मार्तंड से शुरू होकर पैसे लेकर खबरें छापने तक

डा. मांधाता सिंह30 मई। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास के 183 साल। कोलकाता से पहला हिंदी पत्र ”उदंत मार्तण्ड” ३० मई 1826 को शुरू हुआ। इससे बहुत पहले वर्ष 1780 में यहीं से जेम्स आगस्टस हिक्की ने ”बंगाल गजट” या ”कलकत्ता जनरल एडवरटाइजर” शुरू कर अंग्रेजी पत्रकारिता की शुरुआत कर दी थी। मगर ”उदंत मार्तण्ड” को हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत का मानक मानें तो इन 183 वर्षों में हिंदी पत्रकारिता में बड़े आमूल चूल परिवर्तन आए हैं। अभी हाल में हुए १५वीं लोकसभा चुनावों में खबरों के पैकेज तक के इतिहास को लें तो आजादी की लड़ाई और सामाजिक सरोकार के दौर से निकली हिंदी पत्रकारिता (हम यहां सिर्फ हिंदी पत्रकारिता की ही बात कर रहे हैं। वैसे अंग्रेजी समेत सभी भाषाई पत्रकारिता भी अब अपने कमाऊ दौर में ही हैं और अपने सामाजिक सरोकार के मानदंड से काफी नीचे चले गए हैं।) अब पैसे लेकर खबरें छापने की बेशर्मी के दौर में पहुंच गई है।

तकनीकी प्रगति ने हिंदी पत्रकारिता को वैश्विक तो बना दिया है मगर जगदीश चंद्र माथुर, प्रभाष जोशी या फिर एसपी सिंह जैसे सिद्धांतवादी और मूल्यों की हिंदी पत्रकारिता करने वालों के युग का भी अवसान कर दिया है। अब अंग्रेजी समेत हिंदी में पैसे लेकर खबरें छापने को व्यावसायिक तौर पर उचित मानने वाले कमान संभाले हुए हैं। प्रिंट मीडिया के इस पतन के बावजूद कुछ संपादकों यथा प्रभात खबर के संपादक हरिवंश जैसे हिंदी के संपादक भी हैं, जिन्होंने बाकायदा सूचना छापकर खबरें छापने के बदले पैसा लेने से बचने की अपने पत्रकारों को चेतावनी दी। हालांकि इससे इस नैतिक पतन को कितना रोका जा सकेगा, यह कहा नहीं जा सकता। मगर बाकी अखबारों ने तो यह नैतिक साहस नहीं दिखाया। इस मामले में समानान्तर मीडिया  माध्यम बन चुके हिंदी ब्लाग अभी कुछ हद तक बचे हुए हैं। कुछ मीडिया पोर्टल और समूह ब्लाग यथा- भड़ास4मीडिया और भड़ास वगैरह तो अनैतिक हो रही हिंदी पत्रकारिता को यदा-कदा बेपर्दा भी करते रहते हैं। ऐसे ब्लागों की लंबी सूची है जो बेबाक टिप्पणी करके मानदंड कायम रखने की कोशिश कर रहे हैं। विभिन्न विचारधाराओं की हिंदी ई-पत्रिकाएं भी अब वैश्विक सीमाएं लांघ चुकी हैं। प्रिट मीडिया में संपादकों की निजी दादागीरी से जो जो छप नहीं सकता वह धड़ल्ले से ब्लागों व ई-पत्रिकाओं में छप रहा है। यह विचारों की अभिव्यक्ति का अदभुत विस्तार और प्रिंट मीडिया को चुनौती भी है।

यही कारण है कि आज अंग्रेजी पत्रकारिता के बरक्स हिंदी पत्रकारिता के कद और ताकत में व्यापक बढ़ोतरी हुई। कागज से शुरू हुई पत्रकारिता अब कन्वर्जेंस के युग में पहुंच गई है। कन्वर्जेंस के कारण आज खबर मोबाइल, रेडियो, इंटरनेट और टीवी पर कई रूपों में उपलब्ध है। सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में हिंदी पत्र डिजिटल रूपों में उपलब्ध है। पंडित युगल किशोर शुक्ल द्वारा शुरू किए गए ”उदंत मार्तण्ड” के परिप्रेक्ष्य में बात करें तो उस समय पत्रकारिता का उद्देश्य समाज सुधार, समाज में स्त्रियों की स्थिति में सुधार और रूढि़यों का उन्मूलन था। उस समय पत्रकारिता के सामाजिक सरोकार शीर्ष पर थे और व्यावसायिक प्रतिबद्धताएं इनमें बाधक नहीं थीं। युगल किशोर शुक्ल का ”उदंत मार्तण्ड” 79 अंक निकलने के बाद चार दिसंबर 1827 को बंद हो गया। हालांकि उसके बाद हिंदी में बहुत सारे पत्र निकले। राजा राम मोहनराय ने हिंदी सहित तीन भाषाओं में 1829 में ”बंगदूत” नामक पत्र शुरू किया।

मौजूदा दौर में हिंदी के अखबारों पर प्रासंगिक और तेज बने रहने के साथ व्यावसायिकता का भारी दबाव है। ई-पेपर तेज बने रहने की दिशा में एक अग्रगामी कदम है। यह अवसर भौगोलिक सीमाओं को पार करने और व्यावसायिक अवसरों के दोहन को लेकर है। इन सबके कारण हिंदी पत्रकारिता में मानवोचित मूल्यों को स्थान देने में पूर्व की अपेक्षा कमी आई है। 1950 से 55 के दशक तक जिस हिंदी पत्रकारिता को बाजार की सफलता के मानकों पर खरा नहीं माना जाता था, उसके प्रति विचारधारा परिवर्तित हुई है।

अस्सी के दशक के बाद से स्थिति यह हो गई कि अंग्रेजी से लेकर बड़ा से बड़ा भाषाई समूह हिंदी में अखबार शुरू करने में रुचि दिखाने लगा। हालांकि विकास के बड़े अवसर हैं, लेकिन हिंदी पत्रकारिता के समक्ष चुनौतियां भी कम नहीं हैं। हिंदी पत्रकारिता का इंटरनेट के क्षेत्र में जाने का मकसद अपने प्रभाव क्षेत्र में बढ़ोतरी करना होता है। मीडिया हाउस पर अब खबरों के व्यापार का एकाधिकार नहीं रह गया है। गूगल और याहू जैसी कई कंपनियां भी खबरों के प्रसार के प्रमुख स्रोत के रूप में काम कर रही हैं। प्रिंट मीडिया प्रसार संख्या पर आधारित है, ई पेपर भी अब इसमें शामिल किया जाने लगा है।

हिंदी पत्रकारिता ने एक समय अपना भाषाई समाज रचने में बहुत बड़ा योगदान दिया। दिनमान और धर्मयुग जैसे पत्रों ने हिंदी पाठक को उन विषयों पर सोचने और समझने का अवसर दिया, जिन पर केवल अंग्रेजी का एकाधिकार माना जाता था। अंग्रेजी में श्रेष्ठत्व के नाम पर दावा करने की कोई चीज नहीं है। हिंदी उस बराबरी पर पहुंच गई है। हालांकि परंपरा में अंग्रेजी पत्रकारिता हिंदी से आगे है लेकिन सच यह भी है कि हिंदी पत्रकारिता ने भी लंबी दूरी तय की है।


लेखक डा. मांधाता सिंह कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ-साथ हिंदी के वरिष्ठ ब्लागर भी हैं। उनसे संपर्क करने के लिए [email protected] का सहारा ले सकते हैं। 

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