
सुनील पांडेय
लेकिन इसी बीच अंदरुनी राजनीति शुरू हो गई, चैनल हेड को पैदल किया गया और मुझे साइड लाइन किया गया। लेकिन इसके पहले कि अंदरुनी राजनीति मेरी कार्यक्षमता को प्रभावित कर पाती, साथ ही हाशिए पर धकेलने के बाद मुझे, जलालत की परिधि में घसीटा जाता, मैंने नोएडा छोड़ने का फैसला कर डाला। पटना से राष्ट्रीय सहारा को लांच करने की तैयारी थी, सो मैंने पटना का रुख कर लिया। पूरी मेहनत और ईमानदारी से काम में जुटा, चैनल की तरह अखबार भी चल निकला। लेकिन इसके साथ राजनीति की वो चाल यहां भी चली गई, पहले संपादक को शिकार बनाया गया औऱ फिर पुराने कर्मियों से जिम्मेदारियां छीनी जाने लगीं। कुछ ही दिनों के अंदर नए संपादक का जलवा भी दिखाई देने लगा। संपादक जी ने जातिविशेष के लोगों पर खूब कृपा दिखाई, उन्हें खास तवज्जो दिया जाने लगा। लेकिन संपादक जी के कुनबे की करामात से अखबार संपादकीय औऱ व्यवसायिक तौर पर नीचे खिसकने लगा, और नीचे जाने के सिलसिला निरंतर जारी है।
पटना में पैदा हुए हालात से आजिज आकर मैंने मार्च 2010 में सहारा को प्रणाम कर दिया। लेकिन इसके पहले मैंने आदरणीय उपेंद्र जी सहित सभी संबंधित वरिष्ठजनों को मेल के जरिए अपनी पीड़ा औऱ परेशानी से अवगत कराया था, जिसपर ध्यान देना शायद किसी ने मुनासिब नहीं समझा। फिलहाल मैं मौर्य टीवी पटना में हूं। योग्य और सुलझे हुए वरिष्ठजनों और कुशल प्रबंधन की बदौलत मौर्य टीवी हर दिन सफलता के नए मापदंड गढ़ने में मशगूल है, ये किसी से नहीं छिपा। बहरहाल, मुद्दे पर लौटता हूं। सहारा समूह का कोई सानी नहीं है। लेकिन चैनल में अंदरूनी राजनीति और जमा हो चुकी निक्कमों की एक बड़ी फौज, बहुमत में है, जिसने कर्मठ लोगों को साइड लाइन कर रखा है।
विगत पांच वर्षों में जितने नए लोगों को लाया गया, सबों ने अपना उल्लू सीधा करने के लिए प्रबंधन को उल्लू बनाने का काम किया। नतीजन सहारा परिवार के कई कर्मठ कर्मचारियों ने एक- एक कर संस्थान को आखिरी प्रणाम कह दिया। इसके बाद वो जिस संस्थान में भी गए उसे सफलता के शिखर तक पहुंचाया। उदाहरण के तौर पर किसी का नाम लेना ठीक नहीं होगा, लेकिन ये सब जानते हैं कि सहारा को हर जगह उन्हीं संस्थानों से मात मिल रही है, जिसके सिरमौर कभी सहारा के सिपाही हुआ करते थे।
एक बात जो कहना चाहता हूं वो ये कि , विश्व का विशालतम परिवार आज एक भारी भरकम और अनियंत्रित जहाज सा नजर आने लगा है। माननीय सहारा श्री की आंखों और बातों में जिस सहारा संसार की कल्पना देखी है, वो भस्मासुरों के भंवर जाल में उलझ चुकी है। यकीनन सहारा श्री के लिए अपनी सोच के संसार और मौजूदा हकीकत का सार समझकर कुछ करने का वक्त आ गया है।
सुनील पाण्डेय
इनपुट हेड
मौर्य टीवी












kumar singh
October 27, 2010 at 12:28 am
आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं पांडे जी…सहारा में आज यही स्थिति है…जहां हर चैनल या संस्थान में पुराने लोगों को सम्मान दिया जाता है…वहीं आज पुराने लोग पर कल के पत्रकार दुसरे चैनलों से आकर थूक रहे है…उन्हें अपनी पांव की जुती समझ रहे है…और सहारा प्रबंधक चुप-चाप पुरा तमाशा देख रहा है…क्या होगा इस परिवार में काम करने वाले वरिष्ठ बुद्धिजिवियों का खुदा ही मालिक है….।
bhaskar singh
October 27, 2010 at 12:31 am
sir apni bat khulkar kehne ke liye sabse pehle mere taraf se dhanyabad,sir main bhi sahara ka kaphi najdik se janta hu halaki maine waha job nahi kiya hai par hakikat se wakif hu…kyonki hamare kai jannewale pehle sahara se jude the…..
vipin upadhyay
October 27, 2010 at 1:54 am
sabse pahle pranaam sir
sach kaha sir aapne haqiqat yahi hai maine sahara ke bihar jharkhand me internship kiya tha aur waha ki aabo hawa ko samajh ke dukh hua ek etna bada parivar jiske andar hajaaro shakuni maujud hain….
एक पुराना सहारा कर्मी
October 27, 2010 at 2:01 am
पहले के जितने भी भस्मासुर आए उसने तो सहारा को जिस हाल में पहुंचा दिया उसे तो सब जानता है। लेकिन इस बार जिस भस्मासुरों की टोली के हाथों मे सहारा का कमान मिल गया है ये तो सहारा की आत्मा को ही मार रहे हैं। उपेंद्र राय के बारे में तो ज्यादा कुछ नहीं कहा जाएगा, क्योंकि उन्होंने तो आंख मूंद ली है और आम सहारा से कट कर अपना पीआर ठीक करने में लगे हुए हैं। लेकिन उसके बाद जिन लोगों को हाथों में सहारा मीडिया को संभालने का मौका मिला है वो तो हद ही पार कर दी है। इस बार सहारा की आत्मा को मारा जा रहा है। एक कॉकस ग्रुप बन गया है जिसका काम सिर्फ चुन-चुन कर लोगों को ठिकाना लगाना है। सहारा में दरबार की पुरानी परंपरा है लेकिन पुराने सहाराकर्मी अगर अभी के दरबार देख लें तो उनकी आंखें शर्म से मर जाएंगी।
इस बार भस्मासुरों के आतंक से निचले तबके के लोग ज्यादा परेशान हैं। बहुत जल्द ही बगावत हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं है। सुनील पांडेय ने जो बात लिखी है उससे कहीं ज्यादा हालात इस बार खराब है।
vipin upadhyay
October 27, 2010 at 2:06 am
sabse pahle pranaam sir
sir aapki baato main mere shabd shamil hain. sir maine sahara ke bihar-jharkhand main internship kia hai aur wahan ki aabo hawa se wakif hoon.sir sahara bada vishal pariwar hai lekin uske andar utne hi shakuni maujood hai..
ROCKY RANJAN
October 27, 2010 at 6:58 am
SAHARA ME (TOP TO BOTTOM ) BADLAU KE JARURAT HAI. KUCH LOG SAHARA KOBADNAM KAR REHE HAI. SAHARA ME CHAPLUSI AUR AARAJAKTA BADHA HAI. SAHARA PRABANDAK KO IS PUR DHAYA DANA KI JARURAT HAI.
xyx
October 27, 2010 at 4:24 pm
विकास कुमार भारतीय,
सहारा समय में निकम्मों की फौज अभी भी खड़ी है। भ्रष्ट लोगों का जमावड़ा पहले भी था अभी भी है और हाल यूं ही रहा तो कल भी रहेगा। खास तौर पर सहारा समय बिहार-झारखंड के पूर्व पुरोधा मानव बेहद निक्कमे औऱ ऐय्यास किस्म के कई लोग तो निकाले जा चुके हैं पर अभी भी एशिया सबसे बड़े नेटवर्कों में एक सहारा में ईमानदार और कर्मठ लोगों की बेहद कमी है। सांप, पोंगा पंडित, दलाल और कई जहरीले लोगों को बाहर का रास्ता तो जरुर दिखा दिया गया है पर अभी भी उनके द्वारा पाले पोशे गए कई दोमुंहे सांप वहां मौजूद हैं। सुनिल जी ईश्वर के घर है अंधेर है देर नहीं। सहारा में भष्मासुरों का अंत होना बाकी है और ऐसा अंत होगा कि दुनियां देखेगी। सब का हाल सांप छंछुदर वाला होगा।
mini sharma
October 27, 2010 at 5:38 pm
Yeh Baat too App sab theek kah rahe hain. Purane logo kee yaha per koe kadre nahee hai. Jab ke aaj bhee bahut sare Imandaar aur karmath log hain per bechare chupchap baithe hain. kyu kee unkee uppar koe pahuch nahee hai.
Aaj jabkee aur companies apne purane logo ko kahee bhee jane se rok rahee hain wahee Sahara unkee koe kadre nahee kar rahee hai.
andolankari
October 27, 2010 at 7:05 pm
बस एक ही उल्लू काफी है बर्बाद गुलिस्तां करने को
हर डाल पे उल्लू बैठे हैं, अंजाम गुलिस्तां क्या होगा ?
परम पूज्य पाण्डेय जी, सहारा की पीड़ा बयां करते हुए आपने उसके पथ प्रदर्शन की जो पुरजोर कोशिश की है वो काबिले तारीफ है। साथ ही काबिले इंसाफ हैं वो लोग जो सहारा में घुटन महसूस कर रहे हैं, लेकिन सवाल ये कि क्या सहारा श्री इन मुद्दों को काबिले गौर नहीं समझ रहे।[b][/b]
pradeep
October 27, 2010 at 7:14 pm
मै आपकी बात से एक सौ दस फिसदी सहमत हूं..पांडे सर..आज के समय में मीडिया जगत में पैठ बनाना तो दूर आपनी नौकरी बचाने के लिए….हमारे पत्रकार मित्र जिस तरीके से चैनल मालिको के तलवे चाट रहे है….उस से यही प्रतित होता है कि भारत के पत्रकारिता जगत में एक ऐसा वर्ग आ चुका है जो पत्रकारिता के नाम पर कलंक है….मेरा मतलब जाति सूचक से है….मैनें भी अपनी प्ररंभिक दौर में अपने रजक टाइटल के साथ नौकरी मांगने के दौर शुरू किया था…काफी जोश था मुझमें….बाकि जइसे जइसे में मीडिया हाउस के चक्कर काटे…मुझे मेरे औकाद पता चलने लगी…..ऐसा नही था कि मुझ में काबिलियत कि कोई कमी….कमी थी तो सिर्फ मेरे टाइयल कि….एक दिन मै अइसे ही उदासी से बैठा था…मेरा फोन बजा और आपके सहारा बिहार के ही रिपोर्टर जिनका मै नाम नही लेना चाहता हू उन्होने मुझसे कहा..प्रदीप झुठ बोलना के साथ साथ आपने नाम के आगे के टाइटल रिज्यूम से हटा दो..तुम को नौकरी मिल जाएगी…मैने अइसा ही किया…और मै आज एक अच्छे न्यूज चैनल में काम कर रहा हू….आगे क्या लिखू बाकि आप जानते ही होगे….खैर आपको मौर्य टीवी कि नई पारी बहुत बहुत मुबारक हो..
abhijeet
October 28, 2010 at 12:54 am
सुनील, किसी पर ऊँगली उठाने के पहले जरा अपनी गिरेवान में झाँकों. यह तुम्हारे और तुम्हारे मौजूदा संस्थान के भी हित में होगा. तुमने राष्ट्रीय सहारा हरीश पाठक के साथ क्या किया. एक दिन की छुट्टी मांगने पर वे तुम्हें पांच दिन की छुट्टी पर भेज देते थे. क्योंकि तुम 30 हजार रूपये लेकर एक पेज दो घंटे में बनाते थे. जबकि जूनियर 45 मिनट में पूरी पेज तैयार कर देते थे. वाबजूद पाठक जी ने तुम्हें ढोया. लेकिन तुम उनके लिए भस्मासुर
साबित हो गए. अब दूसरों को भस्मासुर कहने के पहले तुम सोचो कि अपने संस्थान के वरीय लोगों के लिए तुम भस्मासुर वाली हरकत किये या नहीं.
अभिजीत, एक ट्रेनी जर्नलिस्ट
abc
October 28, 2010 at 3:44 am
लंबे अनुभव है आपके बहुत कुछ सीखा बहुत कुछ देखा , और आपने यह भी महसूस किया की मीडिया भी जातिवाद से अलग नहीं है , मी़डिया में मेरा अनुभव मात्र दो साल का है लेकिन इतने कम समय में मैने यह महसूस किया की सीवी या बायोडाटा जो भैजा जाता है साफ्ट कॉपी या हार्ड कॉपी वह कु़ड़े के ढेर में चला जाता है अगर भेजने वाला का कोई जान पहचान उस संस्थान में नहीं है , अगर जान पहचान है तो बिना इंटरव्यु लिए या बिना ट्रायल पर ही उसे ऱख लिया जाता है मैं तो इतना देखा हुं की संस्थान में काम करने वाले से अगर किसी भी टापिक पर बहस हो तो संभव नहीं है कि है कि उस एक पत्रकार की हैसियत से जानकारी हो लेकिन , न तो उस कोई देश का इतिहास मालुम है , न तो उसे कोई राजनीतिक या भौगोलिक जानकारी , दूसरी जातिवाद तो खैर है ही सीवी देखने के बाद अगर उस उसकी जात का मालुम नहीं चलता है तो उसके पिता या माता के नाम देखा जाता है ताकि उसे यह पता चले की सही में इसकी जात है क्या यह मेरा अनुभव है क्योंकि मेरा एक दोस्त था जो कि देश के सबस सुप्रसिद्ध संस्थानों से एम ए . एम फिल फिर उसके बाद मास कॉम किया फिर भी नौकरी उसे कोई चैनल या अखबारों में नहीं लगा उसकी नौकरी लगी सूचना प्रसारण मंत्रालय में , लेकिन मैं जैसे बुद्धिजीवी और अनुभवी लोगों से यह अपेक्षा करता हुं की उपरोक्त दो बातों पर जरुर ध्यान देने ताकि आपके व्यक्तिव और निखरे , आपका लेख पढ़ने से यह तो जरुर मालुम हुआ की किस विचारधारा के हैं , इन सभी मानवीय पहलु को ध्यान में रखकर ही आप आगे बढ़े .
धन्यवाद
Mahadev Sharma
October 28, 2010 at 4:31 am
yehi to sahar ki trasadi hai.malik dil khol kar bharosa karte hain.unke karinde dalalon ki fouj khadee karte hain.sahee likha hai aapne,rajsthan mein to ek ese aadmi ko jimmedari de di gayee hai,jiska naam lete hi logon ki bhrakuti tan jati hai,jiski CD bazar mein ho,us channel ki ijjat kya hogi.socha ja sakta hai.jis jagah kaam ki nahee kamdevon ki poochh ho,vah bhala pragti kaise kar sakta hai ?
amod kumar
October 28, 2010 at 1:38 pm
AMOD KUMAR
TV. , JOURNALIST,
SITAMARHI,
Aakhirkar aapne to sunil Bhaiya Sahara ke parde ki pichhe ki hakikat samne vyan kar hi diya , khair koi bat nahi bhaiya imandar aur real journalist ki ek din harek company chirag lekar dhundhegi.
*IMANDARI
*AUR REAL
*JOURNALISM KI
*JAI HO*********
Amod Kumar
Sitamarhi (BIHAR)
gangu
October 28, 2010 at 3:08 pm
सुनील बाबू, चर्चा त इहे ह कि सबसे बडा भस्मासुर तू ही हउअ। तोहरा बारे में एको बढ़ अउर बौद्धिक पत्रकार जे कि ताहर गुरु भी रहल हउएं… के टिप्पणी बा कि, ‘काम के न काज के, सौ सेर अनाज के’ । सहारा से तोके एही चलते सलटावे के प्रयास होत रहे, शुक्र ह तू खुदे चली गईल… कहल जात ह कि मौर्या टीवी में मुकेश खातिर सबसे बड़ भस्मासुर तू ही बनल बाड़, बनल रह बबुआ….. बनल रह…. लेकिन एगो देहाती जुमला भी याद रहे कि “जादे बन मत”।
rajesh
October 28, 2010 at 6:02 pm
बस एक ही उल्लू काफी है बर्बाद गुलिस्तां करने को
हर डाल पे उल्लू बैठे हैं, अंजाम गुलिस्तां क्या होगा ?
mkeshkumar
November 1, 2010 at 12:50 am
baba thik kahat aani ab ye samay nakhe rah gael ba sahara me ab ta fild repotaran ke gali se bat karal jata ehe din dekhe ke rah gael ba sahara shreee ke banal banawal ejat bhi kawada kare par naya log utaru ba to upar ke manejment sab kuchh dekh ke bhi andekhi karatba
vedprakash arya auraiya up
November 5, 2010 at 4:09 am
suneel sir rastey sahara aur sahara tv ka yahi haal rha to wo din door nahi jab yah sasthan gart me mil chala jaega.es sasthan me jati vivesh ko lekar pratmikta ki rajnit jari hai. mane es sasthan ki 15 varso se kartavya nistha aur emandari k shath seva ki hai lekin ramesh awasthi unit manejar kanpur ke dwara jati vivesh ko badawa dene ke karan muje sasthan se nikal kar samannit kiya gya.aur hmare adinstht ko hmare kursi par bitha diya gya.mane bhi kasam khae hai ki janpad auraiya me rasty sahara ka namo nishan mita duga. abhi tak 1500 pratiya rasty sahara hmare kary kal me athi thi jab se maine dainik kalptaru exprees join kiya hai tab se rasty sahara pratiya simat kar ak mahine ke andra 385 par rah gayi hai.aur dainik kalptaru exprees ki pritiya 56054 ho gayi hai.suneel pandey ji mai apki peeda ko samajta hoo.jaesa mane apne janpad me kiya hai waisa hi un sabhi bai se apecha karta hoo jine sahara pariwar se vewjah nikala gya hai….
narendra
January 30, 2011 at 10:22 am
sabse bada chor to tum ho
mahesh gupta
January 30, 2014 at 11:10 pm
i am so sad