मैं अपना पोस्टर-बनैर नहीं लगवा सका

अंचल सिन्हा बैंक की नौकरी छोड़कर पत्रकारिता करने आए तो बिजनेस भास्कर, हमारा महानगर और चौथी दुनिया की छोटी-छोटी पारियों के बाद अब वे पत्रकारिता को भी पूरी तरह अलविदा कह चुके हैं. फिर से बैंक की दुनिया में वापस लौट गए हैं. पहले सरकारी नौकरी थी. अबकी प्राइवेट मिली. उसी बैंक की नौकरी के प्रोजेक्ट पर इन दिनों विदेश प्रवास पर हैं.

यूगांडा में रहते हुए अंचल लगातार लिख रहे हैं, भड़ास4मीडिया के विचार सेक्शन के लिए. उनका लिखा ‘विदेश डायरी’ कालम के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है. अंचल की विदेश डायरी का पांचवां भाग आज भड़ास4मीडिया के विचार सेक्शन पर प्रकाशित हो चुका है. उसमें अंचल एक जगह लिखते हैं-

”मुझे याद है, जब मैं चौथी दुनिया में काम कर रहा था तो कुंभ मेले की एक स्टोरी पर एक महान लेखक और वहां के एक कालमिस्ट की केवल इसी शिकायत पर कि इस स्टोरी के साथ उनकी भेजी गई कुछ तस्वीरों में से अमुक तस्वीर क्यों लगी, मुझे वहां के इंचार्ज ने कहा कि संपादकजी को लगता है कि आप यहां ठीक से मैनेज नहीं कर पा रहे है। मैंने कहा- ठीक है, कब से नहीं आना है। मैंने उन्हें अपना गेट कार्ड आदि दे दिया और कहा- ठीक है, आपकी इच्छा है तो कल से नहीं आउंगा। मैं बाहर चला आया, किसी को बताना भी मैंने उचित नहीं समझा, क्योंकि इससे मेरा तो कुछ होता नहीं, जिससे मिलता, उस पर खतरा बढ़ जाता। पत्रकारिता का अब यही मतलब हो गया है। मैं अपने को कभी देश का सबसे र्निभीक और ईमानदार पत्रकार घोषित भी नहीं कर सका, न ही अपने पोस्टर और बैनर लगवा सका। क्योंकि मेरे पास न तो किसी बड़े सेठ को पटाने का गुर था न ही उसे बेवकूफ बनाकर उसकी पूंजी पर मौज करने का स्वभाव।”

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