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दुख-दर्द

चिरनिद्रा में आलोक और सुप्रिया की सिसकियां

मुझे मेरे पति अमिताभ जी ने करीब बारह बजे बताया कि यशवंत जी का फोन आया था, आलोक तोमर जी नहीं रहे. मैं यह सुन कर एकदम से अचंभित रह गयी. मैंने आलोक जी से कभी मुलाकात नहीं की थी पर भड़ास पर उन्हें नियमित पढ़ा करती थी, बल्कि सच तो यह है कि मुझे पूरे भड़ास में सबसे अच्छे लेख उन्ही के लगते थे.

मुझे मेरे पति अमिताभ जी ने करीब बारह बजे बताया कि यशवंत जी का फोन आया था, आलोक तोमर जी नहीं रहे. मैं यह सुन कर एकदम से अचंभित रह गयी. मैंने आलोक जी से कभी मुलाकात नहीं की थी पर भड़ास पर उन्हें नियमित पढ़ा करती थी, बल्कि सच तो यह है कि मुझे पूरे भड़ास में सबसे अच्छे लेख उन्ही के लगते थे.

मैं उनकी प्रतिभा और हिम्मत की कायल थी और अक्सर मेरे और अमिताभ जी के बीच उनके बारे में चर्चा हुआ करती थी. मेरे पति यदि आलोक जी के बहुत बड़े प्रशंसक थे तो मैं भी बहुत पीछे नहीं थी. आज के समय जब एक पत्रकार कोई बात लिखने के पहले सौ बार सोचता है और थोडा बहुत भी गलत-सही छाप जाने पर उसके पसीने निकल जाते हैं, ऐसे में आलोक तोमर के लिखे लेख और उनके शब्द अपने-आप में लावे की तरह हुआ करते थे, जो अपने गंतव्य पर जा कर एकदम से पिघलाने का असर किया करते थे.

इसीलिए पति की बात सुन कर मेरे मन में भी एक भयानक झटका सा लगा. एक और बात थी जी मुझे आलोक जी और उनकी पत्नी सुप्रिया जी की ओर खींचती थी. जिस प्रकार से मैं अमिताभ जी के साथ निरंतर रहती हूँ, मुझे यह बताया गया था कि आलोक जी की पत्नी भी बिलकुल सच्ची जीवनसंगिनी की तरह अपने पति के साथ निरंतर चला करती थीं और अपने पति के लिए हर प्रकार का सुख-दुःख झेलने को तैयार रहती थीं. इस रूप में मैं सुप्रिया जी के प्रति बहुत अधिक निकटता और अपनापन महसूस किया करता था.

अमिताभ जी ने कहा कि वे दिल्ली जायेंगे. मैंने एकदम से कहा कि मैं भी आपके साथ चलूंगी. वहाँ पहुँच कर मैंने जब आलोक जी को देखा तो मेरा मन एकदम से उदासी और शोक में डूब गया. वे वहाँ लेटे हुए थे और सामने सुप्रिया जी शून्य में खोयी हुई थीं. साफ़ दिख रहा था कि उन्हें ऐसा सदमा लगा है जिससे वे वर्षों तक नहीं उबार पाएंगी. जिस पति के प्यार में, जिस पति के साहचर्य में और जिस पति के  संसर्ग में वे अपने जीवन के कई साल बड़े प्यार से गुज़ार चुकी थीं आज उन्ही के अचानक बीच रास्ते में निकल जाने के कारण सुप्रिया जी उसी तरह से अचंभित और विचलित दिख रही थीं जैसे किसी आदमी के पैरों के नीचे से अचानक फर्श खींच ली जाए.

मैंने आज यह अनुभव किया कि अपने पति को प्यार करने वाली औरत की मनोदशा उस पति के अचानक गुजार जाने, अचानक चले जाने के बाद कैसी होती है. मैं चाह कर भी सुप्रिया जी की सिसकियो, उनकी आँखों की शून्यता और चेहरे के भावों को भूल नहीं सकती. मैं जानती हूँ और मैंने अपनी आँखों से देखा है कि आलोक जी को बेहद प्यार करने वाली पत्नी मिली थी. पर क्या इसके बदले आलोक जी की भी कुछ जिम्मेदारियां नहीं बनती थी? खुद तो वे चले गए और पीछे !

डॉ नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम, लखनऊ

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0 Comments

  1. Ajit Singh

    March 20, 2011 at 7:50 pm

    आज पहली बार किसी ऐसे के जाने पर तकलीफ हुई जिससे न कभी मिला न कभी बातचीत हुई, व्यक्तिगत रूप से न तो कभी जाना , हा उनके लिखे शब्द सीधे दिल में उतरते थे, उनका निर्भीक तरीका, सर्व ग्राह्य शब्द और एक ठोस रचना, अब शायद कभी पढने को न मिले , अभी कुछ ही महीनो से datelineindiaA को पढना शुरू किया था और भारत से दूर परिस में सुबह की शुरुआत उसी से होने लगी…दिल रो रहा है, और कुछ चीजो का अफ़सोस ताउम्र रहेगा, ये उनमे से एक है….अलोक जी को भगवान् स्वर्ग के साथ सबके दिल में जगह और उनके परिवार और हम जैसे क्झाहने वालो को इस असीम दुःख से निपटने की शक्ति दे…

  2. vishal sharma

    March 21, 2011 at 3:22 am

    जिंदगी बस एक उम्मीद भरी डगर है…मौत एक हक़ीकत है। लेकिन आख़िर दम तक अपने पसंदीदा क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए मौत से रुबरू होने का नसीब कम लोगों को ही मिलता है। आलोक जी आपका जाना दुखद है लेकिन आपका सफ़र सुकुन भी देता है क्योंकि इसमें ये अहसास छिपा है कि अपनी शर्तों पर भी जिदंगी को बख़ूबी जिया जा सकता है। कलम के इस अद्वितीय सिपाही को पूरे सम्मान और गौरव के साथ भावभीनी श्रद्धाजंलि…. विशाल शर्मा,पत्रकार,(.जयपुर)

  3. Dr.Hari Ram Tripathi,Journalist ,LKO

    March 21, 2011 at 3:55 am

    आलोक जी का निधन हम सब के लिए दुखदाई है .

  4. yagyawalkya

    March 21, 2011 at 5:16 am

    आलोक जी का इतने जल्दी चले जाना , सचमुच ही अत्यंत त्रासद है। दरअसल प्रभाष जी जब जनसत्ता के माध्यम से हिन्दी पत्रकारिता को नए तेवर दे रहे थे, तब वे ही नहीं , उनकी टीम के सभी सदस्य अपनी कलम की बदौलत देशभर के पत्रकारों को अपने से लगते थे। बाद मे कई लोगों के स्वर बदलते गए, किन्तु आलोक जी की प्रखरता कायम रही। कई कारणों से मैं भोपाल से दूर सक्रिय पत्रकारिता के स्थान पर केवल पाठक बना रहा हूँ , किन्तु इस नाते भी महसूस कर रहा हूँ कि आलोक जी अभी हमे आपकी बहुत जरूरत थी, जाने की इतनी बेताबी क्या थी? आपके तेवर हमेशा याद आएंगे।
    याज्ञवल्क्य

    बरेली [भोपाल]मप्र

  5. Khushdeep Sehgal

    March 21, 2011 at 7:34 am

    अद्भुत आलोक जी को विनम्र श्रद्धांजलि…न जाने क्यों आज धर्मेंद्र की फिल्म सत्यकाम की शिद्दत के साथ याद आ रही है…

    जय हिंद…

  6. subhash Goel

    March 21, 2011 at 7:48 am

    Alok ji ka dehant hum sab ka liya dukhi kabar hai…Bhagwan unki atma ko Sawarg bakhsae….

  7. andlib

    March 21, 2011 at 3:10 pm

    asamyik aur alpayu men smiritishesh par shabd jo nah hote abhivayakt karne ke liye.

  8. Sageer.a.khaksar

    March 21, 2011 at 4:51 pm

    Alok g jaise patrkar kam paida hote hain.shardhanjali!sageer.a.khaksar,sidharth nagar,u.p.

  9. Brajesh

    March 25, 2011 at 5:14 pm

    शब्द हो गए है मौन मेरे,
    लेखनी हो गयी है मूड
    पर दोस्त मेरे तेरा शुक्रिया कैसे करू
    जिसने मुझे दिया जूनून जीना का ज़माने के लिए
    Brajesh Sharma, INdore/Jabalpur

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