आत्मकथ्य : रायपुर – यादों की महक (अंतिम)

यादों की यही महक लिए हुए मैं थोड़े समय के बाद छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से प्रकाशित होने वाले हरिभूमि से जुड़ गया। यह एक संयोग ही था कि मैं हरिभूमि के तब पंडरी स्थित कार्यालय में रमेश नैयर से मिलने के लिए आया हुआ था। वे छत्तीसगढ़ के अत्यंत सम्मानित पत्रकार और मुङो बहुत स्नेह करने वाले व्यक्ति हैं। स्वदेश, रायपुर में कार्य करते समय मेरा उनसे संपर्क आया था, जो उनकी आत्मीयता के नाते निरंतर सघन होता गया। श्री नैयर से इस मुलाकात के समय ही हिमांशु द्विवेदी से मेरी भेंट हुई। कैसे, क्या हुआ, लेकिन मैं मार्च, २००४ में हरिभूमि से जुड़ गया। इसके पूर्व हरिभूमि के संपादक के रूप में गिरीश मिश्र और एल.एन. शीतल कार्य कर चुके थे। अखबार को निकलते कुल डेढ़ साल हो गए थे और मैं तीसरा संपादक था।

बावजूद इसके, अखबार बहुत अच्छे स्वरूप में निकल रहा था। हरिभूमि और हरिभूमि के पदाधिकारियों से जैसा रिश्ता बना कि वह बहुत आत्मीय होता चला गया। यहां पर आरंभिक दिनों में छत्तीसगढ़ के अत्यंत श्रेष्ठ पत्रकार स्वर्गीय रम्मू श्रीवास्तव के साथ काम करने का भी मौका मिला। कुछ ही समय बाद हिमांशु जी पूर्णकालिक तौर पर रोहतक से रायपुर आ गए। उनके साथ मेरा जिस तरह का और जैसा आत्मीय संबंध है, उसमें उनकी तारीफ को ब्याज स्तुति ही कहा जाएगा। बावजूद इसके वे बेहद सहृदय, संवेदनशील और किसी भी असंभव कार्य को संभव कर दिखाने की क्षमता के प्रतीक हैं। उनमें ऊर्जा का एक अजस्र स्रोत है, जो उन्हें और उनके आसपास के वातावरण को हमेशा जीवंत तथा चैतन्य रखता है। एक संपादक और एक प्रबंधक के रूप में उनकी क्षमताएं अप्रतिम हैं। इसके साथ ही उनके पास एक बहुत बड़ा दिल है, जो अपने दोस्तों और परिजनों के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए आमादा दिखता है।

इस बीच मेरा चयन कुशाभाऊ पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर में रीडर के पद पर हो गया। सो मुझे लगभग छ: माह हरिभूमि से अलग होकर विश्वविद्यालय को अपनी सेवाएं देनी पड़ीं। विश्वविद्यालय में मेरे पुराने साथी डा. शाहिद अली और नृपेंद्र शर्मा मौजूद थे। छ: माह का यह समय एक पूर्णकालिक अध्यापक के रूप में ही गुजरा किंतु मित्रों के लगातार दबाव और तरह-तरह की प्रतिक्रियाओं से मन जल्दी ही बोर होने लगा। हिमांशुजी का स्नेहभरा दबाव हमेशा बना रहता था। उनके आदेश पर मुझे अंतत: विश्वविद्यालय की नौकरी छोड़कर फिर हरिभूमि में स्थानीय संपादक के पद पर आना पड़ा। इस दौरान हरिभूमि में काफी परिवर्तन हो चुके थे। कई पुराने साथी अखबार छोडक़र जा चुके थे और एक नई टीम बनाने की चुनौती सामने थी। इस दौर में भी नए-नए साथी जुड़े और कई तो ऐसे जिन्होंने हरिभूमि से ही अपने पत्रकारीय कैरियर की शुरुआत की। इस बीच धमतरी रोड पर हरिभूमि का नया भवन भी बना। वह बहुत सुदर्शन अखबार के रूप में ज्यादा रंगीन पन्नों के साथ निकलने लगा। शहर के बौद्धिक तबकों में भी उसकी खास पहचान बननी शुरू हो गई। इसका फायदा निश्चित रूप से हम सबको मिला।

नगर के बुद्धिजीवी हरिभूमि के साथ अपना जुड़ाव महसूस करने लगे। वरिष्ठ पत्रकार बसंत कुमार तिवारी, बबन प्रसाद मिश्र, गिरीश पंकज, जयप्रकाश मानस, सुधीर शर्मा, डा. राजेंद्र सोनी, डा. मन्नूलाल यदु ऐसे न जाने कितने नाम हैं, जिनका योगदान और सहयोग निरंतर हरिभूमि को मिलता रहा। यह एक ऐसा परिवार बन रहा था, जो शब्दों के साथ जीना चाहता है। इस दौरान हरिभूमि ने अपार लोक स्वीकृति तो प्राप्त की ही, तकनीकी तौर पर भी खुद को सक्षम बनाया। इसका श्रेय निश्चित रूप से हरिभूमि के उच्च प्रबंधन को ही जाता है। अब जबकि प्रिंट मीडिया में १९९४ में शुरू हुए अपने कैरियर की एक लंबी पारी खेलकर मैं इलेक्ट्रानिक मीडिया के क्षेत्र में प्रवेश कर रहा हूं तो यह मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ ही कहा जाएगा। यह असुरक्षा में एक छलांग भी है और स्वयं को तौलने का एक अवसर भी। यह समय मुझे कैसे और कितना बदल पाएगा, इसे हम और आप मिलकर देखेंगे। तब तक इलेक्ट्रानिक मीडिया की भाषा में मैं एक ब्रेक ले लेता हूं।

-संजय द्विवेदी, रायपुर (शुक्रवार, २० जून, २००८)

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