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महाबलशाली देश मजबूर हैं हिंदी सीखने के लिए

[caption id="attachment_18135" align="alignleft" width="151"]दयानंद पांडेय का संबोधनदयानंद पांडेय का संबोधन[/caption]”कोई भाषा बाज़ार और रोजगार से आगे बढती है। हिंदी अब बाज़ार की भाषा तो बन ही चुकी है, रोजगार की भी इसमें अपार संभावनाएं हैं। अब बिना हिंदी के किसी का काम चलने वाला नहीं है। बैंक किसी भी बाज़ार की धुरी हैं। तो बैंक हिंदी को आगे बढाने में मह्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं क्योंकि कोई भी भाषा विद्वान नहीं बनाते, जनता बनाती है। अपने दैनंदिन व्यवहार से। इसीलिए बैंकों की भूमिका हिंदी को आगे बढाने में बहुत बड़ी है।”

दयानंद पांडेय का संबोधन

दयानंद पांडेय का संबोधन

”कोई भाषा बाज़ार और रोजगार से आगे बढती है। हिंदी अब बाज़ार की भाषा तो बन ही चुकी है, रोजगार की भी इसमें अपार संभावनाएं हैं। अब बिना हिंदी के किसी का काम चलने वाला नहीं है। बैंक किसी भी बाज़ार की धुरी हैं। तो बैंक हिंदी को आगे बढाने में मह्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं क्योंकि कोई भी भाषा विद्वान नहीं बनाते, जनता बनाती है। अपने दैनंदिन व्यवहार से। इसीलिए बैंकों की भूमिका हिंदी को आगे बढाने में बहुत बड़ी है।”

ये बातें कहीं दयानंद पांडेय ने. कहानीकार-उपन्यासकार और पत्रकार दयानंद पांडेय हिराल बैंक्वेट हाल, इंदिरानगर लखनऊ में कारपोरेशन बैंक, आंचलिक कार्यालय लखनऊ द्वारा आयोजित हिंदी दिवस समारोह के मुख्य अतिथि थे। अध्यक्षता बैंक के सहायक महाप्रबंधक श्री निराकार प्रधान ने की। दयानंद पांडेय ने अपने संबोधन में आगे कहा कि दुनिया अब हिंदी की तरफ़ बड़े रश्क से देख रही है। अमरीका, चीन जैसी महाशक्तियां भी अब हिंदी सीखने की ज़रूरत महसूस कर रही हैं और कि सीख रही हैं क्योंकि हिंदी के जाने बिना वह हिंदुस्तान के बाज़ार को जान नहीं सकते, हिंदी के बिना उनका व्यापार चल नहीं सकता। सो वह हिंदी सीखने, जानने के लिए लालायित हैं क्योंकि हिदी के बिना उनका कल्याण नहीं है। दयानंद पांडेय ने कहा कि हिंदी अब अपने पंख फ़ैला कर उड़ने को तैयार है। और यकीन मानिए कि आगामी 2050 तक हिंदी दुनिया की सबसे बड़ी भाषा बनने जा रही है। अब भविष्य का आकाश हिंदी का आकाश है। अब इसकी उड़ान को कोई रोक नहीं सकता। हिंदी अब विश्वविद्यालयी खूंटे को तोड़ कर आगे निकल आई है।

दयानंद पांडेय ने कहा कि हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई इसका विधवा विलाप करने से कुछ नहीं होने वाला है। आप ही बताइए कि हिंदी के लिए देश को तोड़ना क्या ठीक होता? और कि क्या देश चलाने में तब क्या हिंदी सक्षम भी थी भला? जो आप हिंदी को राष्ट्रभाषा बना लेते? शासन चला पाते आधी-अधूरी हिंदी के साथ? हालत यह है कि आज भी तकनीकी शब्दावली हिंदी में हमारे पास पूरी नहीं है। लगभग सभी मंत्रालयों में इस पर काम चल रहा है। भाषाविद लगे हुए हैं। काम गंभीरता से हो रहा है। इसी लिए मैं कह रहा हूं कि हिंदी 2050 में दुनिया की सबसे बड़ी भाषा बनने जा रही है। कोई रोक नहीं सकता। बस ज़रूरी है कि हम आप हिंदी को अपने स्वाभिमान से जोड़ना सीखें। उन्होंने कहा कि हमारे देश में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी लाई थी। बाद में मैकाले की शिक्षा पद्धति ने इसको हमारी गुलामी से जोड़ दिया। इसीलिए आज भी कहा जाता है कि अंग्रेज चले गए, अंग्रेजी छोड़ गए। तय मानिए कि अंग्रेजी सीख कर आप गुलाम ही बन सकते हैं, मालिक नहीं। मालिक तो आप अपनी ही भाषा सीख कर बन सकते हैं। चाहे वह हिंदी हो या कोई भी भारतीय भाषा। आज लड़के अंग्रेजी पढ कर यूएस, यूके जा रहे हैं तो नौकर बन कर ही, मालिक बन कर नहीं।

अपने अध्यक्षीय भाषण में बैंक के सहायक महाप्रबंधक श्री निराकार प्रधान ने राजभाषा अनुभाग के निष्पादन पर संतोष व्यक्त किया। इस समारोह का शुभारंभ श्रीमती गीतांजली श्रीवास्तव एवं श्रीमती पूनम गुप्ता द्वारा प्रस्तुत वंदना गीत से हुआ। आंचलिक कार्यालय, लखनऊ के मुख्य प्रबंधक श्री विजय गुप्ता ने मुख्य अतिथि श्री दयानंद पांडेय, सहायक महाप्रबंधक श्री निराकार प्रधान तथा लखनऊ महानगर के विभिन्न शाखाओं एवं कार्यालयों में कार्यरत कर्मचारीगण एवं उनके परिवार के सदस्यों का स्वागत किया। तत्पश्चात मुख्य अतिथि श्री दयानंद पांडेय, सहायक महाप्रबंधक एवं मुख्य प्रबंधक ने दीप प्रज्जवलित कर समारोह का औपचारिक उदघाटन किया। इसके बाद पुष्प गुच्छ एवं स्म्रृति चिन्ह देकर मुख्य अतिथि का सम्मान किया। मंच संचालन का कार्य श्रीमती चारू सिनहा एवं श्री दिनेश देवरानी ने किया। इस मौके पर कुल 8 प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया। साथ ही एक क्विज़ का भी आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि श्री दयानंद पांडेय ने पुरस्कार वितरण किया। इस अवसर पर सांस्कृतिक एवं रंगारंग कार्यक्रम कार्यक्रम भी प्रस्तुत किए गए। राष्ट्रगान एवं सामूहिक भोजन के साथ कार्यक्रम समाप्त हुआ। प्रेस विज्ञप्ति

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0 Comments

  1. देवमणि पाण्डेय, मुम्बई

    September 26, 2010 at 3:06 pm

    जय हो पाण्डेय जी, बहुत तर्कसंगत विचार हैं। हिंदी को सरकारी रोज़गार से भी जोड़ने की ज़रूरत है।

  2. Prem janmejai

    September 26, 2010 at 4:14 pm

    aapke vichar bahut saarthak hain

  3. kamlesh

    September 26, 2010 at 5:26 pm

    पांडेयजी , लगता है आप दिन में सपने देखते हैं। 2050 तक हिंदी के दुनिया की सबसे बड़ी भाषा बनने की जो घोषणा की है वो कुछ ऐसी ही है। हिंदी को लेकर आपकी मंशा काबिल ए तारीफ है लेकिन हकीकत से कोसों दूर। आप क्यों युवाओं को भरमाकर उनकी जिंदगी खराब करना चाहते हैं। दुनिया की बात छोड़िए 2050 तक देश में ही हिंदी रह जाए तो बड़ी बात होगी। आपका भाषण कुछ कुछ उन नेताओं जैसा है जो बरसों से जनता को बेवकूफ बनाते रहे हैं। दूसरों को हिंदी सीखने की नसीहत देंगे और अपने बच्चों को कान्वेंट स्कूलों में भेजेंगे। ताकि दूसरों के बच्चे क्लर्क बनें और उनके बच्चे अफसर।
    आप और हम अच्छी तरह जानते हैं कि सिर्फ हिंदी के दम पर एक अदद क्लर्क की नौकरी हासिल नहीं की जा सकती। आनेवाले दिनों में हिंदी की क्या दशा होगी इसकी कुछ झलक आज के हिंदी अखबारों खासकर मुंबई के नवभारत टाइम्स को देखकर लगा सकते हैं। इन हिंदी अखबारों की भाषा पूरी तरह बदल रही है और आम बोलचाल के शब्दों की जगह भी अंग्रेजी शब्दों ने ले ली है। आपने जो लिखा है वो पढ़ने सुनने और भाषणबाजी में अच्छा लगता है लेकिन इन खोखली बातों से ना किसी गरीब का भला होगा और ना किसी को रोजगार मिल सकता है।
    तल्ख सच्चाई ये है कि आनेवाले दिनों में अंग्रेजी का वर्चस्व और बढ़ेगा। कोई हैरानी की बात नहीं कि 2050 तक पूरे विश्व की भाषा अंग्रेजी हो जाए। इसलिए दूसरों को भरमाने की चेष्टा बंद कीजिए और उन्हें अंग्रेजी सीखने की सलाह दीजिए ताकि घोर प्रतियोगिता के दौर में वो अपना अस्तित्व बचा सकें।
    बाई दि वे पांडेजी, क्या आप बताएंगे कि आपके बच्चे हिंदी मीडियम स्कूल में पढ़ते हैं या अंग्रेजी मीडियम में डाल रखा है आपने।
    — कमलेश, मुंबई

  4. दयानंद पांडेय

    September 27, 2010 at 3:33 am

    कमलेश जी,
    दिन में भी सपने देखना कोई बुरी बात नहीं है। सपने ही समाज को बदलते हैं। जिस अंगरेजी का बाजा आप बजा रहे हैं, वह दुनिया के कितने देशों में बोली जाती है, आप जानते हैं भला? ज़्यादा से ज़्यादा आधा दर्जन देशों में। बस। कोई पौने तीन सौ देश अभी भी बिना अंगरेजी के काम न सिर्फ़ चलाते हैं बल्कि दौडाते है। चीन, जर्मनी, जापान जैसे तमाम देश बिना अंगरेजी के सांस लेते हैं। अरब देशों में भी यही हाल है। रही बात अखबारों द्वारा या बातचीत में अंगरेजी के इस्तेमाल की तो आप ही बताएं कि स्टेशन की हिंदी क्या लिखेंगे? अच्छा इनकमिंग फ़्री या आऊट्गोइंग फ़्री की हिंदी क्या लिखेंगे? ऐसे जाने कितने शब्द हैं जो अंगरेजी के हैं, संस्कृत के हैं, उर्दू के हैं. या अन्य भाशा के हैं, जो हमारे दैनंदिन व्यवहार में समा कर हिंदी के ही हो चुके हैं। तो उन्हें स्वीकार करना सीखिए। छुआछूत में पडने से कोई लाभ नहीं। हिंदी को ग्लोबलाइज होने दीजिए। लचीला बनाइए। तभी हम कह सकेंगे कि हमारी हिंदी वैश्विक हो गई। अंगरेजी अखबारों ने भी लाठीचार्ज जैसे तमाम शब्द बहुत पहले से अपना लिए हैं। हमारी हिंदी ने भी बहुत सारे शब्द तमाम भारतीय भाशाओं के अपनाए हैं। तभी तो मुनव्वर राना जैसे उर्दू के शायर लिखते हैं कि मैं मां से लिपटता हूं तो मौसी मुसकुराती है, मैं उर्दू में गज़ल कहता हूं और हिंदी मुसकुराती है। तो यह दरियादिली सोच में भी दिखाइए। मंशा, काबिल, तारीफ़, कान्वें क्लर्क, मीडियम, हकीकत जैसे कई शब्द आप ने अपनी पोस्ट में ही लिखे हैं। तो मित्र यकीन मानिए कि हिंदी का भविश्य बहुत बेहतर है। अगर इस पर से तालिबानी ज़िद् का छाता हटा लें हम आप तो। आप देख ही रहे हैं कि बडे- बडे चिदंबरम, जयललिता, अरूण शौरी न सिर्फ़ हिंदी बल्कि अच्छी हिंदी बोलने लगे हैं। जो कभी अंगरेजी में ही सांस लेते थे। सोनिया गांधी अब साफ हिंदी बोलने लगी हैं। मनमोहन सिंह देवनागरी नहीं जानते पर उर्दू में लिख कर सही हिंदी बोलने लगे हैं। अपने को महाबली समझने वाले बुश या ओबामा भी नमस्ते करते ही हैं। तो मित्र यह क्या है? सच मान लीजिए २०५० तक हिंदी को दुनिया की सब से बडी भाशा बनाने की यात्रा के पडाव हैं ये। हम तो मान ही चुके हैं, आप जैसे साथी भी जल्दी मान जाएं और्र क हिंदी को अपने स्वाभिमान से जोड लें। बस।

  5. pawan kumar

    September 29, 2010 at 6:30 am

    शानदार भाषण…..बिलकुल सही बातें कही आपने…हिंदी के बिना कैसे काम चलेगा…..संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा मिलना चाहिए….

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