जमानत पर चलता एक चैनल

आलोक तोमरउनमें धार भी है और रफ्तार भी। उत्तर प्रदेश के एक गांव से निकल कर लगभग आधी दुनिया का चक्कर लगाने के बाद पहले दिल्ली फिर इंदौर और वापस दिल्ली आकर बिल्डर साम्राज्य खड़ा किया है उन्होंने। दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा की अदालतों में उनके खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और अमानत में खयानत के अलावा साजिश करने के इतने मामले हैं कि गिनती उनके वकीलों को ही याद होगी।

तिहाड़ जेल में कुछ दिन काट चुके हैं और एक टीवी चैनल चला रहे हैं जिसका प्रचार वाक्य है- धार भी, रफ्तार भी। बात एस वन चैनल के विजय दीक्षित की हो रही है जिन पर गलत सूचनाएं देने का इल्जाम हाल में साधना टीवी ने लगाया है। इस इल्जाम का कोई जवाब नहीं दिया गया। एस वन टीवी चैनल 2004 में बनना शुरू हुआ था और 2005 में इस पर प्रसारण शुरू हुए। शुरू में यह एनसीआर यानी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का चैनल था और ठीक ठाक चल रहा था। नामी पत्रकार इनके यहां काम करते थे। लेकिन कुल मिला कर धंधा धोखे का था। दक्षिण दिल्ली के सीरी फोर्ट रोड पर एक शानदार इमारत में जो पहले होटल हुआ करती थी, इस चैनल की स्थापना की गई। बाद में पता चला कि इमारत ही फर्जी है। नगर निगम को जो नक्शा दिया गया था उससे दोगुना निर्माण हुआ और नक्शे का उल्लंघन तो दरवाजे से ही शुरू हो गया।

जब सीलिंग अभियान शुरू हुआ तो केजे राव की टीम आ कर चैनल की इमारत को सील कर दी। मगर फिल्म अभिनेता राजपाल यादव के बुजुर्ग संस्करण विजय दीक्षित ने एक और तरीका निकाल दिया। पिछले दरवाजे को सील नहीं किया गया था और उसी से लोग अंदर जा कर टीवी चैनल चलाते रहे। के जे राव को पता लगा तो वे दोबारा आ कर सील कर गए। पीछे जो जनरेटर चल रहा था उसे भी उठा कर थाने में रखवा दिया गया।

चैनल नोएडा की एक इमारत में आया। इमारत का नाम है सीनियर मॉल। दरअसल विजय दीक्षित को सीनियर शब्द के साथ इतना मोह है कि उनका हर काम सीनियर होता है। वे सीनियर बिल्डर के मालिक हैं, एस वन चैनल का मतलब सीनियर मीडिया लिमिटेड है। एक पत्रिका निकाली जिसका संस्थापक संपादक मैं था, उसका नाम भी सीनियर इंडिया रखा गया। बस कसर रह गई तो यह कि विजय दीक्षित ने अपना नाम बदल कर सीनियर दीक्षित नहीं रख लिया। उनके बेटे का नाम समीर दीक्षित है जो फिलहाल मरणासन्न एस वन चैनल को चला रहे हैं। कर्मचारियों को संयोग से ही कभी कभार वेतन का एक हिस्सा मिल जाता है। बहुत दिनों तक तो किसी को नियुक्ति पत्र ही नहीं दिया गया मगर प्राविडेंट फंड और आयकर सबका कटा। जाहिर है कि एक भी पैसा सरकार के पास जमा नहीं हुआ।

विजय दीक्षित को भारत की अदालतें किस नजर से देखती है इसका एक उदाहरण आपके सामने है। सीनियर बिल्डर ने गुड़गांव में एक सीनियर डेस्टिनेशन मॉल बनाई थी और इस मामले में पेसिफिक ग्रीन इंफ्राकॉन से तालमेल किया था। बाद में शिकायतें आई कि एक ही दुकान कई-कई लोगों को बेच दी गई और विजय दीक्षित इसका इल्जाम अपनी साझेदार कंपनी पर लगाते हैं। एक दुकान खरीदने वाले यश मनोज पांडा ने पुलिस में शिकायत की तो पता चला कि विजय दीक्षित ने पेसिफिक के सुमन मल्होत्रा से फरवरी 2007 में साझेदारी का सौदा किया था जो इस साल फरवरी में खत्म हो गया हैं। सीनियर बिल्डर्स ने सभी खरीददारों को पिछले साल दिसंबर में ही दुकाने देने का वादा किया था मगर इसे पूरा नहीं किया गया। करोड़ो रुपए लगा चुके लोगों ने दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा में मामला दर्ज कर लिया।

विजय दीक्षित दिल्ली की फास्ट ट्रैक कोर्ट में जमानत के लिए भागे भागे गए और अदालत ने रिकॉर्ड देख कर कहा कि अभियुक्त आदतन अपराधी जान पड़ता है इसलिए उसको अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती। इसके पहले गुड़गांव की एक अदालत ने भी चालबाजी के एक मामले में दीक्षित की जमानत खारिज कर दी थी और चंडीगढ़ उच्च न्यायालय ने इस पर स्थगन आदेश दिया हुआ हैं। गुड़गांव के ही सेक्टर 53 में सेंट्रल प्लाजा नाम का एक और मॉल सीनियर बिल्डर ने बनाया था। नियमानुसार हरियाणा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति ली जानी चाहिए थी मगर वह ली नहीं गई। बोर्ड के आदेश पर मॉल की बिजली काट दी गई। मॉल में जो लोग तरह तरह की दुकाने चला रहे थे, विजय दीक्षित से संपर्क करने की कोशिश करते रहे लेकिन भाई ने फोन नहीं उठाया।

सेंट्रल प्लाजा के खरीददारों ने एक एसोसिएशन बनाई और उसके अध्यक्ष राजपाल सिंह बाजवा ने बताया है कि सीनियर बिल्डर ने उनसे बिजली और रख रखाव के मद में 65 लाख रुपए लिए मगर बिजली विभाग को जमा नहीं किए। बाद में अदालत के आदेश पर पैसे जमा किए गए मगर सिर्फ 55 लाख रुपए। जब बिजली कटी तो दुकानदारों ने ही चंदा कर के पैसे दिए। प्रदूषण बोर्ड के अधिकारियों के अनुसार उन्होंने विजय दीक्षित को कई बार पत्र भेजे थे मगर कभी कोई जवाब नहीं आया। बोर्ड के अधिकारियों के अनुसार तो यह पुलिस का कर्तव्य है कि ऐसे ठग बिल्डर को गिरफ्तार करे। ठगी का आरोप पुलिस में दर्ज करवाया गया है लेकिन पुलिस इसे अभी तक गंभीरता से नहीं ले रही।

दिल्ली उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर जाएं तो विजय दीक्षित के खिलाफ इतने मुकदमे हैं कि वे एक नहीं छह पन्नों में खत्म होते हैं। फिर भी विजय दीक्षित मर्सडीज में चलते हैं, शांति निकेतन जैसी भव्य कॉलोनी में एक भव्य मकान में रहते हैं। यह बात अलग है कि उनके टीवी चैनल या पत्रिका के किसी पत्रकार या कर्मचारी पर काम के सिलसिले में ही अगर कोई कानूनी मामला दायर हो जाए तो उसे वह मुकदमा अपने खर्चे पर लड़ना पड़ता है। विजय दीक्षित के वकीलों ने शायद उन्हें पीआरबी एक्ट पढ़ कर नहीं सुनाया।

लेखक आलोक तोमर वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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Comments on “जमानत पर चलता एक चैनल

  • MAYANK SAXENA says:

    Where is our friend Rvi Sharma.? Sacked? Silenced? or speechless.Now that Milan Gupta has given the documents, he must speak.

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  • ek aur nahin bhai ..madhyapradesh se chalne wale time today ki halat bhi aisi hi hai.. mahinon se tankhwah nahin dee hai.. yahan tak ki buildig ka kiraya bhi nahin diya hai kahin par.. sab kuch jamanat par hi chal raha hai..

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  • sushil Gangwar says:

    Kya media ko bukhaar yaa lakva mar gaya hai . Har tv chennal or Newspaper ki halat etni bekaar hai to aane vale time me media ka bhavishya kya hoga. Mujhe lagta hai , En logo ke pass arvo rupya hai magar apne karamchariyo ko dene ke liye kuchh nahi hai ? Har din ek TV chennal or Newspaper ka uday ho raha hai . Media me naukri ki mara mari chal rahi hai . Jugaad hai to naukri mil jayegi or jugaad nahi jindgi khud ek jugad ban jaati hai . Hamre desh ke saaf suthri chhavi vale bade patrakaar chhokri dekh kar naukri ka jhasa to de hi dete hai . Sach kaha jaye to ujaale me gore dikhne vale dil bahut kaale hai . पापा कहते थे कि बेटा बड़ा होकर बड़ा अधिकारी बनेगा -गाडी बंगला नौकर चाकर मुफ्त में मिलेगे ? बेटे ने तो टीवी देखकर देखकर कुछ और बनने का मन बना लिया था। वह भी एक पत्रकार। आज पत्रकारिता जगत में करांति है , हर बंदा लिखना और छपना चाह रहा है । नौकरी की बात करे तो जिसका जुगाड़ है वह नौकरी कर रहा है । अगर नौकरी मिल जाये तो वेतन इतना कम की गुजारा भी न हो सके – आखिर करे तो क्या करे । इसलिए नए पत्रकारों ने नयी राह पकड़ ली है । थोडा सा पैसा और जुगाड़ है तो stingership मिल जाती है . फिर वेतन कहा से आये . कभी कभार स्टोरी टीवी पर लग जाती है तो पैसा मिल जाता है. नहीं तो उलटे सीधे काम करो। इसलिए पत्रकारिता का ग्राफ गिरता जा रहा है । आज १०० लोगो में से १५ के पास ही नौकरी है । जो लोग नौकरी कर रहे तो पेट ही पाल रहे है । मै जीवन में कितने पत्रकारों से मिला, कुछ तो वीकली , मंथली पपेर magazine और केबल चेन्नल के सहारे ही जिन्दगी बसर कर रहे है . हम दूसरे सेक्टर की बात करे तो अच्छी नौकरी और अच्छा पैसा मिल रहा है ।
    Sushil Gangwar
    http://www.sakshatkar.com

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  • Rajeev Sharma says:

    आप श्रद्धेय प्रभाष जी के प्रिय रहे हैं। मुझे विश्वास करने में मुश्किल हो रहा है। मुझे यह कहते हुए शर्म आती है कि आप “वरिष्ठ पत्रकार” हैं। आप जिन लोगों के आगे पत्नी के साथ झुक-झुक कर चार लाख रुपये माफ करने और मुकद्द्मा वापस लेने की मिन्नतें करते हैं, बाद में उन्हीं लोगों को आप “दाउद” जैसे विशेषण से संबोधित करते हैं…. “जमानत पर चलता एक चैनल” लिखते हैं…यह आपका चरित्र है… आप जैसे चारित्रिक कंगले को तो किसी की जमानत की जरूरत हो सकती है। भूलिएगा मत, आप आपराधिक मामले में जमानत पर चल रहे हैं… एस वन नहीं…। आप स्वयं सीनियर मीडिया लिमिटेड से जुड़े रहे हैं। जिस सीनियर इंडिया मैग्जीन का जिक्र आप कर रहे हैं…और व्यंग कर रहे हैं कि ….अपना नाम सीनियर दीक्षित रख लेते…तो श्रीमान आप तो उस मैग्जीन के संस्थापक संपादक रहे हैं…आपके व्यंग में आप स्वयं को श्रेय दे रहे हैं क्या…।
    क्या आप बता सकते हैं…बड़े-बड़े हिंदी-अग्रेंजी प्रिंट और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया हाउस क्या बिल्डर्स और बिल्डर्स जैसे धंधो से पैसा लाकर मीडिया हाउस में नहीं लगा रहे हैं…
    अच्छा एक बात और है कि…आप उन संस्थानों की एमसीबीसी कर रहे हैं, जिन्होंने आपको कभी प्रश्रय दिया था…क्या अब आप बुढ़ापे में “मुसलमां” बनने चले हैं…या फिर एक-एक से पुरानी खुन्नस निकाल रहे हैं…एक दिन पहले आपने जैन टीवी और डा. जेके जैन के बारे में ऊल-जलूल लिखा…आज आप एस वन और श्री विजय दीक्षित के बारे में ऊट-पटांग लिख रहे हैं…. कहीं आप मति भ्रष्ट/मति भ्रम के शिकार तो नहीं हो गए हैं… आपको याद होगा कि.. आपने भी एक बार सीनियर इंडिया मैग्जीन के संस्थापक संपादक रहते हुए तिहाड़ जेल की यात्रा की। @Alok Tomar: DAWOOD KE GANG MAIN RAH KAR USKI KHILAF BOLNE KI HIMMAT NAHI HAI TOA SWEEKAR KIJIYE…AUR KAHIYE KI NAUKRI SE JAANE KE BAAD HEE NAMAK HARAMI KAR SAKTE HAIN…NAUKRI KE DAURAN DAWOOD KO DAWOOD KAHNE KI HIMMAT NAHI HAI…MR. VIJAY DIXIT TIHAR GAYE THAE TOA USKI WAJAH BHI AAP THE…YE AAP LIKHNA KYON BHOOL GAYE…SANSTHAPAK SAMPADAK KI HAISIYAT SE AAPNE PAIGAMBAR KA PHOTO CHCHAPA THAA, KHAMIYJA DIXIT JI KO BHI BHARNA PADAA THAA….. ACHCHCA, AGAR YE SAB…MATLAB DR. JAIN AUR DIXIT JI, DAWOOOD THAE TOA AAPNE INKI NAUKRI KYO BAJAYI…KYA WAJAH THEE.

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  • Alok Tomar says:

    RAJIV SHARMA, SUDHAR JAO BETA.. LAMBEE ZINDAGEE HAI, AUR JIS DIN HAQIKAT PATA CHAL ZAAYEGEE. MEREE SHUBHKAAMNAYEN AUR SAMVEDANAYEN TUMHARE SAATH HAIN.

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  • आलोक तोमर says:

    विजय दीक्षित तिहाड़ जेल क्यों पहुंचे थे?
    आलोक तोमर
    एस वन चैनल के मालिक विजय दीक्षित की कलई खोली तो कई प्रतिक्रियांए आई। ज्यादातर पीठ ठोकने वाली थी और एक ऐसी थी जो मेरी नीयत पर सवाल उठा रही थी। एस वन में काम करने वाले एक एंकर ने सवाल दागा था कि आप खुद एस वन के राजनैतिक संपादक और उनकी पत्रिका सीनियर इंडिया के संपादक रहे हैं और अब नमक हरामी कर रहे है। ये मित्र अपनी नौकरी बचा रहे हैं और उनसे अपन को कोई बैर नहीं है।
    लेकिन अब तथ्यों की बात हो जाए। सीनियर इंडिया पत्रिका छह महीने में तीस हजार से ज्यादा बिकने लगी थी और इंडिया टुडे हिंदी तक से नोटिस आया था कि आपका कवर हमारे कवर से इतना मिलता क्यों हैं? जाहिर है कि वे डर गए थे। उसी दौरान दिल्ली के तत्कालीन पुलिस आयुक्त के के पॉल के बेटे के कई कारनामे सामने आए और जब के के पॉल से बात की तो उन्होंने कहा कि आप सवाल फैक्स कर दीजिए। सवाल फैक्स किए गए और तीन दिन बाद दिल्ली पुलिस के एक वांछित अभियुक्त की ओर से कानूनी नोटिस आया कि आपने पुलिस कमिश्नर से जो सवाल पूछे हैं उनका जवाब हमसे ले लीजिए।
    जाहिर है कि के के पॉल और अपराधी मिले हुए थे। हमने लेख छाप दिया। जिस दिल्ली में पुलिस का बीट कांस्टेबल भी अपने इलाके को अपनी जागीर समझता है, वहां पुलिस कमिश्नर से टकराना कितनी कठिन बात हो सकती है यह मुझे तिहाड़ जेल जा कर पता लगा। मामला अदालत में हैं इसलिए इसके कानूनी पहलूओं पर नहीं जाऊंगा मगर सिर्फ इतना कहूंगा कि डेनमार्क के हजरत मोहम्मद के एक डाक टिकट साइज के कार्टून को छापने के इल्जाम में मुझ पर सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने का आरोप लगाया गया था जबकि लेख में कार्टून बनाने वालों की खाट खड़ी की गई थी।
    विजय दीक्षित जो एस वन और सीनियर मीडिया और सैकड़ों मुकदमों में फंसे सीनियर बिल्डर के मालिक हैं, भी तिहाड़ जेल पहुंच गए। वे अपने करमों से वहां पहुंचे थे। परंपरा यह है कि अगर किसी भी संस्थान में संपादक के खिलाफ कोई पुलिस मामला दर्ज किया जाता है तो संस्थान उसका साथ देता है। मगर विजय दीक्षित तो कमाल की चीज निकले। अपने चैनल के कैमरे के सामने खड़े हो गए और पूरी दुनिया को बताया कि हमसे गलती हुई है, हमे माफ कर दीजिए और यह भी कि हमने अपने संपादक आलोक तोमर को बर्खास्त कर दिया है। विजय दीक्षित डर गए थे और इसी डर ने उन्हें मेरा सहअभियुक्त बना दिया और तिहाड़ जेल पहुंचा दिया। वहां वे शौचालय की बगल में जमीन पर सोते थे।
    जहां तक मेरी बर्खास्तगी की बात है तो यह अपने आप में मजेदार रहस्य है। मुझे तो कभी नियुक्ति पत्र ही नहीं मिला, बर्खास्त क्या खाक किया जाता। तथाकथित बर्खास्तगी की चिट्ठी पर पता लिखा था वह भी मेरा नहीं था। मतलब इतने बड़े मीडिया संस्थान को अपने संपादक का पता तक मालूम नहीं था। इसलिए मेरी नौकरी भगवान रजनीश की तरह थी जो न कभी मिली और न कभी गई। बस कुछ समय तक होती रही। जहां तक नमक हरामी का सवाल है तो सीनियर इंडिया नाम की तब अज्ञात पत्रिका को अपने संपर्कों से कोई पच्चीस लाख रुपए के विज्ञापन दिलवाए और इतना तो वेतन भी नहीं लिया।
    एक और मामला है जो कभी रौशनी में नहीं आया। ज्यादा लोगो को पता नहीं हैं। मेरी तिहाड़ जेल की एक और यात्रा हुई और वह भी जालसाजी के मामले में। जालसाजी का आरोप विजय दीक्षित ने ही लगाया था और तब लगाया था जब मुझे ’’बर्खास्त’’ हुए छह महीने हो चुके थे। कमाल यह था कि आम तौर पर आतंकवादियों और देशद्रोहियों को पकड़ने वाली स्पेशल सैल को मेरी गिरफ्तारी के लिए लगाया गया था। गिरफ्तारी भी बड़े नाटकीय तरीके से हुई थी। रायपुर में मुख्यमंत्री रमन सिंह के साथ खाना खाया था और दिल्ली में जब जहाज से मैं और मेरी पत्नी सुप्रिया उतरे तो स्पेशल सैल के आठ सब इंस्पेक्टर, दो इंस्पेक्टर और एक एसीपी मुझे पकड़ने के लिए खड़े थे। मामला फर्जी था इसलिए अदालत से पहली सुनवाई में खारिज हो गया।
    अब वापस आइए कार्टून वाले मुकदमे पर। इस मुकदमे में मेरा नाम अदालत में अब भी सीनियर इंडिया के संपादक के तौर पर पुकारा जाता है। मगर मुकदमे का एक भी पैसा सीनियर मीडिया या विजय दीक्षित ने खर्च नहीं किया। उन्हें नोटिस दिया तो जवाब नहीं आया। बाकायदा नियम है कि किसी संस्था के कर्मचारी पर अपना काम करने के सिलसिले में मुकदमा चले तो उसका खर्चा संस्थान उठाता है। मगर नियमों को मानते तो विजय दीक्षित के पीछे आज दो राज्यों की पुलिस नहीं पड़ी होती।
    मेरे मुकदमें में जो खर्च हो रहा है वह मैं अदालत के जरिए विजय दीक्षित से ले कर रहूंगा। वह मेरा हक है। अभी तक मैंने सिर्फ चैनल पर ताला लगवाया है मगर विजय दीक्षित की इतनी चोरियां मुझे पता हैं कि अगर लिखना शुरू कर दिया और अदालत को बता दिया तो उनका सारा ताश के पत्तों का साम्राज्य एक पल में बिखर जाएगा। लेकिन मैं ब्लैकमेलिंग पर उतरने वालों में से नहीं हूं। मुझे मालूम है कि कानून मेरे साथ है और मैं न्याय पा कर ही रहूंगा। यह कहानी है मेरे और सीनियर मीडिया के रिश्तों की। किसी और को कुछ और पूछना हो तो अपने सवाल मुझे भेज दे।

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  • Rajeev Sharma says:

    श्रीमान आलोक तोमर जी, मेरा भी 25 वर्षों का पत्रकारिता का करियर है। आप के विषय में ढेर सारी जानकारियां उपलब्ध हैं… मुरैना से घूम फिर कर दिल्ली तक…सुधरने की बारी अब आपकी है…सीएनएबी छोड़ने के बाद क्या इनके बारे में भी कुछ लिखने बाले हैं…जरा शब्दों पर नियंत्रण रखें…आप लिखने के बाद खुद फंस जाते हैं…

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  • CNEB chhodne ke baad kinke baare me likhne ki baat kr rhe hai rajeev ji? Baat adhuri rah gyi puri kr dijiye.

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  • Harendra Chaudhary says:

    अच्छा एक बात और है कि…आप उन संस्थानों की ;D एमसीबीसी ;D कर रहे हैं, जिन्होंने आपको कभी प्रश्रय दिया था…क्या अब आप बुढ़ापे में “मुसलमां” बनने चले हैं…
    ;););) भाई राजीव जी, जरा एमसीबीसी का मतलब समझा दो, खोल कर, कुछ समझ नहीं आया??????;D;D;D

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  • rajiv singh says:

    हंसी आ रही है. आलोक तोमर पर कोई अनजान राजीब शर्मा सवाल कर रहे हैं. २५ साल से पत्रकारीय जीवन में होने का दावा करते हैं. मगर उन्हें कोई नहें जानता . राजीव आलोक जी के प्रशंशक अगर मूतेंगे तो एस -१ बह जायेगा.आलोक तोमर ने जनसत्ता, यूनीवार्ता बीबीसी और आजतक में वही काम किया है. उनकेबारे में तो कुछ नहीं लिखा. चमचे तू आलोक जी के शरण में जा. और उनकी पत्नी का नाम लिखा तो साहिबाबाद में आ कर ठोकेंगे. रही कार्टून वाले केस के बात, तो आलोक तोमर ने कहीं गुनाह कबूल किया तो दिक्सित भी अन्दर हो जाय्रगा.. आलोक जी तो श्रीमती दिक्सित को बागन बोलते हैं और तू…………………

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  • senior india ka kartoon wala mamla sirf alok sir ko phasanai kai lia tha jabki woh yeh samjhana chahatai thai ki videshi log aik dharm ka mazak uda rahai hai or yeh bardash kai kabil nahin hai ,sir ka saath denai kai bajai sathi hi ilzaam laganai lagai sharm ki baat hai DESH KAI SARAI MUSLIMS ALOK JI KAI SAATH HAIN

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  • @rajiv singh: आपकी अल्प बुद्धि…और श्रीमान आलोक तोमर के लिए मूतने के लिए आप और आप जैसे लोगों के लिए साधुवाद…वैसे, आप जैसे प्रशंसक सिर्फ हिलाते हैं…क्योंकि हिलाते-हिलाते आपकी आदत हिलाते रहने की पड़ गई है… आप सही कह रहे हैं गधे कई संस्थानों में पंजीरी खा चुके हैं…कहीं-कहीं गधे अब भी पंजीरी खा रहे हैं…
    भौंकने वाले कुत्ते काटते नहीं है…झूठ बोलने वालों का हर झूठ उनकी नजर में सच्चा होता है…अंदर कौन जाएगा…ये अदालत तय करेगी आप नहीं…हां श्रीमति दीक्षित को आलोक जी बहन बोलते हैं…कंस भी देवकी का भाई था….और आप दाल-भात में मूसलचंद….

    @ALOK TOMAR: शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद, ईश्वर से अपने लिए भी कुछ मांग लीजिए….आपको बहुत आवश्यकता है सद-बुद्धि…मैं आश्वर से आपके लिए प्रार्थना कर रहा हूं…आप भी शुरू कर दीजिए…छोड़िए ये लिखना…आपका वानप्रस्थ का समय आ रहा है…

    @Harendra Chaudhary: सच्चे मन से बताओ…प्रतिक्रिया दूं…

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  • @Prem: भाई प्रेम जी, समझदार को इशारा काफी है…माफ कीजिए इससे ज्यादा फिल्हाल कहना उचित नहीं है…

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  • vijay singh says:

    alok ji, aap kitane hi patrakaro ke liye aadarsh hai. rajiv sharma jaise chirkut patrakaro ki bat par dhyan nahi dena chahiye. aap media maliko ke bare me jo bolte hai sahi hota hai………

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  • Harihar singh says:

    नमक हराम हैं आलोक तोमर
    आलोक तोमर एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, और कहीं पढ़ा कि वे प्रात:स्मरणीय स्वर्गीय प्रभाष जोशी के शिष्य रहे हैं। इस पोर्टल पर छपे उनके ‘एस-1; चैनल के मालिक विजय दीक्षित के संबंध में आलेख और सभी कमेंटस् पढ़ गया। घोर निराशा हुई। चूंकि दिल्ली के न्यूज चैनलस् और अखबारी दुनिया को बहुत नजदिक से देखता-सुनता रहा हूं, बहुत आश्चर्य भी नहीं हुआ। पहले आलोक तोमर की बात। विजय दीक्षित की बखिया उघेडने वाले तोमर बेहतर हो पहले आईने के सामने खड़े हो जाये। स्वयं को प्रभाष जोशी का शिष्य कहने वाले आलोक तोमर वही हैं जिनको ‘न्यूज रुम; में खबर के साथ हेराफेरी करने के आरोप में प्रभाष जोशी ने ‘जनसत्ता; से निकाल बाहर किया था। विजय दीक्षित के जेल जाने की खबर को प्रचारित करनेवाले आलोक तोमर लोगों को यह भी बता देते तो अच्छा होता कि उनकी करनी के कारण ही विजय दीक्षित को भी जेल जाना पड़ा था। विजय दीक्षित ने अलग से कोई अपराध नहीं किया था। आलोक तोमर दोबारा जेल गए तिहाड़ जेल गए तो चार सौ बीसी और धोखाधड़ी के आरोप में जेल से छुटे तो विजय दीक्षित की मेहरबानी के कारण ही। आलोक तोमर का यह दावा बिल्कुल झूठा है कि कमजोर मामले के कारण अदालत ने पहली ही पेशी में मुकदमा खारिज कर दिया। अदालत की कार्यवाही प्रमाणित करेगी की विजय दीक्षित के अनुरोध पर अदालत ने मामला बंद कर दिया था। विजय दीक्षित ने अदालत में मामला बंद करने का अनुरोध आलोक तोमर की पत्नी सुप्रिया और अनेक मित्रों की अनुशंसा पर किया था। इनमें अनेक पत्रकार भी शामिल थे। सभी लोग तोमर के भविष्य को लेकर चिंतित थे। आलोक तोमर के खिलाफ मामला इतना पुख्ता था कि उन्हें पांच-सात वर्षों के लिए जेल की हवा खानी पड़ती। विजय दीक्षित और उनकी पत्नी ने आलोक व उनके परिवार पर तरस खाकर मामला वापस ले लिया था। अदालत ने मामला खारिज नहीं किया था। आलोक तोमर जालसाजी के आरोप में स्वयं तो जेल गए ही थे, साथ में अपने एक सहयोगी और एक बैंक अधिकारी को भी जेल हवा खिला दी थी। तोमर ने इन लोगों के भविष्य की भी चिंता नहीं की थी। मुझे यह पढ़कर दुख लगा कि जिस विजय दीक्षित ने मानवीय आधार पर आलोक तोमर, एक संपादकीय सहयोगी और बैंक अधिकारी के खिलाफ मुकदमा वापस लिया अथवा समझौता कर लिया। उसी विजय दीक्षित को तोमर ने नंगा करने की कोशिश की है। ऐसा कोई अत्यंत ही गिरा हुआ व्यक्तिही कर सकता हैं। ऐसे व्यक्ति को एहसानफरोश कहा जाता है। क्या अब भी आलोक तोमर नमक का हक अदा करते हुए अपनी घिनौनी हरकतों से बाज आएंगे। या नमक हरामों की पंक्ति में दिखना पसंद करेंगे।

    Reply
  • मिलन गुप्ता says:

    विजय दीक्षित का एक और चमचा बोला. ये हरिहर सिंह कौन हैं और क्या बेचते हैं. 200 रुपये के चेक पर भी खुद दस्तखत करने वाला 4 लाख छोड़ देगा? खुद जालसाज़ है और अदालत के रकार्ड देख लो तो चक्कर आ जाएगा. गिनाना शुरू करू?. कार्टून मामले में दीक्षित जेल गया था क्योंकि कायरों की तरह उसने माफी मांगी थी और उसी आधार पर सह अभियुक्त बन गया. जालसाजी का कसे असली होता तो एइसे ही”बापस” नहीं हो जट्टा न्यायमूर्ति, कोई हरिहर सिंह की तरह अनपढ़ नहीं होते. नमक आलोक तोमर ने दीक्षित का नहीं बल्कि अपनी का खाया था और वेतन से ज्यादा पैसे के विज्ञापन ला कर दिए थे.

    Reply
  • Harihar singh says:

    भाई मिलन गुप्ताजी, जिस मामले में अदालत और दस्तावेज गवाह हैं, उस मामले पर तू-तू, मैं-मैं ठीक नहीं। अगर आप लोगों को सच बताना चाहते हंै तो अदालत में आलोक तोमर के खिलाफ जालसाजी वाले मामले पर आदेश की प्रतिलिपि लेकर इस न्यूज पोर्टल पर छपवा दें। सभी को सच का पता चल जाएगा। किसी के चिल्लाने से या बार-बार झूठ बोलने से अदालत का आदेश बदल नहीं जाएगा। आपको चुनौती है कि आप आलोक तोमर के जालसाजी मामले पर न्यायमूर्ति के आदेश की कॉपी इसी ‘भड़ास4मिडिया’ के पोर्टल पर प्रकाशित कर दें। पाठक सच जान जाएंगे। जहां तक आलोक तोमर द्वारा विज्ञापन देने का मामला है, गुप्ताजी शायद आपको पता ही होगा कि आलोक तोमर ने ऐसे ही दो विज्ञापन के भुगतान का चेक मध्यप्रदेश के जनसंपर्क विभाग से प्राप्त कर ‘स्टेट बैंक ऑफ इंदौर’ जी के – 2, नई दिल्ली ब्रांच में ‘सीनियर इंडिया’ के नाम से एक बोगस खाता खुलवाकर चेक जमा कर भुना लिया था। आलोक तोमर ने अपने सहयोगी भगतसिंह रावत से ‘सीनियर इंडिया’ के प्रोपरायटर के रूप में दस्तख्त करवा दिया। बेचारा रावत भी इसी कारण गिरफ्तार होकर तिहाड़ जेल पहुंच गया था। दिल्ली पुलिस में रावत का बयान दर्ज है। रावत ने अपने बयान में कहा है कि उसने आलोक तोमर के कहने पर जालसाजी की। मिलन गुप्ताजी अगर आप चाहें तो रावत के बयान को ‘भड़ास’ पर भेज दूं।

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  • Milan Gupta says:

    [b]CORT DOCUMENTS IN ALOK TOMAR/SENIOR MEDIA CASE[/b]

    IN THE HIGH COURT OF DELHI AT NEW DELHI
    Criminal MC No. ________ of 2008

    In the Matter of:

    Alok Tomar & Ors. …Petitioners

    -Vs-

    State [Through Special Cell] & Anr. …Respondents

    AFFIDAVIT

    I Satbir Singh son of Sh. Giriraj Singh resident of __________________, New Delhi- 110 0__ aged about __40___ years do hereby solemnly affirm and declare as under:
    1.That I work as Manager Administration with the Complainant Company, Respondent No.2, and have been authorized by the Board of Senior Media Ltd. having their corporate office at 1/1 Shanti Niketan, New Delhi- 110 021 to depose the present Affidavit.
    2.That Respondent No.2 through me had entered into a settlement with the Petitioners and I solemnly affirm that the Settlement Agreement filed herewith as Annexure- P/2 is true and correct and has been signed by me on being authorized by the Board of Senior Media Limited vide resolution dated 27.12.2007.
    3.That I on behalf of Respondent No.2 hereby declare that we have settled all our disputes with the Petitioners and am filing this Affidavit in support of the petition for quashing under section 482 Cr. PC of FIR No. 450/2006 registered with police station CR Park under section 420/468/471/120-B IPC and I state that we have no objections if the said FIR No. 450/2006 registered with police station CR Park is quashed.
    4.That I have informed the Investigating Officer of the case FIR No. 450/2006 of the said settlement and I state that Annexure-P/4 is true and correct.
    DEPONENT
    Verification:
    Verified at New Delhi on this day of January 2008 that the contents of the above Affidavit are true and correct and that no part of it is false and that nothing material has been concealed there from.
    DEPONENT

    IN THE HIGH COURT OF DELHI AT NEW DELHI

    Criminal MC No. ________ of 2008

    In the Matter of:

    Alok Tomar & Ors. …Petitioners

    -Vs-

    State [Through Special Cell] & Anr. …Respondents

    PETITION UNDER SECTION 482 OF THE CRIMINAL PROCEDURE CODE FOR QUASHING OF THE FIR NO. 450/2006 REGISTERED WITH POLICE STATION CR PARK UNDER SECTION 420/468/471/120-B OF THE INDIAN PENAL CODE INVESTIGATED BY SPECIAL CELL OF DELHI POLICE

    TO,
    The Hon’ble Chief Justice Of
    Hon’ble High Court Of Delhi
    And his Companion Judges
    of the High Court of Delhi

    The humble petition of
    The petitioners above named

    Most Respectfully Showeth:

    1.That the Petitioners are accused in FIR No. 450/2006 registered with the CR Park police station under section 420/468/471/120-B of the Indian Penal Code and was investigated by the Special Cell of the Delhi Police.

    2.That Respondent No.2 filed a complaint against its onetime employees, Petitioner No.1 & 2, which was transferred for investigation to Respondent 1, Special Cell of Delhi Police, on 26.10.2006 by the orders of the then worthy Commissioner, Delhi Police.

    3.That the Respondent No.2 got registered the instant FIR No. 450/2006 as they alleged that the cheques due from Directorate of Public Relations, Government of Madhya Pradesh, Bhopal for the advertisements inserted in their February edition of the magazines published by them were encashed by Petitioner No. 2 for a total sum of Rs. 3, 78, 588/-. The typed copy of the FIR along with its true English translation is filed herewith as Annexure-P/1.

    4.That the Petitioners are on regular bail and the charge sheet in FIR No. 450/2006 under section 420/468/471-120-B of the Indian Penal Code has been filed against the Petitioners before the Learned Court of Additional Chief Metropolitan Magistrate, Tis Hazari Courts and is fixed for 13.2.2008 for consideration of the application of the Accused Persons/ Petitioners for supplying of the deficient copies of the statements and evidences. The charge has not been framed against the Accused Persons/ Petitioners.

    5.That the Petitioners and Respondent No.2 on 27.12.2007 amicably resolved their disputes by entering into an Agreement whereby amongst others it was resolved that the parties are thereafter left with no civil or criminal claims against each other and the Respondent No.2 shall join the Petitioners for quashing the FIR No. 450/2006 registered with CR Park police station under section 420/468/471/120-B IPC. The original settlement agreement dated 27.12.2007 along with its true typed copy is filed herewith as Annexure-P/2.

    6.That the Respondent No.2 through their letter dated 29.12.2007 also informed the Investigating Officer of FIR No. 450/2006 about the settlement arrived at between the complainant/ Respondent No.2 and the accused persons/ Petitioners. The copy of the letter written to the Investigating Officer of the case along with the letter of authority of the person signing the letter along with its true typed copy is filed herewith as Annexure-P/3.

    7.That Respondent No.2 through its authorized representative is also filing an Affidavit in support of this instant petition for quashing of FIR No. 450/2006 under section 420/468/471/120-B IPC. The duly notarized Affidavit is filed herewith as Annexure-P/4.

    8.That the Petitioners crave the indulgence of this Hon’ble Court to quash the FIR No. 450/2006 for the following amongst other grounds:
    A]Because the complainant and the accused persons have amicably settled their disputes.
    B]Because no purpose would be served for continuing with the trial as the complainant and the petitioners have settled all their disputes by executing the agreement, dated 27.12.2007.
    C]Because the Petitioners will have to suffer through the hardship of trial even after the disputes have been settled.
    D]Because the complaints against the Petitioners have been withdrawn and as such the FIR No. 450/2006 needs to be quashed.
    E]Because the complainant having settled their disputes no legal evidence would be available to continue with the trial and the chances of conviction would be bleak.

    9.That the inherent jurisdiction of this Hon’ble High Court is being invoked in order to secure the ends of justice and also that the Petitioners have no efficacious remedy available to them other than preferring the instant petition.

    10.That the Petitioners have not filed any similar petition under section 482 Cr. PC for quashing of the FIR No. 450/2006 registered with police station CR Park before this Hon’ble Court or before the Hon’ble Supreme Court of India.

    11.That Annexure- P/2 is filed in original and Annexures P/1, P/3, P/4 & P/5 attached to this petition are the true copies of their respective originals.

    PRAYER
    It is therefore most respectfully prayed that this Hon’ble Court may be pleased to quash the FIR No. 450/2006 registered with police station CR Park, New Delhi under section 420/468/471/120-B IPC and the proceedings initiated thereto and may pass such other and further order(s) as this Hon’ble Court may be pleased in the facts and circumstances of the case.

    Petitioners
    Through
    Place:New Delhi
    Dated:

    Reply
  • Milan Gupta says:

    I
    [u][b]SOME MORE DOCUMENTS[/b][/u]

    iN THE HIGH COURT OF DELHI AT NEW DELHI

    Criminal MC No. ________ of 2008

    In the Matter of:

    Alok Tomar & Ors. …Petitioners

    -Vs-

    State [Through Special Cell] & Anr. …Respondents

    PETITION UNDER SECTION 482 OF THE CRIMINAL PROCEDURE CODE FOR QUASHING OF THE FIR NO. 450/2006 REGISTERED WITH POLICE STATION CR PARK UNDER SECTION 420/468/471/120-B OF THE INDIAN PENAL CODE INVESTIGATED BY SPECIAL CELL OF DELHI POLICE

    TO,
    The Hon’ble Chief Justice Of
    Hon’ble High Court Of Delhi
    And his Companion Judges
    of the High Court of Delhi

    The humble petition of
    The petitioners above named

    Most Respectfully Showeth:

    1.That the Petitioners are accused in FIR No. 450/2006 registered with the CR Park police station under section 420/468/471/120-B of the Indian Penal Code and was investigated by the Special Cell of the Delhi Police.

    2.That Respondent No.2 filed a complaint against its onetime employees, Petitioner No.1 & 2, which was transferred for investigation to Respondent 1, Special Cell of Delhi Police, on 26.10.2006 by the orders of the then worthy Commissioner, Delhi Police.

    3.That the Respondent No.2 got registered the instant FIR No. 450/2006 as they alleged that the cheques due from Directorate of Public Relations, Government of Madhya Pradesh, Bhopal for the advertisements inserted in their February edition of the magazines published by them were encashed by Petitioner No. 2 for a total sum of Rs. 3, 78, 588/-. The typed copy of the FIR along with its true English translation is filed herewith as Annexure-P/1.

    4.That the Petitioners are on regular bail and the charge sheet in FIR No. 450/2006 under section 420/468/471-120-B of the Indian Penal Code has been filed against the Petitioners before the Learned Court of Additional Chief Metropolitan Magistrate, Tis Hazari Courts and is fixed for 13.2.2008 for consideration of the application of the Accused Persons/ Petitioners for supplying of the deficient copies of the statements and evidences. The charge has not been framed against the Accused Persons/ Petitioners.

    5.That the Petitioners and Respondent No.2 on 27.12.2007 amicably resolved their disputes by entering into an Agreement whereby amongst others it was resolved that the parties are thereafter left with no civil or criminal claims against each other and the Respondent No.2 shall join the Petitioners for quashing the FIR No. 450/2006 registered with CR Park police station under section 420/468/471/120-B IPC. The original settlement agreement dated 27.12.2007 along with its true typed copy is filed herewith as Annexure-P/2.

    6.That the Respondent No.2 through their letter dated 29.12.2007 also informed the Investigating Officer of FIR No. 450/2006 about the settlement arrived at between the complainant/ Respondent No.2 and the accused persons/ Petitioners. The copy of the letter written to the Investigating Officer of the case along with the letter of authority of the person signing the letter along with its true typed copy is filed herewith as Annexure-P/3.

    7.That Respondent No.2 through its authorized representative is also filing an Affidavit in support of this instant petition for quashing of FIR No. 450/2006 under section 420/468/471/120-B IPC. The duly notarized Affidavit is filed herewith as Annexure-P/4.

    8.That the Petitioners crave the indulgence of this Hon’ble Court to quash the FIR No. 450/2006 for the following amongst other grounds:
    A]Because the complainant and the accused persons have amicably settled their disputes.
    B]Because no purpose would be served for continuing with the trial as the complainant and the petitioners have settled all their disputes by executing the agreement, dated 27.12.2007.
    C]Because the Petitioners will have to suffer through the hardship of trial even after the disputes have been settled.
    D]Because the complaints against the Petitioners have been withdrawn and as such the FIR No. 450/2006 needs to be quashed.
    E]Because the complainant having settled their disputes no legal evidence would be available to continue with the trial and the chances of conviction would be bleak.

    9.That the inherent jurisdiction of this Hon’ble High Court is being invoked in order to secure the ends of justice and also that the Petitioners have no efficacious remedy available to them other than preferring the instant petition.

    10.That the Petitioners have not filed any similar petition under section 482 Cr. PC for quashing of the FIR No. 450/2006 registered with police station CR Park before this Hon’ble Court or before the Hon’ble Supreme Court of India.

    11.That Annexure- P/2 is filed in original and Annexures P/1, P/3, P/4 & P/5 attached to this petition are the true copies of their respective originals.

    PRAYER
    It is therefore most respectfully prayed that this Hon’ble Court may be pleased to quash the FIR No. 450/2006 registered with police station CR Park, New Delhi under section 420/468/471/120-B IPC and the proceedings initiated thereto and may pass such other and further order(s) as this Hon’ble Court may be pleased in the facts and circumstances of the case.

    Petitioners

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