नरममिजाजी से भी अनुशासन संभव

भुवेंद्र त्यागीभाग 22 : मेरठ में जागरण ने शुरू में औपचारिक फीचर छापकर पाठकों को लुभाया। मेरठ के तमाम दरवाजों और अलियों-गलियों का इतिहास, प्रमुख हस्तियां और दर्शनीय स्थल पढ़कर मेरठ वालों को पहली बार कई ऐसी चीजें पढऩे को मिलीं, जिनके बारे में उन्होंने अभी तक सुना ही था। यह सब सामग्री तैयार की थी वेद अग्रवाल ने। वे मेरठ के काफी वरिष्ठ पत्रकार थे। ‘स्वतंत्र भारत’, ‘अमृत प्रभात’ और ‘आज’ जैसे अखबारों से जुड़े हुए थे। ‘नवभारत टाइम्स’ में जाने की उन्होंने भरपूर कोशिश की थी।

कुछ समय स्ट्रिंगर भी रहे। पर सतीश शर्मा ने उन्हें वहां जमने नहीं दिया और वे खुद कई दशक तक मेरठ में ‘नवभारत टाइम्स’ के संवाददाता रहे। पूर्णकालिक नहीं, सालाना करार के आधार पर। तो वेदजी को दूर के अखबारों के लिए ही काम करना पड़ा। लेकिन वे मेरठ में ‘जागरण’ की शुरूआती टीम में थे। यहां तक कि नियुक्तियों तक में उनकी सलाह ली गयी थी। मगर जब मेरठ में संस्करण शुरू हुआ, तो वेदजी टीम में नहीं थे। कानपुर से कुंतल वर्मा को बुलाकर चीफ रिपोर्टर बनाया गया। फिर अभय गुप्त इस पद पर आये। पर वेदजी को शुरूआती मैटर तैयार करने का पूरा श्रेय जाता है।

इस तरह के मैटर ने पाठकों को सचमुच अखबार की ओर आकर्षित किया। जब वह मैटर चुक गया, तो भगवतजी ने जनरुचि की लोकल खबरों की तलाश की। पर रिपोर्टर कम थे। कुंतलजी को मेरठ की कोई जानकारी नहीं थी। इसलिए भगवतजी के संपादन में अखबार में लोकल खबरें कमजोर थीं। मंगलजी ने पूरा चार्ज हाथ में आते ही सबसे पहले इस ओर ध्यान दिया। भगवतजी में कई खूबियां थीं। पर वे अफसराना अंदाज के थे। उनमें फ्लेक्जिबिलिटी नहीं थी। मंगलजी खूब फ्लैक्जिबिल थे। सबको हर तरह का काम करने की छूट देते थे। उन्होंने सबसे पहले लोकल डेस्क को मजबूत किया। ‘

दैनिक प्रभात’ से ओमकार चौधरी, नीरज कांत राही और अनिल त्यागी को लाया गया। ये तीनों तेज-तर्रार रिपोर्टर थे। फिर नंबर आया प्रादेशिक डेस्क का। अशोक त्रिपाठी, द्विवेदीजी, रमेश गोयल और ओ. पी. सक्सेना इस डेस्क पर थे। ओ. पी. को बाद में लोकल पर भेजा गया। मवाना से संतोष वर्मा और मुजफ्फरनगर से श्रवण शर्मा प्रादेशिक डेस्क पर आये। तो मंगलजी ने इन दोनों डेस्कों को मजबूत किया। उनका मानना था कि दिल्ली के अखबारों से देश-विदेश की खबरों में ज्यादा से ज्यादा टक्कर ली जा सकती है, पर लोकल और प्रादेशिक खबरों में उन्हें मात दी जा सकती है। उन्होंने मेरठ के आसपास के शहरों और कस्बों में स्ट्रिंगर भी रखे। इससे खबरों के अंबार लगने लगे।

इन शहरों और कस्बों से खबरें आती भी बहुत मशक्कत के साथ थीं। ई-मेल और मोबाइल फोन तो छोडिय़े, फैक्स तक का जमाना नहीं था वो। फोन पर बात करना भी महंगा पड़ता था। वहां के स्ट्रिंगर रोडवेज की बसों के ड्राइवरों को अपनी खबरें लिफाफों में रखकर दे देते थे। मेरठ में रोडवेज बस अड्डे पर व्हीलर के स्टॉल के पास एक लैटर बॉक्स लगाया गया था। बस ड्राइवर उसमें खबरों के लिफाफे डाल देते। दो चपरासी ओमप्रकाश और रमेश अपनी-अपनी ड्यूटी के अनुसार हर दो घंटे बाद वहां जाते। बॉक्स में से लिफाफे निकाल लाते। वे लिफाफे प्रादेशिक डेस्क के इंचार्ज को दिये जाते। उनमें से खबरें निकालकर वह अपने सहयोगियों में बांट देता। वे सब उन खबरों को दुरुस्त करने में लग जाते। उन सबको वे स्ट्रिंगर बहुत भाते, जिनकी खबरों में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती। बस करेक्शन करो और कंपोजिंग को भेज दो। लेकिन कुछ स्ट्रिंगरों की खबरों पर बहुत मेहनत करनी पड़ती। पूरा रीराइट करना पड़ता। उनकी खबरों से सब बचने की कोशिश करते।

… लेकिन नौनिहाल को ऐसी खबरों में ही मजा आता। एक तो इससे उन्हें रचनात्मकता का सुख मिलता, दूसरे स्ट्रिंगरों को सिखाने का मौका मिलता। कई बार वे स्ट्रिंगरों को अपनी खूबसूरत लिखावट में खत लिखते। उनका मार्गदर्शन करते। हालांकि ये उनका काम नहीं था। सच कहा जाये, तो ये उनका अधिकार क्षेत्र भी नहीं था। फिर भी, वे लगे रहते थे। उन दिनों पत्रकारिता के संस्थान तो थे नहीं। नौनिहाल जैसे लोग ही चलते-फिरते पत्रकारिता संस्थान होते थे। मेरठ का शायद ही कोई दूसरा पत्रकार हो, जिससे पत्रकारिता सीखकर इतने लोग आगे बढ़े हों। उन्हें एक अनौपचारिक पत्रकारिता संस्थान का अनौपचारिक हैड मास्टर माना जा सकता है।

जागरण तो खैर पत्रकारिता का प्रशिक्षण संस्थान था ही। अब भी है। लेकिन उस जमाने की बात ही और थी। वैसे बीता जमाना सबको अच्छा लगता है। मगर तब पत्रकारिता के अलग मूल्य थे… पत्रकारिता करना एक नशा था… हर पत्रकार के मन में एक रोमांटिक अहसास रहता था कि वह समाज के लिए कुछ कर रहा है। आपसी मतभेद और दंद-फंद होते रहते थे। इसके बावजूद काम में निष्ठा बनी रहती थी। काम से कोई भागता नहीं था। दफ्तर में आते-जाते समय कोई घड़ी नहीं देखता था। खबरों के चयन में लंबी बहसें होती थीं। जन-सरोकारों का पूरा ध्यान रखा जाता था। अपनी डेस्क के सहयोगियों की ही नहीं, दूसरे डेस्कों के लिए काम करने को भी सब तैयार रहते थे। बीट हथियाने की मारामारी नहीं होती थी। जिस रिपोर्टर को जो भी बीट मिल जाती, वह उस पर पूरी मेहनत करता।

रिपोर्टर डेस्क पर काम करने में आनाकानी नहीं करते थे। डेस्क के लोग फील्ड में जाने के लिए जान नहीं छोड़े रहते थे। लेकिन अगर किसी को कोई खबर मिल जाती, तो वह उसे लिखने में पीछे भी नहीं रहता था। इसीलिए वो एक अलग दौर था। ये वो दौर था, जब आर्थिक उदारीकरण के बारे में कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था, उत्तर आधुनिकता भारत में अभी मुखरता से नमूदार नहीं हुई थी, राजनीति में कुछ नीति बची थी, समाज में सामाजिकता मौजूद थी।

… और इसीलिए पत्रकारिता में भी मूल्य बचे हुए थे। पाठक खबरों के लिए अखबार लेते थे, विज्ञापनों के लिए नहीं। खबरों में उन्हें अपनी दुनिया नजर आती थी। ये दुनिया बेशक चमक-दमक वाली नहीं थी, लेकिन सच्ची थी। दिखावटों से कोसों दूर थी। इसीलिए पत्रकारिता का वो दौर सुनहरा लगता है। मंगलजी ने खबरें लिखने के लिए सबको पूरी आजादी दे रखी थी। उन्होंने भगवतजी के समय की अफसराना शैली की जगह खांटी पेशेवर शैली को लागू कर दिया था। उनका बनारसी व्यक्तित्व जल्द ही मेरठ जागरण पर छा गया। शुरू में लगा कि इस तरह तो वे चल नहीं पायेंगे। आखिर प्रशासन में कुछ सख्ती भी तो होनी चाहिए। पर मंगलजी ने इस सिद्धांत को गलत साबित कर दिया। उन्होंने दिखा दिया कि नरममिजाजी से भी सबको साथ लेकर चला जा सकता है, सबको अनुशासन में रखा जा सकता है।

दरअसल, मंगलजी को अनुशासन बनाने की कभी जरूरत ही नहीं पड़ी। उन्हें शांत स्वभाव का समझकर अगर कोई उन पर हावी होने या उनका आदेश न मानने की कोशिश करता, तो वे उतने ही ‘प्यार’ से उसे ‘साध’ भी लेते। उन्हें दूसरों को मनाने और उनका गुस्सा शांत करने में महारत हासिल थी। चाहे कोई उनसे असहमत होता, पर वो उनके खिलाफ कभी नहीं होता। यह बात अब संभव नहीं है। अब तो असहमति होने पर मुखालफत भी लाजमी होती है। ये आज की पत्रकारिता है। और भुवेंद्र त्यागीपत्रकारिता को ही क्यों दोष दिया जाये? हर तरफ तो यही हालात हैं। इंसानियत ही सिकुड़ रही हो, तो मिशन वाली पत्रकारिता कहां से आयेगी? हालांकि नौनिहाल को इसका अहसास था। इसीलिए वे अक्सर कहते भी थे- आने वाला वक्त खराब होगा, लोगों के मंसूबे खराब होंगे और दुनिया भी खराब होगी…

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com  के जरिए किया जा सकता है.

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Comments on “नरममिजाजी से भी अनुशासन संभव

  • Kaushal Mishra says:

    Beshak,apne junior patrakaron ko pyar se bhi sadha ja sakta hai.asal dikkat un ham umra yanee senior patrakaron se hoti hai jinka dimag hamesha isee tikadam me laga rahata ki kaise agle ko neechaa dikhayen ya pareshan karen..

    Reply
  • कमल शर्मा says:

    वाकई यह सही है कि नरममिजाजी से भी मीडिया हाउस संचालित किए जा सकते हैं। लेकिन जब सुनते हैं खासकर टीवी चैनलों में जहां अनाप शनाप गालियां सामने और पीठ पीछे भी बकी जाती है तो अचरज होता है। पत्रकारिता में महान हो गए या सीनियर हो गए तो होना यह चाहिए कि व्‍यक्ति को विनम्र बनना चाहिए। जिन पेड़ों पर फल लगते हैं उनके टहनियां फलों के बोझ से नीचे की ओर झुक जाती है, ना कि ऊपर की ओर उठती है। लेकिन मीडिया में कई जगह देखा काफी कुछ उल्‍टा है। अपमानजनक भाषा में बात करना, नीचा दिखाना या गालियां बकना, कहां की बुद्धिमानी है। ऐसी भाषा में बात करने वाले भले अपने को देश का महान पत्रकार मान लें लेकिन इनकी इज्‍जत कभी एक सज्‍जन व्‍यक्ति के रुप में नहीं रहती। इनके जूनियर भी अपने कमरे में जाकर इन सीनियरों के पूरे के पूरे खानदान को जमकर गालियां बकते हैं। नौनिहाल जैसा पत्रकार बनना हरेक के बूते की बात नहीं है। ज्ञानी हमेशा शांत होते हैं लेकिन अज्ञानियों का क्‍या करें क्‍योंकि वे हमेशा ही गाली गलौज या अभद्र व्‍यवहार के ही आदी होते हैं।

    Reply
  • भुवनेन्द्र जी ,

    वैसे तो मैं बंगलोर मे कार्यरत एक साफ़्टवेअर ईन्जीनियर हूँ और पत्रकारिता का प भी नहीं जानता, पर नौनिहाल के बारे में यह पूरी कथा जरूर पढ़ता हूं । आज आपकी कुछ पंक्तियॊं ने टिप्पणी करने को मजबूर कर दिया .

    दिल से वाह वाह निकल पड़ी। . एक कविता पे वाह वाह सामान्य है क्योंकि वह छंद के अनुशासन में बद्ध दिल की बात होती है पर एक घटना का आपने बहुत अच्छा गध्य निरुपण किया है । मेरे प्रेम भावॊं का पुलित्ज़र पुरस्कार स्वीकार करें ।

    फ़िर से आपकी पंक्तियॊं को उद्धत कर रहा हुँ।

    “ये वो दौर था, जब आर्थिक उदारीकरण के बारे में कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था, उत्तर आधुनिकता भारत में अभी मुखरता से नमूदार नहीं हुई थी, राजनीति में कुछ नीति बची थी, समाज में सामाजिकता मौजूद थी।”

    धन्यवाद ,

    जैन[b][/b][b][/b][b][/b]

    Reply
  • भुवनेन्द्र जी ,

    वैसे तो मैं बंगलोर मे कार्यरत एक साफ़्टवेअर ईन्जीनियर हूँ और पत्रकारिता का प भी नहीं जानता, पर नौनिहाल के बारे में यह पूरी कथा जरूर पढ़ता हूं । आज आपकी कुछ पंक्तियॊं ने टिप्पणी करने को मजबूर कर दिया .

    दिल से वाह वाह निकल पड़ी। . एक कविता पे वाह वाह सामान्य है क्योंकि वह छंद के अनुशासन में बद्ध दिल की बात होती है पर एक घटना का आपने बहुत अच्छा गध्य निरुपण किया है । मेरे प्रेम भावॊं का पुलित्ज़र पुरस्कार स्वीकार करें ।

    फ़िर से आपकी पंक्तियॊं को उद्धत कर रहा हुँ।

    “ये वो दौर था, जब आर्थिक उदारीकरण के बारे में कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था, उत्तर आधुनिकता भारत में अभी मुखरता से नमूदार नहीं हुई थी, राजनीति में कुछ नीति बची थी, समाज में सामाजिकता मौजूद थी।”

    धन्यवाद ,

    जैन[b][/b]

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