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मेरी जिज्ञासाएं, मूंगफली का झब्बा और नौनिहाल का गाना

[caption id="attachment_16852" align="alignleft"]नौनिहाल शर्मानौनिहाल शर्मा[/caption]पार्ट 5 : अब नौनिहाल के साथ ‘मेरठ समाचार’ में काम करते हुए मुझे कई महीने हो गये थे। उनके साथ रोज नये अनुभव मिलते थे। लेकिन मुझे कभी उनके निजी जीवन के बारे में पूछने का साहस नहीं हुआ था। एक दिन हम काम खत्म होने के बाद जिमखाना मैदान में एक क्रिकेट मैच देखने गये। वह रमेश सोमाल मैमोरियल टूर्नामेंट का फाइनल था। मुझे मनोज प्रभाकर की गेंदबाजी देखने का आकर्षण था। मैदान की दीवार पर बैठकर हम मूंगफली टूंगते हुए मैच देख रहे थे। अचानक नौनिहाल कुछ गुनगुनाने लगे। मैंने जरा ध्यान से सुनने की कोशिश की।

नौनिहाल शर्मापार्ट 5 : अब नौनिहाल के साथ ‘मेरठ समाचार’ में काम करते हुए मुझे कई महीने हो गये थे। उनके साथ रोज नये अनुभव मिलते थे। लेकिन मुझे कभी उनके निजी जीवन के बारे में पूछने का साहस नहीं हुआ था। एक दिन हम काम खत्म होने के बाद जिमखाना मैदान में एक क्रिकेट मैच देखने गये। वह रमेश सोमाल मैमोरियल टूर्नामेंट का फाइनल था। मुझे मनोज प्रभाकर की गेंदबाजी देखने का आकर्षण था। मैदान की दीवार पर बैठकर हम मूंगफली टूंगते हुए मैच देख रहे थे। अचानक नौनिहाल कुछ गुनगुनाने लगे। मैंने जरा ध्यान से सुनने की कोशिश की।

आवाज कुछ पकड़ में आयी…

प्यार हुआ, इकरार हुआ…

‘आपको ये गाना कैसे आता है?’

‘बरखुरदार हम भी कभी सुना करते थे। और उस जमाने में गाने खूब सुनते थे। वही गाने अब भी याद हैं।’

मेरा कौतूहल बढ़ा।

‘तो फिर आपकी आवाज कब खराब हुई? बोलने में परेशानी कब शुरू हुई?’

मैंने अपनी जिज्ञासाएं सामने रखीं। मूंगफली का दूसरा झब्बा लिया गया। …और नौनिहाल ने मुझे पहली बार अपनी जीवन-कथा सुनायी।

नौनिहाल का जन्म 13 दिसम्बर, 1955 को हुआ था। गाजियाबाद के धौलाना कस्बे में। उनके पिता खचेड़ूमल वहां के जाने-माने हलवाई थे। (शायद नौनिहाल के स्वाद-राग का यही राज था)। उनकी मां थीं भगवतीदेवी। सुशीला और राजरानी दो बड़ी बहनें थीं। तीनों की उम्र में दस-दस साल का फर्क था। दीगर है कि नौनिहाल अपनी बहनों के दुलारे थे। वे जितने शरारती थे, पढ़ाई में भी उतने ही तेज थे। हर साल अव्वल आते। खेल-कूद में भी आगे रहते। पूरे धौलाना में उनकी चर्चा रहती थी।

इस तरह वे सातवीं क्लास में आ गये। एग्जाम देने गये। वहां बहुत तेज बुखार चढ़ा। जूड़ी बुखार। उन्हें चारपाई पर लादकर घर लाया गया। फिर इलाज के लिए पिलखुआ ले जाया गया। वहां तीन दिन इलाज चला। बुखार उतर गया। घर आकर भी कई दिन कमजोरी रही। अचानक एक दिन उनकी मां को लगा कि वह ठीक से सुन नहीं पा रहे… बोलते भी अजीब सी आवाज में हैं। पहले लगा कि कमजोरी के कारण ऐसा है।

नौनिहाल को भी ऐसा ही महसूस होता…कि आवाज नहीं निकल रही है मुंह से… कुछ भी बोलते हैं तो कोई भी सुनता नहीं।

तब लगा कि बोलने-सुनने में गड़बड़ है।

डॉक्टर कमल सिंह सिसौदिया को दिखाया। उन्होंने चैक-अप किया। समस्या गंभीर लगी, तो उन्होंने मेरठ में प्यारेलाल अस्पताल ले जाने को कहा। संयोग से वहां उन दिनों अमेरिका से कोई डॉक्टर आया हुआ था। उसने 40 दिन की दवाई दी।

पर कोई फायदा नहीं हुआ।

और उसके बाद नौनिहाल को स्वाध्याय से ही अपनी पढ़ाई आगे चलानी पड़ी।

1971 में उनके पिता की मृत्यु हो गयी। अगले साल मां चल बसीं। तब नौनिहाल अपनी बड़ी बहन सुशीला के घर मेरठ आ गये। देवबंद से उन्होंने इंटर किया। बी.ए. मेरठ से किया। एम.ए. कर रहे थे। दो पेपर भी दे दिये थे। तीसरे पेपर में इनविजिलेटर ने उन पर नकल करने का आरोप लगा दिया। यह बात उनके दिल को छू गयी। उसके बाद उन्होंने आगे पेपर नहीं दिये। घर पर भी नहीं बताया। रिजल्ट आने पर ही पता चला। वे अपने बहनोई का काफी सम्मान करते थे। उन्हें लगा कि अब बहनोई उनसे नाराज हो जायेंगे। इसलिए इसके बाद नौनिहाल जीवन की राहों पर अपने बूते निकल गये।

उन्होंने देवबंद, मुजफ्फरनगर और मेरठ के कई प्रिंटिंग प्रेसों में काम किया। शुरुआत हैंड कंपोजिंग से की। मशीनों पर भी हाथ आजमाया। फिर प्रूफ रीडर बने। और आखिरकार मैटर एडिट करने लगे। इन शहरों में उनके दर्जनों दोस्त हैंड कंपोजिटर थे। इसी दौरान बलराम और धीरेन्द्र अस्थाना जैसे कहानीकारों से भी नौनिहाल की गहरी छनी।

18 नवंबर, 1980 को नौनिहाल की शादी मेरठ में सुधा भाभी से हुई। उनका परिवार दिल्ली का था। पर मेरठ में बस गया था। उनके तीन संतान हुईं- मधुरेश (1981), प्रतीक (1988) और गुडिय़ा (1990)।

मेरठ में स्वामीपाड़ा, जेल चुंगी, सुभाषनगर और हनुमानपुरी में किराये के मकानों में कई बरस गुजारने के बाद नौनिहाल ने जागृति विहार में आवास विकास परिषद का मकान ले लिया।

मैं मंत्रमुग्ध होकर नौनिहाल की कहानी सुन रहा था कि मैच खत्म हो गया। मूंगफली का हमारा चौथा झब्बा भी।

‘चल उठ। ज्यादा इमोशनल मत बन।’

‘लेकिन गुरू, आप मेरठ समाचार में कैसे आये?’

भुवेंद्र त्यागी‘वो किस्सा फिर कभी। अभी एनएएस चलकर भगतजी की चाय पियेंगे। फिर घर जायेंगे।’

मुझे इंतजार रह गया उस दिन था, जब नौनिहाल इस किस्से को आगे बढ़ते…

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है। वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं। उनसे संपर्क [email protected]  के जरिए किया जा सकता है।

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0 Comments

  1. x-press

    February 3, 2010 at 11:51 am

    dddduutuutyudsgs

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