संपादकों की स्थिति डायबिटिक हलवाई जैसी

किशोर मालवीयरजत शर्मा कभी नहीं चाहते थे कि इंडिया टीवी पर हल्की-फुल्की खबरें चलें : लोग हमें गालियां देते थे पर खबर देखते भी थे : मोटी फीस देकर सब्सक्राइव करना बंद करें तो टैम अपनी मौत मर जाएगा : टीआरपी पर बहस अच्छी बात है लेकिन अब सिर्फ बहस से कुछ नहीं होने वाला। टीआरपी ने सम्पादकों (खासकर गंभीर संपादकों) की हालत को दयनीय बना दिया है। ज्यादातर टीवी चैनल्स (हिंदी) के सम्पादकों की स्थिति डायबिटिक हलवाई वाली हो गई है, यानी ऐसा हलवाई जो मिठाई तो बनाता है पर खुद नहीं खा सकता। मैं ऐसे कई सम्पादकों को जानता हूं जो ऐसी खबरें बनवा रहे हैं जो उन्हें खुद ही पसंद नहीं। व्यक्तिगत बातचीत में स्वीकार करते हैं। एक टीवी चैनल ने खबर को USP बनाते हुए नारा दिया और चैनल चालू किया। कुछ महीने चैनल पर न्यूज ही न्यूज प्रसारित किए गए।

लेकिन अचानक एक दिन मुझे झटका लगा। वह चैनल भी पटरी से उतर गया। वह चैनल भी बाकी चैनलों की कतार में खड़ा हो गया दिखा। वहां भी वही सब चलने लगा जो बाकी चैनलों पर चल रहा था। मुझे मालूम है कि उस चैनल के संपादक को भी दुख हुआ होगा। क्योंकि ये वही संपादक थे जो मुझे बार-बार एहसास दिलाते थे कि इंडिया टीवी में जो कुछ चल रहा है वह ठीक नहीं (तब मैं इंडिया टीवी में था)। लेकिन बाजार के दबाव में उस चैनल के मैनेजमेंट को झुकना पड़ा और मैनेजमेंट के दबाव में संपादक को। ये दुखद है लेकिन सच है कि आज ज्यादातर पत्रकार पत्रकारिता नहीं नौकरी कर रहे है। जो नौकरी नहीं कर रहे है वे खुलकर लिख बोल रहे है।

अब मैं इंडिया टीवी की बात करता हूं। जुलाई 2006 में मैंने इंडिया टीवी ज्वाइन किया था तब उस चैनल की टीआरपी 3 से 4 हुआ करती थी। तब वहां गंभीर खबरों को तरजीह दी जाती थी। रजत शर्मा जी कभी खबरों से समझौता नहीं करते थे। हल्की खबरों या भूत पिशाच की तो बात भी नहीं हो सकती थी। तीन घंटे की ब्रेकिंग न्यूज और आपकी अदालत जैसे शो चैनल ड्राइवर हुआ करते थे। मुझे याद है वो दिन जब चैनल की उच्चस्तरीय बैठक में मुझे और प्रशांत टंडन (जो अब भी इंडिया टीवी में हैं) को चार घंटे लगे थे रजत जी को कन्वीन्स करने में कि हल्की और मनोरंजक खबरों को भी जगह दी जाए। उन्होंने इस शर्त पर मंजूरी दी थी कि ब्रेकिंग न्यूज में (जिसकी एंकरिंग रजत जी खुद करते थे) ऐसी खबरें नहीं चलेंगी।

और उसके बाद ‘भूत, भभूत और….(सैक्स)’ की खबरों की झड़ी लग गई। मुझे ये स्वीकार करने में अब कोई संकोच नहीं है कि तब पहली बार इंडिया टीवी की टीआरपी 3 से बढ़कर 18 हो गई थी। और ये चैनल पहली बार दूसरे नंबर पर पहुंच गया था। पर रजत जी हल्की खबरों पर कभी हमारी पीठ नहीं थपथपाते थे और न ही हम उन खबरों से संतुष्ट थे। लेकिन बाजार के दबाव ने हमें चुप कर दिया था। लोग हमें गालियां देते थे पर खबर देखते भी थे। यानी टीआरपी दर्ज हो जाती थी।

ये विडम्बना है कि हिन्दी न्यूज चैनल्स के ज्यादातर दर्शक टीवी न्यूज में दिमाग लगाना नहीं चाहते। इसलिए दिमाग के बदले दिल से न्यूज देखते हैं। इसलिए पहले वे प्रलय वाली ‘खबर’ देखते हैं फिर चैनल को कोसते हैं। इंडिया टीवी को पहले दूसरे चैनल्स पहले देखते थे फिर गालियां देते थे और फिर नकल करने लगे। एनडीटीवी इंडिया पहले सिर्फ खबर दिखाता था। हमें बहुत अच्छा लगता था। आज जो लोग इंडिया टीवी पर यू-ट्यूब की फुटेज चुराने का आरोप लगाते हैं उन्हे ये देखकर झटका लगा होगा कि एनडीटीवी इंडिया ने तो यू-ट्यूब फुटेज से आधे घंटे का शो बना डाला। प्रलय हो या यू-ट्यूब, टैम के कथित दर्शक उसे देख और पसंद कर रहे हैं। अब TAM ने ज्यादातर मीटर मुंबई की धारावी बस्ती और दिल्ली की खिचड़ीपुर बस्ती में लगा रखे हैं तो हम क्या करें।

आशुतोष और अजीत की बातों से मैं आंशिक रुप से सहमत हूं लेकिन ये भी मानता हूं कि TAM को हम खुद कमजोर कर सकते हैं। आज अगर सभी चैनल्स (न्यूज और एंटरटेनमेंट दोनों) TAM को सब्सक्राइव करना बंद कर दे, फीस के तौर पर हर महीने मोटी रकम देना छोड़ दें तो उस राजस्व घाटे को TAM बर्दाश्त नहीं कर पाएगा। लेकिन दुर्भाग्य हम ऐसा नहीं करते। हम हर महीने उसे मोटी रकम (फीस) देकर उससे डाटा लेते हैं, फिर उस डाटा की चीरफाड़ कर अपने न्यूजरूम का ब्लडप्रेशर बढ़ाते हैं। बहुत अच्छा होता यदि बीईए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से टीआरपी (टैम) पर प्रतिबंध लगाने की मांग करता। अच्छे काम की शुरुआत अपने घर से ही करनी होगी। नम्बर वन चैनल कुछ करे तो लीला, बाकी करे तो पाप। ये नहीं चलने वाला।

लेखक किशोर कुमार मालवीय वरिष्ठ टीवी जर्नलिस्ट हैं और इन दिनों वीओआई के ग्रुप एडिटर के रूप में कार्यरत हैं.

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Comments on “संपादकों की स्थिति डायबिटिक हलवाई जैसी

  • es hamam sabhi nange hai jab bhi jise mouka milta hai , wah dubki laga leta hai , malviya jee bhi tem ki aalochna kar malai khane ke chakkr me hai , shayad tem wale bhi koi offer de de.
    thanks , likhte rahe , koi koi aap ki tarif likhega.
    tcare malviya jee , phele apne ko sudhar le , duniya sudhar jaye4gi.

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  • subhash gupta says:

    टैम की रिपोर्ट को जब तक चैनल अपने भाग्य की नियामक मानते रहेंगे, तब तक चैनल पर वही परोसा जाता रहेगा, जिसे सम्पादक एक मजबूरी मानते हैं और नौकरी की खातिर इस मजबूरी को पाल पोस रहे हैं। आपसे एकदम सच लिखा है। श्री आशुतोष ने एक सार्थक बहस की बुनियाद डाली है। श्री अजीत अंजुम और श्री रवीश कुमार ने टी आर पी को अलविदा कहने की पैरवी करके जता दिया है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया की हस्तियां भी यही चाहती हैं। – सुभाष गुप्ता, देहरादून

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  • subhash gupta says:

    जब तक टी आर पी को चैनल अपने भाग्य की नियामक मानते रहेंगे, तब तक सम्पादक वो सब दिखाने को मजबूर होते रहेंगे, जिसे वे खुद देखना और दिखाना जरा भी पसंद नहीं करते। ये नौकरी की खातिर मजबूरी को पालने पोसने की विवशता है। आपने एकदम सच और सटीक लिखा है। श्री आशुतोष ने टी आर पी को अलविदा करने की बहस की शानदार अंदाज में बुनियाद डालकर एक फैसले की तरफ बढने की राह खोली है। श्री अजीत अंजुम और श्री रवीश कुमार ने भी इस बहस को फैसलाकुन बनाने की शानदार तर्कों और अंदाज के साथ पैरवी की है। वाकई अब वक्त आ गया है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के हमारे अग्रज इस विषय पर अपनी राय दें… इससे सही फैसले के लिए जमीन तैयार होगी।… सुभाष गुप्ता, देहरादून

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  • Neeraj Shrivastava, Bhopal says:

    बेहद ईमानदारी से बयान हुई है एक पत्रकार की पीड़ा… ये सच है कि एक संपादक जो खबर को अपनी रोजी मानता है, वो कभी भूत-प्रेत, प्रलय और जादू-टोने के मसाले से सहमत नहीं हो सकता. लेकिन ये भी उतना ही सच है कि बाजार की दुनिया में नौकरी और उससे जुड़े समझौते आत्मा की आवाज़ पर भारी पड़ने लगते हैं. हालाँकि मालवीय जी ने समाधान सुझाया है, लेकिन फिलहाल टैम के टामियों पर लगाम कसने की पहल किसी चैनल की तरफ होने के आसार कम ही नज़र आते हैं.

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  • sandip thakur says:

    malviajee ne ekdam thik likha hai.patrakarita ghai bhad me.wohi lekho ya dikaho jo public ko pasand ho.es desh me 80 percent logon ka I-Q level below everage hai.es varg ke log hi trp ghatathe ya barathe ha.koe bhi lakho karor samaj sudhar ke leye nahi lagata.uska aim bhi paisa kamana hai.paisa tabhi ayega jab maal bekega.aur maal thabhi bekega jab waha jucy hoga.jucy banane ke leye kya kya karna partha hai eska praman hai aaj ke channel aur newspaper.
    sandip thakur
    metro editor

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  • सर नमस्कार….जो बातें आपने लिखीं वो सही हैं…..लेकिन हमारे जैसे लोग ये कहें तो अच्छा लगता है…आप तो एक चैनल के ग्रुप एडिटर हैं….आप विधवा विलाप करें तो हजम नहीं होता…मैंने आपके साथ काम किया है….आपको खबरों की बात पर हंसते देखा है….शायद इंडिया टीवी का हैंगओवर था….आपको एक मौका मिला था…खबरों को दिखाने का….तब आपने ही मज़ाक उड़ाया…शायद बाज़ार की समझ ने ऐसा कराया आपसे….दोषी और लोग भी थे….लेकिन voi के जिस परखच्चे के शीर्ष पर आप बैठे हैं….उसे इस हालत में पहुंचाने के लिए सिर्फ औरों को दोषी मानकर संतोष कर लें….ऐसी बेइमानी मुझसे नहीं होगी…पतन का शिकार ये voi कभी पत्रकारिता में नूतन क्रांति का प्रणेता बनने चला था…माना लाला की कुछ और भी मंशा रही होगी..पर क्या आप और आप की कृपा से मैं भी उस संकल्पना की पराजय के दोषी नहीं….ज़रा सोचिए…….मैं अपना नाम किसी डर से नहीं छुपा रहा….बस चाहता हूं आपको ठेस न लगे,,क्योंकि मैं आज भी आपसे प्रेम करता हूं….

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  • अमित त्रिपाठी says:

    साथियों, ये सही है कि जब पत्रकारिता का जुनून लेकर इस फील्ड में आने वाले लोगों को केवल मनोरंजन के लिए खबरें चलानी पड़ती होंगी तो उन्हें कोफ्त होती होगी। लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हमारा जो दर्शक वर्ग है उसका एक बड़ा हिस्सा चौबीसों घंटे सिर्फ खबरें नहीं देखना चाहेगा, चौबीसों घंटे ऐसी खबरें आती भी नहीं हैं कि हम लोगों को बांध कर रख सकें। इसलिए ऐसे समय में जब हमारे पास चलाने के लिए कोई दमदार खबर न हो, तब हल्खे-फुल्के मनोरंजन वाले कार्यक्रम चलाना गलत नहीं है।
    लेकिन हमें ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’ के सिद्धांत को मजबूती से थामकर चलना चाहिए। दर्द तब होता है जब महाप्रलय का झूठा डर दिखाने वाले न्यूज चैनल को देखकर एक बच्चा खौफ में आत्महत्या कर लेता है। दर्द तब भी होता है जब सेक्स का बखान करते हुए न्यूज चैनल्स सीमाओं को पार करने लगते हैं, या फिर भूत-प्रेत की दंत कथाएं चलाकर या फिर स्वर्ग की सीढ़ी खोज लेने का दावा करते हुए खोखली बातों का महल वनाने लगते हैं। और यहीं पर मीडिया को रोके जाने की जरूरत है उसके कंटेंट पर लगाम डालने की जरुरत है। मैं राजदीप सरदेसाई जी की इस बात से सहमत हूं कि हमें नहीं भूलना चाहिए कि हम एंटरटेनमेंट चैनल नहीं, न्यूज चैनल हैं। लेकिन न्यूज चैनल्स को अपने दर्शकों को बांधे रखने के लिए कुछ तो करना होगा।

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  • Malviyaji, TAM ka virodh wahi channel kar rahe hain jo no1, 2 ya 3 per nahi hain ya nahi pahunch sakte… aapke lekh me bhi kuchh aisa hi dard chhipa hai. Albatta aapki ek baat bahut achhi lagi ki agar TAM ke khilaph sabhi imandar aur ekjut hain to wo TAM ko subscribe karna band kyon nahi karte? Ashutosh ho ya Ajit Anjum ya phir aap, sabhi kewal satahi baten kar rahe hain. Aap teeno me dum hai to aap TAM ko subscribe karna band kar den warna syahi kaali karna chhod den.
    Dr Archana Deshpande, Nagpur

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  • Sukarn Singh Rathore says:

    Wah Kishoreji, thanks for the honest confession. aajkal kisi sampadak me ye dum nahi ki we swikar karen ki we patrakarita nahi naukari kar rahe hain… chaliye aapne swikar to kiya. ye jo bade bade sampadak hain we zyada nange hain… ek khabar ambani ke khilaf kya chhapi ki ye bade sampadak chhatpatane lage (shayad maalikon ke ishare par). chahe rajdeep ho ye shazi zaman… ye sabhi kaha the jab ek nirdosh teacher Uma khurana ki sare aam ijjat utaari gayi thi.? wakai paise me badi taqat hai.
    Sukarn Singh, Jodhpur

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  • मुकुंद शाही says:

    संपादकों की स्थिति डायबिटिक हलवाई जैसी….क्या खूब लिखा है सर आपने….आपने अपने लेख में दो संपादकों के बारे में ये लिखा है कि मैं उसके कदम से आंशिक रूप से सहमत हूं…लेकिन जमीनी हकीकत तो कुछ और ही है…जितना मैं जानता हूं उनमें एक संपादक ऐसे मुद्दों को लेकर मुद्दा बनाते हैं और एक सिर्फ उस मंच से वकालत करते हैं…लेकिन न्यूज रूम की हकीकत कुछ और भी है…ज़रा उन लोगों की पीड़ा को समझने की कोशिश की जाये जो इन्हीं दो संपादकों के अंडर में काम कर रहे हैं….सच तो ये है कि बिमारी संपादकों को है और उससे जूझते हैं हम जैसे मजदूर…मिठाई खा कर मजा वो लेते हैं और ब्लड सूगर हाई हमारा होता है…जो ऐसे डायविटिक संपादकों के अंडर में काम कर रहे हैं….उन्होंने तो लगभग जिंदगी पूरी कर ली…और सच तो यही है कि चाहे वो निजी जिंदगी हो या फिर प्रोफेश्लल…बुढापे में डायविटीज हो ही जाता है…लेकिन पैदा होते ही (वो लोग जो पत्रकारिता में कदम रखा ही है ) उन्हें अपनी बिमारी का अंश दे देना कहां का इंसाफ है…

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  • sir aap voi ko aise kar ke bhi nahi chala paye kitna program banate the phi bhi kuch nahi ho paya bichare sab program bana bana thak gaye lekin sabke ghar tak bikva diye

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  • sanam Tasaduq says:

    dear all channel heads andjournalists
    आपका लेख पड़ा पड़ के खुशी भी हुए और दिख भी खुशी इस बात की के आज भी कही न कही संपादकों यह एहसास है की जो वोह देखा रहे है वह सही नहीं है लेकिन दुःख इस बात का की सुल्जे हुए पत्रकार अगर TRP दौड़ में अपने मन को मार रहे है और आंवले दिनों के लिए अँधेरा और अन्द्कार को बढावा दे रहे है श्री किशोर जी में इस तब से इस काम में हो जब में दसवी कक्षा पड़ता था और १९९५ में श्री रजत शर्मा विनोद दुआ श्री राजदीप श्री प्रोनोय रॉय को जानने का मौका मिला और शायद उन्हें को देख देख के टीवी रिपोर्टिंग का शोख पनपा…लेकिन आज जब न्यूज़ चंनेल्स को देखते है तू दुःख होता है के हम इस कुत्ते बिल्ले के खेल में शामिल हो गये है और कुछ गंदे लोगो को मनोरंजन देने के लिए हम उनलोगों के साथ ज्यादती करते है न केवल अपने लोगो को बल्कि देश से बाहर हमारे दर्शकों को वह देखने के लिए मजबूर कर रहे है…किशोर जी हमने वह दौर देखा है जब किसे समारोह या किसी निजी पारिवारिक दावत में जाते थे तू हर कोई इजात देता था लेकिन आज आप खुद महसूस करते होंगे आज हम लोगो को क्या कुछ सुन न पड़ता है,,TAM हमसे है हम इसे बढावा देते है,,वही दूसरी बात यह अगर सबी चंनेल्स एक जुट होके यह निर्णय लेते है के वोह गन्दी और सस्ती खबरी नहे चलायेगे तू सिथ्थी को कण्ट्रोल कर सकते है,और हम जो दर्शकों को देखायेगे वोह वोही देखेंगे,मुझे नहीं पता आप मेरी बात से सहमत होंगे या नहीं मगर कही न कही समाज में बड रहे बेशर्मी और क्रीम को हम हे बढावा दे रहे है..वैसे भी हमारी profession को profession नहीं बल्कि mission कहा जाता है हम लोग पैसे कमाने से ज्यादा समाज को दर्पण दिखाने का काम करते है,,मुझे नहीं पता मेरे यह शब्द आप और अन्ये वरिष्ट पत्रकार पड़ेगे या नहीं लेकिन हमे उम्मीद है के हम लोग समय
    रहते जाग जायेगे और टीवी जौर्नालिस्म के किश्ती को डूबने से समय रहते बचा पायेगे……..

    sanam Tasaduq
    sahara samay.

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