क्योंकि आगरा के जूतों की पहचान समूचे यूरोप-अमेरिका में है। आगरा का कलेक्टर आगरा के जूते नहीं बल्कि आगरा के जूता मालिको के रुतबे को देखता है। और अपने मुताबिक नियमों का खेल कर सालाना पांच सौ करोड़ बनाना कोई बड़ी बात होती नहीं। सिर्फ फंसाने का अंदाज सरकारी होना चाहिये। इसमें नियम-कायदे सरकारी नहीं कलक्टर के चलें। और जांच से लेकर डराने-वसूलने तक जूता मालिक खुद के जूते पहनने तक झुके नहीं, तब तक खेल चलाना आना चाहिये।

जाहिर है इसमें जूता मालिक पर डीएम यानी जिलाअधिकारी का रौब और एसपी का खौफ रेंगना चाहिये। और कलेक्टर के इस खेल के नये शिकार हैं महाशय शाहरु मोहसिन। आगरा के बिचपुरी रोड पर मटगई गांव में जूता उघोग मै. यंगस्टाइल ओवरसीज के नाम से चलाते हैं। इनके जूते इटली, जर्मनी और फ्रांस में साल्ट एंड पीपर के नाम से बिकते हैं। विदेशी बाजार में धाक है। आगरा के जूतों को लेकर अंतर्र्राष्ट्रीय साख है तो कलेक्टर का खेल तो जम ही सकता है।

बस, फांसने का खेल शुरु हुआ। शाहरु मोहसिन जिस किराये के घर-जमीन पर इंटस्ट्री चलाते थे, उस जगह के मालिक ने बैंक से करोड़ों का लोन लिया था। चुकता नहीं किया। तो कैनरा और ओवरसिज बैंक ने उस जगह को बेचने की निविदा अखबारों में निकाल दी। छह खरीदार पहुंचे। चूंकि शाहरु मोहसिन उसी जमीन पर इंडस्ट्री चला रहे थे तो बैंक ने उन्हें प्राथमिकता दी। और ढाई हजार वर्ग मीटर की इस जमीन की कीमत दो करोड़ दो लाख रुपए तय हुई। बैंक ने शहरु मोहसिन को नया मालिक बना दिया और अखबारों में विज्ञापन के जरीये जानकारी निकाल दी कि दो करोड दो लाख में मडगई ग्राम की गाटा संख्या 191-192 बेच दी गयी।

बस नजरें कलेक्टर की पड़ीं। सरकारी काम शुरु हुआ। जमीन को लेकर सरकारी दस्तावेजों के साथ नोटिस जूतों के मालिक के घर पहुंचा। इसमें लिखा गया कि सरकारी निरीक्षण में पाया गया कि जमीन लगभग चार हजार वर्ग मीटर की है। और जमीन निर्धारित बाजार रेट से बेहद कम पर खरीदी गई। लिहाजा जमीन की कीमत दो करोड़ दो लाख नहीं बल्कि 39 करोड़ 91 लाख 31 हजार 180 रुपया होना चाहिये। और कम कीमत में जमीन खरीद कर सरकारी स्टाम्प ड्यूटी की चोरी की गई है। ऐसे में दो करोड़ 65 लाख 24 हजार 940 रुपये स्टाम्प रुपये और अलग से दो लाख रु दंड के तौर पर चुकाये जाने चाहिये।

साफ है कि ऐसे में कोई भी उघोगपति दो ही काम कर सकता है। एक तो जमीन की माप की सरकारी जांच कराने की दरख्वास्त कर जमीन की कीमत, जो कलक्टर ने ही पहले से तय कर रखी होगी, उसकी कॉपी निकलवाकर दिखाये। या फिर कलक्टर के आगे नतमस्तक होकर पूछे-आपको क्या चाहिये। तो शाहरु मोहसिन ने पहला रास्ता चुना और यहीं से आगरा के बाबूओं के उस गुट को लगने लगा कि उनके ही जिले में कोई उनकी माफियागिरी को चुनौती दे रहा है। डीएम के नोटिस में जमीन की कीमत 19 हजार रुपये प्रति वर्ग मीटर बताया गया। जबकि कलेक्टर के ही दस्तख्त से जमीन की कीमत 3500 रुपये वर्ग मीटर पहले से निर्धारित थी।

मामला यहां गड़बड़ाया तो झटके में कलेक्ट्रेट ऑफिस ने जमीन को व्यवसायिक करार दिया। लेकिन चूक यहां भी हो गई। क्योंकि यूपी सरकार के नियम तले व्यवसायिक जमीन की परिभाषा में उघोग आता नहीं है। लेकिन उसके बाद जमीन की माप को गलत बताया गया। लेकिन यहां भी बैंक के दस्तावेज ने बाबूओ की नींद उड़ा दी। फिर जमीन को मापने की बात कहकर जिस तरह सरकारी बाबू यानी तत्कालिन एडीएम अपर जिलाधिकारी उदईराम ने लगभग चार हजार वर्ग मीटर का जिक्र किया, उससे कलेक्टर का खेल और गड़बड़ाया। लेकिन कलेक्टर तो कलेक्टर है। उसने न आव देखा न ताव। तुरंत स्टाम्प ड्यूटी ना चुकाने पर जूता फैक्ट्री में ही ताला लगाने के आदेश दे दिये।

शहरु मोहसिन ने तुरंत लखनऊ के दरवाजे पर दस्तक दी। लखनऊ तुरंत हरकत में आया। कमिश्नर को पत्र लिख कर पूछा कि यह स्टाम्प ड्यूटी का मामला क्या है। इस पर कमिश्नर ने अपर आयुक्त प्रमोद कुमार अग्रवाल को चिठ्टी लिखी। फिर प्रमोद अग्रवाल ने 19 जुलाई 2011 को आगरा के जिलाधिकारी अजय चौहान को चिठ्टी [पत्र संख्या 844] लिखकर 15 दिन के भीतर समूची जानकारी मांगी। लेकिन खेल तो पैसा वसूली का था और दांव पर आगरा के नौकरशाहों की दादागिरी लगी थी, जो आपस में चिठ्टी का खेल खेल रहे थे। तो नतीजा चिट्ठी को फाइल में ही दबा दिया गया। लेकिन लखनऊ से दुबारा 30 अगस्त को जब दुबारा पत्र आया कि जांच रिपोर्ट अभी तक नहीं आयी है, जिसे पन्द्रह दिनों में आना चाहिए था। अब हफ्ते भर में रिपोर्ट दें कि सच है क्या।

जाहिर है सच बताने के काम का मतलब सरकारी नियम-कायदो से लेकर बैंक द्वारा बेची गई फैक्ट्री की जमीन पर उठायी अंगुली को लेकर भी फंसना था। और स्टाम्प ड्यूटी की चिंता कर जूता फैक्ट्रियों के मालिक से अवैध वसूली के धंधे पर से भी पर्दा उठना था। ऐसे में जिलाधिकारी ने अपनी दादागिरी का आखिरी तुरुप का पत्ता फैक्ट्री के मालिक के खिलाफ गिरफ्तारी का आदेश देकर फैक्ट्री पर ताला लगवाकर फेंका। आनन फानन में एसडीएम ने नोटिस निकाला और 22 सितंबर को नेशनल बैंक में फैक्ट्री के बैंक अकाउंट को सीज कर लिया। चूंकि ज्यादातर ट्रांजेक्शन यूरोपीय देशों में होते हैं तो झटके में सबकुछ रुक गया। इस दौर में फैक्ट्री के मालिक शहरु मोहसिन इटली में आगरा के जूतों की मार्केटिंग में व्यस्त थे तो खबर मिलते ही उल्टे पांव दौड़े।

दो दिन में दिल्ली पहुंचे। तो आगरा से पत्नी ने फोन कर बताया कि फैक्ट्री का अकाउंट भी सील कर दिया गया है। और पुलिस घर और फैक्ट्री के बाहर डीएम के आदेश का डंडा गाढ़ कर बैठी है कि शहरु मोहसिन आगरा में पहुंचे तो उन्हें गिरफ्तार कर ले। अब शहरु मोहसिन दिल्ली में बैठे हैं। हर दस्तावेज दिखाने और समूची कहानी कहने के बाद इतना ही कहते हैं- मैंने सिर्फ इतनी ही गलती की कि उनको पैसा नहीं दिया। यह उसी की सजा है। 50 लाख की मांग अधिकारी सौदेबाजी में अपने कमीशन के तौर पर कर रहे थे। लेकिन मैंने गलत क्या किया। अन्ना के बारह दिन के उपवास के बाद भरोसा हमारा भी जागा था। लेकिन यह तो अत्याचार है।

आगरा में घुस नहीं सकता। बीबी, बच्चो से मिल नहीं सकता । बूढ़े अब्बा आगरा से बार बार फोन पर कहते हैं डीएम- कलेक्टर तो खुदा से बढ़कर हैं। अम्मी कहती हैं खुदा पर भरोसा रखूं। अब लखनऊ जा रहा हूं । देखूं वहा सेक्रेटिएट की पांचवीं मंजिल से न्याय मिलता है या नहीं । वहां से आगरा जाने का रास्ता बनता है या नहीं। जहां पूरा परिवार खौफ में है।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी देश के जाने-माने जर्नलिस्ट हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

बिन अन्ना आजतक हुआ सून, इंडिया टीवी फिर किंग

अन्ना के आंदोलन के दौरान आजतक पूरे फार्म में था. दर्शकों ने सबसे ज्यादा भरोसा इसी चैनल पर किया और सबसे ज्यादा इसी को देखा. इस कारण टीआरपी में यह चैनल अपनी नंबर वन की कुर्सी पर आसीन हो गया. लेकिन अन्ना आंदोलन के शांत होने के बाद अब जो टीआरपी आई है, उससे पता चलता है कि इंडिया टीवी ने फिर से नंबर एक कुर्सी पर कब्जा जमा लिया है. इंडिया टीवी थोड़े ही मार्जिन से नंबर वन बना है लेकिन कहा तो यही जाएगा कि आजतक नंबर दो पर चला गया है.

नंबर तीन पर स्टार न्यूज है. आजतक और स्टार न्यूज के बीच बेहद बारीक फासला है. कह सकते हैं कि हालात यही रहे तो स्टार न्यूज कहीं नंबर दो न बन जाए और आजतक को तीसरे पायदान पर आना पड़े. हालांकि आजतक में सुप्रिय प्रसाद की एक्जीक्यूटिव एडिटर के पद पर ताजपोशी के बाद माना जा रहा है कि यह न्यूज चैनल फिर से अपनी पुरानी स्थिति में वापस लौट आएगा लेकिन सुप्रिय के आजतक छोड़ने और वापस आने के बीच यमुना में काफी मैला पानी बह चुका है. विनोद कापड़ी के नेतृत्व में इंडिया टीवी ने बीती रात प्राइम टाइम पर अन्ना के गांव में मीडिया की स्थिति की तुलना पीपली लाइव फिल्म से करके शानदार प्रोग्राम पेश किया. पीपली लाइव फिल्म के एक-एक दृश्य दिखाकर उसी के अनुरूप बने अन्ना के गांव के मीडियामयी माहौल को पेश किया गया. यह कार्यक्रम बेहद रोचक और दर्शनीय बन पड़ा था.

कह सकते हैं कि विनोद कापड़ी नए नए तरीके आजमाकर दर्शकों को बांधने की कोशिश कर रहे हैं जबकि आजतक घिसे पिटे और आजमाए नुस्खों के जरिए दर्शकों को लुभाने की कोशिश कर रहा है. आजतक ने एक दिन पहले बिना कागजात मोबाइल सिम हासिल किए जाने की खबर को प्रमुखता से पेश किया. पर जानकारों का कहना है कि ऐसी खबरें कई बार कई अखबार और चैनल चला दिखा चुके हैं. ऐसे में अब जरूरी है कि आजतक की टीम क्रिएशन के नए फार्मेट इजाद करे अन्यथा उसे अपनी गद्दी यूं ही गंवाने को मजबूर होता रहना पड़ेगा. इस हफ्ते की टीआरपी के मुताबिक इंडिया टीवी 16.2, आजतक 15.4, स्टार न्यूज़ 15.2, आईबीएन7 10.3, जी न्यूज़ 9.5, एनडीटीवी इंडिया 7.5, लाइव इंडिया 6.3, तेज 4.5, समय 4.3, और डीडी 1.8 है.

‘सारा खेल राजदीप, पुण्य प्रसून और राहुल कंवल ने बिगाड़ा”

यशवंत जी, आप चाहें जो लिखें-कहें, लेकिन सच यही है कि अगर कोई बात लिखित रूप से तय हुई है, इंबारगो के बारे में सब कुछ सबकी सहमति से तैयार हो गया तो फिर इसे तोड़ना न सिर्फ अनैतिक है बल्कि किसी पर भी भरोसा न करने जैसा ट्रेंड पनपाने वाला है. पहले से ही तमाम तरह के आरोपों से घिरी मीडिया को एक बार फिर मीडिया वालों ने ही अनैतिकता के गड्ढे में धक्का दे दिया है. सारा खेल राजदीप चौरसिया, राहुल कंवल और पुण्य प्रसून ने बिगाड़ा.

इन लोगों ने इंबारगो की बात पर सहमति जताई, लिखित रूप से, लेकिन इन लोगों ने भयंकर अनैतिकता का परिचय देते हुए अन्ना के इंटरव्यू को पहले ही चला दिया. दूसरे पत्रकार अभी अन्ना का इंटरव्यू कर ही रहे थे कि जब अन्ना का इंटरव्यू राजदीप, पुण्य प्रसून और राहुल कंवल वाले चैनलों पर चलने लगे तो पिछड़ गए पत्रकारों में मायूसी स्वाभाविक है. यही कारण है कि अन्ना के गांव में मीडिया वालों के बीच संघर्ष हुआ. नीचे एक मेल दे रहा हूं, जो विनोद कापड़ी द्वारा कई संपादकों को भेजे जाने के बाद मीडिया दिग्गजों में बहस का विषय बन गया है. मेरे नाम का खुलासा न करें. पूरा मेल यूं है, नीचे से उपर की तरफ पढ़ें. सबसे नीचे विनोद कापड़ी द्वारा भेजा गया मेल है और उसके बाद कई संपादकों पत्रकारों के रिएक्शन… पंकज पचौरी पूछते हैं कि किसने सबसे पहले प्रसारित किया और इंबारगो को तोड़ा? जहांगीर एस पोचा कहते हैं- बहुत दुखद रहा, अन्ना के गांव में सभी लोग कह रहे हैं कि मीडिया पर भरोसा नहीं किया जा सकता. बरखा दत्त का भी रिएक्शन है, पढ़ें…

From: Jehangir S. Pocha
Sent: Tuesday, September 13, 2011 19:16
Subject: Re: “ANNA-RCHY” in RALEGAN-SIDHI
It’s sad…and sadder that this is the conversation in Ralegoan. Everyone is saying “media is like this only. Can’t be trusted!”.

From: Barkha Dutt  
Sent: Tue Sep 13 18:32:01 2011
Subject: Re: “ANNA-RCHY” in RALEGAN-SIDHI
Yep everyone agreed in writing.. Its really disappointing ..that for an interview everyone getting we needed to behave like kids and not honour our word
Sent from Blackberry

From: Arnab Goswami
Sent: Tuesday, September 13, 2011 06:28 PM
Subject: RE: “ANNA-RCHY” in RALEGAN-SIDHI
We haven’t got an interview yet  but if everyone signed on that paper as vinod shows, it should hold. Otherwise it amounts to misleading other channels.

From: Barkha Dutt
Sent: 13 September 2011 18:13
Subject: Re: “ANNA-RCHY” in RALEGAN-SIDHI
Agree. Pretty bizarre considering everyone agreed in writing. And so disappointing that we can’t agree on something so basic?
Sent from Blackberry

From: Pankaj Pachauri
Sent: Tuesday, September 13, 2011 06:07 PM
Subject: Re: “ANNA-RCHY” in RALEGAN-SIDHI
Now who broadcast it first? And flouted the embargo… ?
Pankaj

On Sep 13, 2011, at 18:01, “vinod kapri”  wrote:
Dear Friends,
This is to bring to your notice that today in Ralegan siddhi Anna Hazare was supposed give an interview to the correspondents through a lucky draw procedure.. but when few SENOIRS flew from New Delhi and these seniors requested ANNA TEAM that they have to go back to Delhi same day, so let them take the interview first..

After this all agreed on one condition that interview taken by anybody , be SENIOR  or junior or any channel will be embargoed  till 6 pm, 13th September 2011 ( MoU attached) but it was appalling to see that SENIOR journalists in the beginning went on live or deferred live with their interviews on respective channels. Not only this, they immediately telecasted the same interview many times.

This is a huge breach of trust and gross violation of mutual understanding and respect…

I am attaching agreement signed by all correspondents/bureau chiefs/seniors by respective channels and this was very clear to all present including SENIORS. Seniors were very much aware of this agreement and ANNA team also agreed for interview to SENIORS after MoU signed by all channels (pls see MoU).

This is really very unfortunate and complete breach of TRUST..All reporters/Correspondent( so called juniors) stationed in RALEGAN SIDDHI from 12 days to get ONE, ONLY ONE interview of ANNA are  very very upset and frustrated bcoz of this.. I thought this should come to your notice.Hope we seniors will think about our junior friends in future.

Regards,
Vinod Kapri

अन्ना आंदोलन और कामरेडों की दुविधा-सुविधा

अन्ना आंदोलन के भूत ने सत्ता में बैठे लोगों को सताया हो या नहीं, वामपंथ के एक हिस्से को वह खूब सता रहा है. वह वामपंथ के पूरे इतिहास व वर्तमान के गिरेबान में झांककर बोल रहा है कि जैसा अन्ना ने किया वैसा आज तक तुम न कर सके. कि तुम अपनी कमियों से चिपके रहे और देश की जनता की नब्ज को टटोल सकने में आज अक्षम बने रहे. कि यह तुम्हारी ही कमियां हैं जिनके चलते शासक वर्ग और मजबूत होता जा रहा है…

…और जितना लोगों को तुम आज तक कुल जमा राजनीति सिखा पाए उससे कई गुना यह चंद दिनों का आंदोलन सिखा गया. कि तुम सीखने को तैयार नहीं हो और न ही सुधरने को. कि तुम देश के सबसे वाहियात और अकर्मण्य लोग हो. कि तुम्हें अपना यह अपराध स्वीकार करना चाहिए और नए तरह के उभर रहे आंदोलनों में खुद को समाहित कर देना चाहिए. वामपंथ के एक हिस्से ने इस झोंक में खुद को समाहित करने के लिए एड़ी-चोटी लगा दी. उसने इनकलाब जिंदाबाद के नारे के साथ वंदे मातरम और भारत माता की जय के नारे को अपना लिया. पर इससे भी बात बनी नहीं. धारा के बहाव में उनकी न तैरने की आवाज सुनाई दी और न ही डूबने की.

जिस दिन अन्ना ने रामलीला मैदान से अस्पताल का रास्ता लिया. उस दिन से सड़कें खाली हो गईं और जनता नारों-तख्तियों के साथ नदारद हो गई. यह सब कुछ सिनेमा हाल में बैठ कर फिल्म देखने जैसा था. जब तक फिल्म चलती रही सभी दृश्य के मर्म के साथ उतराते बैठते रहे. फिल्म खत्म होने के साथ ही इसके असर के साथ एक दूसरी तरह की दुनिया में घुस जाने जैसा था. सारा दारोमदार एक बार फिर संसद के पास है कि वह जन लोकपाल बिल के कितने हिस्से को समाहित करेगा. बात नहीं बनी तो अन्ना एक बार फिर आएंगे.

वामपंथियों का यह समूह बेहद स्वाभाविकता के साथ अन्ना आंदोलन के नारों, झंडों व कार्यक्रमों का हिस्सा बन गया. भारत माता की जय! वंदेमातरम! और तिरंगे को हथियार की तरह फहराने से उसके अंदर भी झुरझुरी उठी. इस नारे को देश की असली नब्ज की पकड़ के रूप में देखा. प्रगतिशील आवरण के लिए इनकलाब जिंदाबाद का नारा था. और जिस किसी ने अन्ना आंदोलन का विरोध किया, उसके खिलाफ इस नारे का धारदार हथियार तरह प्रयोग किया.  जो सामाजिक-राजनीतिक समूह पूरे आंदोलन पर छाया रहा और कस्बों से लेकर दिल्ली के ठेठ संसद तक हो रहे प्रदर्शनों पर काबिज रहा, उसके साथ यह वामपंथी समूह स्वभाविक मित्रता महसूस कर रहा था. उसके साथ वह मजे ले रहा था. उसकी पीठ थपथपाकर फोटो खींच व खिंचा रहा था. यह उसके हमजोली का हिस्सा था और उनकी आकांक्षा को पूरा करने का असली हमसफर भी. यह समूह इन आंदोलनकारियों की आवाज में अपनी दबी आवाज को देख रहा था.

वामपंथियों का यह समूह लगातार किसानों, मजदूरों, गरीबों को खोज रहा था, मानों इसके बिना यह आंदोलन वैध साबित नहीं हो पाएगा. वह इस देश के पायदान पर पड़े लोगों को लगातार खोज रहा था और नहीं मिलने पर बेचैन हो कम्युनिस्ट पार्टियों को लगातार गरिया रहा था कि वे ऐसा क्यों नहीं कर रहे हैं, कि इस आंदोलन में उनकी भी वैधता सिद्ध होगी, कि उन्हें भी इस देश का सही नेतृत्वकारी मान लिया जाएगा. इस समूह की यह बेचैनी दरअसल इस हिंदुत्व के जलसे में उसकी बनी स्वभाविक एकता को वैध बना लेने की छटपटाहट थी. यह किसी भी वामपंथ धड़े के छोटे से छोटे वाक्यांशों को अन्ना आंदोलन के समर्थन का नारा बना देने को उतावला हो उठा था. यह पूरे वक्तव्य को संदर्भ और समय से काट कर मचान का झंडा बना कर पेश कर रहा था. वह काट-पीट कर किसी भी तरह एक दुनिया गढ़ लेने के लिए उतावला हो रहा था, जो उसके मन मुताबिक हो,  जो उसकी आकांक्षा के अनुरूप हो.

वामपंथियों का यह समूह अन्ना आंदोलन की पृष्ठभूमि, इतिहास व राजनीतिक उद्देश्य, संगठन आदि किसी पक्ष को देखने-समझने व उसकी व्याख्या भी करने को तैयार नहीं था. हालांकि यह सबकुछ पिछले छह महीने के भीतर हुआ है और आंख के सामने घटित हुआ है. इसके लिए कोई मोटी किताब या किसी जांच-पड़ताल से भी नहीं गुजरना था. पर यह समूह इस आंदोलन के संदर्भ में उपरोक्त बातों को फालतू बता कर जयकारे में लग गया. इस समूह का मानना है कि इस तरह के विश्लेषण से अन्ना आंदोलन पर क्या फर्क पड़ जाएगा, कि जनता तो चल चुकी है और आप सिद्धांत बघार रहे हैं, कि यदि आप भागीदार नहीं हुए तो आप को कुत्ता तक नहीं पूछेगा.

यह तर्कहीनता और राजनीति में दृष्टिहीनता यह समूह जान-बूझ कर अपना रहा था. वह इस पचड़े में पड़कर उमड़ रहे नवधनिकों से किसी भी स्तर पर अलग नहीं होना चाहता था. यह इस एकता की गुहार थी कि पुराने ढांचों व मूल्यों और दृष्टि को तोड़ कर फेंक दिया जाए. और उलट कर कम्युनिस्टों को इस बात की गाली दी जाये कि वे आज के समय को समझ नहीं पा रहे हैं.  कि वे सत्तर साल के बूढ़े की मर्दानगी को समझ नहीं पा रहे हैं. कि वे अब कूड़ेदान में ही पड़े रहेंगे और अन्ना जैसा आंदोलन ही भविष्य का असल ‘मर्द’ आंदोलन होगा.

इस आंदोलन की राजनीतिक इकाई का गठन, जिसे आज अन्ना टीम के नाम से जाना जा रहा है, को बने हुए बहुत दिन नहीं गुजरे. संसद के पिछले सत्र में प्रस्तावित लोकपाल बिल के खिलाफ दिल्ली के जंतर-मंतर पर एनजीओ से जुड़े लोगों ने बैठक किया था. उस बैठक को लेकर कारपोरेट सेक्टर काफी उत्साहित था. और सबसे ज्यादा उत्साहित थी भाजपा. उस सत्र में भाजपा की ओर से सुषमा स्वराज ने मनमोहन सरकार को नंगा कर देने की चुनौती दी थी. बाद के दिनों में भ्रष्टाचार की घटनाओं की बाढ़ में भाजपा खुद ही डूबने लगी.

कांग्रेस और भाजपा दोनों एक ही नाव पर सवार हो किसी तरह पार हो जाने की जुगत में लग गए. संसद में अरुण जेतली और मनमोहन सिंह के बीच इस बात पर तनातनी हुई कि संसद में अन्ना को बुलाकर भाषण क्यों दिलाया गया. पर दोनों ही अन्ना को साधने में लगे रहे और सफल रहे. लोकपाल बिल के खिलाफ जन लोकपाल बिल का प्रस्ताव आया और भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन अन्ना आंदोलन में बदल गया. इस बदलाव में उपरोक्त एनजीओ के कई भागीदार इस आंदोलन से अलग हो गए. कई नाराज हुए. और कई नयों की भर्ती हुई. कुछ दबे हुए चेहरे चमक उठे.

इस पूरी प्रक्रिया में पार्टियों के प्रतिनिधि, एनजीओ, कारपोरेट सेक्टर के प्रबंधकों और मीडिया समूहों ने निर्णायक भूमिका को अंजाम दिया. यह एक आंदोलन की पूर्वपीठिका की एक राजनीतिक गोलबंदी थी. राजनीति सिद्धांत की शब्दावली में यह इस आंदोलन की नेतृत्वकारी इकाई थी जिसने बाद के दिनों में अपनी क्षमता व दिशा का प्रदर्शन किया. बाद के दिनों में बस इतना ही फर्क आया कि अन्ना के बिना अन्ना टीम अवैधानिक व्यवस्था जैसी बन चुकी थी. और आंदोलन ‘मैं अन्ना हूं’ में बदल गया.

अन्ना व टीम अन्ना के बाद मीडिया घरानों से लेकर आरएसएस के विभिन्न संगठनकर्ता, नेता, विभिन्न पार्टियों के प्रतिनिधि व दलाल और कारपोरेट प्रबंधन के एलीट हैं. मीडिया प्रसारण के तौर तरीकों और मुद्‌दों को उछालने की नीति तय करने में लगा है. भाजपा आरएसएस राष्ट्रवादियों के पुराने व नए घरानों को साधने में लगा है. कारपोरेट एलीट भ्रष्टाचार को नेता-नौकरशाह तक सीमित कर अपनी लूट और कब्जा की नीति को पूरी तरह मजबूत कर लेने के लिए प्रयासरत है. वह वहां उबल रहे राष्ट्रवाद में पैसा झोंक रहा है कि यह और भड़क उठे. उसे आर्थिक मंदी की मार सता रही है. उसे और अधिक लूट की नीतियां चाहिए. उसे अब दूसरे दौर के भूमंडलीकरण की जरूरत है. इसके लिए राष्ट्रव्यापी राष्ट्रवादी आंदोलन व माहौल चाहिए.

इस घेरे के बाद 1990 के बाद उभरे नव धनाढ्य मध्यवर्ग अपने परिवारों और गैरसरकारी संगठनों के साथ सक्रिय भागीदार है. यह समूह सरकार में राजनीतिक हिस्सेदारी के लिए छटपटा रहा है. यह देश की कुल कमाई में हिस्सेदार होने के लिए राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों से गठजोड़ कर एनजीओ के माध्यम से सक्रिय है. ‘यूथ फॉर इक्वलिटी’ से लेकर ‘यूथ फॉर डेमोक्रेसी’ जैसे संगठन अपने नारों संगठनों व आर्थिक स्रोतों की बदौलत मीडिया के सहयोग से रातोंरात इनकी हजारों नेतृत्वकारी ईकाइयां उभर आयी हैं. ये भाजपा नहीं है. ये आरएसएस नहीं है. ये राष्ट्रवादी ब्राहमणवाद का नया स्वायत्त समूह है. इन्हें भाजपा-आरएसएस का भरपूर समर्थन और इनके साथ स्वभाविक गठजोड़ है. इन्होंने ‘गर्व से कहो मैं हिंदू हूं’ को ‘मैं अन्ना हूं’ में बदल दिया है.

इस आंदोलन के भागीदारों में सबसे निचले पायदान पर स्वतःस्फूर्त जनता का हिस्सा है जिनकी हिस्सेदारी  कस्बों में अधिक पर दिल्ली के रामलीला मैदान में कम थी. यह समूह रोजमर्रा के भ्रघ्टाचार से लेकर वर्तमान फासिस्ट जनविरोधी मनमोहन सरकार व विभिन्न पार्टियों की राज्य स्तर के दमनकारी सरकारों के खिलाफ विरोध व अपने क्षोभ को दर्ज कराने के लिए भागीदार रहा. यह अन्ना आंदोलन का सबसे बाहरी हिस्सा है. इस समूह की न तो अन्ना टीम तक पहुंच थी और न ही इस टीम को अपनी हिस्सेदारी के एजेंडे को पहुंचा सकने के हालात थे.

सच्चाई यह भी थी कि टीम अन्ना व उसके घेरे के एजेंडे पर यह समूह था ही नहीं. यद्यपि टीम अन्ना बीच-बीच में मीडिया से यह आग्रह करती रही कि कैमरे का मुंह इन तबाह हिस्सों की ओर भी कर लिया जाए. यह आग्रह इस समूह का प्रतिनिधित्व करने के उद्‌देश्य से नहीं बल्कि पूरे भारत के आम व खास सभी का अन्ना का आंदोलन में भागीदारी को वैधता देने के मद्‌देनजर ही किया जा रहा था. यह समूह उपरोक्त राजनीतिक गोलबंदी से बाहर था. यह समूह इस आंदोलन को प्रभावित करने के किसी भी टूल से वंचित था. ऐसी स्थिति में यह खुद उनका टूल बन रहा था और तेजी से उनके प्रभाव में आ रहा था.

1995 के बाद के दौर में वित्तीय पूंजी की खुली आवाजाही व तकनीक सेवा ओर प्रबंधन की संस्थाओं से पैदा हुए नवधनाढ्यों और सट्‌टेबाजों की दावेदारी ने पुनर्गठन की जरूरत को पैदा किया है. यह वर्ग इसके बदले में कारपोरेट सेक्टर को लूटने की खुली छूट दे रहा है. इस पुनर्गठन से शासक वर्ग के किसी भी हिस्से को नुकसान नहीं होना है. यह जनता की लूट, शोषण, शासन, दमन का फासिस्ट पुनर्गठन है. समाज में जीवन स्तर, आय और जरूरत के आधार पर बंटवारे की गति और तेज होगी. चंद लोगों के हाथ में अथाह संपत्ति होगी और देश की बहुसंख्य आबादी भोजन के लिए पहले से और अधिक मोहताज होगी.

अन्ना का जनलोकपाल बिल, राष्ट्रवाद वर्तमान दमनकारी फासीवादी व्यवस्था को और अधिक मजबूत करने का प्रवर्तन है. इस आंदोलन में अल्पसंख्यक खासतौर से मुसलमान समुदाय की भागीदारी न होना, दलित व आदिवासी समुदाय का इससे दूरी बनाए रखने के पीछे आत्मगत से अधिक वस्तुगत कारण ही प्रमुख रहे हैं. भूमंडलीकरण का सबसे अधिक नुकसान इन्हीं समुदायों का हुआ.

बैंकों ने मुसलमान समुदाय के खाता खोलने तक से कोताही बरती. इनके एनजीओ पर पचास तरह के जांच व रोक लगे. इनकी आजीविका के साधनों को नीतियां बनाकर नुकसान पहुंचाया गया. इसका विस्तार पूर्वक वर्णन सच्चर कमेटी ने प्रस्तुत किया है. यही हालात दलित व आदिवासी समुदाय का रहा. दलित समुदाय एक छोटा हिस्सा जरूर ऊपर गया है पर वह अन्ना आंदोलन के फासिस्ट हिंदूत्ववादी पुनर्गठन का हिस्सा नहीं बनना चाहता. अन्ना आंदोलन भारतीय समाज की एक प्रतिगामी परिघटना है. यह शासक वर्ग के फासिस्ट पुनर्गठन की मांग है. इसमें भागीदारी इसके दार्शनिक पहलू को आत्मसात करना है.

लेखक अंजनी कुमार का यह विश्लेषण हाशिया ब्लाग से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

‘जजों को मैनेज’ करने संबंधी शांति भूषण उवाच वाली सीडी असली

: दिल्ली पुलिस ने कोर्ट में पेश की जांच रिपोर्ट : टीम अन्ना के स्तंभ शांति भूषण और प्रशांत भूषण फिर घिर गए सवालों के घेरे में : सीएफएसएल और सीईआरटी को जांच के लिए भेजी गई शांति भूषण वाली सीडी को इन दोनों लैब ने असली बताया है. दिल्ली पुलिस ने इसके बाद जांच रिपोर्ट तीस हजारी कोर्ट में पेश कर दिया है. कुल तीन लैब में दिल्ली पुलिस ने जांच कराई थी जिसमें से दो ने सीडी को असली करार दिया.

चंडीगढ़ की लैब ने सीडी को नकली बताया था. इस सीडी में शांति भूषण की मुलायम सिंह यादव से बातचीत है.  अमर सिंह का कहना है कि यह सीडी वर्ष 2006 में शांति भूषण और मुलायम सिंह यादव के बीच बातचीत की है. सीडी के असली पाए जाने की जानकारी के बाद अन्ना की कोर टीम के एक और सदस्य पर सवालिया निशान लग गया है. इससे पहले स्वामी अग्निवेश एक स्टिंग में टीम अन्ना के खिलाफ विरोधी बयान देते और सरकार के पक्ष में खड़े नजर आए तो टीम अन्ना से उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. वकील और पूर्व केंद्रीय मंत्री शांति भूषण टीम अन्ना के प्रमुख सदस्यों में हैं. वे इंदिरा गांधी के खिलाफ मुकदमा लड़ चुके हैं.

अप्रैल में लोकपाल बिल की साझा ड्राफ्ट समिति में शांति भूषण भी शामिल थे. शांति भूषण ने आरोप लगाया था कि सीडी से छेड़छाड़ करके सिविल सोसाइटी को बदनाम करने की कोशिश की गई है. सीडी में शांति भूषण कथित तौर पर मुलायम सिंह और अमर सिंह को बता रहे हैं कि उनका बेटा प्रशांत भूषण ‘जजों को मैनेज’ कर सकता है. अप्रैल में इस मामले के सामने आने के बाद जो लोग शांति भूषण की साझा ड्राफ्टिंग कमिटी से इस्तीफे की मांग कर रहे थे, उन्हें एक बार फिर से शांति भूषण पर सवाल उठाने का मौका मिल गया है.

टीम अन्ना और जन लोकपाल बिल के विरोधी वरिष्ठ वकील के बहाने अन्ना हजारे, उनके साथियों और भ्रष्टाचार के खिलाफ उनके आंदोलन को कठघरे में खड़ा कर सकते हैं. इस बीच, ताजे डेवलपमेंट पर प्रशांत भूषण का कहना है कि लगता है कि पुलिस, फॉरेंसिक लैब और सरकार के कुछ अधिकारियों समेत कई लोग आपराधिक साजिश रच रहे हैं. वे सीएफएसएल, चंडीगढ़ की रिपोर्ट के बारे में क्या कह रहे हैं?

सीडी को सुनने के लिए नीचे दिए गए शीर्षक पर क्लिक करें-

ये है अमर-शांति-मुलायम वार्ता का टेप

सच में गद्दारी की स्वामी अग्निवेश ने, बातचीत का वीडियो टेप भी जारी

टीम अन्ना के स्तंभ कहे जाने वाले स्वामी अग्निवेश बुरी तरह फंस गए हैं. उन्होंने फोन पर किपल सिब्बल से जो बातचीत की, वह बातचीत पब्लिक में आ चुकी है. इस बातचीत का आडियो टेप जारी किए जाने के बाद अब वीडियो टेप भी उपलब्ध हो गया है. कपिल से बातचीत में अग्निवेश ने अन्ना और उनकी टीम के लोगों को जमकर कोसा है और सरकार को उकसाया है कि वह इन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करे.

वीडियो टेप में भी वही बातचीत है जो आडियो टेप में है. बस, वीडियो टेप में आप अग्निवेश को बात करते हुए सुनने के साथ देख भी सकते हैं. इस तरह अब यह पूरी तरह साबित हो चुका है कि स्वामी अग्निवेश ने अन्ना के साथ गद्दारी की है. बातचीत का वीडियो देखने-सुनने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें- अग्निवेश और कपिल वार्ता

रामलीला मैदान में टोटल टीवी के कैमरामैन के साथ पुलिस ने की मारपीट

अन्ना हजारे के अनशन स्थल रामलीला मैदान पर शनिवार को एक कैमरामैन से कथित तौर पर हुई मारपीट के बाद पुलिस और मीडिया में तकरार हो गई। मारपीट की घटना टोटल टीवी के संदीप शर्मा नामक कैमरामैन के साथ हुई। शर्मा के मुताबिक जब वह रामलीला मैदान के द्वार संख्या एक से प्रवेश कर रहे थे तो एक पुलिस अधिकारी से उनका विवाद हो गया।

शर्मा का आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने उनके साथ मारपीट की और उनका कैमरा तोड़ दिया। इस घटना के बाद मीडियाकर्मियों ने मंच के निकट पहुंचकर वरिष्ठ अधिकारियों से दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। जब इस घटना की जानकारी हजारे के साथी प्रशांत भूषण को मिली तो उन्होंने आश्वासन दिया कि वह मीडिया की तरफ से पुलिस अधिकारियों ने बात करेंगे।

लालू यादव राजनीति के राखी सावंत हैं!

भूमिका राय: संसद में कहिन- कोई 74 साल का आदमी 12 दि‍न का अनशन कर कैसे सकता है, और कैसे कह सकता है कि‍ अभी मैं 3 कि‍मी तक और दौड़ सकता हूं : बचपन में राजनेताओं के नाम और उनके काम में कोई खास दि‍लचस्‍पी नहीं थी, खेलने-कूदने से फुर्सत ही कब रहती थी कि‍ कुछ और याद रहे। लेकि‍न उस वक्‍त भी लालू प्रसाद यादव का नाम याद था। पता था कि‍ आप बि‍हार के ‘राजा’ हैं।

और इसके पीछे कारण बहुत ही सहज था, घरवाले जब भी राजनीति‍ से जुड़ी बातें कि‍या करते तो अक्‍सर लालू का जि‍क्र करके कोई कि‍स्‍सा सुना देते या फि‍र उनकी तथाकथि‍त बेबाकी पर हंसने लगते। कभी-कभी ये नाम इसलि‍ए भी सुनाई देता कि‍ पढ़ा-लि‍खा ना होने पर भी वो मुख्‍यमंत्री थे, जेल में थे लेकि‍न बीवी को तैनात कर रखा था। पढ़ने का मन नहीं करता तो हम उनका ही उदाहरण देते और मां को कहते कि‍ ‘पढ़ लि‍खकर भी कोई राजा बना है क्‍या, लालू प्रसाद तो पढ़े-लि‍खे नहीं हैं फि‍र भी देखो…’ कुछ इन्‍हीं तरह की बातों से लालू प्रसाद यादव का नाम मस्‍ति‍ष्‍क रूपी कागज पर उस वक्‍त से ही छप गया जब मैने राजनीति‍ शब्‍द को जोड़-जोड़कर पढ़ना शुरू कि‍या था।

उसके बाद स्‍कूल और फि‍र कॉलेज में आ गए, समझ बढ़ी, दायरा बढ़ा और राजनीति‍ की इकाई समझ आने लगी। इस वक्‍त तक कई राजनेताओं के नाम के बाद ‘जी’ का सम्‍बोधन करने लगी तो कुछ के नाम के साथ उन तमाम शब्‍दों का जो अब राजनीति‍ज्ञों के पर्यायवाची (देशद्रोही, पापी, चोर, भ्रष्‍ट…आदि‍) बन चुके हैं। खैर लालू प्रसाद यादव का नाम कभी भी राजनीति‍ज्ञों की सूची में नहीं रख सकी, क्‍योंकि‍ जब भी इस नाम का जि‍क्र होता, कोई यार-दोस्‍त उनके ऊपर गढ़ा गया चुटकुला सुनाने लग जाता या फि‍र कोई कि‍स्‍सा लेकर बैठ जाता।
इन सबके बीच एक दौर ऐसा भी आया जब वो रेलवे वि‍भाग सम्‍भालते हुए मैनेजमेंट गुरु बन बैठे और देश से लेकर वि‍देश तक घूम-घूमकर शि‍क्षा देने लगे, खैर ये दौर भी बीतते देर नहीं लगी और उसके बाद लालू कहीं खो से गए। चुनावो में मि‍ली करारी हार भी कहीं ना कहीं उनकी चुप्‍पी का कारण बनी।

लेकि‍न आज एक लम्‍बे समय बाद लालू को सदन में बोलते देखा और आज उन पर और उनकी बातों पर हंसी आने के बजाय, उनकी सोच पर तरस आ रहा था। लालू प्रसाद ने सदन में बजाय इसके कि अन्‍ना के प्रस्‍ताव पर कोई राय दें, देश के लि‍ए कुछ सोचें, कुछ सुझाव दें, इस बात पर खींस नि‍पोरते दि‍खे कि‍ कोई 74 साल का आदमी 12 दि‍न का अनशन कर कैसे सकता है, और कैसे कह सकता है कि‍ अभी मैं 3 कि‍मी तक और दौड़ सकता हूं।

लालू प्रसाद जी इन बातों को कि‍सी मजाक की ही तरह सदन में अभि‍व्‍यक्‍त कर रहे थे। कि‍सी सदस्‍य ने जब पूछा कि‍ क्‍या ये इतना जरूरी वि‍षय है तो लालू जी ने झट से जवाब दि‍या कि‍ हां ये बहुत जरूरी टॉपि‍क है। हम नेता लोगो को ये पता करना चाहि‍ए कि‍ कोई ये सब कैसे कर सकता है। हम नेता लोगों को उनसे ट्रेनिंग लेनी चाहि‍ए और डॉक्‍टरों को उन पर रि‍सर्च करना चाहि‍ए। हालांकि‍ इस बात पर उनके सहयोगी भी खूब दांत चीयार रहे थे लेकि‍न क्‍या ये अन्‍ना का अपमान नहीं है? अन्‍ना ही क्‍या ये उस तपस्‍या का भी अपमान ही है जो भारत की जनता पि‍छले 12 दि‍नों से कर रही है और साथ ही ये सदन का भी अपमान ही था।

सदन में आज लालू प्रसाद को सुनकर पहला ख्‍याल बस यही आया कि‍ राजनेताओं और राखी सावंत में कोई खास फर्क नहीं रह गया है। वो भी अनाप-शनाप बोलकर पब्‍लि‍सि‍टी बटोरते हैं और ये भी कुछ ऐसा ही करते हैं। ना तो इन्‍हें देश से मतलब है और ना ही देश के लि‍ए लड़ने वालों से, मतलब है तो सिर्फ अपनी कुर्सी से। खैर लालू प्रसाद ने जो करना था और कहना था वो कर-कह चुके लेकि‍न अगर वो अन्‍ना से कुछ पूछना ही चाहते हैं तो ये जरूर पूछें कि देश उनके लि‍ए क्‍या है… भारत मां, जि‍सकी इज्‍जत से हम सबकी इज्‍जत है या बस एक जमीन का टुकड़ा, जि‍से कोई भी कभी भी लूट सकता है……।

लेखिका भूमिका राय युवा पत्रकार हैं. वे दिल्ली में पत्रकारिता की पढ़ाई के साथ-साथ स्वतंत्र लेखन भी कर रही हैं. उनके ब्लाग का नाम बतकुचनी है. भूमिका से संपर्क neha.yalka@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

जय जनता, जय अन्ना : दस बज गए हैं लेकिन पार्टी अभी बाकी है

ये आधी जीत है. आधी लड़ाई बाकी है. अगर आप लोगों की अनुमति हो तो ये अनशन तोड़ दूं. हाथ उठाएं. अन्ना के इतना कहते ही रामलीला मैदान में खड़े हजारों हाथ उठ खड़े हुए. तिरंगा झंडा लहराते हुए हजारों लोगों का करीब 13 दिन तक रामलीला मैदान में डटे रहना, सैकड़ों-हजारों लोगों का हर बड़े छोटे शहरों कस्बों में निकलना, सांसदों के घरों को घेरना, राजनीतिज्ञों को गरियाना…

इन सबने मिलकर भारतीय संसद के बंद पड़े कान को थोड़ा बहुत खोलने में कामयाबी हासिल की. वही कामयाबी जो कभी अंग्रेजों के जमाने में इकलौते भगत सिंह ने संसद में बम गिराकर और फांसी पर चढ़कर हासिल की थी. जनलोकपाल बिल की राह का बहुत बड़ा रोड़ा आज हट गया. जनताकत के बल पर बहुत बड़ी जीत हासिल हुई. कल दस बजे अन्ना हजारे अपना अनशन तोड़ेंगे. उन्होंने अनुरोध भी कर दिया कि जिस तरह भी तक सब शांतिपूर्ण हुआ, उसी तरह जश्न का कार्यक्रम भी शांतिपूर्ण रहे. पूरा देश जश्न में है. मीडिया के लोग जश्न में हैं.

अन्ना ने मीडिया को भी बधाई दी कि इन लोगों के कारण भी जीत हासिल हुई. कहने वाले कहते हैं कि सत्ता और सरकार ने सिस्टम के खिलाफ जनाक्रोश को अन्ना के जरिए कम कर लिया. और, कहीं कुछ बिगड़ा भी नहीं. सरकार भी वही. नेता भी वही. सिस्टम भी वही. और, माहौल बन गया जीत का. कहने वाले यह भी कहते हैं कि दुनिया में करोड़ों कानून है लेकिन मानवता अब भी हर जगह त्रस्त है, सो, कानून से काम नहीं बनने वाला, काम बनेगा हर एक आदमी को अन्ना जैसा बनने पर. इस जीत की जितने मुंह उतनी व्याख्याएं हो रही हैं. फिलहाल यह जश्न का दौर है. सवाल उठाना लोगों को कम पचेगा. सो, हम भी यही कहेंगे कि दस बज गए हैं लेकिन पार्टी अभी बाकी है. लेकिन दोस्त, दस बजे के बाद की जिंदगी उतनी की रुखी और बेजान होगी, जितनी अब तक थी.

भ्रष्टाचार कोई एक शब्द नहीं जिसे डिक्शनरी से मिटा दो. यह जीवन पद्धति है. इस भ्रष्टाचार के खिलाफ हजारों लोग सदियों से लड़ते रहे हैं और आज भी लड़ रहे हैं. इस देश के कोने कोने में लोग लड़ रहे हैं और अपनी जान गंवा रहे हैं. सिस्टम शांत और निष्ठुर बना हुआ है. अन्ना भाग्यशाली हैं जो उनको आधी ही सही, जीत हासिल हुई. पर अन्ना और उनके लोगों की यह आधी जीत क्या देश के कोने कोने में लड़े जा रहे भ्रष्ट जीवन शैली और पद्धति के खिलाफ भी कामयाब होगी, कहना मुश्किल है. पूरी दुनिया जिस बाजार से संचालित हो रही है, उस बाजार के नियामकों के काम करने के तौर तरीके में भ्रष्टाचार रचा-बसा है.

कैसे आप मल्टीनेशनल्स को अपने देश का दाम और सामान बाहर ले जाने से रोक सकोगे. कैसे आदिवासियों की अच्छी भली जिंदगी को उजड़ने से बचा सकोगे. कैसे किसानों की जमीन को भ्रष्ट लोगों द्वारा कब्जाने से बचा सकोगे. कैसे हर शिक्षित व्यक्ति को बेरोजगार बनने से रोक सकोगे. कैसे हर हाथ को काम न मिलने की घुटन से मुक्त करा पाओगे… दर्जनों सवाल हैं. और इनका जवाब सिर्फ जनलोकपाल बिल नहीं है. पर, निराश होने की जरूरत नहीं. बस जरूरत इसी जज्बे को बनाए रखने की है. जो भी सत्ता-सिस्टम के खिलाफ सही सवालों पर लड़ता दिखे, उसे सपोर्ट करने के इसी जज्बे की जरूरत है. जाति, धर्म, क्षेत्र और पैसे की राजनीति के विरोध करने के लिए इसी जज्बे की जरूरत है.

ध्यान रखिए, सत्ता और सिस्टम बहुत मक्कार होता है. यह दुनिया के सबसे चालाक लोगों के हाथों संचालित होने वाली चीज होती है जो आसानी से अपने राज करने की ताकत को छोड़ नहीं सकते. इन्हें हमेशा संघर्षों से हराया जा सकता है. वह संघर्ष चाहे अहिंसक हो या हिंसक. अंग्रेजों के खिलाफ चले लंबे आंदोलन गवाह हैं कि वहां हमेशा दो धाराएं सक्रिय रहीं. गरम दल और नरम दल. दोनों दलों का बहुत बड़ा योगदान रहा है अंग्रेजों को नाको चने चबवाने में. आज इस देश के आम नागरिक को सलाम है जो अन्ना के पक्ष में उठ खड़ा हुआ. और इस दस बारह तेरह दिन के आंदोलन की प्रक्रिया ने पूरे देश के आम जन का राजनीतिकरण कर दिया. मेरी नजर में सबसे बड़ी उपलब्धि यही है.

अगर हम राजनीतिक चेतना से लैस रहेंगे और विरोध करने के अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल करते रहेंगे तो इसी तरह आगे भी हम बड़े बड़े सूरमाओं को परास्त करते रहेंगे. फिलहाल तो मैं अन्ना और उनकी टीम के सभी लोगों के साथ साथ इस देश के आम जन को प्रणाम-सलाम करता हूं और उनका दिल से शुक्रिया अदा करता हूं कि सबने मिलकर एक चमत्कारिक माहौल का सृजन किया जिससे जनजीवन के मुख्य मुद्दे एजेंडे में आए और भ्रष्ट राजनीति व राजनेताओं को घुटनों के बल बैठना पड़ा.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

bhadas4media@gmail.com

स्वामी अग्निवेश सरकार के आदमी, टीम अन्ना टूटी… सुनें यह टेप

बड़ी और बुरी खबर है. बड़ा खुलासा है. टीम अन्ना के मजबूत स्तंभ स्वामी अग्निवेश सरकार के पाले में खड़े हो गए हैं. यह साबित करने वाला एक टेप भड़ास4मीडिया के हाथ लगा है. इस टेप में स्वामी अग्निवेश किन्हीं कपिल (कपिल सिब्बल?) से बड़ी गर्मजोशी से फोन पर बात कर रहे हैं. वे टीम अन्ना के सदस्यों को पागल हाथी करार दे रहे हैं. यह भी कह रहे हैं कि…

”…पूरी पार्लियामेंट ने जब खड़े होकर अनशन तोड़ने की अपील की तो अन्ना को तभी अनशन तोड़ देना था.” स्वामी अग्निवेश कहते हैं कि वे बहुत शर्मिंदा हैं कि केंद्र सरकार आखिर इतनी कमजोर क्यों दिखाई पड़ रही है. यही नहीं, अग्निवेश बातचीत के दौरान कपिल को इशारे से यह भी सलाह दे रहे हैं कि केंद्र सरकार अन्ना के आगे कतई झुके नहीं. कई और बातें अग्निवेश कर रहे हैं. इस आडियो में स्वामी अग्निवेश की बातें सुनकर कहा जा सकता है कि वह अन्ना के साथ कम, सरकार के साथ ज्यादा हैं. अगर टीम अन्ना ऐसे ही लोगों से निर्मित है तो फिर इस आंदोलन का भगवान ही मालिक है. अग्निवेश पर हमेशा से सत्ता प्रतिष्ठान का दलाल होने का आरोप लगता रहा है. इस टेप ने फिर साबित किया है कि वे अंततः एक दलाल ही हैं जो जनांदोलन में घुसकर उसे तोड़ने का काम सरकार के इशारे पर करते हैं.

अग्निवेश और कपिल के बीच की बातचीत सुनने के लिए नीचे दिए गए आडियो प्लेयर का साउंड फुल कर लें और प्लेयर पर क्लिक कर दें…

There seems to be an error with the player !

स्वामी अग्निवेश की बातचीत का वीडियो भी उपलब्ध हो गया है, इस वीडियो को देखने के लिए क्लिक करें- अग्निवेश और कपिल के बीच फोन पर बातचीत का वीडियो

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत की रिपोर्ट

करप्ट लोग चढ़ने लगे अन्ना के मंच पर!

: संदेह के घेरे में आने लगी टीम अन्ना : जिस अन्ना हजारे ने कभी एक करोड़ रुपये का एवार्ड इसलिए लेने से मना कर दिया था क्योंकि वह एवार्ड एक शिक्षा माफिया की तरफ से दिया जा रहा था, उसी अन्ना हजारे ने अपनी आंखों के सामने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के अपने मंच से उसी शिक्षा माफिया को अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए देखा. जी हां, ये शिक्षा माफिया और करप्ट परसन कोई और नहीं बल्कि अरिंदम चौधरी है.

अपने एक हालिया लेख में अन्ना हजारे को जमकर गरियाने वाले और सत्ता के पक्ष में खड़े होने वाले अरिंदम चौधरी ने अन्ना समर्थकों की नाराजगी से बचने के लिए किसी शातिर की तरह पैंतरा बदला और भड़ास4मीडिया पर खबर प्रकाशित होते ही अगले दिन रामलीला मैदान पहुंच गया. अरिंदम ने टीम अन्ना को पटाने में कामयाबी हासिल की. मंच पर चढ़ा. अधखुली बुशर्ट और खुला सीना दिखाते किसी लफंगे की माफिक अरिंदम चौधरी ने दूसरा गांधी कहे जाने वाले अन्ना हजारे के मंच से समर्थकों को खूब ज्ञान पिलाया और अन्ना हजारे व उनके आंदोलन की भूरि भूरि प्रशंसा कर डाली. सुनिए, अरिंदम ने अपने भाषण में क्या-क्या कहा और समझिए कि उसकी ये बातें उसके पिछले आलेख (क्लिक करें- अन्ना को अरिंदम ने ये क्या कह डाला) से किस तरह अलग हैं-

”अन्‍ना हजारे का भ्रष्‍टाचार के विरुद्ध आंदोलन और सिविल सोसायटी की बढ़ती ताकत को जनता का व्‍यापक समर्थन मिला है. यह वह आंदोलन बन गया है जो बीते 60 सालों से नहीं देखा गया. अगर सरकार अन्‍ना और उनकी टीम की आधी मांगों को भी मान लेती है तो दो साल में हम एक नया हिंदुस्‍तान देखेंगे. भ्रष्‍टाचार के लिए सरकार और सरकारी नीतियां जिम्मेदार हैं. देश में सबसे ज्‍यादा भ्रष्‍टाचार बड़े ओद्यौगिक घरानों में होता है. सिर्फ इन घरानों को पांच से छह लाख करोड़ रुपए की कर राहत दी जाती है. इस रकम को अगर विकास में खर्च किया जाए तो देश से गरीबी का नामोनिशान मिट सकता है. देश में खाद्य वितरण में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार भी चिंतनीय है. हमारे देश में 200 मिलियन लोग 40 साल की उम्र से पहले मर जाते हैं. इसके पीछे बड़ी वजह यह है कि 60 मिलियन टन अनाज सिस्‍टम में फैले भ्रष्‍टाचार के चलते उन लोगों तक नहीं पहुंच पाता है. सरकार हर बजट में अमीरों के लिए कुछ नए प्रावधान जरूर करती है, लेकिन उसका एक भी फैसला भ्रष्‍टाचार को समाप्‍त करने वाला नहीं होता. सरकार इस ओर बिल्‍कुल ध्‍यान नहीं देती. सरकार की इसी नजरअंदाजी के कारण ही अन्‍ना हजारे को सड़क पर आना पड़ा है. अन्‍ना भ्रष्‍टाचार को मिटाना चाहते हैं. यह लोकपाल बिल बहुत उपयोगी बिल है. इसी बिल ने अमेरिका और इंग्‍लैंड जैसे देशों को बदला है. इसके साथ ही स्‍वीडन और सिंगापुर जैसे देशों से भी भ्रष्‍टाचार पर लगाम लगाने में भी लोकपाल बिल का बहुत बड़ा योगदान है. दक्षिण कोरिया और इंडो‍नेशिया में भी अगर भ्रष्‍टाचार पर नकेल कसी जा सकी है तो लोकपाल की वजह से. कोरिया में इस लोकपाल के लिए प्रतिनिधियों का चयन सिर्फ छह दिन में हो गया था, अमेरिका में इसके लिए छह महीने का वक्‍त लगा वहीं भारत में 20-30 साल का समय लग गया ऐसे लोगों को सामने आने में. अन्‍ना का यह आंदोलन काबिलेतारीफ है. जिस तरह से इस आंदोलन को दिशा दी गई है उसके लिए अन्‍ना और उनकी टीम का काम काबिले तारीफ है. मैं अन्‍ना हजारे से अपना अनशन समाप्‍त करने का अनुरोध करता हूं. यह आंदोलन और विरोध चलता रहना चाहिए. अन्‍ना समर्थकों को चाहिए कि सांसदों के घरों के बाहर धरना प्रदर्शन करने से बेहतर रहेगा कि स्‍थायी समिति के 14 सदस्‍यों के घरों के बाहर धरना दिया जाए. अन्‍ना को अपनी सेहत का खयाल रखना चाहिए और आगे चुनाव और न्‍यायिक सुधार की जंग के लिए भी हमारा मार्गदर्शन करना चाहिए.”

दोहरा चरित्र : अन्ना को पहले लिखकर गाली, फिर मंच पर चढ़कर गुणगान

पढ़ा आपने. कल तक अन्ना को जाने किस किस उपाधियों से नवाजने वाला यह कथित मैनेजमेंट गुरु जब अन्ना के मंच पर पहुंचता है तो उसके सुर बदल जाते हैं और किसी शातिर नेता की तरह भीड़ को अपने पक्ष में लुभाने के लिए वही बोलता है जो अन्ना समर्थकों को पसंद आए. पर बड़ा सवालिया निशान टीम अन्ना पर लग गया है. वे लोग आखिर किस तरह करप्ट लोगों को मंच शेयर करने दे रहे हैं. जो आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रहा है, उसी आंदोलन के पवित्र मंच पर घटिया व अपवित्र लोग चढ़े जा रहे हों और लच्छेदार बातें कहकर खुद को हीरो साबित कर रहे हों, तो यह प्रकरण बताता है कि टीम अन्ना किस कदर दबाव में है.

और, अगर ये लोग आज दबाव में हैं तो कल को जनलोकपाल बिल बन जाने पर क्या गारंटी कि इन्हें कोई भ्रष्टाचारी पटा न ले. अरिंदम चौधरी और उनके आईआईपीएम के खिलाफ दर्जनों प्रकरण, कई जांच आदेश और कई घपले-घोटाले के आरोप हैं. न्यूज चैनल और अखबार इनके खिलाफ कुछ न लिखें, दिखाएं, इस कारण अरिंदम चौधरी हर साल अरबों रुपयों का विज्ञापन इन अखबारों और चैनलों को देता है. साथ ही, खुद के मीडिया हाउस के जरिए वह देश में अपनी छवि एक क्रांतिकारी मैनेजमेंट गुरु की बनाता रहता है. पर इसी अरिंदम चौधरी के मीडिया हाउस की कहानी है कि यहां कई महीनों से लोगों को तनख्वाह नहीं मिली. लड़कियों को दिनदहाड़े आफिस में गरियाया जाता है.

अरिंदम चौधरी का दाहिना हाथ माने जाने वाला शख्स भरी दोपहर दारू पीकर आफिस आता है और लड़कियों को गंदी गंदी गालियां देता है. उसकी दी हुई गालियां की रिकार्डिंग भी भड़ास4मीडिया के पास सुरक्षित है. वह लड़कियों का कई तरह से शोषण करता है और इसे पूरा आफिस जानता देखता है. पर चंद हजार रुपये में इमान बेचने वाले हमारे महान पत्रकार, जो वहां काम करते हैं, विरोध की आवाज तक निकाल नहीं पाते. इसी के मीडिया हाउस में पेड न्यूज का काम धड़ल्ले से किया जाता है. यहां पत्रकारों को विज्ञापन और लायजनिंग का काम करने के लिए मजबूर किया जाता है. इसके भी दस्तावेज भड़ास4मीडिया के पास सुरक्षित है.

इन प्रकरणों पर बात कभी बाद में और विस्तार से किया जाएगा, फिलहाल इतना तो कहा ही जाना चाहिए कि जो खुद नख से शिख तक फर्जीवाड़े में डूबा हो, वो वह शख्स अन्ना के मंच पर चढ़ कर जनता को उपदेश दे तो यह न सिर्फ अन्ना का और इस देश का दुर्भाग्य है बल्कि इस आंदोलन के हश्र को भी बताता है. मीडिया के सभी लोगों और अन्ना के सभी समर्थकों को इस बिंदु पर खुले दिमाग से विचार करना चाहिए.

संभव है, कई लोग मेरी बातों, विचार से सहमत न हों. उनके कमेंट की प्रतीक्षा रहेगी. पर यह खुली बहस का विषय बन गया है कि क्या टीम अन्ना के लोगों ने अरिंदम चौधरी को रामलीला मैदान का मंच उपलब्ध कराकर गलत काम नहीं किया है? और, अरिंदम चौधरी ने अन्ना के साथ मंच पर भाषण देते हुए फोटो खिंचवाकर उसका अपनी ब्रांड इमेज बढ़ाने में, अपने पापों को धोने में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, क्या इसका एहसास टीम अन्ना को है?

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

bhadas4media@gmail.com

अन्ना के सपोर्ट में नंगी योगिता की खुली देशभक्ति की तस्वीर देखें

अभिनेत्री योगिता दांडेकर ने हिम्मत का काम किया है. हिम्मत की जगह दुस्साहस कहें. वे अन्ना के लिए टापलेस हो गई हैं. विविधता भरे इस देश में सोचने समझने और जीने का सबका अपना अपना हिसाब-किताब है. अन्ना आंदोलन को सपोर्ट देने का भी सबका अपना अपना अंदाज है. योगिता ने अपने तरीके से खुलकर अन्ना को सपोर्ट किया है.

ट्रैफिक सिग्नल, सुखांत, गामत एका रात्री ची, रद्दा रॉक्स जैसी हिंदी-मराठी फिल्मों में अभिनय कर चुकीं योगिता बोल्ड और खुले दिमाग वाली एक्ट्रेस हैं. सो, उन्होंने अन्ना के आंदोलन को सपोर्ट करने के लिए अनोखा अंदाज अपनाया. वे नंगी हो गईं. शरीर पर तिरंगा रंगवाया, पेंट कराया. गांधी टोपी पहन ली. और खूब पोज दिए. आगे से पीछे से, खूब तस्वीरें खिंचवाईं. संभव है, ये गांधीवादी तरीका न हो, पर कई लोग इसे अहिंसक तो मानते ही हैं. और, कुछ लोग बेहद हाट तरीका.

कुछ का कहना है कि बदले जमाने में हो सकता है गांधीवाद में कुछ चेंज, कुछ संसोधन हो गया हो, और इसे सिर्फ योगिता महसूस कर पा रही हों. पता नहीं अन्ना हजारे योगिता के सपोर्ट को किस तरह लेंगे, लेकिन इस देश का नौजवान योगिता की तस्वीर को चटखारे लेकर, आंखें फाड़ फाड़कर देख रहा है. योगिता के इस सपोर्ट से अन्ना के आंदोलन का कुछ भला हो न हो, पर योगिता का जरूर भला हो गया है. वह रातोंरात नामी हो चुकी हैं.

योगिता खुद क्या कहती हैं, सुन लीजिए- ”अन्ना का मैं पिछले 10 वर्षों से अनुसरण कर रही हूं. मैंने अन्ना के कई कैंपेन में हिस्सा भी लिया है. अन्ना को खुलकर सपोर्ट करने के लिए अभी न्यूड होकर तस्वीरें खिंचवाई हैं. जब जनलोकपाल बिल संसद में पारित हो जाएगा तो मैं न्यूड होकर दौड़ भी लगा सकती हूं. मैं ऐसा कर यह संदेश देना चाहती हूं कि मैं सच में अण्णा का समर्थन करती हूं और न्यूड होकर सिर्फ पब्लिसिटी बटोरना मेरा इरादा नहीं है. मैंने ऐसी कई मॉडल्स के बारे में सुना जिन्होंने अन्ना के आंदोलन का समर्थन करने के लिए न्यूड होने की बात कही और इस संघर्ष का मजाक उड़ाया है. अन्ना के आंदोलन की आ़ड़ में कई नई अभिनेत्रियां और मॉडल न्यूड होने की बात कर सस्ती लोकप्रियता तो बटोर रही हैं मगर किसी में ऐसा करने का ‘साहस’ नजर नहीं आया. मैं ऐसा करने वाली पहली भारतीय महिला हूं. मैंने यह प्रण किया है कि इस बिल के पास होने के बाद मैं टॉपलेस होकर दौ़ड़ लगाऊंगी. मैं पूनम पांडेय की तरह नहीं हूं जो न्यूड होने के वादे तो करती है मगर आज तक ऐसा कर न सकी.”

अन्ना को ”खुलकर” सपोर्ट देने वाली योगिता की ”नंगी” राष्ट्रभक्ति की कुछ तस्वीरें इस तरह है-

सलमान और मुलायम की मांग- मीडिया करप्शन भी लोकपाल के दायरे में आए!

द हिंदू अखबार में दो खबरें पिछले दिनों प्रकाशित हुई. एक रिपोर्ट के मुताबिक केंद्रीय कानून और सामाजिक न्याय मंत्री सलमान खुर्शीद ने एक न्यूज चैनल पर एंकर के सवालों के जवाब में उन्हीं से सवाल पूछ लिया कि ”…मीडिया करप्शन को टीम अन्ना वर्जन के लोकपाल के अधीन जांच का विषय क्यों नहीं बनाया जाना चाहिए. क्या हम लोगों को नीरा राडिया टेप का यहां जिक्र नहीं करना चाहिए.

अब आप पूछेंगे कि सरकार ने राडिया टेप्स की जांच क्यों नहीं कराई. अगर हम ऐसा करते तो हम पर असंवेदनशील होने का आरोप लगाया जाता, मीडिया विरोधी करार दिया जाता. अगर हम ऐसा करते तो मीडिया के कई तबके खिलाफ खड़े हो जाते.”

सलमान खुर्शीद ने ये बातें हेडलाइंस टुडे पर एक्जीक्यूटिव एडिटर राहुल कंवल से बातचीत के दौरान कहीं. इस बारे में खबर द हिंदू अखबार में प्रकाशित हुई. इसी अखबार में एक दूसरी खबर भी प्रकाशित हुई जिसमें मुलायम सिंह यादव को उद्धृत किया गया है. समाजवादी पार्टी के मुखिया ने मांग की कि मीडिया को भी लोकपाल के अधीन लाया जाना चाहिए. चुनावों के समय हम लोगों को मीडिया की प्रताड़ना और भ्रष्टाचार को झेलना पड़ता है. चुनावों के दौरान यह नियम सा बन गया है कि प्रिंट और टीवी के पत्रकार नेताओं से पैसे लेते हैं और उसी मुताबिक खबरें दिखाते छापते हैं.

सलमान खुर्शीद और मुलायम ने पार्टी लाइन से परे जाते हुए मीडिया को लोकपाल के अधीन लाने की मांग उठाकर नई बहस छेड़ दी है. हाल के दिनों में जिस तरह से परंपरागत मीडिया के लोगों ने पेड न्यूज और पेड सर्वे की गंदगी फैलाई है, उस पर मीडिया के बाहर और भीतर काफी बहस हुई. प्रेस काउंसिल से लेकर चुनाव आयोग तक में शिकायत दर्ज कराई गई. कई नेताओं ने मीडिया वालों पर लिखित रूप से आरोप लगाया कि उनके चुनाव प्रचार के बदले पैकेज की मांग मीडिया के लोगों ने की. शुरुआती हो हल्ले के बाद यह मामला थम गया क्योंकि केंद्र सरकार ने इस मसले पर कोई रुचि नहीं ली.

लेकिन अब जब करप्शन में केंद्र सरकार की गर्दन फंसी है और मीडिया अन्ना हजारे के करप्शन विरोधी आंदोलन का भरपूर कवेरज कर रहा है तो नेताओं ने भी मीडिया के करप्शन को लोकपाल के दायरे में जांच का विषय बनाए जाने की मांग शुरू कर दी है. मजबूरी में ही सही, एक तरह से अच्छा प्रयास है. जब तक मीडिया के लोग नेताओं के करप्शन में चुपचाप शामिल थे, तब तक नेताओं को मीडिया के भीतर का करप्शन नहीं दिख रहा था.

लेकिन आज जब मीडिया देश में करप्शन विरोधी आंदोलन को फैलाने का बड़ा केंद्र बन गया है और अन्ना के पक्ष में खड़ा दिखाई पड़ रहा है तो नेताओं को मीडिया के करप्शन की याद आ गई. पर, कहते हैं ना, लुटेरों में भी अक्सर लूट के माल को लेकर झगड़ा हो जाता है और विवाद बाहर चला आता है तो आजकल यही हाल है. पर इस सच्चाई से कोई इनकार नहीं कर सकता कि कारपोरेट हो चुके मीडिया घरानों के संगठित करप्शन पर लगाम लगाने के लिए मीडिया को भी जनलोकपाल के दायरे में लाया जाना चाहिए.

ध्यान रखना कांग्रेसियों, ये रामदेव नहीं, अन्ना हैं, अबकी खदेड़े तुम लोग जाओगे

दयानंद पांडेय: धृतराष्ट्र, मगध और अन्ना : आप को याद होगा कि पांडवों ने कौरवों से आखिर में सिर्फ़ पांच गांव मांगे थे जो उन्हें नहीं मिले थे। उलटे लाक्षागृह और अग्यातवास वगैरह के पैकेज के बाद युद्ध क्या भीषण युद्ध उन्हें लड़ना पडा था। अपनों से ही अपनों के खिलाफ़ युद्ध लड़ना कितना संघातिक तनाव लिए होता है, हम सब यह जानते हैं।

तो क्या अब हम एक अघोषित युद्ध की ओर बढ रहे हैं? आखिर अन्ना और उन की टीम जो कह रही है, जनता उस को सुन रही है, गुन रही है। दस दिन से दिन रात एक किए हुई है और अपनी सरकार समय की दीवार पर लिखी इबारत को क्यों नहीं पढ पा रही है, इसे जानना कोई मुश्किल काम नहीं है। लोग अन्ना नाम की टोपी पहने घूमने लगे हैं। अभी एक दिन एक लतीफ़ा चला कि आज सुबह मनमोहन सिंह भी एक टोपी लगाए घूमते पाए गए। इस टोपी पर लिखा था मैं अंधा हूं। तो एक सच यह भी है कि मनमोहन सिंह नाम का यह प्रधानमंत्री इन दिनों धृतराष्ट्र में तब्दील है। नहीं, जो मनमोहन सिंह एक समय अमरीका से परमाणु समझौते खातिर वाम मोर्चे का समर्थन खो कर अपनी सरकार को दांव पर लगाने की हद तक चला गया था, वही मनमोहन सिंह अब लोकपाल पर सर्वदलीय समर्थन की टोपी लगा कर देश की जनता के साथ छ्ल की बिसात बिछा कर संसदीय मर्यादाओं की दुहाई देता घूम रहा है तो ज़रा नहीं पूरा अफ़सोस होता है।

अन्ना ने जब लोकपाल पर अप्रैल में जंतर मंतर पर अनशन किया था तब तो इसी मनमोहन सरकार ने संवेदनशीलता का परिचय देते हुए रातोरात अध्यादेश जारी कर दिया था। पर बाद के दिनों में यही सरकार शकुनि चाल के फंदे में लगातार अनेक लाक्षागृह निर्माण करने में युद्ध स्तर पर लग गई। कपिल सिब्बल, सुबोधकांत टाइप के अश्वमेधी अश्व भी छोड़े। और लोकपाल की बैठकों के बीच में ही अन्ना टीम अपने को छला हुआ महसूस करने लगी। इस छल को कांग्रेस ने छुपाया भी नहीं। असल में इस बीच एक और बिसात बिछ गई। यह बिसात भाजपा की थी। इस चाल में बहुत आहिस्ता से भाजपा ने कांग्रेस को महसूस करवाया कि सिविल सोसायटी को अगर इसी तरह सिर पर बिठाया गया तो संसद और संसदीय गरिमा और उस की शक्ति का, उस के विशेषाधिकार और उस की सर्वोच्चता का क्या होगा?

कांग्रेस इस फंदे में बहुत आसानी से आ गई। ठीक वैसे ही जैसे बहेलिए के जाल में कोई कबूतर या कोई चिड़िया आ जाय। यहां भाजपा ने जाल के नीचे संसद की अस्मिता का दाना डाल रखा था। कांग्रेस को यह दाना मुफ़ीद लगा। जाल नहीं देख पाई। और फिर धीरे-धीरे इस संसदीय अस्मिता के दाने की आस में देश की सभी राजनीतिक पार्टियां फंसती गईं। भाजपा का काम हो गया था। कांग्रेस अब जनता के सीधे निशाने पर थी। कांग्रेस को अपने छले जाने और भाजपा के जाल का एहसास तो हुआ पर अब तक बहुत देर हो चुकी थी।

अचानक रंगमंच पर महत्वोन्माद की बीमारी के मारे योग के मल्टीनेशनल व्यापारी रामदेव ने एंट्री ले ली। उन को लगा कि जैसे वह योग के नाम पर अपने अनुयायियों की आंख में धूल झोंक कर अपना व्यवसाय दिन दूना रात चौगुना कर गए हैं वैसे ही वह देश की बहुसंख्य जनता को भी फांस लेंगे। रामलीला मैदान में उन्हों ने अपनी दुकान सजा ली। रामलीला मैदान को जैसे शापिंग माल में कनवर्ट कर बैठे वह। मनमोहन सरकार इसी फ़िराक में थी। पहले रामदेव की पतंग को वह शिखर तक ले गई फिर लंबी ढील दी और अंतत: उन की ओर से बालकृष्ण की लिखी चिट्ठी सार्वजनिक कर उन की मिट्टी पलीद कर दी। बताया कि रामदेव भाजपा और आर.एस.एस. के इशारे पर काम कर रहे हैं। और आधी रात बिजली काट कर रामदेव की रही सही कसर भी निकाल दी।

रामदेव की पतंग काटने की बजाय उन के हाथ से चर्खी ही छीन ली। उन को औरतों की सलवार कमीज पहन कर भागना पडा। जिस को नहीं करना था उस ने भी कांग्रेस की थू-थू की। लेकिन कांग्रेस और उस के टामियों को लगा कि उन्हों ने न सिर्फ़ मैदान मार लिया बल्कि आने वाले दिनों में संभावित आंदोलनों का मंसूबा बांधने वालों के लिए एक बडी लक्ष्मण रेखा भी खींच दी है कि कोई अब हिम्मत भी नहीं कर पाएगा। चाहे पेट्रोल के दाम बढें या दूध के, जनता भी चूं नहीं करेगी। तो जब अन्ना ने १६ अगस्त से अनशन पर जाने की हुंकार भरी  तो कांग्रेस को लगा कि वह फ़ूंक मार कर चींटी की तरह उन्हें भी उडा देगी।

कोशिश यही की भी। पहले के दिनों में राजा जब लडाई लडते थे तो जब देखते थे कि वह हार जाएंगे या मारे जाएंगे तो अपने आगे एक गाय खडी कर लेते थे। उन की रक्षा हो जाती थी। गो हत्या के डर से अगला उस पर वार नहीं करता था। तो इन दिनों जब कांग्रेस या सो काल्ड सेक्यूलर ताकतों को जब कोई बचाव नहीं मिलता तो वह भाजपा और आरएसएस नाम की एक गाय सामने रख देते हैं कि अरे इस के पीछे तो भाजपा है, आर.एस.एस है।जैसे कभी हर गलती को छुपाने के लिए सी.आई.ए. का जाप करती थीं। सो बहुत सारे लोग इसी भाजपा, आर.एस.एस. परहेज में उस प्रकरण से अपने को अलग कर लेते हैं।

कांग्रेस या सो काल्ड सेक्यूलर लोगों का आधा काम यों ही आसान हो जाता है। रामदेव और अन्ना हजारे के साथ भी कांग्रेस ने यही नुस्खा आजमाया। रामदेव तो दुकानदार थे पिट कर चले गए। उन को पहले कोई यह बताने वाला नहीं था कि दुकानदारी और आंदोलन दोनों दो चीज़ें हैं। पर वृंदा करात वाले मामले में वह कुछ चैनलों और मीडिया को पेड न्यूज की हवा में अरेंज कर मैनेज कर ‘हीरो’ बन गए थे तो उन का दिमाग खराब हो गया था, महत्वाकांक्षाएं पेंग मारने लगी थीं। लेकिन झूला उलट गया। होश ठिकाने आ गए हैं अब उन के। और जो अब वह कभी-कभी इधर-उधर बंदरों की तरह उछल-कूद करते दिख जाते हैं तो सिर्फ़ इस लिए कि मह्त्वोन्माद की बीमारी का उन के अभी ठीक से इलाज होना बाकी है अभी। और यह औषधि उन्हें कोई आयुर्वेदाचार्य ही देगा यह भी तय है। एलोपैथी के वश के वह हैं नहीं।

खैर कांग्रेस और उस के टामियों ने तमाम भूलों में एक बड़ी भूल यह की कि अन्ना को भी उन्होंने रामदेव का बगलगीर मान लिया। और टूट पड़े सारा राशन-पानी ले कर। नहा-धो कर। अन्ना की चिट्ठी का जवाब भी जो कहते हैं कि ईंट का जवाब पत्थर की तर्ज़ में राजनीतिक भाषा और संसदीय मर्यादा से पैदल प्रवक्ता मनीष तिवारी से दिलवाया। बिल्कुल बैशाखनंदनी व्याख्या में ‘तुम अन्ना हजारे!’ की शब्दावली में। गोया अन्ना, अन्ना नहीं दाउद के हमराह हों! अब की बार पहला तारा यहीं टूटा। हाय गजब कहीं तारा टूटा के अंदाज़ में। दूसरे दिन सरकार ने धृतराष्ट्र के अंदाज में अन्ना को गिरफ़्तार कर लिया।

और फिर आए कैम्ब्रिज, आक्सफ़ोर्ड के पढे लिखे चिदंबरम, कपिल सिब्बल और अंबिका सोनी जैसे लोग। सरलता का जटिल मुखौटा लगाए। फिर यह वकील टाइप नेता मंत्री लोग जैसे कचहरी के दांव-पेंच में मुकदमे निपटाते, उलझाते हैं, उसी दांव-पेंच को अन्ना के साथ भी आज़माने लगे। पर अन्ना ठहरे मजे हुए सत्याग्रही।उन के आगे इन वकीलों की दांव पेंच खैर क्या चलती? तो भी वह चलाते तो रहे ही। क्या तो जो भी कुछ हुआ, किया दिल्ली पुलिस ने और कि वही जाने। कहां हैं अन्ना? सवाल का जवाब भी गृहमंत्री ने इस अंदाज़ में दिया गोया वह गृहमंत्री नहीं कोई मामूली प्रवक्ता हो। और बताया कि यह भी उन्हें नहीं मालूम। कपिल सिब्बल ने फिर आर. एस.एस. और भाजपा की टेर लगाई।

पर जब शाम तक तक लोग तिहाड पहुंचने लगे तो देश की जनता समझ गई। यह बात चिल्ला चिल्ला कर एक ही खबर दिन रात दिखाने वाले चैनल समझ गए पर सरकार नहीं समझी।पर दूसरे दिन जब बाकायदा तिहाड ही धरनास्थल हो गया तो हफ़्ते भर का रिमांड भूल सरकार ने रिहा कर दिया अन्ना को। अब अन्ना ने सरकार को गिरफ़्तार किया। ऐसा खबरिया चैनलों ने चिल्ला चिल्ला कर कहा भी। अन्ना ने कहा कि बिना शर्त रिहा होंगे। और फिर ्सरकार को घुटने टिकवाते हुए जेल से बाहर निकले। भरी बरसात मे बरास्ता गांधी समाधि रामलीला मैदान। अपनी दौड से सब को चकित करते हुए। अब देश की जनता थी और अन्ना थे। रामलीला मैदान ही नहीं देश भर में मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना और वंदे मातरम की गूंज में नहाया हुआ।

अब शुरू हुआ देश के बुद्धिजीवियों का खोखलापन। अरुंधती राय से लगायत अरुणा राय तक खम ठोंक कर अन्ना का मजाक उडाती हुई खडी हो गईं। और यह देखिए सारे दलित चिंतक एक सुर में गाने लगे कि यह तो अपर कास्ट का आंदोलन है। और कि संविधान विरोधी भी। बैकवर्ड चिंतकों ने भी राग में राग मिलाया और बताया कि इस आंदोलन में तो वही वर्ग शामिल है जो आरक्षण के विरोध में झाडू लगा रहा था, पालिस लगा रहा था। यह भी संविधान विरोधी की तान बताने लगे।

[तो क्या यह दलित और पिछड़े इस अन्ना की आंधी से इस कदर डर गए हैं कि उन को लगने लगा है कि आरक्षण की जो मलाई वह काट रहे हैं संविधान में वर्णित मियाद बीत जाने के बाद भी राजनीतिक तुष्टीकरण की आंच में, एक्स्टेंशन दर एक्स्टेंशन पा कर, कभी उस पर भी हल्ला बोल सकती है यह अन्ना की जनता? सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सरकार से इस पर जवाब मांगा भी है।]

खैर, सरकार अपने मनमोहनी राग में धृतराष्ट्र की राह चलती भैंस की तरह पगुराती रही। भाजपा ने तरकश से तीर निकाले जो दोमुहे थे। वह अन्ना आंदोलन का खुल कर समर्थन करती हुई जन लोकपाल से असहमति का दूध भी धीमी आंच पर गरमाती रही। कि चित्त भी मेरी और पट्ट भी मेरी।कांग्रेस ने अन्ना को बढते जनसमर्थन को देखते हुए एक दिन राग दरबारी गाना छोड़ कर राग अन्ना गाने का रियाज़ किया। भाजपा ने उसे फिर से संसदीय परंपरा और और संसद की सर्वोच्चता की अफ़ीम सुंघाई।

सरकार फिर रुआब और संसद की सर्वोच्चता के नशे में झूम गई है। और सारी राजनीतिक पार्टियां अब एक ही राग में न्यस्त होकर यह साबित करने में लग गई हैं गोया अन्ना देश के लिए खास कर संसद के लिए, संसदीय जनतंत्र के लिए भारी बोझ बन गए हैं। सभी कमोबेश यह साबित करने में लग गए हैं कि अन्ना तो बहुत अच्छे आदमी हैं पर उन की मांगें और जनलोकपाल की उन की जिद देश को डुबो देगी। अन्ना उन्हें लुटेरा बताते हुए काला अंगरेज बता रहे हैं। वह तो कह रहे हैं कि प्रशंसा में भी धोखा होता है। पर सरकार है कि उन्हें गिव एंड टेक का रुल समझाते हुए ऐसे पेश आ रही हो गोया सरकार एंपलायर हो और अन्ना उस के कर्मचारी। कि आओ इतना नहीं, इतना परसेंट बोनस ले लो और छुट्टी करो।

याद कीजिए ऐसे ही दबावों, समझौतों और प्रलोभनों में पिसते-पिसते देश से ट्रेड यूनियनों का कोई नामलेवा नहीं रह गया। यही हाल जनांदोलनों का भी हुआ है। अब ज़माने बाद कोई जनान्दोलन आंख खोल कर हमारे सामने उपस्थित है तो इसे अपर कास्ट और संविधान विरोधी या संसदीय सर्वोच्चता से जोड़ कर इसे कुंद नहीं कीजिए। समय की दीवार पर लिखी इबारत को पढिए। कि यह सिर्फ़ अन्ना की ज़िद नहीं है, महंगाई और भ्रष्टाचार की चक्की में पिसती जनता की चीत्कार है। यह हुंकार में बदले और आंदोलन हिंसा की तरफ मुड़े उस से पहले जनता की रिरियाहट भरी पुकार को सुनना ज़रूरी है, बेहद ज़रूरी। नहीं तो समूचा देश कहीं नक्सलवाणी या दंतेवाला में तब्दील हुआ तो उसे संभालना बहुत कठिन हो जाएगा। सारी संसदीय सर्वोच्चता बंगाल की खाड़ी में गोताखोरों के ढूंढने पर भी नहीं मिलेगी। बिला जाएगी।

संसद को संसद ही रहने दीजिए। जनता के माथे पर उसे बोझ बना कर बाप मत बनिए। उस पर आग मत मूतिए। रही बात भाजपा की तो उस को देख कर कभी जानी लीवर द्वारा सुनाया एक लतीफ़ा याद आता है। कि एक सज्जन थे जो अपने पड़ोसी रामलाल को सबक सिखाना चाहते थे। इस के लिए उन्हों ने अपने एक मित्र से संपर्क साधा और कहा कि कोई ऐसी औरत बताओ जिस को एड्स हो। उस के साथ मैं सोना चाहता हूं। मित्र ने कहा कि इस से तो तुम्हें भी एड्स हो जाएगा। जनाब बोले यही तो मैं चाहता हूं। मित्र ने पूछा ऐसा क्यों भाई? जनाब बोले कि मुझे अपने पड़ोसी रामलाल को सबक सिखाना है।

मित्र ने पूछा कि इस तरह रामलाल को कैसे सबक सिखाओगे भला? जनाब बोले- देखो इस औरत के साथ मैं सो जाऊंगा तो मुझे एड्स हो जाएगा। फिर मैं अपनी बीवी के साथ सोऊंगा तो बीवी को एड्स हो जाएगा। मेरी बीवी मेरे बड़े भाई के साथ सोएगी तो बड़े भाई को एड्स हो जाएगा। फिर बड़ा भाई से भाभी को होगा और भाभी मेरे पिता जी के साथ सोएगी तो पिता जी को एड्स हो जाएगा। फिर मेरी मां को भी एड्स हो जाएगा। और जब पड़ोसी रामलाल मेरी मां के साथ सोएगा तो उस को भी एड्स हो जाएगा। तब उस को सबक मिलेगा कि मेरी मां के साथ सोने का क्या मतलब होता है!

तो अपनी यह भाजपा भी सत्ता में आने के लिए कांग्रेस को सबक सिखाना चाहती है हर हाल में। देश की कीमत पर भी। चाहे संसद मटियामेट हो जाए पर उस की सर्वोच्चता कायम रहनी चाहिए। भले काजू बादाम के दाम दाल बिके, पेट्रोल के दाम हर दो महीने बढते रहें, दूध के दाम और तमाम चीज़ों के दाम आसमान छुएं। इस सब से उसे कोई सरोकार नहीं। भले विपक्ष का काम अन्ना हजारे जैसे लोग करें इस से भी उसे कोई सरोकार नहीं। उसे तो बस कांग्रेस को सबक सिखाना है। रही बात कांग्रेस की तो उन के पास तो एक प्रधानमंत्री है ही, मैं अंधा हूं, की टोपी लगा कर घूमने वाला! जो देश की जनता को आलू प्याज भी नहीं समझता है। उसे बस देश के उद्योगपतियों और बेइमानों की तरक्की और जीडीपी की भाषा समझ में आती है।

श्रीकांत वर्मा की एक कविता मगध की याद आती है। उन्हों ने लिखा है कि, ‘मगध में विचारों की बहुत कमी है।’ सचमुच हमारा समूचा देश अब मगध में तब्दील है! यह देश का विचारहीन मगध में तब्दील होना बहुत खतरनाक है। और जब जनता की आवाज़ चुनी ही सरकार और चुने हुए लोग ही न सुनें तो फिर मुक्तिबोध जैसे कवि लिखने लगते हैं: ‘कहीं आग लग गई, कहीं गोली चल गई !’ क्या यही देखना अब बाकी है?

लेखक दयानंद पांडेय जाने माने साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार हैं. लखनऊ में निवास कर रहे दयानंद से संपर्क dayanand.pandey@yahoo.com, 09335233424 और 09415130127 के जरिए किया जा सकता है. उनके लिखे पिछले दो आलेख नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं.

महिला लेखन यानी भूख की मारी चिड़िया

अमिताभ बच्चन की सफलता और विनम्रता की मार्केटिंग

अमृतलाल नागर : हम फ़िदाए लखनऊ, लखनऊ हम पे फ़िदा!

मौकापरस्ती, धोखा और बेशर्मी जैसे शब्द भी राजीव शुक्ला से शर्मा जाएंगे

भ्रष्टाचार रोकने के लिए कानून की कम, हजारों अन्ना की जरूरत ज्यादा

किसी ने गणना की थी कि इस दुनिया में करीब तीन करोड़ तीस लाख कानून हैं। अगर दुनिया के लोग बाइबिल के टेन कमांडमेंट्स या गीता का निष्काम कर्म या कुरान की कुछ पवित्र आयतों को मानने लगें, तो शायद एक भी कानून की जरूरत न पड़े। लेकिन हमने न तो पवित्र ग्रंथों से कुछ सीखा, न ही इतने सारे कानूनों के बावजूद अपराध रुक पाए। भ्रष्टाचार दरअसल नैतिक प्रश्न ज्यादा है।

कानूनी पक्ष भ्रष्टाचारी को केवल हतोत्साहित करने की ही भूमिका निभा सकता है। जब भ्रष्टाचार जन-जन में व्याप्त हो, तो केवल कानून बनाकर इसे खत्म करने का दावा संशय पैदा करता है। औपचारिक संस्थाओं को विकसित करके या कुछ और कानून बनाकर इसका पूरा समाधान ढूंढ़ना रेगिस्तान में जल ढूंढ़ने जैसा होगा। गांधीवादी आंदोलन एक विदेशी हुकूमत के खिलाफ था। इसके बावजूद महात्मा गांधी ने लगातार यह कोशिश की कि इस आंदोलन के साथ ही समाज में आत्मोत्थान का एक सूक्ष्म संदेश जाता रहे।

भ्रष्टाचार का संपूर्ण समाधान तभी निकल सकता है, जब इसी तरह का सूक्ष्म संदेश समाज में अन्ना हजारे जैसे लोग देते रहें। कानून की अपनी सीमाएं होती हैं। मान लीजिए कि एक मजबूत लोकपाल, कुछ सख्त कानून और एक व्यापक एजेंसी बना दी जाती है। पर इस कानून को अमल में लाने वाले लोग कौन होंगे? वही चेहरे, जो ए राजा और कलमाडी के साथ थे? कहां से लाएंगे हम ऐसे लोग, जिनका नैतिक मूल्य बहुत ही पुख्ता हो और वे लालच से परे हों? आज जो लोग इस आंदोलन के शीर्ष पर हैं, कमोबेश उनके आचरण, उनकी नैतिकता और समाज के प्रति  उनकी प्रतिबद्धता के प्रति पूरा भारतीय समाज आश्वस्त है, ऐसे में जरूरत इस बात की है कि गांधी की तरह निजी जीवन में भी शुचिता, नैतिकता और सदाशयता का संदेश समानांतर रूप से भेजा जाए। खाली नैतिकता की बातें करना एक ऐसा सपना है, जो हकीकत नहीं बन सकता।

यहां हम जयप्रकाश नारायण के आंदोलन का उदाहरण लेते हैं, जिसे संपूर्ण क्रांति का नाम दिया गया था। बाद में इस आंदोलन से उपजे नेता कई घोटालों में लिप्त पाए गए या जातिवादी राजनीति के पुरोधा बने। इसलिए जरूरत इस बात की है कि जो लोग इस आंदोलन में शरीक हो रहे हैं, उन्हें यह शपथ भी दिलवाई जाए कि वे व्यक्तिगत तौर पर भी भ्रष्टाचार नहीं करेंगे और न ही होने देंगे। अन्यथा यह आंदोलन लोकपाल जैसी एक संस्था बनाने की कवायद भर रह जाएगा, जो शायद स्वयं भ्रष्ट होगी। गांधीजी ने हरिजन में 22 फरवरी, 1942 को ट्रस्टीशिप की व्याख्या करते हुए लिखा था, ‘अहिंसा का प्रयोग करते समय हमें यह विश्वास रखना चाहिए कि हर व्यक्ति को मानवीय संदेश देकर परिष्कृत किया जा सकता है। हमें मानव में अंतर्निहित अच्छाई को जगाना होगा।’ क्या अन्ना भी ऐसी कोशिश करेंगे?

लेखक एनके सिंह ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन के महासचिव हैं और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लिखा हिंदुस्तान में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

अन्ना हजारे को अरिंदम चौधरी ने ये क्या-क्या कह डाला!

अरिंदम चौधरी को तो जानते ही होंगे आप लोग. आईआईपीएम के फर्जीवाड़े का जनक और इसके जरिए पैदा हुआ शिक्षा माफिया. प्लानमैन कंसल्टेंसी और प्लानमैन मीडिया जैसी कंपनियों का सर्वेसर्वा. ये महोदय कई भाषाओं में मैग्जीन भी निकालते हैं. मीडिया का अच्छा खासा कारोबार शुरू किया हुआ है. और, ये महोदय दूसरे मीडिया हाउसों को जमकर विज्ञापन भी देते हैं ताकि इनके व्यक्तित्व की चकाचौंध बनी रहे और युवा छात्र-छात्राएं लाखों-करोड़ों रुपये लुटाकर उनके आईआईपीएम में पढ़ने जाएं.

आईआईपीएम के फर्जीवाड़े और इनके मीडिया कारोबार के असली हकीकत को हम बाद में बताएंगे. पहले बता रहे हैं कि यह शिक्षा माफिया किस तरह अन्ना हजारो को बदनाम करने पर तुला हुआ है. अपने एक लेख में अरिंदम चौधरी ने अन्ना हजारे को जिद्दी, गैरजिम्मेदार, घमंडी, असंवेदनशील और अदूरदर्शी जैसी उपाधियों से नवाजा है. अरिंदम चौधरी अपने लेख में किंतु परंतु लेकिन करते-करते आखिर में अन्ना को बुरा आदमी साबित करते हुए दिख जाते हैं. आखिर यह शिक्षा माफिया क्यों ऐसा कर रहा है? जानकारों का कहना है कि अरिंदम का अन्ना विरोध सोची समझी रणनीति का हिस्सा है.

बहुत पहले की बात है जब एक बार अरिंदम ने अन्ना के गुणगान करते हुए उन्हें लाखों रुपये के एक पुरस्कार से नवाजने की घोषणा की थी लेकिन जब अन्ना को अरिंदम की सच्चाई समझ में आई तो उन्होंने पुरस्कार लेने से मना कर दिया. अन्ना को उनके साथियों ने बताया कि अरिंदम का कामधंधा ट्रांसपैरेंट नहीं है और इन पर कई तरह की गड़बड़ियों के जरिए छात्र-छात्राओं और सरकार को छलने का आरोप है. अन्ना को यह भी बताया गया है कि अरिंदम चौधरी शिक्षा माफिया है. तब अन्ना ने पुरस्कार लेना स्वीकार नहीं किया. इससे अरिंदम चौधरी के मन में अन्ना के प्रति नकारात्मक भाव पैदा हो गया.

दूसरे, केंद्र की सरकार के पास अरिंदम और आईआईपीएम की गड़बड़ियों की लंबी चौड़ी फाइल पड़ी है. इनके खिलाफ कई आदेश भी जारी हुए हैं. पर जिस तरह इस दौर में सारे सत्ता संरक्षित भ्रष्टाचारी मजे ले रहे हैं, उसी तरह अरिंदम भी सरकार के लोगों को पटाकर अपना धंधापानी करने में सफल हो पा रहा है और अपनी मीडिया कंपनी के जरिए अपने को बौद्धिक दिखाने का स्वांग रच पा रहा है. इसी कारण कांग्रेस नीत केंद्र सरकार के पक्ष में खड़ा होना और अन्ना को बुरा कहकर सरकार का बचाव करना उसकी फितरत में शामिल हो गया है. अरिंदम के लेख के कुछ पैरे को नीचे दिया जा रहा है, जिसे आप पढ़ें…

”सारे देश में युवा और बुजुर्ग सरकार के अभिमानी और अडिय़ल रुख की निंदा कर रहे हैं. वे अकसर सरकार पर यह इल्जाम सही ही लगाते रहे हैं कि वह उनकी बात सुनने तक को तैयार नहीं. इसमें कोई शक नहीं कि सत्तारूढ़ गठबंधन के कुछ वरिष्ठ नेताओं के कुछ बेहद गैर-जिम्मेदाराना और बेवजह के बयानों ने लोगों की इस सोच को बल दिया है और भ्रष्टाचार के कारण सरकार से पहले से ही बहुत खिन्न जनता के आक्रोश को और बढ़ा दिया है. फिर भी अगर सरकार जिद्दी और अभिमानी होने की दोषी है तो क्या अन्ना हजारे भी वैसा ही रवैया नहीं दिखा रहे? अन्ना हजारे और उनके समर्थक सरकार पर असहिष्णु और असंवेदनशील होने का आरोप लगा रहे हैं क्योंकि वह अन्ना के बनाए लोकपाल बिल के प्रारूप को स्वीकार करने को तैयार नहीं है. लेकिन अन्ना के लोकपाल बिल पर आशंका जताने वाले हर व्यक्ति को सरकार का पिट्ठू और देशद्रोही बताकर क्या वे अपनी असहिष्णुता और असंवेदनशीलता नहीं दिखा रहे? आखिर अन्ना और उनकी टीम पूरे विश्वास के साथ यह दावा कैसे कर सकती है कि लोकपाल बिल का केवल उनका ही प्रारूप सही है और कोई उसकी आलोचना नहीं कर सकता? अगर सरकार खुद को सही साबित करने के लिए लोकप्रिय जनादेश और संसद के सर्वोच्च आधिकारों की आड़ ले रही है तो क्या अन्ना की टीम दिखावटी नैतिकता की आड़ में छुपने की कोशिश की दोषी नहीं है?”

”अगर साफ-साफ कहूं तो, पिछले कुछ महीनों से, सरकार और अन्ना की टीम दोनों ही असहिष्णु, अडिय़ल और असंवेदनशील होने की दोषी हैं.  देश के लाखों भारतीय कुछ कांग्रेसी नेताओं द्वारा सार्वजनिक तौर पर अन्ना को कोसने और उनकी टीम को भ्रष्टाचार में शामिल बताने की वजह से खासे नाराज हैं, और यह जायज भी है. लेकिन अन्ना की टीम भी अप्रैल से ही प्रधानमंत्री, भारत की संसद, भारतीय चुनाव और यहां तक कि भारतीय लोकतंत्र को सार्वजनिक तौर पर कोसने के अलावा और क्या कर रही थी?  और हां, मैं इस बात से सहमत हूं कि सरकार में कई ऐसे लोग भी हैं, जो इसी चीज के हकदार हैं, लेकिन आखिरकार हर चीज का एक लोकतांत्रिक तरीका तो होना ही चाहिए. एक समूह की तानाशाही को सिर्फ इसलिए नहीं स्वीकार किया जा सकता, क्योंकि वह लोगों के उन्माद को हवा देने में कामयाब हो रहा है. आखिर एक संविधान है, अदालत है और एक निर्वाचित संसद है, जिसके नियमानुसार ही सबकुछ होना होता है.”

”जब अन्ना तिहाड़ में थे और वहीं रहने की जिद पर अड़े थे तो बहुत सारे भारतीय इसे उनके संघर्ष के अदम्य साहस के तौर पर देख रहे थे. लेकिन छोडिए भी. सरकार ने उनके अनशन को रोकने के लिए मूर्खतापूर्ण शर्तें लगाकर और उन्हें गिरफ्तार कर एक बड़ी भूल की. लेकिन भारी जनविरोध ने सरकार को झुकने और समर्पण के लिए विवश किया. बाद में खुद सरकार ने कहा कि अन्ना की टीम और उनके समर्थक अनशन कर सकते हैं. उसने अनशन पर थोपी सभी मूर्खतापूर्ण शर्तों को वापस लेने की सार्वजनिक घोषणा भी की. तो क्या अन्ना हजारे इस शानदार जीत के बाद कुछ उदार हुए? नहीं, अब वह इस बात पर अड़े हैं कि उन्हें वह सब कुछ हासिल करने दिया जाए, जो वह चाहते हैं. सरकार पूरी तरह से नतमस्तक होकर उनकी सभी मांगें मानती रहे. इस बीच भावनाओं से भरे उनके लाखों समर्थक खुद को जोखिम में डालकर देशभर में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. क्या इसे जिद्दी, घमंडी और असंवेदनशील होना नहीं माना जाएगा?”

”अन्ना जरूर विरोध करें, लेकिन वह इसको थोपने की जिद पर अड़े नहीं रह सकते. विरोध प्रदर्शनों का अपना प्रभाव होता है और इससे बदलाव भी होते हैं. लेकिन यह हमारे संविधान और लोकतांत्रिक मशीनरी के समर्थन के बिना संभव नहीं हो सकता. भावनात्मक उन्माद से भरी भीड़ अगर उत्पात मचाने पर आमादा हो तो हिंसा और त्रासदी की स्थिति के बीच एक बारीक फर्क ही रह जाता है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब क्रोध से भरी लोगों की उग्र भीड़ आवेश और उत्तेजना में थी तो 1984 में दिल्ली में और 2002 में गुजरात में क्या हुआ था. जैसा कि मैने शुरू में ही कहा था कि मैं तब बहुत छोटा था, इसलिए 1970 के दशक की शुरुआत के उन घटनाक्रमों को ठीक से याद नहीं कर सकता जिनकी वजह से आपातकाल लगा था. लेकिन मैं यह अवश्य जानता हूं कि लोकनायक जय प्रकाश नारायण आज भी एक पूजनीय गांधीवादी नेता हैं, जो एक स्वच्छ और बेहतर भारत के लिए जीवनपर्यंत लड़ते रहे. अन्ना हजारे को भी दूसरा जेपी बताया जा रहा है. लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि बहुत से निष्पक्ष इतिहासकार, जो व्यक्तिगत तौर पर तो जेपी के घोर प्रशंसक हैं, अब खुलेआम कहते और लिखते हैं कि जेपी का अडिय़ल रवैया और प्रदर्शनों के जरिए भारत को पंगु बना देने का उनका आह्वान गैर-जिम्मेदराना और अदूरदर्शी था. क्या इतिहास अन्ना हजारे को भी ऐसे ही देखेगा?”

तो ये थे अरिंदम चौधरी के आलेख के कुछ अंश. इसे पढ़ने के बाद आपको साफ समझ में आ गया होगा कि यह शख्स किस तरह शब्दों की जलेबी छानकर सरकार के पक्ष में और अन्ना व उनकी टीम के विरोध में खड़ा हो गया है. जरूरत है अब अरिंदम चौधरी के आईआईपीएम, प्लानमैन कंसल्टेंसी और प्लानमैन मीडिया की सच्चाई का खुलासा करने की. भड़ास4मीडिया पर जल्द ही अरिंदम चौधरी की असलियत को सीरिज में प्रकाशित किया जाएगा ताकि लोग जान सकें कि अन्ना का विरोध करने वाला यह शख्स और इसकी कंपनियां खुद कितनी इमानदार हैं. अगर आपके पास भी अरिंदम चौधरी और इसकी कंपनियों के बारे में जानकारियां हों तो भड़ास4मीडिया को bhadas4media@gmail.com के जरिए मुहैया कराएं ताकि उसे प्रकाशित कराया जा सके.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

bhadas4media@gmail.com

बर्खास्त सिपाही सुबोध यादव ने अन्ना के मंच से लिया दो आईपीएस अफसरों का नाम

श्रीकांत सौरभ
श्रीकांत सौरभ
बुधवार की शाम आठ बजे अन्ना हजारे के आंदोलन की जानकारी के लिए जैसे ही टीवी आन किया, स्टार न्यूज पर एक खबर को देख नजरें बरबस ही उस पर ठहर गई. “अमिताभ ठाकुर यूपी के सबसे ईमानदार आईपीएस अधिकारियों में, जबकि स्पेशल डीजी बृजलाल उतने ही भ्रष्ट.” रामलीला मैदान के मंच से यूपी के बर्खास्त सिपाही सुबोध यादव के इस बयान को सुन हजारों की भीड़ तालियां पीट रही थी.

टीवी पर इस खबर को बार-बार फ्लैश किया जा रहा था. इस खबर को देख-सुन यकायक जेहन में यही खयाल उभरा कि अरे, ये तो वही अपने भड़ास वाले अमिताभ ठाकुर (फिलहाल अमिताभ) की चर्चा यहां हो रही है!  सिपाही सुबोध यादव की दास्तान भी कम रोमांचक नहीं है. इन्होंने यूपी पुलिस में अपने 17 साल के कार्यकाल में नौ घोटालों को उजागर किया और नौ बार निलंबित भी हुए हैं. यानि जब-जब भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया, तब-तब बर्खास्त हुए. सुबोध का यह बयान यूपी सरकार की निरंकुशता को बतलाता है कि कैसे वहां गुंडा तंत्र हावी है. वहीं ईमानदार सरकारी सेवकों को किस कदर चुन-चुनकर परेशान किया जा रहा है.

जहां तक अमिताभ की बात है तो मैंने उन्हें भड़ास की बदौलत ही जाना कि वह मेरठ में अपराध अनुसंधान विभाग में एसपी होने के साथ ही उम्दा लेखक भी हैँ. करीब तीन महीने से मैं भड़ास का नियमित पाठक हूं. कुछ दिनों पहले अमिताभ जी द्धारा अपने लंदन प्रवास के दौरान भड़ास पर भेजी गई रिपोर्ट पढ़ पहली बार उनसे रूबरू हुआ. हालांकि उनके व उनकी पत्नी नूतन ठाकुर के आलेखों पर भड़ास के कुछ पाठक नकारात्मक कमेंट भेज कई तरह के आरोप लगाते रहे हैं. मसलन भड़ास के एडिटर यशवंत जी अमिताभ की ऊंची हैसियत व उनसे नजदीकी के कारण उनके किसी भी आलेख को कुछ ज्यादा ही तरजीह देते हैं. उनकी पत्रकार व समाजसेवी पत्नी नूतन ठाकुर पति के आईपीएस पद का दिखावा करती है. वगैरह-वगैरह.

कहना चाहूंगा कि ये बेबुनियाद आरोप मुझे नागावार गुजरे. अपने खोजी स्वभाव की वजह से मैंने पूर्व में भड़ास पर प्रकाशित अमिताभ के लगभग तमाम आलेखों को पढ़ डाला. इसके बाद अमिताभ के बारे जो नई जानकारी मुझे मिली उसे आपसे शेयर करना चाहूंगा. यह कि अमिताभ ठाकुर मेरे (मोतिहारी) बगल के जिले मुजफ्फरपुर से आते हैं. आईपीएस की नौकरी करते हुए इनके जीवन का अधिकांश हिस्सा यूपी में ही बीता है. तत्कालीन सरकार में अपनी ईमानदारी व अड़ियल रवैये की वजह से राजनेताओं की आंखों की किरकिरी भी बने.

इस कारण इन्होंने अपने करियर में कई उतार-चढ़ाव झेले. लेकिन ‘सत्यमेव जयते’ की तर्ज पर इन्होंने कभी हार नहीं मानी. फिलहाल मेरठ के अपराध अनुसंधान शाखा में बतौर एसपी कार्यरत हैँ. इतनी पत्नी नूतन ठाकुर भी पत्रकार व समाजसेवी हैं. अमिताभ ने आईआईएम, लखनऊ से प्रबंधन भी किया है. भूमिहार जाति से आने के बावजूद इन्होंने कानूनी तौर पर जातिसूचक टाइटल ‘ठाकुर’ हटा दिया. बिजनौर में जब एसपी थे तो वहां विस चुनाव के दौरान इन्होंने सता पक्ष से पंगा लेते हुए निष्पक्षता से चुनाव कराया जिससे दो दबंग विधायक चुनाव हार गए. इसको लेकर चुनाव बाद जब अमिताभ का तबादला कर दिया गया तब बिजनौर की जनता ने उनके समर्थन मे काफी बवाल मचाया था.

यह तो अमिताभ के पुलिसिया करियर की महज बानगी भर है. और भी रोचक किस्से है जिनका जिक्र इस छोटे आलेख में करना मुमकिन नहीं है. और, आज की शाम दिल्ली के ऐतिहासिक लालकिला स्थित रामलीला मैदान में अन्ना के लिए बने मंच से सुबोध ने हजारों की भीड़ के बीच जो बयान दिया, इससे यह साबित होता है कि अमिताभ वास्तव में यूपी के ईमानदार पुलिस अधिकारियों की श्रेणी में आते हैं. यह हमारे लिए गर्व की बात है. इसी प्रकार से सच को खुलकर बताया जाना चाहिए ताकि देश में बेईमानों को अलग-थलग करने और ईमानदारों को प्रोत्साहित करने का अभियान तेज हो सके.

श्रीकांत सौरभ

पत्रकार
पूर्वी चम्पारण
संपर्क : 9473361087 और saurav.srikant@gmail.com

कपिल सिब्बल और मनीष तिवारी जैसों की सदस्यता खत्म करने के लिए पहल करें

झारखंड आरटीआइ फोरम के अध्यक्ष बलराम ने एक पत्र देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त को लिख भेजा है. इस पत्र में उन्होंने नागरिकों चुनाव लड़कर आने की चुनौती देने वाले दो सांसदों कपिल सिब्बल और मनीष तिवारी जैसों की सदस्यता खत्म करने के लिए पहल करने व प्रावधान बनाने का अनुरोध किया गया है. बलराम ने इसके पक्ष में कुछ तर्क दिए हैं. उनका तर्क कितना सही या गलत है, यह उनके पत्र से आपको पता चल जाएगा, जिसे हम नीचे हूबहू प्रकाशित कर रहे हैं. -एडिटर, भड़ास4मीडिया

सेवा में

मुख्य निर्वाचन आयुक्त

निर्वाचन आयोग, नयी दिल्ली

विषय- नागरिकों को चुनाव लड़ने की चुनौती के कारण निर्वाचन आयोग पर अगंभीर उम्मीदवारों के बोझ की संभावना के संदर्भ में दिशानिर्देश का निवेदन

मान्यवर,

आप अवगत होंगे कि भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत जनलोकपाल के लिए नागरिकों का लोकतांत्रिक तरीके से जनांदोलन चल रहा है। इस क्रम में कतिपय सांसदों/ प्रमुख दलों व सरकार के महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों ने आंदोलनकारी नागरिकों को स्वयं चुनाव लड़कर आने की चुनौती दी है। इनमें लुधियाना के सांसद मनीष तिवारी तथा चांदनी चौक के सांसद कपिल सिब्बल शामिल हैं। नागरिकों को ऐसी चुनौती देना वयस्क मताधिकार पर आधारित संसदीय लोकतंत्र की भावना एंव प्रावधानों के खिलाफ है। प्रत्येक जनप्रतिनिधि को नागरिकों के मत एवं भावना का सम्मान करना चाहिए और उस अनुरूप कार्य करना चाहिए। दुर्भाग्यवश, प्रतिनिधि वापसी की व्यवस्था अब तक नहीं लागू हो पायी है। लेकिन इससे जनप्रतिनिधियों को मनमानी करने और कोई सलाह देने पर आंख दिखाने की स्वतंत्रता नहीं मिल गयी है।

नागरिकों को स्वयं चुनाव लड़ने की धमकी देने के दूरगामी परिणामों की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करने के लिए मैं यह पत्र आपको लिख रहा हूं। अगंभीर उम्मीदवारों की बड़ी संख्या निर्वाचन आयोग के लिए हमेशा चिंता का विषय रही है। ऐसे प्रत्याशियों का नामांकन रोकने का समुचित तरीका अब तक नहीं निकल सका है। इसके कारण कई क्षेत्रों में निर्वाचन आयोग और सरकारी मशीनरी को गंभीर समस्या से गुजरना होता है और संसाधनों की भारी क्षति होती है।

नागरिकों को स्वयं चुनाव लड़ने की धमकी से आहत होने के कारण संभव है कि मैं लुधियाना, चांदनी चौक व ऐसे अन्य क्षेत्रों से नामांकन कर दूं। अन्य नागरिक भी बड़ी संख्या में ऐसे कदम उठा सकते हैं। इससे निर्वाचन आयोग एवं सरकारी मशीनरी पर अनावश्यक बोझ बढ़ सकता है और चुनावी प्रक्रिया पर भी इसका प्रतिकूल असर संभव है। लिहाजा, निवेदन है कि इस दिशा में सख्ती से कदम उठाते हुए सभी राजनीतिक दलों/जनप्रतिनिधियों के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करें। नागरिकों को स्वयं चुनाव लड़ने के लिए उकसाने वाले वक्तव्य देने वालों की सदस्यता समाप्त करने और उन्हें कोई भी चुनाव लड़ने से रोकने के लिए स्पष्ट प्रावधान बनाने की पहल की जानी चाहिए।

भवदीय

बलराम,

अध्यक्ष, झारखंड आरटीआइ फोरम

एफ-108, अशोक विहार, रांची

अन्ना अनशन तोड़िए, भ्रष्टाचार के संरक्षकों को संसद में घेरिए

राजेश त्रिपाठीअन्ना आपसे करबद्ध प्रार्थना है अपने देश के इस अदने से इनसान  के कहने पर भगवान के लिए  अनशन तोड़ दीजिए। आपके जज्बे को प्रणाम, उस अक्षय ऊर्जा को प्रणाम जो नौ दिन बाद भी आपको जवां मर्दों की तरह दहाड़ने की कूबत दे रही है। आपकी जिंदगी हम सब देशवासियों के लिए बहुत जरूरी है। आपको इससे भी बड़ी लड़ाई लड़नी है।

जिन मोटी चमड़ीवालों से आप अपने जन लोकपाल के लिए समर्थन की उम्मीद किये बैठे हैं वे न पसीजे हैं और न कभी भी पसीजेंगे। आप जब अन्न त्याग कर देश के भ्रष्टाचार से मुक्त करने का अनथक तप करे हैं, उस वक्त वे सर्वदलीय बैठक के नाम पर बिस्कुट चाभ रहे थे, चाय की चुस्कियां लेते हुए मुसका रहे थे। उन्होंने आपके जन लोकपाल पर सहमति बनाने की जो कवायद या नौटंकी की उसका वही परिणाम हुआ जो होना था। उनकी इस पर सहमति नहीं बनी। जानते हैं अन्ना आप जिन लोगों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं उन्हीं से उसका उपचार मांग रहे हैं। जहां तंत्र में ही भ्रष्टाचार घुला हो, जिस देश में भ्रष्टाचारे एक सहजात प्रक्रिया या अंग बन गया हो, वहां अगर कोई आपके साथ खड़ा है तो वह जनता जो इस भ्रष्टाचार से पीड़ित है वे नहीं जो इसके पोषक या संरक्षक हैं।

जानते हैं आज भी कई लोग ऐसे हैं जो आपके इस पुनीत तप को विद्रूप दृष्टि से देखते हैं और उसका समर्थन करने वालों पर न सिर्फ खीझते या चीखते हैं बल्कि उन्हें ही कठघरे में खड़ा करने की ताक में रहते हैं। देशवासियों के सामने अब ऐसा संधिकाल आ खड़ा हुआ है जब उन्हें तय करना है कि देश के लिए कौन हितकारी है और कौन देश को लूटने-खसोटने को ही गणतंत्र मान बैठा है। अब उनके लिए फैसले की घड़ी है। जो सच के साथ नहीं, उसे देश को खारिज करना ही होगा। मत पार्थक्य हो सकता है, अन्ना के जन लोकपाल पर बहस हो सकती है लेकिन उसे पूरी तरह से खारिज करना, अन्ना की ईमानदारी पर शक करना परले दरजे की नामसमझी और सच के आंख चुराने की तरह है। अन्ना की आलोचना में कई तथाकथित छद्म प्रगतिवादी आ गये हैं।

इन लोगों में वे भी हैं जिनके बयान पहले भी विवाद की लहर पैदा करते रहे हैं। महेश भट्ट को हम सुलझा हुआ इनसान मानते थे, उन्होंने कुछ अच्छी फिल्में दीं लेकिन आज वे भी अन्ना के खिलाफ बोल कर सवालों से घिर गये हैं और कहें तो देश की जनता के सबसे बड़े अंश की आंखों से गिर गये हैं। एक भद्र महिला हैं, तमाम इकराम पा चुकी हैं इसीलिए शायद अपना दिमागी संतुलन खो बैठी हैं। कभी इन्होंने अतिवादियों को सशस्त्र गांधीवादी की संज्ञा दी थी आज उन्हें अन्ना से परेशानी है क्योंकि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे हैं। अब यह देशवासी तय करें कि यह महिला किस पंक्ति में और किसके साथ खड़ी है। देश की जनता को इन लोगों को यह बता और समझा देना चाहिए कि हर समय धारा के विपरीत तैरना ही प्रगतिशीलता और बुद्धिजीवी होने का परिचायक नहीं होता। कभी-कभी हकीकत की कद्र भी करनी चाहिए, हां उसमें एक खतरा है कि खबरों की सुर्खियां नहीं मिलेंगी जो अक्सर ऐसे लोग चाहते हैं।

अन्ना से एक विनम्र अनुरोध। अगर हमारे नेता और सांसद संसदीय प्रणाली के जरिये ही किसी बात को सुनना और उस पर गौर करना चाहते या जानते हैं तो यही सही। अन्ना आपके साथ आज पूरा भारत खड़ा है। अनशन तोड़िए, देश का मानस और उसकी आत्मा पूरी तरह से आपसे जुड़ गयी है। पूरा देश अन्नामय हो गया है। लोग बेहोश हो रहे हैं, इलाज करा कर फिर आपके साथ आंदोलन में शामिल हो जाते हैं। ऐसा लगाव, किसी आंदोलन से जी-जान से जुड़ाव हमने तो अपने याद में नहीं देखा। यह आपकी संपत्ति है, यही आपके तप का हासिल है कि देश आपके साथ है और आपको सेनापति बना कर भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी जंग को एक सकारात्मक परिणाम तक पहुंचाना  चाहता है। रामलीला मैदान ने एक राह खोली है इसे मंजिल तक पहुंचाने के लिए आप अनशन तोड़िए।

और दिल्ली के इस पुनीत मैदान से जो कई ऐतिहासिक जनसभाओं का साक्षी रहा है, जिनमें कई ने नया इतिहास रचा है, यह संकल्प लीजिए कि आप इस लड़ाई को संसद तक ले जायेंगे। आप अपनी पार्टी जन क्रांति दल बनाइए। अपने लोगों को चुनाव लगाइए। जानते हैं किसी दल या व्यक्ति के साथ आपका नाम ही काफी है। आपको लाखों-करोड़ों रुपयों की दरकार नहीं होगी। अन्ना के नाम पर सारा देश उनके लोगों को वोट डालेंगे। आप बहुमत से संसद में पहुंचेगे और तब आपके जन लोकपाल की राह रोकने वाला होई नहीं होगा। आप अपना सपना साकार कर सकेंगे।

आपके साथ जुड़ें सुधी लोगों और आपसे प्रार्थना है कि रामलीला मैदान से जो कुछ भी हासिल  हुआ है, यहां जो मशाल जलायी गयी है, आजादी की दसरी लड़ाई का जो संकल्प लिया गया है उसे अब निरंतर आनेवाले चुनावों तक गतिशील रखना होगा। अन्ना स्वस्थ होकर देश के कोने-कोने में जाकर जनसभाएं करें और जनता को कहें कि हम अपनी लड़ाई जनतांत्रिक ढंग से नहीं जीत सके हमे संसद का सहारा चाहिए। हमारे लोगों को ज्यादा से ज्यादा जिता कर संसद में भेजिए ताकि हम आपकी आकांक्षाओं को पूरा कर सकें। अन्ना आप मुगालते में न रहें बहुत सी शक्तियां ऐसी हैं जो आपकी जान संकट में डालना चाहती हैं।

वे जानती हैं कि एक अन्ना गया तो दूसरा तो पैदा नहीं हो सकेगा ऐसे में भ्रष्ट तंत्र फूलता-फलता रहेगा। उन्हें नहीं पता कि अन्ना अमोघ शक्ति लेकर पैदा हुए हैं और कई बार मौत को धोखा दे सकें हैं लेकिन इस बार उनकी उम्र ज्यादा हो गयी है इसलिए दिक्कत आ रही है। सरकार उनसे सियासती दांवपेंच खेल रही है, एक दिन पहले उनकी तीन बातें छोड़ सारी मान लीं बुधवार 24 अगस्त को सर्वदलीय बैठक में जनलोकपाल पर पूरी तरह सहमति बन ही नहीं पायी यानी चीजें वापस उसी जगह पहुंच गयीं जहां से शुरू हुई थी। सीधी सी बात है अन्ना की बात मानने को कोई तैयार नहीं है। सब अन्ना के नाम का सहारा लेकर अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे देश के एक ईमानदार बुजुर्ग व्यक्ति को जो आम आदमी की लड़ाई लड़ रहा है, मरने के लिए छोड़ दिया है।

अन्ना आप अपनी लड़ाई लोगों तक ले जाइए। आप रामलीला मैदान से ही यह एलान कीजिए कि भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र से अब आप राजनीति के मैदान में ही निपटेंगे। आप राजनीतिक दल बनाइए, उसके जरिए स्वच्छ चरित्र के लोगों को चुनाव लड़वाइए और देश की विधानसभाओं और संसद में अपनी पैठ बनाइए। तब आपको जन लोकपाल या ऐसे ही जनहितैषी कानूनों को पारित कराने के लिए इन स्वार्थी राजनेताओं या सांसदों के सामने घिघियाना नहीं पड़ेगा। जो आपका इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ सत्ता पक्ष को परास्त कर खुद गद्दी हड़पने की गरज से कर रहे हैं। अगर ये दल आपके आंदोलन और मुहिम से तनिक भी श्रद्धा या सरोकार रखते होते तो ये देश में अपनी तरफ से भी भ्रष्टाचार के विरोध में और आपके समर्थन में आंदोलन चला रहे होते। ये तो संसद में खुद ही कह रहे हैं कि इनको आपका जन लोकपाल हूबहू पसंद नहीं है। फिर ये किस तरह से भ्रष्टाचार को मिटाने और उससे लड़ने का दावा कर रहे हैं।

यह क्या मजाक है कि कहा जा रहा है जिसे भी कुछ कहना या करवाना है वह संसद में चुनाव लड़ कर आये। अगर ऐसा है तो हम अपने जनप्रतिनिधियों को संसद में क्यों भेजते हैं। क्या उन्हें हमारी आकांक्षाओं को समर्थन और सपनों को शब्द नहीं देना चाहिए। क्या यह उनका कर्तव्य और दायित्व नहीं। अन्ना अगर वे यही भाषा समझते हैं तो उन्हें उसी भाषा में जवाब दीजिए। आपने देखा आपकी बात मानने का दिलासा देकर किस तरह से शासक दल ने आपको धोखा दिया। ताज्जुब नहीं कि आपको जबरन उठा कर आपका अनशन तुड़वा दिया जाये।

अब वक्त आ गया है कि आप चुनाव के मैदान में आइए और उन सांसदों को जो आपके जन लोकपाल विधेयक को पास नहीं होने देते, उनकी ही भाषा में माकूल जवाब दीजिए। आपका दल चुनाव लड़ेगा तो उसे पैसे की जरूरत नहीं होगी। वह भारत के आम आदमी की आकांक्षाओं का दल होगा जिसे वह सर आंखों पर बैठा कर संसद में प्रतिष्ठित कर देगा। बस आपको जन लोकपाल आंदोलन से उठी लहर को ठंढा नहीं होने देना। आप इस गति को बनाये रहिए और संसदीय चुनाव आने तक बरकरार रखिए। देश का कोना-कोना छान मारिए और जनसभाओं व कम्युनिटी साइट्स के जरिए अपना प्रचार रामलीला मैदान छोड़ने के साथ ही शुरू कर दीजिए और अपना मुकाम पाने तक जारी रखिए। बल्कि इसे एक सतत प्रक्रिया बनाइए ताकि देश के दूसरी क्रांति के तरफ बढ़े कदम थमे नहीं और आपके दल को संसद तक पहुंचा कर ही दम लें।

आप जिन लोगों से मदद की उम्मीद लिए बैठे हैं वे पहले ही आपको हूट करने और दिल्ली से भगाने की ताक में रहे हैं। इन आपको भगोड़ा कहने में भी शर्म नहीं आयी हालांकि सेना ने जब आपकी सम्मानपूर्वक सेवानिवृत्ति और पदक पाने का उल्लेख किया तो इन्हें शर्म से मुंह छिपाते भी नहीं बन रहा था। अन्ना ये समझ रहे थे कि जैसे एक बाबा को डरा कर भगाने में कामयाब रहे उसी तरह अन्ना को भी खदेड़ देंगे। इन्हें क्या पता अन्ना दूसरी ही धातु के बने हैं और अदम्य व अटल हैं। आपका यह साहस और सत्यपथ पर संघर्षरत रहने का भाव हमेशा कायम रहे।

आप शतायु हों ताकि देश आपके नेतृत्व में भविष्य में भी ऐसे धर्मयुद्ध लड़ता और जीतता रहे। आप समझ रहे होंगे अन्ना केंद्र का सत्ताधारी दल आपके आंदोलन को प्रतिष्ठा की लड़ाई बना चुका है , वह किसी भी तरह से हारना नहीं चाहता चाहे उसे कितने भी निचले स्तर तक उतरना पड़े। रहा सवाल विपक्ष का तो उनकी नजर भी राजनीतिक लाभ या स्वार्थ के गिर्द ही घूमती रहती है। आप अब किस पर भरोसा करेंगे। आपको इन चंद राजनेताओं या सांसदों की दया की क्या जरूरत। आपके साथ पूरा भारत, उसकी आत्मा है। उसे अपना ब्रह्मास्त्र बनाइए और चुनावी समर जीत कर अपनी सरकार बनाइए और देश को दिखा दीजिए कि गणतंत्र के सही मायने और सही रास्ता कौन-सा है। अन्ना उठिए. आगे बढ़िए, देश आपकी सेहत को लेकर बहुत चिंतित है। आपके इन योद्धाओं में निराश घर करे, इनका धैर्य टूटे और इनके अहिंसा के भाव से ‘अ’ हटे इससे पहले इनमें नयी आश जगाइए और इन्हें संसदीय प्रणाली के जरिए सत्ता के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचाइए ताकि आपका मकसद पूरा हो सके। एक बात और, लोकतंत्र के इस पावन यज्ञ में जो शामिल नहीं हुए या इसके खिलाफ खड़े हैं, आनेवाला कल उन्हें माफ नहीं करेगा।

समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ है, समय लिखेगा, उनका भी इतिहास।।

लेखक राजेश त्रिपाठी कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार हैं और तीन दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। इन दिनों हिंदी दैनिक सन्मार्ग में कार्यरत हैं। राजेश से संपर्क  rajeshtripathi@sify.com के जरिए कर सकते हैं। वे ब्लागर भी हैं और अपने ब्लाग में समसामयिक विषयों पर अक्सर लिखते रहते हैं।

मुनादी : एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी

धर्म भारती की कालजयी कविता ”मुनादी” मौजूदा माहौल में बहुत मौजू है. इसे प्रकाशित करने का अनुरोध बिशन कुमार ने किया है और उन्होंने पूरी कविता को भड़ास4मीडिया के पास भेजा है. आप भी इस कविता को पढ़ें और देखें कि हालात जो पहले थे, बिलकुल वैसे ही हैं, और, कह सकते हैं कि सत्ता तंत्र पहले से ज्यादा जनविरोधी, ढीठ, थेथर और अलोकतांत्रिक हो चुका है. जय प्रकाश नारायण के लिए लिखी गई यह कविता अन्ना पर भी सटीक है. -एडिटर, भड़ास4मीडिया

मुनादी

-धर्मवीर भारती-

खलक खुदा का, मुलुक बाश्शा का
हुकुम शहर कोतवाल का
हर खासो-आम को आगह किया जाता है
कि खबरदार रहें
और अपने-अपने किवाड़ों को अन्दर से
कुंडी चढा़कर बन्द कर लें
गिरा लें खिड़कियों के परदे
और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें
क्योंकि
एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी अपनी काँपती कमजोर आवाज में
सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है
शहर का हर बशर वाकिफ है
कि पच्चीस साल से मुजिर है यह
कि हालात को हालात की तरह बयान किया जाए
कि चोर को चोर और हत्यारे को हत्यारा कहा जाए
कि मार खाते भले आदमी को
और असमत लुटती औरत को
और भूख से पेट दबाये ढाँचे को
और जीप के नीचे कुचलते बच्चे को
बचाने की बेअदबी की जाये
जीप अगर बाश्शा की है तो
उसे बच्चे के पेट पर से गुजरने का हक क्यों नहीं ?
आखिर सड़क भी तो बाश्शा ने बनवायी है !
बुड्ढे के पीछे दौड़ पड़ने वाले
अहसान फरामोशों ! क्या तुम भूल गये कि बाश्शा ने
एक खूबसूरत माहौल दिया है जहाँ
भूख से ही सही, दिन में तुम्हें तारे नजर आते हैं
और फुटपाथों पर फरिश्तों के पंख रात भर
तुम पर छाँह किये रहते हैं
और हूरें हर लैम्पपोस्ट के नीचे खड़ी
मोटर वालों की ओर लपकती हैं
कि जन्नत तारी हो गयी है जमीं पर
तुम्हें इस बुड्ढे के पीछे दौड़कर
भला और क्या हासिल होने वाला है ?
आखिर क्या दुश्मनी है तुम्हारी उन लोगों से
जो भलेमानुसों की तरह अपनी कुरसी पर चुपचाप
बैठे-बैठे मुल्क की भलाई के लिए
रात-रात जागते हैं;
और गाँव की नाली की मरम्मत के लिए
मास्को, न्यूयार्क, टोकियो, लन्दन की खाक
छानते फकीरों की तरह भटकते रहते हैं…
तोड़ दिये जाएँगे पैर
और फोड़ दी जाएँगी आँखें
अगर तुमने अपने पाँव चल कर
महल-सरा की चहारदीवारी फलाँग कर
अन्दर झाँकने की कोशिश की
क्या तुमने नहीं देखी वह लाठी
जिससे हमारे एक कद्दावर जवान ने इस निहत्थे
काँपते बुड्ढे को ढेर कर दिया ?
वह लाठी हमने समय मंजूषा के साथ
गहराइयों में गाड़ दी है
कि आने वाली नस्लें उसे देखें और
हमारी जवाँमर्दी की दाद दें
अब पूछो कहाँ है वह सच जो
इस बुड्ढे ने सड़कों पर बकना शुरू किया था ?
हमने अपने रेडियो के स्वर ऊँचे करा दिये हैं
और कहा है कि जोर-जोर से फिल्मी गीत बजायें
ताकि थिरकती धुनों की दिलकश बलन्दी में
इस बुड्ढे की बकवास दब जाए
नासमझ बच्चों ने पटक दिये पोथियाँ और बस्ते
फेंक दी है खड़िया और स्लेट
इस नामाकूल जादूगर के पीछे चूहों की तरह
फदर-फदर भागते चले आ रहे हैं
और जिसका बच्चा परसों मारा गया
वह औरत आँचल परचम की तरह लहराती हुई
सड़क पर निकल आयी है।
ख़बरदार यह सारा मुल्क तुम्हारा है
पर जहाँ हो वहीं रहो
यह बगावत नहीं बर्दाश्त की जाएगी कि
तुम फासले तय करो और
मंजिल तक पहुँचो
इस बार रेलों के चक्के हम खुद जाम कर देंगे
नावें मँझधार में रोक दी जाएँगी
बैलगाड़ियाँ सड़क-किनारे नीमतले खड़ी कर दी जाएँगी
ट्रकों को नुक्कड़ से लौटा दिया जाएगा
सब अपनी-अपनी जगह ठप
क्योंकि याद रखो कि मुल्क को आगे बढ़ना है
और उसके लिए जरूरी है कि जो जहाँ है
वहीं ठप कर दिया जाए
बेताब मत हो
तुम्हें जलसा-जुलूस, हल्ला-गूल्ला, भीड़-भड़क्के का शौक है
बाश्शा को हमदर्दी है अपनी रियाया से
तुम्हारे इस शौक को पूरा करने के लिए
बाश्शा के खास हुक्म से
उसका अपना दरबार जुलूस की शक्ल में निकलेगा
दर्शन करो !
वही रेलगाड़ियाँ तुम्हें मुफ्त लाद कर लाएँगी
बैलगाड़ी वालों को दोहरी बख्शीश मिलेगी
ट्रकों को झण्डियों से सजाया जाएगा
नुक्कड़ नुक्कड़ पर प्याऊ बैठाया जाएगा
और जो पानी माँगेगा उसे इत्र-बसा शर्बत पेश किया जाएगा
लाखों की तादाद में शामिल हो उस जुलूस में
और सड़क पर पैर घिसते हुए चलो
ताकि वह खून जो इस बुड्ढे की वजह से
बहा, वह पुँछ जाए
बाश्शा सलामत को खूनखराबा पसन्द नहीं !

Critical and legal evaluation of Jan Lokpal Draft

अमिताभStatement of objects and reasons in any Act is always high sounding and jlp does not seem short of that but this does not really mean much because what matters are the provisions and their implementability. It basically wants to claim that it is an attempt to establish an “independent authority” to investigate offences under pc act…

…by expeditious investigation, to prosecute offenders and to ensure timely redressal of certain types of public grievances etc. So far so good. All very grand looking but what is the reality? The real picture is that this proposed draft is full of so many loopholes, conjectures, assumptions, surmises, vague premises and lopsided thing.

I present them one by one-

1. Let us take the definition of  “grievance”. It is stated to mean a claim by a person that he could not get satisfactory redressal according to a citizens’ charter despite approaching a grievance redressal officer of that department. Citizen charter has been described in the chapter “Grievance redressal system” at section 25. But it is so vague and wide that nothing can be made out of it and very soon it will lose its meaning and will get diluted.

2. Similarly, it defines “whistleblower” as any person, who provides information about corruption in a public authority or is a witness or victim in that case or who faces the threat of professional harm, physical harm etc for making a complaint to the Lokpal  or for filing an RTI application. But what is meant by providing information against corruption, when will it be established that the information was a genuine one, who will establish and deduce it, all these questions are left open. How can it be said that a person is facing any harm are all matters of conjecture? No definition, no legal explanation, just sheer presumption. Not even the way of defining these words and the authority who finally establish them. No difference between a false complainant or a truthful one. No difference between a bad and cunning government servant proving to be a pain in the neck in the government by presenting all kinds of complaints and doing nothing on his own end.

3. About the much talked selection committee, it talks of a selection committee from out of a short list prepared by the search committee. The search committee shall consist of 10 members. 5 members will be SC judges, CEC, CAG etc. with “impeccable reputation of integrity”. Now, the question is who defines “impeccable reputation”? No law believes in reputation. What does reputation mean? How would integrity be defined? Who will be said to have impeccable reputation about integrity? Should governance be based on such arbitrary, vague and subjective words? My idea of a man of impeccable integrity might be in juxtaposition of yours and vice-versa. Things don’t end here. It also talks that these 5 members selected shall co-opt another 5 members from the Civil society in the search committee. No description about their selection criteria. Not even defined Civil society! Who are fit and who are unfit in this criteria? Who is less important a civil activist than other? These are areas that are fraught with great dangers and are completely unacceptable because they might lead to all kinds of confusion and possibly even nepotism.

4. Again, about candidates, it requires “only persons with impeccable integrity and record of public service particularly in the field of fighting corruption”. Who in India has not an impeccable integrity? Shall law be based on such vague words and vague propositions, that too when “impeccable integrity” is defined nowhere here. Again, who does not claim to be working for fighting corruption? I am yet to find a person in India who says he likes corruption or that he is not against corruption.

5. Then the process of selection and presentation of facts on website. Only yesterday Ms Arundhati Roy, in an article, blamed two of the primary workers of IAC of working for corporate interests and of getting huge foreign donations of unsavoury nature. Does that mean Mr Arvind Kejriwal and Mr Manish sisodia now quit the IAC and never claim membership of search committee? The moment 5 member team Anna was formed for drafting, a plethora of charges were volleyed against Sri Shanti Bhushan and his son. Why did they not quit the drafting committee membership? All these were very much on websites- so many websites!

6. What the above means is that all this bravado being painted is a confused, vague and hypothetical imagination where the only guiding principle is the sweet wishful thinking.

7. But the real trouble starts when we start talking about the work and function of these Lokpal. This includes to superintend and direct over the investigation of offences involving any act of corruption, to impose punishment of dismissal etc even after only the completion of investigation, to ensure that the public grievances covered by this act are redressed in a time bound manner, to initiate proper prosecution before a special court, to receive complaints from whistle blowers, to receive complaints against any officer or staff of Lokpal, to attach property and assets acquired by corrupt means and to confiscate them, to recommend cancellation or modification of a lease, license, permission, contract or agreement, if it was obtained by corrupt means, to ensure that the time limits mentioned in this act are strictly adhered to, to ensure the integrity of its functionaries, to inquire into the assets declaration statements filed by all successful candidates and so on. Thus virtually everything under the sun! Whatever these great architects could think of, they went on stuffing here. On, my god! So, now there shall be a new body of nearly a dozen dynamites (or supermen) who shall control everything in the country- every single complaint, every public grievance as per citizen charter, safety of every whistleblower and what not. This is not only crazy, this is the wildest and weirdest thought one could have ever thought. Today we have lakhs of government officers in India, all doing whatever they can. There are millions of government servants. But these few samurai, a with a hoard of new lokpal office men, will ensure that everything gets cleaned and cleansed. It does not seem proper to use a very strong word for such an imagination but nevertheless i would say that these people should have applied much restrain here.

8. Again, look at the various powers proposed to lokpal- to attach property and assets acquired by corrupt means and to confiscate them, to recommend cancellation or modification of a lease, to take disciplinary activity against an employee etc. Not only this, they will also be designated authority under section 5 of the Indian telegraph act empowered to approve interception and monitoring of messages of data or voice transmitted through telephones, internet etc.

9. Even the removal of the lokpal is described in an equal casual and non-serious manner. As per section 11, any lokpal can be removed from his office by the president, on the recommendation of the Supreme Court after it held an inquiry on the complaint of any person and found that he has been guilty of misbehavior. It is said that the Supreme Court shall make its recommendations within 3 months of receipt of complaint. What it tends to forget is that there can be any number of complaints coming against these lokpal because they are not fundamentally covered under the Contempt’s of courts act and hence many who would feel the lokpal is not listening to them might put in a complaint? Given the way the Supreme Court takes its job, with utmost seriousness and methodically, one can understand that soon it will become another non-operative provision, making a mockery of it. Though there is a fine or an imprisonment up to one year frivolous or malafide complaints, but as we all know, it is very-very difficult to prove either of these, conclusively. Again, this decision of Supreme Court will be subject to various Judicial reviews and hence a plethora of case laws.

10. Another such imaginative, hypothetical and non-realistic provision is about taking action against employees of lokpal. It claims to go for independent complaints authority. In each state, one or more complaints authority would be established by the lokpal to entertain any complaints against any officer or staff of the lokpal. Such complaints authority shall consist of 5 members. Thus, in each state five members to look after all the complaints! With all kinds of functions assigned to lokpal, only five members per state! Each of the government departments and subunits has hoards of complaint officers but each of them are overburdened with complaints and five members to look at all kinds of complaints in a state! Within a month or two, this will get chocked to its full capacity. Here again, look at the audacity of belief- “the complaints received against any officer or staff of the lokpal shall be inquired into by the complaints authority in a public hearing and shall be decided within 2 months of the receipt of the complaint.” These prepositions made one give a feeling that the people engaged in this drafting never had any exposure of public office.

11. Similar impunity can be seen chapter X on “Timely completion of investigation and trials for corruption” which says every investigating officer shall endeavour to complete the investigation of an offence within a period of 6 months but in any case the period of investigation shall not extend 18 months. Every effort will be made by the special courts to complete the trial within a maximum period of 12 months. All I can say here is- “if wishes were horses, beggars would fly.” I had so far heard politicians coming up with grand promises but this must be the first time, social activists resorted to this on such a large scale.

12. Similarly, the bill talks of an appellate grievance officer of lokpal. Thus there shall be at least one officer of the lokpal in each district to receive grievances who will be the officer based on whose “might and strength” the institution of lokpal will wipe away all the corruption, all the delay and everything! A penalty not exceeding Rs. 500/- per day to Rs 50,000 is prescribed for failure in grievance redressal but no modality regarding that fine is prescribed.

13. All through, the proposed draft is preconceived in its assumptions. It seems to believe that the moment a person falls in its net; he/she shall be hanged, even if the basic principles of natural justice are thrown away. It gives so many powers to the lokpal and its institution, all rolled in one. At the same time, it also wants to get away with section 389 (regarding suspension of sentence pending the appeal and release of appellant on bail) and section 397 (calling for records to exercise powers of revision) of the code of criminal procedure. Thus, right from the beginning, a complaint is believed to be true except against that of the so-called and self-described whistle-blower about whom it says in section 30 that lokpal may impose fine up to Rs one lakh. But is makes it mandatory that no fine can be imposed without giving a reasonable opportunity of being heard to the complainant and also not merely because a case could not be proved.

Somehow, this sense of wisdom seems to be completely absent against the accused. Thus what this will result in that there might evolve many set of government servants playing with this act for their own personal gains and thus ruining things. Such provisions, when applied so lightly, non-seriously, non-legally and hurriedly, will prove to be a permanent bane for Indian governance.

Summing it up, the Jan Lok Pal has all the faults that a hurried, one-sided and preconceived legal draft can have.

Amitabh

an IPS officer from UP

amitabhth@yahoo.com

09415534526

दीपक चौरसिया ने अन्ना का अपमान किया!

जगमोहन फुटेलासन अस्सी के दशक के शुरू में मेरी पहली नौकरी लगी तो मैं उपसंपादक था और मेरी पहली तालीम ये कि जब भी किसी मसले पर किसी भी संस्था का सहमति या विरोध में कोई प्रेस नोट आए तो उसमें लिखे नामों में से कम से कम आधे ज़रूर छाप देना. बाकी आधे अगली बार.

इसके पीछे सोच ये कि कल कम से कम पांच अखबार वो हर आदमी खरीदेगा, अपनों में दिखाने बांटने के लिए और कुछ फिर वो भी जिन्हें वो फोन कर कहेगा कि देखो आज के अखबार में मेरा नाम छपा है. मुझे याद है कि ऐसे कुछ लोगों को उनका नाम छप रहा होने की जानकारी फोन से रात को ही दे दी जाती थी. ताकि वे अपने लिए अपनी आवश्यकता की प्रतियां हाकर से कह के पहले ही सुनिश्चित और सुरक्षित कर लें.

समय के प्रवाह के साथ वो अखबार बहुत बड़ा हो गया और मेरा ये यकीन पक्का कि अखबार मुद्दों नहीं, नामों के सहारे भी छपते और बिकते हैं. फिर नब्बे के दशक में मैं इस देश के पहले प्राईवेट टीवी चैनल में रिपोर्टर हुआ तो देखा कि मीडिया अपनी सुविधा और ज़रूरत के लिए खबरें कवर ही नहीं करता, उन्हें गढ़ता भी है. मुझे एक घटना याद आती है… मैं ब्यूरो देखता था एक न्यूज़ चैनल में. कहीं किसी शहर में एक हत्या हुई.

मुझे जनसत्ता के दिनों से इंडियन एक्सप्रेस के मेरे एक मित्र ने फोन किया. बताया कि हमारा स्ट्रिंगर मृतक की पत्नी से ऐसे बैठने वैसे बैठने, इधर देखने उधर देखने, और फिर जैसे ही इशारा करे वैसे ही रोना शुरू कर देने की हिदायतें दे रहा था. मेरे मित्र जैसे प्रिंट मीडिया के लोगों ने इस पर आपत्ति की तो उसने कहा कि भाई समझो, हम विजुअल मीडिया में हैं. आपने आंसू हों न हों लिखने हैं, मुझे दिखाने भी पड़ेंगे. अम्बाला में पुलिस एक ऐसे पत्रकार की धुनाई कर चुकी है जिसने रिपोर्ट दर्ज न होने से दुखी थाने में आई एक महिला से कहा कि तू अपने कपड़े फाड़ ले, इन सबकी वर्दियां तो मैं उतरवा दूंगा. आपने पढ़ा सुना ही होगा कि कैसे एक बड़ी खबर के चक्कर में एक महिला को उकसा कर कुछ टीवी पत्रकारों ने जिंदा जला दिया था.

मेरा ये अनुभव है कि पत्रकारों के मौके पर पंहुचने से पहले लोग खामोश और उनके कैमरे देखते ही चिल्लाने लगते हैं. वे अगर चिल्ला चिल्ला के थक चुके हों तो बाद में पंहुचे कैमरों के लिए उन्हें फिर से चिल्लाना पड़ता है. और अगर उसके भी बाद पंहुचे कैमरों को मौके से सब जा चुके मिलें तो फिर खुद कुछ लोग जुटा कर चिल्लाहट करानी पड़ती है. कभी कभार तो उनकी भी बाईट ली, भेजी और चलाई जाती है जिनका उस मुद्दे या उस संस्था से कोई ताल्लुक ही नहीं होता.

छोटी खबर को बड़ा करना व्यावसायिक मजबूरी हो गई है और बड़ी खबर को उस से भी बड़ी बताना खुद को बड़ा बताने की कोशिश. जैसा दीपक चौरसिया ने संसद पर हुए हमले के दौरान किया. वे दो घंटे तक चीख चीख के बताते रहे कि संसद परिसर में बम फटा है. बड़ी जोर का धमाका हुआ है. उनने खुद सुना है. उनने खुद देखा है. धुंआ है. भगदड़ है. पुलिस है. बम निरोधी दस्ते हैं. भय का माहौल है. वगैरह वगैरह… अब आप ज़रा दिल्ली पुलिस, खुद संसद या बाद में अदालत में चली कारवाई का रिकार्ड उठा के देख लीजिये. उसमें संसद पे हमले का ज़िक्र तो है. बाहर किसी बम के फटने का कोई ज़िक्र कहीं नहीं है.

तब दीपक आजतक में थे. अब स्टार में हैं. वे वही हैं. उनकी सोच, आदत और समझ भी वही है. ज़ाहिर है पत्रकारिता का स्तर भी. अन्ना की रिहाई वाले दिन ‘हमने बीस कैमरे’ लगाने का दम भरने और बरसात के बावजूद सुबह शाम तिहाड़ से लेकर वाया राजघाट रामलीला मैदान तक डटे रहने और निरवरत अन्ना के कसीदे पढ़ने वाले श्रीमान दीपक चौरसिया बीती रात अभिषेक मनु सिंघवी के घर पर थे. वन टू वन कर ये दिखाने कि जिसे बरखा, राजदीप या अरनब गोस्वामी तक नहीं पकड़ पाए, वे उन अभिषेक मनु के साथ उनके घर, उनके सोफे पे, उनके साथ बैठे हैं. और फिर जैसा मैंने कहा, खबर अगर न हो तो बनानी पड़ती है. खबर यहाँ भी नहीं बन रही थी. वो ही न बने तो मज़ा ही क्या. सो लगे दीपक चौरसिया अभिषेक मनु के मुंह में शब्द ठूंसने.

एकाध नहीं कई बार पूछा, क्या आपको नहीं लगता कि अन्ना टकराव पैदा कर रहे हैं संसद के साथ? अब अभिषेक सिंघवी भी आखिर अभिषेक सिंघवी हैं. राजनीति और शब्दों के चयन का सलीका उन्हें पहली बार अपने पिता का अंगूठा चूसने के समय से तब से है जब शायद दीपक के पिता जी की शादी भी नहीं हुई होगी. वे नहीं बोले अन्ना के खिलाफ एक शब्द भी. दीपक ने बहुत कोशिश की. अभिषेक ने हर बार कहा, आप स्वतंत्र हैं, कुछ भी कह सकते हैं, मैं वैसा नहीं कहूँगा.

और फिर दीपक ‘स्वतंत्र’ हो गए. चाय वो शायद पहले पी चुके होंगे. उसके साथ शायद कुछ नमकीन और उस नमक का असर रहा हो. वो उन पे तारी हुआ. और वे बोले,” मुझे तो ये अन्ना का मज़ाक लगता है”. अभिषेक फिर कुछ नहीं बोले. वकालत के पेशे ने उन्हें बखूबी समझा दिया है कि जब सामने वाला ज्यादा बोलने के चक्कर में अपने पैरों पे खुद कुल्हाड़ी मार लेने पे आमादा हो तो उसे मार ही लेने देनी चाहिए. वे चुप रहे. दीपक को लगा मैदान खाली है. एक शाट और मारो. बोले, “मुझे तो लगता है, अन्ना आन्दोलन नहीं मखौल कर रहे हैं”.

जब ये इंटरव्यू चैनल पे चला तो इसके आगे उसने काट दिया. मुझे नहीं मालूम इसके आगे दीपक ने अन्ना को और क्या क्या कह कर निरादरित किया होगा. कोई पूछे इन भाईसाहब से कि भैया, आप इंटरव्यू लेने गए थे कि देने? और अगर आपको लगता है कि अन्ना भारतीय संविधान, संसद या जनता के साथ मज़ाक कर रहे हैं तो आप क्या कर रहे हैं उनके साथ तिहाड़ से लेकर रामलीला मैदान तक? इन से भी बड़ा सवाल ये है कि जब आप अपनी बुद्धि, दिमाग, सोच और प्रतिबद्धता से हैं ही नहीं अन्ना या उनकी सोच के साथ तो उनके लिए सुबह सुबह बिना नहाए धोये रामलीला मैदान आ के सिटी रिपोर्टर की तरह उनकी रिपोर्टिंग क्यों कर रहे हो?

पी7 न्यूज़ के एक रिपोर्टर को मैंने देखा टीवी पर. पीस टू कर रहा था. कल. सर पे ‘मैं अन्ना’ वाली टोपी लगा के. अरे भैया, इतना ही शौक है अन्ना का साथी दिखने का तो पहले वही कर लो. चैनल की नौकरी और रिपोर्टिंग बाद में कभी कर लेना… तुम्हीं बताओ कैसे भरोसा करें तुम्हारी रिपोर्ट पर? क्या भरोसा है कि जो तुम बोल और बता रहे हो वो सब निष्पक्ष है. कैसे मान लें कि तुम आस पास वैसी टोपी वालों को खुश करने के लिए या फिर उनसे डर के नहीं बोल रहे हो?

कल रात आशुतोष ने और भी गज़ब किया. एक कमाल का शो करते हैं करन थापर उनके चैनल IBNCNN पर. आशुतोष चूंकि चैनल के सम्पादक मंडल में हैं सो आशुतोष को आजकल बिठाना ही पड़ रहा है कार्यक्रम में. कल का प्रोग्राम अन्ना आन्दोलन में मीडिया की भूमिका पर था. करन ने पूछा आशुतोष से कि क्या मीडिया ने अपनी ज़रूरतों के लिए कुछ ज्यादा ही बढ़ा चढ़ा कर पेश नहीं किया है आन्दोलन को?… अब पत्रकारिता में करन थापर का कद देखिए, आशुतोष का भी और फिर आशुतोष का जवाब देखिए. पलट कर बोले, “ये उन अंग्रेजीदां पत्रकारों की सोच है जिन्हें पत्रकारिता के बाद सरकार की मदद से कोई पी.आर.ओ. टाईप नौकरी चाहिए.” उनके ये कह लेने के बाद आशुतोष का मुंह हमेशा की तरह काफी देर तक खुला ही रहा कि जैसे करन थापर को अभी के अभी निगल ही जाएंगे. हद हो गई है. हम रसातल में ले गए हैं पत्रकारिता को. और फिर अपने भी लोगों को सुनने को तैयार नहीं हैं!!

लेखक जगमोहन फुटेला चंडीगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार हैं, जर्नलिस्टकम्युनिटी.कॉम के संपातक हैं. इनसे संपर्क journalistcommunity@rediffmail.com के जरिए किया जा सकता है.

ये हरामखोर बेइमान नेता अन्ना आंदोलन से फायदा उठाने में लग गए

सुभाष गुप्ता: खून चूसने वाले नेता अभी चेते नहीं… : अन्ना की लड़ाई देश भर के लोगों की लड़ाई  में बदल रही है। इसकी वजह भी है। दरअसल, ये लड़ाई  जन लोकपाल की लड़ाई से बहुत आगे निकल चुकी है। आजादी  के बाद नौकरशाही और नेताओं ने जिस तरह आम आदमी का खून  चूसा है…. ये लड़ाई उसी का नतीजा है।

खास बात ये है कि देश भर में आंदोलन की आग फैलने के बाद भी तमाम भ्रष्ट नेता इसका सियासी फायदा उठाने की जुगत भिड़ाने लगे हैं। वे आजाद हिंदुस्तान के इन तेवरों से सबक लेने को तैयार नजर नहीं आते। बल्कि शायद उनकी सोच ये है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ खड़े हुए देश की पैरवी का ड्रामा करके वे खुद को ईमानदारों की कतार में खड़ा कर लेंगे। लेकिन क्या हिंदुस्तान के लोग इतने भोले हैं कि सियार की खाल में छुपे भेड़ियों को नही पहचानते  ? क्या सिर्फ केंद्र में बैठे बेईमान ही बेईमान माने जाएंगे और राज्य में बैठकर जनता का खून चूसने वालों को जनता माफ कर देगी ? यदि आकंठ भ्रष्टाचार और बेईमानी में डूबा कोई नेता ऐसा मुगालता पाल लेता है, उसकी अक्ल पर तरस ही खाया जा सकता है। अभी एक को निशाना बनाया गया है, कल दूसरों की बारी आएगी।

अन्ना का यह आंदोलन समूचे भ्रष्टाचार और सड़ी गली व्यवस्था के खिलाफ जनता की आवाज है। भ्रष्ट नेताओं और अफसरशाही ने जिस तरह जनता की खून पसीने की कमाई पर डाका डालने और अपनी जेबें भरने को अपना अधिकार समझ लिया है, ये उसके खिलाफ आम आदमी की बगावत है। आम आदमी इस लड़ाई में इसलिए कूदा है कि उसे अन्ना की आवाज में सच्चाई नजर आती है।… और आजादी के बाद पिसते – पिसते नाउम्मीद हो चुके लोगों को अन्ना ने ये दिखा दिया है कि हौसला बुलंद हो, तो जुल्मी के खिलाफ कोई भी लड़ सकता ….  लड़कर जीत सकता है। भले ही जुल्मी का कद सरकार जितना ही क्यों न हो।

अब पानी सिर  के ऊपर से गुजरने लगा है।  अब भी हमने खामोशी ओढ़े रखी, तो भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाही का इलाज करना और मुश्किल हो जाएगा। इसी सोच के साथ  बच्चा, बूढ़ा, जवान हर कोई  सड़क पर आ रहा है। अहिंसा की ताकत एक बार फिर अपना रंग दिखाने लगी है। संसद और कमेटी को आड़ की तरह इस्तेमाल करने वाले ये कैसे भूल जाते हैं कि लोकतंत्र में सारी शक्ति जनता में निहित होती है। कुछ लोगों को अपना नुमाइंदा चुन लेने का अर्थ यह कदापि नहीं हो सकता है कि इससे जनता शक्तिहीन हो गई है। जनता ने किसी को भी चुना है, तो सही तरीके से काम करने के लिए चुना है। हजारों करोड़ के घोटाले करने के लिए नहीं। और न ही घोटालेबाजों को बचाने और आश्रय देने के लिए किसी को चुना या किसी बड़े पद तक पहुंचाया गया है। महज अपने सियासी नफे नुकसान से लिए घोटालों पर पर्दा डालना और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने में आनाकानी क्या कम बड़ा भ्रष्ट आचरण है?

अन्ना की ये लड़ाई  पूरे देश में फैल गई है… ये लड़ाई और ज्यादा फैलेगी।  तब तक फैलती जाएगी, जब तक भ्रष्टाचार की जड़ न उखाड़ दी जाए। इसी विश्वास के साथ देश के लोग अन्ना बन रहे हैं। अन्ना ने जो मशाल जलाई है, उसे और आगे ले जाना, समय की पुकार है … अपने अधिकारों पर डाकेजनी रोकने के लिए ये एक नितांत आवश्यक उपाय भी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इसकी आंच उन सभी सफेदपोशों को बेनकाब करके उखाड़ फेंकेगी, जो जनता के हितैशी होने का ढकोसला करके जनता का खून चूस रहे हैं। भले ही वे किसी भी राजनीतिक चोले में क्यों न हों।

लेखक सुभाष गुप्ता उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

Anna has the support of people, admits Ambika Soni

: Parliament to take final call on Lokpal bill : New Delhi : Even as anti-graft crusader Anna Hazare has started his fast at capital’s Ramlila ground, Union Information and Broadcasting minister Ambika Soni has no idea whether any behind the door effort is on to engage Anna in order to resolve all the outstanding issues in respect of Lokpal bill.

She, however, points out that government is ready to talk. “ While addressing the nation on 15 August, Prime minister said his government is open to talks to settle the matter.” In a no-holds barred interview with Ms Anurradha Prasad, Ambika Soni was candid enough to admit that  “ I have no idea whether any track-2 efforts are going on with team Anna to resolve the complex issue. In any case, government has accepted 34 points of bill made by team Anna. There is difference of opinion on other points.”

She, however, made it clear that government always keep the doors open for talks and dialogue. It always welcome inputs from any quarter. The interview with Ambika Soni will be aired at 9.30 pm tonight on News 24 channel.

Ambika Soni  also accepts the fact Anna is getting lot of support from people across the country. “ But, that is no indication that he has the support of whole of India.”

‘Do you think the movement for stronger Lokpal bill is the most challenging political crisis UPA-2 is facing ?’  “ I do not know, but  our government is very serious to root out the menace of corruption. And it is true that as media exposed series of scam, people are very annoyed with even the political class of the country,” she said.

Replying to a direct barb ‘as to why the image of government has taken the nose dive when the image of PM is very clean?’ Ambika Soni said, “ I feel this is the manifestion of people’s anger against all those who are involved in scams. I also feel that people more often than not tend to support who raise the banner against corruption. It happens in the past and it is happening now.”

Ambika Soni, who is very active in putting the views of her government on Lokpal bill to media, was very critical of some members of team Anna for calling many ministers and MPs as rank corrupt. “ How can anybody make such a wild allegations against the elected members of parliament. This is the insult of people who have voted for them in election,” Ambika Soni said, who almost lost her temper while answering the this question.

‘But why government look so weak before Anna and his comrades?’ Surprisingly, Ambika Soni squarely blame media for giving more coverage to Anna’s movement than it really deserves. “And this is wrong impression that government is feeling helpless or weak before Anna.”

When asked as to why government did not take opposition parties into confidence in dealing with the issue as important as Lokpal bill, Ambika Soni reveals that both Prime Minister and Finance minister called a meeting of opposition parties to discuss the whole matter. It is a different matter opposition parties were not forthcoming in meeting called by the PM and FM. ‘ So what next ?’ Ambika Soni made it clear that government will be run according to constitution. There is no other way to run the government. “ And it is the parliament that will take the final call on Lokpal bill,” she said.

इंडिया गेट टू जंतर-मंतर : अगस्त 2011 – ए लव स्टोरी… कुछ दृश्य

1-वो इंडिया गेट से जंतर-मंतर के बीच किसी चौराहे पर मिली. चेहरे पर खुशी-उल्लास. वही नारे लगा रही थी, जो लोग लगा रहे थे. अत्याचारी बंद करो. भ्रष्टाचार बंद करो. वो छुटकी रोजाना मसाले, सुर्ती, तंबाकू, सिगरेट, चने, मूंगफली बेचती है. उसके साथ उस जैसे कई बच्चे भी यही काम करते हैं. रोज कुआं खोद पानी पीने वाले हैं ये. स्कूल नहीं जाते क्योंकि सांसों की डोर के लिए ज्ञान की नहीं बल्कि चंद सिक्कों की जरूरत होती है.

छुटकी की नारेबाजी, उठने ही वाला है हाथ…

ये लो, वो झंडा अभी संभाल रहे हैं, इधर लग गया नारा और उठ गई बंद मुट्ठी

अभी वे लोग झंडा-मोबाइल में फंसे हैं, इधर छुटकी ने गला फाड़कर अत्याचारी मुर्दाबाद कह दिया.

बाबू, इधर ले आओ तिरंगा झंडा, जरा हम भी तो देखो… अरे अरे नहीं दोगे… साले चश्मा वाले, ये तिरंगा तुम्हारी बपौती नहीं है, और तुम लोगों ने अभी कहां तिरंगा हमें थामने दिया, पर चल निकल, फिलहाल तो हम भी तेरे साथ हैं …

2-इंडिया गेट से जंतर मंतर जाने वाले इतनी बड़ी संख्या में थे कि लग रहा था कि इंडिया गेट से जंतर मंतर के बीच कई किलोमीटर की सड़क सिर्फ और सिर्फ भारत के लाडलों से भरी पड़ी है. मैं भी इसी भीड़ का हिस्सा था. कभी कक्षा आठ दस बारह के बच्चों का हुजूम दिख रहा था जो स्कूली ड्रेस और बस्ते के साथ आंदोलन में शरीक हुए थे, स्कूल से बंक मारकर. ये किशोर उम्र विद्यार्थी सबसे ज्यादा जोरशोर से नारे लगा रहे थे. कभी बुजुर्ग दिख रहे थे जो खाए पिए घरों से थे लेकिन उन्हें करप्शन और महंगाई के मुद्दे परेशान करते हैं. महिलाओं का रेला भी नारा लगाता चल रहा था. सुंदर सजीली जींसधारी लड़कियों का समूह भी इसमें था. नए फिल्मों के हीरो माफिक युवाओं की भरपूर मात्रा इस पैदलमार्च में शामिल थी.

3-तरह तरह के नारे लग रहे थे- सोनिया जिसकी मम्मी है, वो सरकार निकम्मी है. मनमोहन जिसका ताऊ है, वो सरकार बिकाऊ है. जिसने देश को बेचा है, राहुल उसका बेटा है. इंडिया अगेंस्ट करप्शन के वालंटियर ऐसे नारे लगाने से मना कर रहे थे पर भीड़ कहां मानने वाली. भीड़ का सरकार के प्रति गुस्सा तीखे रूप में नारों के जरिए प्रकट हो रहा था. खासकर स्कूल से भागकर आंदोलन में शामिल होने आए किशोरों को तो ऐसे ही नारे भा रहे थे और यही नारे वे शुरू से आखिर तक लगाते रहे.

4-एक लड़की जंतर मंतर से फोन पर अपने किसी दोस्त को अपनी लोकेशन बता रही थी. यह प्रेमी जोड़ा भटक गया था. लड़का इंडिया गेट के इर्दगिर्द भीड़ में नारे लगाते हुए घूम रहा था और साथ ही अपनी गर्लफ्रेंड को भी तलाश रहा था. लड़की रेले के साथ बहते हुए, नारे लगाते हुए जंतर मंतर आ पहुंची थी. दोनों कुछ देर में शायद मिल जाएंगे यहीं कहीं जंतर मंतर के आसपास, रिजर्व बैंक आफ इंडिया के करीब. ऐसी संभावना थी. लव स्टोरी में विचारधारा थी. लव स्टोरी में देश की चिंता भी थी. यह मेच्योर लव स्टोरी थी. ऐसों की संख्या काफी दिखी. और जब ”अगस्त 2011 – ए लव स्टोरी” में आंदोलन पार्ट हो तो आंदोलन की गहनता को समझा जा सकता है. और, यह आंदोलन सचमुच लवस्टोरी है, देश के प्रति प्यार की स्टोरी.

5-दिल्ली पुलिस के लोग चौराहों पर ट्रैफिक रोककर पैदलमार्च में शामिल लोगों को जाने का रास्ता बना रहे थे. ट्रैफिक रुकने के कारण चौराहों के इधर उधर रुके कारधारी बाइकधारी बससवार लोग रैली को संभावनापूर्ण नजरों से निहार रहे थे. रैली के लोग उन्हें देखकर नारे लगाते- वंदेमातरम, तो रुकी ट्रैफिक में फंसे लोगों के कंठ भी खुल जाते- वंदेमातरम. कांस्टेबल से लेकर इंस्पेक्टर तक खड़े थे चौराहों पर, आधुनिक हथियारों से लैस जवान भी थे. इन्हें देख नारे लगते- अंदर की है ये बात, दिल्ली पुलिस हमारे साथ. इतना भरोसा अपने पर और आंदोलन पर कि पैदलमार्च वालों को लगता कि पुलिस भी उनके साथ है क्योंकि देश की हालत से पुलिसवालों के घर-परिवार भी परेशान हैं.

6-मीडिया के लोगों का हुजूम था. हर चौराहे पर मीडिया वाले खड़े मिलते. थ्री इडियट्स का बैनर लगाए खड़े थे कुछ लोग जिसमें मनमोहन, चिदंबरम और कपिल सिब्बल की तस्वीर थी. एक लड़का इस बैनर पर जूता सटाए खड़ा था. फोटोग्राफरों की भीड़ सीन को कैमरे में कैद करने को बार बार क्लिक क्लिक कर रही थी. कई विदेशी फोटोग्राफर थे. अच्छी तस्वीर बन रही थी उनकी. कैमरे देखकर नारे लगाने वाले बड़ी संख्या में थे. मीडिया आंदोलन के साथ है, यह भाव सबके मन में दिखा. और मीडिया वाले भी कुछ अलग करने की जुगत में अलग-अलग मूड मिजाज के सीन फुटेज जुटा रहे थे, लाइव दे रहे थे. नागरिक पत्रकारिता के इस दौर में ढेर सारे युवा, बुजुर्ग अपने मोबाइलों से तरह तरह के फोटो और वीडियो खींच बना रहे थे.

7-कलाकार भी पैदलमार्च में काफी संख्या में थे. कोई ड्रम बजाता चल रहा था तो कोई गाने गाता. तिरंगा ज्यादातर के हाथों में था. डाक्टरी की पढ़ाई कर रहे छात्र-छात्राएं भी आंदोलन के सपोर्ट में ग्रुप बनाकर आए थे और नारे लगा रहे थे. कई संकोची युवा नारे नहीं लगाते दिखे लेकिन उनसे बात करने पर पता चला कि चाहते हैं कि सड़ा हुआ पानी बदले, नई तस्वीर बने, सुख-चैन का माहौल कायम हो. युवाओं का एक ग्रुप पानी के खाली बोतलों को सड़क पर पीट पीट कर बजा गा रहा था. मैं अन्ना हजारे हूं लिखी टीशर्ट पहने युवा सबसे अलग नजर आ रहे थे. किसी लड़की ने एक टीशर्टधारी से पूछा- ये टीशर्ट मिलते कहां हैं. युवक ने जवाब दिया- मुझे नहीं मालूम, मुझे तो कल शाम तिहाड़ के सामने दिया गया, वहां बांटा जा रहा था, तभी से पहना हूं.

8-जंतर-मंतर पर युवा कांग्रेस वालों ने काफी बड़ा इलाक अपने बैनर और तंबू से घेर रखा था. क्या कि राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी मिलनी चाहिए. इस मांग से जुड़े पोस्टर टेंट में लगे हुए थे पर टेंट पूरा खाली था. कोई भी सज्जन नहीं दिख रहे थे. और जंतर मंतर पूरा अन्ना समर्थकों से भरा था. क्या पता उन्हें डर हो कि सरकार के प्रति नाराजगी के चलते भीड़ कहीं उन पर न टूट पड़े, इसलिए एक बड़ी जगह घेरकर, टेंट तंबू लगाकर वे खुद उखड़ गए थे वहां से.

9-अपने जीवन में मैं तरह तरह के प्रदर्शनों और आंदोलनों में शामिल हुआ था पर इस पैदलमार्च के साथ चलते हुए लग रहा था कि ये वही लोग हैं जिनके हम आंदोलन में शामिल होने की कामना किया करते थे पर लोग थे कि सुनते-समझते ही नहीं थे. आज ये सब लोग सड़क पर खुद ब खुद निकल पड़े हैं, अन्ना के नाम पर. उन्हें अन्ना में देवता दिखता है, सादगी दिखती है, ईमानदारी दिखती है, देश का असली नेता होने का स्वरूप दिखता है, गांधी दिखते हैं… तो इस देश की आम जनता को विचारधारा के जरिए नहीं, प्यार और सादगी से जीता जा सकता है, ऐसा महसूस हुआ. और जब आप उन्हें जीत ले, जोड़ लें तब चाहें जैसे शिक्षित करें, वे शिक्षित हो जाएंगे. नेता इससे सबक ले सकते हैं. विचारधारा वाली पार्टियां इससे सीख ले सकती हैं.

10-एक युवा अपनी शर्ट खोलकर उस पर भारत का नक्शा बनवाए था और अन्ना के समर्थन में व करप्शन के खिलाफ नारे लिखवाए थे. उसकी तस्वीर खींचने वालों की भीड़ थी. एक साथी शराब के नशे में इतने नारे लगाते रहे और पैदल चलते रहे कि जंतर-मंतर पहुंचकर उन्हें बेहोशी आ गई. अन्य अपरिचित लोगों ने उनकी इस तरह सेवा टहल की जैसे वे उनके ही घर के हों. अपनापन का एक भाव अजनबियों के मन में था और सब एक दूसरे से जन्मों-जन्मों से परिचित लग रहे थे. ऐसे आंदोलन जनता के दिलों को आपस में जोड़ते भी हैं. और ऐसे आंदोलन देशभक्ति की प्रचंड भावना पैदा करते हैं.

11- इंडिया गेट से जंतर मंतर पहुंचे एक अधेड़ हो रहे सज्जन ने अपनी निकली तोंद और पसीने से डूबी शर्ट को देखते हुए अपने एक दूसरे मित्र से कहा- चलो, अन्ना बाबा की कृपा रहेगी तो अपनी तोंद कम हो जाएगी. बहुत दिन बाद इतना पैदल चला हूं और खूब पसीना निकला है. शरीर से टाक्सिक चीजें बह गई हैं. राजनीति से भी विषैलापन खत्म होना चाहिए. उन्होंने अपने दोस्त को, जो जंतर-मंतर पर पराठे वाली दुकान से एक प्लेट लेकर भकोसने में लगे हुए थे, सलाह दी कि हम लोग मार्निंग वाक छोड़कर रोज अन्ना के आंदोलन में शामिल होंगे और देश की सेहत ठीक करने की प्रक्रिया के साथ अपनी तंदरुस्ती को भी रास्ते पर ले आएंगे.

उपर उल्लखित बातों और पैदल मार्च की झलकियां वीडियो में देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें–

IndiaGate to JantarMantar Part1

IndiaGate to JantarMantar Part2

IndiaGate to JantarMantar Part3

IndiaGate to JantarMantar Part4

IndiaGate to JantarMantar Part5

&

IndiaGate to JantarMantar Part6

… और, पैदल मार्च से जुड़ी कुछ चुनिंदा तस्वीरें यूं हैं…

…अन्ना एंड आंदोलन… अगस्त 2011 – ए लव स्टोरी… जारी है… कुछ सीन अगर आपके भी जेहन में हों तो इसमें जोड़ें और फिल्म को क्लाइमेक्स तक ले जाएं….

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

bhadas4media@gmail.com

इसे भी पढ़ें, क्लिक करें- जनांदोलनों के साथ हूं, इसलिए… मैं अन्ना हजारे हूं – बयान दर्ज करें

पत्रकार रहे मनीष सिसौदिया हैं टीम अन्ना के पांचवें चाणक्य

आखिर क्या वजह है कि अन्ना आंदोलन की घोषणा करते हैं, और मीडिया में छा जाते हैं. आखिर क्या वजह है कि अन्ना के आगे हर बार सारी खबरें बौनी बन जाती हैं और अखबार से लेकर टीवी चैनल तक पर बस अन्ना अन्ना और अन्ना नजर आते हैं. पिछले चार दिनों से आलम कुछ ऐसा है कि क्रिकेट टेस्टमैच की खबरें भी कहीं पीछे छूट गईं और अन्ना 24 घंटे टीवी स्क्रीन पर चमकते रहे.

इन कारणों को समझने के लिए जानना होगा अन्ना के उन चाणक्यों के बारे में, जो मीडिया मैनेज नहीं करते बस मीडिया को समझते हैं और मीडिया अपने आप मैनेज होती चली जाती है. ये चाणक्य हैं, अरविंद केजरीवाल, शांति भूषण, प्रशांत भूषण, किरण बेदी और मनीष सिसौदिया. बाकी लोगों के बारे में तो हर कोई जानता है पर मनीष सिसौदिया को कम लोग जानते हैं.

मनीष सिसौदिया
मनीष सिसौदिया
भ्रष्टाचार के खिलाफ देश भर में अलख जगाने वाले अन्ना को दिल्ली पुलिस गिरफ्तार कर चुकी थी. एक तरफ अन्ना के समर्थक गिरफ्तारी के विरोध में पुलिस का विरोध कर रहे थे तो दूसरी ओर तमाम न्यूज चैनलों पर अन्ना का संदेश टेलीकास्ट हो रहा था. हर कोई हैरान हर था. अन्ना तो  पुलिस की हिरासत में थे.फिर वो देश को संबोधित कैसे कर सकते हैं. अन्ना के आंदोलन को कुचलने पर आमादा सरकार के तो जैसे होश गुम हो गए थे. न्यूज चैनलों पर प्रमुखता से चलने वाले इस वीडियों ने सरकार के रणनीतिकारों की बखिया उधेड़ कर रख दी.

मीडिया मैनेजमेंट का इससे बेहतरीन नमूना हिंदुस्तान के इतिहास में पहले कभी नहीं देखा गया. जब से अन्ना ने आंदोलन का ऐलान किया है अन्ना की टीम ने सरकार को हर चाल में मात दी है. मीडिया को मैनेज करने के लिए अन्ना की टीम के पास बकायदा एक नियमावली है. जिसका टीम का हर सदस्य कड़ाई से पालन करता है. सिर्फ प्रेस मीडिया मैनेजमेंट ही नहीं टीम अन्ना ने अपने आंदोलन से ऐसे पत्रकारों को भी जोड़ा है जो मास मीडिया की कार्य प्रणाली से अच्छी तरह वाकिफ हैं.

मीडिया को दोस्त बनाकर कब कहां और कैसे ब्रेकिंग न्यूज चलवानी है. ये बात अन्ना की टीम बखूबी समझती है. इतना ही नहीं, न्यूज चैनलों के टाइम स्लॉट को समझकर मीडिया स्ट्रैटजी तैयार करना टीम अन्ना की सबसे बड़ी खासयित है और इसके पीछे है उन पत्रकारों का दिमाग जो अन्ना के साथ काम कर रहे हैं. जी न्यूज के पूर्व पत्रकार, मनीष सिसोदिया और स्टार न्यूज की जानी मानी एंकर रहीं, साजिया इल्मी मीडिया को समझती हैं. खबरों में अन्ना और उनका आंदोलन कैसे रहे इसकी बारीकी इन्हें पता है. इसके अलावा एनडीटीवी से जुड़े अभिनंदन शेखरी ने भी अन्ना के आंदोलन को काफी हद तक मीडिया फ्रेंडली बनाया है.

सिर्फ मीडिया मैनजमेंट ही नहीं आंदोलन के लिए तकनीक के इस्तेमाल में भी टीम अन्ना सरकार से कई कदम आगे है. आंदोलन के बारे में पल पल की जानकारी देने के लिए अन्ना की टीम ने एक कॉल सेंटर बनाया. इंडिया अंगेस्ट करप्शन नाम की वेबसाइट तैयार की जिसको हर पल अपडेट किया जाता है. आंदोलन से जुड़ी हर खबर इसके जरिए लोगों तक पहुंचाई जाती है. मोबाइल मेसेज के जरिए भी आंदोलन को पूरे देश में फैलाया गया.

वालंटियर्स की एक पूरी फौज है टीम अन्ना के पास जो चौबीसों घंटे फोन पर आंदोलन के बारे में जानकारी देने के लिए तैयार रहती है. इतना ही नहीं टीम अन्ना ने अपना संदेश लोगों तक पहुंचाने के लिए रिएलिटी शोज का भी इस्तेमाल किया. साफ है कि अन्ना की टीम मीडिया मैनेजमेंट से लेकर सूचनाओं के प्रचार और जनमत बनाने में हर मामले में सरकार पर बीस साबित हुई है.

सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य को एक चाणक्य ने नंदवंश का नाश करके राजा बना दिया था. अब सोचिए अन्ना के साथ हैं 5 चाणक्य. ऐसे में अन्ना के आंदोलन का मज़बूत होना लाज़िमी टीम अन्नाहै. आइए जानें मनीष सिसौदिया के बारे में. टीम अन्ना के पांचवें चाणक्य हैं मनीष सिसौदिया. पेशे से पत्रकार रह चुके सिसौदिया, समझते हैं कि कैसे टीवी पर छाया जा सकता है. अन्ना के फैसलों में सिसौदिया भी शामिल रहते हैं. भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार अन्ना के सामने ऐसे झुक जाएगी ये खुद सरकार को भी गुमान नहीं होगा और इसकी वजह है टीम अन्ना. जी हां सिविल सोसायटी से एक और शख्स जुड़ा है जो मीडिया की नब्ज़ को अच्छे से जानता है और उसका नाम है मनीष सिसौदिया.

अन्ना के फैसलों में सिसौदिया का भी अहम रोल होता है. आज अन्ना का आंदोलन मीडिया में छाया हुआ है तो शायद उसकी वजह मनीष सिसोदिया ही हैं क्योंकि मनीष सिसौदिया एक टीवी पत्रकार रह चुके हैं और टीवी पर छाए रहने के गुर उनसे बेहतर अन्ना को कौन बता सकता है? मनीष सिसौदिया आरटीआई, यानी राइट टू इनफॉर्मेशन से जुड़े हुए हैं. सरकारी कार्यप्रणाली में खुलापन और पारदर्शिता लाने के लिए 2005 में इस अधीनियम को बनाया गया था. आरटीआई लोकतांत्रिक संस्थानों को मजबूत बनाने, करप्शन हटाने, जनता को अधिकारों से लैस बनाने और देश के विकास में नागरिकों की भागीदारी बढ़ाने में मील का पत्थर साबित हुआ.

मनीष सिसौदिया केजरीवाल के साथ परिवर्तन संस्था से भी जुड़े हैं यानी भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए कब क्या करना है और खास कर मीडिया में कैसे बने रहना है ये गुर सिसौदिया को ठीक से पता है और ऐसे में अन्ना और आंदोलन कैसे बने रहें सुर्खियों में इसके पीछे सिसौदिया के सलाह की अनदेखी नहीं की जा सकती. साभार : आजतक

जनांदोलनों के साथ हूं, इसलिए… मैं अन्ना हजारे हूं – बयान दर्ज करें

मेरे एक मित्र पंकज झा, जो छत्तीसगढ़ भाजपा की मैग्जीन के संपादक हैं, ने सबसे एक सवाल पूछा है- ”जिन लोगों को अन्ना के इस आन्दोलन से काफी उम्मीद है उनसे एक असुविधाजनक सवाल पूछना चाहता हूं कि आखिर आज़ादी के बाद से अभी तक कितने आंदोलन को सफल होते उन्होंने देखा या सुना है? मेरे एक मित्र ने सही कहा कि गर्द-ओ-गुबार थम्हने दीजिए फिर सही तस्वीर देखिएगा.”

यह सवाल सिर्फ पंकज झा का नहीं है. ऐसे सवाल बहुत सारे लोग देश के अलग-अलग कोनों से उठा रहे हैं. और सवाल उठाने वाले अलग अलग बैकग्राउंड और विचारधारा के हैं. इसके जवाब में आप लोगों को मैं दो चीज कहूंगा. एक दिन आप बिना मकसद, बिना मतलब अन्ना के आंदोलन में शामिल हो जाइए. और वहां मौजूद लोगों को देखिए. हमारे आप जैसे घरों के बच्चे, युवा, बुजुर्ग, अभिभावक, लड़कियां, बच्चे, महिलाएं… आपको वहां मिलेंगे.

ये लोग सत्ता, सरकार और सिस्टम से उकताये-उबे हुए लोग हैं. आम जीवन में हम सभी रोज सिस्टम की क्रूरता, भ्रष्टाचार, असंवेदनशीलता से दो-चार होते हैं पर जब सिस्टम के खिलाफ आंदोलन की बात आती है तो उसके नाम पर वो पार्टियां सामने आती हैं जो खुद भ्रष्ट हो चुकी हैं और जनता का भरोसा खो चुकी हैं. चुनाव जीत जाना एक अलग बात है क्योंकि आजकल चुनाव लड़ने के लिए करोड़पति-अरबपति होना जरूरी होता है और चुनाव जीतने के बाद ये करोड़पति-अरबपति विभिन्न किस्म के भ्रष्टाचार से अपनी जेब भरते रहते हैं.

आजादी के बाद जितने आंदोलन हुए, वे भले सफल नहीं हुए पर उन आंदोलनों ने इस देश के लोकतंत्र को बचाए रखा, सत्ता के मद में चूर नेताओं को औकात न भूलने का दबाव बनाए रखा, तंत्र में लोक को हमेशा बड़ा मानने का ज्ञान पढ़ाए रखा… जेपी आंदोलन ने तानाशाह इंदिरा और कांग्रेस को उनकी औकात दिखाई. उस झटके के कारण कांग्रेस के नेताओं में जनता के प्रति भय पैदा हुआ जो हाल के वर्षों में गायब होता दिखा. लोकतंत्र की खासियत यही है कि अगर जनता संगठित और जागरूक होकर अपने हित में इकट्ठी न हुई तो सत्ता के भ्रष्ट से भ्रष्टतम होते जाने का रास्ता मिल जाता है.

इस देश में पक्ष और विपक्ष, दोनों दलों ने जनता के साथ धोखा किया है. दोनों ने भ्रष्टाचार के जरिए अथाह पैसा कमाया है. रोज ब रोज बढ़ती महंगाई को खत्म करने का बूता सरकारों में नहीं दिख रहा है. कारपोरेट इस देश की नीतियां बनाते और चलाते हैं, नेता उनके अप्रत्यक्ष प्रतिनिधि की तरह बिहैव करते हैं. भ्रष्टाचार और महंगाई का जो चोली-दामन का साथ है, उससे निपटना बेहद जरूरी हो गया है अन्यथा पैसा कुछ अमीर लोगों की जेब में जाता रहेगा और आम जनता दिन प्रतिदिन गरीबी रेखा के नीचे जाती जीती रहेगी. अन्ना के आंदोलन ने इस देश के लोकतंत्र को मजबूत करने का काम शुरू किया है. जनता की असली ताकत को दिखाने का काम किया है.

यह आंदोलन अपने मकसद में कामयाब हो या विफल, लेकिन इस आंदोलन ने भ्रष्ट नेताओं को संदेश दे दिया है कि उनकी तभी तक चल सकती है जब तक जनता चुप है. गर्द-ओ-गुबार थमने के बाद भी सही तस्वीर यही रहेगी कि अन्ना के आंदोलन से देश के नेता और पार्टियां अपनी औकात समझते हुए नई चीजें शुरू करेंगी जो उन्हें ज्यादा जनपक्षधर बनाएंगी. कम्युनिस्ट हों या संघ, मध्यमार्गी पार्टियां हों या जाति-भाषा वाली पार्टियां, सबकी सीमाएं जहां खत्म होती हैं, वहां से अन्ना का आंदोलन शुरू होता है. दुनिया का इतिहास गवाह है कि अक्सर बड़ी क्रांतियां छोटे मुद्दे पर शुरू हुआ करती हैं और बाद में निर्णायक रुख अख्तियार कर लेती हैं.

केंद्र में काबिज नेताओं ने अन्ना को रोकने के लिए क्या नहीं किया, लेकिन उनका हर उपाय उन्हीं के खिलाफ चला गया. सारे सलाहकारों के मुंह पर ताले पड़ चुके हैं. कांग्रेस सकते में है. भाजपा सत्ता विरोधी हवा को अपने पक्ष में करने की फिराक में है पर सफल नहीं हो पा रही क्योंकि जनता किसी भी पार्टी पर भरोसा करने के मूड में नहीं है. संभव है आगे अन्ना के साथ के लोग कोई राजनीतिक विकल्प खड़ा करने की सोचें पर फिलहाल तो यही सच है कि भ्रष्टाचार का इलाज करने के लिए एक कड़वी दवा इस लोकतंत्र को देने की जरूरत है और वह कड़वी दवा जनलोकपाल बिल ही है.

इस बिल के बारे में भी लोगों को आशंकाएं हैं कि कहीं इस बिल के बाद देश में लोकतंत्र का स्वरूप ही नष्ट न हो जाए और जनलोकपाल सबसे बड़ा सत्ता तंत्र बन जाए. इसका जवाब यही दिया जा सकता है कि वही जनता जो आज करप्ट सरकारों और नेताओं के खिलाफ सड़क पर है, कल जनलोकपाल के पथभ्रष्ट हो जाने और तानाशाह हो जाने की स्थिति में उसके खिलाफ भी सड़कों पर उतरेगी. पर मौत तय है इस डर से तो जीना नहीं छोड़ा जा सकता. इस देश में हजारों कानून हैं पर उनका इंप्लीमेंटेशन नहीं होता. इंप्लीमेंटेशन क्यों नहीं होता और इंप्लीमेंटेशन कैसे कराया जाए, यह बड़ा सवाल रहा है पर नेता और सत्ता के लोग इस पर चुप रहते हैं.

इन कानूनों का सत्ताधारी नेता अपने हित के लिहाज से उपयोग करते हैं. जो सत्ता का विरोध करना शुरू करे, उसे नष्ट करने और फंसाने के लिए उन कानूनों का तुरंत इस्तेमाल शुरू हो जाता है पर सत्ताधारी भ्रष्टाचारियों के खिलाफ वही कानून मौन रहते हैं. क्योंकि कानूनों को लागू करने वाली एजेंसियां सरकारों के दबाव में होती हैं. ऐसे में जनलोकपाल बिल जरूरी है ताकि सत्ता के मदांध सांड़ों को नाथा जा सका, काबू में किया जा सके, उन्हें उनके भ्रष्टाचार को लेकर कठघरे में खड़ा किया जा सके.

देश आजाद कितने बरसों में हुआ और कितने आंदोलन हुए, यह सबको पता है. सन 1857 से लेकर 1947 तक हजारों लाखों आंदोलन चले होंगे. कई दशक लग गए. पर अंततः आंदोलनों की सीरिज ने, जन जागरूकता ने, जन गोलबंदी ने अंग्रेजों पर इतना दबाव बनाया कि वे देश छोड़कर भागने को मजबूर हुए. इसी तरह अब अन्ना के नेतृत्व में जो जनगोलबंदी शुरू हुई है, और आगे भी यह विभिन्न लोगों, संगठनों, कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में जारी रहेगी, वह सत्ताधारियों को घुटने के बल बैठने को मजबूर करेगी ताकि वे जनहित में काम करें, करप्शन पर लगाम लगाएं, महंगाई को पूरी तरह नियंत्रित करें, प्राकृतिक संसाधनों की लूट खसोट रोक सकें.

दिल्ली में जो जनसैलाब उमड़ा है, वह थमने का नाम नहीं लेगा, यह तय है. पूरा देश जब दिल्ली कूच करेगा तो दिल्ली वाले नेताओं की सांसें थम जाएंगी और वो मजबूर हो जाएंगे अन्ना की मांग मानने के लिए. अन्ना व्यवस्था में बदलाव कितना ला पाएंगे या नहीं ला पाएंगे, यह सवाल फिलहाल बेमानी है. हमें एक कदम आगे बढ़ना चाहिए ताकि निष्प्राण हो चुके कानूनों में जान फूंका जा सके. इस देश और लोकतंत्र को बचाने के लिए, बदलाव का सहभागी बनने के लिए हमको आपको सभी को अन्ना का साथ देना चाहिए ताकि हम अपनी विचारधाराओं से उपर उठकर सरकारों पर यह दबाव बना सकें कि वो काला धन देश में लाए, करप्शन करने वालों को सजा दे, उनकी संपत्ति जब्त करे और आम लोगों को राहत प्रदान करे.

अन्ना का आंदोलन अराजनीतिक हो चुकी कई पीढियों को राजनीतिक रूप से ट्रेंड करने का काम कर रहा है. जिन दिनों में बड़े नेताओं के बेटे ही राजनीति के योग्य माने जा रहे हों और उन्हें ही देश चलाने का अधिकार मिलता दिख रहा हो, उस दौर में हमारे आपके घरों के लोग राजनीति के प्रति प्रेरित हो रहे हैं, विरोध प्रदर्शन, राजनीतिक बहस-बतकही, लोकतंत्र से संबंधित विमर्श में शामिल हो रहे हों, तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए. राजनीति सिर्फ करप्ट लोगों की बपौती नहीं, राजनीति सिर्फ नेताओं के बेटे का पेशा नहीं बल्कि यह आम जनता को बेहतर जिंदगी दिलाने का माध्यम है, यह स्थापित होना चाहिए. संभव है अगले आम चुनाव में बड़ी संख्या में ऐसे नए चेहरे चुनकर संसद में पहुंचें जो हमारे आपके घरों के हों. इस बदलाव का असर भारतीय राजनीति पर जरूर पड़ेगा, कोई इससे इनकार नहीं कर सकता.

आखिर में कहना चाहूंगा कि यह पक्षधरता का वक्त है. बहस का नहीं. बहुत बहसें हो चुकी हैं. अब थोड़ा सी उर्जा लगाकर सड़क पर उतरें. और सरकारों, भ्रष्टाचारियों, नेताओं, अफसरों को अपनी ताकत दिखाएं. उन्हें औकात में रहने का संदेश दें. ध्यान रखिए, अगर हम चुप बैठे रहे तो देश बेचने वाले देश बेच डालेंगे और हम बहसों में ही उलझे रहेंगे. तय करो किस ओर हो, आदमी के साथ हो या कि आदमखोर हो… इन पंक्तियों में छिपे-छपे संदेश को महसूस करिए और अपना अपना पक्ष तय करिए. आपके दो पैर दो कदम भी अन्ना के आंदोलन में चल सकें तो यह बड़ी परिघटना होगी. इसलिए आप चाहें जिस शहर में हों, आप दिल्ली कूच करें, रामलीला मैदान पहुंचें. निर्णायक वक्त को आपके समर्थन की दरकार है.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

bhadas4media@gmail.com

मेरा बयान दर्ज करें- मैं अन्ना हजारे नहीं हूं

RC Shuklaजब देश में कोई बड़ी घटना या दुर्घटना होती है तो पत्रकार होने की वजह से इलेक्ट्रानिक मीडिया की भाषा में मैं उसे क्लोज फ्रेम में देखता हूं.. मतलब एकदम नजदीक से.. कहा जाए तो खबरों को जीने का मौका मिलता है.. हर पल ब्रेकिंग न्यूज की तलाश.. प्रतिद्वंदी चैनल से हर हाल में आगे रहने की कोशिश.. ओबी प्लेसमेंट से लेकर रिपोर्टर्स की मूवमेंट तक..

जिंदगी की रफ्तार बढ़ जाती है.. और स्पीड कुछ इस कदर होती है कि ज्यादा सोचने समझने का वक्त ही नहीं मिलता है.. लेकिन अन्ना के आंदोलन को दुर्भाग्य से लॉंग शॉट में देखने का मौका मिला.. हुआ कुछ यूं कि 16 अगस्त को सुबह जब दिल्ली पुलिस अन्ना को मयूर विहार से गिरफ्तार कर ले जा रही थी, उस दौरान मैं वहीं था.. अन्ना की गाड़ी के आगे वॉकथ्रू करते वक्त मैं कुछ ज्यादा ही एंबिसिएस हो गया… गाड़ी को सादी वर्दी में दिल्ली पुलिस के जवानों ने घेरा हुआ था.. मैं उनके घेरे को तोड़कर अन्ना के सामने अपनी गनमाइक लगाना चाह रहा था.. तभी एक पुलिसवाले ने मुझे जोर का धक्का दिया.. मेरा पैर बुरी तरह से मुड़ा और मै रिटायर हर्ट हो गया.. पैर में हेयर लाइन फ्रैक्चर हो गया है और मैं पिछले तीन दिनों से घर में बैठकर बस न्यूज चैनल देख रहा हूं..

ये सब देखने के बाद मुझे देश के क्रांतिकारी संत विवेकानंद की एक बात याद आ रही है.. उन्होंने एक बार कहा था कि इस दुनिया में अच्छा या बुरा जो भी है, वो सब संक्रामक है… देखा जाए तो इस वक्त देश अन्ना के संक्रमण से बुरी तरह से ग्रस्त है.. कहा जाय तो देश पर अन्ना का बुखार चढ गया है.. हर उम्र.. हर वर्ग.. और हर तबके के लोग ”मी अन्ना हजारे” की टोपी पहने नजर आ जाएंगे.. भावनाओं के इस भयंकर तूफान के बीच मैं पूरे होशो हवाश में ये कहना चाहता हूं कि – मैं अन्ना हजारे से सहमत नहीं हूं.. मै जानता हूं कि मेरी तरह सोचने वाले बहुत लोग हैं.. हां, वो तिहाड़ और इंडिया गेट पर नजर नहीं आ रहे हैं.. और ना ही रामलीला मैदान में दिखेंगे.. लेकिन उनकी संख्या अन्ना के साथ नजर आने वाले लोगों से बहुत ज्यादा है..

यहां एक बात साफ कर देना बहुत जरूरी है कि- ”मैं अन्ना हजारे नहीं हूं”, इसका मतलब ये कत्तई नहीं है कि मैं उन्हें नापसंद करता हूं.. उनका जीवन, उनकी जीवनशैली निश्चित तौर पर अनुकरणीय है.. 74 साल के इस जवान की उर्जा पर रस्क होता है.. जब कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी उन्हें तुम कहते हैं तो गु्स्सा मुझे भी आता है.. मनीष के उस बयान की जितनी भी निंदा की जाए कम है… मैं भी शिद्दत से यह मानता हूं कि जिस बदलाव की बात किशन बाबू राव हजारे उर्फ अन्ना कर रहे हैं वो हिंदुस्तान की सबसे बड़ी जरूरत है.. लेकिन मैं इस बात से कत्तई सहमत नहीं हूं कि वो बदलाव इस तरीके से हो सकता है.. पहली बात तो ये है कि ये विरोध प्रदर्शन है.. इसे क्रांति समझने की बेवकूफी नहीं करना चाहिए..

और दूसरी बात ये कि ये हिंदुस्तान है.. मिस्र नहीं.. हम एक मजबूत लोकतंत्र हैं.. इमरजेंसी के बाद जनता ने इंदिरा गांधी को दिखा दिया है कि इसके मूलभूत ढांचे से छेड़छाड़ करने वालों का हश्र क्या होता है.. मेरी समझ से भावनाओं के ज्वारभाटा में कुछ हजार लोगों के बह जाने से इतिहास नहीं बदले जाते.. और अगर आपकी बिल्डिंग के कुछ दीवारों में हेरफेर कर काम चल सकता है तो पूरी बिल्डिंग को गिराने का जोखिम नहीं उठाना चाहिए.. और ना ही हमें उन लोगों के हाथों का हथियार बनना चाहिए जो सिर्फ इसलिए पुरानी बिल्डिंग को गिराना चाहते हैं क्योंकि उनका नाम और चेहरा भी इतिहास के आइने में दिखाई पड़े.. अन्ना बड़े हैं.. बुजुर्ग हैं.. उन्होंने बहुत सी लड़ाइयां लड़ीं हैं.. लेकिन यहां सवाल देश के सवा सौ करोड़ लोगों का है..

कुछ हजार लोगों का रेला औऱ कुछ सो कॉल्ड सोफेस्टिकेटेड लोगो की रहनुमाई में देश के भविष्य को नहीं सौंपा जा सकता है… पहला सवाल तो ये है कि आखिर सवा सौ करोड़ लोगों के लिए फैसला करने का हक आखिर सिविल सोसाइटी के इन आठ लोगों को किसने दिया.. दूसरी बात ये है कि अगर इस जनलोकपाल के दायरे में पटवारी से प्रधानमंत्री तक आ जाते हैं.. न्यायपालिका को भी इसके भीतर रख दिया जाता है तो हम क्यों अन्ना की इस बात पर यकीन कर लें कि जनलोकपाल का जो प्रतिनिधि होगा वो दूध का धुला हुआ होगा..

अन्ना भले ही जनलोकपाल से 60-65 फीसदी भ्रष्टाचार खत्म करने की गारंटी दे रहे हों, लेकिन मेरी समझ से इससे भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा.. बस उसका केंद्र बदल जाएगा.. हमे नहीं भूलना चाहिए कि महात्मा गांधी ने कहा था कि स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस को भंग कर देना चाहिए.. उनका सबसे बड़ा सपना था आखिरी आदमी तक सरकार और सहायता पहुंच सके.. लेकिन आजादी के 65 साल बाद भी ऐसा नहीं हुआ.. आज शायद लोगों पर अन्ना का संक्रमण इसलिए हो गया है क्योंकि भ्रष्टाचार से जूझ रहे देशवासियों को अन्ना आजादी के 65 साल बाद करप्शन से 65 फीसदी आजादी दिलाने की गारंटी दे रहे हैं.. मेरा सवाल बस यही है.. इस गारंटी पर हमें यकीन क्यों करना चाहिए..

हो सकता है कि अन्ना संत पुरुष हों.. पहली नजर में वो ऐसा दिखते भी है.. लेकिन जिन लोगों के हाथ जनलोकपाल की कमान होगी.. वो सब क्या अन्ना जैसे होंगे.. क्या लोकतांत्रिक ढांचे में किसी को इस कदर ताकतवर बना देना ठीक है.. अगर किसी को इतना ताकतवर बना दिया जाए तो क्या गारंटी है कि वो भ्रष्ट नहीं होगा.. जॉर्ज बर्नांड शॉ की एक लाइन जो मुझे बहुत पसंद है.. और कई केस में मैंने इसकी सच्चाई को महसूस भी की है.. उन्होंने कहा था कि – सत्ता और शक्ति सबको एक जैसा बना देती है… हमें क्यों यकीन करना चाहिए कि जनलोकपाल की सत्ता जिसके हाथ होगी, वो महात्मा गांधी जैसा होगा.. और अगर उसने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया तो सोचिए हालात कितने बदतर हो जाएंगे.. ये जनसैलाब और जनसमर्थन ऐसा नहीं है कि देश में ऐसा पहली बार किसी को मिल रहा है..

मैं तो उस समय पैदा भी नहीं हुआ था.. लेकिन उस दौर के लोगों से सुनकर और पढ़कर जो समझ बनती है उससे तो यही साबित होता है कि जेपी का आंदोलन इससे कहीं ज्यादा बड़ा था, लेकिन उसका हश्र भी हिंदुस्तान ने देखा है.. जेपी के सिपहसालारों का सत्ता की मलाई के लिए लड़ाई सबके सामने हैं.. यही नहीं, जेपी की यूनिवर्सिटी से निकल कर आए बड़े बड़े लोगों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे.. जेपी के कुछ चेलों को तो जेल जाना पड़ा.. संपूर्णक्रांति अधूरी रह गई.. गलती जेपी की नहीं थी.. उनकी सोच तो बड़ी पाक थी..

लेकिन ये सत्ता ऐसी सुंदरी का नाम है जिसके सामने बड़े बड़े विश्वामित्र बिछ जाते हैं.. इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है कि आजाद हिंदुस्तान में लोकतंत्र की सबसे बड़ी गुनहगार इंदिया गांधी की बहू आज देश की सबसे ताकतवर शख्सियत हैं.. वही इंदिरा गांधी जिन्हें देश की जनता ने इमरजेंसी के बाद औकात दिखा दी थी.. और आज अगर देश के लोगों ने सत्ता कांग्रेस के हाथों सौंप रखी है तो इसका मतलब ये है कि जनता सबको समझ चुकी है.. विकल्प के तौर पर कोई खरा नहीं उतर पाया.. ना जेपी की सोच.. ना वीपी सिंह का आंदोलन.. ना दलितों और शोषितों की मशाल लेकर चलने का दावा करने वाले क्षेत्रीय क्षत्रपों की समझ… खैर, अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि किया क्या जाए..

जरा गौर कीजिए, अन्ना की इस आंधी में कुछ तस्वीरें ऐसी हैं जो धुंधली पड़ गई हैं.. जरा उन्हें गौर से देखिए.. सौमित्र सेन का हटाया जाना.. आजाद देश की अपने तरह की अनोखी घटना है.. कर्नाटक से यदियुरप्पा का जाना.. ये दो ऐसी घटनाएं हैं जो साबित करती हैं कि हमारे पास जो कानून है, उसे मजबूती से लागू करने वाला चाहिए.. लोकपाल भी धारदार हो सकता है, कर्नाटक उसका उदाहरण है.. मेरी समझ से जनलोकपाल से कुछ नहीं होगा… जिस शख्स के हाथ में सत्ता होती है..उसकी नीयत कैसी है.. सबकुछ इसी पर निर्भर करता है.. नहीं तो टीएन शेषन से पहले चुनाव आयोग की हैसियत क्या थी.. ये सबको पता है..

हम अगर गौर से देखें तो तस्वीर इतनी भी बुरी नहीं है.. हमारा समाज बेहतर बनता जा रहा है.. हां स्पीड को लेकर सवाल हो सकता है.. जरूरत है स्पीड बढाने की लेकिन रफ्तार इतनी भी नहीं होनी चाहिए कि हम उस पर काबू ही ना कर पाए.. इसमें कोई शक नहीं कि अन्ना ने जनआंदोलन खड़ा किया है.. भ्रष्टाचार पर बड़ी बहस शुरू की है.. तिहाड़ से निकलने के बाद अन्ना के साथ जो जनसैलाब उमड़ पड़ा है उसकी बेचैनी को समझना पड़ेगा..

आज के दौर में देश में कोई हीरो नहीं है.. युवाओं के सामने कोई आदर्श नहीं है.. हमारे बेचैन नौजवानों को अन्ना में हीरो नजर आ रहा है.. जो चौहत्तर साल की उम्र में एक सोच और समझ के साथ तनकर खड़े होने की हिमाकत करता है.. सरकार की नाक में दम कर देता है.. युवाओं को इंकार से भरी चीख.. आंदोलन की भाषा आकर्षित करती है.. हम हिंदुस्तानी भावनाओं में बहुत जल्दी बह जाते हैं.. लेकिन समझदारी ये कहती है कि भावनाओं से भविष्य नहीं बदला जा सकता है.. हमें सोचने की जरूरत है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हम भावनाओं में बहकर इस्तेमाल हो रहे हैं.. अगर 65फीसदी करप्शन हटाने की गारंटेड योजना लेकर बाजार में निकले अन्ना हजारे के जनलोकपाल ने इन युवाओं को निराश किया तो क्या होगा.. आने वाले सालों में यही सबसे बड़ा सवाल बनने वाला है…

लेखक आरसी शुक्ला वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं.

हमारे प्रस्तावों की सरलता ही हमारी दिक्कत है – अनिल बोकिल

अनिल बोकिल
अनिल बोकिल
: बातचीत : ‘अपनी आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह भी चोरी है।’ गांधीजी की इस उक्ति को अपने जीवन में अक्षरश: उतारने वाले अनिल बोकिल, 175 लाख करोड़ के घोटालों के युग में एक अजूबे की तरह हैं। उनसे फोन पर दिनेश चौधरी की हुई लंबी बातचीत के संपादित अंश यहां प्रस्तुत हैं:

  • ‘अर्थक्रांति’ का विचार मन में कैसे आया?

– योजनाबद्ध तरीके से तो नहीं आया। यह भी नहीं कह सकते कि अचानक कहीं से कोई प्रेरणा हासिल हुई हो। बस एक बार मन में यह विचार आया तो इस पर आगे बढ़ते गये। कुछ मित्रों से बात की और बहुत जल्दी ही पूरा ढांचा तैयार हो गया।

  • क्या आपको लगता है कि जनलोकपाल की तरह केवल ‘अर्थक्रांति’ से भ्रष्टाचार पर नकेल कसी जा सकती है?

लोकपाल का सरोकार एक कानून से है जो वर्तमान व्यवस्था में भ्रष्टाचारियों को दण्डित कर पायेगा। हमारा मानना यह है कि अगर किसी व्यवस्था में खामी है तो आप कितने भी कड़े कानून क्यों न बना लें, इन सब बुराइयों से नहीं बच सकते। लेकिन यदि आपकी व्यवस्था ही सुधर जाये तो आपको किसी कानून की जरूरत नहीं होगी। आप इसे इस तरह भी समझ सकते हैं कि फर्ज कीजिये की हमारी अर्थ-व्यवस्था मकान की छत पर बनी पानी की एक बड़ी टंकी है, जहां से हमारी जरूरतें पूरी हो रही हैं। इस टंकी में रिसाव के कारण पानी कहीं और इकट्‌ठा हो रहा है, जिसे हम ”पैरेलल इकानॉमी” या समानांतर अर्थव्यवस्था कहते हैं। अब यह जो गंदे पानी का जमाव है, उसी से मच्छरों की पैदावार बढ़ रही है। लोकपाल का काम इन मच्छरों को मारने का होगा पर आप बतायें कि कितने मच्छरों को मारा जा सकता है? अर्थक्रांति का उद्देश्य उस रिसाव को ही बंद कर देना है जो इनको पनपने की सहूलियत प्रदान करता है।

  • बड़े नोटों को वापस लेने संबंधी बाबा की मांग का आपने विरोध किया था?

बाबा ने मांग आधे-अधूरे ढंग से उठायी थी। उनके आंदोलन का समर्थन करते हुए हमने कहा था कि बड़े नोटों को वापस लेने की मांग अर्थक्रांति के मूल-प्रस्तावों को दरकिनार करते हुए अकेले नहीं उठायी जा सकती और ऐसा करना देश को एक बड़े संकट की ओर धकेलना है। किसी रोग के निदान के लिये यदि मरीज का कोई बड़ा ऑपरेशन करना हो तो उसे कुछ आवश्यक तैयारियों से गुजरना होता है। बाबा की मांग इन तैयारियों के बगैर मरीज के बड़े ऑपरेशन जैसी खतरनाक थीं। हालांकि उनके मन में भी यह खयाल कोई तीन साल पहले हमारा प्रेंजेटेशन देखने के बाद ही आया था और इसके बाद वे अपनी प्रत्येक सभा में बड़े नोटों को वापस लेने की मांग के बारे में कहते थे। ये बात और है कि उन्होंने कभी ‘अर्थक्रांति’ का जिक्र नहीं किया।

  • क्या इन्हीं वजहों से ‘अर्थक्रांति’ के पेटेंट की आवश्यकता महसूस हुई?

नहीं। हम ‘वसुधैव कुटुंबकम्‌’ की अवधारणा पर विश्वास करते हैं और हमारा मानना है कि अर्थक्रांति का कॉपीराइट न सिर्फ देश की कोई 120 करोड़ जनता का है, बल्कि पूरी दुनिया के पास है। पेटेंट लेने की आवश्यकता इसलिए महसूस हुई कि अमेरिका सहित कुछ अन्य देश इस तरह के प्रस्तावों को लेकर आगे बढ़ रहे हैं और भविष्य में इन्हें अपने देश में लागू करने में कोई दिक्कत नहीं आये। बल्कि ‘ग्लोबल वार्मिंग’ व आतंकवाद जैसी विश्वव्यापी समस्याओं से निपटने के लिये हमने अपने प्रस्तावों में 0.1 फीसदी ‘ग्लोबल टैक्स’ देने का भी प्रावधान रखा है, जो प्रस्तावों के लागू होने पर बहुत आसानी से दिया जा सकता है।

  • क्या किसी ने इन प्रस्तावों का विरोध किया है?

इनाम-इकराम की व्यवस्था करते हुए हमने लोगों को प्रेरित किया है कि आप इन प्रस्तावों में तार्किक अथवा तकनीकी खामियां निकाल दें। राष्ट्रपति से लेकर मंत्रियों, पूर्व मंत्रियों, सांसदों व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इन्हें देखा है और अभी तक किसी ने इस पर सवालिया निशान नहीं लगाया है। या हमारे सामने कोई ऐसा सवाल अभी तक नहीं आया, जिसका हम जवाब न दे सके हों।

  • फिर इसे लागू करने में दिक्कत क्या है?

इच्छाशक्ति की कमी। हमारा पूरा प्रस्ताव एक तरह का ‘टैक्नीकल करैक्शन’ है और पूरी तरह से संवैधानिक ढांचे के अंदर है। सरकार चाहे तो इसे छः महीनों में लागू कर सकती है। हमारे प्रस्तावों के साथ एकमात्र दिक्कत यह है कि ये बेहद सरल हैं और हमारे देश के लोग अब अपने अनुभवों के कारण थोड़े शंकालु हो गये हैं। उन्हें लगता है कि क्या इतनी सरलता के साथ इतनी बड़ी व्यवस्था को बदला जा सकता है?

एक भले लोकतंत्र की कीमत

पाठकों को थोड़ी-सी हैरानी हो सकती है कि ‘अर्थक्रांति’ ने आर्थिक प्रस्तावों को रखते हुए लोकतंत्र की समुचित सेहत का भी ध्यान रखा है। यह बात जगजाहिर है कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में समानांतर अर्थ-व्यवस्था की बड़ी भूमिका होती है। जब साधन ही दूषित हो जायें तो साध्य पवित्र नहीं हो सकता और चुनावों के बाद ऐसे स्रोतों को उपकृत करने की परंपरा तो होती ही है।

लिहाजा ‘अर्थक्रांति’ ने पंजीकृत राजनीतिक दलों के लिये निर्धारित न्यूनतम प्रतिशत से अधिक मात्रा में मिलने वाले वोटों के अनुपात में अनुदान की व्यवस्था रखी है। प्रस्तावों के अनुसार एक भले लोकतंत्र की कीमत यहां के प्रत्येक नागरिक को 5 साल में एक बार 100 रुपये देकर चुकानी पड़ेगी, लेकिन यह पैसे अलग से नहीं वसूले जायेंगे बल्कि उसी राजस्व वसूली का हिस्सा होंगे जो ‘अर्थक्रांति’ प्रस्ताव के तहत बैंक-कटौती के माध्यम से आयेंगे। वर्तमान में उपलब्ध आंकड़ों के तार्किक विश्लेषण के बाद लोकसभा चुनावों के लिये यह राशि कोई 6900 करोड  रुपयों की होती है।

किसी भी पंजीकृत राजनीतिक दल को 5 फीसदी से कम वोट मिलने पर कोई अनुदान नहीं दिया जायेगा। यदि किसी राजनीतिक दल को 10 फीसदी वोट मिलते हैं तो उसे पांच साल में एक बार 690 करोड  रुपये चुनावी खर्च के लिये मिल पायेंगे। 30 फीसदी वोट मिलने पर यही राच्चि 2070 करोड  हो जायेगी। विधान सभा व स्थानीय निकाय के चुनावों के लिये भी अलग से गणना की गयी है।

इतना ही नहीं, चुने हुए जनप्रतिनिधियों के लिये “आकर्षक” भत्तों का भी प्रावधान रखा गया है। प्रस्तावों के तहत इनके लागू होने पर एक सांसद को 10 लाख, विधायक को 5 लाख, पार्षद को 1 लाख तथा ग्राम विकास अधिकारी को 10 हजार रुपयों का मासिक भत्ता भी मिल सकेगा।

इससे संबंधित इस आलेख को भी पढ़ें- अन्ना व बाबा के सवालों का सटीक जवाब है अर्थक्रांति

दिनेश चौधरीसाक्षात्कारकर्ता दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद भिलाई में एक बार फिर नाटक से लेकर पत्रकारिता तक की दुनिया में सक्रिय हैं. वे इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष भी हैं. उनसे संपर्क iptadgg@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

अन्ना व बाबा के सवालों का सटीक जवाब है ‘अर्थक्रांति’

दिनेश चौधरीछत्तीसगढ़ के एक छोटे-से कस्बे बालोद में स्थानीय महावीर विद्यालय का सभागार खचाखच भरा हुआ है। वातावारण में थोड़ी उमस भी है। व्याख्यान प्रारंभ हुए कोई दो घंटे हो चुके हैं, फिर भी लोगों की एकाग्रता भंग नहीं हुई है। मजे की बात यह है कि व्याख्यान किसी धर्मगुरु का नहीं है, जो सरस पौराणिक गाथायें सुनाकर श्रोताओं को बांधे हुए हो।

दरवाजे की झिरियों से जो शब्द छनकर बाहर आ रहे हैं वे अर्थशास्त्र की किसी उबाऊ, मोटी व ठस्स किताबों से लिये हुये लगते हैं। राजकोषीय घाटा, वित्तीय पूंजी, दोहरी कराधान प्रणाली और सकल घरेलू उत्पाद जैसे भारी-भरकम शब्द कानों से टकराते हैं और सुनने वाला सोचता ही रह जाता है कि इस गांव-गंवई की सभा में इतने सारे अर्थशास्त्री कहां से इकट्‌ठे हो गये हैं? जब तक वह अपनी जिज्ञासाओं को शांत करे, श्रोताओं के सारे सवालों का जवाब देने के बाद अतुल देशमुख अपने लैपटाप को समेटते हुए सभागार के बाहर निकलने लगते हैं, क्योंकि उनकी अगली सभा छत्तीसगढ  के ही एक अन्य नगर धमतरी में व दूसरे दिन भिलाई में हैं।

नागपुर के अतुल देशमुख पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट है और वे ‘अर्थक्रांति’ प्रतिष्ठान के कार्यकर्ता हैं। उनका व्याख्यान उस पावर पॉइंट प्रेजेन्टेशन का एक हिस्सा है जिसे पूर्व में महामहिम राष्ट्रपति, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी, वर्तमान व पूर्व वित्तमंत्री, विपक्ष के नेता, अनेक मंत्री-सांसदों  व आर्थिक मामलों के विशेषज्ञों समेत अन्ना के सहयोगी अरविंद केजरीवाल से लेकर बाबा रामदेव तक देख चुके हैं। किसी ने भी ‘अर्थक्रांति’ समूह के प्रस्तावों का नकारा नहीं है- उल्टे सराहना की है- पर इसे स्वीकार करने की दिशा में कोई गंभीरता नहीं दिखाई है। हालांकि समूह का मानना है कि ये प्रस्ताव, जिनका बाकायदा पेटेंट हासिल किया गया है, अगर सरकार स्वीकार कर लेती है तो न सिर्फ कालेधन व भ्रष्टाचार की समस्या से स्थायी निजात मिल सकेगी, बल्कि देश की जटिल कर प्रणाली में भी क्रांतिकारी बदलाव आयेगा और उद्यमी व व्यवसायी कराधान के झंझटों से मुक्त होकर देश के रचनात्मक विकास में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकेंगे। समूह का यह भी मानना है कि उनके प्रस्तावों के लागू होने पर नकली नोटों का चलन खत्म करने और फलस्वरुप आतंकी गतिवधियों में नकेल कसने में सहायता मिल सकेगी।

औरंगाबाद की एक सभा में अनिल बोकिल
औरंगाबाद की एक सभा में अनिल बोकिल

बाबा रामदेव ने अपने ‘अनशन’ के दौरान विदेशों में जमा कालेधन को वापस लाने के अलावा भी कुछ मुद्‌दे उठाये थे। इनमें से एक मुद्‌दा बड़े नोटों का चलन बंद करने का था। सरकार ने 3 जून की शाम को ही कह दिया की बाबा की यह मांग पूरी नहीं हो सकती और उन्होंने दोबारा कभी इस सवाल को उठाया भी नहीं। एकाध बार किसी टीवी रिपोर्टर ने जब इस मांग का ‘जस्टीफिकेशन’ मांगा तो बाबा इसका कोई संतोषजनक जवाब भी नहीं दे सके। गांधीवादी कार्यकर्ता तथा अर्थक्रांति आंदोलन के जनक श्री अनिल बोकिल ने बाबा की इस ‘आइसोलेटेड’ मांग का विरोध करते हुए कहा कि (देखें उनका इंटरव्यू) बाबा की आधी-अधूरी मांग देश के लिये खतरनाक है। इस मांग को अर्थक्रांति के मूल प्रस्तावों से अलग करके नहीं उठाया जाना चाहिये।

अर्थक्रांति प्रस्तावों की तह में जाने से पहले यह जान लेना दिलचस्प होगा कि इन प्रस्तावों के जनक श्री अनिल बोकिल आखिर हैं कौन, क्योंकि हिंदी पट्‌टी में अभी तक यह नाम कमोबेश अनसुना है। प्रस्तावों को देखकर किसी को भी ये भरम हो सकता है कि श्री अनिल बोकिल एक अर्थशास्त्री हैं। हकीकतन वे एक मेधावी मेकेनिकल इंजीनियर हैं और अपने पूरे करियर के दौरान अव्वल दर्जे पर आते रहे। पढ़ाई -लिखाई पूरी करने के बाद उन्होंने अपना उद्योग स्थापित किया जो देश की एक जानी-मानी ऑटो कंपनी को कुछ ऐसे सामानों की आपूर्ति करता था, जिसे पूर्व में आयात करना पड़ता था। दुर्योग से 90 के दशक में नरसिंहा राव की सरकार ने उदारीकरण के नाम पर जो नीतियां लागू की उससे औरंगाबाद के आस-पास उनके अनेक मित्रों के उद्योग तबाह हो गये व अनिल को भी भारी नुकसान सहना पड़ा। यद्यपि वे अपना कारोबार बचा सकते थे पर मित्रों को मिले झटके ने उन्हें बेहद व्यथित कर दिया। अर्थशास्त्र की बारीकियों से वे शायद इसी दौरान रू-ब-रू हुए होंगे, हालांकि वे स्वयं इस विषय में कोई बात नहीं करते। अनिल ने सड़क पर आ गये कोई एक सौ उद्यमियों से केवल एक -एक रुपये लेकर एक सहकारी संस्था प्रारंभ की और बैंक से 5 लाख रुपयों का लोन लेकर उन्हें नये सिरे से काम चालू करने के लिये प्रोत्साहित किया। आज उनके सारे सहयोगी गाड़ी व बंगले की हैसियत रखते हैं, पर अनिल ने कभी वापस मुड़ कर कारोबार की ओर नहीं देखा। वे अपना पूरा समय ‘अर्थक्रांति’ आंदोलन को देते हुए न्यूनतम खर्च पर गुजारा करते हैं और उनके साथियों का कहना है वे इतने सादगी-पसंद हैं कि नये कपड़ों व जूते-चप्पलों तक से परहेज करते हैं।

धमतरी (छत्तीसगढ़) की एक जनसभा में अतुल देशमुख
धमतरी (छत्तीसगढ़) की एक जनसभा में अतुल देशमुख

देश की अर्थव्यवस्था में क्रांति के लिये इस आंदोलन ने लंबी छान-बीन, शोध व कड़ी मेहनत के बाद कुल पांच प्रस्तावों को विचार के लिये देश के सामने रखा है। आंदोलन के कार्यकर्ताओं का दृढ  विश्वास है कि इन प्रस्तावों के लागू होने पर न सिर्फ भ्रष्टाचार, काला धन व बेकारी-बरोजगारी जैसी समस्याओं से निजात मिल सकेगी, वरन्‌ भारत के लिये आर्थिक महाशक्ति बनने का मार्ग भी प्रशस्त हो सकेगा। मजे कि बात तो यह है कि इन प्रस्तावों में वैश्विक समस्याओं के लिये ‘ग्लोबल टैक्स’ देने और देश के भीतर राजनीतिक दलों को चुनावी खर्चों के लिये अनुदान देने की व्यवस्था भी रखी गयी है।

जनतंत्र बनाम करतंत्र

‘अर्थक्रांति’ मौजूदा कर प्रणाली को सिरे से खारिज करती है। श्री अनिल बोकिल कहते हैं कि यह व्यवस्था किसी भी ईमानदार व्यक्ति को अपनी ईमानदारी त्याग देने के लिये उकसाती है। भारत की अर्थव्यवस्था व इसके इतिहास की गहरी समझ रखने वाले आदिलाबाद के श्री रवीन्द्र शर्मा का मानना है कि मौजूदा कर व्यवस्था औपनिवेशिक शासनकाल की उन्हीं नीतियों का विस्तार है जो जानबूझकर किसी व्यक्ति को बेईमान बनाता है ताकि उसे राजसत्ताओं के समक्ष आसानी से झुकाया जा सके। रायपुर के व्यवसायी शेखर वर्मा कहते हैं कि कर वसूली की वर्तमान प्रक्रिया इतनी अराजक है मानों राह चलते किसी भले आदमी के पीछे लुटेरों व पिंडारियों के गिरोह को छोड़  दिया गया हो। उसका सारा ध्यान सही राह की तलाश में – अपने प्रोडक्ट की डिजाइन व गुणवत्ता सुधारने में नहीं-बल्कि इस बात में लगा होता है कि इन पीछे लगे हुए लोगों से कैसे बचा जाये? शेखर की इस बात में इसलिए भी दम लगता है कि इस समय देशभर की विभिन्न अदालतों में केवल आयकर के 30 लाख मुकदमें लंबित हैं। अंदाजा लगाया जा सकता है कि जन व तंत्र का कितना समय, कितनी ऊर्जा इस कार्य में जाया हो रही है।

ईमानदार या भले आदमी की बात तो छोड़ ही दें, किसी विशेषज्ञ कर सलाहकार को भी ठीक-ठीक यह पता नहीं होता कि देश भर में कुल कितने प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कर हैं जो केंद्र सरकार, राज्य सरकार व स्थानीय निकायों द्वारा लिये जाते हैं। कब, कहां, कितना कर किस तरह दिया जाना है, इसको लेकर हमेशा एक अनिश्चय की स्थिति बनी रहती है। गौरतलब है कि इस समय केंद्र व राज्य सरकारों को होने वाली राजस्व आय में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष करों का अनुपात 34 : 66 है। एक आदर्श कर व्यवस्था में समानता का तत्व बेहद महत्वपूर्ण होता है और यह समानता तभी आ सकती है जब प्रत्यक्ष-कर वसूली अप्रत्यक्ष-कर की तुलना में ज्यादा हो। यहां यह उल्लेख करना असंगत न होगा कि आयकर व संपत्ति कर जहां प्रत्यक्ष करों में आते हैं वहीं वस्तुओं व सेवाओं पर लगने वाले कर -जो देश के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होते हैं- अप्रत्यक्ष करों की श्रेणी में आते हैं। यानी एक लीटर पेट्रोल लेने पर एक ऑटो रिक्शा चालक को भी उतना ही कर चुकाना पड़ता है जो मुकेश अंबानी को या महेंन्द्र सिंह धोनी को देना पड़ता है। यहां तो समता के सिद्धांत की हवा ही निकल जाती है।

दूसरी ओर सरकार बार-बार यह कहती रही है कि उसने बाजार को एक स्वस्थ प्रतियोगिता के लिये पूरी तरह से खोल दिया है। यहां गौर करने की बात यह है कि बाहर की कंपनियां तो अपनी सरकारों की सहूलियतों के पंख लेकर आ रही हैं पर भारत सरकार ने अपनी कंपनियों के पैरों पर करों का बोझ लाद दिया है। ऐसे माहौल में ‘स्वस्थ प्रतियोगिता’ की बात भी करना एक तरह का मानसिक दिवालियापन है। अर्थक्रांति का मानना है कि आज के माहौल में यदि आपको प्रतियोगिता में खड़ा होना है तो 1 प्रतिशत का कर भी बहुत ज्यादा है। उसके अनुसार देश में जमीन हड़पने वाले छोटे-छोटे ‘सेज’ (Special Economic Zone) की जरूरत नहीं है, बल्कि पूरे देश को ‘सेज’ घोषित करने की जरूरत है और केवल आयात शुल्क को छोड़ कर सारे कर वापस ले लिये जाने चाहिये तथा कर वसूली से संबंधित इन सभी महकमों को बंद कर दिया जाना चाहिये। गौरतलब है कि कर-चोरी कर जमा की गयी राशि ही काला धन कहलाती है, इसलिए जब कर ही नहीं होगा तो काला धन कहां से आयेगा?

कमाई बिन कर

सरकार यदि कर वसूली ही बंद कर दे तो उसकी राजस्व आय का क्या होगा? अर्थक्रांति के इस प्रस्ताव का सारा दारोमदार बैंकिंग व्यवस्था पर टिका हुआ है जो आंदोलन की निगाह में अब तक काफी विश्वसनीय रहा है। आंदोलन के इस प्रस्ताव के अनुसार समस्त प्रकार के करों के वापस ले लिये जाने के एवज में बैंक में किसी भी खाते में पैसे जमा करने के दौरान सीधे-सीधे खातेदार से जमा की गयी रकम का 2 फीसदी काट लिया जाये। 2 फीसदी का यह आंकडा आगे चलकर और भी कम हो सकता है तथा ‘अर्थक्रांति’ का यही प्रस्ताव एक तरह से तुरूप का इक्का है।

अपने इस प्रस्ताव के समर्थन में आंदोलन ने कर वसूली के आंकड़ों, बैंकिंग कामकाज, केंद्र व राज्य सरकारों सहित विभिन्न स्थानीय निकायों की राजस्व आय तथा अन्य प्रासंगिक तथ्यों की गहरी छानबीन करते हुए सरकार की वर्तमान राजस्व आय व संभावित-प्रस्तावित आय का तुलनात्मक ब्यौरा प्रस्तुत किया है, जो कि वास्तव में चौंकाने वाला है। अधिकृत आंकडों का हवाला देते हुए आंदोलन ने बताया है कि वर्ष 2009-10 के लिये भारत सरकार के बजट अनुमानों के अनुसार केंद्र व राज्य सरकारों की संयुक्त राजस्व आय 10,26,460 करोड  रुपये थी। एकत्र किये गये विभिन्न आंकडों के आधार पर यदि इसमें स्थानीय निकायों के 75,000 करोड  रुपयों की आय जोड़  दी जाये तो मोटे तौर पर कुल आय 11 लाख करोड  रुपये होती है।

‘अर्थक्रांति’ यहां पर तस्वीर का दूसरा पहलू देखने का आग्रह करती है। वे कहते हैं कि आप प्रतिदिन बैंक में जमा होने वाली राशि को फिलहाल छोड़ दें जो व नगद व मांग-जमा पर आधारित होती है। नेशनल फंड ट्रांसफर, इलेक्ट्रानिक क्लीयरिंग सिस्टम और मोबाइल ट्रांसफर के मामले भी दरकिनार कर दें। केवल आर.टी.जी.एस. के मामले को उदाहरण के तौर पर अपने जेहन में रखें, जिसके प्रतिदिन औसतन 60,000 लेन-देन से 2 लाख 70 हजार करोड  रुपयों का अंतरण होता है। गणना की सुविधा के लिये इसे और भी घटाकर 2 लाख 50 हजार करोड  रुपये कर दिये जायें तो इसका 2 फीसदी 5 हजार करोड़  होता है। 5 हजार करोड़ की यह आय केवल एक दिन की होगी। अब यदि बैंक अवकाश व रविवार के दिनों को निकालते हुए मोटे तौर पर केवल 300 दिनों को गणना में लिया जाये तो सरकार की आय 15 लाख करोड  रुपये होगी, जो कि वर्तमान आय से 4 लाख करोड  रुपये अधिक है। वह भी तब जब जमा व अंतरण के अन्य मामलों को शामिल नहीं किया जा रहा है और समूची राशि बगैर भागदौड़ के बैठे-बिठाये आ रही है।

‘अर्थक्रांति’ ने इस 2 फीसदी वसूली के तार्किक वितरण का भी प्रस्ताव रखा है, जिसके अनुसार 0.7 फीसदी राशि केंद्र को, 0.6 फीसदी राशि राज्यों को व 0.35 फीसदी राशि स्थानीय निकायों के हिस्से में जायेगी। सेवा के बदले में बची हुई 0.35 फीसदी राशि बैंकों लिये रखी जायेगी क्योंकि इनका कामकाज कई गुना बढ़ जायेगा। इसी राशि से बैंक की अनेक शाखाओं का विस्तार भी होगा और कर वसूली के महकमों के बंद होने से रोजगार के अवसरों में जो कमी आयेगी उसकी क्षतिपूर्ति हो जायेगी। ‘अर्थक्रांति’ का अनुमान है कि नगद जमा व अंतरण के अन्य मामलों को विचार में लिये जाने के बाद 2 फीसदी की प्रस्तावित कटौती और भी घटकर केवल 1 फीसदी रह जायेगी।

बड़े नोट की बड़ी मुसीबतें

जैसा कि पूर्व में जिक्र किया जा चुका है बड़े नोटों को वापस लेने की जो मांग बाबा रामदेव ने उठायीं थीं, दरअसल वे ‘अर्थक्रांति’ से ही प्रेरित थीं। अनिल बोकिल कहते हैं कि पैसे केवल विनिमय का माध्यम हैं, कमोडिटी नहीं हैं और इसके कमोडिटी में बदलने के अवसर तब ज्यादा होते हैं जब वे आपकी जेब में पड़े होते हैं। इसीलिये एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था के लिये नगद मुद्रा सदैव बैंक मुद्रा से कम होनी चाहिये, लेकिन वर्तमान परिद्श्य इसके ठीक विपरीत है और 8,32,414 करोड  की नगद मुद्रा के मुकाबले बैंक मुद्रा केवल 6,38, 373 करोड़ है। इसका एक बड़ा कारण अधिक मूल्य वाले नोट हैं।

अतुल देशमुख कहते हैं कि बड़े नोट बड़ी रिश्वत के लिये सुविधाजनक होते हैं। रोजमर्रा की खरीदारी के लिये तो नोटों की उपयोगिता समझ में आती है पर बड़े नोटों के होने से करोड़ों के वारे -न्यारे हो जाते हैं और सरकार के हाथ कुछ नहीं लगता।यह भ्रष्टाचार के अलावा देश में आतंकवाद को भी बढ़ावा दे रहे हैं। पिछले दिनों में ऐसे कई मामले सामने आये हैं, जिनमें सीमा पार से नकली नोटों के आने की पुष्टि हुई है। अतुल कहते हैं कि 50 रुपयों से लेकर 1000 रुपयों तक एक नोट को छापने का औसत खर्च लगभग 40 रुपये है। इसलिये यदि  कोई 1000 रूपये का नोट छापता है तो उसे बड़ी आसानी से कमीशन देने के बाद भी एक मोटी रकम मिल जाती है। लेकिन यदि बड़े नोटों को बंद कर दिया जाये तो 40 रुपये के खर्च पर भला कोई 50 रुपये का नोट क्यों छापेगा?

लोगों का दूसरा तर्क होता है कि बड़े नोटों के बगैर लेन-देन किस तरह होगा? अतुल कहते हैं कि यह सरकार के ही आंकड़ें हैं कि इस देच्च में 84 फीसदी लोगों की रोज की आय 20 रुपये से भी कम है, ऐसे में केवल 16 फीसदी लोगों के लिये, जो बैंकिंग व्यवस्था से भलीभांति अवगत हैं, बड़े नोट छापने की क्या आवश्यकता है? इसीलिये अर्थक्रांति का प्रस्ताव है कि 50 रुपये के नोट को छोड कर बाकी बड़े नोट बंद कर दिये जायें, नगद लेन देन की अधिकतम सीमा रुपये 2000 हो, इस लेन-देन पर कोई कर नहीं लगाया जाये तथा इससे ज्यादा राशि के नगद लेन-देन पर कोई कानूनी संरक्षण न हो।

प्रस्तावों को लेकर अनेक लोगों की अनेक जिज्ञासायें होतीं हैं, जिसे आंदोलन ने विभिन्न माध्यमों से सार्वजनिक कर दिया है। वे अपने वेब-ठिकाने के माध्यम से भी प्रतिदिन लोगों से रू-ब-रू हो रहे हैं। महाराष्ट्र में यह आंदोलन काफी जोर पकड़ चुका है। भीलवाड़ा में सामाजिक कार्यकर्ता सुनील आगीवाल इस आंदोलन से इतने प्रभावित हैं कि वे लोगों को मुफ्त में इसकी सीडी बांटने के कार्य में लगे हुए हैं तथा उनकी योजना पूरे राजस्थान में ‘अर्थक्रांति के व्याखयान आयोजित करने की है। छत्तीसगढ  में सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश सोनी ने बाकायदा व्याख्यान की ट्रेनिंग हासिल कर लोगों के बीच जाना शुरू कर दिया है। हिंदी पट्‌टी में बाकी स्थानों पर अभी यह काम होना है।

अन्ना हजारे इस व्यवस्था के भ्रष्ट लोगों की नाक में नकेल कसने की कोशिश में लगे हैं, जबकि अनिल बोकिल चाहते हैं कि व्यवस्था ऐसी हो जहां इन सब की संभावना ही न हो। उम्मीद की जानी चाहिये कि इन सभी की मिली-जुली कोशिशें एक दिन रंग लायेगी।

अनिल बोकिल से दिनेश चौधरी की बातचीत पढ़ने के लिए क्लिक करें- हमारे प्रस्तावों की सरलता ही हमारी दिक्कत है : अनिल बोकिल

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद भिलाई में एक बार फिर नाटक से लेकर पत्रकारिता तक की दुनिया में सक्रिय हैं. वे इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष भी हैं. उनसे संपर्क iptadgg@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

क्या स्विस बैंक में सबसे ज्यादा धन नीरा राडिया ने जमा कर रखा है?

फेसबुक पर अमित मोदी नामक एक मीडियाकर्मी ने एक खुलासा किया है. उन्होंने इस खुलासे में यह तो कहीं नहीं लिखा है कि उनकी जानकारी का आधार, स्रोत क्या है पर उन्होंने जो कुछ बताया है, वह अगर सच है तो बहुत सनसनीखेज है. उन्होंने फेसबुक वालों को इस बात की मुबारकबाद दी है कि स्विस बैंक में काला धन जमा करने वालों का नाम व राशि का पता लग चुका है.

अमित मोदी ने इसी के साथ नामों और राशि का भी खुलासा कर दिया है. इसमें बताया गया है कि सबसे ज्यादा पैसा नीरा राडिया ने स्विस बैंक में जमा कर रखा है. कुल नौ लोगों का नाम है, जिसमें ए. राजा, कलमाडी समेत लालू, राजीव गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया आदि हैं. अमित मोदी के बारे में जब उनके फेसबुक एकाउंट से जानकारी ली गई तो पता चला कि वे जी न्यूज में कार्यरत हैं. मतलब, मीडिया के आदमी हैं.

तो, इससे यह पता चलता है कि यह सूचना कहीं से उन्हें पता चली है. पर उन्होंने स्रोत का खुलासा नहीं किया है. और, अगर उन्होंने सूचना को फेसबुक जैसी पब्लिक जगह पर शेयर किया है तो यह भी सच है कि उन्हें इस सूचना के पुख्ता होने का पूरा भरोसा है. नीचे हम अमित मोदी के फेसबुक स्टेटस और आए कमेंट्स का स्क्रीनशाट लेकर प्रकाशित कर रहे हैं. अगर आपको इस सूचना और इसके स्रोत के बारे में कुछ जानकारी हो तो हमें जरूर सूचित करें, bhadas4media@gmail.com पर मेल करके या फिर नीचे दिए गए कमेंट बाक्स में कमेंट करके. -एडिटर, भड़ास4मीडिया

नेता खुश हुआ क्योंकि उसकी खींची लकीर पर मीडिया चल पड़ा

पुण्य प्रसून वाजपेयीमीडिया न हो, तो अन्ना का आंदोलन क्या फ़ुस्स हो जायेगा. मीडिया न होता, तो क्या रामदेव की रामलीला पर सरकारी कहर सामने आ नही पाता. और, सरकार जो खेल महंगाई, भ्रष्टाचार या कालेधन को लेकर खेल रही है, वह खेल बिना मीडिया के सामने आ नहीं पाता. पर जो कुछ इस दौर में न्यूज चैनलों ने दिखाया और जिस तरह सरकार ने एक मोड़ पर आकर यह कह दिया कि अन्ना की टीम संसद के समानांतर सत्ता बनाना चाहती है…

तो सवाल निकला कि अब आगे का रास्ता है क्या? और जो सरकार कहे और जो अन्ना की टीम कहे, इससे इतर न्यूज चैनल दिखायें क्या? यह सवाल अगर 14 बरस पहले कोई एसपी सिंह से पूछता, तो जवाब यही आता कि इसमें खबर कहां है? 1995 में आज तक शुरू करनेवाले एसपी सिंह ने माना, जो कैमरा पकड़े, वह तकनीक है. जो नेता कहे, वह सूचना है. और, इन दोनों के पीछे की जो कहानी पत्रकार कहे, वह खबर है. तो क्या इस दौर में खबर गायब है और सिर्फ़ सूचना या तकनीक ही रेंग रही है. अगर ईमानदारी की जमीन बनाने में भिड़े आंदोलनों के दौर को परखें, तो एसपी के मिजाज में अब के न्यूज चैनल क्या- क्या कर सकते हैं, यह तसवीर धुंघली ही सही, उभर तो सकती है.

इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि अन्ना के आंदोलन की जमीन आम-आदमी के आक्रोश से बनी और फ़ैल रही है, जिसमें संसद, सरकार की नाकामी है. इसमें मंत्रियों के कामकाज के सरोकार आम-आदमी से न जुड़ कर कारपोरेट और निजी कंपनियों से जुड़ रहे हैं. तो फ़िर मीडिया क्या करे? संसद में जनता के उठते मुद्दों को लेकर राजनीतिक दलों का टकराव चरम पर पहंचता है, तो न्यूज चैनलों को टीआरपी दिखायी देती है. टकराव खत्म होता है, तो किसी दूसरे टकराव की खोज में मीडिया निकल पड़ता है या फ़िर राजनेता भी मीडिया की टीआरपी की सोच के अनुसार टकराव भरे वक्तव्य देकर खुद की अहमियत बनाये रखने का स्क्रीनिंग बोल बोलते हैं, तो मीडिया उसे जश्न के साथ दिखाता है. नेता खुश होता है, क्योंकि उसकी खींची लकीर पर मीडिया चल पड़ता है और उन्माद के दो पल राजनीति को जगाये रखते हैं. हर पार्टी का नेता हर सुबह उठ कर अखबार यही सोच कर टटोलता है कि शाम होते-होते कितने न्यूज चैनलों के माइक उसके मुंह में ठुंसे होंगे और रात के प्राइम टाइम में किस पार्टी के कौन से नेता या प्रवक्ता की बात गूंजेगी.

कह सकते है मीडिया यहीं आकर ठहर गया है और राजनीतिज्ञ इसी ठहरे हए स्क्रीन में एक-एक कंकड़ फ़ेंक कर अपनी हलचल का मजा लेने से नहीं कतराते है. अगर अन्ना के आंदोलन से ठीक पहले महंगाई और भ्रष्टाचार के सवालों को लेकर संसद, नेता और मीडिया की पहल देखें, तो अब उस दौर की हर आवाज जश्न में डूबी हई सी लगती है. पहले महंगाई के दर्द ने ही टीस दी. संसद में पांच दिन तक महंगाई का रोना रोया गया. कृषि मंत्री शरद पवार निशाने पर आये. कांग्रेस ने राजनीति साधी. लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने तो पवार के हंसने को आम-आदमी के दर्द पर मिर्च डालना तक कहा. और, मीडिया ने इसे नीतियों का फ़ेल होना बताया. चिल्ला- चिल्ला कर महंगाई पर लोगों के दर्द को शब्दों में घोल कर न्यूज चैनलों ने पिलाया, लेकिन हआ क्या. वित्त मंत्री तो छोड़िए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने महंगाई थमने का टारगेट पांच बार तय किया.

सितंबर 2010, फ़िर नवंबर 2010, फ़िर दिसंबर 2010, फ़िर फ़रवरी 2011, फ़िर मार्च 2011. प्रधानमंत्री ने जो कहा, हेडलाइन बना. तीन बार तो टारगेट संसद में तय किया. तो क्या मीडिया ने यह सवाल उठाया कि संसद की जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए? यानी मनमोहन सिंह ने देश को बतौर पीएम धोखा दिया, यह कहने की हिम्मत तो दूर मीडिया मार्च के बाद यह भी नहीं कह पाया कि प्रधानमंत्री ने कीमतें बढ़ा कर किन-किन कारपोरेट सेक्टर की हथेली पर मुनाफ़ा समेटा. गैस के मामले पर कैग की रिपोर्ट ने रिलांयस को घेरा और पीएमओ ने मुकेश अंबानी पर अंगुली उठाने की बजाय तुरंत मिलने का वक्त दे दिया. क्या मीडिया ने यह सवाल उठाया कि जिस पर आरोप लगे हैं, उससे पीएम की मुलाकात का मतलब क्या है? जबकि एक वक्त राजीव गांधी ने पीएमओ का दरवाजा धीरूभाई अंबानी के लिए इसलिए बंद कर दिया था कि सरकार पाक-साफ़ दिखायी दे. तब मीडिया ने कारपोरेट की लड़ाई और सरकार के भीतर बैठे मंत्रियों के कच्चे-चिट्ठे भी जम कर छापे थे, लेकिन अब मीडिया यह हिम्मत क्यों नहीं दिखा पाता है.

याद कीजिए संसद में भ्रष्टाचार के खिलाफ़ पहली आवाज आइपीएल को लेकर ही उठी. क्या- क्या संसद में नहीं कहा गया. लेकिन हआ क्या ? आइपीएल को कॉमनवेल्थ घोटाला यानी सीडब्ल्यूजी निगल गया. सीडब्ल्यूजी को आदर्श घोटाला निगल गया. आदर्श को येदियुरप्पा के घोटाले निगल गये. और, इन घोटालों ने महंगाई की टीस को ही दबा दिया. लेकिन हर घोटाले के साथ मीडिया सोये हए शेर की तरह जागा. उसने अखबारों के पन्नो से लेकर न्यूज स्क्रीन तक रंग दिये. लेकिन लोकतंत्र का प्रहरी है कौन? यह सवाल हर उठती-बैठती खबर के साथ उसी जनता के दिमाग में कौंधा, जिसने नेताओं को संसद पहंचाया और जिसने मीडिया को टीआरपी दे रखी है.

देश के इतिहास में पहली बार कोई चीफ़ जस्टिस घोटाले के घेरे में भी आया और सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार किसी घोटाले में कैबिनेट मंत्री, सांसद, नौकरशाह, कारपोरेट कंपनी के कर्ता-धर्ताओं को जेल भी भेजा. लेकिन इस पूरे दौर में यह सवाल कभी नहीं खड़ा हआ कि संसद चूक रही है. प्रधानमंत्री का पद गरिमा खो रहा है. लोकतंत्र के तीनों पाये चेक-एंड-बैलेंस खोकर एक-दूसरे को संभालने में लगे है. और, ऐसे में चौथा पाया क्या करे. असल में अन्ना हजारे के आंदोलन को कवर करते मीडिया के सामने यही चुनौती है कि वह कैसे लोकतंत्र के इन पायों पर निगरानी भी करे और आंदोलन की जमीन को भी उभारे, जहां ऐसे सवाल दबे हए हैं, जिनका जवाब सरकार या राजनेता यह सोच कर देना नहीं चाहेंगे कि संसद मूल्यहीन न ठहरा दी जाये और सिविल सोसाइटी यह सोच कर टकराव नहीं लेगी कि कहीं उसे राजनीतिक न ठहरा दिया जाये.

न्यूज चैनलों की पत्रकारिता के इस मोड़ पर 14 बरस पहले के एसपी सिंह के प्रयोग सीख दे सकते हैं. जो चल रहा है वह सूचना है, लेकिन वह खबर नहीं है. अब के न्यूज चैनल को देख कर कोई भी कह सकता है कि जो चल रहा है, वही खबर है. दिग्विजय सिंह का तोता रटंत हो या फ़िर सरकार का संसद की दुहाई देने का मंत्र. विपक्ष के तौर पर भाजपा की सियासी चाल. जो अयोध्या मुद्दे पर फ़ैसला सड़क पर चाहती है, लेकिन लोकपाल के घेरे में प्रधानमंत्री आये या नहीं, इस पर संसद के सत्र का इंतजार करना चाहती है. महंगाई और भ्रष्टाचार पर ममता के तेवर भी मनमोहन के दरवाजे पर अब नतमस्तक हो जाते है. और अन्ना की टीम इस दौर में सिर्फ़ एक गुहार लगाती है कि संसद अपना काम करने लगे. सभी मंत्री ईमानदार हो जायें. न्यायपालिका भ्रष्ट रास्ते पर ना जाये. नौकरशाही और मंत्री की सांठ-गांठ खत्म हो और प्रधानमंत्री भी जो संसद में कहें कम से कम उस पर तो टिकें. क्या इन परिस्थितियों को टटोलना खबर नहीं है. यानी सत्ता जो बात कहती है, उसका पोस्टमार्टम करने से मीडिया अब परहेज क्यों करने लगा है.

दरअसल, 1995 में एसपी सिंह ने जब सरकार की नाक तले ही ‘आज तक’ शुरू किया, तब भी साथी पत्रकारों को पहला पाठ यही दिया, सरकार जो कह रही है वह खबर नहीं हो सकती. और, हमें खबर पकड़नी है. खबर पकड़ने के ही इस हुनर ने एसपी को घर-घर का चहेता बनाया. एसपी उस वक्त भी यह कहने से नहीं चूकते थे कि टीवी से ज्यादा सशक्त माध्यम हो नहीं सकता. लेकिन तकनीक पर चलनेवाले रोबोट की जगह उसमें खबर डाल कर ही तकनीक से ज्यादा पत्रकारिता को सशक्त बनाया जा सकता है. और अगर सूचना या तकनीक के सहारे ही रिपोर्टर ने खुद को पत्रकार मान लिया, तो यह फ़ैशन करने सरीखा है. तो क्या अब न्यूज चैनल इससे चूक रहे हैं, और इसीलिए अन्ना की सादगी और केजरीवाल की तल्खी भी सिब्बल व दिग्विजय की सियासी चालों में खो जाती है. और, संपादक असल खबर को पकड़ना नहीं चाहता और रिपोर्टर झटके में कैमरे को लेकर भागता या माइक थामे हाफ़ंता ही नजर आता है.

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी वरिष्ठ मशहूर टीवी जर्नलिस्ट / एंकर हैं. वे इन दिनों जी न्यूज से जुड़े हुए हैं. एसपी सिंह की स्मृति के बहाने उनका लिखा यह विश्लेषण प्रभात खबर हिंदी दैनिक में प्रकाशित हो चुका हैं. वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशन किया गया है.

भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन के दौरान संत निगमानंद की जान गई

स्वामी निगमानंद जी
स्वामी निगमानंद जी
एक दुखद खबर देहरादून से है. साधु निगमानंद की मौत हो गई. वे अनशन पर थे और कोमा में चले गए थे. उनका इलाज हिमालयन अस्पताल में चल रहा था. निगमानंद ने 19 फरवरी को अनशन शुरू किया था. वे दो मई को कोमा में चले गए थे. उसके बाद उनका उपचार किया जाता रहा पर वे वापस नहीं लौटे.

निगमानंद हरिद्वार के मातृ सदन आश्रम से ताल्लुक रखते थे. उनकी उम्र 36 साल थी. वे गंगा में खनन बंद करने की मांग कर रहे थे. साथ ही हिमालयन स्टोन क्रेशर को कुंभ क्षेत्र से हटाने की मांग पर भी अड़े थे. उधर, साधु के समर्थकों ने आरोप लगाया है कि निगमानंद को जहर देकर मारा गया है. प्रशासन शव का पोस्टमार्टम करा रहा है ताकि मौत के असल कारणों का पता चल सके. मातृ सदन के संस्थापक स्वामी शिवानंद ने थाने में 11 मई को ही शिकायत दर्ज कराई थी कि 30 अप्रैल को इलाज के दौरान निगमानंद को जहर दे दिया गया. इसी कारण वह 2 मई को कोमा में चले गए.

स्वामी शिवानंद ने हरिद्वार के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ . पीके भटनागर और क्रेशर के मालिक ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नामजद तहरीर दी थी. स्वामी शिवानंद के मुताबिक निगमानंद को 30 अप्रैल को एक इंजेक्शन लगाया गया था. उसके बाद वह दो मई को कोमा में चले गए. आरोप है कि इंजेक्शन में निगमानंद को ‘आर्गेनो फास्फेट’ दिया गया. कांग्रेस विधायक किशोर उपाध्याय ने निगमानंद की मौत के लिए उत्तराखंड सरकार को जिम्मेदार बताया है. उनका आरोप है कि मुख्यमंत्री निशंक बाबा रामदेव का अनशन तुड़वाने के लिए बेहद सक्रिय रहे पर उसी अस्पताल में इलाज करा रहे निगमानंद को देखने तक नहीं गए.

ज्ञात हो कि निगमानंद गंगा रक्षा हेतु वर्ष 2008 में भी 73 दिन का आमरण अनशन कर चुके थे. उस अनशन के कारण उनके शरीर के कई अंग कमजोर हो गए. उनमें न्यूरोलॉजिकल डिसआर्डर के लक्षण भी देखने को मिले. उन्होंने दुबारा इसी साल 19 फरवरी से आमरण अनशन शुरू किया और 68वें दिन उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. उन्हें गिरफ्तार कर जिला चिकित्सालय, हरिद्वार में दाखिल किया गया पर लंबे अनशन से उन्हें दिखाई और सुनाई देना कम हो गया.

2 मई को अचानक वे कोमा में चले गए. जिला चिकित्सालय के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक पीके भटनागर कोमा को संत निगमानंद की गहरी नींद बताते रहे. काफी मेहनत के बाद संत को  देहरादून स्थित अस्पताल में भेजा गया. बाद में उन्हें जौली ग्रांट के हिमालयन अस्पताल में दाखिल कराया गया. पर वे बच नहीं सके. सूत्रों का कहना है कि हिमालयन अस्पताल में हुई जांच में पता चला कि संत के शरीर में  ऑर्गोनोफास्फेट कीटनाशक मौजूद है. इसी के बाद आरोप लगा कि संत निगमानंद को जहर दिया गया है.

रामदेव के भाजपा एजेंट होने की चुगली करते ये दो वीडियो

: क्या भाजपा नेताओं के इशारे पर टूटा बाबा का अनशन? : निशंक-आडवाणी और निशंक-रामदेव वार्तालाप सुनिए :  उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने मीडिया वालों के सामने फोन पर आडवाणी और रामदेव से बातचीत की थी. यह बातचीत रामदेव के अनशन खत्म होने से ठीक पहले हुई.

सीएम की आडवाणी और रामदेव से हुई बातचीत को सुनेंगे तो एकबारगी यह जरूर लगेगा कि कहीं रामदेव का अनशन तुड़वाने का फैसला भाजपा के शीर्ष नेताओं ने तो नहीं लिया, जिसका पालन रामदेव ने किया. और, यह भी कि कहीं बाबा वाकई भाजपा और संघ के एजेंट त नहीं? हालांकि रामदेव पर भाजपा और आरएसएस का एजेंट होने का आरोप लगाकर कांग्रेस दरअसल करप्शन के खिलाफ मुहिम की हवा निकालने पर तुली हुई है और कांग्रेस की इस फूट डालो राज करो नीति की हम निंदा करते हैं पर संदेह तो संदेह है. आप भी सुनिए इस बातचीत को.

दुखद ये है कि किसी न्यूज चैनल ने इस वीडियो क्लीपिंग को अभी तक क्यों प्रसारित नहीं किया जबकि इस पूरी बातचीत से यह संदेश साफ जा रहा है कि भाजपा के लोग इस बात पर एकमत थे कि अनशन तोड़ दिया जाना चाहिए और बाबा ने अनशन तोड़ दिया. निशंक मोबाइल पर आडवाणी से बातचीत में उन्हें बार बार बाबूजी कहकर संबोधित कर रहे हैं. आप भी सुनिए इस बातचीत को और बताइएगा कि आपको यह बातचीत सुनकर क्या एहसास हो रहा है, क्या महसूस हो रहा है….

इन वीडियोज को देखने सुनने के लिए इन शीर्षकों पर क्लिक करें…

सीएम निशंक की आडवाणी के साथ बातचीत

सीएम निशंक की बाबा रामदेव के साथ बातचीत

बाबा रामदेव पर इंडिया टीवी वाले रजत शर्मा की टिप्पणी

Deshpremi Bharatvanshi नामक किन्हीं सज्जन ने deshpremi.bharat@gmail.com मेल आईडी से ग्रुप में मीडिया के सैकड़ों लोगों को एक मेल किया है, जिसमें एक लेख है और लेखक के बतौर इंडिया टीवी के मालिक रजत शर्मा का नाम है. चूंकि ये मेल रजत शर्मा की मेल आईडी या इंडिया टीवी की मेल आईडी से आफिसियली नहीं आया है, इसलिए ये कनफ्यूजन है कि वाकई ये लेख रजत शर्मा का है या नहीं.

लेकिन भेजने वाले ने जब भेज ही दिया है तो इसे हम भी छाप देते हैं, और, उम्मीद करते हैं कि इंडिया टीवी की तरफ से कमेंट आएगा कि यह लेख रजत शर्मा का है या नहीं. लेख में रजत शर्मा का बाबा के प्रति अदभुत प्रेम दिख रहा है, जो कि इन दिनों का ट्रेंड भी है. बाजारू मानक के हिसाब से नंबर वन बने चैनल के मालिक रजत शर्मा बाबा रामदेव के बारे में क्या सोचते हैं और क्या कुछ बोलते हैं, यह इसे पढ़कर जाना जा सकता है, बशर्ते यह लेख रजत शर्मा का ही हो.

एडिटर

भड़ास4मीडिया

 


 

मैंने बाबा से कहा था- कोई सरकार इतनी बड़ी गलती नहीं करेगी

रजत शर्मा

इंडिया टीवी

5 जून को स्वामी रामदेव ने मुझसे पूछा था कि क्या ऐसा हो सकता है कि पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने की कोशिश करे ? मैंने उनसे कहा कि कोई भी सरकार इतनी ब़ड़ी  गलती नही करेगी “ आप शांति से अनशन कर रहे हैं ,आपके हज़ारो समर्थक मौजूद हैं, चालीस TV Channels की OB Vans वहां खड़ी हैं.” .. मैंने उनसे कहा था ‘सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह ऐसा कभी नहीं होने देंगे’…मेरा विश्वास था कि कांग्रेस ने Emergency के अनुभव से सबक सीखा है…पिछले 7 साल के शासन में सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह ने ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे ये लगा हो कि वो  पुलिस और लाठी के बल पर अपनी सत्ता की ताकत दिखाने का कोशिश करेंगे

लेकिन कुछ ही घंटे बाद सरकार ने मुझे गलत साबित कर दिया..मैंने स्वामी रामदेव से कहा था कि आप निश्चिंत होकर सोइये… देर रात मुझे इंडिया टीवी के Newsroom से फोन आया : “सर, रामलीला मैदान में पुलिस ने धावा बोल दिया है”…फिर उस रात टी वी पर  जो कुछ   देखा ,आंखों पर विश्वास नहीं हुआ कोई ऐसा कैसे कर सकता है …कैमरों और रिपोर्ट्स की आंखों के सामने पुलिस ने लाठियां चलाईं, आंसू गैस के गोले छोड़े, बूढ़े और बच्चों को पीटा, महिलाओं के कपड़े फाड़ दिए…मैंने स्वामी रामदेव को अपने सहयोगी के कंधे पर बैठकर बार-बार पुलिस से ये कहते सुना- “यहां लोगों को मत मारो, मैं गिरफ्तारी देने को तैयार हूं”…लेकिन जब सरकार पांच हजा़र  की पुलिस फोर्स को  कहीं  भेजती है तो वो फोर्स ऐसी बातें सुनने के लिए तैयार नहीं होती…पुलिस वालों की Training डंडा चलाने के लिए होती है, आंसू गैस छोड़ने और गोली चलाने के लिए होती है पुलिस ये नही समझती कि जो लोग वहां सो रहे हैं वो दिनभर के भूखे  हैं , अगर वहां मौजूद भीड़ उग्र हो जाती है तो पुलिस गोली भी चला देती…वो भगवान का शुक्र है कि स्वामी रामदेव के Followers में ज्यादातर बूढ़े, महिलाएं और बच्चे थे या फिर उनके चुने साधक थे जिनकी Training उग्र होने की नहीं है

जब दिन में स्वामी रामदेव ने मुझे फोन किया था तो उन्होंने कहा था – कि किसी ने उन्हें पक्की खबर दी है कि ”आधी रात को हजारों पुलिसवाले शिविर को खाली कराने की कोशिश करेंगे” और ये भी कहा कि ”पुलिस गोली चलाकर या आग लगाकर उन्हें मार भी सकती है”…मैंने स्वामी रामदेव से कहा था कि ”ऐसा नहीं हो सकता-हजारों पुलिस शिविर में घुसे ये कभी नहीं होगा और आप को मारने की तो बात कोई सपने में सोच भी नहीं सकता”…रात एक बजे से सुबह पांच बजे तक टी वी पर पुलिस का तांडव देखते हुए मैं  यही सोचता रहा कि रामदेव कितने सही थे और मैं कितना गलत…ये मुझे बाद में समझ आया कि स्वामी रामदेव ने महिला के कपड़े पहनकर भागने की कोशिश क्यों की…उन्होंने सोचा जब पुलिस घुसने की बात सही है

लाठियां चलाने की बात सही है  तो Encounter की बात भी सही होगी …मैं कांग्रेस को अनुभवी नेताओं की पार्टी मानता हूं…मेरी हमेशा मान्यता रही है कि कांग्रेस को शासन करना आता है…लेकिन 5 जून की रात की बर्बरता ने मुझे हैरान कर दिया…समझ में नहीं आ रहा कि आखिर सरकार ने ये किया क्यों ?…उससे भी बड़ा सवाल  ये उठा कि कांग्रेस को या सरकार को इससे मिला क्या?

सरकार को मिला सुप्रीम कोर्ट का नोटिस जिसमें ये बताना पड़ेगा कि रात के अंधेरे में पुलिस की बर्बरता का औचित्य (justification) क्या था…सरकार ये कैसे कहेगी कि हमने ये इसलिए किया कि ये बताना था   कि सरकार की ताकत क्या होती है…हम जब चाहें किसी की भी जुबान पर लगाम लगा सकते हैं…कपिल सिब्बल ने उस दिन शाम को कहा था ( if we know to accommodate, we also know how to rein in)”हम अगर किसी के लिए  रास्ता बनाना  जानते है तो लगाम  लगाना भी जानते है”

कांग्रेस को क्या मिला..जो स्वामी रामदेव बीजेपी से नाता तोड़कर कांग्रेस की तरफ दोस्ती का हाथ बड़ा रहे  थे, उन्हें अपना दुश्मन बना लिया…जो स्वामी रामदेव RSS के लोगों से दूरी बना रहे थे, अपने साथ मुस्लिम नेताओं को खड़ा कर रहे थे ताकि उनकी ऐसी छवि बने जो सबको स्वीकार्य  हो  – उन्हें कांग्रेस ने धक्का देकर RSS के पाले में फेंक दिया…कांग्रेस ने रात को पुलिस से स्वामी रामदेव के समर्थकों की पिटाई करवा कर, मायावती और मुलायम सिंह दोनों को रामदेव के साथ खड़ा कर दिया…जो वृंदा करात स्वामी रामदेव की खुलेआम आलोचना करती थीं, वो रात को TV Channels पर रामदेव के समर्थन  में पुलिस के अत्याचार को सबसे सख्त शब्दों में निंदा करती नज़र आईं

कांग्रेस और सरकार दोनों अन्ना हजारे से परेशान थी…वो रामदेव को अन्ना हजारे के जवाब के रूप में देख रही थी …लेकिन रात को पुलिस की लाठियों और आंसूगैस ने   इसे उल्टा  कर दिया…जो अन्ना और रामदेव एक दूसरे से उखड़े हुए थे अब साथ-साथ हैं…अन्ना हजारे रामलीला मैदान की पुलिस बर्बरता के खिलाफ अनशन करेंगे…अब सरकार इन दोनों से एक साथ  निबटना होगा

कांग्रेस को क्या मिला? मिला तो बीजेपी को…जो पार्टी बार-बार उठने की कोशिश कर रही थी लेकिन उसके पास सरकार के खिलाफ कोई बड़ा मुद्दा नही  था…अब पूरी ताकत के साथ मैदान में है .कांग्रेस ने उसके हाथ में एक मुद्दा  दे दिया, रामदेव जैसा लीडर  दे दिया और करोड़ों लोगों का जनाधार ,लोगों को  लाठियां मार-मारकर बीजेपी को उपहार में दे दिया…अब कांग्रेस को बीजेपी से, रामदेव से, अन्ना हजारे की Civil Society से, मायावती से, मुलायम सिंह से, एक साथ लड़ना है…इसके बदले मिला क्या- लालू यादव का समर्थन  जिनके लोकसभा में सिर्फ चार  MP हैं और बिहार में सिर्फ बाईस  MLA हैं

पुलिस की लाठियां चलाने और लोगों का खून बहाने की टाइमिंग भी कमाल की थी कपिल सिब्बल ने रामदेव से हुई डील की चिट्ठी दिखाकर भ्रम पैदा कर दिया था..रामदेव defensive पर थे…वो बार-बार सफाई दे रहे थे कि चिट्ठी में सिर्फ इतना लिखा है कि हमारी सारी मांगें पूरी हो जाएंगी तो दो दिन के बाद अनशन खत्म हो जाएगा…लेकिन रात में 5000 की पुलिस फोर्स  भेजकर सरकार ने रामदेव को Offensive कर दिया…अब वो लगाताक उन सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह पर हमला कर रहे हैं जिनका नाम लेकर उन्होंन पिछले पांच साल में एक शब्द नहीं कहा था.

दिग्विजय सिंह ने स्वामी रामदेव को ठग कहा, उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण को चोर कहा…सरकार से उनकी जांच कराने की मांग की…फिर हिंदुस्तान टाइम्स में खबर छपी कि CBI और ED स्वामी रामदेव के ट्रस्ट और कंपनियों की जांच करेगी…अगर स्वामी रामदेव ठग हैं तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनसे अनशन वापस लेने की अपील क्यों की ?…प्रधानमंत्री ने एक ठग को चिट्ठी लिखकर ये क्यों कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आपकी मुहिम सही है…अगर स्वामी रामदेव के ट्रस्ट और कंपनियों की जांच होनी है तो देश के Finance Minister प्रणब मुखर्जी तीन और मंत्रियों के साथ उन्हें एयरपोर्ट पर लेने क्यों गए?…अगर कपिल सिब्बल ये जानते थे कि स्वामी रामदेव भरोसे के आदमी नहीं हैं तो फिर सरकार ने भ्रष्टाचार और कालेधन के सवाल पर उनकी ज्यादातर मांगें क्यों मान ली हैं कपिल सिब्बल ने प्रेस कांफ्रेस बुलाकर ये क्यों कहा कि हमने स्वामी रामदेव की सभी मांगे मान ली हैं ?…क्या ये सरकार ऐसे व्यक्ति के साथ डील कर रही थी जिसकी जांच CBI और ED को करनी है

कौन विश्वास करेगा स्वामी रामदेव पर ठगी और बेईमानी जैसे आरोपों का ? दिग्विजय सिंह की बात समझ में आती है, उनका अपना एजेंडा है…लेकिन सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह ने तो कभी ऐसे एजेंडे को नहीं अपनाया…क्या अब CBI और ED के दम पर फिर से साबित किया जाना है कि सरकार की ताकत क्या होती है?…स्वामी रामदेव को ये बताना है कि हमसे लड़ोगे तो तुम्हारा दिमाग ठिकाने लगा देंगे

अगर सरकार ने ये करके अपना इकबाल जतला भी दिया तो क्या मिलेगा ? …लोकतंत्र में कोई भी जनता का विश्वास राजनैतिक दलों के लिए ऑक्सीजन का  काम करता है…सत्ता का अहंकार- किसी भी पार्टी के लिए तेजाब का काम करता है…इतिहास गवाह है कि लोकतंत्र में डंडे के बल पर शासन नहीं चलता…जो सरकारें विरोध के स्वर का सम्मान करती हैं, शांतिपूर्ण ढंग से आलोचना करने वालों की बात सुनती हैं, वही सरकारें ज्यादा दिन चलती हैं…ये फैसला कांग्रेस को करना है  कि उसे आक्सीज़न  चाहिए या तेज़ाब.

असल में, हमारा समाज और सरकारी व्यवस्था लोकतांत्रिक नहीं है

राजकिशोर: यह नागरिक जमात क्या होती है : जब भारत सरकार ने जन लोकपाल विधेयक पर अण्णा हजारे और उनके समूह के साथ दोस्ती कर ली, तभी मुझे शक हो गया था कि सरकार ने बहुत मजबूरी में यह समझौता किया है और उसके भावी इरादे ठीक नहीं हैं। जन लोकपाल विधेयक वाकई एक रेडिकल विधेयक है और वह संसद द्वारा पारित हो गया, तो भ्रष्टाचार के एक बड़े और अहम क्षेत्र को प्रदूषण-मुक्त किया जा सकता है।

भारत सरकार को इस बात का पूरा एहसास था। इसीलिए जब तक अण्णा हजारे का अनशन शुरू नहीं हो गया, तब तक वह इस विधेयक पर बातचीत करने के लिए भी राजी नहीं थी। अनशन शुरू होते ही देश भर में भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसा माहौल बन गया कि सरकार के हाथ-पाँव काँपने लगे। वह समझौता करने में जितना विलंब करती, माहौल उतना ही उग्र होता जाता। अण्णा हजारे के समर्थन का दायरा बढ़ता जा रहा था और सरकार की प्रतिष्ठा कम होती जा रही थी। इसलिए सरकार को ठीक वही करना पड़ा जो वह नहीं चाहती थी। बाद की घटनाओं ने मेरे शक को पुष्ट ही किया।

शक का एक मजबूत कारण यह था कि सरकार अगर जन लोकपाल विधेयक को पूरी तरह मान ले, तब भी वह संसद से पारित कैसे कराएगी? अण्णा ने भी कहा है कि आखिर कानून तो संसद ही पास करेगी। यह सच है कि सरकार के पास बहुमत है,  लेकिन यह बहुमत कांग्रेस का अपने दम पर नहीं है। उसके कई सहयोगी दल है। सरकार चाहे तो कांग्रेस के सांसदों को राजी कर सकती है, पर वह अन्य दलों के सांसदों को कैसे राजी करेगी? जो समझौता हुआ है, वह यूपीए के सभी दलों से नहीं हुआ है। सरकार में थोड़ी भी ईमानदारी और इस मुद्दे पर गंभीरता होती, तो वह हजारे के साथ समझौता करने के पहले अपने सभी सहयोगी दलों के नेताओं से बात करती और उनके रजामंद हो जाने के बाद ही आगे बढ़ती। यह अण्णा हजारे का भोलापन था कि उन्होंने बिना किसी न्यूनतम शर्त के संयुक्त समिति के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। अब सरकार तरह-तरह के अड़ंगे लगाने लगी है। प्रश्न यहां तक किया जाने लगा है कि कानून बनाना संसद यानी निर्वाचित जन प्रतिनिधियों का काम है – नागरिक जमात (सिविल सोसायटी) का नहीं। उसे अपनी सीमा में रहना चाहिए। चार-छह आदमियों के दबाव से कहीं कानून बनाया जाता है?

आश्चर्य यह है कि यह डाँट नागरिक जमात को क्यों पड़ रही है – सरकार को क्यों नहीं? अगर कानून बनाने या बदलने में नागरिक जमात की कोई वैध भूमिका नहीं है, तो सरकार ने इसके प्रतिनिधियों से बातचीत करने की उत्सुकता क्यों दिखाई? वह कह सकती थी कि कानून बनाने का काम संसद का है, इसलिए हम चंद नागरिकों के अनशन की परवाह नहीं करते? सरकार ने हजारे से भी समझौता किया और बाबा रामदेव से भी। रामदेव के बारे में सरकार की शिकायत यह है कि वे बाद में समझौते से मुकर गए। लेकिन सरकार तो समझौते पर डटी रही। फिर उसने जो मांगें मान ली थीं, उन पर वह अमल क्यों नहीं कर रही है? इसका अर्थ यह है कि सरकार का हृदय इन मांगों के साथ नहीं था, वह सिर्फ एक राजनीतिक संकट से बाहर आना चाहती थी। जाहिर है, नागरिक जमात के सदस्यों का जनाधार सरकार के अपने जनाधार से ज्यादा मजबूत और व्यापक साबित हो रहा था। जनता के अनिर्वाचित प्रतिनिधि संसद के निर्वाचित प्रतिनिधियों पर भारी पड़ रहे थे।

इसे ही नागरिक जमात की ताकत कहते हैं। यह ताकत नैतिक ताकत होती है और इसके आगे सभी को झुकना पड़ता है। संसद के प्रतिनिधियों को पाँच साल के लिए चुन कर जनता अपनी प्रभुसत्ता को स्थगित नहीं कर देती। उचित समय पर हस्तक्षेप करने का अधिकार वह अपने पास रखती है। लोहिया का यह वाक्य अभी भी बहुतों के दिमाग में गूँजता रहता है कि जिंदा कौमें पाँच साल तक इंतजार नहीं करतीं। इसी के कारण जेपी आंदोलन का जन्म हुआ था और इसी के कारण नर्मदा बचाओ और चिपको आंदोलन इतने समय तक चला। सरकार पर दबाव डालना प्रत्येक नागरिक का और नागरिक जमात का जन्मसिद्ध अधिकार है। कोई भी सरकार इस अधिकार को जब्त नहीं कर सकती। अपनी पाशविक शक्ति के बल पर दमन वह जरूर कर सकती है, पर जैसा कि वैज्ञानिक न्यूटन बता गए हैं, हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है और कोई भी सरकार, खासकर लोकतांत्रिक व्यवस्था में, इस प्रतिक्रिया से अपने को बचा नहीं सकती। इंदिरा गांधी जैसी शक्तिशाली नेता इस प्रतिक्रिया से नहीं बच पाईं और अब पश्चिम बंगाल के वामपंथी अपने जख्म सहला रहे हैं। इसलिए सरकार चलाने वालों को ज्यादा गरूर नहीं करना चाहिए।

असल में, हमारा समाज लोकतांत्रिक नहीं है। सरकारी व्यवस्था भी लोकतांत्रिक नहीं है। जो सज्जन चुन कर संसद में आते हैं, वे पूरे मतदाता मंडल के बहुमत द्वारा समर्थित नहीं होते। उन्हें मुश्किल से तीस-चालीस प्रतिशत वोटरों का वोट मिला हुआ होता है। इसीलिए वे नागरिक जमात की नैतिक उपस्थिति का एहसास नहीं कर पाते। इस संवेदनहीनता के कारण ही वे पूछ बैठते हैं कि मुट्ठी भर लोगों के कहने से हम कानून कैसे बदल सकते हैं? दरअसल, नागरिक जमात के सक्रिय सदस्य मुट्ठी भर ही या उससे कुछ ज्यादा होते हैं, पर उनकी ताकत संख्या के अनुपात में इसलिए बहुत ज्यादा हो जाती है, क्योंकि उनके साथ व्यापक जन भावना जुड़ी होती है। अगर देश में भ्रष्टाचार की समस्या इतनी गहरी और व्यापक नहीं हो गई होती, तो अन्ना हजारे के अनशन का कोई असर नहीं होता। साल भर में ऐसे दर्जनों धरने, अनशन और प्रदर्शन होते रहते हैं, पर मामला नक्कारखाने में तूती की आवाज बन कर रह जाता है।

कानून संसद ही बनाती है, पर कई बार जन दबाव से भी कानून बनाना पड़ जाता है। अगर अरुणा राय ने राजस्थान में सूचना का अधिकार आंदोलन नहीं चलाया होता, तो यह कानून बनता ही नहीं। प. बंगाल, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में अगर जन विरोधी भूमि अधिग्रहण के खिलाफ जनता आंदोलन नहीं कर रहो होती, तो सरकार इस कानून को संशोधित करने पर विचार नहीं कर रही होती। पंजाब, महाराष्ट्र,झारखंड, उत्तरांचल और छत्तीसगढ़ राज्य भी नागरिक जमात के दबाव से ही बने। अगर सरकार  बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार तथा जनता के साथ न्याय करने के लिए खुद ही कानून बनाती चलती, तो किसी को पागल कुत्ते ने नहीं काया है कि वह अनशन करे या धरने का आयोजन करे। बहरी संसद को सुनाने के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है।

लेखक राजकिशोर जाने-माने पत्रकार, स्तंभकार और विश्लेषक हैं. उनसे संपर्क truthonly@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

अन्ना हजारे, रामदेव और कांग्रेस (अंतिम)

दिनेश चौधरी: हां, मैं बिका हुआ हूं! : “आप अमेरिका के साथ हैं या नहीं हैं?”… 9/11 के बाद बुश ने सारी दुनिया से यही वस्तुनिष्ठ प्रश्न पूछा था और चूंकि वह दुनिया का दादा है इसलिए प्रश्न के उत्तर में “इनमें से कोई नहीं” वाला विकल्प नहीं रखा था। जिन्होंने उत्तर “नहीं” में दिया वे सब आतंकवादी कहलाये। प्रतिबद्धताओं को स्पष्ट करने-कराने की बुश की यह नीति कालांतर में काफी लोकप्रिय हुई।

और, अगर इसके इतने लोकप्रिय होने का जरा-सा भी अंदाजा बुश को होता तो वह इसका पेटेंट करा लेता। भारत के राजनीतिक परिदृश्य में अभी जो कोहराम मचा हुआ है उसमें भी बुश की इस शैली का प्रयोग धड़ल्ले से किया जा रहा है और आज के माहौल में कुछ लिखना या बोलना जोखिम का काम हो गया है। अगर आप बाबा के पक्ष में बोलते हैं तो आप आरएसएस के एजेंट हैं और अगर आप बाबा की आलोचना करते हैं तो आप बिके हुए हैं। बाबा पर अब दो पार्ट में लिखे और भड़ास पर छपे लेखों पर जो प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं, वे कमोबेश इसी तरह की हैं।

बाबा के असंख्य भक्तों की पीड़ा मैं समझ सकता हूं क्योंकि वे निर्दोष-निष्कलंक हैं और सचमुच चाहते थे कि इस व्यवस्था में परिवर्तन होना चाहिये। वे बाबा के साथ सच्चे मन से जुडें हैं और उन पर इनकी अपार श्रद्धा भी है, लेकिन दुख है कि इसी श्रद्धा के फेर में वे कुछ इस तरह की चीजों को नहीं देख पा रहे हैं जो बहुत साफ-साफ दिखाई पड़ रही हैं। मैंने पिछले दो किस्तों में जो कुछ भी लिखा है, उसमें मैंने कहीं पर भी आंदोलन के औचित्य पर प्रश्न नहीं उठाया है बल्कि आंदोलन के तरीकों की व खासतौर पर बाबा की मंशा की आलोचना की है और आलोचना की भी जानी चाहिये ताकि आप अपनी गलतियों से आइंदा के लिये सबक ले सकें। ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। भ्रष्टाचार पर दो समानांतर आंदोलन आपके सामने चल रहे हैं, उनका तुलनात्मक अध्ययन क्यों नहीं कर लेते?

अन्ना का आंदोलन बेहद सादगी के साथ शुरू हुआ था और  उसमें मीडिया का जमावाड़ा पहले दिन से नहीं था। खुद अन्ना को भी यकीन नहीं था कि उन्हें आगे चलकर इतना समर्थन हासिल होगा। लेकिन अचानक मिले इस समथर्न से भी अन्ना बौराये नहीं और पूरे समय उनका व्यवहार गरिमापूर्ण था। उनके साथ के लोगों की भूमिकायें भी स्पष्ट थीं। अन्ना सब जगह दिखाई नहीं पड़ते थे और सभी जगह वही नहीं बोलते थे। 8 जून के अनशन में भी कुछ यही माहौल था और उनके साथियों ने अपने-अपने विषयों के अनुसार ही बातें की। उनके पास भक्तों की भीड़ नहीं थी और  न उनका कोई काडर है। लोग स्वत:सफूर्त आंदोलन से जुड़ते चले गये और आंदोलन के इस फैलाव का “श्रेय” लेने का प्रयास अन्ना ने नहीं किया। उनकी सादगी ही इस आंदोलन में उनका संदेश रही और एक बिल्कुल नयी पीढी , जो केवल लैपटाप व एसएमएस की भाषा समझती थी और जिसने  गांधी को केवल मुन्नाभाई के जरिये जाना था, उनसे जुड़ती चली गयी। अन्ना का आंदोलन आगे चलकर क्या रूप लेता है, यह कहना मुश्किल है, लेकिन एक गांधीवादी के साथ नयी पीढ़ी का जुड़ जाना ही इस आंदोलन की एक बड़ी जीत है।

दूसरी तरफ बाबा का आंदोलन एक सेलिब्रिटी का आंदोलन था। आंदोलन के दो दिन पहले से ही मीडिया वालों ने उनके भव्य पंडाल को अपना स्टूडियो बना डाला था। सरकार से बातचीत आंदोलन शुरू होने से पहले ही चालू हो गयी थी। भारी तादाद में भक्तगण पहले दिन से विराजमान थे, लेकिन बाबा के मंच में कुछ तरतीब समझ नहीं आ रही थी। बात करने भी बाबा ही जाते थे। वक्ता, मुख्य वक्ता, प्रवक्ता, संचालक, सब कुछ बाबा ही थे। यह मैं उतने समय की बात कह रहा हूं, जितने समय तक मैं टीवी देख पाया, क्योंकि बाबा के भक्तों को यह बताना आवश्यक है कि उनके आंदोलन के समर्थन में मैं भी दिन भर धूप में बैठा हुआ था, बावजूद इसके कि 3 तारीख की शाम को ही एक पत्रकार मित्र ने दिल्ली से फोन पर यह सूचना दी थी कि बाबा की सरकार से कुछ सहमति बन गयी है। बाबा ने टीवी पर इसका खण्डन किया था।

कहने का तात्पर्य यह है कि बाबा का यह आंदोलन अगर देश की 121 करोड़ जनता का आंदोलन था, जैसा कि बाबा टीवी पर कहते रहे, तो फिर उन्हें इस आंदोलन को “वन मैन शो” बनाने की क्या जरूरत थी? क्या बाबा को इतने बड़े आंदोलन के संचालन के लिये एक टीम बनाने की जरूरत महसूस नहीं हुई? क्या बाबा को यह महसूस नहीं हुआ था कि इतने बड़े आंदोलन में अगर वे गिरफ्तार हो जाते हैं तो दूसरी व तीसरी पंक्ति का नेतृत्व किनके हाथों में होगा? या बाबा निश्चिंत थे कि इन सबकी नौबत ही नहीं आयेगी?

मैंने लेखमाला की दूसरी किस्त में जो लिखा है उसका लब्लोलुआब यही है कि बाबा औरों को श्रेय देना नहीं जानते और वे बाकायदा इस बात के लिये प्रयासरत रहते हैं। एक ही बात को बार-बार दोहराना ठीक नहीं है, खासतौर पर तब जबकि वह घटना भक्तो को विचलित कर रही है, लेकिन मान लें कि बाबा प्रशांत भूषण को अपने साथ रखते तो क्या कपिल सिब्बल के हाथ में वह चिट्ठी पहुंच पाती जिसने सारे किये-कराये पर पानी फेर दिया? बाबा ने बाद में मासूमियत से कह दिया कि यह सरकार धोखेबाज है। सरकार अगर ईमानदार होती तो आपको आंदोलन की जरूरत ही क्या थी?

एक बड़ी लड़ाई में व्यक्तिगत गुण, दुर्गुण, राग, द्वेष, अहम आदि का कोई स्थान नहीं होता। शीर्ष स्तर पर भले ही एक ही नेता हो पर निचले स्तर पर एक सामूहिक नेतृत्व तो होता ही है जो विभिन्न प्रकार के दायित्वों को अंजाम देता है। भक्तगण किस्म के सीधे-सादे लोगो में भावना का ज्वार उठाकर, इतनी सारी रणनीतिक चूकों के साथ, इतनी क्रूर व्यवस्था से इतनी बड़ी लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। केवल एक व्यक्ति के अहम् के पोषण के लिये यदि बाबा के भक्तगण इन रणनीतिक चूकों की आलोचना का भी अधिकार नहीं देना चाहते तो -हां, मैं बिका हुआ हूं!

समाप्त

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद भिलाई में एक बार फिर नाटक से लेकर पत्रकारिता तक की दुनिया में सक्रिय हैं. वे इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष भी हैं. उनसे संपर्क iptadgg@gmail.com  के जरिए किया जा सकता है. दिनेश चौधरी के भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित अन्य लेखों को पढ़ने के लिए क्लिक करें- भड़ास पर दिनेश

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का धुंआ देख उसे तुरंत बुझाने में क्यों जुटे सत्ताधारी?

हरिवंश: दुनिया के एक विख्यात न्यायविद, न्यायमूर्त्ति हैंड ने कहा था, आजादी के बारे में… नैतिकता या भ्रष्टाचार के प्रसंग में भी वही चीज लागू है…. उनका कथन था, आजादी मर्दों-औरतों के दिलों में बसती है. जब वहां यह मर जाती है, तब इसे कोई संविधान, कानून या अदालत नहीं बचा सकती… :

भ्रष्टाचार के सवाल पर देश में शह-मात का खेल चल रहा है. सरकार किसी कीमत पर इस जन मुद्दा को बड़ा सवाल नहीं बनने देना चाहती. वह जानती है कि यह धुंआ या चिंगारी सुलगी, इसे हवा मिली, तो इसमें तख्तोताज भस्म हो जायेगा. मध्य-पूर्व और अफ्रीकी देशों (टय़ूनीशिया,मिस्र्, सीरिया, यमन, बहरीन, लीबिया) में तो घटनाएं ताजा हैं. शासक वर्ग के भ्रष्टाचार के खिलाफ़ बगावत, उन समाजों-देशों में तानाशाह शासकों के खिलाफ़, विद्रोह या बगावत की परंपरा नहीं थी. भारत में तो दो-दो बार ‘भ्रष्टाचार’ के सवाल पर केंद्र सरकारें अपदस्थ हो चुकी हैं. पहली बार 1974 में भ्रष्टाचार के खिलाफ़ बगावत की आवाज गूंजी. दूसरी बार 1989 में बोफ़ोर्स तोप में कमीशन की चरचा उठी और वह आंधी में तब्दील हो गयी.

इस बार केंद्र सरकार चौकस है या राजनीतिज्ञों ने 1974, 1989 और मध्यपूर्व देशों की हाल की घटनाओं से सीखा है. वे जहां भी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आंदोलन का धुंआ देखते हैं या प्रतिरोध की आवाज सुनते हैं, उसे तुरंत बुझाने में जुट जाते हैं. इसलिए अन्ना हजारे हों या बाबा रामदेव, दोनों को तुरंत केंद्र सरकार मनाने में जुट गयी. एक और वजह संभव है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की निजी छवि बेदाग है, संभव है, वे भी भ्रष्टाचार रोकने के सवाल पर उतने ही संवेदनशील हों, जितने अन्य. पर हकीकत यह है कि सरकार इस गंभीर रोग का इलाज नहीं कर पा रही. कैसे और क्यों?

दुनिया जान रही है. रोज-रोज अनेक सर्वे और प्रामाणिक रिपोर्ट आ रही हैं कि भारत, दुनिया के भ्रष्टतम देशों में से एक है. इसकी पुष्टि भी हुई है, केंद्र में मंत्री रहे लोग, बड़े आइएएस, कारपोरेट घरानों के टाप लोग तिहाड़ जेल में हैं. ये जेल गये, सिर्फ़ और सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट के कारण. क्या केंद्र सरकार को पता नहीं था कि किन-किन विभागों में क्या ‘लूट खेल’ चल रहे हैं? भ्रष्टाचार रोकने के सख्त कानून बनाने के लिए क्यों केंद्र सरकार को किसी आंदोलन, उपवास और अनशन की प्रतीक्षा करनी पड़ती है? सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने, सार्वजनिक रूप से माना है कि देश में भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा है. फ़िर कानून क्यों नहीं बन रहे? क्यों अन्ना हजारे या बाबा रामदेव के आंदोलन-उपवास की प्रतीक्षा में सरकार रहती है?

सरकार जनता द्वारा चुनी और उसकी नुमांइदा है, बाबा रामदेव या अन्ना हजारे जैसे लोग ‘जनता की आवाज’ होने का दावा कर सकते हैं, पर वे चुने प्रतिनिधि नहीं हैं. इस तरह जनता की पीड़ा, जनता द्वारा चुने लोग स्वत कानून बना कर क्यों पहल नहीं करते? भ्रष्टाचार रोकना, मूलत सरकार का धर्म और फ़र्ज है. पंडित नेहरू ने आजादी के बाद सपना देखा था कि भ्रष्टाचारी, चौराहे पर, लैंपपोस्ट पर फ़ांसी पर लटकायें जायें. उनके उत्तराधिकारी हैं, आज के कांग्रेसी. सबसे अधिक वर्षों से देश में राज करने वाले. अगर ये कांग्रेसी हटे भी, तो दो बार भ्रष्टाचार के सवाल पर ही. लेकिन इस भ्रष्टाचार को रोकने, सख्त सजा देने, मामलों के स्पीडी ट्रायल कराने के कानून क्यों नहीं बनाये गये? अगर ये कानून बने होते, तो आज केंद्र सरकार को अन्ना हजारे पर बाबा रामदेव के आगे मत्था नहीं टेकना पड़ता.

पर सरकार न कानून बना रही है, न इस भ्रष्टाचार के आंदोलन को सुलगने देना चाहती है. सरकार का खेल साफ़ है, वह भ्रष्टाचार के सवाल को आंदोलन नहीं बनने देगी, क्योंकि यह आग उसे जला देगी. उधर भ्रष्टाचार की जांच बढ़े और सख्ती हो, तो बड़े-बड़े मामले आयेंगे. स्विस बैंकों या विदेशी बैंकों में जमा धन से लेकर शासक वर्ग (पक्ष-विपक्ष, नौकरशाह, उद्योगपति यानी पूरा रूलिंग एलीट) के चेहरे उजागर होंगे. खेल में, टेलिकॉम में, खाद्यान्न में..जहां देखिए बड़े घोटाले, बदबू और कुशासन.

अब ताजा उदाहरण एयर इंडिया का है. अचानक एक दिन खबर आयी कि केरल में एयर इंडिया के एक जहाज को, एक तेल कंपनी (वह भी सरकारी) ने तेल भरने से इनकार कर दिया, क्योंकि एयर इंडिया को तेल मद में 1200 करोड़ से अधिक देना है. एयर इंडिया, भ्रष्टाचार और कुशासन के कारण दम तोड़ रहा है. जनता की पूंजी झोंकी जा रही है, रूलिंग एलीट (समाज का प्रभु शासक वर्ग) की सुख-सुविधा और तफ़रीह में. वह भी जनता के नाम पर. एयर इंडिया का कुल घाटा है, 14000 करोड़. हर जहाज के पीछे 160 कर्मचारी हैं. हर जहाज में 60 फ़ीसदी के लगभग यात्री होते हैं. यानी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं. हर जहाज प्रतिदिन औसतन नौ घंटे उड़ान भरता है.

उधर एयर इंडिया पर 40,000 करोड़ का कर्ज है. बिना योजना या रणनीति के पहले विमान मंत्री ने 100 जहाज खरीद लिये. उनकी वकालत या मांग पर 2000 करोड़ की अतिरिक्त पूंजी केंद्र सरकार ने डाली. इस वर्ष फ़िर एयर इंडिया में 1200 करोड़ पूंजी डालने का प्रस्ताव है. वित्तीय सलाहकार डिलोटि के अनुसार इस एयर इंडिया को चलाते रहने के लिए 17500 करोड़ तत्काल चाहिए. हाल के एयर इंडिया पायलटों की हड़ताल को याद करें, इसमें 200 करोड़ का नुकसान हुआ. यह सब बोझ किस पर? हम पर, आप पर.

और इसे रोकने के लिए रोज कानून बनाने की मांग हो रही है. पर यह भ्रष्टाचार उसी तेजी से गांव-गांव, घर-घर पहुंच-पसर रहा है. दुनिया के एक विख्यात न्यायविद, न्यायमूर्त्ति हैंड ने कहा था, आजादी के बारे में. नैतिकता या भ्रष्टाचार के प्रसंग में भी वही चीज लागू है. उनका कथन था, आजादी मर्दों-औरतों के दिलों में बसती है. जब वहां यह मर जाती है, तब इसे कोई संविधान, कानून या अदालत नहीं बचा सकती. आजादी की जगह नैतिकता जोड़ कर पढ़ें या भ्रष्टाचार से नफ़रत बोध. एक और प्रसंग. राजनीति से नफ़रत करने वालों के लिए!

फ़िर समझ लें, राजनीति ही कुछ कर सकती है. वही दवा है, भ्रष्टाचार जैसे मर्ज की. जेपी आंदोलन या 89 में भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आंदोलन, राजनीतिक अभियान थे. यह अलग प्रसंग है कि कामयाबी (चुनावी सफ़लता) के बाद भी वे मुकाम तक नहीं पहुंचे. पर वे आंदोलन शुरू होते ही समझौते के शिकार नहीं बने. अन्ना हजारे की तरह. या बाबा रामदेव के साथ भी जो पहल हुई है. कोई राजनीतिज्ञ इस जनसवाल पर परदे के पीछे हल नहीं निकालेगा. वह लंबी लड़ाई की तैयारी करेगा. क्योंकि यह महज सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं, व्यवस्था परिवर्तन की कठिन लड़ाई है. व्यवस्था बदले बिना, भ्रष्टाचार नहीं रुकने वाला. पर आज की राजनीति में वह ताकत, चेहरा और ऊर्जा कहां है?

लेखक हरिवंश प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं, देश के जाने-माने पत्रकार हैं. सरोकार वाली पत्रकारिता के अगुवा हैं. उनका यह लिखा प्रभात खबर में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लेकर भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित किया गया है.

पारदर्शिता क्रांति में नेता, अफसर, व्यवसायी बाधक

: पर अब रोके न रुकेगा यह महाभियान : भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम से कांग्रेस के अंदर भी खदबदाहट मची है. कोई कांग्रेसी चाहकर भी रामदेव और अन्ना के आंदोलन को सपोर्ट नहीं कर पा रहा क्योंकि देश में भ्रष्टाचार की जमनोत्री-गंगोत्री कांग्रेस को ही माना जाता है, और, बाबा व अन्ना का आंदोलन कांग्रेस के राज करने के तौर-तरीके के खिलाफ है जिसके कारण लाखों करोड़ रुपये विदेश में ब्लैकमनी के रूप में जमा है.

लेकिन कुछ कांग्रेसी नेता इशारों-इशारों में कांग्रेस आलाकमान तक संदेश पहुंचा रहे हैं. रक्षा मंत्री एके एंटनी का कल दिया गया एक बयान चौंकाने वाला है. उन्होंने अपने बयान में कहा कि राजनेता और नौकरशाह नहीं चाहते पारदर्शिता. एंटनी के मुताबिक पारदर्शिता क्रांति के दौर से गुजर रहा है देश. गोपनीयता की दीवार धीरे-धीरे हर क्षेत्र में टूट रही है जिसमें राजनीति, कारोबार, प्रशासन और न्यायपालिका शामिल है.

सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से चलाई जा रही भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम की पृष्ठभूमि में रक्षा मंत्री एके एंटनी ने बुधवार को कहा कि राजनीतिज्ञ, नौकरशाह और महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोग पारदर्शिता के लिए तैयार नहीं हैं. इससे समस्याएं पैदा हो रही हैं. एंटनी ने कहा कि देश ‘ पारदर्शिता क्रांति’ के दौर से गुजर रहा है जिसे बीच में रोका नहीं जा सकता है. देश नए दौर की क्रांति से गुजर रहा है-पारदर्शिता क्रांति. गोपनीयता की दीवार धीरे-धीरे हर क्षेत्र में टूट रही है जिसमें राजनीति, कारोबार, प्रशासन और न्यायपालिका शामिल है. एक बार जब यह चलन शुरू हो जाता है तब आप इसे बीच में नहीं रोक सकते.

एंटनी ने कहा कि बदलाव के इस दौर में समस्याएं सामने आ रही हैं, क्योंकि भारत तैयार नहीं है. भारत के राजनीतिज्ञ, नौकरशाह, कारोबारी, सशस्त्र बल और महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोग इस बदलाव के लिए तैयार नहीं हैं. महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोग बदलाव के लिए तैयार नहीं हैं, इसलिए परिवर्तन में कुछ समस्याएं आ रही हैं. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने इसे भारतीय लोकतंत्र का हिस्सा बताते हुए विश्वास व्यक्त किया कि कुछ वर्षों के बाद ऐसा होगा. बदलाव होंगे. प्रेस क्लब आफ इंडिया के नए सम्मेलन कक्ष का उद्घाटन करने के बाद एंटनी संवाददाताओं से बात कर रहे थे.

अन्ना हजारे समेत समाज के प्रबुद्ध लोग सरकार और संस्थाओं के कामकाज में पारदर्शिता बरतने और कार्यों की निगरानी के लिए आंदोलन कर रहे हैं. देश में बढ़ती पारदर्शिता का श्रेय संसद को देते हुए उन्होंने कहा, ‘इसके (पारदर्शिता) लिए आपको भारत की मीडिया, एनजीओ और सामाजिक कार्यकर्ताओं को श्रेय देना चाहिए, लेकिन अंतत: भारत की संसद ने सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून बनाया.’ मंत्री ने कहा, ‘पीछे जाने की बजाए मैं समझता हूं कि आने वाले समय में आरटीआई नए क्षेत्रों में फैलेगा. मैं समझता हूं कि जीवन का प्रत्येक क्षेत्र पारदर्शी बन जाएगा. भारत में यह कानून के तहत हो रहा है.’ राष्ट्र निर्माण में मीडिया की भूमिका की सराहना करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि मीडिया को निहित स्वार्थी तत्वों के बहकावे में नहीं आना चाहिए.

अन्ना के मंच से उतारी गईं वामपंथी नेता

कविता कृष्णन
कविता कृष्णन
नई दिल्ली : राजघाट पर जुटे अन्ना हजारे के हजारों समर्थकों ने जंतर-मंतर की तरह ही एक बार फिर भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में अन्य दलों के नेताओं को किसी भी तरह से जुड़ने नहीं दिया। अगर कोई पार्टी से जुड़ा व्यक्ति मंच पर दिखा भी तो उसे लोगों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा और मजबूरन उस नेता को चुपचाप वहां से खिसक लेना पड़ा।

नेताओं से मोहभंग की अपनी इन भावनाओं का लोगों ने पोस्टरों, नारों और गानों के माध्यम से इजहार भी किया। अन्ना के पिछले आंदोलन के दौरान जहां चौटाला और उमा भारती को अपमानित होना पड़ा था तो इस बार के आंदोलन के दौरान एक महिला कम्युनिस्ट नेता की दुर्गति हो गई। राजघाट पर अन्ना हजारे के अनशन के दौरान जब मंच संचालक ने मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी विचारधारा से जुड़ी एक महिला नेता को बोलने के लिए आमंत्रित किया तो लोग अन्ना के मंच से नेता को बोलने का मौका दिए जाने की बात सुनकर भड़क गए। इस महिला नेता ने मंच से जैसे ही लोगों को संबोधित करना शुरू किया तो वैसे ही अन्ना समर्थकों के एक बड़े हुजूम ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया। देखते ही देखते विरोध के स्वर बढ़ते गए। आखिरकार भाकपा माले नेता को अपना वक्तव्य बीच में ही बंद करके मंच से उतर जाना पड़ा।

इस महिला नेता का नाम है कविता कृष्णन। ये कभी जेएनयू में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की नेता हुआ करती थीं। इन दिनों भाकपा माले की केंद्रीय समिति की सदस्य हैं। जानकारी के मुताबिक राजघाट पर अन्ना के अनशन के दौरान मंच संचालक ने भाकपा माले और आइसा से जुड़ीं कविता कृष्णन को बोलने के लिए आमंत्रित किया। कविता ने जब मंच पर आकर लोगों को संबोधित करना शुरू किया तो कई लोग उन्हें मंच से उतारने की आवाज उठाने लगे। थोड़ी ही देर में काफी संख्या में लोग इस नेता को मंच से हटाने की मांग करने लगे। माहौल बिगड़ता देख वहां मौजूद कार्यकर्ताओं और मंच संचालक ने कविता कृष्णन से मंच से उतरने की अपील की। अंततः कविता को अन्ना के मंच से हटना पड़ा और इसी के बाद वहां मौजूद भीड़ शांत हुई।

गौरतलब है कि अन्ना हजारे और उनके समर्थक पहले भी इस बात को कहते रहे हैं कि उनके अनशन में मंच पर किसी राजनेता या राजनीतिक विचारधारा से जुड़े व्यक्ति को नहीं आने दिया जाएगा। इससे पहले चार अप्रैल से जंतर मंतर पर हुए अन्ना के अनशन में भी उमा भारती और ओम प्रकाश चौटाला जैसे नेताओं को लोगों ने मंच पर नहीं चढ़ने दिया था। यही नहीं, यहां मौजूद कई लोगों में इस बात को लेकर भी रोष देखने को मिला है कि बाबा रामदेव के कार्यक्रम में साध्वी रितंभरा और संघ परिवार के करीबी लोगों को क्यों मंच से जोड़ा गया।

अन्ना हजारे, रामदेव और कांग्रेस – (एक)

दिनेश चौधरी: जब धर्म धंधे से जुड़ता है तो उसे योग कहते हैं- हरिशंकर परसाई : इस समय देश की राजनीति में कुकरहाव जैसा मचा हुआ है। पता नहीं आपके किस बयान को किस रूप में ले लिया जाये और हमले करने के लिये आप पर किसी प्रवक्ता को छोड़ दिया जाये। इन प्रवक्ताओं ने और कुछ किया हो या न किया हो, कुछ बातों को अच्छी तरह से स्थापित कर दिया है।

जैसे यह कि जिस तरह घटिया लेखक आगे चलकर अच्छा आलोचक साबित होता है उसी तरह पिटे हुए नेता प्रवक्ता बनने के आदर्श पात्र होते हैं। इन्हीं प्रवक्ताओं का पुण्य स्मरण करते हुए और इनसे बख्श देने की अग्रिम याचना करते हुए मैं यह बात पहले ही साफ कर देना चाहता हूं कि मैं यह लेख किसी पत्रकार या टिप्पणीकार की हैसियत से नहीं, बल्कि एक आंदोलन के छोटे से कार्यकर्ता की हैसियत से लिख रहा हूं, जिसकी चिंता के केंद्र में सड़ी हुई राजनीति नहीं बल्कि जन-आंदोलन हैं और ये भय है कि कुछ लोगों की करतूतों की वजह से कहीं ये आंदोलन भी लोगों के बीच अपनी विश्वसनीयता न खो बैठें।

बाबा रामदेव जब व्यवस्था परिवर्तन के लिये हुंकार भर रहे थे और वीरों के अंदाज में सरकार को ललकार रहे थे तब मुझ समेत आंदोलन के अनेक साथी इस बात की सांस रोककर प्रतीक्षा कर रहे थे कि देखें, बाबा की पोल कब तक खुलती है? पोल खुलेगी यह बात सभी को मालूम थी पर इतनी जल्दी खुल जायेगी, ये किसी ने नहीं सोचा था। और अब तो जो बाबा कर रहे हैं वह सरेआम अपनी ही लंगोट खोलने जैसा है। लेकिन इस कहानी की तफसील में जाने से पहले जरा कांग्रेस के खेल को समझ लिया जाये।

बड़े-बड़ों से लेकर छुटभैयों तक, सारे कांग्रेसी नेताओं ने बाबा के खिलाफ हल्ला बोल दिया है और यह हल्ला बोल एक तरह से मैडम की निगाह में गुडबाय बनने का जरिया होकर रह गया है। कल तक बाबा की चरणों में लोटने वाले कांग्रेसी अलादीन के चिराग घिसकर नये-नये दस्तावेज जुगाड़ने में लगे हैं कि बाबा तो संघ का आदमी है। बाबा के संघ का आदमी होने की बात इन बेचारे भोले-भाले नेताओं को ब्रेकिंग न्यूज की तरह अभी-अभी मालूम हुई है, वरना इनके चार-चार बड़े नेता कल तक बाबा के चरणों में शीर्षासन कर रहे थे। क्या सचमुच ये कांग्रेसी इतने भोले-भाले हैं?

बाबा ने करोड़ों रूपयों का साम्राज्य क्या एक ही दिन में खड़ा कर लिया, रामदेव के गुरू शंकरदेव कथित रूप से लापता हैं, बाबा के “सहयोगी” राजीव दीक्षित को इतनी कम उम्र में हैरतअंगेज ढंग से दिल का दौरा क्यों पड़ा और बालकृष्ण की नागरिकता पर उठने वालों सवालों की जानकारी भी कांग्रेस को तभी हुई जब बाबा से उनकी “डील” विफल हो गयी। इस “डील” के विफल होने के बाद से ही बाबा व कांग्रेस में कुकरहाव मचा हुआ है और देश का पूरा माहौल गंधाने लगा है। बिल्ली के भाग से छींका टूटा और ताल ठोककर भाजपा भी मैदान में आ गयी है। काले धन का असल मुदृदा हाशिये पर चला गया और कांग्रेस चाहती भी यही थी। आखिर इतने दिनों से वे शासन कर रहे हैं तो क्या खाली देश की सेवा ही कर रहे थे? सुप्रीम कोर्ट की झाड़ खाने के बाद भी जो सरकार बेशर्मी के साथ निकम्मापन दिखाये तो चोर दाढ़ी में तिनका वाली बात तो समझ में आती ही है।

कुछ बेहद अंदरूनी सूत्रों की बात पर यकीन किया जाये तो समझा जाता है कि बाबा की फाइल कांग्रेस ने तभी तैयार कर ली थी जब से उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षायें जोर मारने लगी थीं। कहा जाता है कि सोनिया के नजदीकी व कांग्रेस के एक खासमखास नेता ने बाबा को यह फाइल पहले ही दिखा थी और उनसे कहा गया था कि या तो वे चुपचाप योग ही करते रहें या राजनीति का शौक चर्रा रहा है तो अपनी नयी पार्टी खड़ी कर लें। कांग्रेस को न तो बाबा के योग से आपत्ति थी और न ही नयी पार्टी बनाने से। उल्टे कांग्रेस चाहती थी कि बाबा नयी पार्टी खड़ी कर लें तो उन्हें भाजपा को निपटाने में आसानी रहेगी क्योंकि विचारधारा के आधार पर वोट तो आखिर उन्हीं के कटने हैं।

सूत्रों के अनुसार व्यावसायिक बुद्धि के बाबा ने कांग्रेस की इस धमकी को भी एक अवसर के रूप में लिया और वे कांग्रेस और भाजपा दोनों को “डबलक्रास” करते रहे। कांग्रेस को जताते रहे कि वे एक नयी पार्टी खड़ी कर रहे हैं और यह जताते हुए सरकार से तमाम सुविधायें लेते रहे और उधर भाजपा को यह संकेत देते रहे कि अपनी विचारधारा तो एक ही है, इसलिए जब भी पककर टपकेंगे उनकी ही झोली में गिरेंगे। रिश्ते तो उनके मायावती से भी खराब नहीं रहे और शायद कल ही कह रहे थे कि चंद्राबाबू नायडू ने भी उन्हें फोन किया है। वे सबसे मैनेज करके चलने वाले योगगुरू हैं, जो इस बात को अच्छी तरह से समझते हैं कि देशभक्ति भी एक ब्रांड है, जो बाजार में हाथों-हाथ बिकता है।

इस कहानी में ट्विस्ट तब आया जब बीच में अन्ना हजारे ने एंट्री मार दी। अन्ना गांधीवादी हैं और बरसों से ईमानदारी के साथ अपने काम में लगे हुए हैं। उन्हें मिले मीडिया के प्रचार से बाबा को लगा कि उनका मुद्दा हाईजैक हो गया। साथ ही किंगमेकर बनने की उनकी दबी हुई महत्वाकांक्षाओं ने फिर से जन्म लिया और उन्हें लगा कि बदले हुए हालात में कांग्रेस को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आसानी से घेरा जा सकता है, इसलिये वे लाव-लश्कर लेकर दिल्ली पहुंच गये। दिल्ली में हुए उनके स्वागत ने उनके अहंकार को और बढ़ा दिया कि वे लाखों लोगों के दिलों में राज करने वाले स्वामी हैं और अब उनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता।

बाबा ने तो उस समय – हालांकि इसका अवसर भी नहीं मिला होगा- सपने में भी नहीं सोचा होगा कि ये सरकार उन पर डंडे भी चला सकती है। उधर कांग्रेस ने जब देखा कि अन्ना हजारे की ड्राफ्टिंग कमेटी को बदनाम करने की पुरजोर कोशिशें नाकाम हो गयीं हैं तो उसने यह अंदाजा लगा लिया था का अन्ना को सीधे तो नहीं घेरा जा सकता इसलिये बेहतर है कि रामदेव को ही हवा देकर उनका कद कुछ कम किया जाये, बाबा को गुब्बारे की तरह फुलाया जाए और मौका लगते ही पिन खोंस दी जाये। गड़बड़ ये हुई की अभूतपूर्व स्वागत व भीड़ से बाबा को और बालकृष्ण की चिट्ठी से सिब्बल को कुछ ज्यादा ही जोश आ गया और जो “लड़ाई” सौहाद्रपूर्ण माहौल में चल रही थी वह आर-पार की लड़ाई में तब्दील हो गयी। अन्यथा न तो बाबा कांग्रेस से सीधा टकराव चाहते थे और न ही कांग्रेस चाहती थी कि वे भाजपा की झोली में जा टपकें।

हे भड़ासी भाइयो, ठीक इसी बिंदु पर आकर मुझे क्षमा करें क्योंकि मैं इस कहानी को कोई आठ-दस बरस पीछे की ओर ले जाना चाहता हूं जो कि बाबा के चरित्र को समझने के लिये आवश्यक है। यह कहानी बाबा के “सहयोगी” और एक समय आजादी बचाओ आंदोलन के फायर ब्रांड नेता रहे राजीव दीक्षित की है। इसे जानना इसलिये भी जरूरी है क्योंकि गांधीवादी आंदोलनों में नैतिक शक्ति, चारित्रिक बल, शील, सत्य, शुचिता जैसे तत्वों का बोलबाला रहता है व अन्ना के आंदोलन व रामदेव के आंदोलन में बुनियादी अंतर को भी इन्हीं के संदर्भों में समझा जा सकता है।

-जारी-

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद भिलाई में एक बार फिर नाटक से लेकर पत्रकारिता तक की दुनिया में सक्रिय हैं. वे इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष भी हैं. उनसे संपर्क iptadgg@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. दिनेश चौधरी के भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित अन्य लेखों को पढ़ने के लिए क्लिक करें- भड़ास पर दिनेश

”अमूल बेबी” के बोल कब फूटेंगे

भूमिका राय
भूमिका राय
: रामदेव से लेकर अन्ना और भाजपा तक को कुछ न कुछ मिला… हर बार की तरह इस बार भी ठगी गई सिर्फ जनता : एक बार फिर जनता ठगी-सी खड़ी है. अवाक है और परेशान भी। अवाक, क्योंकि जिन हाथों में उसकी सुरक्षा का दायित्व था, उन्हीं हाथों से उसे ज़ख्म मिले हैं और परेशान इसलिए, कि आखिर वो जाए तो जाए कहां?

बाबा रामदेव ने जब अनशन की शुरुआत की तो, एक आस बंधी थी कि शायद इस बार हम भ्रष्टाचार को कड़ी टक्कर दे पाएं। लेकिन सरकार की दमनकारी नीति ने सब कुछ तितर-बितर कर दिया। इससे पूर्व अन्ना हजारे के आन्दोलन का हश्र भी कुछ ऐसा ही हुआ। हालांकि उनके अनशन पर किसी तरह का हमला नहीं हुआ लेकिन आज तक कोई परिणाम भी नहीं निकला। बैठकों का दौर जारी है और हर बैठक के साथ एक नये विवाद का जन्म भी।

बीते हफ्ते रामदेव के सत्याग्रह ने पूरे देश को एक सूत्रा में पिरोने का काम किया। ऐसा नहीं था कि इसमें केवल बाबा के समर्थक ही मौजूद थे। वे भी थे जो बाबा से भले कोई वास्ता न रखते हों पर देशहित की बात ने उन्हें भी रामलीला मैदान तक पहुंचा दिया। पर अब….. अब ना तो मुद्दे हैं और न ही उनका कोई सरपरस्त। काले धन का मुद्दा तो कभी का पीछे छूट गया है और अगर कुछ शेष है तो नवविवादित जूता काण्ड, सुषमा का नाच, भाजपा का प्रदर्शन, बाबा-भाजपा-संघ का रिश्ता, लाठी चार्ज, सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार। लेकिन जिस विषय को लेकर जनता ने रामदेव बाबा का समर्थन किया था अब उनकी प्रासंगिकता धुंधली हो चुकी है।

सरकार की बात करें तो शायद ‘मौकापरस्त’ ही एक ऐसा शब्द मिले जो इसकी छवि का पर्याय बन सके। ये वही सरकार है और ये वही युवराज जो कभी आम जनता की आवाज बनने का दावा करते हैं तो कभी उनके साथ राज्य सरकार के विरोध में धरने पर बैठ जाते हैं। यही नहीं गिरफ्तारी तक देते हैं। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर तो सरकार की पोल बहुत पहले ही खुल चुकी है लेकिन शनिवार को जो हुआ, उसने सत्ता की रावणनीति को पूर्णतः स्पष्ट कर दिया। ‘अमूल बेबी’ तो लगता है बोलना ही भूल चुके हैं और दो दिन बाद जब प्रधनमंत्री के बोल फूटे तो बड़े ही नपे-तुले शब्दों में या यूं कहें कि डिक्टेटेड शब्दों में उन्होंने कहा कि हमारे पास कोई और चारा नहीं था। देश के प्रधनमंत्री की इस लाचारी पर तरस तो नहीं, गुस्सा जरूर आता है।

कहावत है कि ‘‘जाकै काज तेही को साजै और करे तो डंडा बाजै’’ लेकिन वरद हस्त की छाया में वे तो सुरक्षित है और डंडे की चोट पर है मासूम जनता। अगर सत्ता का ये हाल है तो विपक्ष भी पीछे नहीं है। गुमनामी के अन्धेरों में लगभग खो-सी गई भाजपा को भी टीवी स्क्रीन पर चमकने और अखबारों में हेडलाइन बनने का मुद्दा मिल गया है। उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं और अब तक कोई ठोस मुद्दा ना होने के कारण भाजपा बुझी-बुझी नजर आ रही थी। लेकिन सत्याग्रह के मुद्दे ने उनमें भी नवसंचार कर दिया है। विपक्ष जनता की सोचने लगा है, और उसके लिए राष्ट्रपति तक से गुहार लगाने लगा है लेकिन ये नहीं कह सकतें कि ये सच्चाई है या ढोंग। जो भी हो एक सक्रीय विपक्ष नजर आने लगा है। पर यहां भी राजनीति ही हावी है और स्वयं का हित ही प्राथमिकता बना हुआ है।

रही बात अन्ना एण्ड पार्टी की तो, जो आवाज जन्तर-मन्तर से बुलन्द हुई अब चारदीवारी में ही दबकर रह गयी है। जब अन्ना ने अनशन शुरू किया था तो लगा कि देश में बदलाव की बयार आ गयी है और निश्चित तौर पर अब कुछ होकर रहेगा, लेकिन तमाम बुद्धजीवियों को ठेंगा दिखाते हुए अन्ततः सरकार वही कर रही है जो वो चाहती है।  अन्ना के चरित्र पर किसी को कोई शक नहीं लेकिन आपसी मतभेदों और सरकार की चालों में फंसकर अन्ना की टीम ने खुद ही अपनी मिट्टी-पलीद करवा ली है। कहीं न कहीं जनता का मोहभंग तो हुआ ही है और इसके लिए परिणामों से कहीं ज्यादा अन्ना और उनकी टीम की जल्दबाजी और अधूरी तैयारी जिम्मेदार है।

अब बात रामदेव के सत्याग्रह की। रामदेव ने सत्याग्रह तो बड़ी ही तैयारी से शुरू किया, और जब सत्ता के चार आला नेता उनके सम्मान में नतमस्तक दिखे तो लगा कि शायद इसबार काले धन का मुद्दा सुलझ जाए लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। जो हुआ वो आपके और हमारे सामने है। रामदेव का अन्धानुकरण न करते हुए अगर सोचें तो क्या ऐसा नहीं लगता कि रामदेव को पहले ही अपनी सम्पत्ति का खुलासा कर देना चाहिए था और वैसे भी सांच को आंच क्या। अगर वे सच्चे हैं तो पहले या बाद में का कोई प्रश्न ही नहीं उठता और यदि उन्होंने किसी पत्र पर सहमति दी है तो उसका खुलासा, साफ-साफ तौर पर जनता से करते।

उन्हें क्यों ऐसा लगा कि ऐसा करने से वे कमजोर पड़ जाएंगे या जनता उनका साथ नहीं देगी? जो जनता भरोसा करके अपना कामधाम छोड़, भूखे-प्यासे आपके साथ खड़ी है क्या वो सच जानकर आपका साथ छोड़ देती? जनता रामदेव के साथ आयी क्योंकि ये मुद्दा उससे जुड़ा था और बाबा उसके लिए आवाज बुलन्द कर रहे थे, लेकिन कहीं न कहीं रामदेव ने बात छिपाकर जनता को छला तो है ही। अब सब कुछ सामने आ चुका है, शेष है तो सिर्फ राख के ढ़ेर पर पत्थरबाजी करने का दौर।

सरकार को जो करना था उसने किया और आज भी बिना किसी की परवाह किये वही कर रही है जो उसे करना है। भाजपा जिन टर्निंग प्वाइंट्स की खोज में थी वो उसे रामदेव के सत्याग्रह के रूप में बैठे-बिठाए मिल गया। अन्ना एण्ड ग्रुप को जो चाहिए था वो उसे मिला भी और खो भी गया। रामदेव को राजनीति में आने का रास्ता मिल गया और मुद्दा धुंआ हो गया, कल तक गर्मी दिखाने वाले बाबा आज केन्द्र को माफी देते नजर आ रहे हैं लेकिन जनता…..? जनता आज भी वहीं है जहां कल थी। आज भी भ्रष्टाचार उसी का निवाला छीन रहा है और सरकार भी उसी की गर्दन दबोच रही है। शनिवार के काण्ड ने उसके मन में रोष तो भरा है लेकिन साथ ही एक झिझक भी। झिझक, कि क्या उसे अब किसी आन्दोलन का हिस्सा बनना चाहिए? लेकिन अब अगर हम चुप रहे तो लाठियों की जगह गोलियां ही चलेंगी।

अब हमें ही ये समझना होगा कि वास्तव में ये हमारे हक की ही लड़ाई है और हमें ही इसकी कमान सम्भालनी होगी। अपने-अपने स्तर पर इस भ्रष्टाचार को दूर करने का प्रयास करना होगा और इसे अपनी आदत में शुमार करना होगा क्योंकि वार्षिक उत्सव के तौर पर मनाये जाने वाले इन आन्दोलनों का हश्र हम सबके सामने है। आने वाले कुछ दिनों में एक बार फिर सबकुछ सामान्य हो जाएगा। बाबा पतंजलि में ध्यान रमा लेंगे और राजनीतिक दल चुनावों में, लेकिन हमारा क्या? हमारे मुद्दों का क्या? वो तो आज भी जस के तस बने हुए हैं और अब अगर हमने कुछ नहीं किया तो संभव है ये धोखेबाज देश के साथ-साथ हमें भी बेच खाएं। तो इससे पहले की बहुत देर हो जाए आज से ही अपने स्तर पर भ्रष्टाचार की लड़ाई की शुरुआत करें।

लेखिका भूमिका राय दिल्ली विश्वविद्यालय के कम्युनिटी रेडियो में बतौर कार्यक्रम उदघोषक कार्यरत हैं. उन्होंने हाईस्कूल व इण्टरमीडिएट लखनऊ से और स्नातक की शिक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय से पूरी की है. वर्तमान में भारतीय विद्या भवन से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा में अध्यनरत हैं.

बाबा व भक्तों पर जुल्म के खिलाफ आज ब्लैक डे मनाएं

यशवंत सिंहकुछ काम अन्ना ने किया और काफी कुछ बाबा ने कर दिखाया. अन्ना ने करप्ट कांग्रेसियों पर भरोसा किया और सरकार के झांसे में आ गए तो नतीजा ये है कि उन्हें अब रोना पड़ रहा है, मुद्दा पीछे छूट गया और तेवर पीछे रह गया. शेष है तो सिर्फ फिजूल की बैठकों का दौर और बेवजह की उठापटकों की चर्चाएं.

बाबा ने हुंकार भरकर सत्याग्रह शुरू किया तो सरकार एक दफे चरणों में लोट गई. बाबा जब न माने तो बाबा को धक्का मारकर दिल्ली से बाहर भगा दिया. बाबा के अनुयायियों पर लाठियां बरसी. एक संत का अपमान. हजारों साधकों का अपमान. इस भारत देश में संत का ऐसा खुलेआम अपमान नहीं किया गया, उस संत का जो देश हित की बातें कर रहा है. बाबा रामदेव को जिस तरह से पुलिस वालों ने, गुप्तचर एजेंसियों के लोगों ने नजरबंद किया वह शर्मनाक है. जैसी पिटाई श्रद्धालुओं और सत्याग्रहियों की की गई, वह लोकतंत्र का काला अध्याय है. पर यह सब अब हो ही गया है तो तय मानिए की कांग्रेस ने अपने ताबूत में कील ठोंक ली है. देश का आम जन सांस बांधे टीवी देख रहा है. अखबार पढ़ रहा है. बाबा के अपमान को महसूस कर रहा है. सत्याग्रहियों के साथ हो रहे जुल्म को खुद पर जुल्म गिन रहा है.

वंदेमातरम और बाबा जिंदाबाद जैसे नारों के बीच पिटते लोगों को देखना अंग्रेजों के दौर की याद दिला देता है. यह जो घाव, यह जो जख्म सरकार ने ईमानदारी के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने वालों को दिया है, वह जल्द भरेगा नहीं, वक्त का मरहम भी काम नहीं आए. अगले लोकसभा चुनाव में अगर कांग्रेस का सूपड़ा पूरे देश से साफ नहीं हुआ तो तय मानिए कि बाबा और उनके सत्याग्रहियों पर हुए जुल्म का बदला नहीं लिया गया. ऐसी कांग्रेसी सरकार के खिलाफ उठ खड़े होने और इसे उखाड़ फेंकने का दौर आ चुका है. आप जहां भी हों, जिस भी स्थिति में हो, बाबा और उनके लोगों पर हुए जुल्म के खिलाफ अपना विरोध प्रकट करें. अपने-अपने ब्लागों पर  पोस्ट लिखें. ट्विटर और फेसबुक पर ब्लैक डे मनाएं. आम जन के बीच कांग्रेस और उनके नेताओं के करप्शन की पोल खोलें और इनकी निंदा करें. और कुछ न करें तो कम से कम काली टीशर्ट या शर्ट पहनें.

मैं निजी तौर पर आज के दिन को काला दिवस के रूप में मना रहा हूं. इसी कारण भड़ास4मीडिया पर एक ब्लैक पट्टी लगा दी है. विरोध जताने के लिए ही यह पोस्ट लिख रहा हूं और फेसबुक व ट्विटर आदि पर भी बाबा व भक्तों पर हुए जुल्म के खिलाफ आवाज उठाऊंगा. अन्ना हजारे जिंदाबाद. रामदेव जिंदाबाद. भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग जारी रहे. भ्रष्ट और निकम्मी कांग्रेस पार्टी और इसके कर्ताधर्ता मुर्दाबाद…. दांव-पेंच में फंसाकर करप्शन के मुद्दे को डायलूट करने वाली केंद्र सरकार मुर्दाबाद…

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

bhadas4media@gmail.com

लोकपाल बन गया होता तो अनिल अंबानी अब तक जेल में होते

: अगर लोकपाल बन गया तो आधे मंत्री जेल में होंगे :  सरकार लोकपाल मामले को पटरी से उतारना चाहती है :  “2जी मामले में सीबीआई अगर निश्पक्ष तरीके से जांच कर रही होती तो अनिल अंबानी अब तक जेल में होते” ये बात कही जनलोकपाल पर बनी संयुक्त ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य प्रशांत भूषण ने सीएनईबी के सप्ताहिक कार्यक्रम क्लोज एनकाउंटर में। कार्यक्रम के होस्ट हैं वरिष्ठ पत्रकार किशोर मालवीय।

किशोर के साथ खास बातचीत में प्रशांत भूषण ने कहा कि रिलायंस के तीन अधिकारियों को इस आरोप में जेल में डाल दिया गया कि उन्होंने स्वान टेलीकॉम का गठन किया और फिर उससे नाजायज फायदा लेने के लिए शाहिद बलवा को ट्रांसफर कर दिया। लेकिन अनिल अंबानी की कंपनी में 10 करोड़ रुपये से उपर की रकम को ट्रांसफर करने का अधिकार केवल अनिल अंबानी और उनकी पत्नी को था जबकि इसमें हजारों करोड़ का ट्रांसफर हुआ है और इस डील से सीधे- सीधे फायदा मालिक को मिला है।

लोकपाल पर ड्राफ्टिंग कमेटी को लेकर सरकार के रवैये पर सवाल उठाते हुए  प्रशांत भूषण ने कहा कि पहली बैठक में जो बड़े मुद्दे थे और जिनपर विवाद हो सकता था उनको किनारे कर दिया गया लेकिन बाद की बैठकों में हमलोगों ने बड़े और अहम मुद्दों पर बात शुरू करने की बात कही तो सरकार की ओर से कहा गया कि प्रधानमंत्री, जजों और संसद में वोट के बदले घूस लेने वाले सांसदो को लोकपाल के दायरे से बाहर रखा जाय।

प्रशांत भूषण ने कहा कि सरकार ने लोकपाल पर संयुक्त ड्राफ्टिंग कमेटी को जनमत के दबाव में मंजूरी दी। उन्होंने कहा कि सरकार लोकपाल मामले को पटरी से उतारना चाहती और इसी के मद्देनजर हमलोगों के खिलाफ एक रणनीति के तहत अभियान चलाया गया और दिग्विजय सिंह, अमर सिंह सहित अन्य कई प्रभावी लोगों ने सरकार के इशारे पर ऐसा किया। उन्होंने बेबाकी से स्वीकार किया कि सीडी प्रकरण में आवाज उनके पिता शांति भूषण थी लेकिन उसे बहुत चलाकी से अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की गई।

प्रशांत भूषण ने कहा कि लोकपाल से सबसे अधिक  कांग्रेस डरी हुई  है क्योंकि वह अभी सरकार  चला रही है और जिसकी  सरकार  होती है वह भ्रष्टाचार में  सबसे ज्यादा शामिल होता है।  उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में 2जी मामले की जांच चल रही है तो कई मंत्री और अधिकारी जेल में है अगर लोकपाल बन गया तो आधे मंत्री जेल में होगें। प्रशांत भूषण ने  एक सवाल के जवाब में कहा कि न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार है और कुछ जजों को प्रभावित किया जा सकता है।

प्रशांत भूषण ने अन्ना हजारे और स्वामी रामदेव के बीच किसी भी तरह के मतभेद की बात से इंकार किया। उन्होंने कहा कि स्वामी रामदेव ने प्रधानमंत्री और जजों को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने की बात किसी गलतफहमी में बोला होगा क्योंकि जो आदमी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहा है वह इस तरह की बात कैसे कह सकता है? उन्होंने सवालिया लहजे में कहा कि इसका मतलब आप ये कह रहें हैं कि प्रधानमंत्री को भ्रष्टाचार की खुली छूट होनी चाहिए? प्रशांत भूषण ने कहा कि हमलोग स्वामी रामदेव के अनशन का समर्थन कर रहे हैं लेकिन ये कोई जरूरी नहीं कि हमलोग उनके अनशन में साथ बैठें। सीएनईबी के इस कार्यक्रम का प्रसारण 5 जून रविवार शाम 7 बजे होगा और इसका दोबारा प्रसारण मंगलवार रात 9:30 बजे होगा। प्रेस रिलीज

क्या प्रधानमंत्री को लूट की खुली छूट होनी चाहिए?

: स्वामी रामदेव के अनशन पर उठ रहे सवाल का जवाब भी मिलना चाहिए :  स्वामी  रामदेव का अनशन परेशानी खड़ी करने वाला है :  भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम ज्यादा अहम है : प्रधानमंत्री  के पास देश की सुरक्षा से जुड़ी सूचना होती है साथ ही कई मंत्रालय सीधे उसके हाथ में होते हैं तो क्या ऐसे में प्रधानमंत्री को लूट की खुली छूट होनी चाहिए? न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार किस हद तक अपनी जड़ें जमा चुका है?

इसका पता इससे चलता है कि सुप्रीम कोर्ट का एक इमानदार मुख्य न्यायधीश भी हाईकोर्ट के भ्रष्ट जज के खिलाफ जांच की इजाजत नहीं दे पाता जबकि  उस भ्रष्ट जज के रिटायर होने पर अगले ही दिन सीबीआई उसे गिरफ्तार कर लेती है। ऐसे में लोकपाल के दायरे में इन्हें क्यों न लाया जाए? ये बातें कही समाजिक कार्यकर्ता और लोकपाल पर बनी ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य अरविंद केजरीवाल सीएनईबी के शो जनता मांगे जवाब में। इस शो में अरविंद केजरीवाल, समाजिक कार्यकर्ता और फिल्म निर्देशक राजा बुंदेला, वरिष्ठ पत्रकार  सत्येंद्र रंजन और समाजिक कार्यकर्ता मनीष सिसोदिया ने शिरकत की।

बहस के दौरान  माहौल उस समय गर्मागरम हो गया जब वरिष्ठ पत्रकार सत्येंद्र रंजन ने स्वामी रामदेव के आंदोलन पर सवाल खड़ा किया और कहा कि उनका आंदोलन परेशानी खड़ी करने वाला है। उन्होंने कहा कि स्वामी रामदेव भी प्रधानमंत्री बन जाएं तो भ्रष्टाचार और कालेधन की समस्या एक दिन में खत्म नहीं हो जाएगी। इसपर समाजिक कार्यकर्ता और फिल्म निर्देशक राजा बुंदेला ने कहा कि इस देश का दुर्भाग्य है कि जब भी कोई इस देश में परिर्वतन लाने की कोशिश करता है तो उसको नकारात्म तरीके से देखने की कोशिश की जाती है। उन्होंने सवालिया लहजे में कहा कि क्या गांधीजी ने आजादी के आंदोलन में बिड़ला से आर्थिक मदद नहीं ली? बुंदेला ने कहा कि इस तरह के आंदोलन के उदेश्य पर सवाल खड़ा नहीं होना चाहिए। यह बहस जब ज्याद उग्र होने लगी तो शो के होस्ट और संपादक अनुरंजन झा ने हस्तक्षेप कर मामला शांत किया।

मनीष सिसोदिया ने कहा कि  भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मुहिम चली है और यह देश में मुद्दा बना है यह बेहद अहम है। अब तक हम कहते थे कि इस देश में कुछ भी नहीं हो सकता लेकिन अब मानसिकता बदल रही है.. अब हम कहते हैं कि हो सकता है और हम सब एक साथ खड़े हो सकते हैं। स्वामी रामदेव और अन्ना के आंदोलन में  अंतर को लेकर एक बार फिर से बहस गर्म हो गई जब राजा बुंदेला ने अन्ना के आंदोलन को संभ्रांत वर्ग का आंदोलन करार दिया और कहा कि स्वामी रामदेव का आंदोलन आमलोगों का आंदोलन है। इस पर सत्येंद्र रंजन ने कहा कि अन्ना के आंदोलन पर भी सवाल उठा जिसका  जवाब उससे जुड़े लोगों  ने दिया और स्वामी रामदेव के अनशन पर उठ रहे सवाल का जवाब भी मिलना चाहिए।

भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना और स्वामी रामदेव के आंदोलन को मिले मीडिया कवरेज को सभी वक्ताओं ने तारीफ की लेकिन साथ ही यह भी कहा कि मीडिया को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि इस तरह के आंदोलन को लेकर किसी तरह भ्रम पैदा न हो। सीएनईबी के इस शो का प्रसारण 4 जून शनिवार रात 8 बजे होगा और इसका दोबारा प्रसारण रविवार सुबह 11 बजे होगा। प्रेस रिलीज

रामदेव के सत्याग्रह पर पत्रकारों की तीन त्वरित टिप्पणियां

: अपरोक्ष सत्ता संघर्ष ही है बाबा रामदेव का आंदोलन : प्रकृति, मानवता, समाज, देश हित, ईमानदारी और सच्चाई की बातों का कौन समर्थन नहीं करना चाहेगा? सकारात्मक मानसिकता वालों की तो बात ही छोडिय़े, इन मुद्दों पर नकारात्मक सोच रखने वाले भी हां में हां करते नजर आते हैं, ऐसे में योग गुरू बाबा रामदेव की बातें किसी को भला क्यूं बुरी लगेंगी?

यही कारण है कि उनके आंदोलन को देश के सभी भागों से समर्थन मिल रहा है और लोग बड़ी संख्या में दिल्ली भी पहुंच रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि हम दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लोकतंत्र का हिस्सा हैं और 26 जनवरी 1950 को लागू किये गये दुनिया के सबसे अच्छे संविधान के दायरे में रह रहे हैं, जिससे हट कर कुछ भी करना न्याय संगत कैसे हो सकता है?

हमारी अपनी व्यवस्था के अनुसार संसद सर्वोच्च है और वही रहनी चाहिए, लेकिन कभी अन्ना हजारे तो कभी बाबा रामदेव उस व्यवस्था को तोडऩे का प्रयास करते नजर आते हैं, जो व्यक्तिवादी होने का सटीक उदाहरण कहा जा सकता है। संसद में कौन बैठे हैं या किस को बैठना चाहिए? यह किसी का व्यक्तिगत निर्णय नहीं होता है। पूरी प्रक्रिया के बाद संसद के अंदर जो लोग पहुंचते हैं, वह जनता की ही पसंद के होते हैं, ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि जो जनता अन्ना हजारे या बाबा रामदेव के पीछे खड़ी नजर आती है, उसकी बुद्धि वोट देते समय कहां चली जाती है और जब जनता सही हाथों में सत्ता नहीं सौंप सकती, तो उसे सत्ता के बगैर परिवर्तन करने का अधिकार किसने दे दिया या ऐसा करना संभव कैसे है?

खैर, अहम् सवाल यही है कि बाबा रामदेव कांग्रेस या यूपीए सरकार को भ्रष्ट कह रहे हैं, तो उसी से सुधार क्यूं कराना चाहते हैं? धन शक्ति के साथ उनके पास जन शक्ति भी है, तो उसे वोट में क्यूं नहीं बदलवा लेते हैं, जिसके लिए समय का इंतजार करें और सत्ता अपने हाथों में लेकर सब कुछ अपने मन के जैसा ही करें? वह देश, समाज या व्यवस्था सुधारने में इतनी शीघ्रता क्यूं बरत रहे हैं? उन्हें चुनाव की प्रतीक्षा करनी चाहिए, लेकिन वह नहीं करना चाहते, क्यों कि वह जनता को सपने ही दिखा रहे हैं। उनकी शीघ्रता से स्पष्ट है कि वह जो मांगे सरकार के सामने रख रहे हैं, वह मांगे उनके लिए सिर्फ मुद्दा ही हैं और किसी कीमत पर वह मुद्दा नहीं छोडऩा चाहते, क्यों कि इन मुद्दों की बैसाखी के सहारे ही उन्हें भी सत्ता की चाबी चाहिए और वो चाबी सिर्फ जनता ही दिला सकती है।

महंगाई, भ्रष्टाचार आदि के बढ़ते मामलों के  कारण जनता राजनीतिक दलों से आज कल घृणा करती नजर आ रही है। अन्ना हजारे के आंदोलन के समय जनता का नेताओं के प्रति आक्रोश स्पष्ट नजर भी आया, तभी बाबा रामदेव राजनेता की जगह बाबा बन कर भक्त जनता से मतदाता का रिश्ता का कायम करना चाहते हैं, जो आसान नहीं कहा जा सकता, क्यों कि सत्ता के लिए जनता राजनेताओं पर ही विश्वास करती है, इसलिए बाबा रामदेव का आंदोलन या अभियान अपरोक्ष रूप से सत्ता संघर्ष ही नजर आ रहा है।

बी.पी.गौतम

स्वतंत्र पत्रकार

09411222163


: बाबा का धमाल क्या दिखा पाएगा कमाल :  भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन के नाम पर बाबा रामदेव ने करोड़ो रुपये पंडाल पंखे और पकवान में ही फूक डाले। अब ये तो तय है कि बाबा के पंडाल में रइसों का भी तांता लगेगा। सुविधाएं जो फाइवस्टार की मिल रही हैं। बाबा ने तो आंदोलन का स्वरूप ही बदल डाला। अब तक आंदोलन का मतलब तकलीफों को आत्मसात कर न्याय की मांग पर अड़े रहना ही हुआ करता था लेकिन यहां तो खीर मालपुआ की भी व्यवस्था है।

यानि बाबा के पंडाल में आने वाले खूब दावत उड़ाएंगे। सरकार हिली तो हिली नहीं हिली तो पेट हिलाना तो सब सीख ही जाएंगे। मांगें पूरी हो या न पर यह तो तय है दो लोग जरूर फायदे में होंगे। एक बाबा रामदेव जिनके लिए यह मुहिम राजनैतिक प्रवेश द्वार साबित होगी दूसरे हमेशा की तरह अपनी डुगडुगी बजाने वाले दिग्यविजय सिंह। उनको बाबा के स्टंट पर ताना कसने का मौका जो मिल जाएगा। अब देखने लायक ये होगा की बाबा का धमाल कहा तक दिखा पाएगा कमाल।

पुष्पेन्द्र मिश्रा

नईदुनिया

जबलपुर


: सिंहासन खाली करो कि जनता आती है..!! : देश में आंदोलनों की बाढ़ है और पहली बार देश की जनता सचमुच इन आंदोलनों से जुडी हुई है या जुड़ना चाहती है और आन्दोलन करने वाले लोग किसी सियासी पार्टी के लोग न होकर जनता के बीच के लोग हैं जिन्हें आगे आकर अपनी आवाज को उठाना पड़ा है. यह बातें किस ओर संकेत करती हैं. कि एक लोकतान्त्रिक देश में जहाँ देश की सबसे पुरानी पार्टी सत्ता में है ओर दूसरी बड़ी पार्टी विपक्ष की भूमिका में है, से जनता का भरोसा उठ गया है. या अब पार्टियों की पहुँच आम जनता तक रह ही नहीं गई है. देश की दोनों बड़ी पार्टियाँ पिछले कुछ सालों में कहीं न कहीं जनता पर अपनी पकड़ कमजोर कर चुकी हैं.

देश में सत्तारूढ़ कांग्रेस का हाल ये है कि उसके पास तीन ही चेहरे बचे हुए हैं सोनिया, राहुल ओर मनमोहन सिंह. इसके अलावा जो बचे खुचे चेहरे हैं वो राहुल या सोनिया के पीछे खड़े हुए नजर आते हैं. लेकिन पार्टी की मज़बूरी ये है कि राहुल सोनिया की तमाम कोशिशों के बावजूद जनता का विश्वास जीतने में पार्टी नाकाम रही है. दरअसल पार्टी के तमाम नेता चुनाव जीतने के बाद सीमित हो गए हैं. और पार्टी चेहरों की कमी से जूझने लगी है. हालत यह है कि राहुल और सोनिया के अलावा जनता के साथ खड़े होने को ओर कोई नेता नजर नहीं आता. इसे कांग्रेस की मज़बूरी कहें या गाँधी परिवार की खुद को राजनीति में जीवित रखने की कवायद क्यूँकि जनता के लिए संघर्ष करने के नाम पर यही दोनों नजर आते हैं. बात चाहे भट्टा पारसोल में किसानो के साथ खड़े राहुल की हो या जन कल्याणकारी योजनायें बांटती सोनिया गाँधी की.

इन दोनों के तमाम प्रयासों के बाद भी पार्टी का जनाधार लगातार गिर रहा है. क्यूंकि जिस राज्य में भी पार्टी की सरकार है वहां जमीनी स्तर पर पार्टी का कोई बड़ा चेहरा नहीं है जिस पर जनता ऐतबार कर सके. इसके उलट गैर कांग्रेसी राज्यों में भी आम जनता से जुड़ने वाला कोई कांग्रेसी नेता नजर नहीं आता जो मजबूत विपक्ष की भूमिका निभा सके. नतीजा आम आदमी ने भी कांग्रेस का हाथ छोड़ दिया है. उदाहरण के तौर पर राहुल के तमाम प्रयासों और रात्रि प्रवासों के बावजूद भी उत्तर प्रदेश में पार्टी तीसरे नंबर पर आती है. वहां भी एक रीता बहुगुणा को छोड़ दें तो कोई बड़ा चेहरा जनता की आवाज उठाता नहीं दिखता. कुल मिलाकर यह कांग्रेस के लिए शुभ संकेत नहीं है क्यूंकि आम आदमी की बात करने वाली पार्टी में अब जनता का भरोसा थोडा कम ही है.

दूसरी तरफ चाल चरित्र और चेहरे की बात करने वाली भाजपा अब अपना रास्ता खो चुकी है. न तो पार्टी के पास जन कल्याणकारी मुद्दों को उठाने की ताक़त रह गई है और न ही सड़कों पर उतरकर संघर्ष करने की हिम्मत. और जो थोड़ी बहुत हिम्मत करके पार्टी कहीं पर किसी मुद्दे को उठाती भी है तो उसे जन समर्थन हासिल नहीं होता. महंगाई के मुद्दे को लेकर असम में पार्टी ने जनादेश माँगा तो जनता ने इसे नकारते हुए तरुण गोगोई को समर्थन दे दिया. इसका सीधा संकेत यह है कि पार्टी जनता से दूर हो गई है. और अब पार्टी कि भाषा जनता को समझ नहीं आ रही है. हिंदुत्व का मुद्दा भी बीते ज़माने की बात हो चुका है. और नए ज़माने में भाजपा आधारहीन हो चुकी है. यहाँ तक कि जिनके दम पर पार्टी खड़ी हुई थी उसके दो मजबूत स्तम्भ विहिप और आरएसएस भी उससे दामन छुडाते हुए नजर आ रहे हैं.

आरएसएस का देश भर में बड़ा नेटवर्क है. और जनता के बीच जाकर काम करना उसका प्रमुख उद्देश्य इसीलिए अब तक भाजपा के पीछे खड़े होकर आरएसएस जनता के सवालों को सरकार तक पहुँचाती रही. लेकिन अब जब जनता ने भाजपा को लगभग नकार दिया है. आरएसएस भी अन्य विकल्प तलाशती नजर आ रही है. दरअसल देश में जो सवाल इस समय मुद्दा बने हुए हैं उनके घेरे में भाजपा भी है और इन सवालों पर भाजपा की चुप्पी उसके लिए घातक बन रही है. भ्रष्टाचार जैसे अहम् मुद्दे पर भी पार्टी  की कमजोर पहल आरएसएस और जनता दोनों को ही अखर रही है.

शायद यही वजह है की दोनों अब भाजपा से दूरी बना रहे हैं. संघ अब अपनी साख को कायम रखने की कवायद में अन्ना और राम देव को समर्थन दे रहा है. आरएसएस का इस तरह रामदेव और अन्ना को समर्थन देना कई सवाल खड़े करता है. जिनके जवाब खोजना इस पार्टी के लिए जरुरी हो चला है.  इन सारी बातों का मतलब यह निकलता है कि देश में सत्तारूढ़ पार्टी पर लोगो का विश्वास रह नहीं गया है और विपक्ष में बैठी पार्टी उसका विकल्प होने लायक नहीं है. मतलब पक्ष विपक्ष के बाद रह गई जनता जो अब कहीं न कहीं आंदोलनों कि भाषा समझने और बोलने लगी है.

प्रत्यूष मिश्र

मुख्य संपादक

“शाइनिंग वर्डस”

जयपुर


….बाबा रामदेव के सत्याग्रह के मुद्दे पर लिखे गए इन विश्लेषणों-लेखों को भी पढ़ सकते हैं….

अन्ना ने खाया धोखा पर होगी बाबा की जीत

आलोक कुमार: स्वामी रामदेव के आगे केंद्र सरकार के सारे दांव विफल होते नजर आ रहे हैं : रामदेव के आंदोलन में है लोहिया की खुशबू : योग गुरू रामदेव हठयोग की वैभवकारी मुद्रा में हैं। बाबा की मुद्रा से सियासी कुर्सी की चूलें हिली हुई है। सत्याग्रह का दायरा अन्ना हजारे की तुलना में व्यापक है।

देशभर के 624 जिलों में स्वामी रामदेव के योग शिविर चलाने वाले शिष्यों ने सत्याग्रह स्थल सजा रखा है। समर्थन में आए लोग के लिए बैठने ठहरने का जरूरी इंतजाम है। डंके की चोट पर सत्याग्रह पर खर्चों का हिसाब देने के बजाय स्वामी रामदेव सरकार से विदेशों में जमा काले धन का हिसाब मांग रहे हैं और दबंगता से कह रहे हैं कि जब तक सरकार ने गंभीर पहल नहीं की, वो सत्याग्रह के अष्टांग योग से उठने वाले नहीं हैं।

डा. मनमोहन सिंह की सरकार सत्याग्रह के असर की सोचकर हैरान परेशान हैं। स्वामी को मनाने की शुरुआती विफलता के बावजूद पुरजोर कोशिश जारी है कि बाबा के हठयोग को किसी तरह  राजयोग से मना लिया जाय। बाबा के आसन छूटने की देरी से सरकारी सियासत दां की जनता से हितैषी रिश्ते की डोर कमजोर पड़ रही है। इसका अगले साल उत्तर प्रदेश चुनाव के शुरू हो रहे केंद्र में अगली सरकार की कवायद के सेमीफाइनल पर काला असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

स्वामी रामदेव के हठयोग के निहितार्थ को समझने के लिए हाल की तीन बातों पर गौर करना होगा। पहला, अन्ना हजारे ने रालेगांव सिद्धि के घर से सवाल किया है कि जनहित में बनी सरकार ठीक से काम नहीं कर रही है। इसलिए बाबा रामदेव अथवा उन जैसों को आसान मसलों पर आंदोलन की राह पकडने को मजबूर होना पड़ रहा है। अन्ना के मत से साफ है कि सरकार ने ही लोकपाल लाने के लिए पहल की थी। जब भ्रष्टाचार मिटाने के इस सटीक पहल पर अमल में विलंब हुआ तो अन्ना हजारे को आंदोलन करना पड़ा। अब लोकपाल विधेयक की ड्राफ्टिंग कमेटी में बैठाकर सरकार के मंत्रियों ने वकालती दलीलों से अन्ना को परेशान कर रखा है। अन्ना ने स्वामी रामदेव को भविष्य में हो सकने वाली ऐसे किसी परेशानी के प्रति आगाह किया है।

दो महीने पहले अप्रैल में अनशन से दिल्ली की सियासत को हिलाने वाले अन्ना हजारे अब परेशान हैं। प्रणव मुर्खजी की अध्यक्षता में बनी लोकपाल ड्राफ्टिंग कमेटी में सरकार  की तरफ से मौजूद बाकी चार सदस्यों की पृष्ठभूमि वकालत की है। दिग्गज वकील कपिल सिब्बल, सलमान खुर्शीद, पी चिदम्बरम कानून मंत्री वीरप्पा मोईली के साथ मिलकर सिविल सोसाईटी के नुमांईदों को कानून और संविधान के पाठ पढा रहे हैं। छठी बैठक पूरा होते होते इसकी उम्मीद कम पड़ती जा रही है कि सरकार की तरफ से तय किए गए 30 जून की तारीख तक लोकपाल विधेयक ड्राफ्ट करने का काम पूरा हो पाएगा। सरकार की तरफ से वकीलों की जोर अजमाईश को इसे देखकर सिविल सोसाईटी की तरफ से तमाम विवादों के बावजूद समिति में पिता-पुत्र के दो दिग्गज वकीलों की जोड़ी को बनाए रखने की हठ का मतलब समझ में आने लगा है।

इधर देश के सबसे पुराने राजनीतिज्ञों में शामिल प्रणव मुर्खजी ने राजनीतिक अनुभव के बल पर अलग दांव चल दिया है। समिति के अध्यक्ष के नाते उन्होने लोकपाल ड्राफ्ट पर राज्यों के मुख्यमंत्री से सलाह लेने की औपचारिकता को पूरा करने के बहाने विलंब का नया रास्ता तैयार कर दिया है। विवाद में फंसे लोकपाल ड्राफ्टिंग कमेटी में सरकारी पक्ष की दलील है कि प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश को लोकपाल के दायरे से बाहर ऱखा जाए। दलील को कानून सम्मत बताने के साथ ही प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश को लोकपाल के दायरे में लाने से आशंका जताई जा रही है कि इससे लोकपाल के निरंकुश  होने का खतरा है। अब वातावरण तैयार किया जा रहा है कि लोकपाल की व्यवस्था लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा कर सकती है।

अन्ना हजारे को चकमा देकर अनशन से उठाने वाली सरकार अब लोकपाल बनाने की पूरी कोशिश की जड में मट्ठा डाल रही है। इस पर विरोध लाजिमी है। विरोध को कम करने के लिए रामदेव बाबा का इस्तेमाल किया गया। जिन्होने मध्यप्रदेश में कांग्रेस दिग्गज कमलनाथ के घर आहार लेने के साथ ही लोकपाल के दायरे से प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश को बाहर रखने की पैरवी कर दी। इससे पैदा हुए आपसी दरार या भ्रम को दूर करने के लिए रविवार को अन्ना हजारे दिल्ली पहुंचकर बाबा रामदेव के आंदोलन में शिरकत करने वाले हैं।

गौर करने वाली दूसरी बात, बाबा रामदेव के एक शानदार शर्त को झटके में मान लेने से जुडी है। लोहिया के बाद पहली बार रामदेव ने हिंदी में तकनीकी विषयों की पढाई की व्यवस्था करने और अंग्रेजी के बजाय भारतीय भाषाओं को कामकाज में समुचित जगह देने की बात सरकार के सामने रखी और मुश्किल में फंसी सरकार ने इसे एक झटके में मान लिया। और कह दिया गया कि बाबा रामदेव के नब्बे प्रतिशत बात मान ली गई हैं। सवाल उठा कि वो कौन सी दस प्रतिशत बात है जिसे सरकार को मानने में दिक्कत आ रही है। इसका खुलासा होना बाकी है।

लेकिन जैसे ही अंग्रेजी का मोह त्यागकर भाषाई जरूरतों को पूरा करने की मानी गई बातों को पूरा करने के लिए टाइम फ्रेम तय करने की बात आई तो सरकार की तरफ से कहा गया कि इसे एक दिन में पूरा नहीं किया जा सकता है। अच्छा लगा कि समय को लेकर स्वामी रामदेव को अन्ना हजारे की तरह धोखा देने वाले टोटके को अजमाया नहीं गया। वैसे आसानी से सरकार के मान लेने से जाहिर है कि लोक कल्याण की कमजोर होती इच्छाशक्ति ने सरकार को इस दिशा में सोचने नहीं दिया। इस दरकार को सरकार ने हाल के बरसों में गंभीरता से महसूस ही नहीं किया था औऱ जैसे ही स्वामी रामदेव ने महसूस कराया तो आसानी से मान लेने की बात की गई।

तीसरी महत्वपूर्ण बात गोविंदाचार्य कर रहे हैं। उन्होने प्रतिपक्षी बीजेपी पर तोहमत जड़ा है। कभी बीजेपी के थिंक टैंक रहे और सोशल इंजीनियरिंग के रास्ते बीजेपी को सत्ता तक पहुंचाने में अहम किरदार निभाने वाले गोविंदाचार्य इन दिनों स्वामी रामदेव के सिपहसलारों में हैं। उनका कहना है कि विपक्ष जनता की जरूरतों को आवाज  देने में फेल हो गया। विपक्ष के फेल होने से बनी रिक्तता का ही नतीजा है कि लोगों का राजनीतिक व्यवस्था से मोहभंग हो रहा है। अगर संसदीय व्यवस्था में सार्थक विपक्ष की भूमिका निभाई गई होती तो लोग सिविल सोसाइटी की तरफ उम्मीद भरी नजर से नहीं देखते। खेती और समाज सुधार में लगे अन्ना हजारे अथवा योग सिखाने वाले बाबा रामदेव को  राजनीतिक सुधार के लिए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन  नहीं करना पडता। उनके मुताबिक विपक्ष का कमजोर होना लोगों में व्यवस्था को बनाए रखने के लिए चोर-चोर मौसेरा भाई वाली स्थिति के भाव को भरता है। गोविंदाचार्य ने विदेशों में जमा कालाधन मामले में सोनिया गांधी को लिखे लालकृष्ण आडवाणी के माफीनामे को राजनीति क अपराध बताया है।

बाबा रामदेव की असली मांग विदेशों से काला धन लाने से जुडा है। इसे लेकर सरकार पर शक है। दुनिया के कई देश स्विस बैंक से अपने खातेदारों का विवरण मंगा चुके हैं। कार्रवाई कर चुके है लेकिन भारत में विदेशी बैंकों में गुपचुप कालाधन जमा करने वालो के खिलाफ कार्रवाई होनी बाकी है। इसे लेकर  सरकार को सुप्रीम कोर्ट तक से निर्देश मिल रहे हैं। लेकिन  कार्रवाई के नाम पर अब तक ढाक के तीन पात ही होता रहा है। बल्कि शर्मिंदगी की इंतहा तो तब हो गई जब सुप्रीम कोर्ट में दलीलों के सहारे सरकार ने विदेशी बैंकों के खातेदारों तक का नाम बताने से इंकार कर दिया। सरकार के ऐसे ही कई  रवैए बेतहाशा मंहगाई से मार खा रहे आम नागरिक को नागवार गुजर रहा है। लोग  अपनी हालात पर नाराजगी के गुस्से के प्रदर्शन के लिए ही बाबा रामदेव या अन्ना हजारे के पीछे हो ले रहे हैं।

बाबा रामदेव के वित्तीय सलाहाकारों के अध्ययन के मुताबिक  भारत का चार सौ लाख करोड़ रुपए का काला धन विदेशों में जमा है। विदेशों में जमा इस धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने की मांग हो रही है। गौर करने वाली बात है कि पिछली बजट में देश के 59 लाख करोड रूपए के सकल घरेलू उत्पाद का अनुमान  है। ऐसे में विदेशों से चार सौ लाख  करोड़ रुपए  के काला धन का देश के विकास  के काम आने की सूरत में गरीब भारत की तस्वीर पूरी तरह से बदल जाने की उम्मीद है ।  उम्मीद भरे इसी ने अनुमान ने लोगों को बाबा के राजयोग की तरफ आकर्षित कर रखा है। फिर काला धन बनाने की मशीन पर चोट करने के लिए अन्ना हजारे की लोकपाल बिल  लाने की जरूरत  के साथ राजनीति  हो रही है। परेशान अन्ना हजारे ने  इस मामले में केंद्र सरकार से धोखा मिलने की बात करके लोगों की नाराजगी को बढा दिया है। नाराज लोग  सबक सिखाने के लिए बाबा रामदेव के साथ हो लिए हैं।

अन्ना में एक तरह से धोखा खाने का भाव भरने के लिए ही केंद्र सरकार ने बाबा रामदेव का ऐतिहासिक रेडकार्पेट वेलकम किया था। किराए के निजी विमान से आंदोलन के लिए दिल्ली पहुंचे बाबा रामदेव से मिलने के लिए देश के सबसे बड़े अफसर कैबिनेट सचिव के साथ सरकार के चार कैबिनेट मंत्री विमानतल पर मौजूद रहे। एयरपोर्ट पर ही ढाई घंटे तक स्वामी रामदेव के साथ बैठक कर गंभीरता से सुनने समझने का नाटक किया गया ताकि स्वामी में ये भाव घर करे कि नैतिक बल पर महाराष्ट्र में वक्त बेवक्त शरद पवार और बालासाहेब ठाकरे की चूलें हिला चुके अन्ना हजारे से कहीं ज्यादा उनको महत्व दिया जा रहा है। लेकिन दस साल से राजनेताओं को चराते हुए दनादन तरक्की कर रहे स्वामी रामदेव के आगे केंद्र सरकार के सारे दांव विफल होते नजर आ रहे हैं।

लेखक आलोक कुमार ने कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उन्होंने ‘आज’, ‘देशप्राण’, ‘स्पेक्टिक्स इंडिया’, ‘करंट न्यूज’, होम टीवी, ‘माया’, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज, आजतक, सहारा समय, न्यूज़ 24, दैनिक भास्कर, नेपाल वन टीवी में अपनी सेवाएं दी हैं.  झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. कुल तेरह नौकरियां करने के बाद आलोक इन दिनों मुक्त पत्रकारिता की राह पर हैं.

कांग्रेस के एजेंट अमर सिंह को एक्सपोज करने की जरूरत

: भड़ास पर अब न छपेगा अमर का कोई लेख, वचन या ब्लाग लेखन : इंडिया टीवी पर रजत शर्मा वाले कार्यक्रम आपकी अदालत को कल देख रहा था. इस कार्यक्रम में जज बने थे अमर उजाला के संपादक अजय उपाध्याय. कथित कठघरे में बैठे थे अमर सिंह. अमर सिंह ने वही सारी बातें कहीं जो उन्होंने पिछले दिनों मीडिया वालों से बातचीत के दौरान कही थी. उड़ि बाबा… जेनुइन है… उसी अंदाज में. शांति भूषण और प्रशांत भूषण की धज्जियां उड़ाए जा रहे थे.

अचानक बोले कि इन लोगों को भ्रष्टाचार के खिलाफ लखनऊ में जाकर लड़ाई लड़नी चाहिए जहां स्वास्थ्य विभाग के दो अफसरों का कत्ल हो चुका है. आपको याद होगा कि पिछले ही दिनों राहुल गांधी ने लखनऊ में स्वास्थ्य विभाग के दो अफसरों की हत्या होने और स्वास्थ्य विभाग की एक योजना के लिए केंद्र से मिले पैसे की बंदरबांट से संबंधित सवालों वाली आरटीआई दाखिल की. मायावती शासन के करप्शन के इशुज को उठाने में जोरशोर से जुटी हुई है कांग्रेस. इससे दोहरा लाभ है. एक तो करप्शन से कांग्रेस को जोड़े जाने के अभियान को कमजोर किया जा सकेगा और करप्शन का इशू डायवर्ट होकर यूपी में जाएगा तो मायावती कमजोर होंगी और चुनावों में इसका लाभ कांग्रेस को मिलेगा.

सपा से भगाए जाने के बाद तनहाई झेल रहे अमर सिंह किसी मजबूत पार्टी में जाने के चक्कर में हैं. और सत्ताधारी कांग्रेस से मजबूत उन्हें कोई दिख नहीं रहा. दूसरे, कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जहां अमर सिंहों को अपनी कला व कलाकारी दिखाने का पूरा मौका मिलता है. जोड़तोड़, रैकेट, मैनेज, संकट मोचन, खरीद-बिक्री आदि कुकृत्यों के लिए कांग्रेस सबसे ज्यादा तत्पर रहती है क्योंकि कांग्रेस के नेताओं को लगता है कि वही इस देश के जेनुइन शासक हैं और अगर उन्हें किसी भी प्रकार से सत्ता से दूर रहने को कहा जाता है तो वो ठीक नहीं, उन्हें हर हाल में सत्ता में आना है, चाहे इसके लिए कितने ही अमर सिंहों की मदद लेनी पड़े या कितने ही जोड़तोड़ करने को मजबूर होना पड़े.

भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे मनमोहन, सोनिया की कांग्रेस पार्टी को इस समय जरूरत एक ऐसे ही कलाकार अमर सिंह की थी. अमर सिंह अभी कांग्रेस में शामिल नहीं हुए हैं लेकिन कांग्रेस से बाहर रहकर उन्होंने जो काम कर दिया वो काम कांग्रेस के दिग्विजय सिंह भी नहीं कर सके. भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए उठ खड़े हुए अन्ना के आंदोलन को भटकाने के वास्ते अमर सिंह ने जो सीडी कांड की व्यूह रचना रची, वो षडयंत्र सफल रहा. लोग प्रशांत भूषण और शांति भूषण पर सवाल उठाने लोग.

सवाल उठाने वाले लोग हमारे आप जैसे खाते पीते शहरी मध्यवर्ग है जो हर पर पेंडुलम की तरह दाएं बाएं होता रहता है, अपना खुद का कोई स्थायी कनविक्शन नहीं होता. उनका तर्क ठीक लगा तो उनके पाले में हो गए और उनका कहा जंचा तो उनके लिए वाह वाह करने लगे. अमर सिंह ने अन्ना के आंदोलन के उफान के निशाने को कांग्रेस से हटाकर तितर बितर कर दिया है. ठीक ही कहा जाता है कि इस व्यवस्था में जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाएगा, उस आवाज उठाने वालों को ही लोग निपटा देंगे. रजत शर्मा ने कल अपनी अदालत में अमर सिंह को जमकर एक्सपोजर दिया. उनकी बातों, उनके तर्कों को व्यापकता के साथ बड़े जनमानस तक पहुंचाया.

मुझे नहीं लगता कि रजत शर्मा की अदालत में कभी अन्ना हजारे बुलाए गए होंगे क्योंकि अन्ना ड्रामेटिक नहीं हैं, कलाकार नहीं है, किसी और के एजेंडे पर काम नहीं करते. अन्ना सरल सहज मनुष्य हैं. ऐसे वक्त में जब करप्शन बहुत बड़ा मुद्दा बनता जा रहा हो और इस मुद्दे को लीड करने लायक कोई लीडर न मिल रहा हो, अन्ना का प्रकट होना चमत्कार की तरह था पर उस चमत्कार को साजिश करने में माहिर कांग्रेसियों ने अमर सिंहों के साथ मिलकर मिट्टी में गाड़ने की तैयारी कर दी.

जो अमर सिंह अपनी निजी जिंदगी में शुचिता, ईमानदारी और नैतिकता का दावा नहीं कर सकता, वह दूसरों पर कीचड़ उछाल रहा है, इससे बड़ी त्रासदी क्या हो सकती है. और ऐसे शख्स के आगे हमारी मीडिया लहालोट हुए जा रही है. अमर सिंह के अभिनयपूर्ण डायलाग्स सुनना मिडिल क्लास को पसंद आता है क्योंकि इस शहरी मिडिल क्लास को लालू भी बहुत पसंद आता था. लालू चाहे जो कहें, उससे मिडिल क्लास को मतलब नहीं था, मतलब था उनके संवाद अदायगी की भाव भंगिमा से. और, वो लालू आज किधर हैं, किसी को पता नहीं. बिहार का बंटाधार कर चुके लालू का योगदान इतना रहा है बिहार में कि उन्होंने पिछड़े समुदाय की आवाज को अभिव्यक्ति दी लेकिन विकास कुछ नहीं किया. उसी पिछड़े समुदाय ने, जिसके हीरो लालू थे, लालू को आउट कर दिया, सिर्फ बड़बोलापन नहीं चलेगा, यह कहकर.

लालू तो फिर भी जमीन वाले नेता थे. अमर सिंह की कौन जमीन है. अमर सिंह जब कहते हैं कि वे बेहद बीमार आदमी हैं और दो बच्चियों के पिता हैं, और तमाम तरह की दवाइयों पर उनका शरीर चल रहा है, तो एक बार दर्शक सोचने लगता है कि आदमी जेनुइन है. पर जब अगले ही पल वे भ्रष्टाचार की लड़ाई को पटरी से उतारने की खातिर बयान देने लगते हैं तो दर्शक समझ जाता है कि ये आदमी किसी बड़े एजेंडे के तहत बात व काम कर रहा है. वो एजेंडा है कांग्रेस को लाभ पहुंचाना.

अमर सिंह की मजबूरी है किसी बड़ी पार्टी का दामन थामना. क्योंकि वे जनता के आदमी नहीं हैं. उनकी जड़ें भ्रष्टाचारी पार्टियों से सिंचित होती रही हैं, जनता के दुख-दर्द व सरोकार से नहीं. सो, वो चाहें जितने भी बीमार हों, उनकी मजबूरी है कि वे अपनी कलाकारी से कांग्रेस के आकाओं का हित साधें ताकि अपनी आगे की बचीखुची जिंदगी के लिए खाद-पानी की व्यवस्था कर सकें. जरूरत हमें आपको है कि हम अमर सिंहों के मंसूबे को समझें और उन्हें अपने अपने स्तर पर एक्सपोज करें. आज से मैं वादा करता हूं कि अमर सिंह का कोई बयान या लेख या ब्लाग लेख भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित नहीं किया जाएगा क्योंकि बुरे लोगों की अच्छी बात को भी स्थान देने का मतलब होता है बुराई का साथ देना. मैं अमर सिंह से हजार गुना बेहतर और अच्छा मानता हूं प्रशांत भूषण और शांति भूषण को.

दूसरे, भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध में बहुत ज्यादा बुरे लोगों को हटाने के लिए कम बुरे लोगों का साथ देने का मौका मिले तो हमें साथ देना चाहिए क्योंकि बदलाव हर हाल में होना चाहिए. सत्ताधारी ताकतें यही चाहती हैं कि विरोध की आवाज बंट जाए, भोथरी हो जाए और इस प्रकार वे यथास्थितिवाद कायम करने में सफल रहें. मैं सभी से अपील करूंगा कि वे अन्ना के आंदोलन में तन मन धन से शिकरत करें और नाटकीय अमर सिंहों, दिग्विजय सिंहों को न सिर्फ एक्सपोज करें बल्कि इनकी हिस्ट्रीशीट भी प्रकाशित-प्रसारित करें.

यशवंत

bhadas4media@gmail.com

आज सबसे कठिन है भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना उर्फ अन्ना की घेरेबंदी

हरिवंश: ईमानदार लोगों को समाज भी समय के साथ व्यावहारिक नहीं मानता : जब तक जेपी भ्रष्टाचार के खिलाफ चुप रहे, उन्हें शासक वर्ग पूजता रहा, जैसे ही, 74 में वह बोले, उन पर चौतरफा प्रहार शुरू हुआ, उनके गांधी शांति प्रतिष्ठान की जांच के लिए कुदाल आयोग बैठा : गांव का सीधा-साधा आदमी भ्रष्टाचार के खिलाफ आज लड़ना चाहता है, तो उसे इस कदर व्यवस्था घेर लेगी कि या तो वह आत्महत्या कर लेगा या दयनीय पात्र बन जायेगा :

आज सबसे कठिन है, भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना. गांव से लेकर दिल्ली तक, जो भी इसके खिलाफ तन कर खड़ा होना चाहता है, उसे अभिमन्यु की तरह वध करने के लिए सारी ताकतें एकजुट हैं. विचार और दल का चोंगा उतार कर. इसके पीछे का दर्शन है कि सफ़ेद कपड़े वालों पर भी इतने छीटें मारो कि वह भी काली भीड़ का हिस्सा बन जाये. यह शासकों का पुराना सियासी खेल और शगल है. पर गुजरे 20 वर्षो में हालात और बदतर हुए हैं.

वीपी सिंह ने 1987 में बोफोर्स के खिलाफ आंदोलन चलाया, तो उन पर कई आरोप लगाये गये. इसके पहले तक वह सबसे अच्छे बताये गये. सेंट किट्स में विदेशी बैंक खाते होने के आरोप लगे. दइया ट्रस्ट जमीन घोटाले के आरोप वीपी सिंह पर लगे, ये सब झूठे आरोप थे. पर इन आरोपों के खारिज या झूठ साबित होने में दशकों लगे. इससे पीछे लौटें, तो जेपी को सीआइए का एजेंट कहा गया.

जब तक जेपी भ्रष्टाचार के खिलाफ चुप रहे, उन्हें शासक वर्ग महान कह कर पूजता रहा. जैसे ही, 74 में वह बोले, उन पर चौतरफा प्रहार शुरू हुआ. उनके गांधी शांति प्रतिष्ठान की जांच के लिए कुदाल आयोग बैठा. कई अन्य तरह की जांच हुई. इन झूठे आरोपों का क्या हश्र हुआ? लक्ष्मीचंद जैन ( प्रमुख गांधीवादी और योजना आयोग के पूर्व सदस्य ) की हाल में आयी संस्मरणात्मक पुस्तक में दर्ज है. जेपी के गुजरने के बाद तक जांच चलती रही. राजीव गांधी के जमाने में जब बार-बार सदन में रिपोर्ट रखने की मांग हुई, तब पता चला कि कुछ भी नहीं मिला.

1974, 1989 और 2011 में फर्क है. पहले गलत करने वालों को थोड़ी शर्म थी. समाज उन्हें हिकारत या अवमानना की नजर से देखता था. आज ईमानदार लोग, शासकों के लिए सिरदर्द हैं. समाज भी ऐसे लोगों को समय के साथ व्यावहारिक नहीं मानता. आज एक ईमानदार आदमी, सर छुपा कर जीने के लिए विवश है. पता नहीं कब कौन, क्या आरोप लगा दे. जांच तो कई दशकों बाद होगी. अधिक प्रभावशाली लोग अगर दुश्मन हैं, तो वे अपने रसूख और प्रभाव का इस्तेमाल कर सरकारी एजेंसियों से कई कार्रवाई शुरू करा देंगे. ईमानदार इंसान के लिए जीते जी नरक की स्थिति. इस तरह आज भ्रष्टाचार के खिलाफ तनना सबसे कठिन है.

ताजा उदाहरण हैं,  अन्ना. अन्ना की घेराबंदी शुरू हो गयी है. खबर है कि महाराष्ट्र का सत्तारूढ़ गठबंधन कांग्रेस और एनसीपी, अब अन्ना के खिलाफ एक पुराने जांच मामले को उठा रहा है. यह प्रसंग 2005 का है. पूछा जाना चाहिए कि अन्ना पर कोई गंभीर आरोप किसी आयोग ने 2005 में लगाया, तो 2011 में उसे क्यों इस्तेमाल किया जा रहा है? तब अन्ना गलत थे, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या महाराष्ट्र सरकार अब अन्ना को ब्लैकमेल करना चाहती है ? अन्ना घूस विरोधी आंदोलन से, जब पूरी दुनिया में चर्चित हो गये, तब यह मामला क्यों उठ रहा है? इसके पहले क्यों नहीं उठा?

इसी तरह शांतिभूषण से संबंधित सीडी का मामला है. इन दिनों आपसी और निजी बातचीत के पुराने सीडी रिलीज करने की होड़ लग गयी है. सार्वजनिक आचरण में पतन का प्रतीक. यह सीडी भी उस वक्त रिलीज की गयी, जब लोकपाल विधेयक को लेकर दिल्ली में बैठक होने वाली थी. अब शांतिभूषण ने इस संबंध में अमर सिंह के खिलाफ मामला दायर किया है. दो विशेषज्ञों ने भी कहा है कि सीडी से छेड़छाड़ की गयी है.

पर सबसे महत्वपूर्ण सवाल भिन्न है. अगर शांतिभूषण या अन्ना या कोई अन्य, वर्षो पहले बातचीत में या काम में गलत पाया गया, तो वह सीडी बना कर किन लोगों ने, किस उद्देश्य से रखा? अगर सीडी बनाने वाले सही लोग थे, तो उन्होंने उसी वक्त इसे क्यों नहीं उजागर किया? क्या राजसत्ता भी अपने नागरिकों को ब्लैकमेल करेगी? क्या सीडी निर्माण के पीछे  ब्लैकमेलिंग नहीं है? अगर वर्षो पहले महत्वपूर्ण लोगों के खिलाफ सीडी बनी है, तो उन्हें एक खास समय पर क्यों जारी किया जा रहा है? इस पर पहले कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

अन्ना और उनके साथियों का जीवन, साफ-सुथरा, खुला और पारदर्शी है. ये प्रभावशाली और लोकप्रिय भी हैं, तब इन्हें तरह-तरह से घेरने की कोशिश हो रही है. यदि गांव का एक ईमानदार और सीधा-साधा आदमी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना चाहता है, तो क्या आज वह सफल हो सकता है? उसे इस कदर व्यवस्था घेर लेगी कि या तो वह आत्महत्या कर लेगा या दयनीय पात्र बन जायेगा.

अन्ना को घेरने वाले (अन्ना के उठाये मुद्दे), भ्रष्टाचार नियंत्रण की बात क्यों नहीं कर रहे? पुराने उदाहरणों को छोड़ दें. 16 अप्रैल की खबर है. वाईएस राजशेखर रेड्डी के बेटे जगन रेड्डी ने अपनी संपत्ति की घोषणा की. वह कांग्रेस छोड़कर अपनी पार्टी से उपचुनाव लड़ रहे हैं. वह 366 करोड़ के मालिक हैं. अगर वह जीत गये, तो सबसे समृद्ध सांसद होंगे. एक या दो पीढ़ी पहले इस परिवार की क्या संपत्ति थी? इसी तरह तमिलनाडु, केरल, बंगाल, असम चुनाव में आयकर ने न जाने कितने करोड़  ब्लैकमनी जब्त किया, जो चुनाव लड़ने के लिए छुपा कर इधर-उधर किये जा रहे थे. क्या कहीं आपने इन खबरों को सुना ? किसी ने ऐसे सवालों पर मुंह खोला है ? राजनीतिज्ञों के पास कहां से धन आ रहे हैं ? क्यों इन सवालों पर अन्ना को गाली देने वाले मौन हैं ?

11 अप्रैल की खबर है. हर दिन एक फर्जीधारी पायलट पकड़ा जा रहा है. चालीस फ्लाईंग स्कूल हैं, जहां पायलटों की ट्रेनिंग होती है. सभी जांच के घेरे में हैं. इन पर फर्जी ढंग से लाइसेंस देने का आरोप है. अब आप बतायें कि लाखों यात्रियों के जीवन से खेलने के लिए जो लोग भ्रष्टाचार कर फर्जी पायलट बना रहे हैं, क्या उन्हें फांसी की सजा नहीं होनी चाहिए? सूचना यह है कि  कुल 4500 पायलटों में से कई सौ फर्जी लाइसेंसधारी हैं. सरकार के डीजीसीए (डायरेक्टरेट जेनरल ऑफ सिविल ऐवएशन) से फर्जी लाइसेंस दिलाने के लिए बिचौलियों ने 15-15 लाख वसूले. क्या किसी नेता ने यह भी पूछा है कि भ्रष्टाचार की सजा इस देश में क्या है? क्या हुआ हर्षद मेहता का, कहां गये केतन पारिख? वित्त मंत्रालय से जारी आंकड़ों के मुताबिक 30000 करोड़ रुपये बैंकों में डूबने की स्थिति में है. बैड एंड डाउटफ़ुल अकाउंट में दिसंबर 2010 तक. क्या ऐसे सवाल भी हमारे दलों के एजेंडे पर हैं?

अन्ना क्या कर रहे हैं? वह देश की नब्ज छू रहे हैं. भ्रष्टाचार के मुख्य स्रोत तो राजनीति, व्यवस्था और सरकार ही हैं.  इनके द्वारा ही पोषित बड़े घराने हैं. गंगोत्री अवरुद्ध न हो, तो गंगा का प्रवाह शायद ठीक रहे. अगर शिखर पर बैठे लोग अपने उद्देश्यों में साफ और स्पष्ट हैं, तो भ्रष्टाचार के लाइलाज होने का सवाल कहां है? पर मूल दिक्कत है कि इस देश का शासक वर्ग (राजनीति, सरकार, नौकरशाह, उद्यमी) नहीं चाहता कि व्यवस्था से भ्रष्टाचार खत्म हो. इसलिए पंडित नेहरू ने कहा था कि आजाद भारत में मेरी ख्वाहिश है कि भ्रष्टाचारी को लैंपपोस्ट पर लटका दिया जाये. फांसी के तख्ते पर. सार्वजनिक चौराहे पर. राजीव गांधी ने 1984 के कांग्रेस अधिवेशन में कहा कि दिल्ली से चला एक रुपया, आम आदमी तक पहुंचने पर 15 पैसे हो जाता है. ये पैसे बीच में ओखर कहां जाते हैं? शांति निकेतन में राहुल गांधी ने कहा कि भ्रष्टाचार सबसे गंभीर सवाल है.

अब भ्रष्टाचार देश का गंभीर कैंसर है, तो नेता बतायें कि इसका इलाज क्या है? क्या अन्ना के भूख हड़ताल के इंतजार में थी, केंद्र सरकार? क्यों नहीं खुद सरकार और संसद ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कानून बनाया? किसने रोका है? अगर सरकार व संसद इस सवाल पर कठोर रुख अपना लें, तो क्या अन्ना जैसे लोगों के सत्याग्रह का असर होगा? पर दुर्भाग्य देखिए कि लड़ना है भ्रष्टाचार के कैंसर से, तो लड़ाई हो रही है गांधीवादी अन्ना के खिलाफ.

लेखक हरिवंश जाने-माने पत्रकार और बिहार-झारखंड के प्रमुख हिंदी दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं.

How to go against corruption?

Amitabh: Including Why No Lokpal : Yes, we all feel that the existing organizations/Institutions have not come up to the mark but which new organization has? Secondly, we need new organizations only when they r not existing previously, in one form or another. But what is the logic for having a new Institution just for the heck of it?

Other than duplicating the efforts, it will also prove detrimental by not fulfilling the raised expectations and bringing in more gloom. What is it that Lokpal offers that is not already there? Having thoroughly gone through the various Drafts of the Jan Lokpal Bill, I would say there is hardly anything new that this Institution would be offering as is not being offered by a host of Government, semi-Government and autonomous agencies already. At the same time, in all places where it wants to club powers, it is not only unconstitutional but also dangerous, completely against the basic premises of democratic value of check and balance.

So, what is the solution-

1. For one thing the solution is not at all simple

2. There can’t be a simple solution to such a complex problem

3. Corruption is not an external disease; it is nicely built in our system our organization, our very being- something intrinsic

4. Corruption is not limited to a particular group or activities, be it politicians (often the first to be denigrated), corporate world, educational institutions, media and even the so-called civil societies.

5. Hence, we can’t give the work of exorcising corruption to any particular organization

6. It needs to be a shared work

7. Each organization and each establishment already existing will have to be given its due importance

8. Instead of thinking bad about them and treating them as failed or useless, we need firstly to empower them and secondly to make them feel important and honoured. As long as we don’t give respect to other’s views and don’t respect their existence, we are bound to get poor results

9. Yes, we need Committees, working groups, individuals, associations, platforms (better if they are under the aegis and supervision of the Government) which shall be assigned individual tasks- some to look into the various Acts, Statutes like the Indian Penal Code, the Prevention of Corruption Act, CrPC and the Evidence Act (four of the main related enactments) along with the Income Tax Act, Customs Act, Excise Act, Sales Tax Act, Anti-smuggling Acts etc and others to devise procedural measures to implement each of the Government policies in this regards, by suitably amending and empowering the existing structures

10. When each of the expert team has made recommendations, let them be suitably incorporated and amended to suit the requirements.

11. There is a need to quicken the investigations of the Police department. Though the time-frame for investigations is prescribed, in many cases, they are not adhered to. There is a need to incorporate methods so that these time-frames are rigorously complied with

12. No less important is the way the time frame needs to be adhered in the Courts, right from the Lower courts (the District and Session Court) to even the Hon’ble Supreme Courts because a delay in each of these stages is directly harmful and defeating to the entire cause.

13. This compliance with time-frame is completely lacking in our judicial system and it needs to be incorporated.

14. My personal view is that sticking to time-frame must be made a priority over all other issues because this has somehow come to acquire the center-stage of all the judicial process’s outcome. When I read about a Kodku judgement in Giridih, Jharkhand where the ex Jharkhand CM Shibu Soren was acquitted after possibly 38 years of judicial process, I thought it would have been much better if the same was done in two-five years.

15. None of these can be achieved by an Institution like Lokpal because it will take no powers of the Court, right from the Lower Court to the Supreme Court. Thus, under the extra-ordinary powers under Article 226 and Article 32 of the Constitution, the High Court and the Supreme Court will still have all the powers to entertain any act of the Lokpal which will only add up to the already overburdened judicial burden. Whatever initiative is taken by Lokpal will come to the review of these bodies (which is correct as well, because this is the fundamental process of Check and balance of power), bringing the situation to naught

16. While we need all these individual changes of honest and sincere nature, we don’t need a Lokpal to add up to our woo, because the Institution will soon turn into any other Institution because-
a. It will replicate power position
b. It will be extra-Constitutional
c. It will create further confusion in the existing set of administrative set-up
d. It is being envisaged as having too much concentration of power, which is completely against the fundamental principle of Check and balance
e. It will involve public exchequer without any substantive return

17. Thus, instead of another new organization, the need is-
a. To strengthen each and every existing structure
b. Suitable amendments in Executive law
c. More importantly, suitable amendments in procedural laws
d. Be pragmatic and grounded to the realities of Indian situations instead of deliberately and intentionally talking on hypothetical planes knowing them fully well to be unachievable

18. The administrative reforms can only be a holistic, systematic and well-concerted one and can’t be in the piece-meal manner by imposing an extraneous Institution

19. Finally, we must all be thankful to each and every individual who has brought the issue of Corruption to the center-stage, making the entire nation rise to it (if at least momentarily) but shall also be wary of their words about some kind of short-cut revolution because this deep-rooted malaise needs a consistent and persistent measure (including some of the suggestive measures presented here) and just can’t be washed away thru some magic band, be it Lokpal or anything else. Fighting corruption is a brick by brick affair and not a song and dance matter.

I particularly emphasize this fact because we as leaders shall always be honest to ourselves and to those who believe in us.

Amitabh
amitabhthakurlko@gmail.com

The author is an IPS officer and the views expressed here are his personal views.

फेसबुक पर शांति भूषण प्रशांत भूषण के पक्ष में एक लंबी बहस

Avinash Das : एक समाजवादी सज्‍जन और एक दलितवादी पत्रकार ने पूछा है कि शांतिभूषण की फीस 25 लाख क्‍यों? मैं ये पूछना चाहता हूं कि शांतिभूषण या प्रशांत भूषण ने वंचितों, संघर्षशीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के पक्ष में जितनी भी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ी, क्‍या उनसे भी फीस के रूप में 25 लाख रुपये वसूले?

Yogesh Jadon : सवाल बिल्कुल सही है और इसका जवाब भी आना ही चाहिए

Avinash Das : ये वही शांतिभूषण हैं, जिन्‍होंने इंदिरा गांधी की लोकसभा सदस्‍यता के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई जीती थी और इसके बाद ही इमर्जेंसी लगायी गयी थी। कांग्रेस क्‍यों चाहेगी भला कि लोकपाल की ड्राफ्टिंग कमेटी में इन जैसा दागदार आदमी रहे। तो आप समझ लीजिए कि इनके खिलाफ भ्रष्‍टाचार के तमाम मामले कहां से आ रहे हैं?

Dinesh Mansera : amarvani diggi vani sedhe ..sonia darbar se hoti hai..

Rajeev Ranjan Jha : अविनाश जी, जब आप किसी दल, विचारधारा या कुछ व्यक्तियों से खुद को बांध लेते हैं तो आपकी भूमिका उस वकील की बन जाती है जिसे हर हाल में अपने मुवक्किल के पक्ष में दलीलें रखनी होती हैं। और अक्सर मुकदमे में हार-जीत मामले के तथ्यों पर कम, दोनों पक्षों के वकीलों की काबिलियत पर ज्यादा निर्भर करती है। आप जिन लोगों की तरफ इशारा कर रहे हैं, वे अपने पक्ष के बड़े धुरंधर वकील हैं!

Shashi Kant : भाई अविनाश जी, जिस हिंदुस्तान की 80 करोड़ ग़रीब जनता 20 रुपये रोज़ पर गुज़ारा कर रही है वहां एक वकील 100 करोड़पति कैसे बन जाता है? भ्रष्ट सत्ता-व्यवस्था- दलाल- माफियाओं को कानूनी मदद देकर नहीं कमाई गई है यह रकम? हमें भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जनलोकपाल बिल के पक्ष में होना चाहिए या किसी ख़ास शख्स के साथ, वो भी जो सौ करोड़पति हो उसके???

Shailendra Jha : BAAT SHANTI BHUSHn ki villain ya hero banane ki nahi hai, baat ye hai ki shanti bhuahan par yadi daag hai koi joki ham sab ki zindagi me hota hai to use wo publick me aakar dhoyen

Anoop Bahujan : plz don’t try to be speaker of wrongdoers. if sm1 is wrong, doesn’t get clean chit, why r u advocating for him. It’s Indian Politics sir ji, it’s not black and white only.

Samar Anarya : जो लोग एक दिन की फीस २५ लाख देने की हैसियत में होंगे,वह बहुत ईमानदार लोग होंगे. उन्होंने बहुत लगन और मेहनत से पैसा कमाया होगा.और इतनी ईमानदारी का पैसा कमाने में भला शांति भूषण जी को क्या परेशानी.

Anoop Bahujan : this is corporate socialism!!!

Anand Pandey : वैसे बिना बेईमानी के भी लाखों कमाए जा सकते हैं और फीस के रूप में दिए जा सकते हैं…हम लोग तो लग भाग पूंजीवादी समाज में हैं..

Samar Anarya : और हाँ, बाबा रामदेव और ‘श्री श्री रविशंकर जैसे घोषित विश्व हिन्दू समर्थकों को तो छोडिये.. शांति भूषन १९८० से १९८६ तक भाजपा के सदस्य थे, यह तथ्य जाने क्यों लोग भूलना चाहते हैं.. भूलने पर amada हैं

Anoop Bahujan : ‎Samar Anarya m shocked to kno it…..

Anand Pandey : ‎@Samar जी–क्या विश्व हिन्दू परिषद् का समर्थक होना बुरी बात है? और क्या कोई बी जे पी में जाने के बाद गन्दा हो जाता है?

Avinash Das : ये वही शांतिभूषण हैं, जिन्‍होंने 2010 के सितंबर महीने में सुप्रीम कोर्ट से कहा कि देश के 16 प्रधान न्यायाधीशों में से कम से कम आठ ‘निश्चित रूप से भ्रष्ट’ थे। सुप्रीम कोर्ट में उन्‍होंने जा हलफनामा दायर किया था, उसमें उन्‍होंने गुजरात हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एसजे मुखोपाध्याय की एक टिप्पणी का भी उल्लेख किया था, जिसमें उन्होंने कहा था, ‘हमारे न्याय तंत्र में किसी को भी खरीदा जा सकता है।’ हमारी सर्वोच्‍च अदालत के आलाकमानों पर ऐसी टिप्‍पणी करने वाले और देश की सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री की लोकसभा सदस्‍यता समाप्‍त कराने वाले शांतिभूषण को 25 लाख की फीस के मायाजाल में डुबोया जा रहा हो और हमारे कुछ न्‍यायप्रिय साथी नगाड़े बजा रहे हों – तो इस देश के भविष्‍य का अंदाजा लगाना बहुत आसान हो जाता है।

Samar Anarya : ‎Anoop Bahujan Really Anoop Bhai? This is an open secret. Just that with some JNU type revolutionaries have been inviting him so much, celebrating him so much that people just stopped talking about this. You can check the facts! Anas Journalist Agar drafting commitee me shamil kuch log UPA gov. Ko blackmail krna chahte hain to aisa nhi hona chahiye..

Avinash Das : In 1986, he resigned from BJP after the party acted against his advice over an election petition.

Samar Anarya : ‎@anand jee– मेरे लिए बिलकुल बुरा है. बुरा ही नहीं वरना घृणित है, गलीज है, हत्यारों के साथ खड़ा होना है..यह दोनों हिन्दू धर्मान्धों के गिरोह हैं जो अल्पसंख्यकों को तो छोडिये ही दलित और आदिवासियों का खून भी पीना चाहते हैं..

Avinash Das : i m agree with Samar Anarya

Samar Anarya : यकीन ना हो तो आचार्य गिरिराज किशोर का वह बयान याद कीजिये.. जो उन्होंने झाज्हर में ५ दलितों की हिन्दू भीड़ द्वारा गाय काटने के आरोप में हत्या के बाद कहा था. “गाय का जीवन दलितों के जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण है”

Anand Pandey : समर जी –दुःख हुआ जानकर की हम विरोध में भी स्टीरीओ-टाईप्ड हो गए हैं..

Avinash Das : हालांकि Samar Anarya को ये भी याद रखना चाहिए कि शांतिभूषण कांग्रेस और जनता पार्टी के भी सदस्‍य थे।

Anoop Bahujan : ‎Avinash Das plz don’t be a mouthpiece of someone. you should be truthseeker. 1 more thing u always blame upon Dalit & socialist and categorise them, it seems that except Dalit & socialist , everybody are agree with you, isn’t it. तय करों किस ओर हो तुम, आदमी हो कि आदमखोर हो तुम!!

Kamalendra Jha : but avi aapas me ladai achhi bat nahi hai… kanhi na kanhi esase un logo ko fayda hoga jo ye chahte hain ki JAN LOKPAL NA BANE…..

Samar Anarya : ‎Avinash Das जानकारी दुरुस्त कर लें अविनाश भाई.. शांतिभूषन कभी कांग्रेस के सदस्य नहीं थे.. वह कांग्रेस (ओ) के सदस्य थे, वह कांग्रेस जो इंदिरा गांधी के खिलाफ वाले धड़े की थी. अब इसमें यह जोड़ें की जनता पार्टी के अन्दर दोहरी सदस्यता की परंपरा थी और उसमे १९८० से ८६ यानी की स्थापना के समय से लेकर कमजोरी के दिनों में भी बीजेपी को चुनने वालों की विचारधारा के बारे में आपको थोडा तो असहज होना चाहिए.

Avinash Das : हम लोकपाल चाहते हैं और चाहते हैं कि सिविल सोसाइटी के कुछ जनोन्‍मुखी कानूनविद उसमें शामिल रहें।

Avinash Das : अब इतना तो पता ही है गुरुदेव Samar Anarya. यह कांग्रेस (ओ) इंदिरा की तानाशाही के विरोध में बनी थी। इसके लीडर थे कामराज और मोरारजी देसाई। और यह पार्टी कांग्रेस आई से ही अलग होने के बाद बनायी गयी थी। संभवत:। गलत हो तो फिर दुरुस्‍त किया जाए गुरुदेव।

Sushant Jha : शांति भूषण ने उग्र हिंदुत्व के मुद्दे पर ही बीजेपी से इस्तीफा भी दिया था…इसे भी समझने की जरुरत है।

Samar Anarya : Avinash Das बिलकुल साहब. अब एकदम दुरुस्त है पर इतना फर्क बहुत कुछ बदल देता है. खैर, जन लोकपाल हमें भी चाहिए, पर ऐसा निरंकुश और अलोकतांत्रिक नहीं. और ऐसा राजनीति-विरोधी भी नहीं. और हाँ , सिविल सोसायटी का तो बिलकुल नहीं..

Sanjay Awasthi : Dalit ke naam par roti sekne wale patrakar aur neta unke shoshd ka kam hi karte hain avinas das

Samar Anarya : ‎@सुशांत झा– गलत जानकारी है साहब कृपया दुरुस्त कर लें. पार्टी उन्होंने एक चुनाव याचिका को लेकर छोडी थी, उग्र हिन्दूवाद को लेकर नहीं… और हाँ १९८० में पार्टी की स्थापना के समय से ही पार्टी में शामिल होने के कुछ तो मतलब होंगे.

Avinash Das : ‎@ Samar Anarya : कैसा निरंकुश ? और कैसा अलोकतांत्रिक ?? और कैसा राजनीति विरोधी ??? और फिर सिविल सोसाइटी का मतलब आप समझते क्‍या हैं ???? कुछ साफ किया जाए।

Atul K Mehta ‘viduur’ : Lokpal ki to keval Khal hogi jo Dhal ka kaam bhi karegi….par ‘Corrupt Society’ ya Elite Society ke Lokpal ka mizaz ekdam RAJ-PUROHIT vala hoga….jo is baar Eklavya ka angootha nahi, apitu uski Gardan hi katva diya karega…..:)

Ravish Kumar : मैं एक संस्थान चलाने वाले को जानता हूं. जो मजबूर होकर संस्थान की मान्यता बचाने के लिए रिश्वत देता रहता है। प्रति दिन के हिसाब से कई हज़ार। लेकिन वो अपने तरीके से भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ता भी है. जिसकी वजह से कई विश्वविद्यालयों के वीसी जेल गए हैं। इस आदमी को हम शूली पर कैसे लटका सकते हैं? कोई सुझाव?

Samar Anarya : ‎Avinash Das निरंकुश ऐसा कि लोकतंत्र के आधार शक्ति विभाजन का नकार है यह सिविल सोसायटी वाला जनलोकपाल.कार्यपालिका, विधायिका, और न्यायपालिका की शक्तियां अलग अलग होनी चाहिए यहाँ एक में समाहित हैं. Checks and balances की बात याद है न?

Ravish Kumar : why can’t the corrupt lead an. anticorrupt brigade? u dnt need morals to say dt something is immoral. asish nandy (outlook)

Avinash Das : शांतिभूषण जनता पार्टी में थे, जनसंघ में नहीं। जनता पार्टी की सरकार इमर्जेंसी के बाद बनी थी। एक साल के भीतर अपने ही सरकार टूट गयी। मध्‍यावधि चनाव हुए। कांग्रेस भारी बहुमत से जीती। इंदिरा के खिलाफ गोलबंद हुई राजनीतिक शक्तियां भी बिखरनी शुरू हुई। सन अस्‍सी में बीजेपी बनी। शांति भूषण भी उसमें शामिल हुए। तब बीजेपी के एजेंडे में अयोध्‍या और राममंदिर नहीं था। बजरंग दल और विश्‍व हिंदू परिषद का अस्तित्‍व भी नहीं था। खैर, असहमति के एक बिंदु पर उन्‍होंने पार्टी छोड़ दी। जो लोग इन सूचनाओं को शांतिभूषण के सांप्रदायिक होने और न होने के दावों से जोड़ रहे हैं, उनकी सामाजिक चिंताओं को हमारा सलाम है।

Samar Anarya : अलोकतांत्रिक ऐसा कि पूरा फोकस राजनीतिकों और नौकरशाहों पर है.. उन कार्पोरेशंस पर नहीं जो इस आन्दोलन को फंड कर रहे हैं.. आखिर को स्पेक्ट्रम घोटाले में केवल ए राजा ही दोषी थे अनिल अम्बानी और टाटा थोड़े ही. उनको कोई फायदा कहाँ हुआ. नीरा राडिया टाटा के लिए थोड़े ही काम कर रहीं थी, वह तो सिर्फ राजा के लिए काम कर रही THEEN.

Sushant Jha : समरजी…आपका कहना है कि वे कभी भी बीजेपी में थे तो क्यों थे…जनाव इस हिसाब से तो बड़ा गड़बड़ हो जाएगा अगर ये पूछा जाए कि समर अनार्य कभी समर पांडे थे तो क्यों थे….! कृपया इसे अन्यथा न लें…:)

Samar Anarya : ‎Avinash Das और सिविल सोसायटी का पूरा विचार राजनीति विरोधी है, इसके कुछ पहले प्रवर्तकों में से जोर्ज कोनराद की किताब का नाम ही aNTIPOLITICS है. यह भी जोड़ लें की ग्राम्सी ने सिविल सोसायटी को राज्य सत्ता का भीतरी सुरक्षा कवच बताया है. यह भी की जान पी हैरिस की किताब पढ़ें DEPOLITISIZING DEVELOPMENT. इस आन्दोलन के सालों पहले की किताब है, और तब से कह रही है की सिविल सोसायटी राजनीतिकों पर निशाना साधती है, और कार्पोरेशंस से पैसा लेती है. अब इस आन्दोलन की फंडिंग देखें और तर्क SAMJHEN.

Avinash Das : ये बड़ी विचित्र किस्‍म की बात है कि कॉरपोरेट को भी लोकपाल के दायरे में शामिल होने चाहिए। बहुत मामूली सी बात है कि कॉरपोरेट को फायदे जिन सरकारी नीतियों के तहत पहुंचाये जाते रहे हैं, उन नीतियों पर नजर रखने की जरूरत होनी चाहिए या कि सीधे उस फैक्‍ट्री के मालिक पर, जो घूस लेकर मंत्रालय आता है और डील करता है? कमाल है यार आपलोगों की समझदारी भी !!!

Samar Anarya : ‎@ रविश कुमार जी– क्या जबरदस्त तर्क है साहब.. फिर तो साम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्वा नरेन्द्र मोदी को सौंप दिया JAAY..

Samar Anarya : ‎@रवीश कुमार– और हाँ भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के लिए ए राजा का नेतृत्वा कैसा रहेगा? बाकी उनके साथ बरखा दत्त और नीरा राडिया को भी शामिल कर लें. क्या ख़याल है?

Neeraj Diwan : सही बात है।

Avinash Das : ‎@ Neeraj Diwan : नीरज भाई, कौन सी बात?

Samar Anarya : Avinash Das कमाल हमारी नहीं आपकी समझदारी है साहब. जरा देख लें कि २ज्ञ घोटाले का फायदा किसको हुआ है. और यह भी कि इस देश में टेलेफोन, बिजली, पानी, और तमाम सारी बुनियादी सेवाएँ भी किसके हाथ में हैं. और हाँ, चिकित्सा.. जिसका ७५ प्रतिशत निजी हाथों में हैं, और शिक्षा भी. इनको बाहर रखें, और फिर भ्रष्टाचार दूर करें, कमाल है साहब.

Avinash Das : ‎@ Samar Anarya : अरे गुरु जी, सत्ता पक्ष की पूरी बॉडी राजनीतिक है, जनता ने उन्‍हें चुना है, जो ड्राफ्टिंग कमेटी में शामिल है। क्‍या आप इस गलतफहमी में हैं कि ड्राफ्ट केवल सिविल सोसाइटी के लोग बना रहे हैं?

Neeraj Diwan : ‎@avinash das जो आपने कही।

Samar Anarya : Avinash Das और हाँ, निरंकुशता, अलोक्तान्त्रिकता, और राजनीति विरोध के स्पष्टीकरण पर आप कुछ नहीं बोले, मेरी बात गलत लग रही हो तो भी बता DEN.

Samar Anarya : Avinash Das आप भूल गए हैं शायद, कल तक अन्ना हजारे और उनका गैंग किसी बदलाव पर तैयार नहीं था. वह तो अपना ड्राफ्ट वैसे का वैसा लागू करने पर आमादा थे. वह तो जब परतें खुलनी शुरू हुईं, तब अन्ना जी ‘संसद का निर्णय अंतिम होगा वाली भूमिका में आये, नहीं तो ब्लैकमेल है तो है, बार बार करेंगे वाली ताल ठोंक रहे थे.

Suresh Chiplunkar : यदि किसी को प्रगतिशील(?) दिखना है तो उसे नरेन्द्र मोदी का विरोध करना ही पड़ेगा… 🙂 🙂 अण्णा गैंग ऐसे ही प्रगतिशीलों से भरी पड़ी है…

Samar Anarya : Avinash Das देख लें साहब.. आपको सुरेश चिप्लूकर जी का समर्थन मिल रहा है.. अब भी चेत जाइए साहब

Sushant Jha : यानी अविनाश दास को संघी मान लें…?

Neeraj Diwan : माथे पर मोहर लगाने का वक़्त नहीं है। मैं तो इस पर भी सहमत हूं कि अन्ना और उनके कथित गैंग को किनारे कर दीजिए। लेकिन लोकपाल पर बहस कीजिए। उसके तकनीकी पहलुओं पर सुझाव-आपत्तियां दर्ज कीजिए। और संसद इसे पास करें- इसके लिए मिल-जुलकर दबाव समूह बनाइए।

Samar Anarya : ‎@ सुशांत झा– अविनाश जी की वाम प्रतिबद्धता कमसेकम मेरे लिए असंदिग्ध है सुशांत जी.. बस मैं यह चाहता हूँ कि वह इस पूरे आन्दोलन को मध्यवर्गीय भावनाओं विस्फोट से पैदा हुई उन्माद वाली नजर से न देख तार्किक विवेचन की नजर से देखें, बस. और हाँ, आपका पहला सवाल, दिमाग से उतर गया था.. समर पाण्डेय का पाण्डेय मेरे परिवार/समाज द्वारा मेरे ऊपर थोपा गया हिस्सा था, या आप यह भी मानते हैं कि एक बच्चा अपना नाम चुन सकता है? ‘अनार्य’ मैंने चुना, (वैसे पासपोर्ट वगैरह पर अब भी वही पाण्डेय चिपका हुआ है, नाम बदलवाना बहुत बड़ी और कष्टदायक प्रक्रिया है साहब- आखिरी डिग्री का इन्तेजार कर रहा हूँ कि फिर एक साथ कर लूँ) अब आप बच्चे को दिए गए नाम की तुलना पार्टी चुनने जैसे सचेत काम से कर रहे हैं तो आप बेशक बहुत ‘बुद्धिमान’ HONGE.

Suresh Chiplunkar : अरे समर जी, हम तो वैसे ही “अछूत” हैं, जैसे नरेन्द्र मोदी हैं… अविनाश दास जी का अण्णा गैंग से विरोध (या समर्थन) अलग प्लेटफ़ार्म पर है… हमारा अलग कारण से है…

Suresh Chiplunkar : ‎60 साल हो गये “सो कॉल्ड सेकुलरों” को झेलते… अब एक और नीति निर्धारण समिति में भी ऐसे ही लोग… उफ़्फ़्फ़

Samar Anarya : सुरेश जी- अछूत शब्द को गाली ना दें. सदियों के शोषण और संताप से उपजे गुस्से के विद्रोह में बदलने को इंगित करता है यह शब्द.. आपने जिस राम की तस्वीर अपनी बना के चिपकाई है, उनका शम्बूकवध का प्रसंग तो याद होगा आपको. आप ‘चितपावन’ लोग क्या समझेंगे उसे.. सो जो हैं वही कहें, अछूत ना BANEN..

Neeraj Diwan : वाम और संघ के बीच फंसे अन्ना हज़ारे कल शाम एक ग़ज़ल गुनगुना रहे थे, “उन्हें ये ज़िद कि मुझे देखकर किसी को ना देख.. मेरा ये शौक है, सबसे कलाम करता चलूं” ! – कुछ ऐसा ही आग्रह हम दोस्तों में भी होता है।

Sushant Jha : ‎@समर- मुझे ‘बुद्धिमान’ घोषित करने के लिए तहे दिल से शुक्रगुजार हूं।

Suresh Chiplunkar : समर भाई, समझने का ठेका “चितपावन” के अलावा किसी और को भी मिला है क्या? 🙂 🙂

Anand Pandey : समर जी–राम का नाम बदनाम न करें! संबुक वध से उनका कोई लेना देना है ..वह तो ब्राह्मणों द्वारा इंटर-पोलेतेड चीज़ है..

Suresh Chiplunkar : नरेन्द्र मोदी यदि 2+2=4 कहे तब भी उसका विरोध करना, यदि इसे “अछूत” नहीं कहते तो क्या कहते हैं?

Samar Anarya : ‎@आनंद जी — आ हा हा– वाह भाई ऐसी अद्भुत खोज .उन्ही ब्राह्मणों ने राम कथा भी लिखी है यह तो याद है.. तुलसी बाबा ने.. और असली वाली रामायण (वाल्मीकि जी वाली) में भी यह प्रसंग है.. वह तो जाती से ब्राह्मण नहीं थे. अब इस पर तो @AVINASH DAS की प्रतिक्रिया जाननी ही PADEGEE..

Suresh Chiplunkar : ‎”संघी”, “चड्डे”, “हिन्दू आतंकवादी”, इत्यादि सुनते-सुनते अब हम इस “अछूतियत” के अभ्यस्त हो चले हैं… 🙂 🙂 🙂

Ravish Kumar : मैं नरेंद्र मोदी का विरोध करता हूं।

Suresh Chiplunkar : रवीश जी, बिलकुल कीजिये… यह आपका लोकतांत्रिक अधिकार है

Suresh Chiplunkar : ठीक वैसे ही जैसे “सो कॉल्ड सेकुलरों” का विरोध करना मेरा भी अधिकार है 🙂

Suresh Chiplunkar : चलो भाईयों, अब घर जाना है… और अर्णब गोस्वामी की “मै ही मैं हूं” सुनना है… नमस्कार कल मिलेंगे 🙂

Sushant Jha : लेकिन रवीशजी…आपने अन्ना को सपोर्ट किया था…मोदी के विरोध से काम नहीं चलेगा…कुछ ज्यादा करना होगा…!

Ravish Kumar : यहां का वहां न मिलायें तो ठीक रहेगा। बात सिर्फ भ्रष्टाचार के खिलाफ है। ऐसा नहीं है कि बाद में ये लोग सांप्रदायिकता की तरफ हमें धूल मिट्टी की तरह चहेट ले जाएंगे। ड्राफ्ट में समस्या है। कौन कहता है कि नहीं है। मंच से ही कहा जा रहा था कि ज़िद कमेटी के वैधानिक गठन को लेकर है। बातचीत में बहुत सारे प्रस्तावों पर पीछे न हटने को लेकर नहीं। मैंने सुना है मंच से कई लोगों को बोलते।

Ravish Kumar : सुशांत, हम दलीलों का आईपीएल नहीं खेल रहे हैं। मेरी कई दलीलें पिट भी सकती हैं। पिटनी भी चाहिए। मैंने आंदोलनों का कोई अंतिम सत्य हासिल नहीं कर लिया है। हर आंदोलन में अपनी समस्या होती है। नेतृत्व पर सवाल उठते हैं। मुझे मालूम है कि मैं सांप्रदायिक नहीं हूं। न हो सकता हूं।

Ravish Kumar : मुझे इस बहस में दस-शून्य से पराजित समझा जाए।

Ravish Kumar : समर से सहमत हूं। इस बात को लेकर कि ड्राफ्ट के कई पहलुओं से निरंकुशता का आभास होता है। लेकिन जब इस ड्राफ्ट की धुलाई कर रहे हैं तो सरकार की बनाई ड्राफ्ट को भी रिन से नहीं विम से ही सही धो लें तो अच्छा रहेगा।

Sushant Jha : रवीशजी…सही बात है। आपकी टिप्पणी से बहस पटरी पर आ गई है। वह डिरेल हो गई थी। मैंने इसिलिए हास्य में वो लिखा था…:) बाकी आप पर शक कहां है…?

Samar Anarya : ‎@रवीश कुमार– सरकार के बनाए ड्राफ्ट से कौन सहमत है? पर उसका मतलब यह नहीं है कि कि अन्ना जैसे घोर साम्प्रदायिक, क्षेत्रवादी राज ठाकरे समर्थकों को साम्प्रदायिक बाबाओं के सहारे राजनीति पर ही हमला करने उतार दिया जाय. हाँ आपका पहला तर्क बेतरह निराश करता है, आशीष नंदी के सहारे ही सही यह कहना कि भ्रष्ट लोग भी भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन का नेतृत्व कर सकते हैं लगभग यही कहने जैसा है कि नरेंद्र मोदी साम्प्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई के नेता हो सकते हैं.. बात गलत लगे तो बिलकुल धो डालिए मुझे, पर आप लोग जनमत बनाने वाले लोग हैं, आपसे ऐसी बड़ी गलतियां बहुत कुछ नुक्सान कर सकती हैं..

Avinash Das : Suresh Chiplunkar की टिप्‍पणी है : अरे समर जी, हम तो वैसे ही “अछूत” हैं, जैसे नरेन्द्र मोदी हैं… अविनाश दास जी का अण्णा गैंग से विरोध (या समर्थन) अलग प्लेटफ़ार्म पर है… हमारा अलग कारण से है | इस पर Samar Anarya हमें चेतातें हैं कि देख लें साहब.. आपको सुरेश चिप्लूकर जी का समर्थन मिल रहा है.. अब भी चेत जाइए साहब | अब बाकी लोग निर्णय लें कि चिपलून कर हम जैसों का समर्थन कर रहे हैं या विरोध। उनकी टिप्‍पणी में उनका समर्थन या विरोध साफ है – लेकिन अगर समर को ये समझ में नहीं आ रहा है, तो उनको अपनी समझदारी पर आत्‍मचिंतन करना चाहिए।

Ravish Kumar : अब समर, समस्या किससे है। अन्ना से या भ्रष्टाचारा से। मुझे समस्या भ्रष्टाचार से है। वैचारिक सतर्कता होनी चाहिए. अरविंद केजरीवाल ने टाइम्स आफ इंडिया में लिख कर सफाई दी है कि आंदोलन सेकुलर है और वे लोग भी इसमें यकीन रखते हैं। फिर भी मोदी की तरीफ और रामदेव का जयकारा पचता नहीं है। आप जब सिर्फ इसी लाइन पर चलेंगे तो मैं आपके साथ आने में देरी नहीं करूंगा। पर मुझे नहीं लगता कि( पूरी संभावना है कि गलत हो जाऊं) कि यही आंदोलन का चेहरा है। वैसे भी आंदोलन(अगर था तो) भ्रष्टाचार के खिलाफ था,लोकपाल को लेकर कम। कम को पता था कि लोकपाल क्या है। सबको यही मालूम था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ गैर राजनीतिक लोगों ने मोर्चा संभाल लिया है। वर्ना जब बीजेपी ने इस मुद्दे को उठाया था तो कामयाबी नहीं मिली थी। किसी जनसमर्थन को फासिस्ट होने को लेकर सचेत रहना ही होगा। पर चंद बयानों से फिलहाल ख़तरे की कोई गंभीर या साज़िशी बू नहीं आती कि संघ पीछे से चला रहा है। फिर भी यह मसला काफी गंभीर तो है ही। अब यह समझना होगा कि अन्ना ऐसे बयान वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण देते हैं या फिर भलमनसाहत के। मेरे पास साबित करने के लिए प्रमाण नहीं हैं।

Samar Anarya : ‎Avinash Das बात दिलचस्प है की आपको चिप्लूकर साहब की ‘अछूत’ आवाज भी हड़प जाना खतरनाक नहीं दीखता.. मेरा ‘चेताना’ दीखता है.. क्या करें.. बाकी चिपलूकर साहब के नेता राम माधव मंच पर थे.. विहिप वाले रामदेव थे , रविशंकर थे..यह आप या भूलना चाहते हैं या छिपाना.. क्यूँ अविनाश bhaai?

Sajid Usmani : ‎@ravish ji aap is behas ka IPL 10/0 se jeet gaye hain badhai ho aap ko harana koi majak thode he hai warna aap sab ki khabar le kar friday ko RAVISH KI REPORT ME PESH KAR DENGE.

Ravish Kumar : माधव को लेकर मैंने अरविंद से सवाल किया था. वैसे एक पत्रकार के नाते माधव का काफी इंटरव्यू किया है। खबरी रिश्ते भी रहे हैं। पहले कभी। खैर अरविंद ने बताया कि माधव को भी मंच से उतार दिया गया था। अब मैंने यह देखा तो नहीं था लेकिन जो कहा है वही बता रहा हूं।

Ravish Kumar : ग्राम्सी और मार्क्स के अनुसार जंतर-मंतरिया आंदोलन नहीं था। लंपटिया जमावड़ा था। लेकिन यार दो चार दिनों के लिए लोग सड़क पर उतर ही आए तो इतना क्या लोड लेना। उन्हें राजनैतिक होने की प्रैक्टिस तो करने दीजिए। बहस काफी गंभीर हो जाती है तो मैं हल्का होने लगता हूं। क्या करें।

Anand Pandey : समर जी : “.उन्ही ब्राह्मणों ने राम कथा भी लिखी है यह तो याद है.. तुलसी बाबा ने.. और असली वाली रामायण (वाल्मीकि जी वाली) में भी यह प्रसंग है” जी हाँ उत्तर कांड जिसमे यह वाली कहानी, सीता की अग्नि परीक्षा, इत्त्यादी है, वह बाद में जोड़ा गया है…असल वाले वाल्मीकि रामायण में नहीं था यह ..देखिये यह विकी लिंक : http://en.wikipedia.org/wiki/Ramayana#Uttara_Kanda

Sajid Usmani : ‎@RAVISHSAHI KEH RAHE HAIN AAP MEN SCHOOL SE CHUTTI LEKAR GAYA THA RSS WALE MADHAV KO EX BJP WALI UMA KO MANCH PE NAHI BAITHAYA BAAKI SAB KI ACESS THI

Ravish Kumar : अच्छा दोस्तों अब हे हे हे मेरी तरफ से भी। चलता हूं। मूर्खता पर सिर्फ मूर्खों का अधिकार नहीं है। मेरा भी है।

Anand Pandey : खैर, यह इस चर्चा से परे है सो हम लोग अभी इसपर न बात करें तो ठीक है..बाद में आप कभी भी जब फुर्सत में हों तो हम लोग इस विषय पर भी बात चीत कर सकते हैं.

Sajid Usmani : KHOONI KRANTI KO HI KRANTI KYUN SAMJHA JATA HAI BHALE HI VIRAT JAMAVDA NA HUA HO PAR LOG APNE MAN SE AAYE THE. KUCH BHRASTHACHAAR SE TRAST KUCH JIGYASA VASH

Sajid Usmani : ‎@RAVISH JI AAP JAISA DHEER GHAMBHIR AADMI KIS BEKAAR KI BEHAS ME PAD GAYA MUJHE PATA HAI AAP KE PAAS AUR BHI PRODUCTIVE KAAM HONGE

Neeraj Diwan : यूं भी अर्बन मिडिल क्लास के मुंह आंदोलन का स्वाद लग गया है। कम से कम यह अहसास तो कि कुछ करेंगे तो सरकार भी सुनेगी। सही कहा.. नैट प्रैक्टिस। अभी अनशन फिर आगे और..

Avinash Das : आपके लिए Samar Anarya यह लेख http://mohallalive.com/2011/04/22/pankaj-srivastava-react-on-critics-of-anna-s-movement/ और दूसरे कि चिपलूनकर जैसों के बारे में मेरी राय जगजाहिर है।

Samar Anarya : ‎@रवीश कुमार जी– राम माधव जी पूरी इज्जत से मंचासीन रहे.. मैं नहीं जानता की झूठ आप बोल रहे हैं या अरविन्द जी.. पर अरविन्द केजरीवाल के टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में दिए गए ‘सेकुलरिज्म’ वाले बयां के जवाब में एक (बेशरमी के साथ अपने ही लेख का हवाला दे रहा हूँ.. क्या करूँ बड़े लोग सब उस तरफ हैं..) उसी से कुछ लिंक दे रहा हूँ.. जांच len..

Samar Anarya : http://in.jagran.yahoo.com/news/national/national/5_2_7567157.html

Samar Anarya : और हिन्दू वाले इस लिंक में तो फोटो भी है.. आपसे लोगों को जिम्मेदारी की उम्मीद रहती है रवीश जी, गलतबयानी की नहीं.. http://www.thehindu.com/todays-paper/tp-national/article1629646.ece?css=print

Vineet Kumar :  स्टेटस को गौर से और टिप्पणी को जहां-तहां से पढ़कर कमेंट कर रहा हूं कि 25 लाख रुपये की जो फीस उन्होंने ली क्या इस पर बात नहीं करेंगे कि किससे ली? क्या किसी भी एक ऐसे शख्स से ली जो लाचार है,घर-दमीन,किडनी बेचकर दी है। अगर नहीं तो जिसके पास अकूत,काला,सफेद,ग्रे दुनियाभर की अलग-अलग किस्म की मनी है तो उनसे लेना कुछ गलत नहीं है औऱ जो बाकी लोग इसमें भी शोषण और ब्ला,ब्ला देख रहे हैं तो मेरी अपनी समझ है कि अमीरों को लुटो और गरीबों पर लुटाओ,तभी कुछ बदलाव संभव है। इस देश में गरीबों को लूटकर,अमीरों पर लुटाया जाता है, जो है, उसी की भरी जाती है। इसलिए मैं सैद्धांतिक तौर पर सक्षम लोगों से 25 क्या करोड़ रुपये लेने के पक्ष में हूं। हां, शर्त ये हैं कि टैक्स और बाकी संवैधानिक प्रावधानों के तहत।

Avinash Das : हद हो यार। हिंदू वाले इस लिंक में अन्‍ना के साथ शांतिभूषण की तस्‍वीर है। राम माधव की भी होती तो उससे क्‍या साबित हो जाता। रवीश ने यही कहा कि अ‍रविंद केजरीवाल से जब उन्‍होंने इस बाबत पूछा तो उन्‍होंने जवाब दिया कि उन्‍हें भी मंच से उतार दिया गया था। इसमें निहित है कि वे मंच पर थे। आप गलतबयानी जैसे जुमले किस बात को लेकर इस्‍तेमाल कर रहे हैं, आप ही बताएंगे। पर इस मिजाज में मत रहिए कि अब तो हर चीज का विरोध कर के ही रहूंगा – चाहे जो हो जाए।

Avinash Das : ‎@ Ravish Kumar : रवीश डियर, आप अपना हे हे हे वापस ले लें… Samar Anarya ने अपना हे हे हे डिलीट कर दिया है।

साहित्य शिल्पी ई-पत्रिका : मुझे इस लेख के आरंभ से भी आपत्ति है। क्या लेखकों और पत्रकारों का वर्गीकरण जाहिर है? “समाजवादी सज्‍जन और एक दलितवादी पत्रकार” वाक्य से बहस का आरंभ कर अविनाश क्या सिद्ध करना चाहते हैं? समाजवादी सज्जन होना गलत है या दलितवादी पत्रकार? या फिर आप हमेशा की तरह अपनी वामपंथी कट्टरता का झंडा बुलंद कर रहे हैं? मेरी कमीज ज्यादा सफेद सिद्ध करने वाली दास्तान…भ्रष्टाचार की वकालत ही है आपका वक्तव्य। पीआईएल आत्मप्रचार का बडा बिजनेस है जिसकी आड में बडी महत्वाकांक्षायें आसानी से सिद्ध होती हैं।

Avinash Das : मेरा एक कमेंट पता नहीं कहां चला गया, जो मैंने ऊपर Samar Anarya को संबोधित किया था। खैर, मैंने लिखा था : हिंदू वाले लिंक में अन्‍ना के साथ राम माधव की नहीं, शांति भूषण की तस्‍वीर है। देखिए समर राम माधव का चेहरा भी नहीं जानते। खैर, वे बार-बार रवीश पर गलतबयानी का आरोप लगा रहे हैं। रवीश का बयान था – माधव को लेकर मैंने अरविंद से सवाल किया था. वैसे एक पत्रकार के नाते माधव का काफी इंटरव्यू किया है। खबरी रिश्ते भी रहे हैं। पहले कभी। खैर अरविंद ने बताया कि माधव को भी मंच से उतार दिया गया था… अब इस बयान में रवीश ने यह नहीं कहा कि माधव मंच पर चढ़े नहीं थे। मंच पर चढ़े थे, बैठे थे – तभी तो उतार दिया गया था। यार कुछ तो लिहाज करो अपना। जरूरी नहीं कि लोकपाल या अन्‍ना या शांतिभूषण के खिलाफ हो, तो मुंह से झाग निकालने की हद तक बहस करो।

Avinash Das : अरे! शुक्रिया फेसबुक!! ऊपर वाला कमेंट भी आ गया!!!

Samar Anarya :  ‎Avinash Das भाषा बदलती है तो बौखलाहट दिखने लगती है. तर्कों में कमजोर पड़ने की बौखलाहट. जैसे आप ने शांतिभूषण को कांग्रेस ओ की जगह कांग्रेस का बता देने के बाद कहा था की इतना तो मैं भी जनता हूँ.. मैंने भी हिन्दू वाली तस्वीर में यह नहीं कहा की यह राम माधव हैं. बात सीधी और साफ़ थी की हिन्दू वाली तस्वीर में तो फोटो भी है, मतलब कोई फोटो है, राम माधव के होने का जिक्र करता तो सीधे कहता की राम माधव की फोटो है. हाँ मामला मुह से झाग निकलने वाला जरूर है.. रवीश जी की बात के जवाब में मेरा सीधा बयान था की “रवीश कुमार जी– राम माधव जी पूरी इज्जत से मंचासीन रहे.. मैं नहीं जानता की झूठ आप बोल रहे हैं या अरविन्द जी.. पर अरविन्द केजरीवाल के टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में दिए गए ‘सेकुलरिज्म’ वाले बयां के जवाब में एक (बेशरमी के साथ अपने ही लेख का हवाला दे रहा हूँ.. क्या करूँ बड़े लोग सब उस तरफ हैं..) उसी से कुछ लिंक दे रहा हूँ.. जांच len..”

Samar Anarya : ‎Avinash Das अब जरा देख लें के मेरा वाक्य था की पता नहीं झूठ आप बोल रहे हैं या अरविन्द केजरीवाल..और बाद की एक टिप्पणी में फिर बात सीधी थी “आपसे लोगों को जिम्मेदारी की उम्मीद रहती है रवीश जी, गलतबयानी की नहीं.. “

Neeraj Diwan : राममाधव बाइज़्ज़त मंच पर आसीन थे। ये है तस्वीरें और संघ का समर्थन पत्र भी http://alturl.com/4zzgh

Avinash Das : अरे भाई, रवीश का आखिरी वाक्‍य एक बार फिर पढिए – अब मैंने यह देखा तो नहीं था लेकिन जो कहा है वही बता रहा हूं। अब इसके बाद भी आप कहते हैं कि रवीश गलतबयानी कर रहे हैं, तो आपकी मानसिक बुनावट की बलिहारी।

Avinash Das : आप सब लोगों के लिए पंकज भाई का आलेख अग्रसारित। कृपया जरूर पढ़ें : http://mohallalive.com/2011/04/22/pankaj-srivastava-react-on-critics-of-anna-s-movement/

Samar Anarya : अब झूठ और गलतबयानी का अंतर तो समझते होंगे.. हाँ हे हे हे गलती से टाइप हो गया था.. किसी और दोस्त के एक सादा सी बात का सादा सा जवाब.. पहले ध्यान भी नहीं गया.. ध्यान जाते ही हटा लिया.. हाँ यह और की आप जैसों से मुंह से झाग निकलने वाली भाषा के उम्मीद नहीं रहती, तो थोडा झटका खाया हुआ हूँ.. यह भी की मेरी हर बात पर दौड़ा लेने के अभ्यस्त आप रवीश जी के भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन का नेतृत्व भ्रष्ट भी कर सकते हैं तक देख ही नहीं पाते.. अब इस पर यह कहूँगा की ‘बढ़िया है’

Samar Anarya : ‎@Avinash Das अब लीजिये.. अब तो नीरज जी ने राम माधव जी के तस्वीरें भी खोज डालीं.. मंच पर..और हाँ अविनाश भाई.. जिन भोथरे तर्कों का सहारा आप बार बार ले रहे हैं.. चाहे वह पंकज श्रीवास्तव के हों या शशि झा के..उनका जवाब बारहा दिया गया है.. मेरे लेखों को छोडिये, अपूर्वानंद जी ने भी कुछ लिखा था, और भी तमाम लोगों ने..आप नहीं सुनेंगे.. नहीं सुन रहे हैं…

Samar Anarya : सवाल है की इस आन्दोलन को कार्पोरेशंस क्यूँ फंड कर रहे थे? और क्या यही कारण है की जन लोकपाल बिल कार्पोरेशंस के जांच को तैयार नहीं है? इस आन्दोलन के ६ नेताओं में से २ सीधे सीधे विश्व हिन्दू परिषद् के हैं.. उसकी धर्म सांसदों में जाते रहे हैं.. तीसरे अन्ना हजारे स्वयम ने लगातार शिवसेना का राज ठाकरे का समर्थन किया है.. आन्दोलन के तुरंत बाद मोदी को बेहतर बता कर उन्होंने रहे सहे भ्रम भी खोल दिए.. आप यह देखना नहीं चाहते या आपको दिख ही नहीं रहा?

Samar Anarya : Avinash दस तीसरा सवाल यह है की यह आन्दोलन सिर्फ राजनीति और नौकरशाही को क्यूँ निशाना बना रहा है.. आन्दोलन वाले तो जानते होंगे की यही दो जगहें हैं जहाँ दलित/पिछड़ी शोषित आबादी आ पाई है.. क्या यह सवर्ण/आभिजात्य वर्ग के फिर से हुंकार है या नहीं?

Samar Anarya : और हाँ, को देश बांटने वाला बताते हैं और संतोष हेगड़े का एक निर्णय यूथ फॉर इकुआलीटी का अब तक का सबसे प्रिय निर्णय होता है.. आप देख नहीं पा रहे या देखना नहीं चाहते?

Samar Anarya : ‎Avinash Das चौथा सवाल.. जन लोकपाल बिल लोकतंत्र के मूल धारणा शक्ति विभाजन के खिलाफ क्यों है? यह सारी शक्ति एक लोकपाल के हाथ में क्यों समेत देना चाहता है, यह एक साथ विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका क्यों बनना चाहता है? लोकतंत्र के जरा सी भी समझ वाले को इससे डरना चाहिए.. आप जाने क्यों नहीं dar रहे..

Samar Anarya : पांचवा सवाल– यह सिविल सोसायटी है क्या? इसमें कोई दलित/पिछड़ा/शोषित वंचित तबका शामिल क्यों नहीं है? छोडिये, इसमें उतर पूर से कोई क्यों नहीं है? कश्मीर से कोई क्यों नहीं है? क्या अकारण ही? या यह इलाके सिविल सोसायटी के ‘भारत’ में नहीं aate..

Samar Anarya : अब बन सके तो जवाब दीजियेगा या ऐसा कोई लेख दिखाइएगा जिसमे इन सवालों से उलझा गया हो.. भावनात्मक उल्टी वाले (शब्द असंसदीय नहीं है, ख़ास तौर पर मुंह से झाग निकलने वाले आरोप के बाद) लेख, हम भी क्रांतिकारी हैं वाले लेख.. बहुत पढ़ लिए.. सीधे सवाल हैं, साहस हो, विवेक हो तो सीधे जवाब deejiyega…

Avinash Das :  ‎@ Samar Anarya : जैसे जैसे आपके सवाल सामने थे, वैसे वैसे हमने जवाब देने की कोशिश की है… 1) हमने झाग निकलने वाली भाषा का इस्‍तेमाल किया और आप हमारे तर्कों को भोथरा बतानी वाला का इस्‍तेमाल कर रहे हैं। इस पर मैं भी कहूंगा – “बढ़‍िया है!” 2) पंकज श्रीवास्‍तव और शशि झा के लेख के जवाब में आपके बारहा दिये गये तर्कों का अंतिम निष्‍कर्ष यही है कि आंदोलनों का विशेषाधिकार सबके पास नहीं होना चाहिए। कुछ खास, पवित्र किस्‍म के लोगों के पास होने चाहिए। मैंने अपूर्वानंद जी को पढ़ा भी और उनको छापा भी। आपको भी मंच दे ही रहे हैं… 3) जंतर मंतर पर एक दानपेटी थी, वहां कोई भी दान दे सकता था। आप भी दे सकते थे, कॉरपोरेशंस ने भी दिये। इसमें हैरानी की क्‍या बात है? जन लोकपाल बिल के दायरे में कॉरपोरेशंस क्‍यों नहीं हैं – इसका जवाब ऊपर मैंने एक कमेंट में दिया है। फिर यहां चिपका रहा हूं – ये बड़ी विचित्र किस्‍म की बात है कि कॉरपोरेट को भी लोकपाल के दायरे में शामिल होने चाहिए। बहुत मामूली सी बात है कि कॉरपोरेट को फायदे जिन सरकारी नीतियों के तहत पहुंचाये जाते रहे हैं, उन नीतियों पर नजर रखने की जरूरत होनी चाहिए या कि सीधे उस फैक्‍ट्री के मालिक पर, जो घूस लेकर मंत्रालय आता है और डील करता है? कमाल है यार आपलोगों की समझदारी भी !!! 4) इस आंदोलन के छह नेता थे – शांति भूषण, प्रशांत भूषण, अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, स्‍वामी अग्निवेश और स्‍वयं अन्‍ना हजारे। मुझे ये बताया जाए कि इनमें से दो कौन सीधे सीधे विश्‍व हिंदू परिषद से जुड़े हैं? बाकी हमें सब दिखता है और सब कुछ देखते हुए भी हम लोकपाल की लड़ाई जीतना चाहते हैं, क्‍योंकि आरटीआई की तरह जनता के हाथ में एक और धारदार बंदूक होगी। ‎5) लोकपाल राजनीति के ऊपर नहीं बैठेगा, राजनीतिक सत्ता के ऊपर बैठेगा। आप इस बात की लड़ाई छेड़‍िए कि लोकपाल दलित ही होना चाहिए – हम आपकी लड़ाई में साथ होंगे। नौकरशाही पर अभी सीधे सीधे सत्ता की कमान होती है। लोकपाल बिल अभी तक लटका ही इसलिए रहा, क्‍योंकि इस बिल में यह प्रावधान है कि नौकरशाही की लगाम एक के हाथ में नहीं होगी। एक कमेटी होगी, जो उसका ताना-‍बाना तय करेगी। उस कमेटी में विपक्ष भी होगा। तो ट्रांसफर-पोस्टिंग की धांधली तो सबसे पहले बंद होगी। पता नहीं, आप जैसे अभूतपूर्व बुद्धिजीवी नारेबाजी की शैली में तर्क क्‍यों गढ़ने-देने लग जाते हैं। 6) संतोष हेगड़े का ड्राफ्टिंग कमेटी में होना महज एक तकनीकी मामला है और लोकायुक्‍त की हैसियत से उन्‍हें पता है कि शक्तियों का बंटवारा ड्राफ्ट में कैसे होना है। यह अप्रत्‍याशित नहीं है कि कांग्रेस लॉबी और लोकपाल और अनशन के विरोधियों की लॉबी हेगड़े और शांतिभूषण-प्रशांतभूषण के पीछे लगी हुई है। ये तीनों ही कानूनविद हैं, जो सिविल सोसाइटी की ओर से ड्राफ्टिंग कमेटी में हैं। इनके होने से ड्राफ्टिंग में जो पैनापन आएगा, उसको समझा जाना चाहिए। नहीं समझेंगे तो भी आपका क्‍या बिगड़ेगा? आप जैसों को जनता से क्‍या मतलब? 7) जनाब ये आपसे किसने कह दिया कि जन लोकपाल बिल लोकतंत्र की मूल धारणा शक्ति विभाजन के खिलाफ है? फिर आपको पता ही नहीं है दरअसल कि जन लोकपाल क्‍या है? ये शक्ति के विकेंद्रीकरण और केंद्रीयता की तानाशाही के खिलाफ होगा। लोकपाल का पॉलिसी मेकिंग में कहीं कोई योगदान नहीं होगा। लोकपाल का कामकाज लोकतांत्रिक नक्‍शे के भीतर ही समाहित होगा। वह अलग से कोई सैन्‍य बॉडी नहीं होगी। आप तो जैसे सवाल कर रहे हैं, उस हिसाब से तो आरटीआई भी लोकतंत्र के खिलाफ का मामला है। फिर तो जनता की चुनी हुई सरकार से किसी को सवाल करने का हक ही नहीं होगा? कोई सूचना मांगने का भी हक नहीं होगा? खैर, मुझे यह बताइए कि पिछले साठ सालों में कितने नेता भ्रष्‍ट हुए होंगे – किसी आंदोलन ने किसी नेता को राजनीतिक जमीन से बेदखल किया। उसे सजा दिलवा पाया। फिर नये रास्‍ते क्‍या होंगे? आप कहें, क्रांति ही वह रास्‍ता होगा। हमारा आखिरी उत्तर होगा – हमें ऐसे नारों से डरना चाहिए, जो वस्‍तुस्थिति की परवाह किये बगैर रेगिस्‍तान में पानी तलाश रहा हो। 8) क्‍या हास्‍यास्‍पद सवाल है कि सिविल सोसाइटी में दलित, पिछड़ा, शोष‍ित, वंचित तबका शामिल क्‍यों नहीं है? एक काम कीजिए, संताल परगना से किसी गरीब आदिवासी का उठा कर ड्राफ्टिंग कमेटी में शामिल कर दीजिए। हद है भाई। अरविंद केजरीवाल जिस आरटीआई कानून के लिए लड़े, उस कानून का लाभार्थी वही दलित, पिछड़ा, शोषित, वंचित तबका है। शांति भूषण, प्रशांत भूषण जिस तबके की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ते रहे, वह दलित, पिछड़ों, शोषितों, वंचितों का ही तबका था। आप खुद उच्‍चकुलीन ब्राह्मण हैं और आप दलितों, पिछड़ों, वंचितों के हक में बोल रहे हैं, तो क्‍या आपको यह कह दिया जाए कि आप चुप रहिए, किसी दलित, पिछड़े, वंचित को बहस करने के लिए लाइए। हद है यार। 9) आंखें खोलिए। मैंने लेख पेश करने के बजाय सिलसिलेवार जवाब देने की कोशिश की है। पर मुझे पता है, आप आंखों का पट जरा सा खोलेंगे और आधा भी नहीं पढ़ेंगे कि जवाब देने में जुट जाएंगे – क्‍योंकि अंतत: आपको किसी को यह नहीं बताना पड़ेगा कि समर को चुप कोई नहीं करा सकता। खैर, आपके अगले किसी भी सवाल का जवाब देकर वक्‍त बर्बाद करने से बेहतर होगा कि आपको बिंदास लिखने-बोलने दिया जाए।

Nadim S. Akhter : बहस बहुत गर्मागरम है..अगर आप लोग इजाजत दें तो बस इतना कहना चाहूंगा कि साधन और साध्य में से ज्यादा महत्वपूर्ण कौन है…फैसला आपके हाथ में है।

Avinash Das : सिविल सोसाइटी = http://en.wikipedia.org/wiki/Civil_society

Avinash Das : मुझे कुछ नहीं कहना है… मेरे तर्क भोथरे हैं कि क्‍या हैं, इसका फैसला मैं समर अनार्य के ही हाथों में दे देता हूं और मान लेता हूं कि मैं हतबुद्धि इस देश का नागरिक होने के लायक नहीं हूं। आमीन।

Samar Anarya : Avinash Das इस बार बढ़िया है की परतें थोड़ी खुली हैं.. फिर से देख लीजिये की आप के तर्क कितने भोथरे हैं.. (बात फिर वही की झाग वाली भाषा भी आप ही ले के आये थे तो फिर से… बढ़िया है)

१- पंकज और शशि झा साहब के लिखे लेखों के किसी भी जवाब में कम…सेकम मैंने आन्दोलनों का विशेषाधिकार किसी ख़ास ‘पवित्र’ तबके के हाथ में होने के बात नहीं के थी. यह आप के जवाब पढने के सीमा हो सकती है, इसे कृपया मेरे तर्कों पर आरोपित ना करें.

२- मेरा सीधा सवाल कुछ ख़ास आभिजात्य लोगों के ‘राष्ट्र’ के अव्वाज बनने के दावे पर था. ३००० लोग राष्ट्र के आवाज नहीं होते, ख़ास तौर पर तब जब तीन लाख लोग इसी शहर में एक महीने पहले इसी मीडिया द्वारा उनकी रैली के वजह से हुए ट्रैफिक जाम को लेकर खलनायक बनाये गए हों. कहने के जरूरत नहीं की वह मजदूर लोग थे और यह बड़ी कारों वाले अंग्रेजीदां..

३-इससे बड़ी हास्यास्पद बात हो ही नहीं सकती की ” जंतर मंतर पर एक दानपेटी थी, वहां कोई भी दान दे सकता था।”

आप० सच में यह समझ रहे हैं अविनाश जी? संस्थागत फंडिंग और दानपेटियों का फरक समझाने के कोशिश कीजिये.. या फिर अरविन्द केजरीवाल से ही पूछ लीजिये की पैसा उन्हें चेक से मिला था या दानपेटियों में..

4-आपका अगला तर्क खैर और दिलचस्प है. आप कह रहे हैं की ” बड़ी विचित्र किस्‍म की बात है कि कॉरपोरेट को भी लोकपाल के दायरे में शामिल होने चाहिए। बहुत मामूली सी बात है कि कॉरपोरेट को फायदे जिन सरकारी नीतियों के तहत पहुंचाये जाते रहे हैं, उन नीतियों पर नजर रखने की जरूरत होनी चाहिए या कि सीधे उस फैक्‍ट्री के मालिक पर, जो घूस लेकर मंत्रालय आता है और डील करता है? कमाल है यार आपलोगों की समझदारी भी !!!”

आप कहना क्या चाहते हैं अविनाश जी.. की नीरा राडिया से लेकर बरखा दत्त तक मंत्री बनाने के लिए जो लोबीइंग करती हैं वह अपने आप होती है? आप यह कहना चाहते हैं की भ्रष्टाचार को सांस्थानिक बनाने में कार्पोरेशंस की कोई भूमिका नहीं है? या आप यह नहीं जानते की स्वास्थ्य सेवाओं का ७२ प्रतिशत इस देश में इन्ही निजी क्षेत्र वालों के हाथ में हैं जिनको सरकारी जमीनें इस नाम पर मिली हैं की वह २५ प्रतिशत गरीब लोगों का निशुल्क इलाज करेंगे.. वह नहीं कर रहे.. यह भ्रष्टाचार कैसे रोकेंगे आप? बड़े बड़े निजी स्कूलों में भी यही बात है. या आप यह नहीं जानते की बिजली निजी क्षेत्र से वितरित हो रही है, यहीं इसी दिल्ली में..

अन्ना हजारे तक दबाव में कार्पोरेशंस को लोकपाल के दायरे में लाने को तैयार हैं, आप क्यों नहीं..

५- बाबा रामदेव को क्यों भूल गए आप? और उन श्री श्री रविशंकर को जिनको अन्ना हजारे ने पहला धन्यवाद दिया? यह सिर्फ चूक तो नहीं हो सकती अविनाश जी. आरटीआई और लोकपाल का फरक भी. आरटीआई सरकार को जवाबदेह बनाने का औजार है और लोकपाल एक संस्था को ‘सुपर सरकार’ बनाने का.. ऊपर से यह बन्दूक जनता के नहीं नोबेल और मैग्सेसे विजेताओं के हाथ में होगी..

Avinash Das : आप ऊपर के कमेंट मिटा रहे हैं, फिर लिख रहे हैं – माजरा कुछ समझ में नहीं आ रहा है। खैर, आपके आखिरी जवाब से ऐसा लग रहा है कि आपको वाकई पता नहीं है लोकपाल का पूरा ढांचा क्‍या होगा। आप यही बता दीजिए कि लोकपाल के हाथ में क्‍या क्‍या शक्तियां होंगी और उसका गठन कैसे किया जाएगा। बता ही दीजिए – फिर हम सब समझ लेंगे कि आपको पता है लोकपाल की पूरी संरचना और अपनी लोकपाल के बारे में अपनी गलत धारणा से उबर भी जाएंगे। बता ही दीजिए जरा।

Avinash Das : जनसत्ता में योगेंद्र यादव का परसों एक लेख छपा है। कल इसे मोहल्‍ला लाइव पर कॉपी-पेस्‍ट करूंगा। उसमें कुछ वाक्‍य इस तरह है : जमीन पर संघर्ष कर रहे कार्यकर्ताओं को अक्‍सर बुद्धिजीवियों की सैद्धांतिक आलोचनाओं से चिढ़ होती है। कई बार ऐसी आलोचनाएं जमीनी हकीकत की नासमझी से पैदा होती हैं। कुछ हद तक यह बात अन्‍ना हजारे के आंदोलन की आलोचना पर भी लागू होती है। इस आंदोलन को संघ परिवार की उपज मानने वाले लोग जनांदोलनों की दुनिया की बारीकियों से नावाकिफ हैं।

Samar Anarya : ‎5) यह फिर से गलत समझदारी है आपकी.. लोकपाल राजनीतिक सत्ता के ऊपर नहीं राजनीति के ऊपर बैठेगा.. इसका मतलब है वह किसी को जवाबदेह नहीं होगा.. संसद को भी नहीं.. हाँ यह आप की अद्भुत दृष्टि ही है जो नोबेल विजेताओं और मैग्सेसे विजेताओं की समिति को जिम्मेदार समिति मान लेती है. यह भी बता दें की यह समिति किसके प्रति जवाबदेह होगी..(यही सवाल अपूर्वानंद जी ने भी उठाये थे, हिन्दू की विद्या सुब्रमनियम ने भी.. और भी तमाम लोगों ने.. तो यह भी बता दें

6) जी हाँ, आप सही कह रहे हैं की कानूनविदों के समिति में होने से पैनापन आएगा.. जैसे शांति भूषन द्वारा दलबदल के खिलाफ ड्राफ्ट किये गए कानून से आया था.. पता नहीं आप जानते भी हैं या नही की वह क़ानून जिसके बाद व्यक्तिगत दलबदल झुण्ड के दलबदल में बदल गया उन्ही का बनाया था.. बाकी.. आप खुशी से जनता के साथ रहिये, हम बाहर ही सही..

7) जन लोकपाल बिल लोकतंत्र की मूल धारणा शक्ति विभाजन के खिलाफ है यह मुझसे इस बिल के अध्ययन ने कहा है जनाब. पूरे ड्राफ्ट को कई बार पढने के बाद.. लोकपाल जांच भी करेगा, सजा भी देगा, क़ानून भी बनाएगा..यह आपको शक्ति विभाजन लगता है? तब तो फिर बलिहारी है..

जनता की चुनी हुई सरकार से जनता को सवाल करने का हक़ है, विपक्ष सालों साल यही करता है. और ६० सालों का सवाल.. वी पी सिंह और बोफोर्स तो आप जानते ही होंगे.. कोंग्रेस तब की चोट से अब तक नहीं उभर पायी है.. पर आप तो सिविल सोसायटी वाले हैं, अनपढ़ गरीब जनता रजा को फकर कैसे बना देती है, उसे देश की तकदीर कैसे बना देती है क्यूँ कर याद रखेंगे.

8) काश आप जानते होते की आरटीआई कानून के लिए अरविन्द केजरीवाल नहीं लादे.. ब्यावर का गरीब मजदूर लड़ा.. एम्केएसएस के नेतृत्व में. ५० दिनों तक तहसील घेर के रखने के वह घेरा डालो डेरा डालो वाली राद्नीति राजस्थान में आर टी आई कानून बनवाने में कामयाब हुई. आप नहीं जानते शायद की यही वह क़ानून है जो बाद में राष्ट्रीय स्तर पर इस क़ानून की लड़ाई का जनक और मॉडल है.. कैसे जानेंगे, उस लड़ाई में गरीब मजदूर था तो कैमरे नहीं थी सिर्फ प्रिंट मीडिया था.. (वैसे हम वहीं थे.. पूरी लड़ाई में नहीं पर चंद रोज जरूर)

अब आप शायद समझ पायें की हमारा पैसा हमारा हिसाब का नारा अरविन्द केजरीवाल के श्रीमुख से नहीं राजस्थान के गरीब किसान मजदूरों के संघर्ष में गधा गया नारा है..बाकी यह की आपकी संथाल परगना के आदिवासियों के लिए की गयी यह टिप्पणी कुछ और भी इशारे कर रही है.. खैर उसके बारे में फिर सही..

और हाँ, “उच्‍चकुलीन ब्राह्मण’ तो छोडिये मैं हिन्दू ही नहीं हूँ.. नास्तिक हूँ. और अगर आप जन्म की वजह से बता रहे हैं तो दर्ज कर लें की ‘पाण्डेय’ उच्च कुलीन नहीं होते, वह ‘१३’ के ब्राहमण हैं.. उत्तर भारत में उच्च कुलीन सिर्फ तीन हैं.. शुक्ल मिश्र और त्रिपाठी.. तो यह तथ्य भी सही कर लें..

९- हमारी तो ऑंखें खुलीं हुई हैं साहब.. आप ही आँखें बंद कर आरोप लगाये जा रहे हैं. इस बहस में आपको, या किसी को चुप कराने के इरादे से नहीं आया था, वैसे भी उसका बेहतर तरीका बहस नहीं ‘झाग उगलने’ जैसा आरोप होगा.. वह करना होता तो तर्क ना करता.. खैर अच्छा हुआ की आपने बात साफ़ कर दी..

बिलकुल आप अपना बहुमूल्य समय बर्बाद ना करें.. कहें तो मैं अब तक बर्बाद हुए वक्त के लिए माफी वाफी भी मांग लूँ.

Samar Anarya : uupar ke kament mita nahee raha tha avinash jee, ye facebook ke naye awtaar me enter daba dene se adhooree baat bhee paste ho jaate hai aur ab tak shift enter kee thek se aadat nahee padee hai.. bas..

Avinash Das : अभी लोकपाल की ड्राफ्टिंग चल रही है। अभी उसी ड्राफ्ट में ये तय होगा कि लोकपाल को कैसे चुना जाएगा और वह अंतत: किससे प्रति जिम्‍मेदार होगा। आप और अपूर्वानंद जैसे अतर्यामियो को क्‍या कहा जाए… जिनको दरअसल पता नहीं है कि लोकपाल बिल का मतलब क्‍या होगा।

Avinash Das : दिक्‍कत ये है कि आप जवाब पढ़ते ही नहीं हैं, अपनी ही भांजते चलते हैं। दलबदल वाले कानून के संदर्भ में मैंने एक जवाब आपको दिया हुआ है – व्‍यक्ति को खरीदना आसान होता है, समूह को खरीदना आसान नहीं होता – दलबदल कानून के संदर्भ में शांतिभूषण की मंशा पर संदेह करने वालों को ये समझना चाहिए। लेकिन अगर संदेह करने वाले का नाम समर है, तो फिर बात अलग है। कई जिंदगियां खत्‍म हो जाएंगी, उनके तर्क (कुतर्क कहने की कोई गलती नहीं करूंगा) खत्‍म नहीं होंगे।

Avinash Das : आपने आरटीआई आंदोलन और केजरीवाल के संदर्भ में बहुत अच्‍छी बात कही। यही बात मैं पिछले कई दिनों से आपको समझाने की कोशिश कर रहा हूं। कोई भी आंदोलन एक व्‍यक्ति का आंदोलन नहीं होता। जैसे यह आंदोलन अन्‍ना का आंदोलन नहीं था – जिसकी वजह से आप चिढ़े हुए हैं। आपका सारा विश्‍लेषण आपकी चिढ़ का परिणाम न ही है, न कि भारतीय राष्‍ट्र राज्‍य के प्रति आपकी चिंता का।

Avinash Das : उच्‍चकुलीन ब्राह्मण वाली बात – देखिए मेरा जातीय ज्ञान कितना कमजोर है और आप अपना देख लीजिए? आप भी अंतत: किसी को तो उच्‍चकुलीन मान ही रहे हैं… कमाल है प्रभु…

Samar Anarya : अविनाश जी आप गंभीर बहसों में कम उतारते हैं यह तो पता ही नहीं था.. अब बता दूँ की ड्राफ्ट जनलोकपाल बिल पूरा का पूरा तैयार है.. और ना सिर्फ तैयार है बल्कि इसे अन्ना और उनके आभिजात्य समर्थक देश के सीने पे चढ़ के स्वीकार करवाने पर आमादा ही थे.. अन्ना की दहाड़ आपको याद होगी.. यह ब्लैकमेल है तो करेंगे के अंदाज वाली.. और बात है की फिर मिमियाने में बदल गयी.. संसद का जो भी फैसला हो मंजूर होगा.. वाले अंदाज में

Samar Anarya : खैर मुद्दे पे आयें.. इण्डिया अगेंस्ट करप्शन वाले पेज पर ड्राफ्ट जन्लोक्पाल बिल पूरा का पूरा मौजूद है.. मैंने वहीं से पढ़ा था.. अप भी पढ़ लें.. फिर शायद आप भी मेरे/हमारी और अपूर्वानन्द जी जैसों की चिंताएं समझ पायें.. http://www.indiaagainstcorruption.org/ दाहिने हाथ पर हरी बत्ती में लिखा है.. डाउनलोड ड्राफ्ट जन लोकपाल बिल.. कर लें.. पढ़ लें..

Avinash Das : हद हैं यार आप भी… जब सब तैयार है, तो फिर ड्राफ्टिंग कमेटी नये ड्राफ्ट के लिए समय क्‍यों बर्बाद कर रही है? सरकारी लोकपाल ओर जन लोकपाल का अलग अलग मसौदा है और दोनों पक्ष अपना अपना मसौदा लागू कराना चाहता है – सवाल ये है कि आपको पता है कि दोनों के मसौदे में कहां कहां फर्क है। अलग पता चल जाएगा तो आपकी लोकतांत्रिक चिंताओं से जुड़े सवाल कहां चले जाएंगे, आपको भी पता नहीं चलेगा।

Samar Anarya : फिर उसके बाद ज्ञान के इन गूगाल्वादी/विकिपीडिया वादी समयों में सिविल सोसायटी के अर्थ समझते हुए (पूरी बेशर्मी से फिर अपने ही एक लेख का लिंक भेज रहा हूँ) काउंटर करेंट्स में प्रकाशित मेरे एक लेख पर सिविल सोसायटी के बारे में अब तक हुए बौद्धिक विमर्श का एक हिस्सा देख लें.. शायद कुछ और सन्दर्भ khulen..

Avinash Das : आपकी बेशर्मी को बार-बार प्रदर्शित करने की खुद ही आपको जरूरत नहीं। मुझे सिर्फ ये बता दीजिए, जो कि मैं बार बार पूछ रहा हूं कि जनलोकपाल बिल में ऐसी कौन सी बात है, जो आपकी लोकतांत्रिक चिंता को ज्‍यादा सघन बना रही है?

Samar Anarya : Avinash Das वही प्रदर्शित कर रहा हूँ बार बार.. आप बिलकुल ठीक बात कर रहे हैं.. पर एक बार खुद से भी पढ़ लें.. शायद और बातें खुलें.. शायद आपको समझ आये की आप गलत पाले में खड़े हैं.. हम तमाम लोग आपको खोना नहीं चाहते अविनाश जी.. कम से कम इस आभिजात्य ‘सिविल सोसायटी’ के पाले में तो बिलकुल नहीं.. तो खुद ही पढ़ लें.. मैं तो अपनी चिंताएं लगातार लिख ही रहा हूँ.. पूरी बेशर्मी के साथ.. और शर्मिंदा भी नहीं हूँ..

Avinash Das : आपको आपकी बेशर्मी से उबरने के लिए ही आज योगेंद्र यादव का लेख छापूंगा, पढ़ कर कुछ समझने की कोशिश कीजिएगा।

Avinash Das : योगेंद्र यादव के लेख की कुछ पंक्तियां है : इस अनशन की सफलता केवल अन्‍ना हजारे और उनके चंद समर्थकों की जीत नहीं है। इस आंदोलन में महानगरीय, अंग्रेजीदां और संपन्‍न वर्ग का बोलबाला नहीं था। यह उन छोटे-बड़े जनसंगठनों और साधारण नागरिकों की विजय है, जिन्‍होंने अपनी पहल पर दिल्ली या अपने शहर-कस्‍बे में इस अभियान में शिरकत कर सदाचार की आवाज बुलंद की। यह उन लाखों हिंदुस्‍तानियों की विजय है, जिन्‍होंने मन ही मन अन्‍ना हजारे को सफलता की दुआ दी थी।

Samar Anarya : जी बिलकुल.. योगेन्द्र जी ने लिखा ही होगा.. कल पढ़ लूँगा.. गंभीरता से जब पूरा छपेगा.. तब तक आप ड्राफ्ट जनलोकपाल बिल का यह हिस्सा देख लें..

6.5 A selection committee consisting of the following shall be set up:

1. The Chairpersons of both Houses of Parliament

2. Two senior most judges of Supreme Court

3. Two senior most Chief Justices of High Courts.

4. All Nobel Laureates of Indian Origin

5. Chairperson of National Human Rights Commission

6. Last two Magsaysay Award winners of Indian origin

7. Comptroller and Auditor General of India

8. Chief Election Commissioner

9. Bharat Ratna Award winners

10. After the first set of selection process, the outgoing members and Chairperson of Lokpal.

Samar Anarya : अब यह बताएं की इनमे से कितने लोग हैं जो किसी भी तरह जनता को जवाबदेह हैं? केवल दो– संसद के दोनों सदनों के सभापति.. बाकी? और मैग्सेसे कौन देता है यह भी जानते होंगे आप.. सदीप पाण्डेय ने पुरस्कार लेते हुए भी धनराशी क्यों लौटाई थी यह बहस भी पढ़ ही लें तो बेहतर..पर फिर वही.. आपको पढना पडेगा.. काम जरा मुश्किल है..

Avinash Das : इसमें आपको दिक्‍कत मैगसेसे वीनर से है, तो ये कहिए इन्‍हें हटा दीजिए।

Avinash Das : वैसे मसौदे दोनों तरफ से हैं और अंतिम तौर पर किस किस्‍म का ढांचा होगा लोकपाल का – इस पर दबाव बनाना चाहिए।

Avinash Das : मुझे तो कोई दिक्‍कत जन लोकपाल के मौजूदा ढांचे से नहीं है।

Samar Anarya : मैग्सेसे पुरस्कार कौन देता है जानते ही होंगे.. नहीं तो आप तो बड़े आदमी हैं.. संदीप जी से ही पूछ लें की उन्होंने धनराशी क्यों लौटाई.. और बिलकुल साहब.. योगेन्द्र जी सत्य के अंतिम निर्णायक हैं, अपूर्वानन्द नाहीए हैं.. छापिये उन्हें भी.. हम भी अपनी बेशर्मी से उबरने का पूरा प्रयास करेंगे.. आपकी खुशी भी इसी में दिखती है..

Avinash Das : हमारी खुशी की परवाह करने का शुक्रिया।

Samar Anarya : बस यह यद् दिला दें की जिस जन लोकपाल बिल को आप समझ रहे थे की अभी ड्राफ्ट होगा, उसका अभी वाला ड्राफ्ट वोर्किंग ड्राफ्ट बनाने के लिए अन्ना मरे जा रहे थे.. भला हो की तम्मं बातें खुल गयीं.. शांति भूषन वाली ख़ास तौर पर तो अब संसद की सर्वोच्चता के सामने मिमियाते फिर रहे हैं..

Avinash Das : यह मिमियाना लोकतंत्र के हित में है। जब वे मिमिया नहीं रहे थे, तो आप कह रहे थे ये तानाशाही लादेंगे। जब मिमिया रहे हैं, तो कह रहे हैं देखिए मिमिया रहे हैं। शोले में जय के हाथों के सिक्‍के वाला हेड-टेल बढिया है आपके पास।

Samar Anarya : जी इस मिमियाने को लोकतंत्र की, राजनीति के विजय के ही बतौर देख रहा हूँ मैं. दिक्कत तो मुझे तब होती जब मिमियाते नहीं..

Avinash Das : इसलिए लोकतंत्र पर और अंतत: संसद पर भरोसा रखिए – जो आपकी पार्टी रखती नहीं है।

Avinash Das : http://mohallalive.com/2011/04/23/yogendra-yadav-s-view-on-anna-hazare-s-movement/

Samar Anarya : Avinash Das इन्तेजार कर रहा था इस कमेन्ट का.. हमारी पार्टी को इस संसद पर भरोसा नहीं है, संसदवादी लोकतंत्र पर है. अन्ना और उनके समर्थकों को ना इस पर है ना संसदवादी लोकतंत्र पर. वह तो यह मानते हैं की दारू की बोतल पर बिकता है वोटर.. क्यों, वह पूछते भी नहीं. तो आप उनमे भरोसा rakhiye shrimaan..

Avinash Das : क्‍या यह फिर बताना पड़ेगा कि मैं अन्‍ना समर्थक नहीं हूं, मौजूदा आंदोलन का समर्थक हूं…

Samar Anarya : मौजूदा आन्दोलन अन्ना और उनके वर्णाश्रम समर्थक विचारों से संचालित है क्या यह फिर बताना पड़ेगा? यह भी की आप और मैं (मने हम दोनों) जो शराब पीते हैं अन्ना के गाँव में होते तो खम्भे से बाँध के मारे जाते यह? या यह की अन्ना के साथ बाबा रामदेव और श्री श्री के सपनों का भारत क्या है?

Avinash Das : चलिए आप अपना राग अलापिए, मैं अपना अलापता हूं। इस मसले पर हमारे सुर अलग हैं, अलग रहेंगे।

Samar Anarya : यह ठीक है.. यहाँ मैं सहमत हूँ.. बस ये की अपना अपना सुर अलापने के ठीक पहले आपके दिए लिंक से योगेन्द्र जी का लेख पढ़ रहा था.. एक पैराग्राफ बहुत दिलचस्प लगा.. आपको भेज रहा हूँ.. दिल करे तो अपना सुर अलापने के पहले इसे पढ़ लीजिएगा.. ना करे तो आपकी मर्जी..

Samar Anarya : ‎”जन लोकपाल विधेयक की खामियों पर भी गंभीर आत्म-विश्लेषण की जरूरत है। इसमें कोई शक नहीं कि सरकारी लोकपाल विधेयक लचर है और उससे इस व्‍यवस्‍था में सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती। ऐसे में एक सर्वव्‍यापी और सर्वशक्तिमान लोकपाल का विचार मन को गुदगुदाता है। लेकिन अंतत: लोकतंत्र में सर्वव्‍यापी और सर्वशक्तिमान संस्‍थाओं के लिए कोई जगह नहीं है। राजनीति में सुधार के तमाम प्रस्‍ताव अक्‍सर इस बीमारी का शिकार रहे हैं। कड़े कानून के लालच में एक समस्‍या खत्म होती है, तो नयी समस्‍या पैदा हो जाती है। उम्मीद करनी चाहिए कि विधेयक की समीक्षा करने वाली समिति में जनांदोलनों के पंच इस मायन