पत्रकारिता के नाम पर जो छूट मिली हुई है, वह स्टेट पावर का फेल्योर है : हरिवंश

हरिवंश”नेहरूजी के जमाने में जितने बड़े संपादक थे, क्या वो नहीं जानते थे कि हमारे समाज में अंधविश्वास है? क्या वो नहीं जानते थे कि हमारे समाज में सनसनीखेज चीजे, चरित्र हनन की चीजों को लोग ज्यादा पढ़ते हैं? वो लोग सब जानते थे. पर जर्नलिज्म के हमारे लीडर ऐसे थे जिन्होंने समाज के लिए सोचा. कहा कि अंधेरे में पड़े हुए समाज को उजाले में ले जाना है. इसलिए उन्होंने वो अंधेरे वाले पक्ष को उठाना छोड़ कर, चेतना की ओर ले जाने का काम किया. आज हम लोग क्या कर रहे हैं? इतना आगे पहुंचकर भी लोगों को अंधेरे में डाल रहे हैं? ये कितना बड़ा फर्क है. आप देखिए, तब चलपति राव जैसे व्यक्ति थे. राम राव थे, विक्रम राव के पिता. आजादी की लड़ाई के दौरान अंग्रेजों के आपरेशन में ये लोग देश और जनता के लिए जेल में रहे. परेशान हुए. जब आजादी मिली तो इमरजेंसी के दौरान चलपति राव जी जैसे आदमी मामूली चाय की दुकान पर चाय पीते हुए मर गए. उनको आठ घंटे बाद देश ने जाना कि वो मर गए. उनके कलम से पंडित नेहरू जैसे लोग प्रेरित होते थे. ऐसे लोग थे हमारे रहनुमा. ऐसे लोगों ने हमारी भारत की पत्रकारिता की नींव डाली. आज हम कहां पहुंच गए हैं? आज कोई राम राव को याद करता है? चलपति राव के नाम पर कोई पुरस्कार है? इसी तरह हिंदी में ऐसे-ऐसे अखबार हुए जिन्होंने चुना कि हमें काले पानी की सजा ही लेनी है. स्वराज अखबार इलहाबाद से निकला. उसके छह संपादक हुए. उनकी कलम से डरे अंग्रेजों ने सभी को एक-एक कर काले पानी की सजा दी. इस अखबार में निकलता था कि जो काले पानी की सजा के लिए तैयार हैं, वहीं उस अखबार का संपादक बनने के लिए आवेदन करें. और, तब भी लोगों की लाइन लगी रहती थी. क्यों तब इस देश में पत्रकारिता के मोरल लीडर्स थे, इनटेलेक्चुवल लीडर्स थे. आज तो जो लोग अपराध की दुनिया से नजदीकी संबंध रखते हैं, अपराधियों से सांठगांठ रखते हैं, उन्हें इसी गुण के कारण संपादक बना दिया जाता है. मालिकों को यह समझना बंद करना चाहिए कि उनका अखबार या टीवी चैनल लूटने के लिए है.”


…ये बातें कही, बताई और समझायी है हरिवंश जी ने. समकालीन पत्रकारिता के उन चुनिंदा नायकों में से एक हैं हरिवंश जी, जो अपने समय-काल के प्रलोभनों से परे हटकर नैतिक और सामाजिक सरोकारों के लिए लिखते, पढ़ते, करते, जीते हैं. पिछले दिनों भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत ने पत्रकारिता के आगे मौजूद ढेर सारे सवालों पर बिहार-झारखंड के प्रमुख अखबार ‘प्रभात खबर’ के प्रधान संपादक हरिवंश जी से फोन पर बातचीत की. संयोग ये था कि बातचीत जिस वक्त हुई, उस समय हरिवंश जी अपने गांव में थे. वही गांव, जहां जेपी पैदा हुए, जहां चंद्रशेखर ने सैकड़ों बार डेरा डाला. हरिवंश जी ने जो कुछ कहा, वह समकालीन पत्रकारिता को समझने के साथ-साथ इसे आगे सकारात्मक दिशा की ओर मोड़ने के लिए रोडमैप की तरह है.  उम्मीद है आप सभी उनकी बात को न सिर्फ गंभीरता से पढ़ेंगे बल्कि सोचेंगे-सुझाएंगे व अमल भी करेंगे. याद रखिए, एक-एक मिलकर ही ग्यारह की ताकत बनते हैं. तो आइए, हरिवंश जी की पूरी सोच, पूरी बात को बिना किसी सवाल-जवाब, बिना किसी अवरोध के, उन्हीं की जुबानी सुनें…


प्रिंट और विजुवल मीडिया समाज तोड़क भूमिका में

  • किसी के बारे में कुछ भी लिख-बोल देने की छूट हमारा समाज नहीं देता

  • अन्य स्तंभों के गड़बड़ाने से मीडिया वाले भी छूट लेकर अराजक हुए

  • टीआरपी के खिलाफ टीवी संपादकों की पहल स्वागत करने योग्य है

  • सिर्फ संपन्न लोगों के लिए अखबार निकालेंगे तो नीचे के लोग कहां जाएंगे

  • बात-बहस बहुत हो गई, पेड न्यूज के खिलाफ आयोग बने और एक्शन हो

  • कौन रोता है गरीबी पर? कौन लिखता है देश-समाज की चुनौतियों पर?

-हरिवंश-

मैं इन दिनों अपने गांव में आया हुआ हूं. यहां से फोन कभी-कभार ही मिलते हैं. संयोग है कि तुम्हारा फोन मिल गया. टीआरपी पर जो सवाल खड़े हो रहे हैं, वह एक शुरुआत भर है. दरअसल टीआरपी के लिए जो होड़ है, उससे पूरी पत्रकारिता का स्तर खराब हो रहा है. समाज के सामने जो चुनौतियां है उस पर बात नहीं की जा रही है. टीआरपी के नाम पर समाज के मुद्दों से मीडिया दूर हट रही है. होड़ यह है कि किस तरह से हम व्यूवर्स पैदा कर सकें. पत्रकारिता की भूमिका क्या हो…. एक ऐसे समाज में, जो आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है, जहां आज भी बड़े पैमाने पर लोग अशिक्षित हैं, लोग बहुत सारी चीजों को अच्छी तरह से नहीं जानते तो वहां पर लोगों को वेल इनफार्म्ड करना, चेतना को जागरूक करना ही पत्रकारिता का काम है, पत्रकारिता की भूमिका है. पर कई बार ऐसा होता है कि बहुत फूहड़-सनसनीखेज और अश्लील चीजों की ओर भी आम जन मानस की निगाह जाती है. यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि लोग अफवाहों की ओर ज्यादा ध्यान देते हैं. एक गासिप कल्चर हमारी पूरी सोसाइटी में है और हम परनिंदा के बहुत शिकार होते हैं. सेंसेशनल चीजें देखना चाहते हैं. ऐसे में अवैज्ञानिक और अतार्किक चीजों को लगातार दिखा करके व्यूवरसिप को इकट्ठा करने की कोशिश की जाती है. यह कदम समाज की चेतना को पीछे की ओर ले जाता है.

समाज के सामने बहुत-सी चुनौतियां हैं. आज देश में नक्सल चुनौती है. कई राज्यों में तो नक्सली वस्तुत: शासन कर रहे हैं. अब देश को यह तय करना है कि वो लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहेगा या फिर नक्सलियों की बढ़ती ताकत की ओर जाएगा. दूसरी गंभीर समस्या है गवर्नेंस की. इस समय सबसे गंभीर समस्या कप्शन की है. करप्सन चरम पर है. मैं इस समय गांव में हूं. जेपी के गांव जयप्रकाश नगर का रहने वाला हूं. यहीं जयप्रकाश जी का जन्म हुआ. चंद्रशेखर जी का इलाका रहा है यह. तो यहां मैं सुनता हूं कि विधवा पेंशन के लिए जो महिला विधवा भी नहीं हुई है, उन्हें भी ताकतवर लोग विधवा घोषित कर विधवा पेंशन दिलाते हैं. आंगनवाडी में फर्जीवाड़ा है, ऊपर से नीचे तक पैसे बंटते हैं. कल्याणकारी समाज के लिए जितने कदम हैं, समाज को आगे ले जाने के लिए, वो करप्सन में जा रहे हैं. अरबों रुपए इस देश के लूटे जा रहे हैं. विदेशों में भी, स्विस बैंक में, ऊपर के नेतृत्व वर्ग का जो पैसा है, जा रहा है. आज पत्रकारिता इन सवालों को कहां उठा रही है.

आज चीन बहुत बड़ी चुनौती बन गया है. हमारा देश नहीं जानता कि चीन की ताकत कितनी बड़ी हो गई है. वो भारत को एक धमकी देता है कि अरूणाचल प्रदेश में आप काम नहीं करेंगे और प्रधानमंत्री से लेकर सब सफाई देने पर उतारू हो जाते हैं. देश के सामने इतनी गंभीर और मौलिक समस्याएं हैं. इस पर कोई गंभीर बहस न हो, स्टेट पावर खत्म हो रहा है, उस पर कोई चर्चा न हो, गवर्नेंस खत्म हो रही है, उस पर कोई चर्चा न हो. इनकी जगह कहां भूत-प्रेत है और कहां पूजा हो रही है और कब दुनिया खत्म हो रही है, इस तरह की अवैज्ञानिक चीजें दिखाई जा रही हैं. ऐसी चीजें किसी समाज में दिखाई जाएं, इसकी इजाजत पत्रकारिता को नहीं होनी चाहिए. मैं मानता हूं कि भारत में पत्रकारिता के नाम पर जो छूट मिली है, वह स्टेट पावर का फेल्योर है. जब गांधी-नेहरू या बड़े लोगों ने कल्पना की तो उसमें सोचा गया था कि पत्रकार भी अपने दायित्व का जिम्मेदारी के साथ निर्वाह करेंगे. आज पत्रकारिता के नाम पर, चाहे वे टीवी चैनल हों या अखबार, छोटे-बड़े सभी जगहों पर, कोई भी कुछ कह सकता है, दिखा सकता है, छाप सकता है, कोई कुछ भी लिख सकता है. क्योंकि किसी को किसी से डर नहीं है कि कुछ होने वाला है. न तो न्यायपालिका काम कर रही है और न ही पोलिटिकल मोरल का भय रह गया है. न ही कोई चीज लाजिकल एंड तक जाती है. इसलिए मीडिया वाले निर्भय होकर जो कुछ चाह रहे हैं, कर रहे हैं, दिखा रहे हैं.

टेलीविजन बहुत प्रभावशाली माध्यम है. लोग इससे गाइड होते हैं. ये मीडिया जिस तरीके से इस देश को चला रही है, आदमी को गाइड कर रही है, इसको मैं दुर्भाग्यपूर्ण मानता हूं. खुद ये मीडिया सनसनीखेज चीजों से गाइडेड हो रही है. ये मीडिया गाइडेड हो रही है आधारहीन चीजों से. अवैज्ञानिक चीजों से. अगर गंभीर मीडिया प्रशासन की, स्टेट पावर के मजबूत होने की, समाज को बेहतर बनाने की, करप्सन को दूर करने की बातों की ओर लोगों को जागरूक करे, इस बारे में बताए तो देखिएगा मीडिया का निश्चित रूप से एक पाजिटिव रोल होगा. स्वतंत्रता और छूट इस काम के लिए मिलनी चाहिए. किसी के बारे में कुछ बोल दें, इसके लिए हमारा समाज छूट नहीं देता. यह छूट जबरन ले लेने से हमारे यहां आज अराजकता की स्थिति पैदा हो गई है.

टीआरपी के खिलाफ जो पहल टीवी के संपादक लोग कर रहे हैं, आवाज उठा रहे हैं, वह स्वागत योग्य है. यह ऐतिहासिक कदम है. यह बहुत अच्छा कदम है. इससे प्रिंट मीडिया वालों को भी प्रेरित होना चाहिए. आज प्रिंट में भी होड़ लग गयी है कि हमको आईआरएस चाहिए. जैसे वहां टीआरपी की बात है तो आईआरएस में भी जिसमें सम्पन्न वर्ग को एसीसीए यानि समाज का वह वर्ग जो सबसे अधिक आय कर रहा है, पैसा कमा रहा है, उसके लिए अखबारों में होड़ लगी है. क्या बाकी लोग समाज में नहीं रहते? इस देश में अगर सिर्फ संपन्न वर्गों के लिए हम अखबार निकालेंगे और मध्य वर्गों के लिए निकालेंगे तो नीचे के लोग जाएंगे कहां?

दूसरा मुद्दा जो आपने उठाया पैसे लेकर खबरें छापने की तो पेड न्यूज के खिलाफ जिन अखबारों ने कदम उठाया है उसमें प्रभात खबर भी है. प्रभाष जी ने इस मसले को उठाया. हम लोग तभी से लगातार इस पर छाप रहे हैं. यहां झारखंड चुनाव हुआ और हमने चुनाव से पहले ही प्रकाशित किया कि पैसे लेकर खबरें हमारे यहां नहीं छपती हैं. हम लोगों ने अपनी आचार संहिता का प्रकाशन किया. फोन नंबर दिया कि अगर किसी को कोई शिकायत करनी है तो सीधे संपादक को फोन करके बताएं. मैं तैयार हूं. मैं चाहता हूं कि बात आगे बढ़े. कोई आडिट संस्था बने जो यहां-वहां, हर जगह जाकर देखे कि चुनाव में झारखंड में प्रभात खबर ने क्या किया है. सारे कैन्डीडेट से मिले. किसकी कितनी खबरें छपी हैं, इसकी पड़ताल करे. और बाकियों की भी जांच करे. जब तक हम कोई नैतिक आचार संहिता नहीं रखेंगे, तब तक वो चाहे प्रिंट मीडिया हो या विजुवल मीडिया, दोनों समाज को तोड़ते रहेंगे. हमारी मीडिया आजकल इसी भूमिका में आ गई है.

आपने देखा होगा कि पिछले दिनों हम लोगों ने बिहार पर एक बहस चलाई थी. उसमें एक अवधारणा थी. समाज के चर्चित सवाल को उठाते रहना चाहिए. अब हम लोग यह सवाल नहीं उठाते कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पूर्वी उत्तर प्रदेश में फर्क क्यों है? पूर्वी उत्तर प्रदेश को लेकर नेहरू जी के जमाने में गहमरी रिपोर्ट आई थी. उस रिपोर्ट में गरीबी की जिस स्थिति का वर्णन किया गया था, कहा जाता है कि उसे सुन करके पार्लियामेंट में नेहरू जी रो पड़े. लेकिन आज भी वहां के लोग गरीब बने हुए हैं, क्योंकि कोई आवाज नहीं उठाता. पालिटिक्स उस पर डिस्कस नहीं करती. मीडिया उस मुद्दे को नहीं उठाती. मैं ये बात सिर्फ टीवी के लिए ही नहीं, प्रिंट के लिए भी कह रहा हूं. प्रिंट मीडिया को भी जनता के मुद्दे पर आगे बढ़ना चाहिए. हम लोग क्षेत्रीय स्तर पर इसकी कोशिश करते हैं लेकिन सामूहिक तौर पर जब सभी लोग प्रयास करेंगे, तो इसका भी व्यापक और सामूहिक होगा. समाज में जो गरीब लोग हैं, उनको हमें प्रियारिटी पर रखना होगा.

बात हो रही थी पेड न्यूज की. तो, इस मामले में मेरा क्लीयर स्टैंड है कि पेड न्यूज की प्रथा कैसे शुरू हुई, यह कैसे आगे बढ़ी, इसकी कोई जांच रिपोर्ट बननी चाहिए. पार्लियामेंट में हमारे पार्लियामेंटेरियन सिर्फ डिस्कस करते हैं. सिर्फ डिस्कस करने से कोई बात नहीं बनने वाली. इस पर जांच आयोग बने और जांच हो कि अब तक लोगों ने क्या किया. लोगों का पिछला रिकार्ड चेक होना चाहिए. पिछला रिकार्ड चेक करके उस पर एक्शन लेना चाहिए. दूसरी पहल होनी चाहिए कि एक लोक मानस बने. ऐसे काम करने वाले अखबारों का विज्ञापन बंद करे सरकार. ऐसे काम करने वालों को समाज जाने. ऐसे काम करने वालों से राजनीतिक दल नफरत करें. मैं कोई ठोस कदम उठाए जाने की बात कर रहा हूं. लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हमारे देश में सिर्फ और सिर्फ बात करने और चर्चा करने का ही दौर चलता है.

मैं कल एक पुस्तक पढ़ रहा था. अरुण शौरी की नई पुस्तक आई है. अभी कुछ दिन पहले रिलीज हुई है. उसे मैं पढ़कर दंग रह गया. किताब में जो उनका पहला ही लेख है, जो उन्होंने राज्य सभा में भाषण दिया था. यह भाषण मुंबई में आतंकवादी हमले के बाद हुआ. उसमें उन्होंने कोट करना शुरू किया कि तत्कालीन गृहमंत्री ने कब-कब क्या-क्या कहा. तत्कालीन गृहमंत्री ने कई दफे कहा कि समुद्र के रास्ते से आतंकवादी आने वाले हैं। कम से कम छह बार दिए गए तत्कालीन गृहमंत्री के बयानों को अरुण शौरी ने कोट किया. कई टॉप आफिशियल के बयान को कोट किया. अंतत: प्रधानमंत्री के बयान को कोट किया है. इन सभी को पता था कि बाहरी हमले होने वाले हैं. लेकिन फिर भी हमले हो गए. मतलब, कहां खड़ा है हमारा देश? प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री का जो पद है, ये कोई केयर टेकर या कंसलटेंट का पद तो नहीं है जो सिर्फ सलाह दे रहे हैं, बयान दे रहे हैं. इन लोगों ने उपाय क्यों नहीं किए? किए तो फिर हमले कैसे हो गए? ये लोग देश को बता रहे हैं, चेतावनी दे रहे हैं, आगाह कर रहे हैं…. तो ये लोग अपने पदों पर क्यों बने हुए हैं. ये लोग हैं किसलिए? अगर इनकी जानकारी में एक साल से ये बातें है कि समुद्री रास्ते से भारत पर हमले की तैयारी हो रही है, बड़ी-बड़ी बिल्डिंगों के नक्शे लिए जा रहे हैं, हमले के लिए बिल्डिंगों के अंदर की एक-एक चीजें मैप की जा रही हैं. इतनी सारी जानकारियों के बाद भी हमले हो गए तो क्या इस पद पर इन लोगों को बने रहना चाहिए? लेकिन हमारा देश इन सब चीजों की ओर देखता ही नहीं.

दुर्भाग्य मीडिया के साथ भी यही है कि इस क्षेत्र में जो कुछ घटित हो रहा है, उसे कोई देखने-सुनने वाला नहीं है. पेड न्यूज के मामले में पार्लियामेंट में सामूहिक तौर पर कोई फैसला लिया जाना चाहिए. बहस तो करें ही, जांच भी करें. पता लगाएं कि लोकसभा चुनाव में किन-किन अखबारों ने पेड न्यूज के लिए पहल की और कब से ये धंधा शुरू हुआ है और इसको किस तरीके से बंद करना चाहिए. आपको याद होगा कि नेहरू जी के जमाने में पहला प्रेस आयोग बना था. प्रेस आयोग फिर बनाया जाना चाहिए. इसमें देश के जाने-माने लोगों को रखें. यह आयोग जांच करे. मैं पहल करता हूं कि जांच हो तो सबसे पहले मेरा और मेरे अखबार का हो. मैं अपनी जांच के लिए सबसे पहले तैयार खड़ा मिलूंगा. हमारी जो भी गल्तियां हैं, उसको भी हम स्वीकार करेंगे और दंड के लिए तैयार रहेंगे. ऐसा बाकी लोग भी करें. पत्रकारिता के अंदर सफाई बड़ा सवाल है. छोटी-छोटी चीजों से लोग ऊपर उठें और सोचें कि हम जा कहां रहे हैं, किस स्तर की पत्रकारिता कर रहे हैं. नक्सल के सवाल पर कहीं गंभीर रिपोर्टिंग नहीं है. करप्सन इतना बड़ा मुद्दा बन गया है लेकिन कहीं इस पर गंभीर रिपोर्टिंग नहीं है. पर उम्मीद खत्म नहीं हुई है. मैं आशावादी हूं. संभव है, लोग अपने-अपने स्तर पर प्रयास कर रहें हों पर उनका प्रयास हम तक न पहुंच पा रहा हो. हम का यहां आशय पूरी मीडिया बिरादरी से है. तो, यह नहीं मानना चाहिए कि चीजें ऐसे ही चलेंगी. जरूर बदलेगा. बस, जो जहां है, वहीं अपने स्तर से सोचे और शुरुआत कर दे. धन्यवाद यशवंत, इस बातचीत के लिए.

Comments on “पत्रकारिता के नाम पर जो छूट मिली हुई है, वह स्टेट पावर का फेल्योर है : हरिवंश

  • Harivans jee ki baato me dam hai. hame bhi umid hai ki unke bicharo ka dusre ptrakar bhi anusaran karenge. yadi kuch baristh patrakar Is muhim me shamil hote hai tho hum aaj ki ptrkaita ko nai disha de sakte hai. Hum aasha karte hai ki Harivans jee ke vicharo se kuchh savedanshil akhabar malik bhi prabhit honge.

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  • राजेश यादव says:

    आप ने बिल्कुल सच कहा है, एसा ही हो रहा है।

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  • सर। अब भी राम राव जैसे कुछ गिने-चुने लोग हैं, मैंने देखा है। उन्हें जाना है। वे अपने स्तर से कोशिश भी कर रहे हैं। हम उम्मीद करते हैं कि उनके प्रयास से पत्रकारिता का कुछ भला हो.

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  • harivansh ji aap humse kafi bade hain patrakarita ke baare mein bahut kuchh jante hain. bhala ye bataiye patrakarita ko is halaat mein lane wale kaun log hain hain jo tathkathit roop se apne aap ko media ka mai baap samajhte hain.naye patrakaron ki nasl mein haramkhori ka khoon daudane wale kaun hai.naye patrakaron mein wo josh kyun nahin hai.iska zawab to de koi bada patrakar.

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  • vikas tripathi says:

    sir,
    aap sahi kah rahe hen desh ke sirph ek do akhbar ko chodkar sabhi me khabro ka dhandha chal raha he……….

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  • gangesh kumar says:

    batein to aapne bahut sahi kahi hai, lekin yeh bhi sach hai ki aapke hi Prabhat Khabar mein ek Sampadak hai, jiske criminals ke sath sambandh rahe hain. aapke akhbaar mein aise logon ka hona achchhee baat nahin. kripaya dhyan dein….

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  • Dheerendra Gopal says:

    kahhi na kahhi hum log hi is patrakarita ko badhawa de rahe hai.agar hum true journalism ko badhawa de to tasweer badal sakte hai.

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  • vinay bihari singh says:

    प्रभाष जोशी के बाद बड़े संपादकों में हरिवंश जी ही हैं जिन्होंने गरीब और मजबूर लोगों की तकलीफ से अपनी पीड़ा को जोड़ा है। देश और समाज के लिए कुछ करने की चाह वाले शिखर पर बैठे अन्य संपादक हरिवंश जी की बातों से प्रेरणा ले सकते हैं। हां, गरीब आदमी आज हाशिए पर है। उसे कोई नहीं पूछता। न प्रशासन, न शासन, मीडिया और न ही चुने हुए प्रतिनिधि। किसके पास जाए गरीब आदमी? यह सवाल बड़ा होता जा रहा है। हरिवंश जी को इस लेख के लिए आभार।- विनय बिहारी सिंह

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  • vivek sinha says:

    हरिवंश जी की बातों में कई कर्मनिष्ठ पत्रकारों के विचार झलकतें हैं। हरिवंश जी इसे ही अरिस्टोटल इफेक्ट कहते हैं। जब समाज और देश को चलाने वाली कोई एक चीज कमजोर पड़ती है तो दूसरी चीजें उससे पैदा हुए वैक्यूम को भरने के लिए आगे आती है। मसलन अगर कार्यपालिका अपना काम काज सही ढंग से नहीं करती है तो न्यायपालिका उस पर हावी होती है। देश में हाल में ही कई ऐसे मौके सामने आए हैं जब कोर्ट सुपर पावर बनती नजर आई है। झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के कई जिले अगर नक्सलियों के चपेट में है तो इसी वजह से कि प्रशासन और पुलिस की नाकामी से बने निर्वात को नक्सलियों ने भर दिया। पत्रकारों के लिए आने वाले दिन और मुश्किल होने वाले हैं क्योंकि उनके सामने ईमानदार बने रहने को साथ ही लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को अक्षुण्ण बनाये रखने की चुनौती भी है । नहीं तो अमिताभ बच्चन पत्रकारों को पत्रकारिता सीखाते नजर आयेंगे और हर ऐरा गैरा नेता मीडिया को उनकी जिम्मेदारी बताते हुए नजर आयेगा

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  • Suresh Pandit says:

    dadhuvaad apko Yashwant ki aapne hum sabko Harivanshji ke vicharon se avgat karaya. Ummeed hai ki aage bhi samay samay par karate rahenge. Wahi to un chand logon main hai jinhone sampadak pad ka naam aur samman bacha rakha hai.

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