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ये तो मार्क टुली है, बीबीसी वाला!

नौनिहाल शर्मा: भाग-32 : प्रगति मैदान, पुस्तक मेला और हम : दिल्ली के प्रगति मैदान में हर दो साल के बाद विश्व पुस्तक मेला लगता था। उसका अखबारों में और दूरदर्शन पर काफी विज्ञापन आता था। मेरठ से सुबह को दिल्ली के लिए शटल जाती थी, रात को लौटती थी। उसमें ज्यादातर नौकरीपेशा दैनिक यात्री सफर करते थे। रोडवेज की बसें भी चलती थीं। लेकिन आम लोग ट्रेन से सफर करना ही बेहतर समझते थे।

नौनिहाल शर्मा: भाग-32 : प्रगति मैदान, पुस्तक मेला और हम : दिल्ली के प्रगति मैदान में हर दो साल के बाद विश्व पुस्तक मेला लगता था। उसका अखबारों में और दूरदर्शन पर काफी विज्ञापन आता था। मेरठ से सुबह को दिल्ली के लिए शटल जाती थी, रात को लौटती थी। उसमें ज्यादातर नौकरीपेशा दैनिक यात्री सफर करते थे। रोडवेज की बसें भी चलती थीं। लेकिन आम लोग ट्रेन से सफर करना ही बेहतर समझते थे।

तो एक बार नौनिहाल ने पुस्तक मेले में चलने का आदेश दिया….

‘चल, इस शनिवार को दिल्ली घूम आते हैं। पुस्तक मेले में जायेंगे। सरिता और हिन्दुस्तान में कुछ दोस्तों से भी मिलना हो जायेगा।’

‘गुरू, पैसे कितने ले चलें?’

‘वैसे तो पांच हजार भी कम पड़ेंगे, पर हमारी जेब तो खाली रहती है। इसलिए जितने संभव हों, उतने ले चलो। उनमें जितनी किताबें आयेंगी, ले लेंगे। पैसे खत्म होने पर किताबों के दर्शन करके लौट आयेंगे।’

‘तो एक काम किया जाये। खाना घर से बनवाकर ले चलें। इससे बाहर खाने पर खर्चा नहीं होगा। इस तरह बचे पैसों की भी किताबें खरीदी जा सकेंगी।’

‘ठीक है। मैं पराठे और आलू की सब्जी ले आऊंगा।’

‘मैं चने और गुड़ लाऊंगा, क्योंकि तेरी भाभी इतनी सुबह उठकर खाना नहीं बना सकती।’

‘चला कैसे जायेगा?’

‘शटल जिंदाबाद। मेरठ सिटी पर बैठेंगे। तिलक ब्रिज पर उतरेंगे। वहां से पैदल टहलते हुए प्रगति मैदान पहुंच जायेंगे।’

‘ठीक है। शनिवार को स्टेशन पर मिला जाये।’

और शनिवार को हम मेरठ सिटी स्टेशन पहुंच गये। सुबह साढ़े छह बजे ही। स्टैंड पर साइकिलें खड़ी कीं। टिकट लिये। शटल भी स्टेशन पर आ लगी। हमने दौड़कर सीट पकड़ी। कई जान-पहचान के लोग भी मिल गये। रोज शटल से सफर करने वाले। शटल चलने में दो-तीन मिनट बाकी थे। तभी नौनिहाल को चाय की तलब हुई। हम पास की सीट वाले से अपनी जगह देखते रहने को कहकर चाय लेने उतर गये। चाय का ठेला करीब दस मीटर दूर था। हमने वहां जाकर कुल्हड़ों में चाय ली। एक घूंट भरा। फिर ट्रेन में अपनी सीट की ओर बढ़े। तभी इंजन ने सीटी दी। मैंने नौनिहाल को कोहनी मारकर इशारा किया। हमने कदम जरा तेज किये। तब तक शटल गति पकडऩे लगी थी। हमने गति और बढ़ायी। पर अब चाय के कुल्हड़ के साथ ट्रेन नहीं पकड़ी जा सकती थी। इसलिए हमने एक साथ अपना-अपना कुल्हड़ फेंका और दौड़ लगा दी। किसी तरह डिब्बे में चढ़ गये। हमारे परिचित ने मजाक में कहा, ‘हमें तो लगा था कि अब तुम्हारा सामान भी वापस हमें ही लाना होगा।’

खैर! तिलक ब्रिज तक का हमारा सफर किताबों की बातें करते हुए ही बीता। ट्रेन से उतरकर हम पैदल ही प्रगति मैदान की ओर चल दिये। वहां गेट से ही माहौल देखने लायक था। मेले के नाम पर मैंने तब तक सरधने का बूढ़े बाबू का मेला और मेरठ का नौचंदी का मेला ही देखा था। किताबों का इतना बड़ा मेला मैं पहली बार देख रहा था। चारों ओर स्टॉल। उनमें किताबें ही किताबें। मैंने इससे पहले अबसे ज्यादा किताबें मेरठ में टाउन हॉल की लायब्रेरी में ही देखी थीं। नौनिहाल इस पुस्तक मेले में हर बार आते थे। इस बार वे अपने साथ मुझे लेते आये थे। इसका मुझे बहुत फायदा भी हुआ।

पहले हमने हिन्दी की किताबें देखीं। देश भर के प्रकाशकों की। मैं कहानी, उपन्यास, कविता की किताबें लेने के चक्कर में था। नौनिहाल ने बरज दिया।

‘फिक्शन वही लो, जो क्लासिक हो। उसी को बार-बार पढ़ा जा सकता है। बाकी फिक्शन एक बार ही पढऩे लायक होता है।’

‘तो फिर पढऩे के लिए रिपीट वैल्यू वाली किताबें कैसे चुनी जायें?’

‘रैफरेंस बुक्स सबसे पहले लो। विज्ञान, समाज और आम जन के उपयोग तथा रुचि की किताबें लो। तुलनात्मक अध्ययन की आदत डालो। यही असली पढ़ाई है।’

मैंने नौनिहाल की वो बात गांठ बांध ली। उसके दो साल बाद जब मैं जागरण से नवभारत टाइम्स, मुम्बई में आया, तो यही सलाह मुझे संजय खाती ने दी। अपने पत्रकारिता जीवन में मुझे इन्हीं दो लोगों से मानसिक खुराक मिली।

बहरहाल, हम प्रगति मैदान में घूम रहे थे। किताबों के बीच। किताबों की महक हम पर नशे का असर कर रही थी। इस बीच मैंने चार किताबें ले ली थीं। नौनिहाल ने भी सात-आठ किताबें ली थीं। तभी हमने एक स्टॉल के पास भीड़ देखी। नौनिहाल ने मुझे उस ओर खींचते हुए कहा, ‘शायद कोई बड़ा लेखक आया है।’

वहां एक लंबे-चौड़े विदेशी को लोगों ने घेर रखा था। मेरे मुंह से निकला, ‘ये तो मार्क टुली है।’

‘बीबीसी वाला?’

‘हां।’

हम भी उनके पास पहुंच गये। मार्क टुली हिन्दी में बात कर रहे थे।

किसी ने कहा, ‘बहुतै नीक हिन्दी बोलत हई।’

मार्क ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘जानत हैं, जानत हैं, हमहू तोहार भासा जानत हैं’ और पूरा माहौल ठहाकों से गूंज गया। दसवीं क्लास में मैंने बीबीसी की एक स्लोगन प्रतियोगिता जीती थी। उसका पुरस्कार लेने मैं दिल्ली में बीबीसी के दफ्तर में गया था। मैंने मार्क को वो वाकया बताया। उन्हें याद आ गया। फिर वे हमें अपने साथ लंच पर ले गये। मैंने घर से बनवाकर लायीं पूडिय़ां निकालीं। मार्क की ओर बढ़ायीं। वे खुश हो गये।

‘आलू की सब्जी और अचार भी है?’

मैंने दूसरे डिब्बे में से निकालकर उन्हें आलू की सब्जी और अचार दिया। हम मिलकर देसी भोजन करने लगे। मजा आ गया। इस बीच मैंने मार्क से नौनिहाल का परिचय कराया। नौनिहाल ने उन्हें नमस्ते करके कहा, जब मैं सुनता था, तो पूरी शाम बीबीसी सुनते हुए ही गुजरती थी। अब मजबूरी है। सुन नहीं सकता।’

मार्क ने उठकर नौनिहाल का कंधा थपथपाया। बोले, ‘इस नौजवान ने मुझे बताया है कि आप जीनियस हो। सुनने, बोलने और देखने से भी बड़ी चीज है महसूस करना। इंसानियत। अंदर की प्रतिभा। मन की कोमलता। और इस नौजवान ने मुझे बताया है कि आप में ये सब गुण हैं।’

हम करीब एक घंटा साथ रहे। खूब बातें हुईं। गये थे किताबें देखने-खरीदने, मुलाकात हो गयी मार्क टुली से। और उनसे बातें भी खूब जमीं। वे लंच करके अपनी कार की ओर बढ़ गये। हम फिर किताबों की ओर। इस बार हम पहुंचे विदेशी प्रकाशकों के स्टॉलों पर। नौनिहाल ने सबसे पहले ली स्टीफन हॉकिंग की किताब ‘ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’। मैंने सिमोन की ‘द सेकंड सेक्स’ ली। हॉकिंस की किताब नौनिहाल ने पढऩे के बाद मुझे भेंट कर दी थी। ये दोनों किताबें आज भी मेरे पास हैं।

हमने करीब 25-30 प्रकाशकों के सूची पत्र भी ले लिये। उनमें से छांटकर मैं बरसों तक किताबें लेता रहा। हमने शाम को करीब पौने पांच बजे चाय पी। बची हुई पूडिय़ों के साथ। भागकर तिलक ब्रिज से शटल पकड़ी। सुबह वाले लोग ही मिल गये। सफर अच्छा कटा। टछठ बजे ट्रेन मेरठ सिटी पहुंची। स्टैंड से साइकिलें लेकर हम घर की ओर चल दिये। रास्ते में घंटाघर पर चाय पी। गप्पें लड़ायीं। नौ बजे घर पहुंचा। मम्मी-पापा, भाई-बहन को पूरे दिन का हाल सुनाया। सोते-सोते 12 बज गये। अगले कई दिनों तक हमारी चर्चा अपनी इस दिल्ली यात्रा के इर्द-गिर्द ही घूमती रही। खासकर मार्क टुली से हुई मुलाकात।

उस घटना को करीब ढाई दशक हो गया है। पर मार्क टुली की एक बात मुझे अब तक याद है। नौनिहाल ने उनसे भारत के राजनीतिक भविष्य के बारे में पूछा, तो वे बोले थे, ‘भारत में कुछ सालों में अनेक पार्टियां होंगी। उन्हीं से कांग्रेस और भाजपा को गठजोड़ करने होंगे। तब राजनीति दूषित होती चली जायेगी। समर्थन देने के बदले हर क्षेत्रीय पार्टी केन्द्रीय पार्टी को भुवेंद्र त्यागीब्लैकमेल करेगी।

मार्क टुली कितने सही थे!

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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