27 दिन से बिजली-पानी को तरस रहा है एक पत्रकार का परिवार

: घर जाते हुए डर लगता है एक पत्रकार को : घपले-घोटाले की खबर लिखने की मिली सजा : तरह तरह से प्रताड़ित किए  जा रहे परिजन : hello, pl. find article, the case of a journalist who has been suffering just because he has raised his voice against corruption. i know azad khalid for last more than 10 years. he has been a fearless journalist.

बड़े ग़ौर से सुन रहा था ज़माना, हम ही सो गये दास्तां कहते कहते

बीमारी के जानलेवा हमले के दौरान आलोक जी से मेरी आख़िरी मुलाक़ात कुछ महीने पहले सीएनईबी न्यूज़ चैनल में हुई। बेहद प्यार और अपनेपन से अलग ले जाकर ख़ूब सारी बातें की… बत्रा जाना है यार, बेहद मुश्किल लड़ाई में उलझा हूं, मौत से जंग है, हार जीत नहीं आखिरी सांस तक लड़ने की फिक्र है… शायद उनके ये शब्द, सभी पत्रकारों के लिए एक पैगाम है।

सत्यजीत ने संपादक पद छोड़ा, आजाद खालिद ने ज्वाइन किया

ग्रामीण उत्तर प्रदेश के किसानों और युवाओं की आकांक्षाओं को बल देने के फौरी उद्देश्य से गाजियाबाद से शुरू किए गए पाक्षिक समाचार पत्र “एक कदम आगे” के संपादक सत्यजीत चौधरी ने प्रबंधन को अपना इस्तीफा सौंप दिया है. अभी हाल ही में मथुरा और भिवानी से भी एक कदम आगे की शुरुआत की गई. करीब डेढ़ साल पहले टीवी पत्रकार सत्यजीत चौधरी को इस समाचार पत्र का जिम्मा सौंपा गया था। सत्यजीत ने करीब एक साल तक समाचार पत्र को पश्चिमी उत्तरप्रदेश का चेहरा बनाने का काम किया.

ये राडिया हैं, वो मां थीं

: जांच एजेंसियों का दोहरा चरित्र : कभी-कभी अपनी कमज़ोरी और कानून को लागू करने वाली मशीनरी के करतूत को देख कर आम आदमी यक़ीनन शर्मिदां होता होगा। देश के सबसे बड़े घोटाले की बड़ी सूत्रधार नीरा राडिया से पूछताछ के लिए सीबीआई उनके घर गई। इसी घोटाले से जुड़े कई पत्रकारों से अटे पड़े चैनल पर ख़बर थी कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन है कि महिला आरोपी से पूछताछ के लिए थाने नहीं बुलाया जा सकता इसीलिए सीबीआई राडिया के घर पूछताछ के लिए उनके घर गई…। उफ्फ कितना फर्क है कानून के पालन करने वालों और ख़बरे परोसने वालों के चरित्र में।

justice for मां : जैसे जैस वक़्त गुज़र रहा है, अपमान की पीड़ा बढ़ती ही जा रही है

थाने में बंधक महिलाएंराष्ट्रपति महिला… महिला के हाथ में केंद्र सरकार का रिमोट… सूबे की महिला मुखिया… इन सबकी मौजूदगी में एक बेबस मां का अपमान का एक दिन… दो दिन… तीन दिन… बीतता जा रहा है. दोषी जस के तस हैं… अपनी जगह पर हैं… बिना डर और भय के… जैसे उनके लिए कुछ हुआ ही न हो… आरोपी के घर की महिलाओं को थाने में लाकर बंधक बनाने की पुलिसिया परंपरा को खत्म की लड़ाई है यह… किसी यशवंत की लड़ाई नहीं है… किसी एक मांग की जंग नहीं है… 3 जुलाई 2003 को मेरा चार साल का बेटा मुझको हमेशा के लिए छोड़कर चला गया…. न जाने क्यों ये कहते हुए संकोच नहीं हो रहा कि जैसे जैसे वक़्त गुज़रता जा रहा है, दर्द तो कम नहीं हुआ मगर मानो सबर सा आता जा रहा है…. मगर आप यक़ीन मानिए कि उत्तर प्रदेश पुलिस के हाथों मेरी अपनी ही नहीं बल्कि हर पत्रकार की माता के अपमान की ख़बर सुनने के बाद जैसे जैस वक़्त गुज़र रहा है, अपमान की पीड़ा बढ़ती ही जा रही है…. हम इस मामले को भावनाओं के साथ साथ एक पत्रकार की हैसियत से भी लोगों को दिखाना चाहते हैं…. माता जी मेरी हो या यशवंत, किसी पत्रकार या इंसान की, उसके हम चरण तो स्पर्श कर सकते हैं लेकिन ये सोच भी नहीं सकते कि उसके आंचल को गम का साया भी छू सके….

असहाय यशवंत और यूपी का लोकतंत्र

: क्या पत्रकार का असहाय होना जुर्म है? : आज ना जाने क्यों अपने पत्रकार और ईमानदार होने पर पहली बार शर्म आ रही है। आज दिल चाह रहा है कि अपने सीनियर्स जिन्होंने हमको ईमानदार रहने के लिए शिक्षा दी उन पर मुकदमा कर दूं। साथ ही ये भी दिल चाह रहा है कि नई जनरेशन को बोल दूं कि ख़बर हो या ना हो, मगर ख़ुद को मजबूत करो।