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पत्रकारिता कैसे की जाये?

शोमा दास की उम्र सिर्फ 25 साल की है। पत्रकारिता का पहला पाठ ही कुछ ऐसा पढ़ने को मिला कि हत्या करने का आरोप उसके खिलाफ दर्ज हो गया। हत्या करने का आरोप जिस शख्स ने लगाया संयोग से उसी के तेवरों को देखकर और उसी के आंदोलन को कवर करने वाले पत्रकारों को देखकर ही शोमा ने पत्रकारिता में आने की सोची। या कहें न्यूज चैनल में बतौर रिपोर्टर बनकर कुछ नायाब पत्रकारिता की सोच शोमा ने पाल रखी थी।

शोमा दास की उम्र सिर्फ 25 साल की है। पत्रकारिता का पहला पाठ ही कुछ ऐसा पढ़ने को मिला कि हत्या करने का आरोप उसके खिलाफ दर्ज हो गया। हत्या करने का आरोप जिस शख्स ने लगाया संयोग से उसी के तेवरों को देखकर और उसी के आंदोलन को कवर करने वाले पत्रकारों को देखकर ही शोमा ने पत्रकारिता में आने की सोची। या कहें न्यूज चैनल में बतौर रिपोर्टर बनकर कुछ नायाब पत्रकारिता की सोच शोमा ने पाल रखी थी।

बंगाल के आंदोलनो को बेहद करीब से देखने-भोगने वाले परिवार की शोमा को जब बंगला न्यूज चैनल में नौकरी मिली तो समूचे घर में खुशी थी कि शोमा जो सोचती है वह अब करेगी। बंगला न्यूज चैनल ’24 घंटा’ की सबसे जूनियर रिपोर्टर शोमा को नौकरी करते वक्त रिपोर्टिग का कोई मौका भी मिलता तो वह रात में कहीं कोई सड़क दुर्घटना या फिर किसी आपराधिक खबर को कवर करने भर का। जूनियर होने की वजह से रात की ड्यूटी लगती और रात को खबर कवर करने से ज्यादा खबर के इंतजार में ही वक्त बीतता। 13 अक्तूबर की रात भी खबर कवर करने के इंतजार में ही शोमा आफिस में बैठी थी। लेकिन अचानक शिफ्ट इंचार्ज ने कहा ममता बनर्जी को देख आओ। बुद्धिजीवियों की एक बैठक में ममता पहुची हैं। शोमा कैमरा टीम के साथ निकल गयी। कवर करने पहुची तो उसे गेट पर ही रोक दिया गया। ममता बनर्जी की हर सभा में गीत गाने वाली डोला सेन ने शोमा दास से कहा ’24 घंटा’ बुद्धदेव के बाप का चैनल है इसलिये ममता से वह मिल नहीं सकती। लोकिन शोमा को लगा, कोई बाईट मिल जाये तो उसकी पत्रकारिता की भी शुरुआत हो जाये। खासकर बुद्धिजीवियों की बैठक में अल्ट्रा लेफ्ट विचारधारा के लोगों की मौजूदगी से शोमा का उत्साह और बढ़ा, क्योंकि घर में अपनी मां-पिताजी से अक्सर उसने नक्सलबाड़ी के दौर के किस्से सुने थे।

शोभा को ममता में आंदोलन नजर आता। इसलिये उसे लगा कि एक बार ममता दीदी सामने आ जायें तो वह इस मुद्दे पर बाइट तो जरूर ले लेगी। लेकिन गेट पर ममता का इंतजार कर रही शोमा दास का खड़ा रहना भी तृणमूल के कार्यकर्ताओं को इतना बुरा लगा कि पहले धकेला फिर डोला सेन ने ही कहा – ‘तुम्हारा रेप करा देंगे, किसी को पता भी नहीं चलेगा। भागो यहां से।’ लेकिन शोमा को लगा, शायदा ममता बनर्जी को यह सब पता नहीं है, इसलिये वह ममता की बाईट के इंतजार में खड़ी रही और ममता जब निकलीं तो उत्साह में शोमा ने भी अपनी ऑफिस की गाड़ी को ममता के कैनवाय के पीछे चलने को कहा। लेकिन कुछ फर्लांग बाद ही तृणमूल के कार्यकर्ताओं ने गाड़ी रोकी और शोमा पर ममता की हत्या का आरोप दर्ज कराते हुये उसे पुलिस के हवाले कर दिया। यह सब ममता बनर्जी की जानकारी और केन्द्र में तृणमूल के राज्य-मंत्री मुकुल राय की मौजूदगी में हुआ। शोमा को जब पुलिस ने थाने में बैठा कर पूछताछ में बताया कि ममता बनर्जी का कहना है कि तुम उनकी हत्या करना चाहती थीं तो शोमा के पांव तले जमीन खिसक गयी। उसने तत्काल अपने ऑफिस को इसकी जानकारी थी। लेकिन ममता बनर्जी ऐसा कैसे सोच भी सकती हैं, यह उसे अभी भी समझ नहीं आ रहा है।

लेकिन इसका दूसरा अध्याय 14 अक्टूबर को तृणमूल भवन में हुआ। जहां ‘आकाश’ चैनल की कोमलिका ममता बनर्जी की प्रेस कान्फ्रेन्स कवर करने पहुंची। कोमलिका मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। लेकिन इस सभा में तृणमूल के निशाने पर कोमलिका आ गयीं। कोमलिका को तृणमूल भवन के बाहरी बरामदे में ही रोक दिया गया। कहा गया ‘आकाश’ न्यूज चैनल सीपीएम से जुड़ा है, इसलिये प्रेस कान्फ्रेन्स कवर करने की इजाजत नहीं है। कोमलिका को भी झटका लगा, क्योंकि कोमलिका वही पत्रकार है जिसने नंदीग्राम के दौर में ‘समय’ न्यूज चैनल में रहते हुये हर उस खबर से दुनिया को वाकिफ कराया था, जब सीपीएम का कैडर नंदीग्राम में नंगा नाच कर रहा था। जब सीपीएम के कैडर ने नंदीग्राम को चारों तरफ से बंद कर दिया था जिससे कोई पत्रकार अंदर ना घुस सके, तब भी कोमलिका और उसकी उस दौर की वरिष्ठ सहयोगी सादिया ने नंदीग्राम में घुस कर बलात्कार पीड़ितों से लेकर हर उस परिवार की कहानी को कैमरे में कैद किया जिसके सामने आने के बाद बंगाल के राज्यपाल ने सीपीएम को कटघरे में खड़ा कर दिया था। उसी दौर में ममता बनर्जी किसी नायक की भूमिका में थीं।

कोमलिका-सादिया की रिपोर्टिग का ही असर था कि सार्वजनिक मंचों से एक तरफ सीपीएम कहने लगी कि ‘समय’ न्यूज चैनल जानबूझ कर सीपीएम के खिलाफ काम कर रहा है, तो दूसरी तरफ ममता दिल्ली आयीं तो इंटरव्यू के लिये वक्त मांगने पर बिना हिचक आधे घंटे तक लाइव शो में ममता मेरे ही साथ यह कह कर बैठीं कि आपकी रिपोर्टर बंगाल में अच्छा काम कर रही है। कोमलिका को लेकर ममता बनर्जी की ममता इतनी ज्यादा थी कि ममता ने कोमलिका को सलवार कमीज तक भेंट की और साल भर पहले जब कोमलिका ने शादी की तो ममता इस बात पर कोमलिका से रुठीं कि उसने शादी में उसे क्यों नहीं आमंत्रित किया।

लेकिन 14 अक्टूबर को इसी कोमलिका को समझ नहीं आया कि वह एक पत्रकार के बतौर अपना काम करने के लिये प्रेस कान्फ्रेन्स कवर करने पहुंची है, तो उसे कोई यह कह कर कैसे रोक सकता है कि वह जिस चैनल में काम करती है, वह सीपीएम से प्रभावित है। नंदीग्राम और सिंगूर के आंदोलन के दौर में कोमलिका ने जो भी रिपोर्टिंग की, कभी सीपीएम ने किसी न्यूज चैनल को यह कह नहीं रोका कि आप हमारे खिलाफ हैं, आपको कवर करने नहीं दिया जायेगा। कोमलिका के पिता रितविक घटक के साथ फिल्म बनाने में काम कर चुके हैं और नक्सलबाड़ी के उस दौर को ना सिर्फ बारीकी से महसूस किया है, बल्कि झेला भी जिसके बाद कांग्रेस का पतन बंगाल में हुआ और सीपीएम सत्ता पर काबिज हुई। नंदीग्राम से लालगढ़ तक के दौरान सीपीएम की कार्यशैली को लेकर शोमा दास और कोमलिका के माता-पिता की पीढ़ी में यह बहस गहरायी कि क्या वाकई ममता सीपीएम का विकल्प बनेगी और अक्सर कोमलिका ने कहा – लोगों को सीपीएम से गुस्सा है, इसका लाभ ममता को मिल रहा है।

लेकिन नया सवाल है कि अब ममता से भी गुस्सा है तो किस तानाशाही को शोमा या कोमलिका पंसद करें। यह संकट बंगाल के सामने भी है और पत्रकारों के सामने भी। क्योंकि अगर दोनों नापंसद हैं, तो वैकल्पिक धारा की लीक तलवार की नोंक पर चलने के समान है। तो सवाल है, पत्रकारिता कैसे की जाये?


लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी मशहूर पत्रकार हैं। इन दिनों वे ‘जी न्यूज’ में बतौर संपादक कार्यरत हैं। उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है। उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लिया गया है। अगर आप उनके इस लिखे पर कोई कमेंट करना चाहते हैं या दूसरों के कमेंट को पढ़ना चाहते हैं तो क्लिक करें- पुण्य प्रसून का ब्लाग
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