फेसबुक से दुखी क्यों हैं भाई लोग?

त्रिनिदाद और टोबैगो दक्षिण अमेरिका का एक छोटा सा देश है। आबादी और आकार में अपनी दिल्ली से भी छोटा। मगर इन दिनों यह देश खबरों में इसलिए हैं क्योंकि यहां भारतीय मूल की कमला प्रसाद विसेसर प्रधानमंत्री चुनी गई है। वे दुनिया में भारतीय मूल की पहली महिला प्रधानमंत्री हैं और उनके पूर्वज पूर्वी उत्तर प्रदेश से 1810 में मजदूरी के लिए इस देश में पहुंचे थे। खबर तो यह भी है लेकिन कमला विसेसर ने अपना पूरा चुनाव अभियान फेसबुक के जरिए चलाया। उनकी फेसबुक पर चवालीस हजार सात सौ तिरासी सदस्य बुधवार सुबह तक थे।

सवा करोड़ आबादी वाले देश में मतदाता भी साठ लाख से ज्यादा नहीं है। कमला विसेसर ने लगातार फेसबुक का इस्तेमाल किया और उन्हें अपनी नीतियों के अलावा पास के मतदान केंद्रों के बारे में भी बताती रही। उधर अचानक एक अभियान चल पड़ा है जिसमें फेसबुक के बहिष्कार की मुहिम चलाई जा रही है। अब तो महाराष्ट्र सरकार ने भी केंद्र सरकार से कहा है कि मुस्लिम और ईसाई संगठनों के विरोध की वजह से फेसबुक पर प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए। इन समूहों का कहना है कि फेसबुक पर धर्म विरोधी टिप्पणियां और चित्र होते हैं। पाकिस्तान सरकार ने पहले ही फेसबुक को प्रतिबंधित कर दिया है। महाराष्ट्र के अतिरिक्त गृह सचिव चंद्रा अयंग्गर ने केंद्रीय गृह सचिव जी के पिल्लई को पत्र लिख कर फेसबुक को प्रतिबंधित करने के लिए कहा है और इसके प्रति की एक कॉपी सूचना तकनीक मंत्रालय को भी भेजी गई है।

महाराष्ट्र के मुस्लिम संगठन तो कहने लगे हैं कि अगर सरकार फेसबुक के खिलाफ कार्रवाई नहीं करती तो वे सड़कों पर आंदोलन करेंगे। यही हाल ईसाई संगठनों का है। फेसबुक की स्थापना 2004 के फरवरी महीने में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के छात्र मार्ग जुकैरबर्ग ने अपने हॉस्टल के साथी एडुवर्डो सोबरेन, जस्टिन मोकोविच और क्रिस यूथ के साथ मिल कर की थी। शुरूआत में इसकी सदस्या सिर्फ हारवर्ड विश्वविद्यालय के छात्रों तक सीमित थी मगर बाद में बॉस्टन तथा दूसर विश्वविद्यालयों तक इसके सदस्य बनने लगे। आखिरकार दुनिया में कहीं भी तेरह साल से ज्यादा उम्र का कोई भी व्यक्ति फेसबुक पर अपना खाता खोल सकता हैं।

अब पूरी दुनिया में फेसबुक के चालीस करोड़ सदस्य है और यह संसार की सबसे सोशल नेटवर्किंग साइट बन गई हैं। जैसे हॉटमेल के समीर भाटिया के साथ हुआ था, वैसे ही फेसबुक को जल्दी ही आर्थिक मदद मिलने लगी। पहली मदद तो जून 2004 में ही पांच लाख डॉलर की मिली थी और देने वाले थे पे पैल भुगतान कंपनी के मालिक पीटर थील। एक साल बाद एक करोड़ सत्ताइस लाख डॉलर की पूंजी एस एल पार्टनर से मिली और फिर 27 करोड़ डॉलर की पूंजी ग्रोलॉक पार्टनर से मिली। फिर भी 2005 तक फेसबुक इकतीस लाख डॉलर के घाटे में थी। खरीददार आ रहे थे मगर जुकैर बर्ग ने ऐलान कर दिया कि वे फेसबुक को बेचेंगे नहीं।

28 मार्च 2006 को बिजनेस वीक ने छापा कि फेसबुक को पिचहत्तर करोड़ डॉलर का खरीद प्रस्ताव मिला था जो उसने खारिज कर दिया और दो अरब डॉलर का प्रस्ताव सितंबर 2006 में याहू ने दिया। फेसबुक के बोर्ड में आ चुके इसके पहले निवेशक ट्विटर थील ने कहा कि फेसबुक की कीमत आठ अरब डॉलर से कम नहीं हो सकती क्योंकि 2015 तक यह हर साल विज्ञापनों से ही एक अरब डॉलर कमाने की हैसियत में होगा। 17 जुलाई 2007 को जुकैर बर्ग ने फिर कहा कि हम न फेसबुक के शेयर निकालेंगे और न इसे बेचेंगे। सितंबर 2007 में माइक्रोसॉफ्ट जैसे महाबली यानी बिल गेट्स ने ऐलान किया कि उसने फेसबुक में चौबीस करोड़ डॉलर लगा कर 1.6 प्रतिशत शेयर खरीद लिए हैं। फेसबुक का बाजार भाव अब तक पंद्रह अरब डॉलर हो चुका था। माइक्रोसॉफ्ट ने फेसबुक पर विज्ञापन सेवा शुरू करने के अधिकार भी खरीद लिए। नवंबर 2007 में हांगकांग से छह करोड़ डॉलर का निवेश हुआ।

अक्टूबर 2008 में जुकैर बर्ग ने कहा कि सोशल नेटवर्क का आर्थिक ढांचा सर्च इंजन की तरह नहीं हो सकता और अगस्त 2009 से फेसबुक ने दूसरी नेटवर्किंग साइट खरीदनी शुरू कर दी। पहली साइट उन्होंने फ्रेंड फीड खरीदी जो जीमेल बनाने वाले इंजीनियर पॉल बुकेट ने बुनाई थी। सितंबर 2009 में फेसबुक ने पहली बार लाभ की घोषणा की। इस साल फरवरी 2010 में अपनी छठवीं वर्षगांठ पर फेसबुक ने मलेशिया के ऑप्टीजम साल्यूशन को खरीद लिया और 2 अप्रैल 2010 को फोटो शेयरिंग सर्विस डीबी शॉट खरीदी।

फेसबुक का विरोध करने वाले इल्जाम लगा रहे हैं कि फेसबुक में जो परिर्वतन किए गए हैं उससे उनकी निजी जानकारी सार्वजनिक हो सकती हैं। इसलिए फेसबुक छोड़ने के लिए पूरी दुनिया में अभियान चलाने वाले फेसबुक के खिलाफ वेबसाइट बना रहे हैं और अगर इनके आंकड़ों पर विश्वास किया जाए तो इस 28 तारीख को करोड़ों लोग फेसबुक से नाता तोड़ देंगे। यह खबर मिलने पर फेसबुक पर अपने लगभग पांच हजार दोस्तों के बीच मैंने एक ओपिनियन पोल करवाया। एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं था जिसे फेसबुक से कोई तकलीफ हो और वह इतने शानदार मीडिया माध्यम को छोड़ना चाहता हो। कुछ देशों ने फेसबुक को प्रतिबंधित किया है लेकिन चीन और इराक जैसे ये देश प्रतिबंध के अपने कारण बताते हैं। इनका फेसबुक की तकनीक या प्राइवेसी से कोई संबंध नहीं है। आप फेसबुक पर हैं तो खुद तय कर के देख लीजिए कि आखिर आपको इससे क्या दिक्कत आ रही है?

लेखक आलोक तोमर जाने-माने पत्रकार हैं.

Comments on “फेसबुक से दुखी क्यों हैं भाई लोग?

  • Dr Matsyendra Prabhakar says:

    Alok ji, mujhe facebook join kiye bahut din nahin huye lekin yah zaroor lagta hai ki yah vibhinna fabrics ke logon ko jodne ka behtarin madhyam ban gaya hai, ab koi iska durupayog karne par hi utaroo ho jaye to kya kaha ja sakta hai. 60 sal men hamen apna samvidhan 100 bar se adhik badlna pada hai. Haan facebook valon ko yah avashya sunishchit karna chahiye ki sadharantaya log ismen sendhmari na kar saken.

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  • madan kumar tiwary says:

    फ़ेस बुक अच्छी जगह है । मैं खुद वहां tiwarygaya के नाम से हूं । अपने बहुत सारे परिवार से वहीं मिला। सामाजिक कार्यकर्ता भी मिले । मुझे तो कभी कोई बुराई नजर नही आई । जहां तक धार्मिक टिप्पणियों का सवाल है तो नेट पर बहुत कुछ उपलब्ध है। किस किस को हटाओगे । गुजर गया वह जमाना जब सता, सरकार, न्यायालय कुछ भी प्रतिबंधित करने के लिये आज़ाद थें । ब्लाग ने देसाई , संघवी,प्रभू, बरखा जैसों की नकेल कसने का काम किया है। यह तो अच्छा है फ़ेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साईट अमेरिका जैसे मुल्कों से संचालित हैं, वरना एशियायी मुल्क , जिसमें हमारा देश भी शामिल है, में बैठे गंदे लोग इसकी हत्या कर देते। आप इसी से समझ जाओ की मेरा जैसा आदमी जो किसी से नही डरता वह भी न्यायपालिका के बारे में सिर्फ़ अपने ब्लाग पर हीं लिख पाता है। दुर्भाग्य है कि मैं इस पाखंडी देश का नागरिक हुं।

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