टीआरपी से बगावत का स्वागत : रवीश कुमार

रवीश कुमाररेटिंग फार्मूले में भयंकर गड़बड़ी है : क्या मान लिया जाए कि अब टीआरपी के खिलाफ लड़ाई शुरू होने जा रही है? आज सुबह पहली नज़र हिन्दुस्तान में आशुतोष के लेख पर पड़ी फिर दैनिक भास्कर में एनके सिंह के लेख पर। हैदराबाद के न्यूज़ चैनलों ने जो फर्ज़ी खबरें चलाईं हैं, लगता है कि इस भयंकर भूल ने टीआरपी लिप्त हम सभी पत्रकारों का सब्र तोड़ दिया है। आशुतोष के इस लेख से पहले कुछ साल पहले अजित अंजुम ने लिखा था कि इस बक्से को बंद करो। अब लग रहा है कि इसके विरोध को लेकर मुखरता आने वाली है। पिछले एक साल में टैम के टीआरपी के आंकड़ों को देखने का अनुभव प्राप्त हुआ। हरा, पीला और ग्रे रंग से रंगे खांचे बताते हैं कि आपका कार्यक्रम कितना देखा गया।

पहले शुक्रवार को आता था। अब बुधवार को आता है, और अब तो ए मैप अगले ही दिन रेटिंग भेज देता है। टीवी वाले तो हर दिन बारहवीं का इम्तहान देते हैं। फर्क ये है कि सुसाइड की जगह खबरों को मार काट कर अनाप-शनाप खबरें ला रहे हैं। यह भी एक किस्म की आत्महत्या है। जिसे देखो वही टीआरपी का आइडिया ढूंढ रहा है। मैंने अपने ही ब्लॉग पर लिखा था कि गोबर हमारे समय का सबसे बड़ा आइडिया है और टीवी गोबर का पहाड़ है। गद्य से असर नहीं हुआ तो पद्य शैली में आ गया। हम लोगों ने भी मुकाबले के लिए प्रस्तुति शैली बदली। थोडे़ टाइम में ही लग गया कि घटिया होकर यह लड़ाई लड़ी जा सकती है लेकिन इस जीत का कोई मजा नहीं। एडिट की मामूली शैली बदलते ही रेटिंग दिखने लगी। लेकिन जल्दी ही सब आजिज आ गए। सहमति से फैसला हो गया कि इस चक्कर में नहीं पड़ते हैं। ये अब और नहीं हो सकता है। हमारे कुछ शो एनडीटीवी इंडिया के पुराने निष्ठावान दर्शकों को पसंद नहीं आ रहे है। हमने कुछ कार्यक्रम बंद भी कर दिये। रेटिंग के फार्मूले में भयंकर गड़बड़ी है। कोई दर्शक तालिबान या चीन पर बनने वाले एक ही तरह के विजुअल और शो को कैसे एक ही समय पर लगातार देख सकता है। मुमकिन नहीं है। आज तक यह नहीं समझा कि प्रतियोगिता से उत्पाद बेहतर होते हैं लेकिन हिन्दी न्यूज चैनलों में घटिया क्यों हो रहे हैं।

लेकिन क्या आशुतोष, अंजुम और तमाम पत्रकारों के लिख देने से टीआरपी समाप्त हो जाएगी? वैकल्पिक पैमाने की तस्वीर अभी तक सामने नहीं आई है। पूरी दुनिया में यह सिस्टम मान्य है। विज्ञापन कहां से आयेंगे? कैसे मिलेंगे? जब तक इसका विकल्प नहीं आता तब तक इस सवाल से भी जूझना होगा कि क्या हमने बेहतर काम कर रेटिंग लाने की कोशिश की। आशुतोष लिखते हैं कि खबरों की नयी दुनिया तलाशी जाए। उनके इस महत्वपूर्ण लेख में एक लाइन आ कर चली गई है। हिन्दी के चैनल और पत्रकार नए इदारों की तरफ जा रहे हैं? क्या वे प्रस्तुति शैली को लेकर कोई प्रयोग करने की हिम्मत जुटा पा रहे हैं? दरअसल हमने बेहतर विकल्पों को ढूंढे बिना खुद को टीआरपी के गटर के हवाले कर दिया।

अच्छा पत्रकार होने का मतलब यह नहीं कि कुछ भी लिखेंगे या दिखायेंगे तो लोग देखेंगे। एक अच्छे पत्रकार को सर्जनात्मक भी होना चाहिए। ये नहीं चलेगा कि आप कुछ भी शूट कर लाए, बेतरतीब ढंग से पीटूसी कर के लाएं और अनुप्रासों के ज़रिये स्क्रिप्ट लिख मारे और फिर कहें कि आप अच्छी पत्रकारिता कर रहे हैं और अब दर्शकों को देखना भी पड़ेगा। ज़्यादातर पत्रकारों के शूट टेप निकाल कर देख लीजिए। उन्हें क्रिएटिव होना गुनाह लगता है। टीवी की खबरों को एजेंसी की तरह बनाने वाले रिपोर्टरों और कापी डेस्क के लोगों की नकारा शैली ने भी घटिया उत्पादों को जगह दी। घटिया इसलिए आया कि खुद को अच्छा कहने वाले तमाम पत्रकार, संपादकों और लेखकों ने मेहनत नहीं की। खबरों की नई दुनिया के साथ साथ खबरों की नई शैली भी लानी पड़ेगी। पुराने बीट रहेंगे लेकिन नई बीटों की खोज कीजिए। यह बात टीआरपी विरोधियों के मन में भी साफ होनी चाहिए कि अच्छी पत्रकारिता का मतलब होता है अच्छे पत्रकार और संसाधनों पर खर्च जिनसे होगी खबरों की तलाश। अभी तक जो हो रहा है अच्छी पत्रकारिता के नाम पर, उसको भी खारिज करना होगा। उसमें कोई ताकत नहीं है। हिन्दी न्यूज़ चैनल सिर्फ टीआरपी के मारे नहीं हैं। सिस्टम ही सड़ा हुआ लगता है। तो क्या हम इसके लिए भी तैयार हैं?

समस्या यही है कि हिन्दी न्यूज चैनल अच्छाई के छोर पर भी कमजोर लगते हैं। अब सवाल यह है कि टीआरपी के विरोध करने से पहले हम करना क्या चाहते हैं? क्या अब तमाम तरह के घटिया शो बंद हो जाएंगे? मुश्किल लगता है। टीवी एक मंहगा माध्यम है। राजस्व के बिना टिक नहीं सकता। इसलिए आज दैनिक भास्कर की पहली खबर से गुदगुदी हुई। दूरदर्शन अपना डीटीएच लाएगा। फीस के खर्चे कम होंगे। इससे निजी चैनलों को लाभ होगा। चालीस फीसदी पैसा वितरण पर खर्च हो जाता है। किसी भी बिजनेस में वितरण का खर्चा इतना नहीं है। टीवी को यही मार रहा है। टीआरपी खतम करने से पहले राजस्व का नया वैकल्पिक मॉ़डल को भी ढूंढना होगा। वर्ना हैदराबाद में जो कुछ भी हुआ है, उससे पहले भी ऐसे कई पल आए हैं जब टीवी पत्रकारिता ने इस तरह की गिरावट देखी है। हर बार कुछ करने की बेचैनी सामने आई लेकिन कुछ नहीं हुआ। इस बार उम्मीद लगती है। वर्ना एक ही दिन दैनिक भास्कर में एनके सिंह और हिन्दुस्तान में आशुतोष के लेख नहीं आते।

यह भी अच्छा लगता है कि टीवी अपनी खराब चीजों के बारे में खुल कर बात करने लगा है। अखबारों की तरह नहीं कि चुनावों में खबरों के लिए पैसे लिए और चुप्पी मार गए। प्रिट में भयंकर चुप्पी है। राजदीप सरदेसाई को लेख लिखना पड़ता है लेकिन हिन्दी अखबारों का कोई संपादक बोलता नहीं है। हिन्दी की बुराई अंग्रेजी अखबार में छपती है। न्यूज़ चैनलों में तो अच्छे बुरे को लेकर न्यूज फ्लोर पर ही घमासान रहती है। व्यंग्य के लहज़े में ही सही लेकिन फैसले लेने वाले को पता चल जाता है कि अगला मन से नहीं, मन मार के कर रहा है। ऐसे हालात में कब तक जीयेंगे। शायद अब और बर्दाश्त नहीं हो रहा है। तो देखते हैं कि इसका असर हिन्दी न्यूज चैनलों के कंटेंट पर कितना असर पड़ता है। बहरहाल टीआरपी मीटर के खिलाफ इस बगावत का स्वागत कीजिए।

एनडीटीवी के प्रमुख एंकर और मशहूर टीवी जर्नलिस्ट रवीश कुमार के कस्बा ब्लाग से साभार

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Comments on “टीआरपी से बगावत का स्वागत : रवीश कुमार

  • prahalad kumar [Kilu] says:

    हम आपकी बातो से बिलकुल सहमत है की जल्द से जल्द इस टी.आर.पी. के चंगुल से टीवी चैनलों को बाहर आना होगा वरना वो दिन दूर नहीं जब टीवी चैनल को ही नहीं बल्कि पत्रकार और पत्रकारिता को ही एक दिन टी.आर.पी. अपनी चंगुल में लेकर उसका गला घुट देगा फिर अपने आप को चौथे स्तंभ कहनेवाले इस पत्रकार के ही स्तंभ को इस टी.आर.पी.का किरा अन्दर ही अन्दर खोखला कर देगा और यह स्तम्भ एक दिन अपनेआप गिर जायेगा | जरुरत है समय रहते टीवी न्यूज़ चैनलों को इस कीरे से बचाने की ताकि आम लोगो का विस्वाश जो पत्रकारों पर है वो बना रहे | टीआरपी के चक्कर में कई बार तो न्यूज़ चैनल लगातार गलत खबर परोसते रहते है और तो और दुसरे चैनल भी खबर की पुष्टि किये बिना इसी चैनलों के आधार पर खबर चला देते है यहाँ तक की अपने रिपोर्टर की भी बातो का यकीन नहीं करते है बल्कि दुसरे चैनल पर झूठी खबर आने पर अपने ही रिपोर्टर की क्लास लगा देते है | अगर hamare desh में भी ऐसी पत्रकारिता हिती रही तो वो दिन दूर नहीं जब सबसे विकसित देश अमेरिका जैसे जगहों पर पत्रकार से ज्यादा सरकार की बातो पर यकीन किया जाता है वही हल हमारे देश की भी पत्रकारिता का हो जाये |

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  • prahalad kumar [Kilu] says:

    उदहारण के लिए मै बता दू की एक खबरिया न्यूज़ चैनल ने बिहार में बाढ़ के दौरान बिहार के तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह को बाढ़ के पानी में टरेक्टर पर घूमते हुए दिखाया गया और न्यूज़ एंकर के साथ फ़ोनों पे भी यह लगातार कहा जा रहा था की ये तस्वीर दरभंगा जिले की है जहा सबसे ज्यादा लोग बाढ़ से प्रभावित है जबकि सच्चाई यह है की बूटासिंह दरभंगा आये ही नहीं थे और ये खबर एक्सक्लूसिव दिखाया जा रहा था | जबकि दुसरे चैनल ने सिर्फ लिख कर या तो फ़ोनों पे ही काम चला लिया | हलाकि एक चैनल ने इसका खुलाशा कई कई घंटे बाद कर दिया पर कोइ भी चैनल अपनी इस गलती को नहीं सुधार बल्कि लगातार अपनी झूटी खबर दिखाते रहे |

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  • अवनीश कुमार राय says:

    ये बात तो सोलह आने सही है कि टैम का मीटर खराब है। लेकिन आपकी इस महत्वपूर्ण बात से मैं बखूबी सहमत हूं कि टीवी पर घटिया सामग्री भी परोशी जा रही है जिसके कारण टीआरपी खराब आती है। टीवी वालों को एक बार अपने कंटेंट के बारे में सोच विचार करना चाहिए। सूचनाओं और सनसनियों को छोड़कर खबरों को दिखाने का साहस करना चाहिए। अगर ऐसा किया तो पूरा विश्वास है कि लोगों को पंसद आएगा। उसके आगे तो बस यही कहा जा सकता है – काबिल बनो, सफलता तो झक मारकर आएगी।

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  • रवीश सर मै आपकी बातो से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ क्योकि टी आर पी का खेल अकेले किसी एक चैनल की बस की बात नहीं इस खेल में हमारा प्रतिष्ठित चैनल ndtv भी शामिल हो चूका है जो बड़े दुःख की बात है क्योकि इसकी पहचान सबसे अलग थी लेकिन आज यह भी उसी कतार में है | कहना बड़ा ही सहज है लेकिन उसको लागू करना उतना ही कठिन |
    आज टी आर पी की इस अंधी दौड़ में सभी सामिल है आज कोई भी चैनल हो हर कोई टी आर पी शहर की खबरों को ही प्रमुखता से दिखलाता है |इन शहरो की छोटी से छोटी खबर को ब्रेक किया जाता है | वही छोटे शहर मतलब नॉन टी आर पी सेंटर की बड़ी से बड़ी खबर को हल्के में लिया जाता है | बाकि किसी से कुछ छिपा नहीं है | लेकिन टी आर पी हमारी ही उपज है और हमें ही इसका हल ढूँढना है |

    इन्द्रेश – मिर्ज़ापुर यू पी

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  • रवीश कुमार जी अपने चैनल को देखिए, सबसे बुरा हाल वहीं हैं. चोर तो खुलकर कहते हैं हम चोर हैं लेकिन आपका चैनल पुलिस वाले का किरदार निभाने का ढोंग करता है और चोरी करता है. या तो वहां उटपटांग ख़बर चलती है या आपका अपना दर्शनशास्त्र. अफ़सोस होता है यह सब एनडीटीवी इंडिया कर रहा है.

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  • AHSAN ALI JAIPUR RAJASTHAN says:

    Hindustan me adhik log padhe likhe nahi he. or unko maloom bhi nahi he k TRP kya hoti he. pahle to aapko ye batana hoga ki TRP kya he or ye kaise count hoti he. hum media ke log to jante he ki TRP kya he, or kaise count ki jaati he.TRP ke liye to sabhi channel kuchh na kuchh gadbad karte he. agar TRP bhadane ke liye jhooth ka sahara lena jaroori he,to jo channel ye sab karte he asal me unko media ka matlab hi nahi pata rahi NDTV ki baat to ka aapko milakar ek channel or he jo TRP bhadane k liye jhooth ka sahara kam hi lete he. log bhi jante he or kehte bhi he ki ye channel kharaw he ye sab jhooth dikha raha he lekin dekhte bhi usko ruchi lekar or trp bhi bhadata he. AHSAN ALI JAIPUR RAJASTHAN

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  • nagmani pandey says:

    ravish je TRP batorana ab har chanal ka pesha hogaya hai Q ki unki bhi majburi ho gaye hai agar TRP nahi badhega to ad. bhi nahi melega ad. nahi melega to companey ka busenesh nahi hoga to phir reporter or baki ke logo ko salari nahi melegi iske kiye GOV. ko bhi help karni chahiye taki TRP ka jhanjahat dur ho jaye

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  • satya prakash azad says:

    ravish ji, aap log sach ke liye ladne ka dawa karte hain, to phir tam aur trp ko lekar bhi morcha kholiye, dekhiye badlaw hota hai ki nahi.

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  • Sachin Patil says:

    मैं आप से बिलकुल सहमत हूँ सर .. | क्यों की आज कल खबरे कहा देखने को मिलती है .. प्रत्येक चेनल टी.आर.पी. की मारामारी के चक्कर में खबरों को इतना टटोलते है कि लोग भी समझने लगते है … यह क्या हो और क्यों हो रहा है ..? कई सारे कार्यक्रम भी दिखाए जा रहे है टी.आर.पी. के चक्कर में .. पर शायद होना यह चाहिए कि असली पत्रकारिता कही अपना दम न तोड़ दे | ऐसा नहीं है कि जो वहा बैठे है वह गलत है .. अगर ऐसा होता तो चर्चा के लिए ऐसा मंच नहीं होता | और यहाँ पर भी बदलाव कि उम्मीद आप बड़ो से ही राखी जाएगी |

    Sachin Patil
    Vadodara
    9825060592

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