जो सवाल करेगा, वही मारा जाएगा

: पत्रकारिता के फटीचर काल का सही चित्रण है पीपली लाइव : पीपली लाइव के आखिर के उस शाट्स पर आंखें जम गई…जब कैमरे ने कलाई में बंधे ब्रैसलेट को देखा था। जला हुआ। यहां भी मीडिया ग़लत ख़बर दे गया। नत्था तो नहीं मरा लेकिन एक संवेदनशील और मासूम पत्रकार मारा गया। फिल्म की कहानी आखिर के इसी शॉट के लिए बचा कर रखी गई थी। किसी ने राकेश को ठीक से नहीं ढूंढा, सब नत्था के मारे जाने की कहानी को खत्म समझ कर लौट गए।

ओबी वैन और मंच के उजड़ने के साथ जब कॉफी के स्टॉल उखाड़ कर जा रहे थे तो लगा कि कैसे बाज़ार राकेश को मार कर चुपचाप और खुलेआम अपना ठिकाना बदल रहा है। नत्था तो अपनी किस्मत के साथ कलमाडी के सपनों के नीचे इमारती मज़दूर बनकर दबा मिल जाता है लेकिन राकेश की ख़बर किसी को नहीं मिलती। हम इस आपाधापी में अपना ही क़त्ल कर रहे हैं। इसीलिए मरेगा राकेश ही। जो सवाल करेगा वही मारा जाएगा।

इस फिल्म को सबने हिस्सों में देखा है। किसी को मल का विश्लेषण करता हुआ पत्रकार नज़र आता है तो किसी समझ नहीं आता कि सास पुतोहू के बीच की कहानी व्यापक वृतांत का हिस्सा कैसे बनती है। धनिया और उसकी सास अपने प्रसंगों में ही फंसे रहते हैं। उन पर मीडिया न मंत्री का असर पड़ता है। दो औरतों के बीच की वो दुनिया जो रोज़ की किचकिच से शुरू होती है और उसी पर ख़त्म हो जाती है। यही मज़ा है पीपली लाइव का। कई कहानियों की एक कहानी। मोटा भसका हुआ बीडीओ और उसका गंदा सा स्वेटर। जीप की खड़खड़ आवाज़। कृषि सचिव सेनगुप्ता की दार्जिलिंग टी और सलीम किदवई का जैकेट और पतलून में इंग्लिश स्टुडियो जाना और हिन्दी स्टुडियो में जाते वक्त कुर्ता पायजामा और अचकन पहनना। नत्था का अपने बड़े भाई के सामने बेबस हो जाना। उसकी मां का बेटे के लिए दहाड़ मार कर नहीं रोना। पत्नी धनिया किसी साइलेंट मूवी की हिरोईन की तरह चुप रहती है और जब फटती है तो लाउडस्पीकर चरचरा जाता है। मीडिया के अपने द्वंद से गुज़रती हुई इसकी कहानी एक परिवार,एक गांव,एक ज़िला,एक राज्य,एक देश और एक विश्व की तमाम विसंगतियों के बीच बिना किसी भावनात्मक लगाव के गुज़रती चलती है। राकेश की तुकबंदी में इराक भी है और किसानों की बातचीत में अमरीकी बीज कंपनी भी।

फोकस में ज़रूर मीडिया है लेकिन जब कैमरा शिफ्ट फोकस करता है तो लेंस की हद में कई चीज़े आ जाती हैं। सियासत की नंगई भी खुल जाती है। दिल्ली में बैठा इंग्लिश बोलने वाला सलीम किदवई भी चालबाज़ियां करता हुआ एक्सपोज़ हो जाता है। राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी योजना का नया प्रतीक लाल बहादुर। गांव गांव में नलकूप योजनाओं का यही गत है मेरे भाई। मुखिया से लेकर मुख्यमंत्री तक सब एक ही कतार में। पीपली लाइव नाम बहुत सही रखा है। सब कुछ लाइव ही था। इंग्लिश की पत्रकार हिन्दी के पत्रकार को छू देती है। वो सारी प्रतिस्पर्धा भूल जाता है। हिन्दी और इंग्लिश के पत्रकार के लाइव चैट में भी अंतर है। हिन्दी की लड़की अपने लाइव भाषण में देश,समाज और राजनीति का ज़िक्र करती है। इंग्लिश की पत्रकार एक व्यक्ति की कहानी से आगे नहीं बढ़ती। इंग्लिश की पत्रकार के लिए नत्था एक इंडिविजुअल स्टोरी है और हिन्दी के पत्रकारों के लिए नौटंकी के साथ-साथ एक सिस्टम की स्टोरी। हिन्दी और इंग्लिश मीडिया के पत्रकारों के रिश्तों में झांकती इस फिल्म पर अलग से लिखा जा सकता है।

फिल्म के फ्रेम बहुत तेज़ी से बदलते हैं। कहानी किसी घटना का इंतज़ार नहीं करती। बस आगे बढ़ जाती है। पूरी फिल्म में प्रधानमंत्री का कोई किरदार नहीं है। मनमोहन सिंह ने इस पद को वाकई अपनी चुप्पी से मिट्टी में मिला दिया है। एक फ्रेम में धनिया और सास की लड़ाई है तो अगले फ्रेम में मुख्यमंत्री की सेटिंग। वैसे में राकेश का यह सवाल कि मर तो होरी महतो भी गया है। होरी महतो का बीच फ्रेम में आकर गड्ढा खोदते रहना। राकेश का बगल से गुज़रना। एक दिन उसकी मौत। स्टोरी और हकीकत के बीच मामूली सा द्वंद। स्ट्रींगर राकेश का सपना। नेशनल चैनल में नौकरी का। उसकी स्टोरी पर बड़े पत्रकारों का बड़ा दांव। संपादक की लंपटई। कैमरा बड़ा ही बेरुख़ेपन से सबको खींचता चलता है। अनुषा के निर्देशन की यही खूबी है।

पत्रकारिता के फटीचर काल का सही चित्रण है पीपली लाइव। गोबर हमारे टाइम का सबसे बड़ा आइडिया है। अनुषा और महमूद के कैमरे ने तो गोबर से गू तक के सफर को बखूबी दिखाया है। इंग्लिश और हिन्दी दोनों ही माध्यमों में काम करने वाला पत्रकार एक-एक फ्रेम को देखकर कह सकता है सही है। इसका मतलब यह नहीं कि टीवी के पत्रकारों ने कभी अच्छा काम नहीं किया है। वही तो याद दिलाने के लिए यह फिल्म बनी है। हम क्या से क्या हो गए हैं। किरदारों के किसी असली नाम से मिलाने का कोई मतलब नहीं है। हर किरदार में हर पत्रकार शामिल है। मीडिया मंडी में बिक गया तो पगड़ी तो उछलेगी ही। कई फिल्मों और लेखों में मीडिया के इस फटीचर काल की आलोचना होती रही है। लेकिन पीपली लाइव ने आलोचना नहीं की है। सरेस काग़ज़ लेकर आलोचना से खुरदरी हुई परतों को और उधेड़ दिया है। टीवी और टीआरपी की लड़ाई को मल्टीप्लेक्स से लेकर सिंगल स्क्रिन के दर्शकों के बीच लाकर पटक दिया है जिनके नाम पर करीना के कमर की मोटाई न्यूज़ चैनलों में नापी जा रही है। यह फिल्म मीडिया से नहीं दर्शकों से टकराती है।

आप इस फिल्म को कई बार देख सकते हैं। अनुषा और महमूद को बधाई लेकिन विशेष बधाई शालिनी वत्स को। धनिया रवीश कुमारबनने के लिए। कौन बनता है आज के ज़माने में पर्दे पर नत्था और धनिया और कौन बनाता है ऐसी फिल्में। उम्मीद है साउथ दिल्ली की लड़कियां अपना पेट या कैट नाम धनिया भी रखेंगी। अनुषा का रिसर्च बेज़ोड़ है। निर्देशन भी बढ़िया है। वैसे याद रहे। बदलेगा कुछ नहीं। मीडिया ने महंगाई डायन को छोड़ अब मुन्नी बदनाम हो गई का दामन थाम लिया है।

लेखक रवीश कुमार एनडीटीवी से जुड़े हैं. इनका यह लिखा उनके ब्लाग कस्बा से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

Comments on “जो सवाल करेगा, वही मारा जाएगा

  • raj kaushik says:

    raveesh bhai, bahut-bahut achcha likha. jitni tareef karu, kam hai. koi mane ya na mane….media ke 99.9 % log rakesh hi hain. koi chota rakesh to koi bada rakesh.durbhagya ye hai ki beemar khud apni beemari ko nahi samjh rahe. is se koi ilaaj bhi nahi ho pa raha.
    . raj kaushik
    r.e. dla
    9811449246

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  • abdul salim khan says:

    ravish ji ka lekh vaakai kabile taarief hai,unhone film ki sameekhha me patrakaron ki kahani samjhane ki koshish ki hai,

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