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क्या हिन्दी रीजनल भाषा है?

शेष जीहिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज ने एक दिलचस्प विषय पर फेसबुक पर चर्चा शुरू की है. कहते हैं कि सारी पीआर कंपनियां हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाओं को रीजनल मीडिया कहती हैं. कोई विरोध नहीं करता. वक्‍त आ गया है कि उन्‍हें भारतीय भाषा कहा जाए. आगे कहते हैं कि मैं उनकी राय से सहमत नहीं हूं और उन सभी पीआर कंपनियों की भर्त्‍सना करता हूं जो सभी भारतीय भाषाओं को रीजनल कैटेगरी में डालती हैं.

शेष जीहिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज ने एक दिलचस्प विषय पर फेसबुक पर चर्चा शुरू की है. कहते हैं कि सारी पीआर कंपनियां हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाओं को रीजनल मीडिया कहती हैं. कोई विरोध नहीं करता. वक्‍त आ गया है कि उन्‍हें भारतीय भाषा कहा जाए. आगे कहते हैं कि मैं उनकी राय से सहमत नहीं हूं और उन सभी पीआर कंपनियों की भर्त्‍सना करता हूं जो सभी भारतीय भाषाओं को रीजनल कैटेगरी में डालती हैं.

इस बहस में बहुत बड़े लोग शामिल हो गए हैं. गरम हवा और और श्याम बेनेगल की ज़्यादातर फिल्मों की सहयात्री शमा ज़हरा जैदी का कहना है कि अंग्रेज़ी को नेशनल मीडिया कहना गलत है. उसे एंग्लो-इन्डियन मीडिया कहना चाहिए. अजय जी कहते हैं आज से उन्होंने विरोध और फटकार आरंभ कर दिया है. थोड़ा प्रेम से भी समझाएंगे. उन्‍हें मालूम ही नहीं कि वे कौन सी परंपरा ढो रहे हैं. एक तरीका यह भी है कि सभी स्‍टारों को रीजनल स्‍टार कहा जाए. सलमान, आमिर, रितिक, शाहरूख सभी रीजनल स्‍टार हैं, क्‍योंकि हिंदी मीडिया रीजनल मीडिया है.

इस बहस में शामिल होने की ज़रूरत है. अंग्रेज़ी जिसे इस देश में दो प्रतिशत लोग भी नहीं जानते, उसे ये लोग राष्ट्रीय मीडिया कहते हैं. भारतीय भाषाओं को रीजनल मीडिया कहने की यह बीमारी अखबारों में भी है. कुछ तो ऐसे पाषाण युगीन सोच के लोग हैं कि वे भारतीय भाषाओं के अखबारों को वर्नाक्युलर प्रेस भी कहते हैं. यह हमारी गुलामी की मानसिकता की उपज है और इसका हर स्तर पर विरोध किया जाना चाहिए. मामला मीडिया से सम्बंधित है इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि इस पर बाकायदा बहस चलाई जाय. सबके सुझाव आमंत्रित करके बात को आगे बढाया जा सकता है.

लेखक शेष नारायण सिंह जाने-माने पत्रकार हैं. एनडीटीवी समेत कई न्यूज चैनलों-अखबारों में काम कर चुके हैं. पत्रकारिता में जनपक्षधरता के लिए अलख जगाने वाले शेषजी इन दिनों स्तंभकार के रूप में कई जगह अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

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0 Comments

  1. Ravinder Singh

    October 6, 2010 at 7:08 pm

    मैं अजय जी के द्वारा पीआर कंपनियों द्वारा हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाओं को रीजनल मीडिया कहे जाने के विरोध से सहमत हंू। अपनी मातृ भाषा को उसका उचित दर्जा दिलाने के लिए आवश्यक है इस संघर्ष को बड़े स्तर तक ले जाया जाए ताकि विश्व स्तर पर सभी भाषाओं की अम्मा बनी बैठी अंग्रेजी भाषा के अहंकार को खत्म करवाया जा सके।

  2. ashok

    October 7, 2010 at 1:41 am

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  3. Rupesh

    October 7, 2010 at 1:55 am

    Jo vaastavikta hai usse mooh na moden. Agar aisa na hota to aapko Meerut, Ghaziabad, aur tamaam hindi pranton me “Learn English Fast” waale vigyapan deewaron par dekhne ko na milate. Kyon/ Isliye ki janaab agar aap angrezi me siddhahast nahin hain to aapko achhi naukri nahi milegi, BPO ki naukri to katai nahin milegi aur sirf Hindi jaanne walon ko driver, security guard wali naukri hi milegi. Yahi vaastavikta hai. Jab main ek gair-Hindi bhashi prant se Delhi pehli baar aaya to mujhe yeh jaankar hairani hui ki yahan Hindi akhbar liftmen, drivers, aadi padhte hain, jabki policymakers angrezi ke akhbar padhte hain. Politicians apna bayaan angrezi ke akhbar me dekhkar gadgad ho jaate hain. Yahi vaastavikta hai. Angrezi ek aisi bhasha hai jisne Educated Indians ke beech na sirf kadi ka kaam kiya balki Bhartiya rashtravaad ko panapne me madad ki. Gandhiji is baat ko bhaanp chuke the. Woh Hindi laana chahte the, lekin azaadi ke baad aaye shashakon ne na sirf ICS (ab IAS) ko bahal rakha balki angrezi ko bhi bahal rakha. Is mulk ko badalna ho to sab se pahle yahan ki British model bureaucracy ko badlo. 63 saal ho chuke hain, ab koi American ya French ya German ya Japanese model dhoondo – dekho kaise wo apni bhasha me apna shasan chalate hain bakhoobi. Kaise multi-lingual desh jaise belgium apna shaasan chalate hain. Phir yeh regional, national media ka sara chakkar hi khatam ho jayega. Filhal yeh sab divaswapn lagta hai. Bahrahaal main ek ahinidibhashi hoon jo hindi media me hoon. Meri haalat yeh hai ki kaha bhi na jaye, raha bhi na jaye. Shesh Narayan ji apne former employer Prannoy Roy se pooch len, ye national, regional media akhir kis chidiya ka naam hai.

  4. शेष नारायण सिंह

    October 7, 2010 at 2:44 am

    रूपेश जी ,
    आपकी बात सही है . बिना अंग्रेज़ी पढ़े बहुत सी नौकरियाँ नहीं मिल सकतीं . उसके बावजूद भी हिन्दी को रीज़नल भाषा नहीं कहना चाहिए . भाषा तो वह पूरे देश की है . जहां तक प्रणय से पूछने की बात है, उसका कोई फायदा नहीं होगा. वे तो उस वर्ग के हैं जो अंग्रेज़ी को महाप्रभुओं की भाषा बनाकर रखना चाहते हैं .

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