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जो जिसे खास समझता, वही जासूस निकलता

नौनिहाल शर्माभाग 16 : दैनिक जागरण, मेरठ की शुरूआती टीम में अनुभव और युवापन का बेहतरीन मिश्रण था। भगतवशरण जी खुद खबरें बहुत अच्छी लिखते थे। लेकिन उन्हें अपने हाथ से लिखने की आदत नहीं थी। जब उन्हें कोई खबर लिखनी होती या री-राइट करनी होती, तो वे नरनारायण गोयल को आवाज देते…. ‘नरनारायणजी, जरा आइये’। गोयल जी कहते- ‘आता हूं भगवत जी। कहिए।’

नौनिहाल शर्माभाग 16 : दैनिक जागरण, मेरठ की शुरूआती टीम में अनुभव और युवापन का बेहतरीन मिश्रण था। भगतवशरण जी खुद खबरें बहुत अच्छी लिखते थे। लेकिन उन्हें अपने हाथ से लिखने की आदत नहीं थी। जब उन्हें कोई खबर लिखनी होती या री-राइट करनी होती, तो वे नरनारायण गोयल को आवाज देते…. ‘नरनारायणजी, जरा आइये’। गोयल जी कहते- ‘आता हूं भगवत जी। कहिए।’

भगवत जी का अनुरोध होता- ‘अरे! पेन तो ले आइये। एक न्यूज फाइनल करनी थी जरा।’

‘जी सर।’

और भगवत जी बोलते जाते, नरनारायण जी लिखते जाते। राकेश सिन्हा पहले पेज के प्रभारी थे। लोकल के प्रभारी कुंतल वर्मा थे। प्रादेशिक डेस्क पर अशोक त्रिपाठी, द्विवेदी जी (जिन्हें हम दाऊ कहते थे) और रमेश गोयल थे। बिजनेस पेज कुछ दिन अशोक त्रिपाठी ने देखा। फिर उस पर लोग बदलते रहे। ओ. पी. सक्सेना लोकल और प्रादेशिक, दोनों जगह फिट था। कुछ दिन बाद दो ऐसे सहयोगी आये, जिनके व्यक्तित्व तो अलग-अलग थे, पर वे हमेशा कुछ ऐसा नया कर देते थे कि उसकी कई दिन तक चर्चा रहती थी। ये थे डॉ. रतीश झा और विश्वेश्वर कुमार। झा साहब को सब दादा कहते थे। गोरा-चिट्टा रंग, हष्ट-पुष्ट बदन, तेज और जोर से बोलने के आदी और सबसे खास बात ये कि खाने के शौकीन। वे खाने को लेकर लगायी गयी शर्त कभी हारते नहीं थे। हमेशा कुछ न कुछ बोलते रहते। इससे सबका मनोरंजन होता। उन्हें बहुत जानकारियां थीं। पर कभी-कभी बेहद मासूमियत से ऐसा शो करते कि वे निपट अनाड़ी हैं। हालांकि वे ऐसा केवल शो ही करते थे। और फिर हमें हंसते-ठहाके लगाते देखने का पूरा मजा भी लेते।

उनके विपरीत, विश्वेश्वर बहुत अंतर्मुखी था। हमेशा शांत रहता। कमल हासन जैसी अपनी मूंछों पर इस तरह उंगलियां फेरता रहता, मानो उनमें से कुछ निकाल रहा हो। कई बार दादा बोलते- का हो बिसेसरा, मूंछों में से समाचार सब निकालता है का रे?

विश्वेश्वर ने अपने मेरठ आने की भी अजब-गजब कहानी बतायी थी। वह अपने भाई की ससुराल गया था। वहां उसे ही उठा लिया गया। जबरन शादी कराने के लिए। उसे बंद कर दिया गया। लेकिन वह किसी तरह वहां से भाग निकला। अपने घर आया, तो उसे रिश्तेदारी में यूपी में लखनऊ भेज दिया गया। फिर मेरठ। भगवत जी उसके दूर के रिश्तेदार थे। उनके पास। उन्होंने उसे प्रशिक्षु संवाददाता बनवा दिया। कई दिन तक तो वह परेशान रहा। खबर कहां से लाये? कहीं कैसे जाये? अनजाना शहर, अनजाने लोग।

आखिर भगवत जी ने उसे कंपनी के लोन पर साइकिल दिलवा दी। वह मेरठ में घूमने लगा। धीरे-धीरे खबरें भी लाने लगा। कई बार की कोशिश के बाद इंट्रो लिखता। फिर हौले-हौले खबर। उसने संपर्क भी बना लिये। अच्छी खबरें लाने लगा। शुरू में वह भगवत जी के साथ रहता था। बाद में साकेत के पास ही एन. ए. एस. कॉलेज के एक प्रोफेसर की कोठी में छत पर बने कमरे में रहने लगा। खाना खुद बनाता था। स्टोव पर। एक बार खाना बनाते हुए उसकी दोनों आंखों की भौं जल गयीं। काफी दिन तक सब उसे इसके लिए परेशान करते रहे। वह मासूमियत से कहता, ‘अरे जल गया सो जल गया। इसमें इतना हल्ला करने का क्या जरूरत है। अपना बाल है, फिर आ जायेगा।’

और जब विश्वेश्वर की भौं पहले की तरह हो गयीं, तो उससे बाकायदा पार्टी ली गयी। उसके कमरे पर व्हिस्की की बोतल हमेशा रहती थी। और वो रोज पीता था। बोतल खोलता, एक ढक्कन भरकर मुंह में डालता। ऊपर से पानी पी लेता। पता नहीं उसकी इतनी ही खुराक थी या कड़की के मारे वो ऐसा करता था। आखिर 600 रुपये तनखा में से 100 रुपये साइकिल के कटते और 150 रुपये कमरे का किराया! पूरा महीना 350 रुपये में निकालना पड़ता।

यही हाल सबका था। मैं इसलिए खुद को राजकुमार समझता था, क्योंकि एक तो परिवार के साथ रहने के कारण मेरा कोई खर्चा नहीं था, दूसरे नौनिहाल ने मुझसे कुछ पत्रिकाओं में लिखवाना शुरू कर दिया था। उन दिनों जागरण में पत्रिकाओं में लिखने की छूट थी। मैं खेल भारती, खेल हलचल, स्पोर्टस वर्ल्ड, स्पोर्टस वीक, सन, परिवर्तन जैसी पत्रिकाओं में लिखता था। कुछ साहित्यिक लघु पत्रिकाओं में भी। इनके पारिश्रमिक से मेरा खर्च चल जाता था। दोस्तों के लिए भी बचा रहता। जागरण की तनखा मैं घर पर दे देता।

जागरण में तब मैटर की टाइपसैटिंग के बाद ब्रोमाइड निकाला जाता था और उसकी कटिंग-पेस्टिंग से पेज बनाया जाता था। संपादकीय विभाग के पीछे कंपोजिंग और प्रोसेसिंग रूम थे। सबसे पीछे प्रेस था। उसके एक कोने में पेस्टिंग का सेटअप था।

कई पेस्टर थे। उनका हैड था अखिलेश अवस्थी। पर्सनल इंचार्ज कमलेश अवस्थी का छोटा भाई। उतना ही शरारती। काम में भी काफी तेज। हममें से जो भी पेज बनवाने जाये, उससे खूब मजाक-शरारत करे और उसी छेड़-छाड़ में कमलेश जी की भी बहुत बुराई करे। लोग समझें कि दोनों भाइयों में झगड़ा है। और इस गफलत में सारी बातें इधर की उधर हो जातीं। कई महीने तो किसी को इसका अंदाज तक नहीं हुआ। बाद में धीरे-धीरे पता चला, तो सब दोनों भाइयों के सामने दूसरे की भरपूर तारीफ करने लगे। इससे वे दूसरी तरकीबें ढूंढने लगे। जागरण में यह बहुत चलता था। सबकी जासूसी होती थी। कोई जिसे अपना घनिष्ठ। समझता, वही उसकी जासूसी कर रहा होता।

तो अखिलेश ने एक दिन नौनिहाल के पेस्टिंग रूम में आने पर आपत्ति कर दी।

‘ये क्या काम करायेंगे? ना बोल सकते हैं, ना सुन सकते हैं। क्या होगा इस संस्थान का? पता नहीं कैसे गूंगे-बहरे लोग रख लिये जाते हैं?

‘नौनिहाल ने मेरी तरफ देखा। इशारे से पूछा कि यह क्या कह रहा है। मैंने उन्हें बता दिया। उन्हें गुस्सा तो बहुत आया, पर उसे पीकर बोले, ‘बच्चू, इस सवाल का जवाब तो कमलेश बाबू से लेना।’

उस रात तो बात वहीं खत्म हो गयी। लेकिन अगले दिन मैंने भगवत जी से इसकी शिकायत की। उन्होंने पूछा, ‘अरे भई, ये सब झगड़ा-टंटा तुम्हारे साथ ही क्यों होता है? और किसी को तो कोई शिकायत नहीं।’

‘सर, आई एम सॉरी। आपको परेशान करता रहता हूं। पर ये मानवीयता की बात है। क्या किसी को दूसरे का अपमान इस तरह करना चाहिए?’

‘बात मान-अपमान की नहीं है। तुम मामूली बातों को इश्यू बना लेते हो।’

‘सर, ये तो संवेदनशीलता की बात है…’

‘मैं ये नहीं कहता कि सेंसेटिव नहीं होना चाहिए। पर सेंसेटिविटी से ऊपर प्रेक्टिकलिटी को रखना चाहिए।’

‘ठीक है सर। आगे से ध्यान रखूंगा। पर इसमें मेरा कोई इश्यू नहीं था। ये तो नौनिहाल की बात थी।’

‘तो तुम क्यों परेशान हो रहे हो?’

‘परेशानी की बात नहीं है। सौमनस्य रहे तो काम में भी सहजता रहती है।’

‘ओके… ओके, अब जाकर काम करो।’

रात को एनएएस कॉलेज के सामने नाले पर भगत जी के खोखे में चाय पीते हुए मैंने यह किस्सा नौनिहाल को सुनाया, तो वे एकदम अविचलित रहे।

‘भगवत जी सही कहते हैं। हमें काम पर ही ध्यान देना चाहिए। जागरण नया अखबार है। यहां स्टाफ ज्यादा है। इसलिए टकराव की नौबत गाहे-बगाहे आयेगी ही। इस सबको नजरअंदाज करना होगा।’

नौनिहाल की इस सीख को मैंने गांठ बांध लिया। बाद में कई बार मतभेद के मौके आये, पर फिर हम कभी नहीं उलझे। बल्कि गुटबाजी में भी कभी शामिल नहीं हुए। हालांकि इस वजह से कई बार अपने ही दोस्तों से नाराजगी भी मोल ली। पर इसी सीख की भुवेंद्र त्यागीवजह से मैंने जागरण में चार साल बहुत सहजता से कटे। कभी कोई तनाव नहीं हुआ। हालांकि जागरण में इसके मौके बहुत आते थे!

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. vijay singh

    April 25, 2010 at 6:41 am

    sir phir agle bhag ka intzar rahega…….. vija singh (navbharat)

  2. santram pandey

    April 25, 2010 at 11:39 am

    bhuvnendra ji, aapne bahut purani baat yad dila di.Bhai Naunihal ki yad aa hi jati hai…… santram pandey Dainik Prabhat

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