
रोहित पांडेय
इस उपेक्षा ने रोहित को तोड़ दिया और उनकी बीमारी और बढ़ गयी. रोहित उन बिरले पत्रकारों में थे जिन्होंने ईमानदारी के साथ न सिर्फ पत्रकारिता की बल्कि बीमारी से जूझते हुए भी अपनी ईमानदारी को बचाए रखा था. अजय श्रीवास्तव सरीखे साथियों ने समय-समय पर रोहित के इलाज के लिए संसाधन जुटाए पर अफ़सोस यह किसी काम नहीं आ सका. रोहित के पीछे उसकी पत्नी और दो नन्हे बच्चे हैं. साथियों से अपील है की रोहित के परिवार को इस विषम परिस्थिति से उबरने में मदद करें. मदद के इच्छुक साथी अजय श्रीवास्तव से 09935004949 पर संपर्क कर सकते हैं.
मूलत संतकबीर नगर के रहने वाले रोहित ने पत्रकारिता का सफर दैनिक जागरण से शुरू किया. पिछले सात वर्षों से वे हिन्दुस्तान गोरखपुर से जुड़े थे. प्रतिभा के धनी रोहित पत्रकारिता में नेट उत्तीर्ण करने वाले गोरखपुर मंडल के प्रथम छात्र थे. वे गोरखपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग द्वारा संचालित पत्रकारिता पाठयक्रम में भी बतौर शिक्षक अपनी सेवाएं दे रहे थे. रोहित वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी के पत्रकारीय सफर पर शोध कर रहे थे. उनके निधन पर पत्रकार जगत में शोक की लहर है. गोरखपुर प्रेस क्लब व महराजगंज प्रेस क्लब में उनके निधन पर शोक सभा का आयोजन किया गया.
लखनऊ से उत्कर्ष सिन्हा की रिपोर्ट












अम्बुजेश शुक्ल
March 3, 2011 at 7:07 am
मै शाक्ड हू. ये सब कैसे हो गया ….अच्छे लोगो के साथ भगवान् ऐसा क्यों करता है .रोहित सर मेरे गुरु रहे है …गोरखपुर विश्वविद्यालय में उन्होंने मुझे पढाया था. अब उनकी जगह लेने वाला पूर्वांचल में कोई नहीं है . ,मेरी इश्वर से प्रार्थना है की उनकी आत्मा को शांति मिले .और परिवार के लोगो को यह दुःख सहने की ताकत मिले .
रजनीश कुमार चतुर्वेदी
March 3, 2011 at 4:37 pm
रोहित का देहान्त मेरे लिये व्यक्तिगत क्षति है। एक पत्रकार के रूप में उनके द्वारा दैनिक जागरण में लिखे जाने वाले कालम हफ्ते की बात की कमी आज भी महसूस होती है। रोहित बहुमुखी प्रतिभा वाले व्यक्ति थे,उनकी कविताएँ उनके व्यक्तित्व को सामने लाती हैं। विश्वविद्यालय के छात्र के रूप में छात्र-संसद में उन्होने प्रधानमंत्री की भूमिका निभाते हुए उन्होंने जो भाषण दिया था वह उनके एक अच्छे वक्ता होने का प्रमाण है। मेरा रोहित से बहुत मधुर सम्बन्ध था। मैं उनके व्यक्तित्व और कृतित्व से प्रभावित था और उन्होने भी मुझे हमेशा छोटे भाई का स्नेह दिया और प्रोत्साहित करते रहे। काफी दिनो से दिल्ली में इलाज करा रहे रोहित से 15-20 दिनो पर बात हो जाती थी। मुझे आज पता चला कि हिन्दुस्तान ने उनकी सेवा लेनी बन्द कर थी। रोहित ने कभी भी अपनी निराशा नहीं प्रकट की थी। यह व्यवस्था का दोष था रोहित अर्हता और योग्यता रखते हुए भी कहीं नौकरी नहीं पा सके। हम दोनो ने कई बार साथ में साक्षात्कार दिया था। अभी मुझसे अन्तिम बात में उन्होने मुझसे उन्होने कहा था कि रजनीश भाई अब हमें नौकरी नहीं मिलेगी अब हमारा कल्याण होगा क्योंकि 40 की उम्र में नौकरी मिल गयी तो वह कल्याण ही होगा। दुर्भाग्य कि रोहित का कल्याण नहीं हो सका और वे हम सब को छोड़ कर कल्याणधाम को चल दिये। अलविदा रोहित ! मैं आप को हमेशा याद रखूगाँ।
kumarharsh
March 3, 2011 at 4:38 pm
kal raat hi usaka sandesh aaya tha-main gahare sankat men hun. aur kuch ghante bad maut. ek napunsak bechainee timag men patthar chala rahi hai.
ishwar singh
March 4, 2011 at 12:11 pm
श्री रोहित पाण्डेय युवा पत्रकारों के प्रेरणास्रोत थे। परफेक्ट पत्रकार, आदर्श शिक्षक, उभरता साहित्यकार, कुशल वक्ता, नेक सहयोगी, अपनों के लिये हमेशा त्याग की भावना, बेबाक टिप्पणीकार, मृदुभाषी कई रुप थे रोहित पाण्डेय के। हर दिन कुछ नया करने का जुनून उन्हें विशिष्ट पत्रकारों की श्रेणी में खड़ा करता था, एक शिक्षक के तौर पर उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि क्लास लेने के दौरान उन्होंने कभी भी किताबों का सहारा नहीं लिया। छात्रों के हर सवाल का जवाब तो उनके पास होता ही था, उनके लिये वे हमेशा उपलब्ध भी होते थे। चुनौतियों से निबटने के फन में माहिर रोहित सर सही मायने में पत्रकारिता के हस्ताक्षर पुरुष थे। रोहित सर मेरे गुरु हैं, उनसे मैंने जिंदगी में काफी कुछ सीखा है। ऐसी महान आत्मा को मेरा शत-शत नमन।
aditya singh badal
March 4, 2011 at 1:39 pm
Rohit sir yuva patrakaro ke leye urja the. ve ham logo se ddu ke b.j class me kaha karte the tum log yaha se passout hone ke bad patrakar banoge mughe khusi tab ho gi jab aap ek emandar patrakar banoge. passout hone ke bad jab bhi ham log milte to sabhi friend ke bare me jankari lena nahi bhulte the. we alaways remember u. we miss u.
mithilesh
March 6, 2011 at 8:24 am
rohit bhaiya ka aise chala jana yakin bhi to nahi hota…subah jab pata chala to ekbaragi khabar dene wale per baras padana chahata thaa….lekin wah bhi to utna hi dukhi tha…. we mere bade bhai bhi the aur patrakarita ke mere guru bhi. kaam karne ka unaka nirala andaz aur kagaz ki kothari se bsdag nikal aane ki unaki kabiliyat hum jaise kitano ko prerna deti rahegi. unhone kabhi zingi ko jine ke liye rookna ganwara nahi kiya. apne kaam ke nashe me chalte rahe. aur aaz zindagi unse aage nika gai. yuva sansad ke dauran hui pahali mulakat se mere bhi unhi ke peshe me aa jaane tak unhone mere jaise kitno ko apni chintao ka hissa banaya. apane chale jaane tak we hum logon ki khoz khabar lete rahe.bhaiya aap hamesha zinda jahoge… hamaari ummid bankar… hamaari sanse band ho jane tak……[b][/b]