आलोक तोमर को कैंसर परास्त न कर सका. वे तो कैंसर को परास्त करने की पूरी तैयारी कर चुके थे और इसी अभियान के तहत कैंसर वाली गांठ घटकर बेहद मामूली हो चुकी थी. ऐसा कीमियो, रेडियोथिरेपी व इच्छाशक्ति के कारण संभव हुआ. पर अचानक आए हार्ट अटैक ने दिमाग में आक्सीजन के प्रवाह को बाधित कर दिया. इससे ब्रेन हैमरेज हो गया और आलोक तोमर कोमा में चले गए थे.
उम्मीद थी कि वे कोमा से वापस लौट आएंगे और फिर से कैंसर को जीतने के मिशन पर लग जाएंगे पर ऐसा हो न सका. आलोक तोमर के साथ अस्पताल में कई दिन रहे युवा व प्रतिभाशाली पत्रकार मयंक सक्सेना के मुताबिक आलोक सर रुटीन में रेडियो व कीमियोथिरेपी के लिए बत्रा हास्पिटल गए थे. तभी उन्हें अस्पताल में ही हार्ट अटैक हुआ. डाक्टरों के इलाज शुरू करते करते आक्सीजन का प्रवाह दिमाग को बाधित हो चुका था जिससे ब्रेन हैमरेज की स्थिति आ गई. और उसी क्रम में वे कोमा में चले गए जिसके कारण उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़ा. डाक्टर भी आशान्वित थे कि कोमा से लौट आएंगे. डाक्टरों ने आने वाले सोमवार को रिव्यू करने की बात कही थी. इसी कारण सुप्रिया भाभी ने मुझे जबरन घर से होकर आने को कह दिया था और यहां लखनऊ पहुंचा हूं तो आज यह दुखद सूचना मिली है. मुझे अफसोस है कि मैं क्यों लखनऊ लौट आया. मैं रात में ही दिल्ली लौट रहा हूं.
मयंक का कहना है कि आलोक सर ने तो कैंसर को परास्त कर दिया था. पर हार्ट अटैक वाले घटनाक्रम ने सब कुछ किया धरा खराब कर दिया. यकीन नहीं हो रहा है कि आलोक सर इस दुनिया में नहीं है. आलोक सर मर नहीं सकते. वो हम जैसों के लिए हमेशा जिंदा रहेंगे और पत्रकारिता की मिशनरी धारा को आगे बढ़ाने वालों का मार्गदर्शन करते रहेंगे.












shravan shukla
March 20, 2011 at 12:23 pm
श्रद्धांजली….हमारे बीच से एक अत्यंत साहसी,निर्भीक,कद्दावर पत्रकार कभी न भर पाने वाली जगह छोड़कर चला गया।
Ajit Singh
March 20, 2011 at 7:47 pm
आज पहली बार किसी ऐसे के जाने पर तकलीफ हुई जिससे न कभी मिला न कभी बातचीत हुई, व्यक्तिगत रूप से न तो कभी जाना , हा उनके लिखे शब्द सीधे दिल में उतरते थे, उनका निर्भीक तरीका, सर्व ग्राह्य शब्द और एक ठोस रचना, अब शायद कभी पढने को न मिले , अभी कुछ ही महीनो से दतेलिने को पढना शुरू किया था और भारत से दूर परिस में सुबह की शुरुआत उसी से होने लगी…दिल रो रहा है, और कुछ चीजो का अफ़सोस ताउम्र रहेगा, ये उनमे से एक है….अलोक जी को भगवान् स्वर्ग के साथ सबके दिल में जगह और उनके परिवार और हम जैसे क्झाहने वालो को इस असीम दुःख से निपटने की शक्ति दे…
vishal sharma
March 21, 2011 at 3:28 am
जिंदगी बस एक उम्मीद भरी डगर है…मौत एक हक़ीकत है। लेकिन आख़िर दम तक अपने पसंदीदा क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए मौत से रुबरू होने का नसीब कम लोगों को ही मिलता है। आलोक जी आपका जाना दुखद है लेकिन आपका सफ़र सुकुन भी देता है क्योंकि इसमें ये अहसास छिपा है कि अपनी शर्तों पर भी जिदंगी को बख़ूबी जिया जा सकता है। कलम के इस अद्वितीय सिपाही को पूरे सम्मान और गौरव के साथ भावभीनी श्रद्धाजंलि…. विशाल शर्मा,पत्रकार,(जयपुर)