तो यह है इस देश में अदालतों का सच!

कुमार सौवीरमुझे लगता है कि अब अदालतों के कामकाज को लेकर भी समीक्षा का काम सम्भालने का मौका समाचारकर्मियों को सम्भाल लेना चाहिए। दरअसल, अदालतों के कामकाज में हस्तक्षेप न करने की एक परम्परा सी चली आ रही है। कब से? शायद शुरू से ही। और इसे बनाया है वकीलों ने। मुअक्किलों को भयभीत करने के लिए इससे बेहतर और क्या हो सकता है कि वादी को चुप रहने को कहा जाए और जो कुछ कहना है वकील ही कहे। लहजा कुछ ऐसा हो ताकि एक भौकाल बना रहे कि जज साहब का मिजाज जरा भी गड़बड़ाया तो सब किया धरा चौपट हो जाएगा, और अदालत की अवमानना अलग से कहर की तरह टूटेगी और अदालत का कहर खुदा के कहर से कम नहीं होता…. यह सब बातें अदालतों के बारे में लोगों के दिमाग में ठूंस-ठूंस कर भरी जा चुकी हैं। किसी भी अदालत में पहुंच जाइये। डायस पर बैठे हमारे-आपके जैसे शख्स को काला कोट पहने वकील लोगों द्वारा आनरेबुल कह कर सम्बोधित किया जाता है और काला कोट पहन कर जिरह करते व्यक्ति को वही आनरेबुल लोग लरनेड कहते हैं। यानी आनरेबुल व्यक्ति के लिए यह जरूरी नहीं कि वह लरनेड हो, जबकि इसके ठीक उलट यह जरूरी नहीं होता कि लरनेड व्यक्ति आनरेबुल हो।

लेकिन इतना जरूर होता है कि इन दोनों स्तम्भों के बीच न्याय की आशा में निरीह खडे़ लोग याची कहे जाते हैं। याची यानी याचना करने वाला, भिखारी यानी भिखमंगा। तो यह है हमारे लोकतान्त्रिक देश में अदालतों का सच। मैं अदालत या संविधान के किसी भी स्तम्भ की अवमानना की वकालत नहीं कर रहा हूं। लेकिन जब हम विधायिका और कार्यपालिका के कामकाज की समीक्षा कर सकते हैं तो न्यायपालिका की क्यों नहीं। आखिर उनमें कौन से सुर्खाब के पर लगे हैं जो समीक्षा करने से विद्रूप हो जाएंगे। क्या मजाक है कि उन्नाव की एक जज ने गलत फैसला दे दिया और जब हाईकोर्ट ने उनसे कैफियत पूछी तो बड़ी ही मासूमियत से बोलीं कि गलती हो गई, मुझे दरअसल एक्ट नहीं मालूम था। क्या इस तरह की गलती की माफी मांग लेने के बाद अदालत किसी को माफ करने का अधिकार रखती है। और क्या यह मासूमियत भरा अन्दाज किसी जज को क्षमा के योग्य बना सकता है। जौनपुर के एक जज साहब एक दुर्दान्त अपराधी का हाल-पता प्रदेश के तब के एक राज्यमन्त्री ललई यादव का सरकारी आवास लिखकर सम्मन जारी कर देते हैं। जब यह खबर हिन्दुस्तान में मैंने प्रमुखता से छापी तो जज साहब ने बिना किसी अधिकार के वह फाइल दोबारा मंगवाकर उस पर लिखा कि वह समाचार दुर्भावनापूर्वक छापा गया है और ऐसा सम्मन जारी करने के पीछे उनकी मंशा में कोई खोट नहीं था।

सवाल यह है कि आखिर आपको यह सफाई देने की जरूरत क्यों पड़ी। आपको तो अधिकार भी नहीं था कि आप वह फाइल तलब करते और उस पर अपने पक्ष में कोई मन्तव्य लिखते। जब हम यह लिखते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने लखनउ आते समय एक दुर्घटनाग्रस्त वाहन के घायलों को अपने वाहन से अस्पताल पहुंचाया, तो हम यह क्यों नहीं लिख सकते कि एक जज ने सार्वजनिक रूप से क्या-क्या हरकतें कीं। मुझे खूब याद है कि अपने साथ हुए अन्याय से बहराइच का सिविल जज पंकज सिंह किस कदर परेशान था। इतना परेशान और बेहाल तो मैंने किसी और असहाय को नहीं देखा। बेसाख्ता रो रहा था पंकज सिंह। मेरे आफिस में फफक कर रोया था वह। एक मी लार्ड, माई बाप, सरकार, हुजूर और अन्नदाता इतना निरीह हो सकता है, मैं सोच भी नहीं सकता था। और आखिरकार उन्हीं तनावों के चलते वह खुद गाड़ी चलाने की जिद कर बैठा।

मैंने बहुत रोका था उस दूध से धुले बच्चे जैसे शख्स को। मैंने बहुत कहा था कि मेरा घर भी तुम्हारा ही है, लेकिन मेरी बात न मानने पर मैंने उसे अपना ड्राइवर तक देने की बात कही थी। वह एक जी-दार इंसान था। नहीं माना। लेकिन तनावों ने उसे इस कदर तोड़ा कि बहराइच पहुंचने के पहले ही वह अपनी गाड़ी पर से नियन्त्रण खो बैठा। नतीजा, उस निहायत जिन्दादिल इंसान की दर्दनाक मौत हो गई। ऐसे तमाम शख्स हैं जो बाकायदा पंकज सिंह जैसी पीड़ा भोग रहे हैं। न्यायपालिका में मेरे कई मित्र ऐसे हैं जो ऐसे ही तनावों और अत्याचारों से रूबरू हैं, लेकिन ओहदा और सम्मान उन्हें कुछ भी बोलने से रोके हुए है। पहले जज और अब इस्तीफा देकर वकालत कर रहे चन्द्र भूशण पाण्डेय भी ऐसे ही त्रस्त लोगों में से एक हैं। बस फर्क सिर्फ इतना है कि पंकज ने मौत को गले लगा लिया, जबकि चन्द्रभूशण पाण्डेय ने अपना संघर्ष सार्वजनिक तौर पर लड़ा और आज भी लड़ रहे हैं।

हिन्दुस्तान मेरठ के सम्पादक दिनेश मिश्र खुदा तो नहीं हैं कि नौकरी भी करें और उस हर मामले की पैरवी भी, जहां-जहां उन्होंने नौकरी की। यह कैसे हो गया कि संवाददाता तो बच गया लेकिन सम्पादक को जेल की हवा खानी पड़ी। और फिर दिनेश मिश्र का मकसद अदालत की अवमानना करना नहीं था। अगर ऐसा होता तो वे सूचना मिलते ही अदालत की हुजूरी में हाजिर ही न होते। तो यदि जज समुदाय को अपनी प्रतिष्ठा की इतनी चिन्ता है तो उन्हें समाज के दूसरे जिम्मेदार समुदायों के प्रमुख लोगों के सम्मान की भी चिन्ता करनी होगी। उन्हें भी इस बात की सचाई जांचनी होगी कि आखिर उनके कृत्यों का परिणाम किस पर कैसा और कहां तक भारी पडेगा।

बहरहाल, क्या कोई जज मनमानी कर सकता है और क्या कोई जज संविधान से उपर है…. इस सवाल का जवाब आजादी के कम से कम साठ साल बाद तो अब मांगा ही जाना चाहिए। कोई न कोई तो इस बारे में पहल करेगा ही, हो सकता है कि किसी को इसकी सजा भी मिले। तो चलिए यह पहल मैं खुद ही किये लेता हूं।

लेखक कुमार सौवीर इन दिनों महुआ न्यूज चैनल के उत्तर प्रदेश के ब्यूरो चीफ हैं। उनसे संपर्क kumarsauvir@yahoo.com या 09415302520 के जरिए किया जा सकता है।

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Comments on “तो यह है इस देश में अदालतों का सच!

  • ARUN KUMAR SINGH MANER says:

    der hi sahi ek acchi suruat hai, hamara sambidhan abhibakti aur samanta ke swatantrata deta hai par ye mamla jab judiciery par ati hai to sabhi nayala ke nam par lafle me nahi padna chate hai.

    Reply
  • bal krishan goyal says:

    bahi yeh ek achi suruaat hai , joo ke bahut jaruri thii , adalat ke avmanana hai essa dar bana rakha hai ke koi kuch likhne or bolne se darta hai . har kisi ko jaruat hai dhayan dene ki or agar adalat me kuch galat ho raha hai too uske khilaf bolne ki , phir he hum kah sakte hai e hum azad hai

    Reply
  • Dear sir..
    read uor view abt “adalat ki sach”
    i agree with uor view after the 64 years of independence we must cover judge’s judgement in media
    but sorry to say, here its seems u also suffer with judge menatality, u r a little bit frastrate with judge
    as a journalist, we did not cover all important story, bcoz of pressure, we leave many impotant story, we compromise with our mission
    now a days media is not a mission, its just a simple any kind of job, its just a AD agency who decide abt our story, not we journalist

    looking forward to hearing from u

    rgds–

    Dhananjay

    Reply
  • Abhilash Bhatt says:

    Sauvir Bhai
    This article will create a new debate for media .But it have to see that how much media is aware for this . They are with you or without you .

    Reply
  • Rohit Gupta says:

    सर आपने जो लेख लिखी है वो सौ फिसदी सही और काबिले तारीफ है ,हमारे देश का एक भी इंसान आप की लिखी बातो को अगर सही तरीके से ले ले तो वो दिन दूर नहीं जब हमारे देश का हर इंसान हमारे देश के सविंधान से डरेंगा और आपने औदे का गलत प्रयोग नहीं करेंगा . मगर हमारे लोक तांत्रिक देश में यही तो एक खराबी है जहा खुले आम कानून की धज्जिया उड़ाई जाती है .और हमारे जैसे लोग केवल देखते रहते है वही कानून के रखवाले इसका भरपूर फायदा उठाते है . अब जब आपने इसकी शुरुवात कर ही दी है तो मेरा अपना मानना है की आज नहीं कल उन लोगो को भी इसका जवाब देना ही होंगा ….

    Reply
  • SURESH GANDHI says:

    बड़े भाई बिलकुल सही खबर है ऐसी लेखनी से समाँज में जाग्रति आयेगी
    सुरेश गाधी

    Reply
  • Vikshipt Pathak says:

    Aadarniya Sauvir Ji,
    bas Do sawaal

    1) Aajtak Kitne Bhrasht Patrakaron Ko Aapne ya Patrakarita ke Thekedaron ne Patrakarita karne se roka hai?

    2) Kitne News Channel ya Akhbaron ka Prakashan band karaya hai Bhrashtchaar ke chalte?

    Aaj Gali ka har Lafanga apni Gaadi pe Press likh ke chalta hai. Kasbon me log Patrakar isliye bante hain taki unki Thekedaari ya dalali chalti rahe.

    Aap ke do swabhawik reaction honge. . . Kaun si nayi baat batayi? Ya Ss@%* mujhe samjha raha hai. . .

    Khoob kariye adalaton ki reporting taki Judges bhi kuch Lafangon ki kalam se dar kar Apne faisle den aur Garibon ki awaz dabti rahe. Jaisa ki patrakaron ke dabaw me police karti rahi hai.

    Ek Swayam Siddh Buddhjiwi ne Civil Judge Pankaj Singh ki kahani Sunaai, arey Tathakathit Mitra Unke Jiwit Rehte unka dukh saamne laate. Hum Patrakaaron ko kisi ke Mar Jaane ke baad usme khabar kyon dikhti hai.

    Dilli me channel ki naukri pe laat maarne ke baad jab grih janpad ke rashtriya star ke akhbar me naukri ke liye gaya to mujhse bola gaya, nishulk sewa kariye, apne aur hamare kharche ka intezaam bhi karte rahiye. . . Aajkal Insurance bech raha hoon, aap me se kisi ko chahiye to awashya batayen.

    Yashwant Ji, agar waqai Rashtra, Samaj aur Patrakarita ki sewa karna chahte hain to BHADAS KO PRINT ME Chhapiye, aam janta ke beech me le jaiye. Aur tab dekhiye ye kalam ke saudagar, aapke liye Patrakarita ke asli chehre par kitna likhte hain. Aap abhi bhi Dalal Patrakaron ka naam chhapne se gurez kyun rakhte hain?

    Pehle Patrakaron ki aisi koi body banaiye jiske daant hon aur us se Patrakar rupi Dalal daren. Aap sau adchane gina denge. . . .
    Chaliye maine to apni bhadas nikal li, ab Patrakarita ke Bhasmasuri Swatantrata ke vakala ka intezaar karta hoon.

    Reply
  • Ajay Shukla says:

    भाई साहब
    आप सही कहते है. जज अपने को खुदा समाज रहे है. इन भ्रष्ट जजों की हालत ये है की वो ऐसे किसी भी व्यक्ति को हिकारत की नजर से देखते है जो उनके इस धंधे का विरोध कर सकता है. इसके खिलाफ मुहीम चलनी ही चाहिए.

    Reply
  • Manish Mishra says:

    Bahut Khoob….aap ko padh kar mujhe Dainik Jagran ka wahi purana Journalist yaad aa gaya jiski news aaj bhi logon ki juban par darj hain….keep it up
    Manish Mishra

    Reply
  • Respected Kumar Sauvir sir
    Apka artcle to hea hae sach…behad khushi hui.
    Ap badhai ke patr hae.
    Apki yeh pahal media jagat ka gauraw badhayegi.
    Mae apko satt-satt naman karta hu.
    Ravindra, bureau chief, Rashtriya Swaroop, Bareilly

    Reply
  • Vikshipt Pathak says:

    Ravindra Ji,
    8 kishton me chapne wali Ansal builders ki story 3 kishton ke baad kyun rok di thi Rashtriya Swaroop ne?

    Reply
  • alim sheikh says:

    yeh sahi hai adalaton ki bhi samiksha honi chahiye.saubeer ji ne himmat ki iske liye badhai.aj se takreeban 5 saal pahle jab mai free launsing karta tha to bahut likha.likhna chahiye shayad is se hi judiciary ki band ankhey khulen.ALIM SHEIKH REPORTER E.T.V.

    Reply
  • bhai aap aise likhoge to is desh ki democracy khatam ho jayege…………,,,,,,
    kya aap ye nahi jante ki judge ki ruprekha kya hoto hai agar jante hain to judge ko defination kar likh dikhayen.

    Reply
  • Vikshipt Pathak says:

    Yashwant Ji, Ignorance of Law is no excuse. Ek sampadak apne upar chal rahe muqadme se itne dino anbhigya rahe, hazam nahi hua. Judiciary me Bhrashtachaar hai, is se kisi ko inkaar nahi. Allahabad ke SHO ne jab Legal notice diya tha tab bhi patrakar bandhuon ko dard hua. Kya galat kiya usne khabar ka aadhar pooch kar.

    Judge ka role pesh kiye gaye saakshyon par apni samajh aur anubhav se nirnay dena hota hai. Shayad isiliye lower court ke judges ko public interaction ki manahi hai… 1985 ya us se pehle jin judges ne Allahabad High court se bina permission liye galat dhang se, beimaani ke paise se makan, gadi kharidi thi. . . Unhe kayi saal baad bina pension labh ke terminate kar diya gaya. Unme se kai ke parivar aaj muflisi me jee rahe hain. Bhrashtachar pe kathor kintu uchit nirnay tha.

    Kya Media me koi aisa aatm-anushashan hai? Kya bar-bas doshi hote huye bhi aap log India TV ko rok paaye, dalal saabit ho chuke patrakaaron ko apna Sada muh kholne aur patrakarit ka apni kalam se balatkar karne walon ko saza dila paaye. Agar kisi bhrasht patrakar ko police pakad le to wo bolne ki aazadi par hamla hota hai.
    Zarurat hai ek aise mechanism ki jo judiciary ko swatantra bhi rahne de aur nyay pranali me paardarshita bhi bani rahe. Aap padhkar muskuraayenge, shayad do char galiyan bhi nikalenge, fir bhi ummeed karta hun ki avesh aur bhavnaon se pare kuch tippani den.

    Reply
  • yadi kisi judge ke decision ke karan yadi koi aam aadmi ki jindgi narak ban jaati hai to us ka result ka kuch hissa us judge ko milna chahiye aur uski jimeddari media ki honi chahia. kyonki aisea nahi hone par court ka bhi man badh jayega aur yadi kisi bhi jail mai media check kara le to 50% kaidi without galti ke band honge jisme kisi na kisi judge ka hi haath hoga.

    Reply
  • sushil kumar says:

    Mai apne desh ke police systeme aur kanoon systeme ka nya nya bhuktbhogi hu.mere is anubhav me yahi paya ki agar apke pas paise aur phuch ho to aap is puri systeme se aap khel sakte hai.police station me agr koi sidha sadha admi kisi karan vash chala jaye to use gidhho ki trah nochne ko taiyar rahte hai.jo piase wale hote hai we pasie phenk kar apni hisab se apne pakch me reeport likhwa lete hai.aur hamari adalate jhan clarck ,peshkar.sarkari vakil ye sabhi khuleam rishvat lete hai,jazz ke bare me to nahi janta lekin jara uske driver ko dekhe aur uska rutba dekhe wo bhi kisi jazz se kam apne aap ko nahi smajhta aur kanoon ki dalali karta hai.jab nichle star per itna bharstachar hai to upri star jaise dsp,sp.jazz ye log iska hishha nahi honge bishvas nahi hota,bare mamlo me dalali jaroor karte honge.yahi karwa sach maine dekha hai.

    Reply
  • abhashek sharma says:

    Thanx Sir
    Pichhalee baar ki hee tarah aapne is baar bhee media ke mahatw ko ek baar fir se swarnaakshharon me ankit kar diya hae
    Abhishek Sharma
    Etv news, auraiya

    Reply
  • Dear sir..
    i my view ab hame bahas se aaga jana chahiye aur ek vavwashtha bananiye chahiye sir..
    64 years se sirf bahus ho raha hai, no law, no acheivement we did, country did sir..
    mujhe as a ek bacha journalist( bacha issliye ki mein journalism mai aapse se bahut chota hu)samjha nahi aata hi prime minsiter se laikar president, chief justice of india sab yeh kahte hi india mai corruption hai, lekin koye issko khtma kyu nahi karta sir?
    even Rahul Ghanhi bhi bol chukai hai ki ” india mai justice mujhe delay se mila to aam aadami ka kya haal hoga?
    i want to know WHO are the corrupt people between us sir?
    mein aap se puri tarah agree hu
    rgds–
    Dhananjay

    Reply
  • anoop Mishra says:

    kumar ji apne patrkaro kv bare me socha or jo us judge ko aaina dikhane ka kam kiya vo kabile tarif hai yeh adalto me baitaahne wale judge sabse bade mafia hote hai thanks anoop mishrareporter starnews bareilly

    Reply
  • kashi yadaw, lucknow says:

    aap ke vichaaro se mae poori tarah ittefaq rakhta hu.
    nyay-paalika ke kam-kaj aor jajo ke acharan ki samiksha to ab honi hi chahiye.
    kyu ki loktantra ke is mahatvapoorn stambh ki jimmedara dusaro ke mukable sabse jyada hoti hae, is kisi ko koi shaq ya aetaraz nahi hona chahiye.

    Reply
  • Ravi srivastava says:

    aap ne ek jo nai bahas chedi hai ho sakta hai ki aane wale dino me ek mudda ban jaye iske liye jaroori hai ki hum aap apni kalam se lagaataar is tarah ke lekh likhte rahe kyonki ab samay aa gaya hai ki nyay palika ki bhi samiksha ho is lekh ke jariye ye hum kah sakte hain ki ab samaaj ko nyaypalika ke prati bhi jaagrook hone ka waqt aa gaya hai

    Reply
  • Vikshpit.Pathak says:

    Jin Chandra Bhushan Pandey ka dard aapne bayan kiya hai wo Naitik Party banakar Naitikta ki duhai dete hain aur dusari taraf Manjunath ke hatyaron ki Vakalat karte hain. Kam se kam udaharan to kisi bedag insan ka diya hota. CB pandey ne apni vyaktigat mahatwakancha ke chalte istifa diya tha. Kyonki unka transfer rajyapal ke vidhi salahkar pad se wapas lower court me kiya gaya tha. Sharm aati hai ki aapke jaisa varishth patrakar anaitik logo ka udaharan ek swasth bahas me adarshwadi ke roop me prastut karta hai. Is se to apki bhi niyat aur naitikta par sawal uthta hai zanab.
    TO YAH HAI AAP JAISE PATRAKARON KA SACH. Bhagwan bachaye is desh ko jahan aap jaise bhrasht patrakar aur pandey jaise anaitik log vyavastha ko apni ungliyon par nachana chahte hain aur jab apki kutil mansha poori nahi hoti to vyavastha me sudhar ke thekedar ban jaate hain.

    Reply
  • Vikshpit.Pathak says:

    Kumar Sauveer jis veerta se CB Pande ki Dalali kar rahe hain, unki Naitikta ka ek kissa aur, wo Manoj Gupta hatyakaand ke aropi thanedar ki bhi vakalat kar rahe hain.
    Party banai hai, Naitik Party jiske Dalal ban gaye hain KUMAR SAUVEER.
    Pandey se jab logo ne pucha, hatyaron ki vakalat kyon, to jawab tha adalat ne abhi doshi karar nahi diya, to unhe hatyar kyon kah rahe hain. Jin rajnitigyon ko dosh dekar Pandey naitik party banate hain khud wohi kaam karte hain aur Kumar Sauveer jaise Patrakar, Patrakarita ke peshe ko bechte huey aise logo ki dalali karte hain.

    Reply
  • Dr. Ravi Gaur says:

    YATHA NAAM, TATHA GUN.
    vikshipt ji to vastav me VIKSHIPT hee lagte hae.
    samvidhan aise VIKSHPT logo apne thenge par hi rakhana chahte hae.
    vo chaahte hae ki is desh me koi bhi insaan bina apni baat adaalat ke saamne rakhe, phansi par chadha diya jae.
    abhivyakti ki swatantrata ka koi bhi matlab in VIKSHIPT mahodaya ko kaise samajh me aa sakta hae. jo yeh chaahte hae ki adalat me kisi bhi maamle ki sunwai ek-tarfa honi chahiye. jisne is halat ko nahi bhoga. vo iska dard kaise jan sakta hae,
    are vikshipt ji. kasab tak ko adalat tak ne sarkari kharche par vakil diya hae. aor aise vakil anaitik nahi hote. ap ki tarah vikshipt bhi nahi hote.
    vikshiptata ka yeh matlab nahi hota hae ki aap har-ek mamle me apni taang adate rahe,
    ap kisi se bhi puchh le ki ap ki tarah ke vikshipt logo ke sath nagar palika valo dwara kaisa vyavhaar kiya jata hae. gambhir mansik rogiyo ke liye aagra aor ranchi me bade aspatal bhi hae.
    kuchh sakaratmak sochiye aor keejiye to aap ki vikshiptata jaldi hi sudharne lagegi. pratyek insan par keval lanchhan lagana hi bahaduri nahi hae, nayi aor bahadur pahal karne walo me achhai bhi to dekhiye. lekin ap pahle apni vikshiptata se to nijat pa le.

    Reply
  • Vikshipt.Pathak says:

    Chaliye mana to aapne ki mujhme YATHA NAAM TATHA GUN hain. Kam se Kam Saamne Adarshwadita ka dhong rach kar peeche apni dalali ki dukaan to nahi chalata. Waise duniya ka dastur hai ki agar sahi aur kadwa bologe to VIKSHIPT hi kahe jaaoge, isiliye to pehle hi apna namkaran kar liya.

    Rahi bat adalat me Manjunath aur Manoj Gupta ke hatyaron ka muqdama ladne ki, ladiye khoob ladiye, kam se kam tab Naitik Party banakar Rajniti ke apradhikaran ka Vidhwa-Vilap mat kariye.

    Dohra mapdand apnayenge to lanchan to package offer me milega Dr. Saheb.

    Aur ab baat Khabari jamat ki to UP me lagbhag 4500 akhbaar panjikrit hain, kitne nazar aate hain? Baki kahan pacha gaye ap log aur KYON?

    Pahle apna Ghar to kisi Nagar Palika wale se saaf karwa lo miyan. Fir chahe jahan apni kalam se taang adao ya sar do meri bala se.

    Zara si aapki poonch par paer kya pad gaya ap to waqai me dard se bilbila uthe aur Ranchi se Agra tak ke apne purane thikane yad kar baithe. Chaliye yad rakhen wapas jane me asani hogi.

    Han is Agra aur Ranchi ke chakkar me mudde ko hazam mat kariyega, jaise ki filing wale akhbaron ki kali syahi karti hai.

    Reply
  • nishant ranjan says:

    ye baat such hai ki adalat ke faisale kabhi-kabhi galat sabit bhi hote rahe hai or iska khamiyaza garib-majloom tatha begunaho ko bhi bhugatana padata hai.mai aapki bato se kafi had tak santushth hoo tatha nyayapalika par lagaye gaye tamam sawaliya nishan aane wale dino me ek mudda banega isme koi do ray nhi hai.is mudde ko ek aandolan ki tarah chalane ki jaroorat hai.jaroorat hai hum sabko aage aane ki.jab khoon se aasman par inqalab likha ja sakta hai to kalam se jamin par bane is nyaypalika ko kyo nhi uski jaminee haqikat se roo-b-roo karaya jaye.
    aapki lekhni se dushyant kumar ki ek kavita ke mayane saf ho gaye hai —YAHAN TO SIRF GUNGE OR BAHARE LOG BASTE HAI
    NA JANE KIS TARAH YAHAN KOI JALSA HUA HOGA.
    aapki is pahal or aapke jajbe ko hamara LAAL SALAM.

    Reply
  • Vikshipt.Pathak says:

    Judge Sahaban ko bhi ab har faisle ke baad DAGGE ka intzam karna padega, warna DAGGEBAZON ki Bhookhi Nangi Fauz apni Kalam Se Kali Syahi Ki Ultiyan Karne Ko Bekarar hai … (agar kini mahanubhav ko kasht hua ho, to Kripya PNB PC ki khabar aur tasveeren awashya dekh len).

    Reply
  • sasha sauvir says:

    its a quiet awaring issue…which should not only be read by all,but take steps filled with efforts to end up this, especially by youths.its an awareness for all unaware people who blindly trust the courts.people who pollute the court of law…this article is a pointing fingure on them.Really a good and motivating effort.

    Reply
  • amitosh srivastava says:

    Sauvir ji, nischay he aap ne ek mahaan suruaat ki hae. Nyaypaalika ke kaamkaaj ki bhi purntaya samiksha honi chahiye, tabhi hamare samaj ke masoom aur kamjor abke tak nyyaya ka sahi arth pahuch paayega.
    Aap ki is pahel ka mae tahe dil se swagat karta hu aur umeed karta hu ki hamara samaj bhi aap ki is pahal me pura sahyog karega

    Reply
  • Akash Shukla says:

    No doubt it is a fundamental problem of our law but nobody has shown these guts to publish it on this type of networking site.
    Yes we are the humans of an independent and self governed country but we do not have proper rights to interfere in the matters of courts, we cannot make any hindrance in any judge’s decision.
    Then how can we say that we are the people of a democratic country???
    Every system of this country is interconnected to each other and making corruption without any reluctance.
    So many people like Pankaj Singh are targeted by this polluted system of the country everyday.
    It is very good to know that atleast our media is active and making every effort to aware the people.
    It is very much motivating article for the young ones of the country like me.

    Thanks for your provoking effort!!!!!!!

    Reply
  • Akash Shukla says:

    No doubt it is a fundamental problem of our law but nobody has shown these guts to publish it on this type of networking site.
    Yes we are the humans of an independent and self governed country but we do not have proper rights to interfere in the matters of courts. We cannot make any hindrance in any judge’s decision.
    Then how can we say that we are the people of a democratic country???
    Each and every system of this country is interconnected to each other and making corruption.
    So many people like Pankaj Singh are targeted by this polluted system of the country everyday.
    It is very great to know that atleast our media is active and making such a nice effort to aware the people.
    It is very much motivating article for the young ones of the country like me.

    Thanks for your nice effort!!!!!!!

    Reply
  • AZAHAR SIDDIQI, LUCNOW says:

    AAP TO AKELE HEE CHALE THE JANIB-E-MANZIL MAGAR,
    HAM SAB BHI AA KAR JUDTE GAYE AUR KARWAN BADHTA GAYA.
    Ab kuchh logo ko yadi ap ki rai se ittefaaq nahee hae, to yeh bhee to unka adhikar aur loktantrik vyavastha ke tahat hee hae.
    Hae ki nahi ?
    AZAHAR SIDDIQI, LUCNOW
    azharsiddiqui88@gmail.com

    Reply
  • RUBY SIDDIQUI, LUCNOW says:

    Jo laga rahe hai tohmat teree paak damni par,
    vo kaha ke hai PAARSHA unhe sochna padega
    Kumar ji,
    Ap ki soch kafi had tak theek hai. aapki is pahal ko MERA salaam.
    Baki baate bilkul 16 aane sach hai.
    Kabhi kabhi to na jane kitne log nyay ke intezar me apni tamaam umar gujaar dete hai aur UMR ke aakhiree mod par un ko pata chaltaa hae ki usne to vo gunaah kiya hi nahi tha. jiski saza use mili.
    Kya kanon un zindagiyo ka thekedar hai ki jise chaha use barbaad kar de aur kahe ye kanon hai aur baad me jab tohamat lagene ka vaqt aaye to bade hee maasoomiyat ke sath bas higher court ke samne khada ho jaye aur kahe ki huzur galti ho gai. Theek waise hi jaise unnao ki ADJ ne high court se kaha tha ki mujhe kanoon ki jankari nahi thi sahib, maaf kar dijiye ….sahib maaf kar dijiye…..
    RUBY SIDDIQUI, LUCKNOW

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  • “जाट ने कर दी खड़ी खाट ”
    मीडिया ये
    क्यों नही बताती की जिस
    संत की वो बुराई करते नही थक
    रही उसने ज्ञान में सारे हिन्दू -मुश्लिम बाबाओ
    के झोले खाली कर दिए मुसिलम
    पर्वक्ता जो तालीम-ए-इल्म होने पर
    छाती ठोकते है ,अरब के मदरसों में पनाह मांगते
    नजर आते है इस संत के आगे
    चारो शंकराचार्य दो दो बार मुह की खा के जाते है ,
    मीडिया ये
    क्यों नही बताती की इस
    संत का चैलेंज दुनिया के हर संत को दिया गया वो आज तक
    सामने नही आये ?
    मीडिया ये
    क्यों नही बताती की संत
    के शिष्य तो किसी के बारे में बुरा सोच
    भी नही सकते हिंसा तो दूर
    की बात ?
    मीडिया ये
    क्यों नही बताती की संत
    का आश्रम सुप्रीम कोर्ट से मिलने के बाद
    भी उसे क्यों नही दिया गया ?

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