जागरण, अमर उजाला और मेरठ के दंगे

naunihal sharma: भाग 26 : 1980 के दशक में मेरठ हमेशा बारूद के ढेर पर बैठा रहता था। हरदम दंगों की आशंका रहती थी। गुजरी बाजार, शाहघासा, इस्लामाबाद, शाहपीर गेट, मछलीवालान और भुमिया का पुल बहुत संवेदनशील स्थान थे। हिन्दू-मुस्लिम समुदाय यों तो शहर में एक-दूसरे के पूरक थे- एक के बिना दूसरे का काम नहीं चलता था- मगर सियासी चालबाजों को उनकी गलबहियां नहीं भाती थीं। ये दोनों समुदाय वोट बैंक थे।

तब मुकाबला दो ही पार्टियों में हुआ करता था। कांग्रेस और भाजपा में। सपा-बसपा जैसी पार्टियां नहीं थीं। इसलिए मतदाताओं के सामने सीमित विकल्प होते थे। और इसीलिए नेतागण दंगे का इस्तेमाल एक हथियार की तरह किया करते थे (अब भी करते हैं, लेकिन तब बाहुबलियों जैसे विकल्प नहीं थे। यही वजह है कि तब दंगे अक्सर होते रहते थे।)। दंगों का भी समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र होता है। वास्तव में साम्प्रदायिक तत्व से ज्यादा महत्वपूर्ण तत्व यही होते हैं। और इन दोनों तत्वों के लिए प्रचार बेहद जरूरी होता है। इसलिए यह संयोग नहीं है कि मेरठ में ‘जागरण’ (1984) और ‘अमर उजाला’ (1986) के आने के बाद दंगों की बाढ़ सी आ गयी थी।

वजह साफ थी।

इन दोनों अखबारों के आने से पहले मेरठ में अखबार तो काफी थे, पर उनका फलक इतना बड़ा नहीं था। इसलिए ‘जागरण’ और ‘अमर उजाला’ के आने से दंगों के ‘सूत्रधारों’ के मजे आ गये। किसी मामूली सी बात पर दंगा होता। जैसे- दो साइकिलों की टक्कर, छेड़छाड़, मंदिर या मस्जिद के पास अवांछित चीज का मिलना, सब्जीवाले से झगड़ा, पतंगबाजी में तकरार, रिक्शावाले से पैसे को लेकर कहासुनी, खेल-खेल में बच्चों की भिड़ंत…

वजह कुछ भी हो, हल्ला मचता। ईंट-पत्थर फेंके जाते। भगदड़ मच जाती। फिर होती छुरेबाजी। एक लाश गिरते ही शहर में पुलिस की जीपें दौडऩे लगतीं। पहले पुलिस हालात को काबू में करने की कोशिश करती। कई जगह पुलिस पर भी पथराव हो जाता। संकरी गलियों में छुरेबाजी जारी रहती। आखिर पुलिस जीपों के लाउडस्पीकरों से कर्फ्यू की घोषणा की जाती। कई दिन कर्फ्यू रहता। पूरा शहर सहमा रहता। कर्फ्यू में ढील दी जाती। लोग जरूरत की चीजें खरीदने के लिए बाजारों की ओर दौड़ पड़ते। फिर कहीं छुरा चल जाता। और फिर कर्फ्यू लग जाता। उसके बाद शुरू होता कर्फ्यू वाले इलाकों में राहत पहुंचाने का सिलसिला। यहीं से शुरू हो जाती राजनीति। जहां जिसका वोट बैंक होता, वह वहीं राहत लेकर जाना। उसके फोटो अखबारों में छपवाये जाते। उन फोटो और खबरों के आधार पर ऊपर तक सोढिय़ां लगायी जातीं।

यह सब चलता रहता। जनता हमेशा सिमटी-सहमी रहती कि पता नहीं कब कब चिंगारी भड़क उठे। ऐसे में पत्रकारों की खासी मुसीबत रहती। कर्फ्यू पास बनवाकर किसी तरह ड्यूटी पर पहुंचते। ऐसे में पड़ोसी घर आकर लिस्ट थमा जाते। सबको कुछ न कुछ मंगवाना रहता। तो पड़ोसी धर्म भी निभाना पड़ता। दफ्तर से मारुति जिप्सी लेने आती। सुबह को निकलती, तो नाइट शिफ्ट वालों को भी बटोर लाती। यानी डबल ड्यूटी। रात को सबको घर छोड़ती। जब तक सुबह के गये घर न लौट आते, तब तक घरवालों के मन में आशंकाओं के बादल उमड़ते-घुमड़ते रहते। इस तरह रोज 14-15 घंटे हम दफ्तर में बिताते। जागरण का दफ्तर साकेत में था। वहां कभी कर्फ्यू नहीं लगता था।

दंगे के दौरान न केवल काम बढ़ जाता, बल्कि आने-जाने का जोखिम भी रहता। लेकिन इसके बावजूद एक जोश रहता। महसूस होता कि कुछ बहुत जिम्मेदारी का काम कर रहे हैं। वो इसलिए कि उन दिनों खबरिया चैनल तो थे नहीं। तो सूचनाएं पाने के लिए सबकी नजरें रेडियो और अखबारों पर रहतीं। रेडियो था सरकारी। उस पर बहुत संक्षिप्त खबर आती मेरठ के दंगे की। वो भी सरकारी नजरिये से। ले-देकर रह जाते अखबार। दंगे के दिनों में मेरठ में अखबार ब्लैक में मिलते।

आज भी मुझे दुनिया के सबसे साहसी लोगों में मेरठ के वे हॉकर भी लगते हैं, जो कफ्र्यू और अपनी जान की परवाह किये बिना सुबह-सुबह साइकिलों पर अखबार लादकर निकल पड़ते शहर में बांटने। हर गली के नुक्कड़ पर लोगों की भीड़ जमा रहती। जिनके घर रोज के अखबार बंधे हुए थे, उन्हें अखबार पहले मिलता। बाकी लोग हॉकर के पीछे भागते। तीन-चार गुना पैसे देकर भी अखबार पा जाते , तो खुद को भाग्यशाली समझते। फिर उन अखबारों का सामूहिक वाचन होता। जोर-जोर से खबरें पढ़ी जातीं। दूसरे मोहल्लों में पिछले दिन हुई वारदातों का पता चलता। लोग चिल्ला-चिल्ला कर कहते-

‘देखो, मैं बोल रहा था ना, रात को मोरीपाड़ा पर हमला हुआ था।’

‘और गुजरी बाजार की ओर से भी तो हल्ले की खबर आयी है छपके।’

‘भुमिया के पुल पर तो चाकुओं से गुदी लाश मिली।’

‘सुभाष नगर पर भी हो ही जाता हमला… वक्त पे पुलिस के पहुंचने से बच गये।’

‘कोतवाली के सामने कचरे का ढेर जमा है चार दिन से। कफ्र्यू खुल नहीं रहा। जमादार लोग उठाने भी कैसे आयें?’

‘ये तो पुलिस की जिम्मेदारी है। जब कफ्र्यू लगाया है, तो सड़कों पर भी तो उसी का राज हुआ। फिर वो सफाई क्यों नहीं कराती?’

‘हां भई, बदबू के मारे सिर फटा जा रहा है। कफ्र्यू हटे, तो ये गंदगी ही पहले हटवाएं।’

इसी तरह की चर्चाएं कर्फ्यूग्रस्त इलाकों में होती रहतीं। जब हमें लेने अखबारों की गाड़ी आती, तो लोग पहले अपने सामान की लिस्ट थमाते। फिर खबरें छापने को कहते। उनकी खबरें भी बहुत विविधता वाली होतीं-

‘आप ये जरूर छापना कि तीन दिन से हमारे महल्ले में दूध नहीं आया है। छोटे बच्चों ने रो-रो कर बुरा हाल कर रखा है।’

‘नुक्कड़ की दुकान वाले ने भी अंधकी मचा रखी है। दो रुपये का सामान आठ रुपये में दे रहा है। हम पूछें, उसकी खरीदी तो कर्फ्यू के पहले की है। फिर वो इतनी महंगाई क्यूं किये हुए है?’

‘साहब, औरत के दिन पूरे हो गये हैं। जचगी कैसे होगी? ये मरे खाकी वाले तो दूसरे महल्ले से दाई को भी ना लाने देंगे।’

‘लड़की को छूचक पहुंचाना है। बताओ कैसे पहुंचायें?’

‘खुद तो भूखे रह भी लें, पर बकरी को तो घास चाहिए। कईं ना मिल रई।’
‘चौराहे के पीछे वाली चाय की दुकान में मुझे तो कुछ गड़बड़ लगै है। कल वहां दो लड़के कुछ सामान रखकर भाग गये। आप जरा चैक करा लेना पुलिस से कि कुछ असलाह वगैरा तो नहीं है।’

एक दिन गाड़ी का ड्राइवर नहीं आया था। इसलिए विज्ञापन विभाग के मुनीश सक्सेना गाड़ी चला रहे थे। मैं और फोटोग्राफर गजेन्द्र सिंह ही थी गाड़ी में। हमें नौनिहाल ने अपने घर बुला लिया। हम अंदर गये। एक कमरे के घर में मधुरेश खेल रहा था। प्रतीक सो रहा था। गुडिय़ा तब तक नहीं हुई थी। उसी कमरे में नौनिहाल की पूरी गृहस्थी थी। कपड़े, बर्तन, दो खाट, एक फोल्डिंग पलंग… और इनसे जो जगह बची, उसमें अखबार, पत्रिकाएं, किताबें!

सुधा भाभी ने हमें नींबू की शिकंजी पिलायी। फिर पंखा झलते हुए हमारे पास बैठ गयीं। बोलीं, ‘भइया इनका ध्यान रखा करो। बोल-सुन तो सकते नहीं, पर जोश ऐसा दिखाते हैं जैसे ये ही कपिल देव हों। हमारा तो कोई आगे-पीछे है ना। बस तुम लोग ही हो।’

वे सुबकने लगी थीं। हम भी सीरियस हो गये। हमारे मुंह ही मानो सिल गये। क्या बोलें? नौनिहाल अपनी मस्ती में थे।

अचानक उन्हें लगा कि कुछ गंभीर बात हो गयी है। (उन्होंने सुधा भाभी को बोलते हुए नहीं देखा था। नहीं तो वे समझ जाते।)

वे ठहाका लगाकर बोले, ‘जरूर मेरी बामनी (वे भाभी को प्यार से यही कहते थे) ने मरने-खपने की कुछ बात कह दी है।’

bhuvendra tyagiफिर भाभी की ओर देखकर बोले, ‘तू क्यूं चिंता करती है? मैं ना रहया, तो मेरे ये दोस्त हैं ना तुम्हारा खयाल रखने को!’

इतना कहकर वे उठकर चल दिये। हम सबका मन भारी हो गया। हम धीरे-धीरे जिप्सी की ओर बढ़े। भाभी हमें ओझल होने तक देखती रहीं…

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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Comments on “जागरण, अमर उजाला और मेरठ के दंगे

  • तब मुकाबला दो ही पार्टियों में हुआ करता था। कांग्रेस और भाजपा में।
    1980 me BJP kahan thi..?

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  • Ha Ha Ha Ha Ha Ha……….. Itna bhi nahi pata? Bjp ka gathan 1980 me hua tha. Pata nahi to pata karo. Varna muh band rakho.

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  • vijay tripathi says:

    प्यारे दोस्तों, कमेंट करने में तो कम से कम शालीनता की उम्मीद की जानी चाहिए कि नहीं? ज्ञान की बात बता रहे हो तो कम से कम ज्ञानियों जैसा तरीका भी तो झलके।

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