बंगाल पुलिस का छल जायज : चंदन मित्रा

[caption id="attachment_15933" align="alignleft"]वर्कशाप को संबोधित करते चंदन मित्रावर्कशाप को संबोधित करते चंदन मित्रा[/caption]पायनियर के संपादक बोले- पत्रकारिता के पेशे की आड़ लेकर की गई गिरफ्तारी गलत नहीं : वैचारिक प्र‎तिबद्धता निष्पक्ष पत्रकारिता के कभी आड़े नहीं आती- राजनाथ सिंह सूर्य : लखनऊ में विश्व संवाद केन्द‎ द्वारा संचालित जनसंचार एवं पत्रकारिता संस्थान में तीन दिनी पत्रकारिता प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया। इसमें मुख्य अतिथि के रूप में पायनियर के सम्पादक और राज्यसभा सदस्य चंदन मित्रा शामिल हुए। चंदन ने अपने भाषण में कई बातें कहीं। वामपंथी से दक्षिणपंथी बने चंदन ने नक्सलवाद और माओवाद से जुड़े चक्र‎धर महतो और कोबाद गांधी की गिरफ्तारी पर मीडिया में उठे बवंडर पर अपना स्टैंड बयान किया। उन्होंने कहा कि कोई आदमी बहुत योग्य हो या धनी हो तो उसके अपराध कम नहीं हो जाते। एक साल में हुई छह हजार हत्याओं के लिए कौन जिम्मेदार है?

हक जबसे जताने लगे, नक्सली कहलाने लगे

शशि सागरबहस खूब चल रही है छत्रधर महतो के पकड़े जाने के तरीके को लेकर। पत्रकारिता के प्रबुद्धजनों ने भी उसे हत्यारा करार दिया लेकिन मुझे लगता है कि इस बहस से कुछ छूटता जा रहा है। क्या ये बहस का मुद्दा नहीं होना चाहिए कि आखिर छत्रधर जैसों को बंदूक उठाने की जरूरत क्यों पड़ती है और क्यों उनका पोषण किया जाता है तब तक जब तक कि पानी नाक तक नहीं आ जाता। आखिर क्या कारण है कि समाज और राजनीति की मुख्यधारा से आदिवासी अलग हैं। शालबनी में इस्पात कारखाने के शिलान्यास के उपरांत मुख्यमंत्री को लक्षित कर बारूदी सुरंग का विस्फोट किया जाता है। इसके बाद पुलिस के साथ-साथ माकपा के अति उत्साही कार्यकर्ता तो मानो पूरे इलाके को माओवादी मान बैठते हैं। पूरे लालगढ़ की घेराबंदी कर दी जाती है और शुरू होता है अत्याचार व उत्पीड़न का घिनौना कृत्य। तो सवाल उठता है कि क्या सैकड़ों गांवों के हजारों आदिवासी एकाएक माओवादी हो गए थे और उन्हें मारकर कौन सी स्वतंत्रता और संप्रभुता की रक्षा की जा रही थी।

नक्सली नेताओं के विश्वास की रक्षा करें

किशोर कुमारपुलिस नहीं, पत्रकारों की भूमिका पर बहस हो : पश्चिम बंगाल के लालगढ़ से नक्सली नेता छत्रधर महतो की गिरफ्तारी के बाद पुलिस की भूमिका और पत्रकारिता की चुनौतियों पर बहस छिड़ी हुई है। यह लाजमी भी है। लेकिन मेरा मानना है कि इस प्रकरण में या ऐसे संवेदनशील मामलों में पुलिस से ज्यादा पत्रकारों की भूमिका पर बहस होनी चाहिए। यह आत्म-मंथन का वक्त है। मैं अपनी बात को विस्तार देने से पहले एक घटना का जिक्र करना चाहूंगा। बात पुरानी है। तब मैं नवभारत टाइम्स के पटना संस्करण का धनबाद में संवाददाता था। धनबाद जिले के ही टुंडी और पीरटांड इलाके में नक्सलियों की गतिविधियां बढ़ी हुई थीं। उस समय नक्सलियों के एक बड़े नेता पत्रकारों के संपर्क में रहते थे।

‘अच्छा होता कि हम बंगाल पुलिस को सराहते’

सेवा में, आदरणीय यशवंत जी, आपको मैं काफी दिनों बाद कोई पत्र लिख रहा हूं। पहले तो मैं सिर्फ एक पाठक ही बना रहना चाहता था पर पिछले दिनों नक्सली नेता को बंगाल में गिरफ्तार करने को लेकर जिस तरह पुलिस ने पत्रकारिता की आड़ ली और उसके बाद जो मुद्दा बनाया गया, वो मुझे काफी खटक रहा है। सवाल उठता है कि क्या अब ऐसे मामले में कोई नक्सली, अपराधी, आतंकवादी, या कोई भी इंसान पत्रकार पर भरोसा करेगा? सवाल बड़ा है। रात के 12 बज चुके हैं। आपको पत्र लिख रहा हूं। इस खातिर कि पत्रकारिता पर आंच का यह कोई पहला मुद्दा नहीं है। चंबल घाटी के क्षेत्र में कभी खूंखार डकैतों का साम्राज्य था। यहां के रिपोर्टर जब डकैतों के इंटरव्यू करते थे तो डकैत भी अपने खजाने का मुंह उनकी खातिर खोल देते थे। कई पत्रकारों ने डकैतों के साथ के अपने अनुभव मुझे सुनाए। आज बीहड़ में डकैत नहीं के बराबर हैं पर यह बात दुनिया जानती है कि दरअसल पत्रकारों ने भी बीहड़ के डकैतों के सूत्र पुलिस को सौंपे तो कभी सर्विलांस का भी हिस्सा बने। क्या पत्रकारों ने उन डकैतों के साथ गद्दारी नहीं की? सवाल बड़ा है। हम पुलिस को उनकी हरकतों के लिए लताड़ लगा रहे हैं।

‘हत्यारे महतो के पकड़े जाने पर हंगामा क्यों?’

टाइम्स आफ इंडिया के लोगों ने पहनी थी पुलिस की वर्दी : तहलका ने लिया था वेश्याओं का सहारा : अनुरंजन जी, माफ कीजिए, मैं आपके विचारों से सहमत नहीं हूं। एक नक्सली छत्रधर महतो, जो सैकडों हत्याओं का दोषी है, उसको अगर बंगाल पुलिस पत्रकार बनकर पकड़ती है तो गलत क्या है? एक मिशन के रूप में और अपने आप को देश का चौथा स्तम्भ कहने पर गर्व महसूस करने वाली मीडिया के लिए नक्सली हत्यारे छत्रधर महतो को पकड़े जाने पर बंगाल पुलिस पर गर्व करना चाहिए, भले ही यह काम पत्रकार का स्वांग रचाकर पुलिस को करना पड़ा हो। यह तो पत्रकारिता जेसे पेशे के लिए गौरवपूर्ण बात है। खासकर ऐसे दौर में जब पत्रकारिता के नाम पर न्यूज चैनलों पर क्या क्या चल रहा है, यह हम सबसे छुपा नहीं है। आपने सवाल उठाया कि अगर पत्रकार पुलिस की वर्दी में चलता तो…. मैं आपको बता दूं कि देश के जाने-माने अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया ने कुछ समय पहले अपने पत्रकारों को नकली वर्दी पहनाकर वीवीआईपी एरिया में मोटरसाइकिल पर घुमाया था और अगले दिन प्रमुखता से अखबार में खबर छपी थी।

‘पत्रकारिता को खिलवाड़ मत बनाओ’

अनुरंजन झाजंग और प्यार में सब जायज है, इस बार साबित किया बंगाल पुलिस ने. बंगाल पुलिस की कारगुजारी आजकल सुर्खियों में है. एक नक्सली नेता की गिरफ्तारी हो चुकी है और पुलिस इसे अपनी बड़ी सफलता मान रही है। जाहिर है, जिस एक शख्स ने लालगढ़ में हफ्तों राज्य पुलिस और देश की प्रशासनिक व्यवस्था को चुनौती दी हो, उसकी गिरफ्तारी पर खुश होना लाजमी है. लेकिन सवाल उठता है कि जिस तरीके से पत्रकारिता को मोहरा बनाकर इस कारनामे को अंजाम दिया गया है वो ठीक है? और उपर से मीडियाघरानों की चुप्पी, बड़े पत्रकार होने का दावा करने वालों की खामोशी..?  यह सब आखिर किस तरफ इशारा करती है? छत्रधर महतो और बंगाल पुलिस के इस नाटक पर कुछ लिखूं, उससे पहले मैं बता देना चाहता हूं कि मैं मौजूदा हालात में नक्सलवाद का समर्थक नहीं हूं लेकिन अपने पाठकों को ये भी साफ करता चलूं कि इन नक्सलियों के बीच हमने एक बार नहीं, कई बार हफ्तों दिन गुजारा है.

Against Misuse of Media’s Credibility by Bengal Police

पश्चिम बंगाल की सीआईडी पुलिस ने मीडिया के नाम पर विश्वासघात किया है। लालगढ़ आंदोलन के चर्चित नेता छत्रधर महतो को पकड़ने के लिए पुलिस ने पत्रकार का वेश बनाकर 26 सितंबर को ऐसा किया। पूरी स्टोरी आप भड़ास4मीडिया में पढ़ चुके हैं। यह मीडिया के प्रति लोगों के भरोसे की हत्या है। यह मीडिया की स्वायत्तता का अतिक्रमण है। यह बेहद शर्मनाक, आपत्तिजनक एवं अक्षम्य अपराध है। इसका पुरजोर विरोध होना चाहिए। इस संबंध में तत्काल एक स्पष्ट कानून बनना चाहिए। हम लोगों ने प्रधानमंत्री को संबोधित एक आनलाइन याचिका दायर की है। कृपया आप भी इस याचिका के हस्ताक्षरकर्ता बनें। बंगाल पुलिस की हरकत के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए प्रधानमंत्री के नाम पत्र पर आनलाइन हस्ताक्षर करें। इसके लिए क्लिक करें – विरोध

बंगाल पुलिस ने मीडिया बनकर छला

[caption id="attachment_15869" align="alignleft"]विष्णु राजगढ़ियाविष्णु राजगढ़िया[/caption]आइए, इस हरकत का विरोध करें : मुझे एक न्यूज स्टोरी के लिए किसी व्यक्ति से कुछ जानकारी चाहिए। वह मीडिया से बात करने तो तैयार नहीं। मैं एक पुलिस अधिकारी होने का नाटक करके उसे पकड़ लूं तो वह सब कुछ बता देगा। मेरी न्यूज स्टोरी बन जायेगी। लेकिन क्या कानून इसकी इजाजत देगा, क्या समाज इसके लिए माफ करेगा? पश्चिम बंगाल की सीआईडी पुलिस ने ऐसा ही शर्मनाक तरीका चुना। लालगढ़ आंदोलन के चर्चित नेता छत्रधर महतो 26 सितंबर को पकड़ लिये गये। पुलिस ने पत्रकार का वेश बनाकर ऐसा किया। एक पुलिस अधिकारी ने खुद को एशियन न्यूज एजेंसी, सिंगापुर का संवाददाता अनिल मयी बताया। उसने पहले एक स्थानीय पत्रकार का विश्वास जीता। फिर उसके साथ जाकर छत्रधर महतो का साक्षात्कार लेने के बहाने गिरफ्तार कर लिया। हर संस्था का अपना अलग कार्यक्षेत्र है। इस नाते उसे कुछ विशेष रियायत मिली होती है। हर संस्था की अपनी अलग भूमिका के अनुरूप लोग उस पर भरोसा करते हैं। किसी चर्च के पादरी के सामने अपने दोष को स्वीकार करने वाले को भरोसा होता है कि वह इसका दुरुपयोग नहीं करेगा। चिकित्सक के सामने एक महिला किसी भरोसे के ही कारण अपने शरीर को अनावृत करती है।