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उन-सा संपूर्ण पत्रकार दूसरा न देखा

[caption id="attachment_16639" align="alignnone"]वर्गाकार घेरे में नीली शर्ट वाले नौनिहाल शर्मा.वर्गाकार घेरे में नीली शर्ट वाले नौनिहाल शर्मा.[/caption]

नौनिहाल होते तो देश के पहले मूक-बधिर संपादक होते : उनके बच्चों के प्रति जीवन दूसरी बार इतना क्रूर नहीं हो सकता  : सुधा भाभी के ब्रेन हैमरेज की खबर भड़ास4मीडिया पर पढ़कर बहुत दुख हुआ। उन्होंने पिछले 16 साल में परिवार चलाने की जिम्मेदारी अकेले ही निभाई है। जब 1993 में भाई नौनिहाल की दुखद मृत्यु हुई थी, तो मधुरेश, प्रतीक और गुड़िया काफी छोटे थे। मधुरेश ने जरूर अपनी उम्र के मानो कई साल लांघकर छोटे भाई-बहन को पढ़ाई के लिए प्यार से डांटने-डपटने की जिम्मेदारी ले ली थी। पर था तो वो भी बच्चा ही। ऐसे में सुधा भाभी ने जिस साहस के साथ तीनों बच्चों को पाला और अच्छी तरह पढ़ाया, वह सचमुच किसी साहस-कथा से कम नहीं है। उन्होंने एक दुर्लभ उदाहरण पेश किया है। बच्चे भी योग्य निकले। कल ही प्रतीक से बात हुई। उसने बताया, मम्मी की हालत में कुछ सुधार है। राहत मिली। उसे ढांढस बंधाया। कहा, हिम्मत रखो, सब ठीक हो जाएगा। फोन बंद करते ही मेरी यादों में नौनिहाल का अक्स उभर आया।

वर्गाकार घेरे में नीली शर्ट वाले नौनिहाल शर्मा.

नौनिहाल होते तो देश के पहले मूक-बधिर संपादक होते : उनके बच्चों के प्रति जीवन दूसरी बार इतना क्रूर नहीं हो सकता  : सुधा भाभी के ब्रेन हैमरेज की खबर भड़ास4मीडिया पर पढ़कर बहुत दुख हुआ। उन्होंने पिछले 16 साल में परिवार चलाने की जिम्मेदारी अकेले ही निभाई है। जब 1993 में भाई नौनिहाल की दुखद मृत्यु हुई थी, तो मधुरेश, प्रतीक और गुड़िया काफी छोटे थे। मधुरेश ने जरूर अपनी उम्र के मानो कई साल लांघकर छोटे भाई-बहन को पढ़ाई के लिए प्यार से डांटने-डपटने की जिम्मेदारी ले ली थी। पर था तो वो भी बच्चा ही। ऐसे में सुधा भाभी ने जिस साहस के साथ तीनों बच्चों को पाला और अच्छी तरह पढ़ाया, वह सचमुच किसी साहस-कथा से कम नहीं है। उन्होंने एक दुर्लभ उदाहरण पेश किया है। बच्चे भी योग्य निकले। कल ही प्रतीक से बात हुई। उसने बताया, मम्मी की हालत में कुछ सुधार है। राहत मिली। उसे ढांढस बंधाया। कहा, हिम्मत रखो, सब ठीक हो जाएगा। फोन बंद करते ही मेरी यादों में नौनिहाल का अक्स उभर आया।

स्वर्गीय नौनिहाल मेरी तरह शायद दर्जनों नए पत्रकारों के गुरु थे। मैंने उनके जैसा सम्पूर्ण पत्रकार आज तक दूसरा नहीं देखा। अगर 1993 की उस रात ऑफिस से लौटते हुए वे कार दुर्घटना से असमय काल के गाल में नहीं समाये होते, तो आज उन्हें संपादक होना चाहिए था। बड़ी बात ना मानी जाए, पर ऐसा होता तो वे शायद हरिवंश जी के बाद आज हिन्दी संसार के दूसरे सच्चे संपादक होते। और शायद पहले मूक-बधिर संपादक भी!  

जी हां, नौनिहाल बोल नहीं सकते थे। सुन भी नहीं सकते थे। उनके मुंह से एक अस्पष्ट-सी ध्वनि निकलती जरूर थी, पर उनके नजदीकी हम जैसे लोग ही उसे समझ सकते थे। उनसे बातचीत करनी पड़ती थी कागज पर लिखकर। हम हथेली पर अंगुली से लिखने की कोशिश करके भी काम चला लेते थे। बाद में तो संकेत भाषा भी हमने उनसे सीख ली थी।

सबसे पिछली कतार में खड़े लोगों में दाएं से दूसरे नंबर वाले गोल घेरे में नौनिहाल शर्मा

नौनिहाल से मेरी पहली मुलाकात ‘मेरठ समाचार’ के दफ्तर में हुई थी। मैं एक समाचार देने गया था। संपादक राजेन्द्र गोयल जी ने वह समाचार नौनिहाल को देने का इशारा किया। मैं उनके पास गया। उनका बोला मेरे समझ में नहीं आया। उन्होंने कागज पर लिखा- जरा बैठो। अभी बात करता हूं।

मैं सकते में। ये सुन नहीं सकते। बोल नहीं सकते। अखबार में काम कैसे करते हैं?

इस बीच वे कई काम निपटाते रहे। मेरा अचरज बढ़ता गया। इस दिन उन्होंने मेरे समाचार में गल्तियां निकालकर बताया कि समाचार कैसे लिखा जाता है। … और मैं उनका फैन हो गया।

ये नौनिहाल ही थे, जो मुझसे इंजीनियरिंग की राह छुड़ाकर मुझे पत्रकार बना गए। उनके साथ कुछ दिन ‘मेरठ समाचार’ में काम करके मैं ‘दैनिक जागरण’ में आ गया। वे भी वहीं आ गए। वहां उनके साथ मैंने चार साल काम किया। इस दौरान उनसे जितना सीखा, वह एक जीवन में सीखना कठिन है। वे ऑलराउंडर थे। कुछ भी लिखना हो, चुटकियों में लिख देते। लिखावट ऐसी कि छपे का भ्रम हो। एक दिन कंप्यूटर खराब हो गए। पेज घटाकर भी दो पेजों का मैटर टाइपसेट होने से रह गया। नौनिहाल ने पेज के ग्रिड पर हाथ से लिखकर तीन घंटे में दो पेज तैयार कर दिए। अखबार छपा। अगले दिन कई लोगों ने पूछा, आज दो पेजों पर कौन सा फोंट इस्तेमाल किया है?     

नौनिहाल को सतीशचंद्र शर्मा, मंगल जायसवाल, अनिल माहेश्वरी, महावीर जैन, अभय गुप्त, वेद अग्रवाल डी. एस. कंवर, नरनारायण स्वरूप गोयल और अनिल बंसल जैसे वरिष्ठ पत्रकार प्रशंसा की नजरों से देखते थे। वहीं ओमकार चौधरी, नीरजकांत राही, पुष्पेंद्र शर्मा, सूर्यकांत द्विवेदी, अनिल त्यागी, विवेक शुक्ला, ओ. पी. सक्सेना, विश्वेश्वर कुमार, कौशल और संजय श्रीवास्तव सहित हम नये पत्रकार उनकी प्रतिभा पर हरदम मोहित रहते थे।

जब मैं नवभारत टाइम्स में काम करने मुम्बई आ रहा था, तो नौनिहाल ने मुझसे गुरुदक्षिणा मांगी थी।

मैंने कहा था – नौनिहालजी, आपको गुरुदक्षिणा देने की मेरी ना तो कभी हैसियत हो सकती है और ना ही औकात।

उन्होंने कहा था – मैंने तुझे जो कुछ सिखाया, वह सब तू नये पत्रकारों को सिखाना।

मैं पिछले कुछ सालों से पत्रकारिता के विद्यार्थियों को पढ़ाकर उनकी गुरुदक्षिणा की पहली किस्त देने की कोशिश कर रहा हूं। जानता हूं, पूरे जीवन में हजारों विद्यार्थियों को पढ़ाकर भी शायद उतना ना सिखा पाऊं, जितना नौनिहाल ने मुझे पांच साल में सिखाया था।

वे बेहद हाजिरजवाब थे। शरारती की हद तक विनोदी भी।  इस विलक्षण पत्रकार के हजारों किस्से हैं मेरे पास। वे फिर कभी…

भुवेंद्र त्यागीआज तो मैंने प्रतीक से बात की। उसे ढांढस बंधाया कि उसके पिता को हम नहीं बचा सके थे। लेकिन उसकी मां को कुछ नहीं होने देंगे। मेरा विश्वास है, इन बच्चों के प्रति जीवन दूसरी बार इतना क्रूर नहीं हो सकता!   


लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है। वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं। उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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0 Comments

  1. saleem akhter siddiqui

    January 15, 2010 at 2:17 pm

    BHUVENDRA TU BAHUT BADAL GAYE HO. AB EH KISHORE SE PARIPAKV AADMI NAZAR AA RAHE HO. NOUNIHAAL KO YAAD RAKHNA UNKE PARTI AADAR SE BADHKAR HAI. NOUNIHAALL NE MUJHE BHEE MEERUT SAMCHAAR BAHUT CHHAPA THA.

  2. Kaushal Mishra

    June 11, 2010 at 7:22 pm

    Aapke pichhale janam ke karam achchhe rahe honge jo aapko itne achchhe margdarshak mil gaye.badhayee.

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