सबसे ज्यादा अखबार मेरठ से निकलते हैं!

नौनिहाल शर्मा
नौनिहाल शर्मा
भाग 11 : क्राइम व जनरल रिपोर्टिंग के बाद नौनिहाल ने मुझे खेल की रिपोर्टिंग करने को भी कहा था, क्योंकि उस समय मेरठ में प्रभात, मेरठ समाचार, हमारा युग और मयराष्ट्र जैसे दैनिक अखबार निकलते थे। जागरण और अमर उजाला तब तक वहां नहीं आए थे। नौनिहाल ने एक दिन बताया कि भारत में सबसे ज्यादा अखबार मेरठ से निकलते हैं।

मैं आश्चर्य से बोला- ‘क्यों फेंक रहे हो गुरु?’

‘तू डीआईओ (जिला सूचना कार्यालय) जाकर देख ले आंकड़े।’

हालांकि नौनिहाल की बात पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं था, लेकिन मैं जिज्ञासावश डीआईओ गया। मेरठ से पंजीकृत अखबारों की सूची देखी। मैं चकित रह गया। तब मेरठ से 13 दैनिक और 866 साप्ताहिक अखबार पंजीकृत थे। इनमें से 60 से ज्यादा अखबार नौनिहाल के पास नियमित रूप से आते थे। मैंने आज तक उनसे ज्यादा अखबार पढऩे और खत लिखने वाला कोई दूसरा नहीं देखा। उतने अखबार पढऩे के बाद वे रोज 20 से ज्यादा खत भी लिखते थे। उनकी डाक में भी तकरीबन इतने ही खत आते थे।

.नौनिहाल ने मुझे भविष्य में अच्छे मौके के लिए खेल रिपोर्टिंग भी करने की सलाह दी थी। इसका मुझे आगे चलकर फायदा भी हुआ। इसलिए जब अरुण जैन ने मेरठ में इलेक्ट्रा अखिल भारतीय टेबल टेनिस टूर्नामेंट शुरू किया, तो मुझे उसकी रिपोर्टिंग से काफी कुछ सीखने को मिला। नौनिहाल ने मुझे कमलेश मेहता, मंजीत दुआ, इंदु पुरी और शैलजा पारीख जैसे अंतर्राष्ट्रीय खिलाडिय़ों के इंटरव्यू करने को भी कहा। टूर्नामेंट की रिपोर्टिंग के साथ ही मैंने इन सभी खिलाडिय़ों के इंटरव्यू भी किये। मैं नौनिहाल का खेल ज्ञान देखकर चकित हो जाता था। उन्होंने ही मुझे खेल पत्रकारिता का भी शुरूआती सबक दिया। इलेक्ट्रा टूर्नामेंट उस समय देश में राष्ट्रीय टेबल टेनिस टूर्नामेंट के बाद दूसरे नंबर का टूर्नामेंट था। इसे मैंने कई साल कवर किया। जब मैं नवभारत टाइम्स में खेल डेस्क पर काम करने 26 अप्रैल, 1988 को मुम्बई आया, तो इन सभी खिलाडिय़ों से पूर्व परिचय होने के कारण काफी खबरें मिलीं।

लेकिन इलेक्ट्रा टूर्नामेंट की कवरेज करते हुए एक दिन अजीब घटना हो गयी। मेरी सभी खास खबरों पर नौनिहाल बाईलाइन देते थे। मेरी 17 वीं सालगिरह से पहले ही वे मुझे 100 से ज्यादा बाईलाइन दे चुके थे। इलेक्ट्रा टूर्नामेंट के फाइनल की खबर भी उन्होंने पहले पेज पर बाईलाइन से लगायी। मेरठ समाचार के मालिक और संपादक राजेन्द्र अग्रवाल (बाबूजी) के दोनों बेटे दिनेश और अरविंद भी अखबार के काम में ही जुटे रहते थे। दिनेश खबरें भी लिखते थे। उन्होंने मुझे खबर लिखते समय किसी से भी न डरने की सीख दी थी। अरविंद खबरें कंपोज भी करते थे। हमारे जाने के बाद उन्होंने उस खबर पर अपनी बाईलाइन लगा दी। अगले दिन मैं दफ्तर पहुंचा, तो वहां अजब नजारा था।

नौनिहाल मुंह फुलाये बैठे थे। मेज पर उनकी कलम बंद रखी थी। सामने वार्ता की खबरों का ढेर था। बाबूजी उनसे कई बार शुरू काम करने को कह चुके थे। पर वे ऐसे ही बैठे थे। मैं अंदर कदम रखते ही भांप गया कि मामला कुछ गड़बड़ है। मुझे देखते ही नौनिहाल फुर्ती से उठे और मेरा हाथ पकड़कर बाबूजी के पास ले गये।

‘इसकी खबर पर अरविंद ने अपनी बाईलाइन दे दी। उसे इसका क्या हक है? माफी मांगगी पड़ेगी’, वे गुस्से से बोले। मैंने कहा, ‘कोई बात नहीं गुरू, मुझे तो आप बहुत बाईलाइन देते रहते हो। अंबरीश भाई का नाम चला गया, तो मुझे इसकी कोई शिकायत नहीं।’    दरअसल, मैं ऐसे हालात में नौनिहाल के उग्र स्वभाव को जानता था। इसलिए नहीं चाहता था कि वे कोई पंगा लें।

पर नौनिहाल ने पंगा ले लिया। अंबरीश ने माफी नहीं मांगी। नौनिहाल उठे। साइकिल निकाली। अपने घर की ओर रवाना हो गये। उनके पीछे मैं भी अपनी साइकिल पर लपका। भाभीजी सारा माजरा समझ गयीं। मैंने उन्हें पूरी बात बतायी। उन्होंने स्टोव पर चाय बनाते हुए कहा, ‘तुम चिंता मत करो। अभी कोई आयेगा प्रेस से और इन्हें अपने साथ मनाकर ले जायेगा।’

थोड़ी देर में एक कंपोजिटर साइकिल पर आया। उसने नौनिहाल के पैर पकड़ लिये। बोला, ‘जल्दी चलो यार। तुम नहीं गये, तो अखबार बंद हो जायेगा और हम सबकी नौकरी चली जायेगी।’ नौनिहाल टस से मस नहीं हुए। वह भाई भी लगा रहा। चिरौरी करता रहा। करीब आधे घंटे बाद नौनिहाल पिघले। बोले, ‘चल, तेरी वजह से आता हूं। वरना मैंने तो नौकरी छोड़ ही दी थी।’

चाय का एक और दौर चला। अपनी-अपनी साइकिल पर हम तीनों निकले। दफ्तर पहुंचे। बाकी कंपोजिटर बाहर ही इंतजार कर रहे थे। हम बाबूजी के पास पहुंचे। वहां नौनिहाल ने कुछ सुनने से पहले ही अपनी शर्त रख दी- काम तब शुरू करूंगा, जब अरविंद दोबारा ऐसा कुछ न करने का वादा करे। बाबूजी ने कहा- मेरी गारंटी। तू काम बढ़ा।

इस सब में डेढ़ घंटा बीत गया था। लेकिन नौनिहाल ने एडिशन समय पर ही निकाल दिया। खुद खबरें लिखने के बजाय सीधे कंपोज करने लगे। मैं खबरें लिखकर दूसरे कंपो जिटरों को देता गया।

आज यह घटना अजीब जरूर लगे, पर मेरे लिए हमेशा प्रेरक रहेगी। भला आज कौन सीनियर किसी सहयोगी के लिए अपनी नौकरी दांव पर लगायेगा? आखिर ये आर्थिक उदारीकरण का दूसरा दौर है, उत्तर आधुनिक काल के समापन की बेला है।

भुवेंद्र त्यागी
भुवेंद्र त्यागी
… लेकिन 27 साल पहले नौनिहाल ने यह किया था।  

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है। वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं। उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है।

Comments on “सबसे ज्यादा अखबार मेरठ से निकलते हैं!

  • श्रीकांत says:

    अपने गुरु के व्यक्तित्व के कम जाने पहलुओं को सामने लाकर अपना ऋण कुछ तो घटा लिया। शुभकामनाएं।

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  • awanish yadav says:

    Bhuvendra ji,
    Sadar pranam aap ke Naunihal ji ke saath bitaye hue sansmaran padkar mujhko kabhi kanpur amar ujala me rahe Vishveswar ji ka nature yaad aa gaya. Mai us samay navodit patrakar tha voh chief reporter thay mera kanpur office kabhi kabhi hi jaana hota tha lekin jab bhi main koi bara samachar lekar kanpur jaata tha voh apne paas bithatay thay. Unke sneh ne mujhko aage badne ki prerna di.Vah jab kabhi phone kartay thay to exclusive khabar hi mangtay thay.Mujh jaise Chotay se patrkar ke liye apne sathiyon se lad jaate thay.

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  • mahesh sharma says:

    mr. Bhuvendra Ji,
    sadar namaste, aap ki gurubhakti ko dekhkar man gad-gad ho gaya. aap hi vah sachche shishya hain jo guru ko samarpit hote hain. aap jaise shishya par guru ki vishesh kripa hoti hai. aapki guru bhabhakti ko dekhkar main main dhanya ho gaya. plz aap aise blog avashya likhte rahen log aapse prerna lenge.
    mahesh sharma, editor weekly jagat vichar, meerut. 9897606884

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