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कचोटता है नैतिकता का पुल

[caption id="attachment_17129" align="alignleft" width="99"]अभय तिवारीअभय तिवारी[/caption]‘…क्योंकि नगर वधुएं अखबार नहीं पढ़तीं’ : बनारस और रंडियों का रिश्ता इतना पुराना है कि उसकी दखल कहावतों में भी हो गई है। फिर रंडियों से जुड़े मामले हमेशा दिलचस्प होते हैं। न सिर्फ़ इसलिए कि वे हमारे स्वभाव की मूल वृत्ति से जुड़ा व्यापार करती हैं बल्कि इसलिए भी कि एक आम शरीफ़ आदमी को उनके जीवन के बारे में अधिक कुछ मालूम नहीं होता। जिज्ञासा अलबत्ता ज़रूर होती है।

अभय तिवारी

अभय तिवारी

‘…क्योंकि नगर वधुएं अखबार नहीं पढ़तीं’ : बनारस और रंडियों का रिश्ता इतना पुराना है कि उसकी दखल कहावतों में भी हो गई है। फिर रंडियों से जुड़े मामले हमेशा दिलचस्प होते हैं। न सिर्फ़ इसलिए कि वे हमारे स्वभाव की मूल वृत्ति से जुड़ा व्यापार करती हैं बल्कि इसलिए भी कि एक आम शरीफ़ आदमी को उनके जीवन के बारे में अधिक कुछ मालूम नहीं होता। जिज्ञासा अलबत्ता ज़रूर होती है।

मंटो जैसे लेखक की सफलता के पीछे एक बड़ा राज़ यह भी था कि वो उन मसलों पर अपनी क़लम चलाते थे जो हाशिये पर पड़े लोगों से तअल्लुक रखते थे और जिनके बारे में मालूमात पढ़ने वालों में कम होती थी। कहानी दिलचस्प है कई नज़रियों से। एक तो यही कि ये वेश्याओं के बारे में है और वो भी बनारस की। दूसरे ये कि लेखक ने वेश्याओ के मामले को महज़ वेश्याओं के मामले की तरह नहीं बरता है। वह पूरे समाज का मामला है और समाज के मुख़्तलिफ़ तबक़ों की तस्वीर कहानी में बनती है या यूँ कहें कि बनती-बिगड़ती है।

तीसरे ये कि कहानी में कोई नायक-नायिका नहीं है। एक घटनाक्रम है और उसकी जटिलताओं के समूचेपन को बनाए रखने की कोशिश करता हुआ उसका बयान है। किसी एक पात्र या चरित्र के प्वाइन्ट ऑफ़ व्यू के चकल्लस में आप नहीं उलझे और न ही किसी चरित्र के आत्मालाप में। अगर मैं ग़लत नहीं हूँ तो एकाध मौक़ो पर प्रकाश ही उसका एक अपवाद है।

ये बात आप की कहानी की ताक़त है कि आप ने एक मामले के कई सारे पहलुओं को गिरफ़्त में लिया है लेकिन दूसरी नज़र से ये भी लगता है कि पढने वालों को किसी एक धुरी की कमी महसूस हो सकती है; तेज़ी से बदलते हुए घटनाक्रम में वो जिस पर वापस लौट सकें और पूरे मामले का जाइज़ा ले सकें।

निजी तौर पर मुझे आप की कहानी में और भी अधिक रस आता अगर आपने इसकी गति को थोड़ा मद्धम और ठहरीला कर दिया होता। इतने सारे दिलचस्प चरित्रों को और क़रीब से जानने और उनके साथ अधिक समय गुज़ारने की इच्छा होती है। फिर भी बाद के हिस्से डीटेल्ड हैं और उनमें संवाद भी काफ़ी हैं जबकि पहले कुछ भाग सरपट चाल से चलते हैं। प्वांट ऑफ़ व्यू वाली बात भी बाद के हिस्सो में साफ़ है कि प्रकाश का ही है। पहले कभी ऐसा लगा कि कुछ भाग अंतरात्मा की प्रमुखता में लिखे गए हैं।

आख़ीर आते-आते कहानी की रंगत गहरी हो जाती है और मोरैल्टी ब्रिज की परिकल्पना बड़ी सनसनीखेज़ मगर एक सम्भावित सच्चाई की तरह कचोटती है।

अभय तिवारी लेखक और फिल्मकार हैं। कानपुर की पैदाइश। इलाहाबाद और दिल्ली में शिक्षा। बरसों से मुम्बई में – फ़िल्म और टीवी के बीच। खुदमुख्तारी और मजूरी के बीच; रोज़गार, सरोकार और बेकार की चिन्ताओं के बीच। हाल में बनाई लघु फिल्म ‘सरपत’ काफी चर्चा में रही। ‘निर्मल-आनंद’ नाम का ब्लाग चलाते हैं।

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0 Comments

  1. Pankaj Tripathi

    March 21, 2010 at 3:28 pm

    Bahut gehra Sach aur Teekhi Baat Ko Aapne Behtar Andaaz Mein Bayaan KIya.

    Regards,
    Pankaj Tripathi,
    9654444004.

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