अरे भइया, ये इज्जत कौन चिड़िया का नाम है?

यशवंत भाई, आपसे भलीभांति परिचित हूं। आप भी मुझे बखूबी जानते हैं। एक लेख भेज रहा हूं। पहचान गुप्त रखने की गुजारिश करता हूं। लेख को पढ़ें। चाहत है कि मौजूदा दौर और आने वाली पत्रकारिता की कौम आज की मीडिया से वाकिफ हो। यहां फैले व्यापारिक एकाधिकार को जाने। यदि संभव हो तो कृपया बहुचर्चित और मीडिया को समर्पित भड़ास4मीडिया के संजाल में इसे जगह दे। यथासंभव कोई त्रुटि रह गई हो तो संपादित करने का पूर्णाधिकार आपको है।


 अरे भइया, ये इज्जत कौन चिड़िया का नाम है?

मीडिया की यह गंदी सी मंडी है और यहां हम सब रंडी हैं। मतलब साफ है- पैसा फेंको और तमाशा देखो। बड़े ख्वाब संजोए, पत्रकारिता का इतिहास पढ़ा, विश्व प्रसिद्ध पत्रकारों और महापुरुषों की जीवनियां घोटीं, रिपोर्टिंग का ककहरा सीखा और फिर पत्रकारिता एवं जनसंचार में परास्नातक की तालीम ली। मकसद केवल एक, समाज को एक नई दिशा देनी है, भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाना है, स्वर्णिम इतिहास की एक नई इबारत को खुद अपनी ही कलम से लिखना है। … और खोजबीन, तहकीकात, मेलमिलाप करके ऐसी धांसू खबरें लिखनी है ताकि लोग सफेद पर्दे के पीछे की काली हकीकत से रूबरू हो सकें।

फिर क्या था, मन में पत्रकारिता के उमड़ते कीड़े, आंखों में देश के सुनहरे भविष्य के सपने और खुद को एक उम्दा पत्रकार बनाने का जुनून ऐसा चढ़ा कि लगा दी मीडिया के गहरे और अथाह सागर में छलांग। जवानी का जोश और उसके साथ खुदी को बुलंद करने का ईरादा लेकर एक नौकरी की तलाश शुरू कर दी।

शुरुआत की कानपुर से। सुबह से शाम तक कानपुर, लखनऊ में जूते घिसे। गर्मियों की तपती दोपहर में नौकरी की तलाश करते-करते यह इरादा भी पक्का करता गया कि आदर्शों से समझौता नहीं करूंगा। खैर, किस्मत शायद बुलंद थी। तीन माह बाद नौकरी मिल गई। देश के नंबर वन अखबार में। 15 दिन काम करने के बाद पता चला कि माह में केवल तीन हजार रुपये ही पगार मिलेगी। सुबह नौ से रात ग्यारह बजे तक काम करना पड़ेगा। लेकिन इतना खर्च तो केवल मेरे स्कूटर का पेट भरने में ही चला जाता, बाकी दिन भर टनटनाने वाले मोबाईल फोन और धुएं के आदी हो चुके फेफड़ों और पापी पेट के लिए एक ढ़ेला नहीं मिलना था। सो छोड़ दिया नंबर वन का ब्रांड और फिर तलाश शुरू कर दी। किस्मत फिर अच्छी थी, नंबर चार के अखबार में नौकरी की बात पक्की हो गई लेकिन उनकी एक शर्त ने फिर इरादे को डगमगा दिया।

उस अखबार के स्थानीय संपादक को एक मीठी गोली देकर कुछ वक्त बाद वापस आने को कह निकल पड़ा फिर उसी तलाश में। इस बार मित्रों के आग्रह पर नोएडा आ गया। किस्मत शायद कदमों से कदम मिलाकर चल रही थी। आने के दूसरे दिन ही नंबर तीन के राष्ट्रीय अखबार के संपादक से साक्षात्कार संबंधी बात की। उन्होंने बुलाया, साक्षात्कार दिया, दो-चार बार फिर बुलाया, समझा और फिर दो दिन बाद फोन करने के लिए कहा। समय के पाबंद संपादकजी ने आखिरकार नौकरी दी। पगार और खर्चे भी अच्छे थे। संयोग और किस्मत देखिए जनाब कि मन की नौकरी लेकर दफ्तर से बाहर निकला तो नंबर चार वाले अखबार के संपादक का फोन आया और उन्होंने पूछा कि क्या हुआ अभी तक आए नहीं? उन्हें बुरा न लगे और संबंध भी खराब न हो इसलिए हकीकत बताई और कहा गुरुजी मन की नौकरी है और कोई शर्त भी नहीं, आपके यहां इतनी छूट नहीं थी। इसलिए माफ कर दीजिएगा। उन्होंने आर्शीवाद दिया।

बस अगले दिन से पत्रकारिता शुरू। जाड़े के दिनों में पत्रकारिता की शुरुआत हुई लेकिन जोश और जुनून की गर्मी के कारण कड़ाके की ठंड में भी कभी-कभी टी-शर्ट पहन कर दफ्तर पहुंच गया। दी गई बीट भी मन की थी और समाज सुधार का रास्ता भी इसके जरिए बखूबी पूरा होता इसलिए और ज्यादा जज्बात उमडऩे लगे। मिशन शुरू कर दिया था। तीसरे दिन से ब्यूरो चीफ भी खबरों की तारीफ करने लगे। लेकिन ब्यूरो में वाहवाही लूटने वाली खबरें अखबार में अगले दिन शायद सफेद स्याही से छाप दी जातीं और कई दिनों तक साधारण खबरों के अलावा विशेष खबरों को अखबार में देखने को तरस गया। कई दिनों तक मन में चल रही उहापोह की स्थिति से खुद को बाहर निकाल करीब दस दिनों बाद जब न रहा गया तो पूछ ही बैठा, गुरु जी। क्या बात है? कहीं आप खबरों को मजाक में ही तो अच्छा नहीं कहते? उन्होंने हंसते हुए कहा नहीं। मैंने तुरंत अगला सवाल दाग दिया तो फिर खबरें क्यों नहीं छपती? उन्होंने फिर मुस्कुराते हुए कहा कि चिंता मत करो, छपने लगेंगी। खुद को असंतुष्ट पा फिर तीसरा सवाल तीर की तरह छोड़ा तो क्या खबरें लिखने का तरीका बदलना पड़ेगा? उन्होंने फिर धीमे से मुस्कुराते हुए कहा कि नहीं अखबार का तरीका समझना पड़ेगा। कुछ बात समझ में आ गई। अखबार को समझते हुए और खुद की बात भी कहते हुए खबरें लिखना शुरू किया, काली स्याही से छपी खबरें अखबार में दिखनी शुरू हो गईं और सिलसिला चल पड़ा।

…लेकिन कुछ माह में ही लगने लगा फिर उस मिशन का क्या हुआ, क्या होगा? सोच में पड़ गया और अखबार के कलेवर और खुद के तेवरों की खिचड़ी बना लिखने लगा और छपता रहा। करीब दो साल गुजर गए। लेकिन इस बीच कई बार मन को लगा कि जिस भी संस्थान, प्रतिष्ठान में गया वहां पत्रकार की इज्जत केवल उसी दिन होती थी जिस दिन उनके यहां कोई कार्यक्रम, समारोह या महोत्सव आयोजित किया जाता था। लेकिन ये सभी प्रतिष्ठान भी चुनिंदा थे और अखबार के व्यावसायिक हितों को पूरा करते थे।

शायद मैं नया था इसलिए कई बार इस हकीकत को जानते बूझते भी दरनिकार कर दिया कि नहीं गलती से हो गया होगा। लेकिन अब तीन सालों से भी ज्यादा का वक्त हो गया है। वही क्षेत्र है वही लोग हैं और वही बीट है। पर इज्जत नाम की चिडिय़ा न जाने उड़ कर कहां गुम हो गई है। अखबार के व्यावसायिक हितों की पूर्ति मेरे पत्रकारिता मिशन में रोड़ा बन जाती है। इस जगह से विज्ञापन आता है, खबर को बड़ी बना देना, यहां के निदेशक मित्र हैं इसलिए फोटो भी भेज देना, इस साल इस प्रतिष्ठान ने बढिय़ा विज्ञापन दिए हैं इसलिए इनकी खबरें बढिय़ा बनाकर भेजना, और इसके अलावा भी न जाने कितनी तरह की इच्छाएं रोज ऊपर वाले जाहिर करते रहे।

पर अब हद हो गई। विज्ञापन ने अखबार की आत्मा यानी पत्रकारिता पर कब्जा कर लिया है। पत्रकार को कतई आजादी नहीं कि किसी आयोजन में….

  1. यदि उससे आयोजक बदतमीजी कर देते हैं तो पत्रकार उस कार्यक्रम को अपने अखबार में जगह न दे।
  2. यदि पत्रकार को आयोजक गलत जानकारी देते हैं, झूठे आंकड़े देते हैं तो पत्रकार खुद से तहकीकात करके लाए सही आंकड़े खबर में दे।
  3. यदि पत्रकार किसी आयोजन को अखबार में स्थान पाने योग्य नहीं समझता है तो उसे न लिखे।
  4. यदि कहीं पर आयोजक आमंत्रण करने के बाद भी पत्रकार को बैठने के लिए नहीं कहता तो वह उस कार्यक्रम को छोड़ दे।
  5. यदि कहीं पर पत्रकार को आमंत्रित नहीं किया जाता तो भी वह आयोजन में न जाए।
  6. दूसरे अखबार में लिखी खबर पर पत्रकार से सवाल किए जाते हैं कि इसमें यह क्यों लिखा है।
  7. बड़ी विज्ञापनदाता पार्टी होने वाले प्रतिष्ठान द्वारा की गई समाज विरोधी गतिविधि को भी बिना नाम दिए छोटी खबर करके प्रकाशित कर दिया जाता है।
  8. पत्रकार को रिपोर्टिंग नहीं बल्कि मार्केटिंग करने के लिए कहा जाता है।
  9. कोई सटीक और बिल्कुल सही नकारात्मक खबर को रद्दी की टोकरी में डाल दिया जाता है।
  10. विज्ञापनदाता प्रतिष्ठान की महिमामंडित खबरों को बड़े ही सलीके से डिजाइन करके लगाया जाता है।
  11. पाठकों पर क्या प्रभाव पड़ेगा इसकी चिंता नहीं लेकिन मालिकों के मित्र हैं इसकी चिंता सबसे पहले करनी पड़ती है।
  12. ढेरों जगह आयोजन है लेकिन बैठना केवल एक जगह ही पड़ेगा क्योंकि यहां मालिकों के दोस्त मौजूद हैं।
  13. हजार लोगों के आयोजन में जहां नामी-गिरामी, विशेषज्ञ भी मौजूद हैं, केवल उन लोगों का ही साक्षात्कार और छायाचित्र लेना होगा जिन्हें संपादक या मालिक छपवाना चाहते हैं। बाकी सभी लोगों से अखबार को कोई सरोकार नहीं।
  14. पाठक जाए भाड़ में, बस संपादक-मालिक का उल्लू सीधा हो और उन भाई साहब का भी कॉलर ऊंचा हो जाए जिनका साक्षात्कार अखबार में छपा है।

शिकायतें और टीसें केवल यहीं खत्म नहीं होती। न जाने कितने और इनसे भी ज्यादा गहरे सवाल हैं लेकिन शायद अब बाहर नहीं निकल रहे। मेरा सवाल है उन संपादकों, अखबार-चैनल मालिकों और मीडिया के ठेकेदारों से है कि खुद के गिरेबान में आखिर एक बार क्यों नहीं झांकते? हकीकत से यह सब भी अच्छी तरह वाकिफ हैं लेकिन व्यावसायिक हितों की पूर्ति और ज्यादा कमाने का लालच, टीआरपी-आईआरएस की दौड़ में अव्वल आने का प्रयास, निजी स्वार्थों की पूर्ति के काले दलदल में यह सभी इतने धंस चुके हैं कि सफदे हकीकत इन्हें रास नहीं आती। यह भी अच्छी तरह जानते हैं कि आज भी पत्रकारिता के बल पर अखबार चलाए जा सकते हैं, टीवी चैनलों की टीआरपी बटोरी जा सकती है लेकिन नहीं, इन्हें इंतजार की आदत नहीं। मशीन की तरह इधर दे उधर ले वाला काम चाहिए। समाज को नित नए और भ्रामक स्लोगन से अपनी ओर आकर्षित करने वाले प्रमुख मीडिया हाऊसेज को शायद खुद से सवाल पूछने का समय आ गया है?

आपका

कुमार

(बदला हुआ नाम)

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