सुधीर अग्रवाल को एक पत्रकार का अलविदा पत्र

अरविंद तिवारी, जो इंदौर में दैनिक भास्कर के आधार स्तंभ माने जाते थे, ने पिछले दिनों भास्कर छोड़ दिया। अरविंद राजनीतिक व प्रशासनिक क्षेत्र में मजबूत पकड़ रखते थे। भास्कर में उन्होंने अनेक खबरें ब्रेक की। उनके भास्कर छोडऩे का बड़ा कारण इंदौर के संपादक अवनीश जैन से अनबन रहा। वे 1 जनवरी 2010 से भास्कर टीवी के संपादक के रूप में सेवाएं दे रहे थे। अब 1 मई से पत्रिका में नेक्सट टू एडीटर की भूमिका में समाचार समन्वयक का दायित्व संभाल रहे हैं।

अरविंद ने अपने त्यागपत्र के साथ जो पत्र सुधीर अग्रवाल को प्रेषित किया, वह पूरे समूह में चर्चा का विषय है। भास्कर के पिछले 20 साल के इतिहास में यह पहला मौका है जब समूह छोड़ रहे किसी साथी ने इतनी अक्रामकता के साथ प्रबंधन के सामने अपना पक्ष रखा। इस पत्र ने समूह के कर्ताधर्तांओं को हिला रखा है। अरविंद का यह पत्र भड़ास4मीडिया के पास भी पहुंचा है। अरविंद ने भड़ास4मीडिया से बातचीत में इस पत्र को प्रबंधन को भेजने की पुष्टि की। यह पत्र संभवत: एक महीने पहले लिखा गया था। सुधीर अग्रवाल, श्रवण गर्ग, कल्पेश याज्ञनिक समेत कई मालिकों-संपादकों को भेजे गए इस पत्र को आप भी पढ़िए। -एडिटर


आदरणीय सुधीर जी,

सबसे पहले तो मैं आपका इस बात के लिए शुक्रिया अदा करता हूं कि आपने मुझे दो अलग-अलग कार्यकाल में करीब 12 साल दैनिक भास्कर और बीटीवी में अलग-अलग भूमिकाओं में काम करने का मौका दिया। सर, इस समूह के साथ जिसका लीडर आपके जैसा दूरदृष्टा, 18 से 20 घंटे अखबार के ही बारे में सोचने वाला और समूह को देश के मीडिया जगत में अलग पहचान दिलाने वाला व्यक्ति हो, काम करना अपने आप में गौरव की बात है। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि आज पत्रकारिता के क्षेत्र में मुझे जो पहचान मिली है उसका पूरा श्रेय आपके नेतृत्व को ही है। सर मैं अब आपसे इस समूह को छोडऩे की इजाजत चाहता हूं पर इस विश्वास के साथ की मैं इस समूह के साथ मैं दिलो-दिमाग जुड़ा था, हूं और रहूंगा ।

सर, इतने बड़े अखबार समूह में जिसमें संपादकीय साथियों में मेरा क्रम बहुत नीचे था, मैंने अपनी पूरी क्षमता के साथ काम किया। आदरणीय श्रवण गर्ग, श्री राजकुमार केसवानी, श्री कल्पेश याग्निक, श्री राजेंद्र तिवारी व अंत में अवनीश जैन के साथ मुझे काम करने का मौका मिला और जो भी दायित्व मुझे सौंपा गया उसका इमानदारी से निवर्हन मैने किया। अब जब कि मैं इस समूह को अलविदा कह रहा हूं इंदौर संस्करण को लेकर मैं कुछ बातें आपके ध्यान में लाना चाहता हूं। इनमें से कुछ मैं समय समय पर गर्ग सर, कल्पेश जी व अभिलाष जी के ध्यान में भी ला चुका हूं।

– जिस इंदौर संस्करण में आपने अपने कैरियर की शुरुआत की वह इस समय सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। इस संस्करण के संपादकीय विभाग में अब वही व्यक्ति मैनस्ट्रीम का काम कर सकता है, जो कागज पर नकली योजना बनाने, चुगलखोरी या मुखबिरी में महारत रखता हो, गलत सुझावों व स्टोरी आइडिया का विरोध करने के बजाज यसमैन बनने का माद्दा रखता हो, जिसे संपादक के बताए हर स्टोरी आइडिया को आंख मूंदकर स्वीकारना, ‘बहुत ही बढिय़ा और इससे बेहतर पहले कभी नहीं हुआ’ बताना आता हो, केवल नौकरी बचाने के लिए संपादक की हां में हां मिलाता हो या फिर संपादक से लोगों को मिलवाने या उनके लिए शहर में लायजनिंग करने में पीछे न रहे। यहां अब संवाद का दौर समाप्त होकर हिटलरी फरमान का दौर चल रहा है। किसी और संस्करण से खबरें शेयर करना यहां बड़ा अपराध मान लिया जाता है। स्टेट हेड अभिलाष खांडेकर और नेशनल हेड कल्पेश याग्निक द्वारा बताए गए स्टोरी आइडिया या प्लानिंग का यहां खुलकर मखौल उड़ाया जाता है। इनको लेकर जिस तरह की टीका टिप्पणी यहां होती है वह वह किसी से छुपा नहीं है।

– यह संस्करण अब रिपोर्टर्स के लिए कब्रगाह बनता जा रहा है। उनकी खबरें आपके सपने के मुताबिक अखबार में चमचमाने के बजाय कंप्यूटर में ही दम तोड़ रही हैं। मार्च 2009 से लेकर दिसंबर 2009 तक मैं खुद इसका भुग्तभोगी रहा हूं। रिपोर्टर की अनेक खबरें यहां संपादक की टेबल पर ही दफन हो जाती हैं और उसे यह कभी नहीं मालूम हो पाता है कि आखिर उसकी खबर का क्या हश्र हुआ। यहां खबरों के नाम पर संपादक खुलकर सौदे करते हैं। विद्यापति उपाध्याय जैसे वन विभाग के भगोड़े रेंजर (जिनके दो साल से बिना बताए काम से गैरहाजिर रहने का विज्ञापन सरकार ने ही भास्कर में छपवाया था) जो अब भास्कर समहू में पीआर व लायजनिंग का काम देखते हैं, रिपोर्टर्स द्वारा मेहनत से जुटाई गई इन खबरों पर संपादक के लिए संबंधित पक्ष से सौदेबाजी करते या प्रभावित होने वाले वजनदार लोगों से परिचय बढ़ाते नजर आते हैं। इन्हीं कारणों से कुछ महीने पहले भास्कर छोड़ चुके एक रिपोर्टर को तलब करके आप पूछ सकते हैं कि शालीमार बिल्डर्स के घोटाले से संबंधित उसकी खबर पर किस तरह आपके नाम का उपयोग कर सौदेबाजी की गई।

– सर, 2009 में हर बड़े मौके पर चाहे वह दशहरे के दूसरे दिन का अखबार हो, हनुमानजयंती जन्माष्टमी या रामनवनी के कवरेज की बात हो या फिर हजयात्रियों के लिए पहली उडान का मामला, हमने हर मौके पर विरोधियों से करारी शिकस्त खायी। जमीन की जंग में हम विरोधी अखबार से निचली पायदान पर रहे और खुद की ही खबरों में विरोधाभास खड़ा करते गए। वह अखबार जो शहर में लीडर की भूमिका अदा करता था अब फालोअप्स के सहारे काम चला रहा है।

– जैन समाज की छोटी-छोटी खबरों को संपादक जिस तरह से प्रमुखता से प्रकाशित करवा रहे हैं वह शहर में चर्चा का विषय बन गया है। इंदौर के शहर काजी तो मुस्लिम समाज की खबरों को अनदेखा करने के मुद्दे पर अपनी नाराजगी रिपोर्टर के सामने दर्शा चुके हैं। मराठी समाज की नाराजगी भी किसी से छिपी नहीं है। हालत यह है कि जैन समाज की टिफिन पार्टी के आयोजन की खबर अब आयोजन के 10 दिन पहले सिटी भास्कर में छपती है। यही खबर पांच दिन पहले मैन अखबार में छपती है और दो दिन पहले फिर दोहरायी जाती है। तिलक नगर में हुए जैन समाज के 500 लोगों के एक आयोजन को सैयदना के जन्मदिन पर निकले हजारों लोगों के जुलूस की तुलना में ज्यादा तवज्जो दी गई। जैन समाज के इसी आयोजन के तीन फोटो छापे गए।

– इंदौर नगर निगम के लिए जब पहली बार नए सिरे से वार्ड विभाजन हुआ तब आम जनता के लिहाज से अहम मानी जाने वाली यह  खबर अखबार से नदारद मिली और संपादक अपने कमरे में रिपोर्टर्स को बुलाकर यह एक्सक्यूज देते रहे की ऐसा तो चलता रहता है।

– वह अखबार जिसमें आपका जोर सौ प्रतिशत सही खबरों पर रहता है मार्च के अंत व अप्रैल के दूसरे पखवाड़े में दो जिंदा लोगों के मरने की खबर छाप चुका है और विरोधी अखबार ने इसे मुद्दा बनाकर भास्कर को नीचा दिखाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। इनमें से एक ने पत्रिका के फोरम पर जाकर कहा मैं तो जिंदा हूं। भास्कर में छपी खबर के आधार पर सुबह सुबह लोग इन दोनों के घरों पर शवयात्रा में शामिल होने लोग पहुंच गए थे।

– मेरा दावा है कि अपने सालभर के कार्यकाल में अवनीश अपने रिपोर्टर्स को 12 स्टोरी आइडिया भी नहीं दे पाए। यही नहीं जो स्टोरी आइडिया इन्हें रिपोर्टर्स ने बताए थे उन आइडियास की इन्होंने ऐसी गत की कि आज तक ये स्टोरी हो ही नहीं पायीं।

– सर, हमारे लिए बहुत दुख का विषय यह है कि अवनीश जैन के संपादक बनने के बाद कई प्रतिभावान रिपोर्टर या डेस्क से जुड़े साथी भास्कर छोडक़र चले गए। कुछ लोगों ने इन्हीं के कारण दूसरे संस्करणों में तबादला लिया पर प्रबंधन ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। ऐसे लोगों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। पिछले एक साल में 15 लोगों ने भास्कर के संपादकीय विभाग से त्यागपत्र दिया है। विनोद शर्मा, शैलेष दीक्षित, पवन राठौर, कपिल भटनागर, जय द्विवेदी, वासुदेव चौहान, विपुल रेगे, अभिषेक वर्मा, पंकज मुखिया, के.पी.सिंह, संजय कुमार, सुचेंद्र मिश्रा, प्रवीण राठौर, संजय सोलंकी, नितीन चावड़ा जो अब अलग अलग अखबारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, संपादक के रवैये के कारण ही अखबार छोडक़र गए हैं। विनोद पुरोहित जैसे वरिष्ठ साथी ने अवनीश के रवैये से परेशान होकर ही पहले जयपुर ट्रांसफर लिया और बाद में भास्कर ही छोड़ दिया।

– आप यह जानकर जरूर चौकेंगे कि भास्कर इंदौर में मनीष पाराशर व मनसुख परमार पिछले एक साल से दिहाड़ी मजदूरी से भी कम वेतन पर काम कर रहे हैं। इन्हें कभी वार्ड परिक्रमा के फंड से तो कभी किसी अन्य फंड से मात्र 2 से 3 हजार रुपये तनख्वाह दी गई। दीपेश शर्मा व हरिनारायण शर्मा जैसे 14-15 घंटा काम करने वाले व 7 से 8 खबरें देने वाले रिपोर्टर की तुलना में संपादक अपने खासमखास लोगों को जो तनख्वाह दिलवा रहे है वह उनके पक्षपातपूर्ण रवैये का ही परिचायक है।

– सर, आप चाहते हैं कि आपके संपादक रात को जल्दी घर जाएं और सुबह फ्रेश मूड के साथ अपना काम शुरू करें ताकि पूरी प्लानिंग व्यवस्थित हो सके लेकिन इंदौर में संपादक का सुबह बारह बजे दफ्तर आने के बाद का पूरा दिन साथियों के खिलाफ षडयंत्र रचने, मुखबिरी सुनने, विद्यापति जैसे व्यक्ति के साथ नये क्लाइंट ढूंढने या किसी नेता या अफसर को अपने चेंबर में बुलाकर ज्ञान बांटने, शाम छह बजे घर चले जाने और रात आठ बजे के बाद अखबार को लेकर जगने और फिर पेजों पर उठापटक करवाने व न्यूज रूम में अपने साथियों को जलील करने के साथ खत्म हो जाता है। सर, आप जरा यह तो मालूम करवायें कि आखिर इंदौर संस्करण के ज्यादातर मौकों पर लेट होने के लिए जिम्मेदार कौन है? आपकी जांच का विषय यह भी होना चाहिए कि अखबार का सरक्यूलेशन लगातार कम क्यों हो रहा है और पाठक इसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह क्यों लगाने लगे हैं।

– सर, जो संपादक अपने कमरे में बैठकर प्रोडक्शन के किसी आदमी से यह पूछता हो कि फलां मेल रिपोर्टर का किस फीमेल रिपोर्टर से क्या चक्कर चल रहा है, कौन फीमेल रिपोर्टर किसके साथ घूमती है, फलां संपादक फलां को ज्यादा प्रिफरेंस क्यों देता था। जो संपादक किसी ट्रेनी रिपोर्टर में श्रेष्ठ रिपोर्टर बनने की अपार संभावना बताते हुए सुबह-दोपहर-शाम एसएमएस करने में लगा रहता हो, उस रिपोर्टर को संपादक के कैबिन के सामने ही बैठने का निर्देश हो और ऐसा न करने पर प्रताडि़त किया जाता हो उस संपादक से आप अच्छे अखबार की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं। कल्पेश जी के परिवार में कुछ महीने पहले आयोजित कार्यक्रम के बारे में इन्होंने एक रिपोर्टर के सामने जो टिप्पणी की थी वह बहुत ही घटिया थी।
(आप चाहें तो इसकी पुष्टि भी की जा सकती है)

– आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि उच्च न्यायालय की इंदौर बेंच में हुए एक बड़े विवाद से जुड़ी जस्टिस रमेश गर्ग से संबंधित एक लाइव रिपोर्ट जब मैंने तैयार कर इन्हें प्रस्तुत की तो इन्होंने मुझे बुलाकर कहा कि आप यह खबर एक बार जस्टिस गर्ग को पढक़र सुना दें और यदि वे स्वीकृति देंगे तो ही हम इसे प्रकाशित करेंगे. बाद में मेरे जोखिम पर यह खबर अखबार में प्रकाशित की गई। मैं आपको करीब एक दर्जन ऐसी खबरों की फेहरिस्त प्रस्तुत कर सकता हूं जो अवनीश ने दबाकर रख ली और अब दफन इतिहास का हिस्सा बन गई।

– सर आपको यह भी मालूम करना चाहिए कि कुछ महीने पहले ही बहुत जोश खरोश से अवनीश द्वारा न्यूज रूम में इंट्रोड्यूस करवाए गए और टाइम्स ग्रुप से लाए गए मानवर्धन कंठ आखिर इतनी जल्दी इंदौर भास्कर छोडक़र क्यों जा रहे हैं। जिस तरह का व्यवहार संपादक ने उनके साथ किया उसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। हालात इतने बिगड़े की अवनीश द्वारा माफी मांगे जाने पर भी श्री कंठ ने यहां रुकने से इंकार कर दिया। योगेश दुबे के मामले में जो षडयंत्र संपादक ने रचा उसी के चलते ही वह माडल एडिशन के लिए आज तक कार्यमुक्त नहीं हो पाया है। सर अपने किसी विश्वस्त सहयोगी को एक दो दिन के लिए रिपोर्टर्स के बीच भेजें तो आपको मालूम होगा कि संपादक को लेकर उनकी क्या धारणा है।

-सर, आप जब भी इंदौर प्रवास पर हों मुझे 10 मिनट का समय अवश्य प्रदान करें ताकि मैं सारी बातें बहुत विस्तार से आपको बता सकूं। भास्कर मेरी रग रग में बसा है। इसी अखबार ने मुझे रिपोर्टिंग के क्षेत्र में ऊंचाई और शहर में अलग पहचान दी। आज यदि मैं इस समूह को छोडऩे का फैसला कर रहा हूं तो इसका कारण केवल और केवल अवनीश जैन है। मैं आपके लिए हमेशा उपलब्ध रहूंगा, जब भी आप पुकारेंगे में हाजिर रहूंगा पर आपसे यह अपेक्षा जरूर रखूंगा कि अपने फ्लैगशिप एडिशन को इस तरह एक व्यक्ति के हाथों बरबाद न होने दें।

आपका

अरविंद तिवारी

इंदौर

Comments on “सुधीर अग्रवाल को एक पत्रकार का अलविदा पत्र

  • Jagdish vijayvagiya says:

    bhaskar mai vese bhi kaam ki kadar nahi hai. rajasthan mai ke ajmer edition ki to halat jayada kharab hai. old editor indushekhar pancholi ki gundagardi aur dadagiri se sab pareshan the hi, magar unhone jo jaatiwaad ka beej bo kar staff mai darar paida ki uska khamiyaza aaj tak ajmer edition bhugat raha hai. present editor ashish vyas ko kaam aata nahi, news kya hai wo jante nahi, leadership unki zero, insaan ki parakh unhe hai nahi, likhna wo jaante nahi, sirf shravan garg ji ka aashirwad aur managment ki gulami kar ke ek naakara insaan kam age mai editor ban gaya aur 70-80,000 Rs. monthly lekar maze kar raha hai, ek hi uddeshya hai ki managment khush rahe. kaam karne walo ki izzat wo karte nahi, 2-4 chamche pal rakhe jo kaam nahi karte bas vyas ji ke makkhan lagate hai aur unki tarha aish karte hai. pancholi ke birhamanwaad jaatiwaad ka vyas bhi hawa de rahe hai. jitne bhi chamche unhone paal rakhe hai, sabhi jaati se birhaman hai. vivek sharma ka kaam aata nahi. sabse bada naakara wahi hai par wo pancholi ka chela hai aur unhi ke kahane par vyas use sharan de rahe hai. muft ki pay uthane walo mai jaidish boda number one hai. sote rahate hai, unke paas koi kaam nahi hai. pata nahi kaun sa patta likhwa kar laye hai ki koi editor bhi unhe kuch nahi kahata. haraam ki kha rahe hai. isi taraha kai birhaman karamchari hai jinhe kuch nahi kaha jaata, jabki wo kuch kaam nahi karte ya kam aur bekaar kaam karte hai. isi tarha dusri cast ke karamchariyo ko jaanbujh kar pareshaan kiya jaata hai. experienced employee ajmer bhaskar se job chhod rahe hai, magar khushamad pasand ashish vyas apne chamcho ke ghere se bahar aane ko aur achche logo ki izzat karne ko taiyyar hi nahi hai. managment yaadi janch karaye to pol khul jaye.

    Reply
  • Jagdish vijayvagiya says:

    bhaskar mai vese bhi kaam ki kadar nahi hai. rajasthan mai ke ajmer edition ki to halat jayada kharab hai. old editor indushekhar pancholi ki gundagardi aur dadagiri se sab pareshan the hi, magar unhone jo jaatiwaad ka beej bo kar staff mai darar paida ki uska khamiyaza aaj tak ajmer edition bhugat raha hai. present editor ashish vyas ko kaam aata nahi, news kya hai wo jante nahi, leadership unki zero, insaan ki parakh unhe hai nahi, likhna wo jaante nahi, sirf shravan garg ji ka aashirwad aur managment ki gulami kar ke ek naakara insaan kam age mai editor ban gaya aur 70-80,000 Rs. monthly lekar maze kar raha hai, ek hi uddeshya hai ki managment khush rahe. kaam karne walo ki izzat wo karte nahi, 2-4 chamche pal rakhe jo kaam nahi karte bas vyas ji ke makkhan lagate hai aur unki tarha aish karte hai. pancholi ke birhamanwaad jaatiwaad ka vyas bhi hawa de rahe hai. jitne bhi chamche unhone paal rakhe hai, sabhi jaati se birhaman hai. vivek sharma ka kaam aata nahi. sabse bada naakara wahi hai par wo pancholi ka chela hai aur unhi ke kahane par vyas use sharan de rahe hai. muft ki pay uthane walo mai jaidish boda number one hai. sote rahate hai, unke paas koi kaam nahi hai. pata nahi kaun sa patta likhwa kar laye hai ki koi editor bhi unhe kuch nahi kahata. haraam ki kha rahe hai. isi taraha kai birhaman karamchari hai jinhe kuch nahi kaha jaata, jabki wo kuch kaam nahi karte ya kam aur bekaar kaam karte hai. isi tarha dusri cast ke karamchariyo ko jaanbujh kar pareshaan kiya jaata hai. experienced employee ajmer bhaskar se job chhod rahe hai, magar khushamad pasand ashish vyas apne chamcho ke ghere se bahar aane ko aur achche logo ki izzat karne ko taiyyar hi nahi hai. managment yaadi janch karaye to pol khul jaye.

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  • mazharuddeen khan says:

    arvind ji
    ab editor ki marji par repoter ki naukri salamat rahti hai. yeh sirf bhaskar mein hi nahin sabhi newspaper mein hai. aap jis akhbar mein gaye hain wahan kab tak bane rahenge kahna muskil hai, kyonki is hamam mein sabhi nange hain. aaj aap editor ki chaploosi karoge to jyada increment milega aur sahin baat kahoge to aap ko kam nahin aane ki baat kahkar bahar ka raasta dikha diya jayega.

    Reply
  • Kaushal Mishra says:

    Arvindji ,
    khud 25 varshon se patrakaaritaa kaa khatteaa-meethaa anubhavon hone ke kaaran aapake dard ko gaharaaee se mahasoos kar sakataa hoon..darasal,aajkal sahee maayanon men ptrakaar honaa hee us patrakaar kaa sabase badaa durgun maanaa jaane lagaa hai..Adhikatar sanpadak apane saath damadaar patrakaar naheen,chaapalooson kee bheed dekhanaa chaahate hain..meree shubhakaamanaayen aapake saath hai..

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  • well done sir,
    ashi indore ma hi nahi ujjain aur ratlam editation ma bhi ho raha hai, vivav chorishaia ratlam ma kushawahji ka dadagiri charam par hai. hal ma ratlam ma sub editore sh kalimudhine na jo latter likha wo app tak nahi gaya hogo. yadi wo pad laga to sh. sudhirji ka kan ka jala saff ho jayanja. ratlam ma to kushwaji gramin reporter ko chun chun kar mita raha hai. yadi sudhir ji wash badalkar nikala to en ki kartot sudhir ji ko hiladagi.

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  • तो अरविंद तिवारी ने बड़े हौसले के साथ हकीकत बयां कर दी, लेकिन यह भी जता दिया कि वे कल्पेश मठ के अनुयायी रहे हैं। उनका पूरा पत्र पढ़ने के बाद दो बातें शायद किसी के गले नहीं उतरी होंगी। हो सकता है कि अवनीश जैन भी किसी नए मठ की महत्वाकांक्षा में भास्कर में चमचागिरी की नई शाखा के प्रवर्तक बनना चाहते हों, मगर भाई तिवारीजी यह तो ठीक है कि अवनीश से आपकी पटरी नहीं बैठी, लेकिन इस बात की पीड़ा सुधीरजी तक करने की क्या मजबूरी थी कि अवनीशजी ने कल्पेशजी के घरेलू कार्यक्रम को लेकर अनाप-शनाप कहा या फिर कल्पेशजी के आइडिया को लेकर मखौल उड़ाया। भाई पत्रकारिता का पहला उसूल ही मतभेद है। जानते आप भी बेहतर हैं कि कल्पेशजी ने राजस्थान के स्टेट हैड रहते हुए अवनीश जैन की क्या हालत कर दी थी, सो यह माना जा सकता है कि अवनीशजी को कल्पेशजी फूटी आंख नहीं सुहाए। कृपया यह तो बताएं कि आप कल्पेश मठ से तो नहीं जुड़े, यदि हां तो हो सकता है कि आपको पत्र में कल्पेशजी से जुड़ी उन बातों का उल्लेख करने का सुझाव भी उन्हीं ने दिया हो। फिर यह पत्र लीक किसने किया? आपने, सुधीरजी ने या कल्पेशजी ने, जाहिर है, अवनीश अपने के लिए मुसीबत को दावत देने से रहे।
    अब जो मैं कहना चाह रहा हूं वह तिवारीजी को संबोधित न होकर, मीडिया के सभी दोस्तों से हैं। भास्कर कितना भी बड़ा अखबार क्यों न हो गया हो, यह किसी से ढ़का छिपा नहीं है कि मठाधीशों का केंद्र बन गया है। श्रवण गर्ग मठ, कल्पेश मठ, यतीश राजावत मठ और अब शायद अवनीश जैन भी एक नया मठ चलाने के लिए चमचों को पालने में लगे हैं। मठ स्थापित करने में इतनी ताकत झोंकने के बावजूद यह किसी से छिपा नहीं है कि सबसे पावरफुल कल्पेश मठ के लोग ही है। इंदौर में कल्पेशजी ने अखबार से इतर क्या गुल खिलाए, यह किसी ने छिपे नहीं है। चमचों की पूरी फेहरिस्त छोड़कर जनाब स्टेट हैड बनकर आए थे जयपुर। आदत कहां छूटती। यहां भी चमचों की लंबी-चौड़ी फौज खड़ी हो गई। तिवारीजी को शायद यह पता करना चाहिए कि कल्पेशजी के जयपुर रहते हुए कितनी प्रतिभाओं ने पलायन किया। कितने लोगों ने अपने सर फोड़े। भला किनका हुआ-सब जानते हैं। नवनीत गुर्जर हाजिरी बजाने का रिकॉर्ड तोड़कर स्टेट हैड हो गए। श्याम शर्मा खट्टी इमली और दमदार चाय पिलाकर पहले अलवर के आरई हुए, मगर अफसोस बाद में बैक टू पेवेलियन होना पड़ा। कुलदीप व्यास जोधपुर में जमे हुए हैं। कुछ चमचों को इंदुशेखर पंचौली ने अपना शिकार बनाया, लेकिन वे खुद ही शिकार हो गए। असल बात तो यह है कि माया चमचों की है। तिवारीजी, इस्तीफा लिखते तो कम से कम अपनी बात तो कहते, कल्पेशजी की शान में हुई गुस्ताखी को उजागर करके खुद को क्यों एक्सपोज कर दिया। कल्पेशजी, कृपया अपने चेलों को इस्तीफा लिखने की स्मार्ट ड्राफ्टिंग तो सिखा दो।

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  • ramesh kumar says:

    पूरी तरह से एकपक्षीय पत्र है. फील्ड मे रहने वाले इंदौर के पत्रकार ये जानते है कि पिछले चुनाव एक बड़े नेता ने अरविन्दजी द्वारा की जा रही ब्लेकमेलिंग की शिकायत की थी इसलिए भास्कर ने उन्हें दरवाजा दिखाया था.
    ब्राह्मणवाद और पत्थावाद चलाना अरविन्दजी की पुराणी फितरत है.

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  • अरविंद जी आप बधाई के पात्र इस लिए भी है कि जो पत्रकार हमेश दूसरों के हितों की लड़ाई लड़ता है वह अपनी ही लड़ाई कभी नहीं लड़ पात। आपने जो पहल की इससे मुझे लगता है कि इस तरह के प्रबंधन में चल रहे अखवारों के एडीशनों में दूसरे पत्रकारों में जागरूकता आएगी,और वे इस तरह के प्रबंधन के खिलाफ आवाज उठाकर अपने अधिकारों की लड़ाई को लड़ सकेंगे।आप धन्‍यवाद के पात्र है।

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  • Bhaskar me Acha Kam Karne Balo ke Sath Esa hi Hota Aaya Hai. Aap to Phir Bhi Bade Ohde per Ho. Maine to ek Stinger hote hue Akhbar ke liye Gundo tak ke Khilaf Khabre likhi Or Unka Hamla Bhi sha, yhan tak ki News ajent Ke agency chodne per Khud akhbare Bechi or 2001 me 10000 Ka Ghata Khaya. Phir Bhi kuch Chapluso ke Karn Mujhe bena Karn Ke hta diya gya tha. Is bare me us smay chandigarh me Sudhir Ji se mela to Unho ne yeh Kehkar bapas lota diya ki Sampadak ke Phesle per Kuch nhi kiya ja sakta.

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  • singhvijay says:

    सबसे पहले तो आपको बधाई और ढेर सारी शुभकामनाएं। बधाई इसलिए कि आपने इतने साहस के साथ अपनी पीड़ा बयां की। आपका यह पत्र जरूर काम करेगा और सोए हुए प्रबंधन की तंद्रा अवश्य टूटेगी।

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  • vipul rege says:

    arvind ji main aapki baat se puri tarah sahmat hu. aajkal indore bhaskar me kaam karne walo ki jo durgati ho rahi hai wah kisi se chupi nahi hai. bhaskar ka dil indore edition ab logo ki nigaho se girta ja raha hai. avnish ji shayad bhaskar ke sabse bure editor sabit hue hai. bhadai arvind ji aapne hum jaise reporters ke dard ko samne rakha. ab kis baat ka intjaar kar rahe hai sudhir ji.

    Reply
  • Sushil Dubey says:

    Bhai Arvindji,
    Aapki peeda sachmuch asahya hai. yahi peeda Indore ke anya nav prakashit Akhbaron me kam karne wale sathiyon ki bhi hai, yahan bhi sampadk mahoday ke betuke fatwe jhelna patrakaron ki mazboori hai, lekin koi vikalp na hone se jlalat jhelne ko majboor hain.

    Reply
  • Dear Arvind jee-
    aapke patra ko padhkar itne bade akbaar ke malik jaroor action lege,bhaskar management yadi koi karwahi nahi karta tho samajh lijiye ki aapki patrakarita ko nayee disha dene ishwar ne Editor ne Avanish jain jee ko Indore bheja hai. aapse aise patra ki umeed shayad sudheer sir ko nahi ho lekin patrakar jab footkar rota hai tho use sirf Bhadas4media ka sahara milta hai.
    Bhai yaswant ji ko dhanyavaad patra ko prastut karne ke liye.
    email: saideep1969@rediff.com (Durg -Chhattishgarh)

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  • ek pathak says:

    vinash kale vipreet buddhi. hota hai, chalta. naidunia bhi aise daha. amar ka patta likhakar koi nahi laya no, 1 rahne ka.

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  • praveen mishra says:

    arvind bai aap ne accha kam kia hai jo lettar beja usse db menegment ko khambeerta se lena chaiay kyon kee aesa gwalior me be ho raha hai.db ne jo polsee banai thee uske panne bikhar gaye hain.ab gwalior me ek wyakti kee polise chalti hai. janch kee prtiksha men.

    Reply
  • bachcha patrakar bhoapl says:

    sar me aapko janta to nahi lekin apne 2 saal ke keriyar me me bhi is baat ko samajh chuka ho ki chaploos logo ka bolbala hai aur kam karane wale ka maran. aap jese seniors ke saath jab yah halat ho sakate hai to hum jese naye logo ka kya hota hoga iska andaza aap aasani se laga sakate hai.

    Reply
  • kiran tiwari says:

    आदरणीय अरविंद जी,
    सबसे पहले तो आपको बधाई और नयी शुरुआत के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं। बधाई इसलिए कि आपने इतने साहस के साथ अपनी पीड़ा बयां की। आप देखिएगा, आपका यह पत्र जरूर काम करेगा और सोए हुए प्रबंधन की तंद्रा अवश्य टूटेगी। आपने अपने पत्र में बहुत सारे सवाल उठाए हैं, जो कहीं ना कहीं मीडिया की हकीकत भी बयां करते हैं। अरविंद जी, पत्रकारिता में आज चापलूसी, पेशे का रूप अख्तियार करती जा रही है। इसके चलते प्रतिभा दम तोड़ रही है, संपादकोंं के मनामाने रवैए तथा प्रबंधन के उन्हें मूक समर्थन के चलते मीडिया का बेड़ा गर्क हो गया है। एक बात और हम आपसे कहना चाहते हैं कि आज के पत्रकार-पत्रकारिता अपने आप को भगवान तुल्य समझ रहे हैं। ऐसे लोगों का मानना है कि ये जिसकी चाहे हस्ती बना दें और जिसकी चाहें दुनिया उजाड़ दें। ये बात और है कि इनके संपादकनुमा आका के दर-बदर होते ही ये फिर खुद ही पहचान के लिए ही तरसते घूमते हैं। जो पत्रकार अभी पत्रकारिता के लिए काम करना चाहते हैं उनकी स्थिति कमर जलालाबादी के इस शेर में बयां हो रही है-

    “सुना था कि वो आएंगे अंजुमन में, सुना था कि उनसे मुलाकात होगी
    हमें क्या पता था, हमें क्या खबर थी, न ये बात होगी न वो बात होगी।”

    Reply
  • kiran tiwari says:

    आदरणीय अरविंद जी,
    सबसे पहले तो आपको बधाई और नयी शुरुआत के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं। बधाई इसलिए कि आपने इतने साहस के साथ अपनी पीड़ा बयां की। आप देखिएगा, आपका यह पत्र जरूर काम करेगा और सोए हुए प्रबंधन की तंद्रा अवश्य टूटेगी। आपने अपने पत्र में बहुत सारे सवाल उठाए हैं, जो कहीं ना कहीं मीडिया की हकीकत भी बयां करते हैं। अरविंद जी, पत्रकारिता में आज चापलूसी, पेशे का रूप अख्तियार करती जा रही है। इसके चलते प्रतिभा दम तोड़ रही है, संपादकोंं के मनामाने रवैए तथा प्रबंधन के उन्हें मूक समर्थन के चलते मीडिया का बेड़ा गर्क हो गया है। एक बात और हम आपसे कहना चाहते हैं कि आज के पत्रकार-पत्रकारिता अपने आप को भगवान तुल्य समझ रहे हैं। ऐसे लोगों का मानना है कि ये जिसकी चाहे हस्ती बना दें और जिसकी चाहें दुनिया उजाड़ दें। ये बात और है कि इनके संपादकनुमा आका के दर-बदर होते ही ये फिर खुद ही पहचान के लिए ही तरसते घूमते हैं। जो पत्रकार अभी पत्रकारिता के लिए काम करना चाहते हैं उनकी स्थिति कमर जलालाबादी के इस शेर में बयां हो रही है-

    “सुना था कि वो आएंगे अंजुमन में, सुना था कि उनसे मुलाकात होगी
    हमें क्या पता था, हमें क्या खबर थी, न ये बात होगी न वो बात होगी।”

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  • अमित गर्ग. राजस्थान पत्रिका. बेंगलूरु. says:

    आदरणीय अरविंद जी,
    सबसे पहले तो आपको बधाई और नयी शुरुआत के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं। बधाई इसलिए कि आपने इतने साहस के साथ अपनी पीड़ा बयां की। आप देखिएगा, आपका यह पत्र जरूर काम करेगा और सोए हुए प्रबंधन की तंद्रा अवश्य टूटेगी। आपने अपने पत्र में बहुत सारे सवाल उठाए हैं, जो कहीं ना कहीं मीडिया की हकीकत भी बयां करते हैं। अरविंद जी, पत्रकारिता में आज चापलूसी, पेशे का रूप अख्तियार करती जा रही है। इसके चलते प्रतिभा दम तोड़ रही है, संपादकोंं के मनामाने रवैए तथा प्रबंधन के उन्हें मूक समर्थन के चलते मीडिया का बेड़ा गर्क हो गया है। एक बात और हम आपसे कहना चाहते हैं कि आज के पत्रकार-पत्रकारिता अपने आप को भगवान तुल्य समझ रहे हैं। ऐसे लोगों का मानना है कि ये जिसकी चाहे हस्ती बना दें और जिसकी चाहें दुनिया उजाड़ दें। ये बात और है कि इनके संपादकनुमा आका के दर-बदर होते ही ये फिर खुद ही पहचान के लिए ही तरसते घूमते हैं। जो पत्रकार अभी पत्रकारिता के लिए काम करना चाहते हैं उनकी स्थिति कमर जलालाबादी के इस शेर में बयां हो रही है-

    “सुना था कि वो आएंगे अंजुमन में, सुना था कि उनसे मुलाकात होगी
    हमें क्या पता था, हमें क्या खबर थी, न ये बात होगी न वो बात होगी।”

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  • manoj sharma says:

    written by meghna, May 28, 2010

    तो अरविंद तिवारी ने बड़े हौसले के साथ हकीकत बयां कर दी, लेकिन यह भी जता दिया कि वे कल्पेश मठ के अनुयायी रहे हैं। उनका पूरा पत्र पढ़ने के बाद दो बातें शायद किसी के गले नहीं उतरी होंगी। हो सकता है कि अवनीश जैन भी किसी नए मठ की महत्वाकांक्षा में भास्कर में चमचागिरी की नई शाखा के प्रवर्तक बनना चाहते हों, मगर भाई तिवारीजी यह तो ठीक है कि अवनीश से आपकी पटरी नहीं बैठी, लेकिन इस बात की पीड़ा सुधीरजी तक करने की क्या मजबूरी थी कि अवनीशजी ने कल्पेशजी के घरेलू कार्यक्रम को लेकर अनाप-शनाप कहा या फिर कल्पेशजी के आइडिया को लेकर मखौल उड़ाया। भाई पत्रकारिता का पहला उसूल ही मतभेद है। जानते आप भी बेहतर हैं कि कल्पेशजी ने राजस्थान के स्टेट हैड रहते हुए अवनीश जैन की क्या हालत कर दी थी, सो यह माना जा सकता है कि अवनीशजी को कल्पेशजी फूटी आंख नहीं सुहाए। कृपया यह तो बताएं कि आप कल्पेश मठ से तो नहीं जुड़े, यदि हां तो हो सकता है कि आपको पत्र में कल्पेशजी से जुड़ी उन बातों का उल्लेख करने का सुझाव भी उन्हीं ने दिया हो। फिर यह पत्र लीक किसने किया? आपने, सुधीरजी ने या कल्पेशजी ने, जाहिर है, अवनीश अपने के लिए मुसीबत को दावत देने से रहे।
    अब जो मैं कहना चाह रहा हूं वह तिवारीजी को संबोधित न होकर, मीडिया के सभी दोस्तों से हैं। भास्कर कितना भी बड़ा अखबार क्यों न हो गया हो, यह किसी से ढ़का छिपा नहीं है कि मठाधीशों का केंद्र बन गया है। श्रवण गर्ग मठ, कल्पेश मठ, यतीश राजावत मठ और अब शायद अवनीश जैन भी एक नया मठ चलाने के लिए चमचों को पालने में लगे हैं। मठ स्थापित करने में इतनी ताकत झोंकने के बावजूद यह किसी से छिपा नहीं है कि सबसे पावरफुल कल्पेश मठ के लोग ही है। इंदौर में कल्पेशजी ने अखबार से इतर क्या गुल खिलाए, यह किसी ने छिपे नहीं है। चमचों की पूरी फेहरिस्त छोड़कर जनाब स्टेट हैड बनकर आए थे जयपुर। आदत कहां छूटती। यहां भी चमचों की लंबी-चौड़ी फौज खड़ी हो गई। तिवारीजी को शायद यह पता करना चाहिए कि कल्पेशजी के जयपुर रहते हुए कितनी प्रतिभाओं ने पलायन किया। कितने लोगों ने अपने सर फोड़े। भला किनका हुआ-सब जानते हैं। नवनीत गुर्जर हाजिरी बजाने का रिकॉर्ड तोड़कर स्टेट हैड हो गए। श्याम शर्मा खट्टी इमली और दमदार चाय पिलाकर पहले अलवर के आरई हुए, मगर अफसोस बाद में बैक टू पेवेलियन होना पड़ा। कुलदीप व्यास जोधपुर में जमे हुए हैं। कुछ चमचों को इंदुशेखर पंचौली ने अपना शिकार बनाया, लेकिन वे खुद ही शिकार हो गए। असल बात तो यह है कि माया चमचों की है। तिवारीजी, इस्तीफा लिखते तो कम से कम अपनी बात तो कहते, कल्पेशजी की शान में हुई गुस्ताखी को उजागर करके खुद को क्यों एक्सपोज कर दिया। कल्पेशजी, कृपया अपने चेलों को इस्तीफा लिखने की स्मार्ट ड्राफ्टिंग तो सिखा दो।

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  • arife jadi says:

    well doen ,
    ab bhaskar ma sethjiu ke nahi chamcho ke chalti hai. eska udharan app hai. jo app jasa senior reporter ko kis tarah parashan kiya aur antth ma bhaskar choudhana pada.
    again congratulate.

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