पागल करने वाली टीआरपी होड़ : एनके सिंह

सन् 1948 में पुनर्संगठित सीआईए के निदेशक ने अपने कर्मचारियों से कहा था, आपकी सफलताएं शायद ही कोई जान पाता है, पर आपकी एक भी असफलता पूरी दुनिया में नगाड़े की तरह बजती है। भारतीय मीडिया का भी कमोबेश यही हालत है। राठौर के करतूतों को सामने लाना और वो भी तब, जबकि एक छोटी सी सजा के रास्ते से वह अपने सारे गुनाहों को मुंह चिढ़ाते व मुस्कुराते हुए निकल रहा हो, एक बड़ी उपलब्धि है। ठीक उसी के कुछ दिन बाद आंध्र प्रदेश के कुछ चैनलों की करतूत ने भारतीय मीडिया को शर्मसार कर दिया। जनता की नजरों में मीडिया का ग्राफ फिर नीचे हो गया। संस्थाओं के ग्राफ को चढ़ाने-उतारने में व्यक्तिगत लोगों व संगठनों की बड़ी भूमिका होती है। आंध्र प्रदेश के तीन चैनलों ने जिस तरह से देश के एक औद्योगिक घराने का नाम लिया और कहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्‍डी की मौत के पीछे इनका ही हाथ है और यह कि दुर्घटना महज एक इत्तफाक नहीं, बल्कि एक साजिश का हिस्सा है, इन चैनलों का एक बहुत ही भौंडा कृत्य था।

पत्रकारिता के मानदंड तो दूर, इसमें आम नागरिक के विवेक का भी इस्तेमाल नहीं किया गया। रेड्डी पिछले वर्ष 2 सितंबर को अपने हेलीकॉप्टर सहित लापता हो गए थे और अगले दिन तीन सितंबर को उनका क्षत-विक्षत शव व हेलीकॉप्टर पावुराला गुट्टा के जंगल में बरामद हुआ था। उसी दिन मास्को स्थित एक वेबसाइट ने इस औद्योगिक घराने के हाथ होने की बात लिखी। चार महीने बाद 7 जनवरी को अचानक आंध्रा का एक चैनल इस वेबसाइट के कथन को उद्धृत करते हुए ऐलान करता है कि इस घराने का हाथ रेड्‍डी की हत्या में हो सकता है। पागल करने वाली टीआरपी की होड़ में दो अन्य चैनल भी कहां पीछे रहने वाले थे। उन्होंने भी देखा देखी इसी तरह की खबर को चलाना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं, इस खबर को चलाने के लिए एक अन्य चैनल पर दबाव डाला जाता है, लेकिन वह मना कर देता है। उधर जैसे ही यह खबर चलती है, रेड्डी समर्थकों का एक वर्ग उस औद्योगिक घराने के आंध्रा स्थित प्रतिष्ठानों पर हमला कर देते हैं। सब कुछ ऐसा लगता है मानों एक सुनियोजित तरीके से हो रहा है।

अब हम इन चैनलों के अपराध पर आते हैं। टेलिविजन न्यूज में तीसरे सूत्र को भी अहमियत दी गई है, लेकिन उसके साथ ये शर्तें भी हैं कि इस सूत्र की विश्वसनीयता हो और सूचना तात्कालिक हो। चार महिनों बाद इस तरह के सूत्र का इस्तेमाल करना और वो भी ये बताने के लिए कि हत्या की आशंका व्यक्त की गई है, कतई गलत है। जहां तक विश्वसनीयता का सवाल है, इस वेबसाइट को अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता। रूस की सरकार ने इसकी अनाप-शनाप खबरों के चलते ही एक जांच बिठाई। इतना ही नहीं, वहां की सरकार ने इसको मजबूर किया कि इसका सप्ताह में दो बार निकलने वाला टेबलॉयड, जो कि 1997 में शुरू किया गया था 2008 में बंद कर दिया जाए। केवल वेबसाइट एडीशन ही जारी रहा। वेबसाइट से अधिकांश खबरें रात की अय्याशियों व देह व्यापार को लेकर लिखी जाती है। इसके एक संपादक ने कुछ पैसे देकर व्यापार में लिप्त महिला के प्राइवेट पाटर्स का व्यापक जिक्र अपनी टेबलॉयड में किया था। इस वेबसाइट के एक एडिटर ने स्वयं कहा कि अगर ये वेबसाइट किसी प्रजातांत्रिक देश में चलाया जाता तो वहां की सरकार बहुत पहले ही इसे बंद कर देती। ऐसी वेबसाइट को तीसरा सूत्र मानकर चार महीने बाद ऐसी खबर चलाना एक भारतीय चैनल के लिए कहीं से भी समाचीन नहीं था।

पूरे विश्व में पत्रकारिता को लेकर कुछ मर्यादाएं है। संयुक्त राष्ट्र उदघोषणा, अमेरिकी संविधान का प्रथम संशोधन व तत्संबंधी अमेरिकी अदालतों के फैसले, अभिव्यक्ति स्वतंत्रता की सीमाएं बांधता भारत के संविधान का अनुच्छेद 19 (2) लगातार इस सच्चाई को उजागर करते है। संविधान के इस अनुच्छेद के अनुसार किसी को भी अधिकार नहीं है कि वह स्वतंत्रता के नाम पर कानून व्यवस्था को बिगाड़े, किसी को बदनाम करे या फिर हिंसा के लिए लोगों को उकसाए। ये तीनों चैनल इन तीनों आरोपों के दोषी हैं। देश के इतिहास में ये पहली बार देखने में आया कि मीडिया इंडस्ट्री से जुड़े सभी संगठनों ने इसकी निंदा की। एडिटर्स गिल्ड आफ इंडिया और ब्रॉडकॉस्ट एडिटर्स एसोसिएशन ने तत्काल इस मामले में अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी है। मुद्दा ये नहीं है कि किस चैनल ने यह किया या किस औद्योगिक घराने के खिलाफ किया। मुद्दा ये है कि क्या पत्रकारिता का स्तर यही रह गया है। और बिना किसी की विश्वसनीयता जांचे टीआरपी की होड़ में हम अपने आपको शामिल कर कुछ भी कर गुजरें, जिससे पत्रकारिता जैसे अहम स्तंभ के चरमराने की स्थिति आ जाए। साथ ही अफसोस इस बात पर भी है कि एडिटर्स गिल्ड और ब्रॉडकॉस्ट एडिटर्स एसोसिएशन जैसी संस्थाए जो मीडिया के अधिकारों, स्वस्थ पत्रकारिता और सरकार के कुप्रभावों से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बचाने के लिए बनी हैं, उन्हें अपनी ही बिरादरी के ऐसे कृत्यों की निंदा करनी पड़ रही है।

लेखक एन.के. सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और ईटीवी में पोलिटिकल एडिटर हैं. उनका यह आलेख दैनिक भास्कर से साभार लिया गया है.

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Comments on “पागल करने वाली टीआरपी होड़ : एनके सिंह

  • alim sheikh E.T.V.REPORTER SULTANPUR U.P. says:

    Sir, ek bar phir apka behtareen aur message deta ya yu kahe ankh kholta article padhne ko mila.meri dua hai ki allah apki kalam ki dhar ko aur tej kare.AMEEN.
    Apka shagird
    alim sheikh
    E.T.V. SULTANPUR

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  • सर, आप के विचार सराहनीय हैं और सारगर्भित भी आप के विचार से मैं सहमती के साथ कुछ और जोड़ना चाहता हूँ ,टी आर पी की जरूरत शायद बाजार के लोगो को ज्यादा है,पत्रकारों और टी वी चैनल को कम,टी आर पी के फेर में पत्रकारिता और जमीनी मुद्दे गायब हैं| हमारे चैनल सस्पेंस सेक्स क्राइम के उपन्यासकार जैसे खबर बनाने और चलने को मजबूर हैं, अगर दमित इक्षाओ को बेच कर उन्हें उधेड़ कर टी आर पी के नंबर गेम को छूना पड़ता हैं तो वास्तव में ये शर्मनाक है और इसे तुरंत हर हाल में बंद ही होना चाहिए|| बाजार के लोगो के लिए भी आप सभी मीडिया के अनुभवी लोग कोई ऐसा रास्ता निकले की जो टी आर पी की जगह ले सके,और इस बात पे भी गौर करिए की दुनिया में किन किन देशो में टी आर पी के बिना किन विकल्पों से काम चल रहा है करना तो सब आप लोगो को ही पड़ेगा |
    डी के सिंह
    आई बी एन ७ बाराबंकी 9451612512

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  • राजकुमार साहू, जांजगीर, छत्तीसगढ़ says:

    मीडिया आज पूरी तरह बाजार बन गया है और इस बाजार के हमाम में कुछ चैनल नंगे हैं और टीआरपी की होड़ में जो मन में आए, वह प्रसारित करने आमादा हैं। ऐसे में सूचना प्रसारण मंत्रालय को भी इन बातों पर ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि चैनल तो बाजार का भूखा है, उसे पेट भरने कुछ न कुछ मसाला तो चाहिए ही। मीडिया को खुद ही एक गाइड लाइन तय करनी होगी, तभी टीआरपी जैसी बीमारी के प्रकोप से बचा जा सकता है।

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