गुरु ने ओके किया तो गया जागरण

नौनिहाल शर्माभाग 12 : एक दिन मैं नौनिहाल के साथ बच्चा पार्क में बैठा था। अब तो इस पार्क को तोड़कर सड़क बना दी गयी है। इधर-उधर की गपशप के दौरान मैंने नौनिहाल से कहा, ‘गुरू, मेरठ समाचार में साहित्य नहीं छपता। इसके लिए भी जगह होनी चाहिए।’ वे बोले- ‘हां, मैंने इसके लिए योजना बनायी है। कुछ स्थानीय लेखकों से रचनाएं मंगायी हैं। तू भी अपने लेखक दोस्तों से कहानी-कविता भेजने को बोल दे।’ अगले हफ्ते से अखबार में साहित्य भी शुरू हो गया। खुद नौनिहाल की भी कई रचनाएं छपीं। इनमें उनके व्यंग्य लेख बहुत पसंद किये गये। तीन हफ्ते बाद नौनिहाल ने मुझे कुछ किताबें और पत्रिकाएं दीं। बोले, ‘इनकी समीक्षा लिख डाल।’

मैं अवाक। तब तक मैंने साहित्यिक लेखन बस शुरू ही किया था। पढ़ता भरपूर था। हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में। रूसी साहित्य भी खूब पढ़ा था। अखबारों में किताबों की समीक्षाएं भी पढ़ता था। पर समीक्षा लिखने के योग्य मैं खुद को नहीं समझता था।

लेकिन नौनिहाल तो नौनिहाल ठहरे। वे अपने शिष्यों के सामने नयी चुनौतियां रखते थे। उन चुनौतियों को पूरा करने के योग्य भी बनाते थे। इसलिए जब मैंने समीक्षा लिखने के उनके निर्देश पर आश्चर्य किया, तो उन्होंने पूछा, ‘अच्छा, ये बता कि तुझे सबसे बेहतरीन उपन्यास कौन सा लगा आज तक?’

‘प्रेमचंद का गोदान और गोर्की का मां।’

‘ठीक है। कल मैं तुझे गोदान की समीक्षा लिखकर दिखाऊंगा।’

अगले दिन नौनिहाल ने मुझे दो पेज की समीक्षा पढऩे को दी। गोदान उन्होंने कई साल पहले एम. ए. की पढ़ाई के दौरान पढ़ा था… और वह उन्हें समीक्षा लिखने लायक याद था। मैंने वह समीक्षा पढ़ी।

‘बस ये ही है समीक्षा। कथ्य, भाव, बिम्ब, शैली, चरित्र चित्रण, संवाद, भाषा, सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक-लोक चेतना, लेखक की अंतर-दृष्टिï, उद्देश्य और उद्देश्य में सफलता। इन सब के इर्द-गिर्द समीक्षा लिखी जाती है। अगर लेखक पर किसी दूसरे लेखक या रचना का प्रभाव पकड़ में आये, तो उसका उल्लेख भी करना चाहिए।’

मैं उनके इस गूढ़ सबक को समझता रहा। उन्होंने पहली समीक्षा लिखने के लिए मुझे चार दिन की मोहलत दी। वह किताब थी अरुणाभ। पटना से प्रकाशित। सतीशराज पुष्करणा के संपादन में उसमें 118 कवियों की छंदोबद्ध कविताएं संकलित थीं। उनमें 27 कवयित्रियां थीं। 18 दिसंबर, 1983 को इसकी समीक्षा छपी –

‘अरुणाभ: नयी पीढ़ी की पीड़ा, श्रंगार की भरमार’

इसके बाद बाल पताका, युग मर्यादा और संकेतिका जैसी पत्रिकाओं व कविता संकलनों की समीक्षा भी मुझसे लिखवायीं।

मूल्य युद्धों का (4 सितंबर, 1983), श्रीलंका में तमिल नरसंहार (26 सितंबर, 1983), गांधी संस्कृति का अर्थ व आवश्यकता (2 अक्टूबर, 1983), ऊर्जा संकट (6 नवंबर, 1983), सफर चौंतीसवें गणतंत्र दिवस पर (26 जनवरी, 1984), राष्ट्रीय एकता की समस्याएं (26 जनवरी, 1983), सामाजिक परिवर्तन औत आंदोलन (31 जनवरी, 1984), पंजाब समस्या: भानुमति का पिटारा (24 फरवरी, 1984) और क्रांतिदूत भगतसिंह का जीवन दर्शन (23 मार्च, 1984) जैसे विविध लेख मुझसे लिखवाकर नौनिहाल ने ‘मेरठ समाचार’ में छापे।

हर साल दिसंबर के आखिरी हफ्ते में न्यूज एजेंसियों पर साल का लेखा-जोखा आता है। तो उस साल नौनिहाल को वार्ता पर ऐसा लेखा-जोखा देखकर आइडिया आया कि मेरठ का भी जाना चाहिए। मैंने कहा कि यह तो एजेंसी पर आयेगा नहीं। नौनिहाल ने मुझे दुछत्ती पर पर चढ़ाकर ‘मेरठ समाचार’ के पूरे साल के अंक देखकर मैटर तैयार करने पर लगा दिया। मुझे फाइलों में से मैटर निकालने में पूरा दिन लग गया। हाथ और कपड़े पेपर की स्याही से काले हो गये। शाम को मैं मैटर फेयर करता गया और नौनिहाल उसे दुरुस्त करके कंपोजिंग में भेजते गये। दो जनवरी, 1984 को पूरे पेज पर वह मैटर छपा। मेरठ में इस तरह का वह पहला प्रयोग था।  

नौनिहाल की सबसे बड़ी खूबी यही थी कि वे हर नये पत्रकार को संपूर्ण पत्रकार बनाना चाहते थे। इसके लिए वे उनसे नये-नये विषयों पर लिखवाते थे और लिखना भी सिखाते थे। साहित्य के अलावा उन्होंने मुझसे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर भी लिखवाया। इसीलिए मेरे करियर के शुरू में ही उन्होंने मुझसे इतने विषयों पर लिखवाया, कि चीजों की समझने और उनके विश्लेषण की मेरी अच्छी समझ बन गयी। उन्होंने कभी इसका श्रेय लेने की कोशिश नहीं की। लेकिन वे किसी पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थान से कम नहीं थे।

नौनिहाल की शागिर्दी में काम करके मेरे अंदर काफी आत्मविश्वास आ गया था। मैं ‘मेरठ समाचार’ में कई महीने से बिना तनखा के काम कर रहा था। नौनिहाल कई बार बाबूजी से मेरी तनखा शुरू करने को कह चुके थे, लेकिन वे टाल जाते थे। मुझे इससे कोई परेशानी नहीं थी। पैसे से ज्यादा कीमती मुझे नौनिहाल से काम सीखना लगता था। तभी मेरठ से ‘दैनिक जागरण’ शुरू होने की सुगबुगाहट हुई। मैंने नौनिहाल से कहा, गुरू तुम चले जाओ जागरण में। वे इसे हंसकर टाल जाते।

जागरण की डमी निकलने लगी थी। ज्यादातर स्टाफ कानपुर से लाया गया था। अचानक स्टाफ में कुछ असंतोष हुआ और कुछ लोग कानपुर लौट गये। मैं वहां किसी को जानता नहीं था। नौनिहाल ने एक-दो बार वहां हो आने को कहा भी, पर मैं टाल गया।

एक दिन मैं स्टेडियम गया। मैं वहां खेलता भी था और खबरें भी ले आता था। साइकिल खड़ी कर ही रहा था कि स्टैंड वाले ने कहा, आरएसओ साहब तुम्हें याद कर रहे थे। मुझे लगा कि कोई खबर देनी होगी उन्हें। वे थे आर. एस. त्रिपाठी। मेरठ के क्षेत्रीय क्रीड़ा अधिकारी। मैं उनके ऑफिस में पहुंचा। वे किसी से फोन पर बात कर रहे थे। उन्होंने मुझे बैठने का इशारा किया। थोड़ी देर बाद फोन रखकर बोले, ‘जागरण के संपादक भगवतशरण आये थे। खेल के लिए किसी को ढूंढ रहे थे। जाकर उनसे मिल लो।’

मेरे चेहरे पर असमंजस देखकर उन्होंने तुरंत मिल लेने को कहा।    

स्टेडियम के पास ही साकेत कॉलोनी है। साकेत में डी-144 था जागरण का पता। कई बार मैंने उसके सामने से गुजरते हुए वहां अखबार का बोर्ड लगा देखा था। तो मैंने साइकिल उठायी और चल दिया डी-144 की ओर। वहां दरवाजे के बाहर साइकिल खड़ी की। अंदर जाने की जुगत कर ही रहा था कि सिक्यूरिटी वाले को खड़े होकर एक सज्जन को सेल्यूट करते देखा। वह बोला, ‘नमस्ते भगवत जी।’

मुझे लगा कि हो न हो, ये ही भगवत शरण जी हैं। मैंने लपककर उन्हें नमस्ते की और पूछा, ‘सर आप ही भगवतशरण जी हैं?’

उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा और हां में सिर हिलाया। मुझे उनके साथ अंदर जाते देखकर गेट पर किसी ने रोका भी नहीं।

‘सर, मैं भुवेन्द्र त्यागी। स्टेडियम से त्रिपाठी जी ने आपसे मिलने भेजा है। मैं मेरठ समाचार में काम करता हूं।’

‘ओके। कम विद मी।’

संपादकीय विभाग में जाकर उन्होंने अपनी सीट पर बैठकर घंटी बजायी। चपरासी आया। वे बोले, ‘रमेश, बहुत गर्मी है। ठंडा पानी पिलाओ। इनके लिए भी लाना।’

यह रमेश बाद में मेरा और नौनिहाल का अच्छा दोस्त बना।

पानी पीकर भगवत जी ने मेरा इंटरव्यू लेना शुरू कर दिया। कोई आवेदन नहीं। कोई टेस्ट नहीं। सीधे इंटरव्यू। सवाल इंग्लिश काउंटी क्रिकेट, सुनील गावस्कर, कपिलदेव और कुछ महीने बाद लास एंजेलिस में होने वाले ओलिंपिक खेलों के बारे में थे। मेरे सारे जवाब सही थे। दस मिनट बाद भगवत जी बोले, ‘कल से काम पर आ जाओ। ट्रेनी सब एडिटर का पद मिलेगा। खेल के पेज पर काम करना होगा। सैलरी 600 रुपये महीना। कल तीन बजे आ जाना।’

मेरा मुंह खुला का खुला रह गया। यकीन ही ना आये।

‘सर, सच्ची?’

‘हां भई, नौकरी पर रख लिया गया है तुम्हें।’

यह सुनकर मैं मानो नींद से जागा।

‘लेकिन सर, पहले मुझे अपने अपने गुरू से अनुमति लेनी पड़ेगी।’

‘वेरी सरप्राइजिंग। जॉब तुम्हें करना है या तुम्हारे गुरू को?’

‘सारी सर। पर उनसे पूछे बिना मैं हां नहीं कर सकता।’

‘ओके। गो एंड सीक हिज परमीशन।’

मैं साइकिल दौड़ाता हुआ ‘मेरठ समाचार’ के दफ्तर पहुंचा। नौनिहाल पेज का पूफ देख रहे थे। मुझमें जरा भी इंतजार करने का धीरज नहीं था। फटाफट सब कुछ बता दिया। नौनिहाल नें खड़े होकर मुझे गले लगाया। मेरी पीठ ठोंकी। एक कंपोजिटर को 10 रुपये देकर रसगुल्ले लाने को कहा। कुछ मिनट बाद वहां मुझे जागरण में नौकरी मिले का जश्न मनाया जा रहा था। आधे घंटे बाद नौनिहाल ने मुझे तुरंत जाकर भगवत जी को हां बोलने को कहा। मैंने साइकिल सुभाष नगर से फिर साकेत की ओर मोड़ दी। भगवत जी मुझे देखकर चौंके। ‘अरे कल आ जाते। कनफरमेशन देने के लिए आने की क्या जरूरत थी?’

‘सर, मैं इसलिए दौड़ा हुआ आया कि कहीं आप किसी और को ना रख लें।’

‘तुम्हारे गुरूजी ने यस बोल दिया?’  

‘यस सर।’

‘ओके। कल ठीक तीन बजे आ जाना। तभी काम भी समझा दिया जायेगा।’

मैं उन्हें नमस्ते करके अपने घर की ओर चला। अंधाधुंध साइकिल दौड़ाता हुआ। घर पर यह सुनकर होली-दीवाली जैसा माहौल हो गया। पड़ोस तक म़ें मिठाई बंट गयी।

वो 25 मई, 1984 का दिन था। अगले दिन जागरण में मेरी नौकरी शुरू होने वाली थी।

भुवेंद्र त्यागी… और इसका सारा श्रेय था नौनिहाल को!        

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है। वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं। उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com  के जरिए किया जा सकता है।

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Comments on “गुरु ने ओके किया तो गया जागरण

  • deepak Agrawal, Hindustan, Agra says:

    tyagi ji, soubhagya se mujhe bhi Meerut Amar Ujala me Noanihal ji ke sath kam krne ka mauka mela tha. apne apne jo sensmeran lekhe hai, unhai padhker mujhe bhe unki yad aa gai.
    Deepak Agrawal

    Reply
  • Rahul Chauhan says:

    Dear Bhuvendra ji,
    Aaj aapka Jagran meerut zone ka No.1 akhbar hai aur there is no competition from others. Aap logo ki mehnat hi hai….
    Rahul
    Jagran Meerut

    Reply

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