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दुख-दर्द

‘शालीन लौ’ हमेशा रोशन करेगी!

[caption id="attachment_18904" align="alignleft" width="90"]सुरेन्‍द्र मोहनसुरेन्‍द्र मोहन[/caption]: श्रद्धांजलि : समाजवादी-राजनीतिक विचारक सुरेंद्र मोहन का गुजर जाना उन मूल्यों और संस्कारों के लिए हादसा है जो नैतिकता, सद्भाव, लोकतंत्र और समाजवाद के जन सरोकारों और जमीनी सच्चाइयों से जुडे हैं. वैसे भी आज की सियासत में सबसे ज्यादा कमी इन्हीं की है, इसलिए भी ये हादसा ही ज्यादा है.

सुरेन्‍द्र मोहन

सुरेन्‍द्र मोहन

: श्रद्धांजलि : समाजवादी-राजनीतिक विचारक सुरेंद्र मोहन का गुजर जाना उन मूल्यों और संस्कारों के लिए हादसा है जो नैतिकता, सद्भाव, लोकतंत्र और समाजवाद के जन सरोकारों और जमीनी सच्चाइयों से जुडे हैं. वैसे भी आज की सियासत में सबसे ज्यादा कमी इन्हीं की है, इसलिए भी ये हादसा ही ज्यादा है.

86 वर्षीय सुरेंद्र मोहन उस पीढी की जगमगाती चंद लौ में से एक थे, जिन्हें देखकर संतोष होता था और दिल को दिलासा भी कि अभी सब कुछ बिखरा नहीं है. चंद्रशेखर जब जनता पार्टी के अध्‍यक्ष थे, तब वो पार्टी के महासचिव हुआ करते थे. उसके भी पहले कई दशकों से अपने नैतिक लोकतांत्रिक रुझान के चलते जयप्रकाश नारायण के भी नजदीक थे. विचारों में शुरुआत से ही प्रखर समाजवादी रहे और भारतीय समाजवादी आंदोलन के भीष्म पितामह आचार्य नरेंद्रदेव से वैचारिक सामीप्य ज्यादा रहा.

शायद ये नरेंद्रदेव का ही असर था कि पैसे और शोहरत की लिप्सा से बहुत दूर आजीवन पढ़ने-पढ़ाने से सम्बद्ध रहे. सभ्य-सुसंस्कृत आचरण जिसमें लोकतंत्र और समाजवाद के संस्कार झलकते थे- उनकी पूंजी थे. जयप्रकाश जिस शिष्ट और शालीन आचरण पर हमेशा जोर देते थे और उनके भी पूर्व नरेंद्रदेव और रोजा लक्जमबर्ग जिस नैतिक-मानवीय धारा को सार्वजनिक जीवन ही नहीं, बल्कि पूरे समाजवादी संघर्ष से जोडना चाहते थे- सुरेंद्र मोहन उस वैचारिक पंक्ति की मजबूत कडी थे.

ये वही धारा थी जो समाजवाद को स्टालिन के ‘रेजीमेंटेशन’ के बजाए लोकतंत्र के मानवीय पक्ष से जोड़ती थी, जो उसे गांधी के सत्याग्रह के पास ही नहीं ले जाती थी- समाजवादी को लोहिया की प्रखरता के साथ आचरण में गांधीवादी भी बनाती थी. इसीलिए तो कोई ताज्जुब नहीं होता जब सुरेंद्र मोहन के काशी विद्यापीठ से लंबे जुड़ाव के पहले का इतिहास ये भी बताता है कि उस ‘समाजवादी-लोकतांत्रिक गंगोत्री’ से सम्बद्ध रहने वालों में नरेंद्रदेव, डॉ. सम्पूर्णानंद, लाल बहादुर शास्त्री, अलगूराय शास्त्री, राजाराम शास्त्री और टी.एन. सिंह जैसे लोग भी शामिल थे. दिलचस्प तो ये है कि ये सभी खुद में नैतिक सियासत के अतुलनीय अध्याय हैं.

निश्चित रूप से ये इसी का असर था कि सुरेंद्र मोहन अंतिम समय तक दिल्ली में डीटीसी की बसों में सफर करते देखे जा सकते थे. जनता सरकार के जमाने में जो व्यक्ति पार्टी का महासचिव रहा हो, राज्यसभा सदस्य रहा हो, सत्ता केंद्र के सर्वाधिक निकट ही नहीं, सत्ता को दिशा देने वाली नीतियों का निर्माता रहा हो, उसने वैचारिक नैतिकता और ईमानदारी से कभी समझौता नहीं किया.

मैं उनसे 23 साल पहले नवभारत टाइम्स, लखनऊ में उनके इंटरव्यू के लिए पहली बार मिला था. भारतीय समाजवादी धारा और नरेंद्रदेव पर लंबी बात हुई. तभी पता चला कि वो मेरे पिताजी के भी मित्र रहे हैं और उनका साथ 20-25 साल पहले बनारस का रहा है.

इस संदर्भ का उल्लेख मैं उस वाकये के लिए कर रहा हूं जिससे सुरेंद्र मोहनजी के व्यक्तित्व पर अनूठी रोशनी पडती है. बात 6-7 साल पहले की है. मैं भोपाल में एक अखबार का संपादक था. संपादक को लिखा एक पोस्टकार्ड मिला, लेखक थे सुरेंद्र मोहन. पत्र में उनके अनेक लेखों के पारिश्रमिक के उन तक न पहुंचने की शिकायत थी और मन को झकझोरती ये सच्ची उलाहना भी कि- ‘आप पत्रकार हैं. एक वृद्ध श्रमजीवी पत्रकार की स्थिति को समझ सकते होंगे, क्या मैं आपसे उम्मीद कर सकता हूं…’ सच कहूं मुझे खुद पर शर्म के साथ अफसोस ये हुआ कि ईमानदारी, नैतिकता कितनी परीक्षा लेती है? किसी भी जोड़तोड़ से दूर रहने वाले शिक्षक, विचारक, राजनीतिज्ञ को ये दिन भी देखने पडते हैं…? उधर, अखबार की आर्थिक स्थिति थोड़ी डांवाडोल थी, बहरहाल मैंने उन्हें व्यक्तिगत पत्र के साथ उनके सारे पुराने आलेखों का भुगतान कराता हुआ चेक यथाशीघ्र भिजवा दिया. ये बात बहुत छोटी थी और मैं भूल भी गया था, लेकिन अभी एक हफ्ते पहले उन्होंने अपनी लखनऊ यात्रा में मेरे पिताजी के साथ फोन पर वार्ता में इस बात का खासतौर पर जिक्र  किया और कहा कि ‘तब मुझे पैसे की जरूरत थी और गिरीश ने मेरी मदद की थी.’ तो ये था उनका बड़प्पन.

कहीं पढ़ा था- व्यक्ति छोटी-छोटी बातों से जाना जाता है. सुरेंद्र मोहन को उनकी वैचारिक प्रखरता के चलते तो याद किया ही जाता है, लेकिन इस छोटी सी घटना का वर्षों बाद उनके द्वारा जिक्र उनके कद को और भी बड़ा बनाता है. बताता है कि उनके लोकतांत्रिक-समाजवादी संस्कार ही नहीं, उनके संवेदनशील सरोकार भी कितने गहरे थे. उनकी समाजशास्त्रीय शिक्षा सिर्फ सैद्धांतिक और किताबी ही नहीं थी. उनकी दृष्टि जमीनी थी. सच्चाई के बहुत नजदीक थी, जो अपनी नैतिक-मानवीय सोच और कर्म से सभी को सिर्फ जोड़ना ही जानती थी. ऐसी सोच और दृष्टि के प्रतीक सुरेंद्र मोहन को प्रणाम, और ये कामना भी कि हादसे के बाद भी ये लौ अनवरत जलती ही रहे और हम सभी प्रकाशित होते रहें.

और अंत में-

’खुशनुमाई देखना न
कद किसी का देखना
बात पेड़ों की कभी आए
तो साया ही देखना…’

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. उनका ये लिखा आज लोकमत में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे गिरीशजीयहां प्रकाशित किया गया है. गिरीश से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. sikanderhayat

    December 18, 2010 at 6:52 am

    bharat ka gilas aaj aadha bara hua ha to iska pura sharay in bhartiye samajvadiyo (not mulayam ) ko jata ha hindu muslim fundamantalistao congress b j p ke bharyhatachariyo khabti or jhakki vampanthiyo lalchi punjipathiyo or angrezi peshacho ke kahar se kafi hadh tak inhone bharat ki aam janta ki raksha ki

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