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इस लड़की ने तो गंध फैला रखा है…

[caption id="attachment_16857" align="alignleft"]आलोक नंदनआलोक नंदन[/caption]कई महिला पत्रकार शरीर का इस्तेमाल आगे बढ़ने के लिए करती हैं : कामसूत्री पत्रकारों की नजर नई लड़कियों पर गिद्ध की तरह होती है : पत्रकारिता में होने वाली रंडीबाजी पर राघवेंद्र जी से बात हो रही थी, जमीन पर पत्रकारिता को सींचने वाले राघवेंद्र जी के मुंह से निकला, रंडीबाजी में भी एक एथिक्स है, पत्रकारिता में तो आज कोई एथिक्स ही नहीं है। सुदूर पूर्व के सेवेन सिस्टर राज्यों में जाकर पत्रकारिता करने वाले राघवेंद्र जी आजकल पटना से एक साप्ताहिक अखबार ‘गणादेश’ से पत्रकारिता की लौ को जिंदा रखे हुये हैं। राणाडे, तिलक और गोखले जैसे लोगों ने भी पत्रकारिता किया था, और खूब धूम मचा के किया था, और कहीं न कहीं पत्रकारिता में एक एथिक्स को तो स्थापित किया था। आज राघवेंद्र जी जैसे पत्रकारों को रंडीबाजी में एथिक्स तो दिखाई दे रही है, लेकिन पत्रकारिता में नहीं। क्या वाकई में पत्रकारिता में अब कोई एथिक्स नहीं रहा? दशकों पत्रकारिता में झोंकने वाले राघवेंद्र जी की बात की अनदेखी नहीं की जा सकती। अखिलेश अखिल जो कुछ भी लिख रहे हैं, उसकी सच्चाई पर सवालिया निशान नहीं लगाया जा सकता है। यदि पत्रकारिता में कहीं एथिक्स है भी तो वह दिख नहीं रही है, या फिर कहीं दब-सी गयी है।

आलोक नंदन

आलोक नंदनकई महिला पत्रकार शरीर का इस्तेमाल आगे बढ़ने के लिए करती हैं : कामसूत्री पत्रकारों की नजर नई लड़कियों पर गिद्ध की तरह होती है : पत्रकारिता में होने वाली रंडीबाजी पर राघवेंद्र जी से बात हो रही थी, जमीन पर पत्रकारिता को सींचने वाले राघवेंद्र जी के मुंह से निकला, रंडीबाजी में भी एक एथिक्स है, पत्रकारिता में तो आज कोई एथिक्स ही नहीं है। सुदूर पूर्व के सेवेन सिस्टर राज्यों में जाकर पत्रकारिता करने वाले राघवेंद्र जी आजकल पटना से एक साप्ताहिक अखबार ‘गणादेश’ से पत्रकारिता की लौ को जिंदा रखे हुये हैं। राणाडे, तिलक और गोखले जैसे लोगों ने भी पत्रकारिता किया था, और खूब धूम मचा के किया था, और कहीं न कहीं पत्रकारिता में एक एथिक्स को तो स्थापित किया था। आज राघवेंद्र जी जैसे पत्रकारों को रंडीबाजी में एथिक्स तो दिखाई दे रही है, लेकिन पत्रकारिता में नहीं। क्या वाकई में पत्रकारिता में अब कोई एथिक्स नहीं रहा? दशकों पत्रकारिता में झोंकने वाले राघवेंद्र जी की बात की अनदेखी नहीं की जा सकती। अखिलेश अखिल जो कुछ भी लिख रहे हैं, उसकी सच्चाई पर सवालिया निशान नहीं लगाया जा सकता है। यदि पत्रकारिता में कहीं एथिक्स है भी तो वह दिख नहीं रही है, या फिर कहीं दब-सी गयी है।

मेल और फीमेल के बीच आकर्षण स्वाभाविक है। एक साथ काम करेंगे तो एक दूसरे के प्रति आकर्षित होंगे ही। चाहे वह किसी भी संस्थान में काम करे, पत्रकारिता में या फिर पत्रकारिता से इतर। इस सहज आकर्षण के वशीभूत होकर यदि दोनों के एक दूसरे से अंतरंग संबंध बनते हैं तो यह प्राकृतिक प्रक्रिया होती है। लेकिन जब यही मामला किसी पत्रकारिता संस्थान में होता है, तब यह कई स्तर पर अपना प्रभाव छोड़ता है। जब कोई महिला पत्रकार जानबूझ कर किसी संस्थान में कुछ पाने के उद्देश्य से अपने सीनियर की ओर बढ़ती है, या सीनियर उसे तमाम तरह के दबाव या लोभ देकर अपनी ओर खींचता है, और दोनों अंतरंग संबंध बनाते हैं, तो इसके नकारात्मक प्रभाव की चपेट में वे लड़कियां आती हैं, जो पत्रकारिता में वाकई कुछ करने की भावना से ओतप्रोत होकर आई होती हैं। उन्हें अपने आगे बढ़ने के रास्ते में कई बाधाएं दिखाई देने लगती हैं और फिर कुंठा की शिकार हो जाती हैं।

लंबे समय तक अखबारों में कलम घसीटने के बाद एक इलेक्ट्रानिक मीडिया में काम करने वाली एक महिला पत्रकार के शब्द अपने बास महिला पत्रकार के लिए कुछ इस तरह थे, ”इस लड़की ने तो गंध फैला रखा है, खुद काम जानती नहीं है, फिर भी टीम को लीड कर रही है, और दोगुना वेतन उठा रही है…चार लाइन लिख भी नहीं सकती है…बस लटके झटके जानती हैं।” चैनलों में काम की क्वालिटी का मूल्यांकन बहुत कुछ बास के मूड पर डिपेंड करता है। और बास का मूड बनाने वाली महिला पत्रकार खटने वाली महिला पत्रकारों से ‘काबिल’ होती हैं, कम से कम आजकल के बास के नजर में तो होती ही हैं। चकाचक बीट या डेस्क इनके खाते में होता है। संस्थान के क्वांटेटिव प्रोडक्शन पर इसका कोई असर नहीं पड़ता, और क्वालिटी के मूल्यांकन का कोई निश्चित ग्रामर नहीं है। यहीं पर पत्रकारिता फिसलती है, जिसे संभालने की जरूरत है। दोनों तरह के लोगों पर लगाम कसने के लिए एक मजबूत मैकेनिज्म को इजाद करना होगा, वह सार्वजनिक स्तर का भी हो सकता है, और सांस्थानिक स्तर का भी। दुनिया पर नजर रखने वाले पत्रकारों की नजर से कामसूत्री पत्रकार नहीं बचते हैं। यदि सोचते हैं कि वे बच जाते हैं तो यह उनका भ्रम है। संस्थान में होने वाली कानाफूसी भले ही उनके पद की आभा के सामने टें बोल जाती हो और वे अपना सिलसिला जारी रखने में कामयाब रहते हों।    

कामसू्त्री पत्रकारों की नजर नई लड़कियों पर गिद्ध की तरह होती है। वे नई लड़कियों को चूजा समझते हैं। नई लड़कियों को भी इनकी गिद्ध दृष्टि का अहसास होता है। दिल्ली में इलेक्ट्रानिक मीडिया की एक कैब में पत्रकारिता की दुनिया में नई-नई शामिल होने वाली एक महिला रंगरूट अपनी सहेलियों से एसाइनमेंट डेस्क के प्रमुख बारे में कह रही थी…. कल रात में दढ़ियल का फोन आया था, कह रहा था पिछले दिनों कंडोम वाली खबर तुमने ही की था ना, बाजार में एक महिला कंडोम कल लांच हो रहा है, उसे भी देख लेना। दूसरी महिला रंगरूट ने कहा- साला पूरा ठरकी है, बच के रहना। एक राष्ट्रीय अखबार के हेड आफिस में लोकतंत्र के सैद्धांतिक पैरोकार एक संपादक के बारे में एक ट्रेनी लड़की ने दूसरी ट्रेनी लड़की से कहा- यह तो कुत्ता है। कामसूत्री पत्रकारों और संपादकों की यौन लालसा नई पौध में कुंठा का संचार कर रही है, और इससे कहीं न कहीं पत्रकारिता बुरी तरह से कुंठित हो रही है।   

प्रत्येक पेशे का अपना एक एथिक्स है, जैसे फिल्मी दुनिया में नई-नई हीरोइन को यहां विचरने वाले तरह-तरह के जन्तु वाट लगाते ही हैं। इसके बाद ही वह पर्दे पर चमकने की प्रासेस में आती है। लाइकेबिलिटी और फकेबिलिटी के मापदंड पर खरा उतरने के बाद ही उसे आगे बढ़ाया जाता है, इसके एथिक्स को मेनटेन करते हुये। (बड़े घरानों से आने वाली हीरोइनें इसका अपवाद हो सकती हैं)। इलेक्ट्रानिक मीडिया को भी एक चमकने वाला मीडिया माना जाता है। फिल्म के एथिक्स का साइड इफेक्ट इस पर पड़ना स्वाभाविक है। लड़कियों में चमकने की लालसा होती है, और इसका फायदा ऊंचे पदों पर आसीन कामसूत्री टाइप के पत्रकार उठाते हैं, और ऐसा करने के दौरान पत्रकारिता की पहली शर्त बौद्धिकता को दरकिनार कर देते हैं। पत्रकारिता का एथिक्स यहीं पर दम तोड़ते हुये नजर आता है।  

चमक दमक में पत्रकारिता का एथिक्स अंधरे में कहीं गुम सा होता जान पड़ता है, और यही कारण है कि राघवेंद्र जी बातचीत में अनायस ही कह उठते हैं, रंडीबाजी में भी एक एथिक्स है, पत्रकारिता में तो आज कोई एथिक्स ही नहीं है। तो क्या वाकई में पत्रकारिता एथिक्स विहीन हो गई है? लंबे समय तक जमीनी पत्रकारिता करने वाले राघवेंद्र जी के शब्द पत्रकारिता में एथिक्स की तलाश करने के लिए विवश करते हैं। साथ ही अखिलेश जी के आलेख भी इसी ओर दिमाग को ले जा रहे हैं, क्या वास्तव में पत्रकारिता का एथिक्स कब्र में दफन हो गया है? यदि हां तो, कब्र को फाड़कर इसे निकालना होगा, यही तो पत्रकारिता का प्राण है।  

लेखक आलोक नंदन तेवरदार पत्रकार हैं. इन दिनों मुंबई में फिल्मों से जुड़े हुए हैं. आलोक से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. BRAJESH KUMAR TIWARI

    February 1, 2010 at 11:50 pm

    आपने सही लिखा है इस ढंग की कन्याऐं मीडिया लाइन में ज्यादा ही हैं। जिनकी वजह से काम करने वालों का शोषण हो रहा है और ये मजे मार रही हैं।

  2. rajesh sinha

    February 2, 2010 at 1:17 am

    sahi likha aapne…..kuch chand gandi ladkiyo ne pure media ko ganda kar rakha hai ..aata jaata to kuch nahi bas latke- jhatke dikhayengi …..
    aur uper se unke gidh jaise boss.inko gidh ki nazar se dekhte rahte hai ……….kab moka mile japath liya jaaye………..
    in sab ke beech asal talent chap jaata hai

  3. ANU

    February 2, 2010 at 1:43 am

    आलोक नंदा जी लड़कियों के इस कृत्य को रंडीबाज़ी नही कहा जाता ये अवसरवादिता है
    जहां हरामी पुरूष चरित्र को एक औरत इस्तमाल करती है, स्त्रियों के बारे में दकियानूसी सोच रखने वालों को ये तमाचा भी है … वैसे तो ये एक नासूर है जो समाज के हर तबके को सताता रहा है। आपके ये शब्द उस हर व्यक्ति को आहत करेंगे जो मीडिया में नौकरी करते हैं और जिनका घर उसी नौकरी से चलता है अपने ही पेशे को एसे गंदे शब्दों से बदनाम ना करें आपके लेख से तो एसा लगा जैसे मीडिया को ही रंडियों ने हाइजैक कर लिया है और मीडिया में काम करने वाला हर मर्द रंड़ीबाज़ ही है। आपकी स्पष्ट सोच पढ़ने में अच्छी नही लगी गन्दे शब्द हमारी भाषा और सोच की गंदगी भी दिखाते हैं इनके प्रयोग से बचें. आइंदा इस विषय में आपसे सोच समझ कर लिखे जाने की उम्मीद है , यहां दोनों ही पक्षों के बारे में जितने तर्क दिए जाएं उतने कम है लेकिन एक का नाम लेकर हर महिला के लिए राय बनाना ठीक नही है क्योकि एसी अवसरवादी महिला और पुरूष सहयोगियो की वजह से ‘सदचरित्र पुरूष’ ही नही दफ्तर में चुपचाप काम करते हुए अपने पारिवारिक दायित्वों को निभाने वाली एक महिला पत्रकार भी उपेक्षित हो जाती है…आगे आपकी अपनी सोच है बस हर कोई अपना दामन साफ रखे तो ये बुराइयां सर उठाएंगी ही नही
    … मेरे शब्द आपको चुभ सकते हैं लेकिन इतने ही बुरे आपके शब्द मुझे भी लगे…आगे आप जो ठीक समझे।

  4. Reporter

    February 2, 2010 at 4:28 am

    आलोकनंदन जी चूतिये हैं। मैं इन्हें भड़ास पर खूब देखता हूं।एक नंबर के फ्रस्टू नजर आते हैं।शायद पत्रकारिता में कामयाब नहीं हो पाए तो अपनी कुंठा निकाल रहे हैं। वो ना तो इलेक्ट्रानिक मीडिया को जानते हैं ना प्रिंट को पहचान पाए। सुनी सुनाई बातों पर कलम घिसाई कर रहे हैं। यशवंत भाई इनके सम्मान में आप जो ये लाइन जोड़ते हैं कि ये फिल्म लाइन से जुड़े हैं, जरा बताएं कि वो वहां क्या योगदान कर रहे हैं? कैमरे ढोते हैं या फिर दारू की बोतल। उनके चेहरे और बातों से तो ऐसा ही लगता है।

  5. unknown

    February 2, 2010 at 4:53 am

    alok sir aap bilkul yani 100&#xsa;hi hain.
    main kewal unko ye comment likh raha hoon jinhone ye kaha hai ki “aloknandan ji chutiye hai.”
    commentwaz ke liye comment………
    “bhai aapki kya koi bahan ya wife electronic media mein hai kya?”

  6. Vasant Joshi

    February 2, 2010 at 5:04 am

    Sahi lika hai Alok ne. Media ko tharki log badnam kar rahe hai.

  7. narendra verma

    February 2, 2010 at 6:05 am

    आलोक जी एक बात कहना चाहूगा पत्रकारिता मे आज आप गंदगी की बात कह रहे है परन्तु मे आपसे पूछता हू गंदगी कहां नही है रही बात अखिल जी औऱ आपकी तो मे कहूगा की पत्रकारिता मे कुछ अच्छे लोग भी है तो आप दोनो बुध्दीजीवियो से अनुरोध है कि ऐसा प्रचार न करे की कोई भी लडकी पत्रकारिता मे आना चाहती हो औऱ आप के प्रचार की वजह से अच्छी नीयत वाले लोग भी इस ओर न देखे अखिल जी तो जैसे मीडिया पर कामसूत्र लिखने का ठान चुके है आशा है और कई मुद्दे है लिखने और सुधारने के लिए तो उस और आप लोग ध्यान देगे ,और मीडिया पर इतने हमले ना करे क्योकि बहुत अच्छे लोग भी है यहां पर जिनके मन को ठेस पहुचती है इन बातो से और समाज मे भी आम लोगो मे मीडिया की छवि खराब हो रही है तो आप लोग जिस प्रोफेशन मे रहे हो या हो उसको सुधार करो न कि उसको सरे राह इस तरह बदनाम करो आशा है आप मेरी बात समझे

  8. raj

    February 2, 2010 at 6:23 am

    Alok ji

    Absoluetly right

  9. Ajay Basu

    February 2, 2010 at 8:15 am

    Main bhi ek Journalist hu…lekin sabdo ka prayog Aloknandan bilkul thik nahi karte ya phir inhe Journalist hi na kaha jaye to thik hoga…and pliz dont compare Aloknandan with Prasunji and all…I had seen so many times he had commented against Prasunji on various articles…
    Aloknandan aapni sthar pehchano phir comment ya phir lekh likkho…
    I have a request Yashwantji…dont allow such people to write on bhadas as it distracts the image of bhadas.com as the weapon of journalist

  10. Syed Athar

    February 2, 2010 at 9:20 am

    aalok nada ji media me ko zameer bech kar naukari kar raha hai to ab shareer bechkar naukari karne waale bhi aa gye hai.aapka lekh to theek hai prstutikarn thoda theekha hai.

  11. alok nandan

    February 2, 2010 at 10:08 am

    रिपोर्टर भाई ने जो विशेषण मुझे दिया है…सम्मान उन्हें वापस कर रहा हूं….न्यू मीडिया के अपने अंदाज हैं…लेकिन मैं इतनी तो उम्मीद कर ही सकता हूं कि प्रतिक्रिया देने वाले भाई लोग अपना नाम भी देंगे…ओर क्षमा करे नाम न देने वालों को मैं जवाब नहीं दूंगा….इस न्यू मीडिया पर यह मिनिमम स्वतंत्रता तो मैं ले ही सकता हूं…
    नरेंद्र जी, हम पत्रकारिता को बदनाम करने की नीयत से यह सब कुछ नहीं कर रहे हैं….
    नीयत पर शक मत किजीये…हां आपकी नजर में हमारा तरीका गलत हो सकता है….तो फिर आप ही बताइये कि आखिर किस तरीके का इस्तेमाल करके पत्रकारिता के इस बदलते हुये स्वरूप को सामने लाया जा सकता था….हम अपने घर और आंगन को तभी साफ रख पाएंगे जब हमें पता हो कि गंदगी कहां -कहां पर है,…आपकी इस बात से खुद को सहमत होते हुये पा रहा हूं कि हो सकता है कि इस तरहे के आलेखों का नकारात्मक प्रभाव पत्रकारिता में आने की मंशा रखने वाली लड़कियों पर पड़े।….
    अजय जी आप भी कहां की बात कहां पटक रहे हैं…..यहां पर प्रसून जी को खीच लाना अप्रसांगिक है। हां, शब्दों का प्रयोग आपको ठीक नहीं लग रहा है….आप मेरे कांटेस तक पर इतनी पैनी नजर रख रहे हैं तो आपसे एक गुजारिश करूंगा…..आप मुझे बताये कि मेरा स्तर क्या है…..किसी व्यक्ति के स्तर के मापने का पैमाना क्या है…यदि आपको लगता है कि मैं अपने कांमेट्स या आलेख से टूच्चागिरी कर रहा हूं तो माफ किजीएगा यह कहने के लिए कि पत्रकारिता मेरा पहला और अंतिम प्यार है….और फिर मैं इसको कैसे प्यार करता हूं इसका मूल्यांकन करने का अधिकार कम से कम अब तो किसी को भी नहीं देता हूं…
    सादर

  12. kamal trivedi, printer-publisher, 7days hindi weekly, dhanbad

    February 2, 2010 at 10:35 am

    Alok Nanda jee se Raghvedra jee ki baatchit parhi. main Raghvedra jee ki baat se shat-pratish sahmat huan kee aaj patrakaaritaa main koi athicks nahi rah gayaa hai. vaastav main chaahe randibaji hi kyon na ho, usmain bhi athicks hai, lekin patrakaaritaa main to yah khatm hi ho gayaa. bhaai Raghvendra jee ne patrakaritaa main ek misaal kaayam ki hai. unhonne Jharkhand aur Bihar sahit desh ke kai bhaagon main bahut nikat se patrakaritaa dekhi hai. we jo bhi kah rahen hain apne anubhav ke aadhaar par kah rahen hain. main unse ittafaak rakhtaa haun. bhaai Raghvedra ko dher saari badhai. [quote][/quote]

  13. shaz mahmood

    February 2, 2010 at 10:45 am

    alok ji bilkul sahi or sateek kaha hai aapnai laikin hum kaisai isai roksaktai hain?kya galti patrkar bannai ya status panai kai lia kuch bhi karnai ki chahat ki hai, ya fir un logon ki hai jo aisa chahanai walon ko apnai paas gandai nalai main kheech lanai ki tak mai rahtai hain? kya aisa nahi lagta ki asli jism faroshi to aaj kal media main hoti hai ? hum kyon nahin isko sabkai saamnai latai hain sir yeh batain blogs par ya patrkaron kai beech hi dabti rahti hai .in ko aam admi tak pahuchna chahia iskai lia to purai desh main aik muhim chalni chahia ,mana ki media badnaam hogi lakin media kai woh badai log jo aaj baikhof yeh sab kar rahai hain khofzada hongai or yeh zaroori hai .A JOURNALIST

  14. विनीत कुमार

    February 2, 2010 at 11:57 am

    मर्दों के साथ यही प्रॉब्लम है। थोड़ा सा हंस-बोल लो साथ में बैठकर तो अलग ही मतलब निकाल लेता है। अब देखो न,वो चूतिया स्साला,एक दिन उससे बात क्या कर ली कि अब समझ रहा है कि मैं सो ही जाउंगी…। उसकी भाषा सुनकर हैरान था..मीडिया इन्डस्ट्री ने उसे यही भाषा दी या फिर उसने यही भाषा सीखी या फिर उसके अलावे कोई चारा नहीं था। वो तो पहले मेरे स्साला बोलने पर टोका करती थी कि बहुत गाली देते हो तुम।.

  15. Pankaj

    February 2, 2010 at 12:09 pm

    Bilkul sahi likha hai sir aapne….. patta nahi aaj is patrakarita ko kya ho gaya hai? Bare logo ka naam sunkar to bahut hairani hoti hai…..

  16. anjna singh

    February 2, 2010 at 12:17 pm

    alok ji apka lekh ‘is ladaki ne to gandh phela rakhi hai…’ padkar lagta hai ki aap khaphi achha likhate hai. aapne kaphi satik satik shabdo me likha hai lekin thoda shabdo ka santulan rakhte hue soch samjhkar likhiyega kyunki aap pure mahila patrakaron par kichad uchhal rahe hai. jitna appne randiwaji shabd ke prayog par jor diya hai usase jyada jor randiwajon par dena chahiye tha. i hope aap in randiwajon ki nazar se patrakarita jagat me aane wali ladkiyon ki rakcha karenge. aur in par gidhh ki nazar rakhane wale purush patrakaron ko unke dayitva ka bobh jaroor karenge.

  17. jitendra

    February 2, 2010 at 1:16 pm

    आलोक सर मुझे ये समझ में नही आ रहा है कि आखिर आप मिडिया में फैलती गंध के बारे में बोलते है आखिरकार आप किसे जिम्मेवार ठहराना चाहते है कभी आप संपादक पर निशाना साधते है तो कभी लड़की पर..आखिर कौन है सबसे बड़ा जिम्मेदार

  18. atul

    February 2, 2010 at 1:20 pm

    yah sahi hai ki media me aisi ladkiyo aur aise patrkaro ki kami nahi hai, lekin isme galati dono ki hai. kai ladkiya jaldi aage badne ke chakkr me yah sab karati hai to kuchh log isi baat ka fayada uthate hai.

  19. femail reporter

    February 2, 2010 at 1:41 pm

    aapne media ki kadvi sacchi ko likha hai.jiska saamna amooman har mahila patrkar ko krna padta hai.mahilaon ki kaabiliyat ko pare rakh kr unse kam karwane ki cheshtha ki jati hai.
    alok ji aapke lekh mai payukt shabd bade sapat hai jo seedhe dimad pr padte hai.

  20. Manish

    February 2, 2010 at 2:42 pm

    Alokjee ko patrakar kaun kahta hai? Ek prabuddh patrakar kabhi aisee bhasha ka prayog nahi kar sakta…….. Afsos hai ki aise log bhee khud ko patrakar kahne lage hain aur bane firte hain…

  21. amitvirat reporter

    February 2, 2010 at 2:49 pm

    alok ji hamare samaj mein yahi ek aisa vishay hai jo bhata to sabko hai lekin baat koi nahin karna chahta. aapne ek galti ki yahi lekh aap kisi corporate house par likhte to yahi tathakathit patrakar jo aaj aapko shabdon ke chayan ki bhasha bata rahe hain yahi log maze lekar padte aur aapko badhai bhi dete lekin yahan sawal apni gireban mein jhhankne ka hai to mirchi lag rahi hai. jo log keh rahe hain ki shabdon ka chayan sochsamajh kar karna chahiye wo zara bataiye jin shabdon se unhen mirchi lagi hai wo shabd unke dictionary mein aaye kahan se. yahan sawal kisi ladki ya kisi patrakar ka to hai nahin sawal patrakarita ki vyavastha ka hai. to fir logon ko kyon bura lag rahi hai.is tarah se do char logon ka bhala ho sakta hai lekin saikdon log iski vajah se avshadgrast ho rahe hain unka khya hai kisi ko. kisi ke kisi se vyaktigat sambadh ho sakte hain lekin kisi par dabav bana kar apne bas mein karna kahan ka nyay hai. sabhi ladkiyan to us tarah ki hoti nahin hain lekin giddhon ki nazar to har maans ke tukde par hoti hai.

  22. अंजान

    February 2, 2010 at 5:30 pm

    मुझे तो आलोक जी नहीं, अलबत्ता उनकी निंदा करने वाले फ्रस्टू नजर आते हैं। शायद ऐसी ही अवसरवादी लड़कियों की दलाली कर मीडिया में मजे मार रहे हैं श्रीमान।

  23. avinash kumar jha

    February 3, 2010 at 1:27 am

    bhadash ke yaswant sir ko mera pranam…..ye munch aapne media jagat ki khati mithi chatpati ke sath kuch khas muddo per apne babak tippani ke liye suru kiya…jisme baad me dhero content jurte chale gaye…..is ke fallower bhi ab hazaro ki sankhaya me hai….aise me kisi ke vicharo per kya pratikriya hois per gaur karna sabse mahtvpurn bate hone chhaiye….1..jahan true journalism ki paripati hi daw per lagi hui hai wahan ethics ki baat karna kitna prasangik hoga yeh sochne wali baat hai…..2..yadi kisine ethics ko bachane ki pahal ki hai to unke bato per gaur pharmana hoga..lakin ethics bachane wale ko apne sabdo ko bhi bade kasawat ke sath prastut karna hoga kyonki yahan koi bhi anpadh nahi hai ya kam samajhdar nahi hai….3..kisike vicharo ki prastuti per comments likhane wale bhi patrkarita ke satik sabdo ko gaur farmayan jisse aapki maryada bachi rah sake aur use padh ker kuch visyantrantergat kuch prabhvpurn vichar nikal ker aa sake.
    sriman yaswant ji apne cite ki popularity ko dekhte hue in bato per aapki bhi najar rahe to kafi achha hoga……
    aloknandan ji ko main nahi janta lakin bhadash ke jariye jo baat unne rakhi hai…usme mere hisab se yeh genaralised form me nahi hai..n yadi unhe aisa hote dekha gaya to iska koi thosh way wo nikale to jyada achha ho …na ki bhadash ko medium bana ker apne ko achha bataya jay….wahin apna naam chipa ker alok ji ko apsabd kahne wale to sahi mayne me patrakarita ke paripatike ho hi nahi sakte..jinhe saymit hona na aaye…..
    is munch ka istmal sahi se kiya jay to ek bar phir se patrakarita ko vapas lautaya ja sakta hai,,,sayad yahi kosis bhi yaswant ji ki hai….so plz sabhi varisht ya frasher journalist kalam ko sahi sabdo ke sath rakho jises nai badlao aaye…dhanyabad

  24. KC

    February 3, 2010 at 4:57 am

    [b]आलोक जी आप ने सही लिखा है…
    कुछ लोग तो पत्रकारिता में आते ही इस बात के लिए है… [/b]

  25. ashwani satyadev

    February 3, 2010 at 8:35 am

    alok ji ko namaskar…..aur dhanya hai aapki mahilao ke bare me aisi soch jaisa ki purva me kuch logo ne apko chetaya hai ki sabhi mahilaye ek jaisi nahi hoti is liye aap unke charitra ka is tarah se postmartrm na kariye ye bilkil sahai hai. ham sabhi aaj awasarwadita ke hi duniya me ji rahe hai, aur ham sabhi ko apne awasro ka labh uthane ka pura adhikar hai aur rahi baat mahilao ki tali ek haath se kabhi nahi bajati hai. jis bhi sanstha me aisa mahoul hai us sanstha me mahila aur purush dono barabar ke jimmedar hai..

  26. Pramod Kaushik,News Editor, Sarvottam Times

    February 3, 2010 at 11:05 am

    Dear Alok Nandanji
    samasya bahut gambhir hai, lekin kewal blog par likh dene ya palayan kar jane bhar se hi iska samadhan nahi kiya ja sakata. Iske liye kathin sangharsh karna padega. Lekin afsos yah hai ki hum log kranti ke liye padosi ke ghar mein bhagat sing dhundane ki mansikata ke shikar ho chuke hain. waise bhi gidhhoon ko badhawa dene ke liye bahut had tak ladkiyan hi jimmedar hain. Agar wo samarpit hone ki bajae pratikar karne ki himmat rakhengi to koi na koi Bhagat Singh to aaj ke yug mei bhi jarror mill hi jayega

  27. pankaj

    February 3, 2010 at 1:00 pm

    Mr Alok wont be able to make a good journalist on the basis of either his language or his sociological understanding/sensitivity. His above post is too flimsy. Hindi me kahen to bahut satahi hai. What crap he is letting go on this site. People should protest his writings then raising a finger on Dayanand Pandey’s ‘Apne Apne Yudh’.

  28. prakashpurohit

    February 3, 2010 at 4:40 pm

    is tarah ke lekh se kuchh nahin hotaa .damgurdaa hai to naam sahit chhaapen .

    sirf jugupsaa jagaate hain aise lekh .vichaar par baat honaa chaahiye .
    is tarah ki harkaten har jagah hoti hai . bas naam kaa hi fark hai .
    yadi vaakaee kuchh karanaa hai to naam sahit chhaapen .

  29. alok nandan

    February 3, 2010 at 5:39 pm

    श्रीमान पंकज जी, भाषा को लेकर जो आप आपत्ति कर रहे हैं वह सिर आंखों पर…मर्यादित भाषा का हिमायती मैं भी रहा हूं…जहां तक पत्रकारिता का सवाल है, तो भाषा को लेकर इसमें भी लगातार प्रयोग होते हैं…सौंदर्य और तहजीब से ओतप्रोत संस्कृत और उर्दू के शब्दों की जगह चलताऊ शब्दों का जोरदार प्रयोग किया है, और ऊपर से तूर्रा यह देते आये हैं कि वह जनता की बात जनता की भाषा में रख रहे हैं…कुछेक अखबारों ने तो हिंग्लिश तक का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया है…और न्यूज चैनलों की भाषा तो आप छोड़ ही दिजीये…यदि इनके द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले शब्दों को एक कोश का रूप दिया जाये तो वह नये युग के शब्दों को लेकर तथाकथित प्रयोगवादी मीडिया का एक नया चेहरा प्रस्तुत करेगा…कहने का यह अर्थ है कि इस न्यू मीडिया (नेट) पर भाषा को लेकर हो-हल्ला मचाना समय की बर्बादी के अलावा और कुछ नहीं है….जहां तक सामाजिक समझ और संवेदनशीलता की बात है तो मैं इतना ही कहूंगा कि मैं भी इस समाज का ही प्राणी हूं…अरस्तु के शब्दों में जो व्यक्ति समाज से बाहर रहता है वह या तो ईश्वर है या फिर दानव। किताबों में समाज और समाजशात्र की जो परिभाषाएं दी गई है उसी आलोक में कहाना चाहूंगा कि जैसा समाज होगा वैसा ही व्यक्ति होगा…इससे इतर यह भी कहा जा सकता है कि जैसा व्यक्ति होगा वैसा ही समाज होगा। इन दोनों उक्ति के तराजू पर आज मीडिया को तौल कर देखिये…इस सवाल का जवाब दिजीये कि मीडिया समाज गलत है इसलिये मीडिया के लोग गलत है या फिर मीडिया के लोग गलत है इसलिये मीडिया समाज गलत है? रही बात संवेदनशीलता की, तो दिनकर के शब्दों में …..

    मुझे मिली अमा गहन,
    चंद्रिका कहां से लाउँगा,
    जो कुछ सीख रहा जीवन में,
    आखिर वही सिखाउंगा।
    मीडिया के उजाले पक्ष को तमाम तरह के शैक्षणिक संस्थान बड़े-बड़े ब्रोशर बनाकर रख रहे हैं, चूंकि उनको अपनी दुकान चलानी है…यदि मैं इसके अंधेरे पक्ष को देख-सुनकर कह रहा हूं तो कहां गलत हूं? भाषा को गोली मारिये….हर मीडिया संस्थान की अपनी वर्तनी होती है…इस न्यू मीडिया को थोड़ा अपने लौ में दौड़ने दिजीये…नहीं तो इसके लिये एक वर्तनी बनाकर सार्वजनिक किजीये….मैं वादा करता हूं, कोई और पालन करे या ना करे मैं उस वर्तनी का पालन पूरी सख्ती से करूंगा।
    अश्वनी जी, मैं सभी महिलाओं को एक पलड़े में नहीं रख रहा हूं…मै एक महिला पत्रकार को जानता हूं जिसके दिमाग और कलम में आग थी, लेकिन उसके साथ काम करने वाले लोग उसे सनकी कहा करते थे, और उससे खौफ भी खाते थे। वह जूझती रही और टूटती रही…इंशाअल्लाह आज वह सम्मानित जगह पर है, लेकिन उसे हिन्दी पत्रकारिता से अंग्रेजी में पलायन करना पड़ा। पत्रकारिता में वैसी जिजीविषा वाली महिलाओं के सम्मान में गर्दन खुद पर खुद झूक जाता है…आप मेरे आलेख फिर से पढे़। इस आलेख की जो हेडिंग आ रही है वह भी किसी महिला के ही शब्द हैं… और मै उस महिला का भी सम्मान करता हूं और उन जैसी तमाम महिला पत्रकारों का भी मैं सम्मान करता हूं। चीजों को सही संदर्भ में देंखे।
    मनीष जी मैं इस बात से इनकार करता हूं कि मैं एक प्रबुद्ध पत्रकार हूं…साथ ही इतना जरूर कहूंगा कि मैं एक पत्रकार हूं, और मैंने विधिवत पत्रकारिता का कोर्स भी किया है। मेरे पास विश्वविद्यालय का डिग्री भी है।
    जीतेंद्र जी….अभी मीडिया के बदलते हुये स्वरुप को रखने की कोशिश कर रहा हूं, संपादक जिम्मेदार है या लड़की, यदि मीडिया हाउस में दोनों मिलकर गंध फैलते हैं और बेहतरीन प्रतिभाओं के रास्ते में बाधक बनते हैं तो दोनों समान रूप से जिम्मेदार हैं…निजी स्तर पर वे कुछ भी करतें फिरे, उनकी मर्जी। उनके हरकतों से कोई फ्रेशर भी इस ओर कदम बढाने के लिए प्रेरित होता है तो वे जिम्मेदार हैं।
    पंकज जी…..भगत सिंह ने एसेंबली में बम क्यों फोड़ा था?? बहरी ब्रिटिश सरकार के कानो तक अपनी बात पहुंचाने के लिए…मीडिया को हांकने वाले लोगों की खाल मोटी है…आलांकारिक शब्दों का इनपर असर नहीं होता….विनम्र शब्दों में कहता हूं कि भाषा को लेकर थोड़ी सी लिबर्टी लिया हूं….वह भी इसलिये क्योंकि न्यू मीडिया यह लिबर्टी देता है। क्षमा चाहूंगा आगे भी यह लिबर्टि लेता रहूंगा…इस विषय को लेकर समर्थन देने वाले सभी पत्रकार और गैर पत्रकार भाइयों को तहे दिल से शुक्रिया…..और विरोध करने वालों को फ्लाइंग किस…..
    सादर

  30. Robin

    February 3, 2010 at 6:19 pm

    Bhayiio
    Akhil ji ko bhi “TRP” ki zaroorat hai.
    “Blog ki TRP” jo inko mil bhi rahi hai- “Ek news channel bhi isi tarah ki TRP se khus hota hai”
    usi tarah AKHIL JI bhi khus hain.

  31. रेखा सोनी

    February 4, 2010 at 2:52 am

    बात आपने जो बताई सच है लेकिन उतनी नहीं , जितना आपने इसको असमाजिक शब्दों से प्रयोग किया….हां सुना मैने भी है कि लड़कियां शार्ट कट लेकर आगे बढ़ रही है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मीडिया में सारी लड़कियां हीं ऐसी हो…..जिस तरीके से आपने एक पक्ष पर सारा दोष डाला है वो कतई न्यायपूर्ण नहीं हैं,…..
    आप कौन-से दूध के धुले होंगे….आपने भी कभी-कभी ट्राई तो जरुर मारा होगा….मगर आगे बढ़ने का लड़कियों ये तरीका और मर्दों का उनको आगे बढ़कर इस्तेमाल करने का तरीका ..उनकी परवरिश को दर्शता है..जिन्होने शायद अपने घर-परिवार से ऐसी सिख ली…..मीडिया में हर उसको जगह दों जो वाकये मेहनती और टेलेनटिट हो…न कि बाजारु, जिस्म का धंधा करने वाले….
    अगर ऐसे सब करके आगे बढ़ना हीं है तो ऐसे इंसान को मीडिया में नहीं …..जिस्मफरोशी के धंधे में होना चाहिए…..गलती से रास्ता भटककर वो मीडिया में आ गया है..गंद फैलाने….क्योकिं उसकी राह तो धंधा थी…न कि पत्रकारिता…..समाज के प्रति असली ‘उत्तरदायित्व’………..

    और आप जब भी लिखें……पक्षपाती होकर न लिखें…..और न तो उसे पूरे वर्ग से जोड़े…क्योकिं मीडिया में ऐसी भी लड़कियां है…..जो मेहनत और काबलियत से आगे बढ़ना चाह रही है.लेकिन आपके लेख से मोस्टली लोग मीडिया में लड़कियों को गंदी .नापाक नजरों से देखंगे…और उन्हें मात्र जिस्मानी कहेंगे…..जो काबिल लोगों की प्रगति में रोड़ा है…..

  32. Rizwan Chanchal lucknow

    February 4, 2010 at 7:44 am

    Aaj ke is badalte pariwesh me bhala kaun nahi aage nikalna chata yeh bat aur hai ki kisi ko sammanjanak tareeke se aage badna behtar lagta hai aur kisi ko samman taq per rakhker aage badna ras aata hai waise is tarah ki gandagi to Aloki ji her jagah hai lekin use sare aam karke aur itne khule sabdo me likhker bhi door kiya jana possible nahi lagta .

  33. bharat desai

    February 4, 2010 at 10:11 am

    aapne jo likha he vo bilkul sahi to nahi kaha jata,

  34. amit singh baba

    February 4, 2010 at 2:30 pm

    alok g ki kalam se unki aulat air cjaritra ka pata chala. jis peshe me we mahilao ko is najar se parakhte hai we apne ghar me bhi aise he khayal rakhte hoge to kisi ko chaukna nahi chahiye. aise he log samaj ki beemari bane huye hain. aise he log balatkar jaise ghatnao ko anjam dete hai. sharm karo alok ki apko bhadas4media ne apko apni bhadas nikalne ka mauka diya.jiske chalte ke apradh karne se aap bach gaye. nahi to kabhi ap balatkari k roop me surkhiyon me hote.

  35. alok nandan

    February 4, 2010 at 4:31 pm

    अमित जी , साइको एनालिसिस करने के लिए धन्यवाद…तो आप कलम पढ़कर औकात और चरित्र बताते हैं…वाह, क्या बात है….बेहतर होता आप तथ्यों पर बात करतें…तथ्यों की एनालिसिस करते….वैसे मेरे घर का दायरा बड़ा है…वो बात आपके समझ में नहीं आएगी….इन चीजों के सामने विवश होने वाली किसी लड़की को आत्महत्या की मानसिकता में आपने देखा है….उन लोगों को शर्म नहीं आती जो यह सब कर रहे हैं,.??….वैसे जो सहजता से इस शोषण के तंत्र को हाथ में नचा कर लड़कियों के साथ जो कुछ कर रहे हैं वो भी बलात्कार नहीं करेंगे….नहीं तो कितने लोग बलात्कारी के रूप में सुर्खियों में होते….

  36. Poonam

    February 5, 2010 at 12:47 pm

    Wah Alok ji kitni aasani se apne mahila patrkaro par lanchan laga diya.. Likhte hue yeh tak nai socha ki apke es lekh se mahila patrkaro ki chhavi par kitna bura prabhav padega.. Jisko khuch likhne ko nai mila usne socha kyu na mahilao ke bare mein hi likh liya jaye.. Alok ji aap un mardo ke bare mein kyun nahi likhte jo aise shokh rakhte hai.. Aise boss ke bare mein kyu nai likhte jo chahte hai ki har time mere cabin mein koi mahila bathi rahe.. Apke lekh ne sari mahila patrkaro par ungali utai hai.. Apne kalam ka estemal khuch aacha likne ke liye kijiye..

  37. alok nandan

    February 6, 2010 at 2:07 pm

    पूनम जी, शायद आपने ठीक से इस लेख को नहीं पढ़ा है..सारे महिला पत्रकारों की उर मैं ऊंगली नहीं उठाई..उन महिलाओं की बात की है जो पत्रकारिता मे शाटकट मारने के चक्कर में वो सब करती है जो उन्हें शोभा नहीं देती…और उनके इस रवैये से मेहनती महिला पत्रकारिता को भी नुकसान होता है..पत्रकारिता तो क्या जीनव के हर क्षेत्र में महिला फोर्स की मैं कद्र करता हूं…
    सादर

  38. MAHENDRA JAIN

    May 25, 2010 at 7:50 pm

    ALOKJI AND SABHI SUDHI PATRAKAR GAN IS MADHAYAM KO EK ESTAR PRADAN KARE JO BHI LIKHIE VAH ESA HO KI USAKA ASAR DUR DUR TAK HO NINDA BHI PRASHANSNIYE TARIKE SE HO SUBJECT BHAHUT ACHHA HAI NARI SAB PER BHARI HAI YAH EK SACHA HAI JO KI ABHI ABHI PRAGAT HUA HAI ESLIYE NARI PER AB TO ACHHA LIKHE TAHANKYOU

  39. sangeeta

    July 18, 2010 at 6:40 pm

    E****-grade writing…….koi journalist aisa nahi likh sakta….:-*

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