‘यशवंत भाई, बेवजह न करें टांग खिंचाई!’

अजय शुक्लशशिजी को वक्त दीजिए, ये तो एक शुरुआत भर है : यशवंत भाई! आप शशि शेखर जी से जो अपेक्षाएं रखते हैं, असल में उसे पूरा करने के लिए वक्त चाहिए। आपने खुद ही माना है कि उन्हें आये अभी केवल एक माह हुआ है। स्वाभाविक है नये संस्थान में पहुंचने और फिर वहां की चुनौतियों का सामना करने में वक्त लगता है। शशि शेखर जी को मैं जितना जानता हूं, उनका सफर शून्य से शिखर तक पहुंचा है, न कि वह बगैर संघर्ष और चुनौतियों का सामना करे यहां तक पहुंचे हैं। हर कोई दूसरे से अपेक्षा करता है कि वह विवेकानंद की तरह सिद्धांतों और आदर्शों का पालन करे मगर अपनी बारी में पीछे रह जाता है। शशि शेखर ने पत्रकारिता के सिद्धांतों को बचाने का उदाहरण न अमर उजाला में रहते हुए दिया था। उन्होंने कलम को न तो बिकने दिया और न ही किसी क्लास के लिए गिरवी रखा।

‘हिन्दुस्तान समागम’ उर्फ ‘बौद्धिक ऐय्याशी’

सलीम अख्तर सिद्दीक़ी‘हिन्दुस्तान’ अखबार के ‘हिन्दुस्तान समागम-2009′ : उत्तर प्रदेश 2020 दिशा और दशा’ के अर्न्तगत लखनऊ में एक आयोजन किया गया। इसमें नामचीन हस्तियों ने इस बात पर मंथन किया कि 2020 तक उत्तर प्रदेश को कैसे ‘उत्तम प्रदेश’ में बदला जाए। पता नहीं अखबार के नए प्रधान सम्पादक शशि शेखर ने किस नीयत से समागम का आयोजन किया था। लेकिन इतना तो तय है कि जो चेहरे इस समागम में बोले हैं, ये वही चेहरे हैं, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में शासन किया है। समागम में लोकदल के जयंत चौधरी, कांग्रेस के जितिन प्रसाद तथा भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी, आदि लोगों की उत्तर प्रदेश के लिए चिंता और उसकी तरक्की की बातें करते देख गुस्से के साथ-साथ हंसी भी आयी। इनमें से लोकदल, कांग्रेस और भाजपा ने प्रदेश पर कई-कई बार शासन किया है। उनके शासन काल में उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश बनने के बजाय उल्टा प्रदेश क्यों बन गया? 

‘खुद का हाल ठीक नहीं, चले हैं यूपी संवारने’

[caption id="attachment_16084" align="alignleft"]अंशुमाली रस्तोगीअंशुमाली रस्तोगी[/caption]भाई यशवंतजी, आपकी टिप्पणी ‘शशिशेखर का इमोशनल अत्याचार’ पढ़ी। मुझे इस बात की खुशी है कि कम से कम आपने इस बेबाक टिप्पणी के माध्यम से हिंदुस्तान या कहूं कि शशिशेखर की सोच को पाठकों के समक्ष कायदे से रखा। यह बहुत जरूरी भी था। शशिशेखर अगर सोचते हैं कि हिंदुस्तान ने अखबार उत्तर प्रदेश की राजधानी के एक महंगे होटल में प्रदेश के हालात पर चंद ऐलिटों को बुलाकर, जायकेदार खाना खिलाकर और ठंडे कमरों में बैठाकर बहुत बड़ा तीर मार लिया हो तो यह हास्यास्पद है। शशिशेखर जी, महंगे होटलों में बैठकर किसी देश या प्रदेश की दशा-दिशा तय नहीं की जाती। इतनी बात तो आप और हम, सभी जानते-समझते हैं। ऐसे बेमतलब के आयोजन कर प्रदेश ही नहीं बल्कि देश के गरीब तबके का भी खुलकर मजाक उड़ाया जा रहा है।

शशिशेखर का इमोशनल अत्याचार

शशिशेखर देश के इन दिनों के सबसे चर्चित हिंदी संपादक हैं। खासकर अमर उजाला से छलांग लगाकर हिंदुस्तान के ग्रुप एडिटर बनने के बाद से उनकी लोकप्रियता और चर्चा में जमकर इजाफा हुआ है और हो रहा है। वे समकालीन पत्रकारिता के लिहाज से कंप्लीट पत्रकार और संपादक माने जाते हैं। कहा जाता है कि खबर-लेख लिखने-लिखवाने, न्यूज रूम को व्यवस्थित रखने-रखवाने, न्यूज टीम का कुशल प्रबंधन करने-कराने, संपूर्ण निष्ठा के साथ काम करने-कराने, सिस्टम डेवलप करने-कराने, अखबार के संपूर्ण ग्रोथ का साझीदार बनने और टीम को बनाने में उन्हें महारत हासिल है। वे जहां जो कुछ चाहते हैं, कर लेते हैं और पा लेते हैं। पर एचटी ग्रुप के ‘हिंदुस्तान’ में जाने के बाद उनसे जो उम्मीदें हम जैसों द्वारा कर ली गई थीं, लगता है वे ज्यादा थीं। हालांकि उन्हें वहां गए ज्यादा दिन नहीं हुए इसलिए उनके कार्यकाल के मूल्यांकन जैसा कोई कार्य अभी नहीं किया जा सकता पर विजन-सोच के लिहाज से तो परखा ही जा सकता है। इस मोर्चे पर वे फिलहाल निराश कर रहे हैं।