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काम करा के पगार तो देते नहीं, भीख क्या देंगे

[caption id="attachment_16679" align="alignleft"]सुभाष गुप्तासुभाष गुप्ता[/caption]यशवंत भाई, यूं तो रहीम दास ने ऐसा कुछ कहा था…रहिमन वे नर मर चुके जे कहूं मांगन जाएं… उनसे पहले वे मरे जिन मुख निकसत नाही…. लेकिन आपको सलाम करने का दिल चाहता है, इसका कारण कोई लम्बा चौड़ा नहीं है। सीधी-सी वजह है कि आपने जो कुछ किया, उसे स्वीकार करने का माद्दा आपमें है। यही पत्रकार, बल्कि असली और बहादुर इंसान वाली बात है। आपने मसूरी में भीख मांगकर गरिमामयी अंदाज में ये कबूलनामा लिखकर इस गलीच पेशे को सम्मानित अंदाज दे दिया है।

सुभाष गुप्तायशवंत भाई, यूं तो रहीम दास ने ऐसा कुछ कहा था…रहिमन वे नर मर चुके जे कहूं मांगन जाएं… उनसे पहले वे मरे जिन मुख निकसत नाही…. लेकिन आपको सलाम करने का दिल चाहता है, इसका कारण कोई लम्बा चौड़ा नहीं है। सीधी-सी वजह है कि आपने जो कुछ किया, उसे स्वीकार करने का माद्दा आपमें है। यही पत्रकार, बल्कि असली और बहादुर इंसान वाली बात है। आपने मसूरी में भीख मांगकर गरिमामयी अंदाज में ये कबूलनामा लिखकर इस गलीच पेशे को सम्मानित अंदाज दे दिया है।

 सच कहने में अब ज्यादा डर नहीं लगता। अब तो लगता है कि मीडिया में आकर हम जैसे तमाम लोग भीख ही मांग रहे हैं। कोई पूरे महीने खून पसीना बहाकर, पूरी ईमानदारी से नौकरी करने के बाद अपने हक के रूप में मिलने वाली पगार के लिए भिखारी वाले अंदाज में बार-बार हाथ फैला रहा है… कोई नौकरी की भीख मांग रहा है…. और कोई हर सुबह शाम महज इसलिए गाली सुनकर वाह वाह के अंदाज में खीसें निपोर रहा है कि उसकी नौकरी बनी रह जाए… ये भी प्रमोशन की भीख मांगने का एक अंदाज बन गया है।

लेकिन हर दफ्तर में मसूरी के सैलानियों जैसे लोग नहीं मिलते। आपको अच्छा गाकर मसूरी में भले ही कुछ नोट मिल गए हों, लेकिन इस निष्ठुर मीडिया में तो ऐसे मठाधीश भी विराजमान हैं, जो अपने स्ट्रिंगर और स्टाफ से महीनों काम कराकर भी उसकी मेहनत का पैसा देने को तैयार नहीं हैं। भीख तो दूर की बात रही। 24-25 साल पहले मीडिया हाउसों के मालिक जिस तरह अपने स्टाफ के शादी ब्याह तक में घर के सदस्यों की तरह शामिल होने पहुंच जाते थे… हर बुरे वक्त में मदद करने का कलेजा रखते थे, लगता है वो अब गुजरे जमाने की बात बन गई है।

आपने ये अनोखा अनुभव क्यों किया और क्या सोचकर इसे पोर्टल पर प्रकाशित कर दिया, ये तो आप ही बेहतर जाने… लेकिन इसके जरिये आपने उत्तराखंड और खासकर मसूरी आने वाले लोगों की उस दरियादिली को भी रेखांकित किया है, जो अब धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। ये शायद देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड की आबोहवा का असर है कि लोग यहां आकर कला के कद्रदान और उदार हो जाते हैं, तभी तो आपको भीख के रूप में पचास के नोट भी देखने को मिल गए। आजकल तो पूजा स्थलों के बाहर भी लोग भीख देने में इतनी उदारता नहीं दिखाते। आपके मसूरी के फोटो देखकर हंसी नहीं आई….दरअसल ये फोटो नहीं आईना हैं। ये आईना किसके लिए हैं.. ये आप भी जानते हैं।

लेखक सुभाष गुप्ता उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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0 Comments

  1. faiz

    January 19, 2010 at 1:49 pm

    subhash ji aap ne shandar likha par voi ke malikon ka naam nahi likhkar aap ne jata diya pehle apni naukri phir samaj sewa matlal saf pehe kaam apna bhad me jaye janta .
    aapka stringers

  2. aasaf absar

    February 5, 2010 at 8:41 am

    ab kya kahu voi ko aur aapko likha to sahi par kya in voi ke maliko se aap darte ho naam kyon nahi likha hai aapne

    aapka stringar aasaf

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