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महात्मा गांधी ऐसी ही मौत चाहते थे!

shesh jiआज से ठीक तिरसठ साल पहले एक धार्मिक आतंकवादी की गोलियों से महात्मा गाँधी की मृत्यु हो गयी थी. कुछ लोगों को उनकी हत्या के आरोप में सज़ा भी हुई लेकिन साज़िश की परतों से पर्दा कभी नहीं उठ सका. खुद महात्मा जी अपनी हत्या से लापरवाह थे. जब २० जनवरी को उसी गिरोह ने उन्हें मारने की कोशिश की जिसने ३० जनवरी को असल में मारा तो सरकार चौकन्नी हो गयी थी लेकिन महात्मा गाँधी ने सुरक्षा का कोई भारी बंदोबस्त नहीं होने दिया.

shesh jiआज से ठीक तिरसठ साल पहले एक धार्मिक आतंकवादी की गोलियों से महात्मा गाँधी की मृत्यु हो गयी थी. कुछ लोगों को उनकी हत्या के आरोप में सज़ा भी हुई लेकिन साज़िश की परतों से पर्दा कभी नहीं उठ सका. खुद महात्मा जी अपनी हत्या से लापरवाह थे. जब २० जनवरी को उसी गिरोह ने उन्हें मारने की कोशिश की जिसने ३० जनवरी को असल में मारा तो सरकार चौकन्नी हो गयी थी लेकिन महात्मा गाँधी ने सुरक्षा का कोई भारी बंदोबस्त नहीं होने दिया.

ऐसा लगता था कि महात्मा गाँधी इसी तरह की मृत्यु का इंतज़ार कर रहे थे. इंसानी मुहब्बत के लिए आख़िरी साँसे लेना उनका सपना भी था. जब १९२६ में एक धार्मिक उन्मादी ने स्वामी श्रद्धानंद जी महराज को मार डाला तो गाँधी जी को तकलीफ तो बहुत हुई लेकिन उन्होंने  उनके मृत्यु के दूसरे पक्ष को देखा. २४ दिसंबर १९२६ को आल इण्डिया कांग्रेस कमेटी की बैठक में गाँधी जी ने कहा कि “स्वामी श्रद्धानंद जी की मृत्यु मेरे लिए असहनीय है. लेकिन मेरा दिल शोक मानने से साफ़ इनकार कर रहा है. उलटे यह प्रार्थना कर रहा है कि हम सबको इसी तरह की मौत मिले. (कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ महात्मा गाँधी अंक ३२)

अपनी खुद की मृत्यु के कुछ दिन पहले पाकिस्तान से आये कुछ शरणार्थियों के सामने उन्होंने सवाल किया था- “क्या बेहतर है? अपने होंठों पर ईश्वर का नाम लेते हुए अपने विश्वास के लिए मर जाना या बीमारी, फालिज या वृद्धावस्था का शिकार होकर मरना. जहां तक मेरा सवाल है मैं तो पहली वाली मौत का ही वरण करूंगा” (प्यारेलाल के संस्मरण)

महात्मा जी की मृत्यु के बाद जवाहरलाल नेहरू का वह भाषण तो दुनिया जानती है जो उन्होंने रेडियो पर देश वासियों को संबोधित करते हुए दिया था. उसी भाषण में उन्होंने कहा था कि हमारी ज़िंदगी से प्रकाश चला गया है. लेकिन उन्होंने हरिजन (१५ फरवरी १९४८) में जो लिखा, वह महात्मा जी को सही श्रद्धांजलि है. लिखते हैं कि ‘उम्र बढ़ने के साथ साथ ऐसा लगता था कि उनका शरीर उनकी शक्तिशाली आत्मा का वाहन हो गया था, उनको देखने या सुनने के वक़्त उनके शरीर का ध्यान  ही नहीं रहता था, लगता था कि जहां वे बैठे होते थे, वह जगह एक मंदिर बन गयी है.’  अपनी मृत्यु के दिन भी महात्मा गाँधी ने भारत के लोगों के लिए दिन भर काम किया था. लेकिन एक धर्माध आतंकी ने उन्हें मार डाला.

लेखक शेष नारायण सिंह देश के वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं.

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0 Comments

  1. sp tripathi

    January 30, 2011 at 3:48 pm

    solid art.sir

  2. aarti

    January 30, 2011 at 4:02 pm

    phone kiya tha mahatama jee ne shesh ji ko marne se pehle …. lamba record hai batchit ka inka -unka …. shesh me buddhi shesh nahi baaki theek hai ….pagal lagta hai ye aadmi …. aisi ki taisi

  3. Indian Citizen

    January 31, 2011 at 2:48 pm

    शेष जी.. आपने बिल्कुल ठीक लिखा है. हर बात से सहमत. सिर्फ एक बात के अलावा कि एक जगह आप धार्मिक आतंकवादी लिख रहे हैं और दूसरे को धार्मिक उन्मादी. ऐसा क्यों?

  4. Rajat Kumar

    January 31, 2011 at 5:10 pm

    Yah aarti ke buddhi kee balihaaree . sab kitaabon men likha hai. bas thoda padhna padta hai . lekh mein sandarbh likha hai lekin inkee samajh mein aaye tab na

  5. shailendra shukla

    January 31, 2011 at 7:14 pm

    वाह पांडेंय जी बलेशर की जीवनी लिखने के लिए मजा आ गया पढ़कर

  6. girish

    February 1, 2011 at 7:15 am

    शेष जी आप वरिष्ठ हैं पर मै इतना आपको जरुर बताना चाहूँगा की मैंने गाँधी और गोडसे दोनों को अच्छी तरह से पढ़ा है, दोनों को पढने के बाद मुझे लगा की इस गाँधी जब अपने सार्वजानिक जीवन में आये तभी उनका वध कर देना चाहिए था ताकि देश और पहले आजाद हो जाता, गाँधी ने कभी भी जो शसस्त्र हिंसा से किसी आन्दोलन को अंजाम देते थे सदा उनकी वे आलोचना करते थे और चाहते थे की उनको अंग्रेजी कानून के तहत कड़ी से कड़ी सजा मिले |
    गाँधी ने जितनी भी आन्दोलन किया है सब में वे असफल रहे हैं और निहत्थे देशभक्तों को अंग्रेजों की गोलियों का शिकार बनवाते थे इसका बहुत बड़ा उदहारण जलियाँ वाला बाग़ का नरसंहार है | रही बात गाँधी वध का तो नाथूराम गोडसे ने उनका वध किया जिसका प्रमुख कारन भारत का विभाजन,सतुलज नदी का पाकिस्तान को जल देना और पचपन लाख रूपये दिए जाने के कारण को लेकर नाथूराम ने गाँधी का वध किया |
    जब देश आज़ाद हुआ तो बात प्रधानमंत्री बनाने की चाह पंडित जवाहरलाल नेहरु और मोहम्मद अली जिन्ना दोनों को था उस समय भी भारत का विभाजन रोका जा सकता था मो.अली जिन्ना को प्रधानमंत्री और नेहरु को राष्ट्रपति बनाकर परन्तु गाँधी का नेहरु प्रेम ने देश विभाजन तो स्वीकार किया बजाये जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाकर विभाजन रोकने की | यहाँ यह भी समझ आता है गाँधी और नेहरु को जिन्ना पर यकीं नहीं था और वे दोनों यहाँ सांप्रदायिक सोच के आधार पर कार्य किये |
    यहाँ यह भी बताना जरुरी समझता हूँ नाथूराम गोडसे का उद्देश्य गाँधी वध का नहीं था जब देश का विभाजन हुआ तो देश के लाखों राष्ट्रभक्तों रो उठे तब कहीं जाकर गोडसे ने गाँधी वध करने का मन बनाया और गाँधी का वध किया | गोडसे ने कोर्ट में अपने लिए मानव वध के लिए मृत्युदंड की मांग किया |
    आज भी मेरे पास गोपालराव गोडसे का अनेक पत्र मौजूद है जिसमें हम दोनों देश विभाजन और स्वतंत्रता आन्दोलनों की बातों को अपने-अपने विचार व्यक्त करते थे |

  7. शेष नारायण सिंह

    February 1, 2011 at 1:55 pm

    girish जी ,जब आप गोपाल गोडसे के मित्र हैं तो आप को यही सब कहना चाहिए. मुझे आपसे पूरी सहानुभूति है .मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वह आप को जल्दी स्वस्थ करे.

  8. s.p.singh

    February 2, 2011 at 1:42 pm

    भाई गिरीश जी वैसे तो आपके द्वारा व्यक्त शब्दों का कोई मतलब इस लिए नहीं है की न तो नाथू राम गोडसे गाँधी जी के कद का नेता था और न ही वह आजादी के आन्दोलन का कोई सिपाही था आखिर वह अपने आप में कौन सी शक्ति/ अथोरिटी था जिसे गाँधी जी द्वारा किये गए कृत्यों का विरोध था — आपका कथ्य इतहास एवं कल चक्र के सर्वदा विपरीत है गाँधी जी की सोंच अहिंसा ही आज की वास्तिविकता है क्या आपको यह नहीं मालूम की जंग फौजों के द्वारा मोर्चो पर लड़ी जाती है पर उसका समझौता मेज पर ही बैठ किया जाता है जंग के मैदान पर नहीं – अगर आपका कथ्य सही भी मान लिया जाय तो क्या आप बिना मतलब के लड़ी गई कारगिल की लड़ाई के हीरो श्री अटल बिहारी बाजपाई और उस समय के रक्षा मंत्री फर्नांडीज को दोषी मान कर उन्हें भी फाँसी पर चड़ा देंगे क्योंकि उसमे भी बहुत से बेगुनाह फौजी मारे गए थे —— s.p.singh

  9. s.p.singh

    February 2, 2011 at 1:43 pm

    भाई गिरीश जी वैसे तो आपके द्वारा व्यक्त शब्दों का कोई मतलब इस लिए नहीं है की न तो नाथू राम गोडसे गाँधी जी के कद का नेता था और न ही वह आजादी के आन्दोलन का कोई सिपाही था आखिर वह अपने आप में कौन सी शक्ति/ अथोरिटी था जिसे गाँधी जी द्वारा किये गए कृत्यों का विरोध था — आपका कथ्य इतहास एवं कल चक्र के सर्वदा विपरीत है गाँधी जी की सोंच अहिंसा ही आज की वास्तिविकता है क्या आपको यह नहीं मालूम की जंग फौजों के द्वारा मोर्चो पर लड़ी जाती है पर उसका समझौता मेज पर ही बैठ किया जाता है जंग के मैदान पर नहीं – अगर आपका कथ्य सही भी मान लिया जाय तो क्या आप बिना मतलब के लड़ी गई कारगिल की लड़ाई के हीरो श्री अटल बिहारी बाजपाई और उस समय के रक्षा मंत्री फर्नांडीज को दोषी मान कर उन्हें भी फाँसी पर चड़ा देंगे क्योंकि उसमे भी बहुत से बेगुनाह फौजी मारे गए थे —— s.p.singh

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