मराठी ‘सारेगामा’ के फाइनल में दो गैर-मराठी

निरंजन परिहारमराठी सारेगामा के फाईनल में दो गैर मराठी भी पहुंय गए हैं। अब बताइए, बाल ठाकरे और राज ठाकरे उनका क्या उखाड़ लेंगे। ये लोग मुंबई में सिर्फ मराठियों को ही टैक्सी के तलाने के परमीट देने के लिए हो हल्ला मचा सकते हैं। लेकिन मराठियों में इतना माद्दा पैदा नहीं कर सके कि मराठी सारेगामा के फाइनल राउंड के तीनों प्रतियोगी मराठी ही होते। अभिलाषा चेलम तमिलनाड़ु मूल की हैं । दूसरा प्रतियोगी राहुल सक्सेना  उस उत्तर भारत का है, जिसके नाम से ही राज ठाकरे को लफरत के सपने आने लगते है। तीन में से ले – देकर एक अकेली मराठी हैं  उर्मिला धनगर। और वह भी मुंबई से कोई 80 किलोमीटर दूर बदलापुर की  रहनेवाली हैं।

सभी जानते हैं कि संगीत सरहद की भाषा नहीं जानता। वह बाकी कोई भाषा भी नहीं जानता। और सभी सीमाओं के पार जाकर सुनने वालों के दिलों तक पहुंचता है।  इस बात को एक बार फिर सही  साबित किया इन दो गैर-मराठियों ने। मुंबई में सिर्फ मराठियों को ही टैक्सी चलाने के लिए लाइसेंस दिए जाने के बारे में निकले सरकारी फरमान, पर महाराष्ट्र नवनिर्माण लेना के राज ठाकरे और उनके शिवसेना वाले चाचा बाल ठाकरे जिस तरह की राजनीति कर रहै हैं, उनको यह समझना चाहिए कि इन बच्चों ने यह साबित कर दिया है कि मराठी सिर्फ बाल ठाकरे या राज ठाकरे की ही बपौती नहीं हैं। यह सीमाओं के पार से आकर मुंबई में रहने वालों की भी हैं। अभिलाषा  चेलम तो सिर्फ एक साल पहले ही मुंबई में आई है। फिर भी वह यहीं के जन्मे – जाए सवा करोड़ मराठियों पर भारी पड़ गई। राहुल भी मराठी कोई खास नहीं जानता था।

अभिलाषा ने इस शो के लिए सात मराठी गाने याद कर लिए थे। अभिलाषा का कहना है कि मराठी गानों को समझने में रिसर्च टीम ने भी पूरा साथ दिया और वह अब गानों के बोल के अलावा उनके अर्थ को संदर्भ के साथ अब  समझने लगी हैं। वहीं, राहुल सात साल पहले मुंबई आए थे। राहुल को मराठी गीतों ने प्रभावित किया। पर दोनों ने ऐसा कभी नहीं सोचा था कि वे मराठी संगीत के मुकाबले में इस मुकाम पर पहुंच जाएंगे। भाषा, समुदाय और प्रांतवाद के नाम पर अपनी राजनीति की रोटियां सेंकने वाले बाल ठाकरे और राज ठाकरे मुंबई में मराठी के नाम का इतना शोर मचाते हैं कि मंबई सिर्फ मराठियों की ही है। लेकिन फिर भी मराठी सारेगामा में मुंबई का उनका कोई मराठी फाइनल में नहीं आ सका। क्यों भाई क्या हो गया?

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Comments on “मराठी ‘सारेगामा’ के फाइनल में दो गैर-मराठी

  • actually fact remains that music has no boundry…and so far Mumbai rather i would call it Bombay its an international city and Marathi`s are not accepting the truth that in this nation UP or Bihari`s are not the major gainer in Maharashtra But Gujarati and Sidhi`s are practically making money in Bombay.

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  • sushil Gangwar says:

    Mumbai or Bal Thackeray or Raj Thackeray—–

    Pahle jamane me jativaad , bhashavaad or aub prantvaad ? Agar hum Mumbai ki baat kare to sabse pahle Bal Thackeray– Raj Thackeray ka chehra samne aata hai . Aakir esa kyo ,”ye sawal aksar mere dimag me ghumta rahta hai. Kabhi -Kabhi Esa mahsus hota hai ki Mumbai me Desh ajaad huya hi nahi hai . Bal Thackeray or Unke nakshe kadam par chalne vale Raj Thackeray Mumbai ko gulam banane ki firak me to nahi hai . Jaha keval unki hi hakumat chale .Dhere dhere Mumbai kahi Talibaan to nahi ban jayega? Kabhi Sachin, Amir ,Shahrukh, Saif Ali khan or kowi nahi mila to uttar bhartiyo par apna jor ajmaate rahte hai. Bhai Samna to ghar ka Akhbaar hai , Jo man kare wo likho ,kown kya kar sakta hai. Gar Bal Thackeray marathi manush ke hito ki baat karte hai to aakhir unki sarkar kyo nahi aayee ? Raj Thackeray to apne chacha se bhi aage chal rahe hai . Wo aage- aage or unki Maharashtra Navnirman sena unke peeche peeche ? Are ye to batooooo,”Aane vale samya me kahi Mumbai aane ke liye visa or passport ki jarurat to nahi padegi .Agar esa hai to ek farmaan abhi se jaari karo do. Taki log apna visa -passport banva le ?
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