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सम्मान

राडिया रानी ले डूबीं मीडिया(द)लालों के पदम!

: दिल्ली के दलाल संपादकों-पत्रकारों का नहीं हुआ सम्मान : इसी कारण कुछ एक गोबरगणेश हैं हैरान-परेशान : होमोई और जार्ज जैसे मीडिया के असली महारथियों को पदम पुरस्कार मिला : अतीत में पदम एवार्ड पा चुके कई जर्नलिस्टों के नाम राडिया टेपों में आने के बाद इस बार पदम पुरस्कार बांटने में सरकार ने मीडिया को लेकर खासी सतर्कता बरती.

: दिल्ली के दलाल संपादकों-पत्रकारों का नहीं हुआ सम्मान : इसी कारण कुछ एक गोबरगणेश हैं हैरान-परेशान : होमोई और जार्ज जैसे मीडिया के असली महारथियों को पदम पुरस्कार मिला : अतीत में पदम एवार्ड पा चुके कई जर्नलिस्टों के नाम राडिया टेपों में आने के बाद इस बार पदम पुरस्कार बांटने में सरकार ने मीडिया को लेकर खासी सतर्कता बरती.

खासकर टीवी वालों को तो इस बार बिलकुल ही पदम एवार्ड के लिए कनसीडर नहीं किया गया. इसी कारण मीडिया फील्ड में दो ऐसे लोगों को पदम पुरस्कार के लिए चुना गया जिनके नाम पर किसी को आपत्ति हो ही नहीं सकती थी. और ये दोनों प्रिंट मीडिया से हैं, और पुराने दौर के हैं और इनका सेलेक्शन बेस्ट सेलेक्शन है. देश की पहली महिला न्यूज फोटोग्राफर होमोई व्यारावला को इस बार पदम सीरिज एवार्ड के लिए चुना गया. दूसरे सज्जन हैं संपादक, लेखक और स्तंभकार टीजेएस जार्ज.

ये दोनों पदम पुरस्कार पाने वाले जर्नलिस्ट न तो ‘दलाल दिल्ली’ में निवास करते हैं और न ही लायजनरों की नई बस्ती राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) से ताल्लुक रखते हैं. होमोई जी बड़ोदरा में रहती हैं जबकि जार्ज साहब बेंगलोर में. तो कह सकते हैं कि नीरा राडिया टेप्स का मीडिया के पदम पुरस्कार पर असर पड़ा है और दिल्ली व एनसीआर के पत्रकारों को दूर रखकर सरकार ने नए किसी विवाद के पैदा होने से बचने की कोशिश की है. मजेदार यह है कि दिल्ली के कई ‘राष्ट्रीय दलाल लेकिन स्वनामधन्य पत्रकार और कुछ मीडिया मालिक’ इस बार अपने को पदम एवार्ड पाने के बेहद योग्य बता रहे थे और लगभग अपना नाम फाइनल मान रहे थे. कई तो दूसरों से अग्रिम बधाई तक ले रहे थे.

यह संख्या एक-दो नहीं बल्कि दर्जन भर है. सबके मुंह से लार टपक रहा था. पदम न हुआ अमृत हुआ जिसे पीकर ये संपादक लोग अमर हो जाएंगे. कभी सम्मान के प्रतीक संपादक जिस कदर दलाल होते जा रहे हैं और जनता से दूर होते जा रहे हैं, तबसे संपादकों के सरकारी सम्मान को दलाली के सम्मान व सरकारी आशीर्वाद के रूप में देखा जाने लगा है. अखबारों व चैनलों पर बड़ी बड़ी बातें लिखने कहने वाले ये संपादक दरअसल कारपोरेड मीडिया के सामने घुटने टेक खुद को दलाल मान चुके हैं और इसी कारण वे पूंजी के हित, कारपोरेट के हित के लिए जनता के हितों की लगातार बलि देते जा रहे हैं. राडिया टेप्स ने इनमें से कई दलाल पत्रकारों के चेहरे से नकाब उतारा है और कइयों के उतरने बाकी हैं.

इसी कारण तरह तरह के विवादों से घिरी और जनविश्वास खोकर अंतिम सांसें ले रही कांग्रेस नीत केंद्र की गठबंधन सरकार किसी नई फजीहत से बचने के लिए मीडिया के दिल्ली-एनसीआर वाले दलालों को अपने से दूर ही रखा. पर बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी. इस बार नहीं तो अगली बार फिर कई दलाल पत्रकार पदम पुरस्कार पाकर खुद को पत्रकारिता का भगवान मानने लगेंगे पर चलिए, इस बार किन्हीं भी कारणों से, राडिया टेप्स की ही वजह से, दलालों को पुरस्कारों से दूर रखा गया और दो ऐसे जेनुइन मीडिया के साथियों को एवार्ड मिला, जिन्हें बहुत पहले ही मिल जाना चाहिए था पर आजकल के बाजारू दौर में भी पुरस्कार उन्हीं को मिलते हैं जो गर्दन व पूंछ हिला हिला कर नौकरशाहों व नेताओं के यहां अपनी मार्केटिंग करते रहते हैं.

मीडिया वालों को पदम पुरस्कारों से दूर रखे जाने को लेकर आज टेलीग्राफ व इंडियन एक्सप्रेस में भी इशारे-इशारे में कुछ बातें कही गई हैं. The Telegraph में RADHIKA RAMASESHAN के विश्लेषण ”Padma for PM’s pick and Vajpayee’s too” में एक जगह कहा गया है- 

“Only one mediaperson, veteran T.J.S. George, made the cut to a Padma Bhushan despite the buzz that nearly a dozen were long-listed. Sources said the government was cautious about this category because at least a couple of former awardees figured in the Niira Radia tapes.”

The Indian Express में प्रकाशित खबर ”Brajesh, Montek, Premji get Padma Vibhushan” में एक जगह लिखा गया है कि-

“The most conspicuous omission from the list are mediapersons. For the first time in several years, not a single journalist has been picked for any of the Padma Awards. It is not clear whether the decision was influenced by the controversy surrounding the Niira Radia tapes in which some prominent mediapersons have been revealed in bad light.”

मजेदार है कि दिल्ली के पत्रकारों को इस बार पदम पुरस्कार नहीं मिला तो सभी बड़े पत्रकारों ने यही हल्ला करना शुरू कर दिया कि इस बार मीडिया के लोगों को पदम पुरस्कारों से दूर रखा गया है लेकिन सच्चाई यह है कि मीडिया के दो श्रेष्ठ व बुजुर्ग साथियों को यह पुरस्कार मिला है. लेकिन दिल्ली को ही मीडिया की दुनिया और भारत का अंतिम स्थान मानने वाले दलालों के लिए दिल्ली के बाहर का कोई बंदा पदम एवार्ड पा जाए तो यह भी कहां पचने वाला. सारी मलाई दिल्ली में ही दिल्ली वाले खाते रहें, यही इन दलालों की इच्छा है और इसी मलाई खाने की कला के कारण ये दिल्ली में बैठे रहकर कथित नामचीन बन जाते हैं.

गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर बड़ी बड़ी बातें करने वाले दिल्ली के ये घटिया दलाल पत्रकार साल के बाकी सारे दिन कैसे ज्यादा सेलरी पर नौकरी चलती रहे और कैसे किस बनिया को पटा कर बड़ा पद पाया जा सके और कैसे जोड़तोड़ करके सारे सरकारी सहूलियत हासिल कर सकें, इसमें लगे रहते हैं. और ऐसी मानसिकता के संपादकों के चलते ही मीडिया का यह चरम पतन का दौर चल रहा है जिसमें पेड न्यूज चोरी चोरी चुपके चुपके हर अखबार और टीवी में अपना जलवा दिखाने लगा है. ऐसे चोर संपादकों और इन्हें संरक्षण देने व प्रमोट करने वाले महाचोर नेताओं,  महाभ्रष्ट उद्यमियों और महाहरामी नौकरशाहों के चंगुल में मीडिया ही नहीं बल्कि देश का पूरा लोकतंत्र, समस्त गणतंत्र आज कराह रहा है. महंगाई व भ्रष्टाचार अपने चरम स्थिति पर पहुंचकर आंतरिक विद्रोह जैसी स्थिति पैदा करने को तत्पर हैं.

पर इन संपादकों को ये सब न दिखेगा. इन्हें तो बस पुरस्कार चाहिए जी, जैसे भी मिल जाए. मीडिया के पतन के जिम्मेदार ये लोग आज के दिन कहीं गणतंत्र के मौके पर देश व समाज व मीडिया को लेकर कहीं फेंचकुर फेंकते, बोलते, दर्शन झाड़ते, प्रवचन पेलते मिल जाएंगे. पढ़िएगा, सुनिएगा उन्हें, जरूर उबकाई आ जाएगी. ऐसे में मैं तो यही कह सकता हूं कि….

इन चोरों को

जहां मिलें ये

जूते मारो चार…

तब भी ये न मानें तो

गाल पर थूको

बारंबार हजार…

भ्रष्ट लोगों का खात्मा हो ताकि गणतंत्र बमतंत्र बनने से बच सके, और दिल्ली से बाहर रहने वाले आर्थिक रूप से सबसे कमजोर आदमी भी बेहद आत्मसम्मान व स्वाभिमान के साथ सहजभाव से अपनी जिंदगी जी सके, अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा सके, मानवीय गरिमा के साथ परिवार का भरण-पोषण कर सके, यही मेरी कामना है.

जय हो, जय हिंद….

बात खत्म करने के पहले इस बार पदम पुरस्कार के लिए चुनी गईं देश की प्रथम महिला न्यूज फोटोग्राफर होमोई जी के बारे में कुछ जानकारी, व कुछ बातें उनकी जुबानी, जो मैंने नेट से खंगाल कर हासिल किया है, इस प्रकार है. इसे पढ़कर आपको थोड़ा और समझ में आएगा कि वे कैसे लोग हुआ करते थे, जिनमें से होमोई समेत कई लोग आज भी जीवित हैं, और आज कैसे कैसे बौने पैदा हो गए हैं, जो अपने शीशे के घरों, गाड़ियों, आफिसों से बाहर निकल कर नहीं झांक पाते…… लीजिए, होमोई जी के बारे में पढिए…

———————-

97 साल की उम्र पूरी कर चुकी होमोई ऎसी फोटोग्राफर हैं, जिन्होंने इतिहास को अपनी आंखों के सामने घटते हुए देखा है. आजादी से पहले के उनके फोटोग्राफ तबके उथल-पुथल भरे दौर के जीवंत दस्तावेज हैं. इनके फोटो से पता चलता है कि असल में आजादी के लिए हमें क्या कीमत चुकानी पड़ी है. गांधी जी की मौत के बाद उनके खींचे गए फोटो देख हर आंख नम हो उठी थी. हो ची मिन्ह, महारानी एलिजाबेथ और जैकी केनेडी जैसी जानी-मानी अंतरराष्ट्रीय हस्तियों के दौरे के समय खींची गई तस्वीरें देखने वालों के दिलो-दिमाग में आधी सदी के करीब गुजर जाने के बाद भी ताजा हैं. दुनिया ने उनकी तस्वीरों के जरिए एक नए आजाद हुए मुल्क के आशावाद और उल्लास को जीवंत देखा. पर होमोई व्यारावला खुद कभी लाइम लाइट में नहीं रहीं. देश की आजादी की गोल्डन जुबली के अवसर पर उनकी उपलब्धियों को जरूर याद किया गया. उनके काम को याद करने के लिए एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई गई, जिसका सब टाइटल था ‘ए टेलेंटिंड वूमेन हिस्ट्री फोरगोट’.

1940 और 1950 के दशक में दिल्ली के आसपास साड़ी में लिपटी होमोई व्यारावला को अक्सर साइकिल पर देखा जाता था. उसी दौरान उन्होंने इतिहास में अमर हो गए इवेंट और आम लोगों की ऎसी तस्वीरें खींचीं, जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता. अपने भारी-भरकम उपकरण वे खुद लादकर चलती थीं. वे कहती हैं- मैं सतर्कतापूर्वक एक कोने में खड़ी रहती थी और जैसे ही मौका आता, फोटो ले लेती. फोटोग्राफर अपने रूटीन के फोटोग्राफ लेने के बाद जल्दी ही चले जाते थे, लेकिन मैं हमेशा एक ऎसे फोटोग्राफ की तलाश में रहती, जो रूटीन से हटकर हो. फोटो जर्नलिज्म के शुरुआती दिनों के बारे में होमोई बताती हैं- उन दिनों फोटोग्राफी एक सम्मानित पेशा हुआ करता था. पंडित नेहरू तो होमोई के मनपसंद सब्जेक्ट थे.

होमोई को अपने काम में पति मानेकशॉ का पूरा सहयोग मिला. होमोई बाहर जाकर फोटो खींचतीं और मानेकशॉ उन्हें डवलप करते. 1938 में बॉम्बे क्रॉनिकल में अपनी खींची हुई आठ तस्वीरें छपने पर उन्हें एक रुपया मिलता था. बाद में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया के संपादक सेटेनली जेपसन ने व्यारावला को साप्ताहिक असाइनमेंट देने शुरू किए. उन्होंने युद्ध के दौरान बॉम्बे की हर एंगल से तस्वीरें खींची. कुछ ही दिन में उनका नाम पहचाना जाने लगा. 1942 में व्यारावला दिल्ली ब्रिटिश सूचना सेवा के फार इस्टर्न ब्यूरो के मुख्यालय दिल्ली आ गईं. यहां वे पूर्णकालिक कर्मचारी थीं, लेकिन ऑफिस के बाद उन्हें अन्य काम करने की इजाजत थी. अपनी ड्यूटी के बाद वे ब्रिटिश उच्चायोग की जिमखाना में होने वाली पार्टियों में जातीं. यहां उन्होंने ऑनलुकर, टाइम और लाइफ जैसी पत्रिकाओं के लिए मशहूर हस्तियों के फोटो लिए. वे बताती हैं कि उन्हें माउंटबेटन के एक फंक्शन को कवर करने का मौका मिला. उन्हें एक हाई एंगल शॉट की जरूरत लगी. इसके लिए वे एक मेज पर चढ गईं और फोटो लिए. शायद उन्हें महिला होने का लाभ मिला. व्यारावला न्यूज चेयरमैन एसोसिएशन की संस्थापक सदस्य हैं. होमोई का जन्म 1913 में गुजरात के नवसारी में हुआ था. उनके पिता उर्दू पारसी थिएटर के जाने-माने अभिनेता थे. बाद में वे मुंबई में बड़ी हुईं.

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यशवंत सिंह

एडिटर

भड़ास4मीडिया

[email protected]

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0 Comments

  1. madan kumar tiwary

    January 26, 2011 at 11:04 am

    यह पुरुस्कार सम्मान से ज्यादा अपमान लग रहा है। ९७ वर्ष की होमोई जी अब दिखी भारत सरकार को , पहले क्या सिर्फ़ दलाल हीं नजर आते थें। लेकिन हम आप लिखने के अलावा कर भी क्या सकते हैं। आजतक से हटते हैं , तो इटीवी कहता है स्वागत किजिये नये मेहमान का सची बात में। हां वह जूते मारने वाली बात सही है , आप देखना जैसा विरोध इन दलालों का हो रहा है , वह दिन भी आयेगा , जुते पडेंगे ।

  2. arvind

    January 26, 2011 at 4:42 pm

    क्‍या बात की जाए पुरस्‍कारों की, आज तक सरकार हाकी के जादूगर दादा ध्‍यानचंद को भारत रत्‍न नहीं दे पायी। धिक्‍कार है लानत है।

  3. Shisher Sharma

    January 26, 2011 at 5:09 pm

    दो साल पहले नईदुनिया के मालिक अभय छजलानी और प्रधान संपादक आलोक मेहता को पद्म सम्मान मिले थे. जबकि इन लोगो ने कोई ऐसा तीर नहीं मारा. मालिक होना कोनसा सम्मान का काम है और आलोक मेहता जैसा जुगाडू होना भी पद्म सम्मान की पात्रता का काम नहीं है, ऐसे लोगो को सम्मान देने से किसी को ना देना ही अच्छा है .

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