भोगवादी जीवन से उबे आदमी की आवारगी (भाग तीन)

: अलास्का के आवारा रास्तों पर : रेगिस्तान, समंदर और शहर-दर-शहर आवारगी : ”रेगिस्तान कभी भी सुखदायी जगह नहीं रहा, मगर इसका रूप हमेशा से जोगियों की तरह संवेदनशील साधारणता ओढे हुए, रहस्यों को उजागर करनेवाला और अभीभूत कर देने वाले सौंदर्य का अजनबी सा चेहरा लिए रहता है, जिसे देखने पर ही यह महसूस होता है कि यह जगह धरती पे नहीं, कहीं और है।

भोगवादी जीवन से उबे आदमी की आवारगी (भाग दो)

अमेरिका के भोगवादी जीवन से ऊबे क्रिस्टोफर ने खुद को जानने के लिए आवारगी का रास्ता चुना। सारे पैसे दानकर, परिचय-पत्र फेंककर और परिवार को बिना कुछ बताए उसने गुमनामी-घुमक्कड़ी का जीवन जीना शुरू किया। दो साल बाद वह अलास्का के निर्जन इलाके में जाकर रहना शुरू कर दिया। वहां जीवन की विपरीत परिस्थितियों से लड़ते हुए जीवन की खोज जारी रखी।

भोगवादी जीवन से उबे आदमी की आवारगी (भाग एक)

अमेरिका के भोगवादी जीवन से ऊबकर क्रिस्टोफर ने वापस खुद को जानने के लिए आवारगी का रास्ता चुना। अपने सारे पैसे दानकर और अपने सारे परिचय-पत्र फेंककर अपने परिवार को बिना कुछ बताए उसने गुमनामी और घुमक्कड़ी जीवन जीना शुरू किया। दो साल बाद वह अलास्का के निर्जन इलाके में जाकर रहना शुरू कर दिया।

ठाकुर साहब को दो तीन थप्पड़ रसीद कर बोली- ‘कुत्ते, तेरी यह हिम्मत!’

: उपन्यास – लोक कवि अब गाते नहीं (4) : कल परसों में तो जैसा कि पत्रकार ने लोक कवि को आश्वासन दिया था बात नहीं बनी लेकिन बरसों भी नहीं लगे। कुछ महीने लगे। लोक कवि को इसके लिए बाकायदा आवेदन देना पड़ा। फाइलबाजी और कई गैर जरूरी औपचारिकताओं की सुरंगों, खोहों और नदियों से लोक कवि को गुजरना पड़ा।

सभ्य मोहल्ला और एक बदचलन की मौत

अजय प्रकाश: वह तो मुसलमान ही था जो इन बच्चों का पेट पाल रहा था, इससे पहले पंजाबी से भी इसीलिए शादी की क्योंकि बिहारी कुछ करता ही नहीं था, सिवाय बच्चा पैदा करने के… : परसों की बात है। दिन के करीब दस बज रहे थे। दुबारा लौट आयी ठंड के बाद मेरी हिम्मत ठंडे पानी से नहाने की नहीं हुई तो सोचा क्यों न धूप में खड़े होकर थोड़ा गरम हो लिया जाये। धूप की गरमी से अगर हिम्मत बंध गयी तो नहा लूंगा, नहीं तो कंपनियों ने महकने का इंतजाम तो कर ही रखा है।

HR vs Hanumaanji

A story told by an IIM professor regarding the side effects of non-systematic working :- After completion of Lanka War Hanumanji was enjoying LTA with his friends. He got an email on his laptop from Accounts requesting him to clear his dues before 31st March – dues related to his tour for bring Sanjivani Booti for Laxmanji. He ignored the first mail. But after 3 – 4 reminders in two days time & receiving a call on CUG Mobile from Accounts Dept., he had to fly to Ayodhya canceling his leave.

सीधा प्रसारण

क्षमा शर्मा लिखित कहानी ‘सीधा प्रसारण’ मीडिया पर केंद्रित है. इसका प्रकाशन वर्ष 1997 में जनसत्ता के साहित्य विशेषांक ‘सबरंग’ में हो चुका है. लंबा अरसा बीत चुका है. एक बार फिर पढ़ने की जरूरत है इस कहानी को. खासकर नई पीढ़ी को बहुत कुछ समझ में आएगा इस कहानी को पढ़कर. -एडिटर

सूखा सूखा कितना सूखा

अभिज्ञात: पत्रकारिता की दुनिया में व्याप्त विसंगतियों को उजागर करती एक कहानी : वह अदना सा अंशकालिक पत्रकार था। एक बड़े अख़बार का छोटा सा स्ट्रिंगर। उसका ख़बरों की क़ीमत शब्दों के विस्तार पर तय होती थी, ख़बरों की गहराई और महत्त्व पर नहीं। जिस ख़बर के जुगाड़ में कई बार उसका पूरा दिन लग जाता उसकी लम्बाई कई बार तीन-चार कालम सेंटीमीटर होती।

‘देश का मीडिया बाजार की रखैल बन गया’

प्रदीप सौरभ‘मुन्नी मोबाइल’ में पत्रकारिता का भी कच्चा चिट्ठा है : बहुत दिनों बाद हिन्दी वालों के पास एक अलग टेस्ट का हिन्दी उपन्यास आ रहा है। नाम है ‘मुन्नी मोबाइल’। लेखक हैं वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सौरभ। इस उपन्यास में लंदन-शिकागो से लेकर बिहार-यूपी, दिल्ली-एनसीआर, पत्रकारिता-राजनीति, समाज-दंगा, नक्सलवाद-आंदोलन, कालगर्ल-कालसेंटर सब कुछ है। जिन लोगों ने इस उपन्यास के कच्चे रूप (प्रिंट होने से पहले) को पढ़ा है, उनका मानना है कि इस उपन्यास में ‘हिंदी बेस्ट सेलर’ बनने की संभावना है। उपन्यास तो इस महीने के आखिर में छपकर बाजार में आएगा लेकिन भड़ास4मीडिया उपन्यास के प्रकाशक वाणी प्रकाशन के सौजन्य से एक हिस्सा, खासकर वो हिस्सा जो पत्रकारिता से संबंधित है, यहां प्रकाशित कर रहा है। उपन्यास के इस हिस्से में गुजरात दंगों के दौरान मीडिया के रोल और मीडिया की आंतरिक बुनावट पर काफी कुछ कहा-लिखा गया है। तो आइए, ‘मुन्नी मोबाइल’ के एक अंश को पढ़ें-