भोगवादी जीवन से उबे आदमी की आवारगी (भाग तीन)

: अलास्का के आवारा रास्तों पर : रेगिस्तान, समंदर और शहर-दर-शहर आवारगी : ”रेगिस्तान कभी भी सुखदायी जगह नहीं रहा, मगर इसका रूप हमेशा से जोगियों की तरह संवेदनशील साधारणता ओढे हुए, रहस्यों को उजागर करनेवाला और अभीभूत कर देने वाले सौंदर्य का अजनबी सा चेहरा लिए रहता है, जिसे देखने पर ही यह महसूस होता है कि यह जगह धरती पे नहीं, कहीं और है।

कहीं कुछ यहां छिपा नहीं रहता, सब उजागर दिखता है। चारों तरफ फैला उजाला और आकाशीय विस्तार, सूखा-सूखा सा गतिमय माहौल, अधिक तापमान और हवाएं दिलो-दिमाग को झकझोरती रहती हैं। रेगिस्तान का घुमावदार आकाश विशाल होने के साथ-साथ डरावना होता है।  अन्य जगहों पर आकाश का घेरा क्षितिज के बाद धुंधला होने लगता है लेकिन रेगिस्तान में यह अनन्त विस्तार लिए होता है। इतना विस्तार जंगल के ऊपर के आकाश का भी नहीं होता। बिना किसी रुकावट के दिखता बादलो से भरा खुला आकाश इतना विशाल कि कभी-कभी दूर पृथ्वी की सतह की गोलाई घूमती हुई नीचे की तरफ जाती महसूस होती है। रेगिस्तान का यह पैराबोलिक सौंदर्य यहां की जमीन के साथ बादलों को प्राचीन इमारत सा सुंदर रूप देता है। इसी रेगिस्तान से होकर कितने पैगम्बर और सन्यासी अपने-अपने मंजिल की ओर गए। धर्मों को स्थापित करने वाले नेताओं ने दुनिया छोड़कर यहां आने के अध्यात्मिक महत्व के बारे में बताया, दुनिया से पलायन करने के लिए नहीं बल्कि सत्य की खोज के लिए।” -पॉल शेफर्ड की पुस्तक मेन इन दी लैंडस्केपः ए हिस्टोरिक व्यू ऑफ दी एस्थेटिक्स ऑफ नेचर से उद्धृत

माजेव रेगिस्तान के अलग-थलग कोने में एक जंगली फूल, आर्कटॉमेकॉन केलिफोमिका, खिलता है जो दुनिया में और कहीं नहीं मिलता। बसंत के आखिर में कोमल और सुनहले रंग का यह आकर्षक फूल इस रेगिस्तान में खिलता है, लेकिन बाकी मौसम की सूखी जमीन पर यह फूलों से रहित घनी झाड़ियों के रूप में किसी की नजर को आकर्षित नहीं करता। कैलिफोमिका का यह फूल इतना दुर्लभ है कि इसे खत्म होती पौधे की प्रजाति के रुप में चिह्नित किया गया है।

मैकेंडलेस के अटलांटा छोड़ने के लगभग तीन महीने से ऊपर हो चुके थे। अक्टूबर 1990 को संघीय सरकार ने  नेशनल पार्क सर्विस के एक रेंजर बुड वॉल्श को ‘लेकमीड नेशनल रिक्रिएशन एरिया’ के देहाती इलाके में इसी कैलिफोमिका को खोजने भेजा गया ताकि यह जाना जा सके कि यह फूल कितना दुर्लभ है। कैलिफोमिका जिप्सम वाली मिट्टी मे उगता है जो लेक मीड के दक्षिणी किनारे पर प्रचुर मात्रा में मिलता है। इसलिए वाल्श अपनी टीम को लेकर उधर ही गया। टेम्पल बार रोड से होते हुए डेट्रिटल वाश की तरफ दो मील आगे जाने पर वाल्श और उसकी टीम ने झील के किनारे अपनी गाड़ियां खड़ी की और आगे उजले जिप्सम वाले पूर्वी किनारे के ढलान की ओर सब धीरे-धीरे संभलकर उतरने लगे। कुछ मिनट बाद जैसे ही वे किनारे को नजदीक गए, एक रेंजर की नजर किसी चीज पर पड़ी, जिसे देखकर उसकी सांसे थम सी गई। वह चिल्लाया, “ यहां देखो, नीचे देखो, यह कौन सी चीज है??”

घनी झाड़ियों के बीच सूखी नदी के किनारे पर एक बड़ा सा सामान गहरे भूरे रंग के प्लास्टिक के नीचे छिपाया हुआ था। जैसे ही रेंजरों ने प्लास्टिक हटाया, वहां एक पुरानी सी पीले रंग की बिना लाईसेंस प्लेट की डॉटसन कार खड़ी थी। उस कार पर एक कागज चिपका था, जिसपर लिखा थाः ‘यह बेकार चीज यहां छोड़ दिया गया है। जिसे भी यह मिले वह इसे शौक से ले जा सकता है।‘

कार का दरवाजे का ताला खुला था। उसकी नीचले सतह पर कीचड़ भर चुका था। अंदर झांकने पर वाल्श को एक गिटार, एक सॉसपेन में रखा 4.93 डालर खुदरा, एक फुटबॉल, पुराने कपड़े से भरा एक बैग, एक फिशिंग रॉड, एक इलेक्ट्रिक रेजर, एक हार्मोनिका, पच्चीस पौंड चावल और गाड़ी की चाबी मिली।

रेंजरों ने और किसी संदिग्ध चीज की खोज में आसपास छान मारा और वहां से सब चले गए। कुछ दिनों बाद एक रेंजर आकर कार को बिना किसी परेशानी के स्टार्ट कर टेम्पल बार के नेशनल पार्क सर्विस मैंटेनेंस यार्ड तक ले आया। बुड वाल्श ने उस वाकये को याद करते हुए कहा कि गाड़ी को साठ मील प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ाता हुआ वह रेंजर ले आया और बोला ‘यह गाड़ी तो चैंपियन की तरह चलती है’।

यह जानने के लिए कि यह कार किसकी है, रेंजरों ने सभी कानूनी एजेंसियों को सूचना भेज दिया और साउथवेस्ट के सभी कम्प्यूटर रेकार्डों को खंगाल डाला, यह देखने के लिए कि यह डॉटसन कार किसी अपराध से तो नहीं जुड़ा था। लेकिन कुछ पता नहीं चला।

कार के सीरियल नंबर से इसके असली मालिक हर्ट्ज तक रेंजर पहुंच गए लेकिन हर्ट्ज ने कहा कि बहुत बार इस्तेमाल हो चुकी इस कार को बहुत साल पहले उसने किसी को बेच दिया था और अब उसमें उन्हें कोई रुचि नहीं है। वाल्श ने गर्व से इस कार को याद करते हुए कहा, “इस बेहतरीन कार का उपयोग हमलोग अगले तीन साल तक ड्रग तस्करों को पकड़ने के लिए अंडरकवर के रुप में करते रहे और इसने गजब का काम किया। इस डॉटसन कार की मदद से पार्क सर्विस कई ड्रग तस्करों को पकड़ने में कामयाब रही। यह कार आज भी अच्छा माईलेज देती है। थोड़े से इंधन में दिन भर चलती है। और इतनी अच्छी कार का मालिक होने का दावा करने कोई नहीं आया तो मुझे आश्चर्य हुआ।“

वह डॉटसन कार क्रिस मैकेंडलेस की थी। अटलांटा से पश्चिम की ओर निकलने के बाद, ऑफरोड ड्राईविंग ना करने की चेतावनी वाले होर्डिंग को नजरअंदाज करते हुए इमर्शन हाई की चढाई पर कार चलाते हुए 6 जुलाई 1990 को वह लेक मीड नेशनल रिक्रिएशन एरिया में पहुंचा था। मैकेंडलेस अपनी कार को रास्ते पर से उतार कर अंदर दो मील तक रेतीले रिवरबेड पर चलाते हुए लेक के दक्षिणी किनारे तक ले गया। दूर तक फैला किनारे का य़ह खाली रेगिस्तान 120 डिग्री फारेनहाईट तापमान में तपकर गर्म था। इधर-उधर किधर से भी निकल जाने वाली गिरगिटों से भरे उस रेगिस्तान में मैकेंडलेस अपना छोटा टेंट टेमेरिस्क पेड़ की छांव में लगाकर इस नयी आजादी का मजा लेने लगा।

डेट्रिटल वाश का रेगिस्तान, लेक मीड से पचास मील के दायरे में किंगमेन के पहाड़ों तक फैला है और साल मे अधिकांश दिन सूखा पड़ा रहता है। गरमी के मौसम में फटी धरती से तपती हवाएं ऊपर की तरफ केतली से उबलते हुए भाप की तरह तेजी से उठती है। यही हवाएं ऊपर उठकर गठीले, हथौड़े की तरह सख्त दिखने वाले गहरे भूरे बादल बनकर मोजेव के आसमान में तीस हजार फीट से ऊपर उठ जाते हैं। मैकेंडलेस के लेक मीड में आने के दो दिन बाद, दोपहरी में घने काले बादल पूरे डेट्रिटल घाटी में घनघोर पानी बरसाने लगे। मैकेंडलेस का कैंप कुछ फीट ऊंचाई पर था इसलिए जब तक भूरे पानी की तेज और ऊंची धारा उसके टैंट को बहा ले जाती, वह अपना सामान समेट चुका था। कार को चलाने के लिए अब कोई जगह नहीं बची थी क्योंकि अब सिर्फ एक ही रास्ता दिख रहा था, वह था पानी से लबालब बहती हुई नदी। पानी की बाढ में इतनी ताकत नहीं थी कि वह कार को बहा ले जाती या कोई नुकसान पहुंचाती। लेकिन ईंजन को यह गीला कर चुकी थी। मैकेंडलेस ने इसे स्टार्ट करने की बहुत कोशिश की लेकिन बैटरी खत्म हो गई, ईंजन ने साथ नहीं दिया। बैटरी के खत्म होते ही अब कोई संभावना नहीं थी कि डॉटसन आगे जा सके। अगर उसे कार को वापस सड़क तक लाना होता तो उसे पैदल चलकर पहले अधिकारियों से सूचित करना पड़ता। लेकिन रेंजरों के पास अगर वह जाता तो उसे सवालों का सामना करना पड़ता, जैसे कि वह नियम को तोड़कर उस दिशा में क्यों गया, जिधर न जाने की हिदायत रास्ते किनारे लिखी हुई थी। उसके कार का रजिस्ट्रेशन दो साल पहले एक्सपायर हो चुका था। रेंजर पूछ सकते थे कि रजिस्ट्रेशन का रिन्यूअल उसने क्यों नहीं कराया। उसका ड्राईविंग लाईसेंस भी एक्सपायर हो चुका था और गाड़ी का इंश्योरेंस भी नहीं था। अगर वह रेंजरों को सही जबाब देता तो परेशानी में पड़ सकता था। मैकेंडलेस अगर उन्हें समझाने की कोशिश करता कि उसने किसी बड़े नैतिक शक्ति द्वारा निर्धारित नियमों का पालन करते हुए सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों को तोड़ा है जैसा कि उसने थोरो के निबंध ‘ऑन दी ड्यूटी ऑफ सिविल डिसऑबिडिएंस’ से सीखा था, तो फेडरल सरकार के अधिकारी शायद ही उसकी बातें समझ पाते और उसे लाल फीतशाही का सामना करते हुए दंड भुगतना पड़ता। उसके माता-पिता से भी संपर्क किया जाता। और इन सबसे बचने के लिए मैकेंडलेस के पास एक ही रास्ता था कि डॉटसन को वहीं छोड़कर वह आगे की आवारगी पैदल ही करे। उसने यही किया।

इन सब घटनाओं को देखकर मैकेंडलेस परेशान होने के बदले और खुश हुआ क्योंकि यह अच्छा अवसर था कि वह सारे गैरजरुरी चीजों को वहीं रेगिस्तान में छोड़ दे। उसने कार को अच्छी तरह से भूरे प्लास्टिक से ढंक दिया और उसका नंबर प्लेट खोलकर छिपा दिया। उसने अपनी विंचेस्टर रायफल और कुछ चीजों के जमीन के नीचे दबा दिया ताकि बाद में उसे निकाल सके। उसके बाद उसने ऐसा काम किया जिससे थोरो और टॉल्सटॉय दोनों खुश होते। उसने अपने सारे पैसे में आग लगा दिया और कुछ ही पल में 123 डॉलर का कागज राख हो चुका था।

ये सभी बातें उस डायरी से पता चली जिसमें मैकेंडलेस सारी घटनाओं को लिखा करता था और जिसे उसने अलास्का जाने से पहले वायन वेस्टरबर्ग के पास कार्थेज में सुरक्षित रखने के लिए छोड़ दिया था। सुबूत से ये साबित होता है कि डायरी में उसने बिल्कुल सच लिखा था औऱ सच को मैकेंडलेस काफी गंभीरता से लेता था।

बचे हुए सामान को बैग में डालकर मैकेंडलेस 10 जुलाई 1990 को लेक मीड की तरफ चल पड़ा। मैकेंडलेस ने अपनी डायरी में लिखा कि यह उसने बहुत बड़ी गलती की क्योंकि गर्मी अपने चरम पर थी और उसे लू लग गई। फिर भी उसने कुछ नाविकों को रोकने में सफलता पायी, जिन्होंने उसे कालविले की खाड़ी तक लिफ्ट दिया। उसके बाद वह अपना अंगूठा उठाकर सड़क पर फिर निकल पड़ा। मैकेंडलेस दो महीनों तक पश्चिम की तरफ आवारगी करता रहा। उधर के लैंडस्केप के सौंदर्य पर वह काफी मुग्ध था। जगह-जगह उसे अपनी तरह के आवारे मिलते रहे और उनके साथ वह आनंद उठाता रहा। लेक ताहो तक वह लिफ्ट लेकर गया। आगे सियरा नेवाडा तक पैदल चलते हुए उत्तर की ओर पैसिफिक क्रेस्ट सेंट्रल तक के पहाड़ों में वह घूमता रहा, उसके बाद फिर से सड़क पर आ गया। जुलाई के अंत में वह एक आदमी की गाड़ी से सफर कर रहा था जो खुद को क्रेजी ईर्नी कहता था। उसने मैंकेडलेस को उत्तरी कैलिफोर्निया के एक रैंच में नौकरी का प्रस्ताव दिया। वहां एक खंडहरनुमा मकान था जिसके इर्द-गिर्द बकरियां और मुर्गे, गद्दे, टूटे टेलीविजन, पुराने सामान और कचरों का अंबार दिखता था। छह और आवारों के साथ मैकेंडलेस वहां ग्यारह दिन तक काम करता रहा लेकिन जल्द ही उसे लग गया कि क्रेजी ईर्नी उसे ये काम करने के एक पैसे नहीं देगा तो उसने वहां से एक लाल साईकिल चुराई और चलता बना। चिको तक वह साईकिल से आया और एक मॉल की पार्किंग मे साईकिल को छोड़कर फिर से उसने आगे की आवारगी, उसी तरह लिफ्ट मांगने के लिए अंगूठा खड़ा करते हुए लगातार करता रहा। उत्तर और पश्चिम से होते हुए वह रेड ब्लफ, वीवरले और विलो क्रीक से गुजरा। कैलिफोर्निया के आर्कटा और पैसिफिक क्षेत्र के किनारे से होते हुए मैकेंडलेस यूएस हाईवे 101 तक आया और समुद्री किनारे की ओर चलता रहा।

ओरेगॉन लाईन के साठ मील दक्षिण में ओरिक शहर के पास एक पुराने वैन में घूमते रबरट्रैंप आवारे जोड़े की नजर सड़क किनारे झाड़ियों में बैठकर कुछ खोजते एक लड़के पर पड़ी। जेन अपने ब्वाय फ्रेंड बॉब के साथ वैन में बैठी थी।

“उसने एक लॉंग शर्ट और बेकार सी टोपी पहन रखी थी। उसके हाथ में पौधों के बारे में लिखी गई एक किताब थी जिसमें देख-देखकर वह एक गैलन में खाने लायक बेरी के फल जमा कर रहा था। वह बहुत परेशान दिख रहा था इसलिए मैने उसे पुकारकर पूछा कि वह उनके साथ कहीं जाना चाहेगा गाड़ी में। हमने सोचा कि उसे हम कुछ खाने को दे सकते हैं।“ चालीस पार कर चुकी रबरट्रैंप जेन ये बातें बता रही थी। “उसने हमसे बात करनी शुरु की। वह बहुत अच्छा था। उसने अपना नाम एलेक्स बताया। वह बहुत समय से भूखा था लेकिन उसके चेहरे से सच्ची खुशी छलक रही थी। उसने बड़े गर्व से बताया कि वह किताब से खोज-खोजकर खाने लायक फलों के खाकर जी रहा  है। वह सच में इस बात पर काफी खुश था। उसने बताया कि वह देश में एक साहसिक यात्रा करने के लिए आवारगी कर रहा है। उसने अपने कार को छोड़ने से लेकर पैसे जलाने तक की सारी दास्तां हमसे कही। मैने जब उससे पूछा कि तुम ऐसा क्यों कर रहे हो तो उसका जबाब था कि उसे पैसे की जरुरत नहीं है।“

जेन ने बताया कि एलेक्स की उम्र का ही उसका एक बड़ा लड़का था जो अब उससे अलग रहता है I इसलिए उसने बॉब से कहा, “इस बच्चे को वह अपने साथ रखेंगे, तुमको इसे कुछ सिखाना पड़ेगा, जीवन जीना।“

“एलेक्स हमारे साथ ओरिक बीच तक आया और हमारे साथ कैंप मे एक सप्ताह तक रुका। वह सच में बहुत अच्छा था। हमने उसके लिए सपने बुने थे। जब हम अलग हो रहे थे तो हमें आशा नहीं थी वह हमसे फिर कभी मिलेगा लेकिन उसने संपर्क में रहने का वादा किया। अगले दो साल तक एलेक्स हमें एक-दो महीने पर पोस्टकार्ड लिखता रहा।“

ओरिक से मैकेंडलेस समुद्री किनारे की तरफ आगे बढता रहा। पिस्टल नदी पारकर, कूस बे, सील रॉक, मंजानिटा, एस्टोरिया; होकियम, हम्पट्युलिप्स; क्वीट्स, फार्क्स, पोर्ट एंजेल्स, पोर्ट टाउनसेंड से गुजरते हुए सिएटल में उसने आवारगी की। जेम्स जॉयस के उपन्यास ‘आर्टिस्ट एज ए यंग मैन’ के कैरेक्टर स्टीफन डेडलस की तरह मैकेंडलेस अकेला था। जॉयस लिखते हैं, “वह अकेला था। उसपर कोई ध्यान नहीं देता था लेकिन वह खुश था और दिल से आवारा। वह बिल्कुल अकेला था। जवान और दृढ ईच्छाशक्ति वाला। समुद्री किनारे के नमकीन लहरें, आवारा हवाओं, सीपों और भूरे रंग के सूरज के रौशनी के बीच तन्हा।“

जेन और बॉब से मिलने से ठीक पहले दस अगस्त को विलो क्रीक के पास यूरेका के पूर्व की तरफ, लिफ्ट लेकर चलने के जुर्म में मैकेंडलेस को एक अधिकारी ने पकड़ लिया। जब अधिकारी ने उससे स्थाई पता के बारे में पूछा तो उसने घर का असली पता दे दिया। अगस्त के अंत तक वाल्ट और बिली के मेलबॉक्स में दंड का पैसा भुगतान करने की चिट्ठी पड़ी थी।

वाल्ट और बिली क्रिस के गायब हो जाने के बाद बहुत चिंतित थे। उन्होंने अन्नाडेल पुलिस को सूचित किया था लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। जब कैलिफोर्निया से दंड वाली चिट्ठी आई तो उनको अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रहा। वाल्ट का एक पड़ौसी यूएस डिफेन्स इंटेलीजेंस एजेंसी में निदेशक था। वाल्ट उस आर्मी जेनरल से सलाह लेने के लिए गया। जेनरल ने उसे एक प्राईवेट इन्वेस्टीगेटर पीटर कालित्का से मिलाया, जो डिफेंस एजेंसी और सीआईए दोनों के लिए काम करता था। जेनरल ने वाल्ट को भरोसा दिलाया कि अगर क्रिस वहां होगा तो पीटर उसे खोज निकालेगा।

उस चिट्ठी के सहारे पीटर ने मैकेंडलेस को वीलो क्रीक से खोजना शुरु किया लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा। दिसम्बर में पीटर को टैक्स रेकार्ड से पता चला कि क्रिस ने अपना सारा पैसा ऑक्सफैम को दे दिया है।

वाल्ट ने बताया, “इस बात ने हमें डरा दिया कि उस वक्त तक क्रिस के बारे में हमें कुछ भी पता नहीं चला। उसको डॉटसन कार से इतना प्यार था कि मुझे यकीन नहीं हो रहा कि वह उसे कहीं पर छोड़कर पैदल चल देगा। लेकिन मुझे आश्चर्य नहीं होना चाहिये था क्योंकि पीठ पर जितना लादकर चल सकें, उतना ही सामान क्रिस हमेशा अपने पास रखना चाहता था।“

पीटर क्रिस को कैलिफोर्निया में खोज रहा था लेकिन वह तो वहां से काफी दूर कास्केड रेंज से होते हुए पूरब की तरफ कोलम्बिया के नदी बेसिन के लावा भरी सतहों और झाड़ियों भरे उच्च भूमि होते हुए मोन्टाना पहुंच चुका था। वहीं कटबैंक के पास उसे वायन वेस्टरबर्ग मिला था और सितम्बर तक कार्थेज में उसके साथ काम कर रहा था। जब वेस्टरबर्ग को जेल हुई तो वहां का काम रुक गया। जाड़े की दस्तक हो चुकी थी इसलिए मैकेंडलेस अब गर्म जलवायु वाले जगह की ओर चल पड़ा।

28 अक्टूबर 1990 को एक ट्रक से वह कैलिफोर्निया के नीडल्स पहुंचा। वहां कोलोराडो नदी के पास पहुंचकर मैकेंडलेस बेहद खुश था। यह बात मैकेंडलेस ने अपने डायरी में नोट किया। उसके बाद वह हाईवे पकड़कर दक्षिण मे रेगिस्तान की तरफ चलना शुरु किया। बारह मील धूल भरे रास्ते से चलने के बाद क्रिस एरिजोना के टोपोक पहुंचा। टोपोक शहर में सेकेंडहेंड डोंगी(छोटी नाव) को बिकते देखकर उसने अचानक भावावेग से उसे खरीदने की सोची, जिससे उसने कोलारोडो नदी से चार सौ मील दक्षिण मैक्सिको के बार्डर से होते हुए कैलिफोर्निया की खाड़ी तक जाने की योजना बनाई।

नदी के नीचले फैलाव में हूवर डैम से खाड़ी तक के रास्ते में टोपोक से 250 मील बाद ग्रैंड कैनयन से तेज और अनियंत्रित लहर फूटती थी। नहरों और बांधो से कमजोर हो चुकी कोलोराडो नदी इस महाद्वीप के कुछ बेहद गर्म और दिखने में साधारण प्रदेशों से होकर धीरे-धीरे गुजरती थी। मैकैंडलेस इस लैंडस्केप की सादगी भरे सौंदर्य से बहुत आह्लादित था। रेगिस्तान के सूखी वादी और क्षितिज से आती साफ रौशनी में उसकी आवारगी ने उसके अंदर जीवन के उस आनंद भरे दर्द को बढा दिया था, जो उसे आगे का रास्ता दिखा रहा था।

टोपोक से दक्षिण हावासू झील के साफ, विशाल और सूने आकाश के गुंबद के नीचे वह अपनी डोंगी में चला और रास्ते में कोलोराडो की एक सहायक नदी बिल विलियम्स में थोड़ी दूर आवारगी की। उसके बाद कोलोराडो रीवर इंडियन रिजर्वेशन, किबोला नेशनल वाईल्डलाईफ रिफ्यूज, इंपेरियस नेशनल वाईल्डलाईफ रिफ्यूज होते हुए वह कैक्टस भरे रेगिस्तान और क्षारीय प्लेन को पीछे छोड़ते हुए, एक बहुत पुराने पत्थर के नीचे अपना कैंप जमाया। दूर नुकीली चोटियों वाले भूरे रंग के पहाड़ों की कतार पानी की सतह पर तैरता महसूस हो रहा था। एक दिन नदी से दूर जंगली घोड़ों के साथ रेस लगाते हुए मैकेंडलेस को यूएस आर्मी द्वारा प्रतिबंधित क्षेत्र यूमा प्रोविंग ग्राउंड का साईनबोर्ड दिखा। चेतावनी की बिल्कुल परवाह न करते हुए वह नवंबर के अंत में यूमा को डोंगी से पारकर रुका और वायन वेस्टरबर्ग को ग्लोरी हाउस, सिऔक्स फाल्स के पते पर एक पोस्टकार्ड लिखा जहां वेस्टरबर्ग अपना समय बिता रहा था।

कार्ड में लिखा थाः- ‘ हे! वेस्टरबर्ग! कैसे हो। आशा करता हूं कि तूम पहले से अच्छे होगे। मैं एरीजोना में एक महीने से आवारगी करता रहा। बहुत सुंदर जगह है। बहुत बढिया जलवायु और सुंदर प्राकृतिक दृश्यों से भरा। इस चिट्ठी का उद्देश्य तुम्हें आभार कहना है, तुम्हारे अच्छे व्यवहार के लिए। तुम्हारे जैसे अच्छे स्वभाव का उदार आदमी मिलना मुश्किल है। कभी-कभी लगता है कि तुमसे ना मिलता तो अच्छा रहता क्योंकि तुम्हारे पास रहके कमाए गए इतने पैसे के साथ आवारगी करने में बड़ी आसानी सी महसूस होती है। जबकि मुझे वो दिन ज्यादा मजेदार लगते थे जब मेरे पास एक भी पैसा नहीं था और मुझे एक वक्त के भोजन के लिए संघर्ष करना पड़ता था। लेकिन एरीजोना में बिना पैसे के खाना मिलना मुश्किल था क्योंकि यहां फलों की खेती बहुत कम है आजकल। केविन को धन्यवाद देना उसके दिए गर्म कपड़ों के लिए जिसके बगैर मैं सर्दी में जमकर मर जाता। मुझे लगता है कि केविन ने तुमको वार एंड पीस किताब दी होगी। जरुर पढना, ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि तुम उच्च नैतिक चरित्र वाले आदमी हो। वार एंड पीस प्रतीकों से भरी काव्यात्मक किताब है। इसमें ऐसी बातें लिखी हैं, जिसे तुम समझोगे। ऐसी बातें जिसे सामान्यतः लोग समझ नहीं पाते। मैं कुछ दिन और इस तरह की आवारगी भरी जिंदगी जीउंगा। इस तरह की आजादी और सादगी भरा जीवन मैं छोड़ नहीं सकता। एक दिन मैं तुम्हारे पास लौटूंगा वायन और तुम्हारे दयालुता के बदले कुछ तुम्हारे लिए भी करना चाहूंगा। तब तक तुम हमेशा मेरे दोस्त रहोगे। गॉड ब्लेस यू।‘

2 दिसम्बर 1990 को वह मैक्सिकन बार्डर के पास मोरेलोस डैम तक पहुंचा। कोई परिचय पत्र ना होने के कारण उसे भय था कि उसे आगे जाने नहीं दिया जाएगा, इसलिए डैम के खुले फ्लडगेट से होते हुए वह निकल गया। एलेक्स ने तेजी से चारों तरफ देखा कि किसी ने उसे देख तो नहीं लिया। लेकिन “मेक्सिको में यह गैरकानूनी प्रवेश किसी की नजर में नहीं आया। एलेक्जेंडर बहुत खुश था“, एलेक्स ने डायरी में लिखा।

यह खुशी ज्यादा देर टिक नहीं सकी। मोरेलोस डैम के बाद नदी से सिंचाई की कई नहरें फूटती थी और मैकेंडलेस उसमें रास्ता भटक गया। नहरें कई तरफ जाती थी और एलेक्स यह देखकर हतप्रभ था। उसे कुछ सूझ नहीं रहा था। तभी उसका सामना कुछ कैनाल अधिकारियों से हुआ जिसने बताया कि वह दक्षिण में कैलिफोर्निया की तरफ नहीं बल्कि पश्चिम में बेजा पेनिनसिला की तरफ जा रहा था। एलेक्स हताश हो गया। उसने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि कैलिफोर्निया की खाड़ी की तरफ जाने के लिए कोई ना कोई रास्ता जरुर होना चाहिए। अधिकारी एलेक्स को इस तरह देख रहे थे जैसे वह पागल हो। लेकिन तभी मैप के ऊपर पेंसिल के साथ सभी ये जानने के लिए जुटे कि क्या सच में ऐसा कोई रास्ता हो सकता था। दस मिनट के बाद उन्होंने एलेक्स को एक रास्ता सुझाया जो उसे कैलिफोर्निया के समंदर की तरफ ले जा सकता था। आशा जगते ही एलेक्स के अंदर वापस आनंद फूट पड़ा।

मैप के अनुसार नहर में वह कुछ पीछे लौटा और कैनाल डे इंडिपेंडेसिया पकड़कर पूर्व की ओर गया। मैप में वह कैनाल,  वैल्टेको कैनाल से जा मिलता था जहां से दक्षिण की तरफ जाने वाला हर रास्ता समंदर तक ले जाता था। लेकिन, उसकी सारी आशा मिट्टी में तब मिल गई जब नहर जाकर दलदली झाड़ियों से भरे क्षेत्र के बीच में जाकर खत्म हो गई। एलेक्स ने पाया कि वह जगह कोलोराडो नदी का सूख रहा रिवरबेड है। मैप में उस क्षेत्र में आधा मील आगे एक और नहर था जहां तक जाने में मैकेंडलेस को तीन दिन लग गए।

एलेक्स ने अपनी डायरी में लिखाः- “आखिर में एलेक्स ने वाल्टेको कैनाल को खोज ही लिया। उसमें अपनी डोंगी उतार वह दक्षिण की तरफ चल पड़ा। उसकी डर और चिंता और बढने लगी जब आगे नहर छोटी होती जा रही थी। मेक्सिको के स्थानीय लोगों ने एलेक्स को वहां के बैरियर से आगे जाने में मदद की और एलेक्स ने मेक्सिकन्स को अमेरिकन से ज्यादा दोस्ताना और सेवाभाव वाला पाया।“

लेकिन 9 दिसम्बर 1990 को फिर उसने लिखा- ‘सारी आशाएं समाप्त हो चुकी हैं। यह नहर भी समंदर में न जाकर एक दलदल से भरे जंगली झाड़ियों वाले जगह में खत्म हो गई। एलेक्स संकट से घिर चुका है। उसने तय किया कि समंदर तक जाने का रास्ता तो खोजना ही है। एलेक्स दिन भर डोंगी को झाड़ियों और दलदल के बीच खींचता रहा लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ। उसे थोड़ी सी सूखी जमीन मिली जहां उसने अपना कैंप लगाया। अगले दिन, 10 दिसंबर 1990 को एलेक्स फिर से समंदर को खोजने में लगा लेकिन भ्रमित होकर दिन भर एक गोले में चक्कर लगाता रहा। पूरी तरह निराश और हताश एलेक्स दिन के खत्म होने पर डोंगी के बगल में बैठा रोने लगा।  लेकिन तभी मेक्सिकन डक(बत्तख) शिकारी उधर से गुजरे। एलेक्स ने उनसे अपनी कहानी कही और समंदर तक पहुंचने की बात भी कही। शिकारियों ने कहा कि उधर से समंदर की तरफ जाने का कोई रास्ता नहीं था। फिर उनमें से एक शिकारी, एलेक्स को अपने बेसकैंप से समंदर तक पहुंचाने को राजी हो गया। यह चमत्कार से कम नहीं था।‘

डक शिकारियों ने एलेक्स को मछुआरों के एक गांव एल गोल्फो डे सांता क्लारा पहुंचा दिया जो कैलिफोर्निया की खाड़ी के तट पर बसा था। वहां से मैकेंडलेस समंदर में फिर उतर गया और दक्षिण की तरफ जाते हुए खाड़ी के पूर्वी छोड़ तक पहुंच गया। वहां जाने के साथ ही वह और चिंतनशील हो गया। उसने हवाओं में उड़ते रेतों के गुंबद के चित्र, डूबते सूरज, समुद्री किनारे के घुमावदार अर्द्धवृताकार चित्र उसने खींचे। एलेक्स अब डायरी में विस्तार से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे नोट लिखने लगा। अगले एक महीने के अंदर उसने सौ से भी कम शब्द लिखे।

डोंगी चलाते-चलाते थकने के बाद 14 दिसम्बर को वह समंदर के किनारे डोंगी को घसीटते हुए उसे ऊंचे चट्टान की तरफ ले गया और उसने वहीं ऊपर के समतल और एकांत वाले हिस्से में अपना कैंप लगा दिया। वह दस दिन तक वहीं रहा। तेज हवाओं ने उसे उसी चट्टान के दूसरी तरफ के गुफानुमा जगह में जाने को मजबूर कर दिया और अगले दस दिनों तक वह वहीं जमा रहा। उसने ऩए साल को उत्तरी अमेरिका के 17000 वर्गमील में फैले रेतीले गुंबदों वाले विशाल दी ग्रेट डेजर्ट के ऊपर चमकते हुए पूर्णिमा के चांद को देखते हुए मनाया। एक दिन बाद वह फिर से समंदर में उतर पड़ा।

11 जनवरी 1991 को उसने अपनी डायरी में लिखा- “यह काफी दुर्भाग्यपूर्ण दिन था।“ उस दिन कुछ दूर दक्षिण में जाने के बाद डोंगी को रेत के टीले से लगाकर दूर से आते ज्वारभाटा को देख ही रहा था कि एक घंटे बाद रेगिस्तान की तरफ से आती तेज हवाएं और समंदर में उठती तेज और ऊंची लहरों ने उसे फिर से समंदर में ला पटका। लहरें इतनी ऊंची और तेज थी कि ऐसा लगता था उसके छोटे डोंगी को निगल जाएगी। हवाएं और तेज हो चुकी थीं। गुस्से में आकर एलेक्स डोंगी को पतवार से पीटने लगा। एक पतवार टूटने के बाद उसे होश आया तो उसने खुद को शांत किया क्योंकि दूसरा पतवार भी अगर टूट जाता तो एलेक्स की कहानी वहीं खत्म हो जाती। बहुत जोर लगाने के बाद एलेक्स डोंगी को किनारे लगाने में कामयाब रहा और रेत पर गिर पड़ा। तब तक शाम ढल चुकी थी। एलेक्स ने सोचा कि अब डोंगी से किसी तरह मुक्ति पाकर वह उत्तर की तरफ जाएगा।

16 जनवरी को मैकेंडलेस ने उस मोटे चदरे से बनी डोंगी को एल गोल्फो डे सांटा क्लारा गांव के दक्षिण-पश्चिम में घास के ऊंचे टीले पर छोड़कर उत्तर की तरफ समंदर के रेगिस्तानी किनारे में पैदल निकल पड़ा। छत्तीस दिनों से उसने किसी से बात नहीं की थी। वह इतने दिन तक सिर्फ पांच पौंड चावल के सहारे और समंदर से मिले कुछ चीजों को खाते हुए जी गया। इसी बात ने क्रिस को आगे अलास्का की यात्रा पर बहुत कम राशन ले जाने की प्रेरणा दी। वह 18 जनवरी 1991 तक यूनाईटेड स्टेट्स के बार्डर पर था। वहां उसे सीमा अधिकारियों ने पकड़ लिया और बिना परिचय पत्र के चलने के जुर्म में जेल में डाल दिया। वहां उसने एक झूठी कहानी गढी और उस आधार पर एक दिन बाद छूट गया लेकिन उसका .38 कैलिबर रिवाल्वर वहीं ले लिया गया, जिससे एलेक्स को बहुत लगाव था।

मैकेंडलेस अगले छह हफ्तों तक दक्षिण-पश्चिम की तरफ घूमता रहा। पूर्वी दिशा की ओर ह्वेस्टन तक, पश्चिम की तरफ प्रशांत सागर के किनारे तक। किसी  शहर में घुसने से पहले उसने पैसे को जमीन में दबा देता था क्योंकि वहां घूमने और सोने के दौरान उसे चोर-बदमाशों से खतरा था। लौटते वक्त मैकेंडलेस पैसे वापस निकाल लेता था। तीन फरवरी को वह लास एंजेल्स पहुंच गया। वहां वह परिचय पत्र बनवाने और एक नौकरी की खोज में गया था। लेकिन वहां समाज में उसे जीने में बहुत परेशानी होने लगी और वह सड़क की जिंदगी में वापस लौट आया।

छह दिन बाद वह ग्रैंड कैनयन घाटी में नीचे एक जर्मन जोड़े थामस और कैरीन के साथ रुका जिन्होंने उसे लिफ्ट दिया था। एलेक्स ने लिखा, “ क्या यह वही एलेक्स है जो जुलाई 1990 को आवारगी पर निकला था। रोड की जिंदगी और पौष्टिक खाने के अभाव में उसका वजन 25 पौंड कम हो गया। लेकिन आत्मा से वह बहुत ऊंचा उठ चुका था।”

24 फरवरी को, साढे सात महीने बाद मैकेंडलेस फिर से वहीं लौटा, जहां उसने अपना डॉटसन कार छोड़ा था। कार तो रेंजर ले जा चुके थे लेकिन नंबर प्लेट के साथ-साथ कुछ सामान खोज निकाला जिसे उसने वहां जमीन में दबाया था। उसके बाद उसने लास वेगास की ओर रुख किया और वहां एक इटालियन रेस्टूरेंट में उसे काम मिल गया।

उसने डायरी में लिखा, “एलेक्जेंडर ने अपना सारा सामान रेगिस्तान में दबा दिया और बिना पैसे और परिचय पत्र के 27 फरवरी को लास वेगास में घुस गया। वह लास वेगास की गलियों में आवारों, बम्पों और शराबियों के साथ कई सप्ताह रहा। लेकिन, लास वेगास उसकी मंजिल नहीं थी। 10 मई को वह नौकरी छोड़कर उल्टे पांव लौटा और रेत में दबे अपना बैग निकालकर फिर सड़क पर आ गया। उसने पाया कि बैग में रखा कैमरा जमीन के नीचे दबा रहके खराब हो चुका था। इसलिए, 10 मई 1991 से 7 जनवरी 1992 के बीच की कोई तस्वीर एलेक्स की कहानी फोटोफाईल में नहीं है। लेकिन यह महत्वपूर्ण नहीं है।  अब तक एलेक्स ने काफी अनुभव पाये, उसके पास यादों का खजाना है। उसने आवारगी में अपने जीवन का असली अर्थ और आनंद पाया है। हे ईश्वर! शुक्रिया! तुमने हमें जिन्दा रखा।“

अमेरिका के भोगवादी जीवन से ऊबे क्रिस्टोफर ने खुद को जानने के लिए आवारगी का रास्ता चुना। सारे पैसे दानकर, परिचय-पत्र फेंककर और परिवार को बिना कुछ बताए उसने गुमनामी-घुमक्कड़ी राजीव कुमार सिंहका जीवन जीना शुरू किया। दो साल बाद वह अलास्का के निर्जन इलाके में जाकर रहना शुरू कर दिया। वहां जीवन की विपरीत परिस्थितियों से लड़ते हुए जीवन की खोज जारी रखी। वह ऐसा क्यों बना… अलास्का में उसके साथ क्या हुआ.. यह सब-कुछ जॉन क्राउकर नाम के पत्रकार ने बहुत शोध के बाद अपने किताब ‘Into the wild’ में लिखा। सीन पेन ने इसी नाम से एक बेहतरीन फिल्म बनाई जो विश्व के सौ महान सिनेमा में गिनी जाती है। Into the wild’ का हिंदी में अनुवाद कर रहे हैं युवा पत्रकार राजीव कुमार सिंह। इसका पहला और दूसरा पार्ट आप लोग पढ़ चुके हैं। ये था तीसरा पार्ट। राजीव ने इस उपन्यास का अनुवाद करके पत्रकारिता क्षेत्र में दस्तक दी है। उनके अनुवाद में कई कमियां-गल्तियां हैं, ऐसा उनका कहना है। पर इसे एक युवा पत्रकार का शुरुआती गंभीर प्रयास मानते हुए कमियों की अनदेखा की जाए, ऐसा वह अनुरोध करते हैं। राजीव की इच्छा है कि उनके परिचय में लिखा जाए- एक बेरोजगार पत्रकार जिसे एक अदद नौकरी की तलाश है। राजीव से संपर्क rajeevsinghemail@gmail.com के जरिए किया जा सकता है। -एडिटर, भड़ास4मीडिया

भोगवादी जीवन से उबे आदमी की आवारगी (भाग दो)

अमेरिका के भोगवादी जीवन से ऊबे क्रिस्टोफर ने खुद को जानने के लिए आवारगी का रास्ता चुना। सारे पैसे दानकर, परिचय-पत्र फेंककर और परिवार को बिना कुछ बताए उसने गुमनामी-घुमक्कड़ी का जीवन जीना शुरू किया। दो साल बाद वह अलास्का के निर्जन इलाके में जाकर रहना शुरू कर दिया। वहां जीवन की विपरीत परिस्थितियों से लड़ते हुए जीवन की खोज जारी रखी।

वह ऐसा क्यों बना… अलास्का में उसके साथ क्या हुआ.. यह सब-कुछ जॉन क्राउकर नाम के पत्रकार ने बहुत शोध के बाद अपने किताब ‘Into the wild’ में लिखा। सीन पेन ने इसी नाम से एक बेहतरीन फिल्म बनाई जो विश्व के सौ महान सिनेमा में गिनी जाती है। राजीव कुमार सिंह‘Into the wild’ का हिंदी में अनुवाद कर रहे हैं युवा पत्रकार राजीव कुमार सिंह।

इसका पहला पार्ट आप लोग पढ़ चुके हैं। पेश है दूसरा पार्ट। राजीव की इच्छा है कि उनके परिचय में लिखा जाए- एक बेरोजगार पत्रकार जिसे एक अदद नौकरी की तलाश है। राजीव से संपर्क rajeevsinghemail@gmail.com के जरिए किया जा सकता है। राजीव ने इस उपन्यास का अनुवाद करके पत्रकारिता क्षेत्र में दस्तक दी है। उनके अनुवाद में कई कमियां-गल्तियां हैं, ऐसा उनका कहना है। पर इसे एक युवा पत्रकार का शुरुआती गंभीर प्रयास मानते हुए कमियों की अनदेखा की जाए, ऐसा वह अनुरोध करते हैं। -एडिटर, भड़ास4मीडिया

अलास्का के आवारा रास्तों पर

क्रिस्टोफर मैकेंडलेस की जीवनी

बियाबान की ओर, आवारा कदमों का पहला निशान

”मैंने हमेशा आवारा होना चाहा। शांत और एक जगह स्थिर अस्तित्व मुझे नहीं चाहिए थी.. मैंने उत्साह और साहस के साथ खतरों से जूझते हुए अपने प्यार के लिेए जान कुर्बान कर देना चाहा… मैने अपने अंदर इतनी उर्जा महसूस की जो मुझे बाहरी शांत जिंदगी में कभी नहीं मिल पाती.”

-क्रिस्टोफर के पास मिली लियो टाल्सटॉय की किताब ‘फैमिली हैप्पीनेस’ के एक पृष्ठ पर छपी पंक्तियां, जिसे क्रिस ने कलम से हाईलाइट किया था.

”इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि आवारा होने की कल्पना हमें असीम आनंद से भर देता है… यह चाहत हमारे मन की उस आजादी से जुड़ी है जो इतिहास, क्रूर शोषण, कानून और प्रताड़ित करने वाले सामाजिक दायित्वों से मुक्त होकर पूर्ण स्वतंत्र हो जाना चाहती है.”

-वालेस स्टेगनर की किताब ‘दी अमेरिकन वेस्ट एज ए लिविंग स्पेस’ से उद्धृत.

अमेरिका के साउथ डाकोटा में एक छोटा सी जगह का नाम था कार्थेज। सुव्यवस्थित चहारदीवारियों से घिरे, लकड़ी से ढंके दीवारों के मकानों वाले कार्थेज में रहनेवालों की संख्या महज 274 थी। अमेरिका के उत्तरी मैदानों में बसे इस छोटे से सुस्त शहर में सिर्फ एक राशन का दुकान, एक बैंक, एक गैस स्टेशन और एक शराब का बार – कैबरेट, जहां कॉकटेल पीते हुए और सिगार का मीठा स्वाद लेते हुए वॉयन वेस्टरबर्ग एक अजीब विचारों वाले नौजवान को याद कर रहा था, जिसे वह एलेक्स के नाम से जानता था।

कैबरेट की प्लाईवुड लगी दीवारो पर हिरणों के सिंग, पुराने मिलवॉकी बियर के पोस्टर्स, उड़ान भरते पक्षियों के मंहगे पेंटिंग्स टंगे थे। सिगरेट के धुएं की कई लकीरें,एक साथ वहां बैठे किसानों के बीच से उठ रही थी जिनका धूल से सना चिंतित चेहरा कोयला खदान में काम करनेवालों की याद दिलाता था। वे सब खराब मौसम के कारण दुखी थे क्योंकि सुरजमुखी के खेत इतने सूखे नहीं थे कि उसे काटा जा सके।

क्रिस मैकेंडलेस की लाश मिले दो महीने बीत चुके थे ।

ह्वाईट रसीयन ड्रिंक में बर्फ का टुकड़ा डालते हुए उदासी भरे आवाज में वेस्टरबर्ग ने कहा- ‘एलेक्स यही पीता था। वह बार के उस कोने में बैठा करता था और अपनी आवारगी के अद्भुत किस्से सुनाया करता था। वह घंटो बात कर सकता था। इस शहर के कई लोग एलेक्स को प्यार करने लगे थे। यकीन नहीं हो रहा, उसके साथ ये हादसा कैसे हो गया।’

मजबूत कंधो और सख्त मांसल बदन वाले वेस्टरबर्ग के पास खेती का काम करने के लिए दो ग्रेन एलीवेटर था-एक कार्थेज में और दूसरा कुछ मील दूर एक दूसरे शहर में। पूरी गर्मी वह अपने आदमियों के साथ टेक्सास से लेकर कनाडा के बार्डर तक के खेतों में अपनी एलीवेटर लेकर काम करता था। 1990 के पतझड़ में वह नार्थ सेंट्रल मोंटाना से अपना काम समेटकर वापस लौटने की तैयारी कर रहा था। कट बैंक से अपने एलीवेटर के कुछ पार्ट खरीदकर वापस लौट रहा था कि रास्ते में एक नौजवान को उसने लिफ्ट दी। नौजवान ने अपना नाम एलेक्स बताया।

मैकेंडलेस कद का छोटा था लेकिन उसका बदन मेहनतकश मजदूरों की तरह कठोर और उभरी हुई नसों वाला दिखता था। इस नौजवान की आंखों में कुछ था जो लोगों को अपनी तरफ खींचता था। गहरी काली और भावुक आंखे- जो संकेत करती थी कि उसके अंदर किसी बाहरी प्रजाति का खून बह रहा है-शायद यूनानियों का। कुछ था उसकी आंखों में जिसने वेस्टरबर्ग को उसे अपने पास रखने को मजबूर कर दिया। ऐसा संवेदनशील चेहरा जिसे देखकर स्त्रियां ममत्व से भर उठती हैं, एलेक्स के पास था।

वेस्टरबर्ग एलेक्स का चेहरा याद कर बयां कर रहा था। एलेक्स के चेहरे में गजब का लचीलापन थाः एक क्षण में वह भावनाहीन दिखता था और दूसरे ही पल अचानक जब भावप्रण होकर मुंह खोलता था तब उसके बड़े-बड़े दांतों की दीवारे हंसने के दौरान बाहर छलक पड़ती थी। उसको दूर की चीजें साफ नहीं दिखाई पड़ती था इसलिए स्टील-फ्रेम वाला चश्मा वह पहनता था।

वेस्टरबर्ग को लगा कि एलेक्स को भूख लगी है। एलेक्स को लिफ्ट देने के दस मिनट बाद वेस्टरबर्ग एथरिज शहर में अपने दोस्त के पास एक पैकेज देने के लिए रुका। दोस्त ने दोनों को बीयर पीने के लिए दिया और एलेक्स से पूछा कि वह कितने दिनों से भूखा है। एलेक्स ने स्वीकार किया कि पैसे खत्म हो जाने के कारण उसे दो दिन हो चुके थे फाकाकशी किये हुए। यह सुनकर दोस्त की बीबी ने जल्दी से उसके लिए ढेर सारा खाना बनाया जिसे एलेक्स जल्दी-जल्दी पेट में डालकर वहीं टेबल पर सो गया।

मैकेंडलेस ने वेस्टरबर्ग से कहा कि वह आगे साको के गर्म झरने तक जाएगा, जो यूएस हाईवे 2 से 240 मील दूर था और जिसके बारे में उसने रबर ट्रैंपो से सुन रखा था। रबरट्रैंप, जो गाड़ी से आवारगी करते हैं और लेदरट्रैंप जो पैदल या लिफ्ट लेकर घुमक्कड़ी का मजा उठाते हैं। मैकेंडलेस लेदरट्रैंप था। वेस्टरबर्ग ने उसे बताया कि वह सिर्फ दस मील आगे तक जाएगा, उसके बाद उसे उत्तर की तरफ सनबर्स्ट शहर जाना है जहां खेतों की कटाई के लिए उसका ट्रेलर पड़ा है।  जब सड़क किनारे मैकेंडलेस को उतारने के लिए वेस्टरबर्ग ने गाड़ी रोकी तब तक रात के साढे दस बज चुके थे और घनघोर बारिश हो रही थी। वेस्टरबर्ग ने मैकेंडलेस से कहा कि इस शैतानी बारिश में उसे छोड़ना अच्छा नहीं लगेगा। “तुम्हारे पास तो स्लीपींग बैग है। तुम क्यों नहीं आज की रात सनबर्स्ट के ट्रेलर में गुजार लेते हो?” अगले तीन दिनों तक मैकेंडलेस वेस्टरबर्ग के कामगारों के साथ सुबह से ही, पके सुनहले गेंहू के खेतों के समंदर में कटाई का काम करता रहा। विदा लेते समय मैकेंडलेस से वेस्टरबर्ग ने कहा कि अगर उसे नौकरी की जरुरत हो तो कार्थेज में वह उससे आकर मिले। और, दो हफ्ते बाद मैकेंडलेस कार्थेज शहर में दिख गया।

वेस्टरबर्ग उस क्षण को याद करते हुए कह रहा था। उसने मैकेंडलेस को ग्रेन एलीवेटर को खेत में चलाने की ट्रेनिंग देकर काम पर रख लिया और कम किराए पर रहने के लिए अपने दो मकानों में से एक में कमरा भी दिया।

वेस्टरबर्ग बताता जा रहा था। “मैं कई आवारगी करने वालों को सालों से नौकरी पर रखता रहा हूं। उनमें से अधिकांश काम नहीं करना चाहते थे। लेकिन एलेक्स का रवैया कुछ अलग था। मेरे पास काम करने वाले लोगों में वह अब तक का सबसे ज्यादा मेहनती कामगार था। वह जो करता था, मेहनत से करता था। जिस काम को एलेक्स शुरु करता था उसे पूरा करके ही दम लेता था, बीच में नहीं छोड़ता था। इसे वह नैतिक नियम मानकर चलता था। वह बहुत ज्यादा नैतिक था। उसने अपने लिए काफी बड़े सिद्धांत बना रखे थे।

अपनी तीसरी ड्रिंक पीते हुए वेस्टरबर्ग बोलता जा रहा था। “एलेक्स का दिमाग बेहद तेज था। वह बहुत पढता था। बातचीत में बड़े भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल करता था। मुझे लगता है जिस चीज ने उसे मुसीबत में डाला था वह था उसका बहुत ज्यादा सोचना। वह बहुत ज्यादा दुनिया के इस रुप को समझने की कोशिश करता था कि आखिर लोग एक दूसरे के प्रति इतने बुरे क्यों होते हैं। मैंने दो-तीन बार उसे समझाने की कोशिश की कि इतनी गहराई से जीवन के बारे में सोचकर वह बहुत बड़ी गलती कर रहा है लेकिन एलेक्स कहां समझने वाला था। एलेक्स तो हमेशा किसी प्रश्न का आखिरी उत्तर जानने की कोशिश में लगा रहता है। उसके बाद ही कुछ और सोच-समझ सकता था।“

वेस्टरबर्ग के हाथ एक बार मैकेंडलेस का कागज लगा, जिसमें उसका नाम क्रिस लिखा था, ना कि एलेक्स। वेस्टरबर्ग ने बताया, “उसने कभी नहीं बताया कि उसने नाम क्यूं बदला। उसकी बातों से लगता था कि उसके और उसके परिवार बीच का रिश्ता कुछ ठीक नहीं है। लेकिन मैं किसी के व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप नहीं करता इसलिए मैंने उससे कभी कुछ नहीं पूछा।“

मैकेंडलेस को अगर अपने परिवार से कोई दुराव था तो उसने वेस्टरबर्ग और उसके कामगारों में नया परिवार पाया था जो कार्थेज के उस मकान में एक साथ रहते थे. मैकेंडलेस को जल्दी ही कार्थेज मोहने लगा। उसे कार्थेज के लोगों की सामान्य और सुगठित जिंदगी, सामान्य रहन-सहन और दोस्ताना व्यवहार पसंद आया। वह जगह दुनिया की मुख्य धारा से कटा हुआ अलग-थलग एक नया जीवन बसाए हुए था, जो मैकेंडलेस को पसंद था। उसने कार्थेज शहर और वायन वेस्टरबर्ग के साथ गहरा जुड़ाव बना लिया था।

तीस से चालीस के बीच की उम्र वाले वेस्टरबर्ग को बचपन में कार्थेज के दंपति ने गोद लिया था। वह किसान के साथ-साथ वेल्डर, बिजनेसमेन, मशीन बनाने वाला, मेकेनिक, कमोडिटी जांचकर्ता, एयर पायलट, कम्प्यूटर प्रोग्रामर, इलेक्ट्रानिक सामान ठीक करनेवाला और वीडियोगेम रिपेयरमेन भी था। वेस्टरबर्ग एक ऐसे ब्लैक बॉक्स को बनाकर बेचने की योजना मे लगा हुआ था जिसके जरिए लोग बिना पैसा चुकाए केबल टीवी के कार्यक्रम देख सकते थे। एबबीआई को इसकी भनक लगी और वेस्टरबर्ग गिरफ्तार हो गया। उसे चार महीने की जेल हुई। वेस्टरबर्ग के चले जाने के बाद ग्रेन एलीवेटर से खेत काटने का काम बंद रहा। 23 अक्टूबर को मैकेंडलेस ने कार्थेज छोड़ दिया और फिर से आवारा जीवन जीना शुरु कर दिया। कार्थेज के साथ मैकेंडलेस का गहरा भावनात्मक लगाव था। जाते-जाते वह वेस्टरबर्ग को लियो टॉल्सटॉय की वार एन्ड पीस किताब देकर गया जिसके अंदर के टायटल पेज पर उसने लिखा –वेस्टरबर्ग के लिए एलेक्स की ओर से। अक्टूबर 1990।

मैकेंडलेस जब तक पश्चिम की ओर घूमता रहा, वेस्टरबर्ग के संपर्क में रहा। हरेक एक-दो महीने पर वह वेस्टरबर्ग से फोन से बात करता था या चिट्ठी लिखा करता था। उसके बाद उसने सारी चिट्टियां वेस्टरबर्ग के पते पर लिखी और जो भी मिला उसे अपना घर दक्षिण डाकोटा बताया।

सच ये था कि मैकेंडलेस वर्जिनिया के अन्नाडेल में एक उच्च मध्यमवर्गीय परिवार में सुख-सुविधा के बीच पला-बढा था। उसके पिता नासा में एयरोस्पेस इंजिनियर थे जिन्होंने स्पेस शटल के लिए एडवांस रडार सिस्टम का डिजाईन तैयार किया था और अन्य बड़े प्रोजेक्ट पर वह काम कर रहे थे। 1978 में वाल्ट ने अपना एक कन्सल्टिंग फर्म शुरु किया जिसका नाम था-यूजर सिस्टम्स। इस बिजनेस में उन्होंने क्रिस की मां बिली को बिजनेस पार्टनर बनाया। क्रिस का अपनी बहन कैरीन के साथ भावनात्मक लगाव बहुत ज्यादा था। मई, 1990 में क्रिस ने अटलांटा के इमोरी विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन किया जहां वह स्टूडेन्ट न्यूजपेपर का संपादक था और स्तंभ लिखा करता था। उसने वहां इतिहास और मानव विज्ञान की पढाई की थी। वहां उसे एक सम्मान देने का प्रस्ताव हुआ लेकिन यह कहते हुए लेने मना कर दिया कि उपाधि या सम्मान बेहद गैरजरुरी चीजें हैं। वहां से पास करने के बाद क्रिस के पास 24,000 डॉलर बच गए थे, जिससे वह आगे कानून की पढाई करने वाला था।

मैकेंडलेस के पिता ने स्वीकार किया कि वे अपने बेटे को समझ नहीं सके। वाल्ट, बिली और कैरीन जब कॉलेज के डिग्री प्रदान करने वाले सामारोह में क्रिस से मिलने गए थे तब उनको ये मालूम नहीं था कि क्रिस कुछ ही दिन बाद अपना सारा पैसा भूख से लड़ने वाली संस्था ऑक्सफैम अमेरिका नाम के चैरिटी को दान कर देने वाला था।

12 मई, शनिवार को वह सामारोह था। उस सामारोह में मैकेंडलेस की तस्वीर, बिली ने खींची थी जब वह डिग्री लेने जा रहा था। अगले दिन मदर्स डे था और मैकेंडलेस ने अपनी मां को कैंडी, फूल और एक भावप्रण कार्ड दिया था। उसकी मां उस दिन काफी आश्चर्यचकित और खुश हुई थी क्योंकि उसका बेटा उसे दो साल बाद कोई गिफ्ट दे रहा था। मैंकेंडलेस ने अपने घर में यह घोषणा कर रखी थी कि सैद्धांतिक रुप से वह गिफ्ट ना तो देगा और ना ही लेगा।

असल में कुछ दिन पहले वाल्ट और बिली ने क्रिस को नए कार खरीद कर देने की और आगे पढने के लिए खर्च देने की बात कही थी जिसे क्रिस ने मानने से इंकार कर दिया था। मैकेंडलेस का कहना था कि उसके पास पहले से जो कार है, वह अभी बिल्कुल ठीक है। 1982 के डॉटसन B210 मॉडल की वह कार थोड़ी पुरानी दिखने लगी थी लेकिन 128,000 मील चल चुकी इस कार के पार्ट-पुर्जे अभी ठीक से काम कर रहे थे।

उसने कैरीन से बाद में कहा, ‘मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि मेरे मां-बाप नई कार लेने को कह रहे हैं। उन्होंने ये भी कैसे सोच लिया कि आगे की पढाई के लिए कोई खर्च लूंगा। मैंने लाखों बार ये बात दुहराई है कि मेरे पास दुनिया की सबसे अच्छी कार है जिसे मैंने मियामी से अलास्का तक खूब बिना किसी परेशानी के दौड़ाया है और अब तक एक भी समस्या सामने नहीं आयी; जिस कार से मैं इतना प्यार करता हूं कि कभी उसे बेचने की नहीं सोच सकता; इसके बावजूद भी वह मेरी भावनाओं को ना समझकर ये सोचते हैं कि मैं नई कार स्वीकार कर लूंगा! मैं आगे से बिल्कुल सावधान रहूंगा कि उनसे कोई भी गिफ्ट ना लूं क्योंकि वह सोचेंगे कि मेरा सम्मान कर उन्होंने मुझे खरीद लिया है।‘

क्रिस की डॉटसन कार सेकेन्डहेंड थी जिसे उसने तब खरीदा था जब हाईस्कूल में था। उसके बाद वह कई बार स्कूल की छुट्टियों में अकेले इस कार को लेकर लम्बे ट्रिप पर निकल जाता था। ग्रेजुएशन के आखिरी सप्ताह में उसने ऐसे ही एक बार मां-बाप से कहा था कि अगली गरमी वह रोड की जिंदगी जीते हुए बिताना चाहता है। उसने कहा था,”मैं सोचता हूं कि कुछ दिन के लिए मैं गायब हो जाउंगा।“

उसके मां-बाप ने उसके घोषणा को उस पल गंभीरता से नहीं लिया। वाल्ट ने प्यार से अपने बेटे से कहा,” जाने से पहले हमसे जरुर मिल लेना”। क्रिस यह सुनकर मुस्कुराकर हां कहने की मुद्रा में सिर को हल्के से ऊपर-नीचे किया था जिससे वाल्ट और बिली ने समझा कि कहीं जाने से पहले मैकेंडलेस उनसे मिलने अन्नाडेल जरुर आएगा।

जून के आखिरी सप्ताह में क्रिस ने अटलांटा से अपने मां-बाप के ग्रेजुएशन फाईनल का ग्रेड रिपोर्ट भेजा जिसके साथ एक चिट्ठी भी थी जिसमे लिखा थाः

‘यह मेरे पढाई के रिपोर्ट की आखिरी कॉपी है। अच्छे ग्रेड से पास हुआ हूं। आपने पेरिस से जो तस्वीरें, शेविंग के सामान और पोस्टकार्ड भेजे हैं उसके लिए धन्यवाद। ऐसा लगता है कि ट्रिप का आपने काफी आनंद लिया है। बहुत मजा आया होगा। अभी कुछ नया नहीं है कहने को। गर्मी और उमस का मौसम शुरू हो चुका है।‘

यह क्रिस का अपने परिवार के साथ हुआ आखिरी संवाद था। ग्रेजुएशन के फाईनल में ही क्रिस ने कॉलेज कैंपस छोड़ दिया था और साधु जैसे कमरे में रहने लगा था जिसमें जमीन पर एक पतला गद्दा बिछा था और टेबल था। वह कमरे को हमेशा इतना साफ और व्यवस्थित रखता था जैसे कि मिलिटरी बैरक हो। उसने कोई फोन नहीं रखा था इसलिए वाल्ट और बिली उसे कॉल नहीं कर पाते थे। अगस्त 1990 के शुरूआत के बाद तक वाल्ट और बिली को जब क्रिस की कोई खबर नहीं मिली तो दोनों अटलांटा चल पड़े। जब वे मैकेंडलेस के कमरे पर पहुंचे तो वह खाली था और उस पर ‘फार रेंट’ लिखा था। मैनेजर ने कहा कि जून के अंत में ही क्रिस ने कमरा छोड़ दिया था। वाल्ट और बिली जब वापस लौटे तो उनके द्वारा क्रिस को लिखी गई सारी चिट्ठियां डाक से वापस लौट चुकी थी।

“क्रिस ने डाकखाने को उन चिट्ठियों को एक अगस्त तक रोककर रखने को कहा था इसलिए हम जान नहीं पाए कि आगे कुछ होने जा रहा है।‘ बिली कह रही थी, “इस बात से हम चिंतित हो गए।“

तब तक क्रिस बहुत दूर जा चुका था। पांच सप्ताह पहले ही अपने कार में सामान लादकर वह पश्चिम की ओर बिना कोई मंजिल तय किए चल पड़ा था। यह ट्रिप ऐतिहासिक साबित होने वाला था, सबकुछ उलट-पलट कर देनेवाला।

क्रिस ने चार साल तक ग्रेजुएशन करते हुए एक निरर्थक ड्यूटी सी लगने वाले काम को अंजाम दिया था। लेकिन अब हर भार से वह मुक्त था; अपने माता-पिता और दोस्तों की घुटन भरी दुनिया से आजाद था; अतिभौतिकता और सुरक्षित दुनिया को छोड़ चुका था,जिसमें जीकर उसे लगता कि अपने अस्तित्व से वह कट गया है।

अटलांटा के पश्चिम दिशा में जाते हुए उसने अपने लिए एक नयी दुनिया खोजनी शुरु की जिसमें वह अपने अनुभवों के साथ पूर्ण रुप से मुक्त रह सके। उस जीवन की शुरुआत करते हुए उसने सबसे पहले अपना नाम बदल लिया।

अब वह क्रिस मैकेंडलेस नहीं था। नया नाम था- एलेक्जेंडर सुपरट्रैंप, जो अब अपना सबकुछ खुद तय कर रहा था।

….जारी…

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भोगवादी जीवन से उबे आदमी की आवारगी (भाग एक)

अमेरिका के भोगवादी जीवन से ऊबकर क्रिस्टोफर ने वापस खुद को जानने के लिए आवारगी का रास्ता चुना। अपने सारे पैसे दानकर और अपने सारे परिचय-पत्र फेंककर अपने परिवार को बिना कुछ बताए उसने गुमनामी और घुमक्कड़ी जीवन जीना शुरू किया। दो साल बाद वह अलास्का के निर्जन इलाके में जाकर रहना शुरू कर दिया।

वहां जीवन की सारी विपरीत परिस्थितियों से लड़ते हुए उसने जीवन की खोज जारी रखी। वह ऐसा क्यों बना… अलास्का में उसके साथ क्या हुआ.. यह सब-कुछ जॉन क्राउकर नाम के पत्रकार ने बहुत शोध के बाद अपने किताब ‘Into the wild’ में लिखा। सीन पेन ने इसी नाम से एक बेहतरीन फिल्म बनाई जो विश्व के सौ महान सिनेमा में गिनी जाती है। ‘Into the wild’ का हिंदी में अनुवाद कर रहे हैं युवा पत्रकार राजीव कुमार सिंह। राजीव की

राजीव कुमार सिंह
राजीव कुमार सिंह
इच्छा है कि उनके परिचय में लिखा जाए- एक बेरोजगार पत्रकार जिसे एक अदद नौकरी की तलाश है। राजीव से संपर्क rajeevsinghemail@gmail.com के जरिए किया जा सकता है। राजीव ने इस उपन्यास का अनुवाद करके पत्रकारिता क्षेत्र में दस्तक दी है। उनके अनुवाद में कई कमियां संभव है। पर इसे एक युवा पत्रकार का शुरुआती गंभीर प्रयास मानते हुए अनुवाद की कमियों को अनदेखा किया जाना चाहिए। -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


अलास्का के आवारा रास्तों पर (क्रिस्टोफर मैकेंडलेस की जीवनी)

बियाबान की ओर

अमेरिका के अलास्का सिटी में फेयरबैंक से मीलों आगे बर्फीले निर्जन इलाके में जिम गिलियन की नजर दूर सड़क किनारे खड़े किसी अंजाने पर पड़ी जो ठंड से ठिठुर रहा था औऱ लिफ्ट की गुजारिश में अंगूठा उठाए इशारे कर रहा था। वह अलास्का के उस बर्फीले बियाबान में और आगे जाना चाहता था। अठारह-उन्नीस साल के उस नौजवान के पीठ पर सेमीऑटोमेटिक रायफल टंगा था जिसे देखकर अलास्का के इस फोर्टी-नाइन्थ स्टेट में शायद ही कोई मोटरवाला लिफ्ट देने के लिए रुकता। लेकिन, गिलियन ने उसके दोस्ताना हाव-भाव को देखकर सड़क के किनारे की ओर अपनी ट्रक रोकी और उस बच्चे को अंदर आने को कहा।

नौजवान उछलकर ट्रक में चढा और अपना नाम एलेक्स बताया।

‘एलेक्स’- गिलियन प्रश्न करने की मुद्रा में बोला। वह एलेक्स का पूरा नाम जानना चाहता था।

“सिर्फ एलेक्स’- नौजवान ने उसके जिज्ञासा पर पानी फेर दिया। पांच फीट सात-आठ ईंच का गठीले बदन वाले एलेक्स ने अपनी उम्र 24 साल बताई और अपना घर दक्षिण डाकोटा बताया। उसने बताया कि वह सुदूर अलास्का मे देनाली नेशनल पार्क के अंतिम छोड़ पर उतरेगा और आगे की झाड़ियों वाले रास्ते से पैदल चलकर दुनिया को छोड़कर और लोगों से दूर अकेले में कुछ महीने बिताएगा।

पेशे से इलेक्ट्रिसियन गिलियन देनाली नेशनल पार्क वाले रास्ते पर 240 मील दूर एंकरेज जा रहा था; उसने एलेक्स से कहा कि वह जहां चाहेगा, उसे वह वहां तक छोड़ देगा। गिलियन को एलेक्स के बैग का वजन बमुश्किल 25-30 पौंड लग रहा था। शिकार का शौकीन और जंगलों में समय बिता चुके गिलियन को इस बात ने चौंकाया क्योंकि वह जानता था कि इतने कम सामान के सहारे ऐसे निर्जन इलाके में महीनों नहीं बिताया जा सकता जबकि अभी बसंत आने में देर है और अलास्का में चारों तरफ जमीन पर सिर्फ बर्फ बिछा है। गिलियन याद करने लगा कि इस तरह के ट्रिप पर वह इतने कम सामान के साथ कभी नहीं गया और जाना संभव भी नहीं था।

धूप निकल जाने से दिन धीरे-धीरे निखर रहा था। जब ट्रक तनाना नदी के किनारे के उंचे ढलानों से नीचे उतर रही थी तब एलेक्स दूर तक दक्षिण में फैले तेज और सर्द हवाओं में झूमते जंगल और पहाड़ियों से भरे दृश्य को देखने में खो गया। गिलियन अचंभित था। उसने सोचा कि कहीं वह किसी क्रेजी आवारा को तो ट्रक में नहीं बैठा लिया है जो बदनाम जैक लंडन की नेचर फैंटेसी जीने के लिए उत्तर के इस निर्जन में भागता है। अलास्का वैसे भी इस तरह के स्वप्नजीवी और समाज में मिसफिट लोगों का गढ रहा है जो सोचते हैं कि उत्तर के आखिरी छोड़ पर शुद्ध हवाओँ वाला ये सुनसान-विस्तार फलक उसके जीवन के सभी जख्मों को भर देगा।

गिलियन जानता था कि अलास्का से बाहर रहने वाले लोग मैगजीनों में अलास्का के बारे में पढकर फैंटेसी में डूब जाते हैं औऱ अपना बोरिया-बिस्तरा उठाकर यह सोचकर चल देते हैं कि वह दुनिया-समाज से दूर स्वर्ग में जीने जा रहे हैं जहां उन्हें बेहतर जीवन मिलेगा। लेकिन जब वह यहां पहुंचते हैं तब मैगजीन में लिखे झूठ का पता उन्हें चलता। यहां की जंगली झाड़ियां किसी को आशा, आनंद और जीवन नहीं देती। बड़ी-बड़ी नदियों का बहाव बहुत तेज है। यहां के मच्छड़ आदमी को जिंदा खा जाने को तैयार रहते हैं। यहां शिकार के लिए जंगली-जानवर भी बहुत कम हैं। यहां का जीवन पिकनिक नहीं है।

फेयरबैंक से देनाली पार्क के अंतिम छोड़ तक जाने में लगभग दो घंटे लगे। एलेक्स की बातें सुनकर गिलियन को वह पागल सा लगा। फिर भी, गिलियन को उसकी चिंता हुई। एलेक्स ने बताया कि उसके बैग में सिर्फ दस पाउंड चावल है। अप्रील की इतनी भयानक सर्दी को झेलने के लिए एलेक्स ने पर्याप्त कपड़े भी नहीं लिए थे। एलेक्स के सस्ते चमड़े का जूता वाटरप्रूफ और सर्दी से बचाने वाला नहीं था। उसका रायफल भी महज .22 बोर की क्षमता वाला था जिससे बड़े जानवरों का शिकार करना मुश्किल था, जिसे मारकर वह ऐसे बियाबान में ज्यादा दिन तक खाने का इंतजाम कर सकता था। उसके पास और कोई हथियार नहीं था। दिशा का पता लगाने के लिेए कम्पास भी नहीं था। उसके पास सिर्फ एक पुराना मैप था।

फेयरीबैंक से अलास्का पहाड़ियों के बीच के रास्ते में नेनाना नदी पर बने पुल से जब ट्रक गुजर रहा था तो एलेक्स ने नदी के तेज धार को देखकर कहा कि उसे नदी के पानी से डर लगता था। एक साल पहले मैक्सिको में वह समंदर में डोंगी लेकर निकल पड़ा था और वह डूबने ही वाला था कि तेज लहर के तूफान ने उसे किनारे ला पटका। कुछ देर बाद एलेक्स ने मैप निकाला और उस पर लाल निशान के द्वारा चिह्नित किए गए एक रास्ते के बारे में बताया जिसे स्टेम्पेड ट्रेल कहा जाता था। इस रास्ते का निशान अलास्का के रोडमैप पर भी नहीं मिलता था। इस रास्ते पर शायद ही आज तक कोई चला था। एलेक्स ने बताया कि वह रास्ता 40 मील का था और वह रास्ता आगे चलकर धीरे-धीरे गुम हो जाता था। माउंट मैकिनले पहाड़ों के उस दिशाहीन उत्तरी इलाके में एलेक्स जाना चाहता था।

गिलियन को एलेक्स की योजना मूर्खतापूर्ण लगी और उसने एलेक्स को लौट जाने को कहा। गिलियन ने एलेक्स से कहा कि वहां उसे शिकार करने के लिए आसानी से कोई जानवर नहीं मिलेगा। जब उसकी बातों का एलेक्स पर कोई असर नहीं हुआ तो गिलियन ने उसे वहां के खतरनाक भालुओं की कहानी सुनाकर डराने की कोशिश की। एलेक्स बिल्कुल नहीं डरा। उसने कहा कि भालू के आने पर वह पेड़ पर चढ जाएगा। तब गिलियन ने बताया कि उस जगह कोई बड़ा पेड़ नहीं है, जिसे भालू गिरा नहीं सकता। लेकिन एलेक्स अपने इरादे से एक ईंच पीछे नहीं नहीं हटा। उसे गिलियन ने जो-जो कहा, वह उसे उसका जबाब देता गया। गिलियन ने उसे अपने साथ एंकरेज शहर चलने को कहा जहां वह उसे जरूरत के सामान खरीद देगा; उसके बाद वह जहां जाना चाहे, चला जाय। एलेक्स ने यह कहते हुए गिलियन का प्रस्ताव ठुकरा दिया कि उसके पास जितना सामान है, उसे वह अपने लिए काफी समझता है।

‘क्या तुम्हारे पास शिकार करने का लाईसेंस है’ गिलियन के इतना पूछने पर एलेक्स ने व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ कहा, “नहीं, लाईसेंस नहीं है। मैं कैसे अपना पेट भरूंगा, सरकार को इससे कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए। मारो, साले उसके नियम-कानुनों को।”

क्या तुम्हारे मां-बाप या दोस्त तुम्हारे इस आवारगी के बारे में जानते हैं- गिलियन के ऐसा पूछने पर एलेक्स ने कहा कि उसकी अपने परिवार से दो साल से बातचीत नहीं हुई थी और उसके इस योजना के बारे में किसी को ऩहीं मालूम। ” मैं अपने उपर आए किसी भी खतरे से अकेले लड़ सकता हूं।” एलेक्स की दृढता देखकर गिलियन को लगा कि वह सच में यह जुनुनी था।

एलेक्स जल्दी से जल्दी स्टेम्पेड ट्रेल को पारकर दिशाहीन रास्ते की ओर बढ जाना चाहता था। स्टेम्पेड ट्रेल के आखिरी छोड़ तक जाने में गिलियन के ट्रक को तीन घंटे लगे। कुछ दूर तक तो सड़क अच्छी थी लेकिन बाद का रास्ता बेहद खराब था। चारों तरफ बर्फ ही बर्फ था। गर्मियों में यह रास्ता चलने लायक रहता है लेकिन जाड़े में नहीं। हाईवे से स्टेम्पेड ट्रेल पर दस मील आगे जाने पर गिलियन को लगा कि आगे जाने पर ट्रक के फंसने का खतरा है। उत्तरी अमेरिका के विशालकाय पहाड़ों की चोटियों क्षितिज को चूमती हुई चमक रही थी।

ट्रक रुका और एलेक्स उतर गया। एलेक्स ने गिलियन को अपने पास बची हुई आखिरी संपत्ति; घड़ी, कंघी और 85 सेंट देने की कोशिश की लेकिन गिलियन ने नहीं लिया।

“अगर तुम नहीं भी लोगे, फिर भी मैं इसे फेंक दूंगा। मैं नहीं जानना चाहता कि कितना समय हुआ है .या आज कौन सा दिन है या मैं अभी किस जगह पर हूं। ये सब बातें जानना निरर्थक है।” एलेक्स हंसते हुए बोला। इससे पहले कि एलेक्स अपने रास्ते पर जाना शुरु करता, गिलियन ने ट्रक के सीट के पीछे रखे रबड़ के मजबूत, पुराने जूते को एलेक्स को देते हुए कहा, “इसे रख लो। ये थोड़े बड़े हैं, तुम इसे अपने जूते को उपर से पहन लो। तुम्हारा पैर गर्म रहेगा।”

“मुझपर कितना एहसान करोगे गिलियन?”

“कोई बात नहीं, एलेक्स”- गिलियन ने उसे अपना फोन नंबर दिया, जिसे एलेक्स ने अपने नाईलॉन के वॉलेट में संभालकर रख लिया।

“एलेक्स अगर तुम जिंदा लौटे तो मुझे फोन करना। मैं तुमको बताउंगा कि ये पुराने जूते तुम मुझे कैसे लौटाओगे।”

गिलियन की पत्नी ने उसे लंच के लिए सैंडविच, पनीर और कॉर्नचिप्स दिया था, उसे भी उसने एलेक्स को दे दिया। एलेक्स ने गिलियन को अपना कैमरा देकर उसे एक तस्वीर लेने को कहा। कैमरा वापस लेकर धीरे-धीरे एलेक्स अपने रास्ते पर चल पड़ा और बर्फीली वादियों में गिलियन की नजर से ओझल हो गया। मंगलवार, 28 अप्रैल 1992 का दिन था वह। गिलियन वापस हाईवे पर लौट गया। एंकरेज के रास्ते पर एक पुलिस चौकी को उसने एलेक्स के बारे में बता दिया। गिलियन ने सोचा कि एलेक्स को भूख लगेगी तो वह वापस लौट आएगा। लेकिन एलेक्स नहीं लौटा।

गुमशुदा पगडंडी पर एक बस की अंजान त्रासदी

स्प्रूस के काले घने जंगल उस बर्फीले रास्ते के दोनों तरफ खड़े थे। हवा के झोंकें पेड़ों के ऊपर जमे बर्फ के सफेदी को उड़ा ले गए थे और कम रौशनी में एक-दूसरे की तरफ झुके हुए ये बेहद डरावने और खतरनाक लग रहे थे। चारों तरफ गहरी शान्ति छाई थी। वह जगह इतनी अकेली, सुनसान, जीवन- विहीन और सर्द थी कि उस माहौल को उदासी भरा भी नहीं कहा जा सकता था। लेकिन ऐसे माहौल के अंदर एक स्याह हंसी छुपी थी, ऐसी हंसी जो उदासी से भी ज्यादा दर्द देनेवाली हो; ऐसी हंसी जिसमें खुशी का नामो-निशान न हो; बर्फ के क्रिस्टल से भी ज्यादा सर्द हंसी, जिसमें हमेशा खुद को सही कहने वाली क्रूरता हो। जीवन की निरर्थकता और जीवन जीने के प्रयासों को देखकर आत्मा की अतल गहराईयों से निकली एक अबूझ हंसी। कुछ ऐसी ही हंसी अपनी नीरवता में छुपाए था यह सर्द दिलवाला, जंगली और खतरों से भरा था उत्तर का ये सुनसान सरजमीं।  (जैक लंडन की किताब ह्वाईट फैंग से उद्दृत)

कांतिष्णा मैदान के ऊपर झुके हुए माउंट मैकिनले के विशाल पहाड़ों की सीमा शुरु होने से ठीक पहले  अलास्का रेंज के पहाड़ों के उत्तरी किनारे पर ऊंचा उठते और नीचे ढलान वाले आऊटर रेंज कहलाने वाली छोटे रिजों की श्रृंखला जमीन पर इस तरह लग रही था जैसे बेतरतीब बिस्तर पर कोई मुड़ा-तुड़ा कम्बल पड़ा हो। पूरब से पश्चिम दिशा तक फैले इस आऊटर रेंज के दोनों छोरों के ऊंची चोटियों के बीच पांच मील के इस लहरदार रिज के ऊपर दलदली सतह थी जिसमें झाड़ियों और स्प्रूस के पत्तों और छालों का मिलावट थी। इसी उतार-चढाव वाले घुमावदार रास्ते के जमीनी हिस्से पर स्टेम्पेड ट्रेल बनाया गया था, जिस पर चलकर क्रिस मैकेंडलेस आगे गया था।

स्टेम्पेड ट्रेल को 1930 में अलास्का के अर्ल पिलग्रिम ने बनवाया था। अर्ल पिलग्रिम अलास्का के महान माईनर थे जिन्होंने तालकोट नदी के पास स्टेम्पेड क्रीक पर मौजूद एन्टीमनी धातु के अयस्कों को ढोने के लिए यह रास्ता बनवाया था। 1961 में फेयरबैंक के युतान कंस्ट्रक्शन कम्पनी ने इस रास्ते को बेहतर बनाने का ठेका लिया। इस कम्पनी ने इसे मजबूत सड़क बना दिया ताकि ट्रक के द्वारा अयस्कों को ढोया जा सके। सड़क बनाने वाले मजदूरों को रहने के लिए कम्पनी ने तीन बसों को रखा, जिसमें सोने के लिए एक बेड और रसोई के लिेए स्टोव सहित अन्य सामान रखा था। इस प्रोजेक्ट को 1963 में रोक दिया गया। तब तक लगभग पचास मील सड़क बन चुकी थी लेकिन नदियों पर एक भी पुल नहीं बनाया जा सका था जिसके कारण बरसात मौसम में बाढ वाले इन ऩदियों को पार करना असंभव सा था। प्रोजेक्ट के रुकने के बाद युतान दो बसों को वापस ले आई, लेकिन एक बस उसने शिकारियों के ठहरने के लिए छोड़ दिया। उसके तीन दशक बाद, सड़क का नामो-निशान मिट चला था और उसपर उत्तरी अमेरिकन जंतु बीवरों ने तालाब बना डाले थे और जंगली घनी झाड़ियां उग आयी थी।

युतान द्वारा छोड़ा गया बस वहीं का वहीं था। 1940 में बना जंग खा रहा ये पुराना इंटरनेशनल हार्वेस्टर बस स्टेम्पेड ट्रेल के उस जंगली इलाके में दूर से बड़ी काली मक्खी की तरह लगता था। उसका इंजन नष्ट हो चुका था। खिड़की के शीशे टूट चुके थे और उसके फर्श पर ह्विस्की के पुराने बोतल बिखड़े पड़े थे। उसके ऊपर चढा हरा-उजला पेंट उखड़ रहा था। मौसम इतना खराब रहता था कि साल में छह-सात महीने इस बस को शायद ही किसी आदमी का दर्शन होता होगा।

1980 में देनाली नेशनल पार्क के अंदर कांतिष्णा की पहाड़ियों और उत्तरी पहाड़ी श्रृंखला को शामिल किया गया लेकिन नीचले क्षेत्रों को उसके अंदर नहीं रखा गया जिसमें स्टेम्पेड ट्रेल का आधा हिस्सा आता था। साढे सात मील का यह दायरा तीन ओर से नेशनल पार्क के सुरक्षित क्षेत्र से घिरा था और इसके अंदर भेड़िये, भालू, हिरण, मूज और अन्य जानवर रहते थे। यह रहस्य उन स्थानीय शिकारियों को मालूम था। जैसे ही मूज इस इलाके में निकलने शुरु होते थे, कुछ शिकारी इस बस में आकर अपना डेरा डाल लेते थे।

6 दिसम्बर 1992 में एंकरेज शहर के आटो बॉडी शॉप के मालिक केन थॉम्पसन, उसका एक कर्मचारी गार्डन सेमेल और केन का दोस्त फ्रेडी सॉनसन, अपने-अपने ट्रक में सवार होकर तीनों मूज का शिकार करने के लिेए उस बस की ओर रवाना हुए। वहां तक पहुंचना जोखिम भरा सफर था। स्टेम्पेड ट्रेल सड़क जहां तक ठीक था, वहां से दस मील आगे खराब रास्ते पर चलने के बाद तेक्लानिका हिमनदी मिलता था जिसका बर्फीला पानी पारदर्शी था। एक संकरा रास्ता इस हिमनदी को स्टेमपेड ट्रेल से मिलाता था। उस संकरे रास्ते को पार करने के बाद अचानक सामने तेक्लानिका नदी के तेज बहाव का सामना होता था जो आगे बढने से लोगों को रोक देता था।

थाम्पसन, सेमेल और स्वान्सन भी साहसी अलास्कियन थे। तेक्लानिका नदी के किनारे पहुंचकर तीनों आगे जाने का रास्ता तलाशने लगे। खोजते-खोजते एक ऐसा जगह दिखा जहां नदी की गहराई कम नजर आ रही थी। आगे-आगे थाम्पसन अपना ट्रक लेकर चला। उसके गाड़ी में लगा हुक पीछे से आ रहे गार्डन के ट्रक में लगा था, ताकि गाड़ी के बहने की स्थिति में वह उसे पीछे खींच सके। उसके पीछे सॉनसन की गाड़ी थी। तीनों उस पार सुरक्षित पहुंचने में कामयाब रहे।

उसके आगे ट्रक का जाना मुमकिन नहीं था। तीनों पूरी तैयारी के साथ इधर आते थे। आगे जाने के लिए एक तिपहिया वाहन और एक फोर-व्हीलर ट्रक पर लदा था। दोनों गाडियों को उतारकर तीनों उसे लेकर आगे चल पड़े। तीनों का लक्ष्य उसी खटारे बस तक पहुंचना था, जिसे युतान कम्पनी वहां छोड़ आयी थी। वहां से कुछ सौ गज बाद रास्ते पर वहां रहने वाले एक जल-जंतु वीबर द्वारा बनाए गए कई छोटे-छोटे तालाब थे। डायनामाइट से इन तालाबों का तटबंध तीनों ने उड़ा दिया और पानी बहा दिया। आगे पत्थरों से भरे छोटे-छोटे नाले औऱ घने झाड़ियों को पार करते हुए तीनों दोपहर देर बाद तीनों बस तक पहुंचे। तीनों की नजर बस से करीब पचास फुट की दूरी पर एक युवक औऱ युवती पर पड़ी। दोनों डरे-सहमे से खड़े थे। दोनों एंकरेज शहर से थे।

दोनों मे से कोई बस के अंदर नहीं जा रहा था लेकिन वे बस के इतने करीब खड़े थे कि अंदर से आते दुर्गंध को महसूस कर सकते थे। बस के पिछले हिस्से के दरवाजे के ऊपर लकड़ी से लाल रंग का सिग्नल फ्लैग लगा था, जिसमें फ्लैग के रुप में एक लाल मोजे को बांध दिया गया था। दरवाजा हल्का सा खुला था और इसके ऊपर एक कागज चिपका था जिसपर कुछ लिखा हुआ था। यह सब किसी गड़बड़ की तरफ इशारा कर रहा था।

वह कागज निकोलॉय गोगोल के किताब से फाड़ा गया था और उसके ऊपर अंग्रेजी के बड़े अक्षरों में यह लिखा हूआ थाः-

“एस. ओ. एस. मेरी मदद करो। मैं घायल हूं और मरने वाला हूं। इतना कमजोर हूं कि उठकर चल नहीं सकता। मैं बिल्कुल अकेला हूं। भगवान कसम, मैं मजाक नहीं कर रहा। मेरी जान बचा लो। मैं अपने लिए पास से जंगली बेरी लाने जा रहा हूं। शाम तक लौटूंगा। धन्यवाद, क्रिस मैंकेंडलेस।”

एंकरेज से आया हुआ जोड़ा उस नोट को पढकर और अंदर से आते दुर्गंध के कारण बस के अंदर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। सेमेल हिम्मत जुटाकर आगे बढा। खिड़की के पास से देखने पर अंदर एक रेमिंगटन रायफल, गोलियों का एक डब्बा, आठ या नौ किताबें, कुछ फटे जीन्स, खाना बनाने का सामान और एक मंहगा बैग दिखा। बस के पिछले हिस्से में बेड के ऊपर नीले रंग का एक स्लीपिंग बैग पड़ा था जिसे देखने से लग रहा था कि कुछ उसके अंदर था। लेकिन सेमेल के लिए यह विश्वास करना कठिन था कि अंदर कोई आदमी हो सकता था। गाड़ी के पिछले हिस्से में एक लकड़ी के टुकड़े पर खड़े होकर सेमेल ने उस नीले बैग को हिलाया। उसे अब विश्वास था कि बैग के भीतर कुछ था लेकिन जो भी था, वह ज्यादा वजनी नहीं था। उस बैग के दूसरी तरफ जाकर देखने पर अंदर से एक सिर बाहर निकला हुआ दिखा और तब जाकर सेमेल को पता लगा कि अंदर क्या है। क्रिस्टोफर मैकेंडलेस अलास्का के इस सुनसान में ढाई हफ्ते पहले मर चुका था।

सेमेल ने उस लाश को वहां से निकाल ले जाने की सोची। लेकिन ना तो थाम्पसन के, ऩा ही उसके और ना ही उस जोड़े की गाड़ी में इतनी जगह थी कि इस मरे आदमी को ले जाया जा सके। कुछ देर बाद वहां एक शिकारी पहुंच गया जिसका नाम बुच किलियन था और जो पास के हिली शहर का रहने वाल था।

किलियन के पास आठ चक्केवाली गाड़ी थी। सेमेल ने उसे लाश को गाड़ी से ले जाने को कहा लेकिन किलियन तैयार नहीं हुआ। उसका कहना था कि यह काम अलास्का स्टेट के पुलिस पर छोड़ दिया जाय।

किलियन कोल माईनर था और फायर डिपार्टमेंट में इमर्जेंसी मेडिकल टेक्नीसियन का भी काम करता था। उसके ट्रक पर टू-वे रेडियो था। लेकिन किलियन जब किसी से संपर्क स्थापित कर पाने में असफल रहा तब वह ट्रक लेकर हाईवे की तरफ पीछे लौटा। लगभग पांच मील जाने के बाद उसके रेडियो का संपर्क हिली के रेडियो आपरेटर से हुआ। आपरेटर को उसने पुलिस को यह सूचित करने को कहा कि सुषाना नदी के पास बस में एक आदमी प़ड़ा था जो लगता था कि मर चुका था।

अगली सुबह लगभग साढे आठ बजे एक पुलिस हेलिकॉप्टर तेज गर्जना करता हुआ, धूल और एस्पन की पत्तियों को उड़ाता हुआ बस के करीब उतरा। पुलिस ने बस की बारीकी से जांच की और क्रिस मैकेंडलेस की लाश,उसका कैमरा और डायरी लेकर फिर वापस उड़ चली। उस डायरी में अंतिम दो पन्नों पर क्रिस्टोफर ने अपने आखिरी सप्ताह के बारे में लिखा था। डायरी में कुल 113 प्रविष्टियां लिखी गई थी। हर प्रविष्टि में कुछ रहस्य भरी बातें बहुत कम शब्दों में बयान की गई थी।

क्रिस की लाश को एंकरेज ले जाया गया जहां साईंटिफिक क्राईम डिटेक्शन लेबोरेटरी में उसकी चीड़-फाड़ की गई। शरीर इतने बुरे तरीके से सड़ चुका था कि यह पता लगाना मुश्किल था कि मौत कब हुई थी। जांच करने वाले को किसी प्रकार के अंदरुनी चोट का पता नहीं चला। शरीर में वसा का नामोनिशान नहीं था। मरने से बहुत पहले हड्डियां सूखने लगी थी। क्रिस के मौत का कारण भूखमरी बताया गया।

क्रिस का हस्ताक्षर एस. ओ. एस को लिखे नोट के नीचे लिखा था इसलिए उसके नाम का पता चल गया। उसके कैमरे में खुद अपने द्वारा खींची गई कई तस्वीरें थी जिससे उसके असली हुलिए के बारे में जानकारी हो गई। लेकिन, चूंकि उसके पास कोई पहचान-पत्र नहीं था इसलिेए किसी को यह मालूम नहीं था कि वह कौन था, कहां से आया था और अलास्का में उधर क्या करने गया था?

….जारी…

ठाकुर साहब को दो तीन थप्पड़ रसीद कर बोली- ‘कुत्ते, तेरी यह हिम्मत!’

: उपन्यास – लोक कवि अब गाते नहीं (4) : कल परसों में तो जैसा कि पत्रकार ने लोक कवि को आश्वासन दिया था बात नहीं बनी लेकिन बरसों भी नहीं लगे। कुछ महीने लगे। लोक कवि को इसके लिए बाकायदा आवेदन देना पड़ा। फाइलबाजी और कई गैर जरूरी औपचारिकताओं की सुरंगों, खोहों और नदियों से लोक कवि को गुजरना पड़ा।

बाकी चीजों की तो लोक कवि को जैसे आदत सी हो चली थी लेकिन जब पहले आवेदन देने की बात आई तो लोक कवि बुदबुदाए भी कि, ‘इ सम्मान तो जइसे नौकरी हो गया है।’ फिर उन्हें अपने आकाशवाणी वाले ऑडिशन टेस्ट के दिनों की याद आ गई। जिस में वह कई बार फेल हो चुके थे। उन दिनों की याद कर के वह कई बार घबराए भी कि कहीं इस सम्मान से भी ‘आउट’ हो गए तो ? फिर फेल हो गए तो ? तब तो समाज में बड़ी फजीहत हो जाएगी। और मार्केट पर भी असर पड़ेगा। लेकिन उन्हें अपनी किस्मत पर गुमान था और पत्रकार पर भरोसा। पत्रकार पूरे मनोयोग से लगा भी रहा। बाद में तो उसने इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया।

और अंततः लोक कवि के सम्मान की घोषणा हो गई। बाकी तिथि, दिन, समय और स्थान की घोषणा शेष रह गई थी। इसमें भी बड़ी दिक्कतें पेश आईं। लोक कवि एक रात शराब पी कर होश और पेशेंस दोनों खो बैठे। कहने लगे, ‘जहां कलाकार हूं वहां हूं। मुख्यमंत्री के यहां तो भडुवे से भी गई गुजरी स्थिति हो गई है हमारी।’ वह भड़के, ‘बताइए सम्मान के लिए अप्लीकेशन देना पड़ा जैसे सम्मान नहीं नौकरी मांग रहे हों। चलिए अप्लीकेशन दे दिया। और भी जो करम करवाया कर दिया। सम्मान ‘एलाउंस’ हो गया। अब डेट एलाउंस करवाने में पापड़ बेल रहा हूं। हम भी और पत्रकार भी। वह और जोर से भड़के, ‘बताइए इ हमारा सम्मान है कि अपमान! बताइए आप ही लोग बताइए!’ वह दारू महफिल में बैठे लोगों से प्रश्न पूछ रहे थे। पर इस के भी उत्तर में सभी लोग ख़ामोश थे। लोक कवि की पीर को पर्वत में तब्दील होते देख सभी लोग दुखी थे। चुप थे। पर लोक कवि चुप नहीं थे। वह तो चालू थे, ‘बताइए लोग समझते हैं कि मैं मुख्यमंत्री का करीबी हूं, मेरे गाए बिना उनका भाषण नहीं होता और न जाने क्या-क्या!’ वह रुके और गिलास की शराब देह में ढकेलते हुए बोले, ‘लेकिन लोग का जानें कि जो सम्मान बंबई के भडुवे बेभाव यहां से बटोर कर ले जा रहे हैं वही सम्मान यहां के लोग पाने के लिए अप्लीकेशन दे रहे हैं। नाक रगड़ रहे हैं।’ इस दारू महफिल में संयोग से लोक कवि का एकालाप सुनते हुए चेयरमैन साहब भी उपस्थित थे लेकिन वह भी सिरे से ख़ामोश थे। दुखी थे लोक कवि के दुख से। लोक कवि अचानक भावुक हो गए और चेयरमैन साहब की ओर मुख़ातिब हुए, ‘जानते हैं, चेयरमैन साहब, ई अपमान सिर्फ मेरा अपमान नहीं है सगरो भोजपुरिहा का अपमान है।’ बोलते-बोलते अचानक लोक कवि बिलख कर रो पड़े। रोते-रोते ही उन्होंने जोड़ा, ‘एह नाते जे ई मुख्यमंत्री भोजपुरिहा नहीं है।’

‘ऐसा नहीं है।’ कहते-कहते चेयरमैन साहब जो बड़ी देर से ख़ामोशी ओढ़े हुए लोक कवि के दुख में दुखी बैठे थे, उठ खड़े हुए। वह लोक कवि के पास आए खड़े-खड़े ही लोक कवि के सिर के बालों को सहलाया, उनकी गरदन को हौले से अपनी कांख में भरा लोक कवि के गालों पर उतर आए आंसुओं को बड़े प्यार से हाथ से ही पोंछा और पुचकारा। फिर आह भर कर बोले, ‘का बताएं अब हमारी पार्टी की सरकार नहीं रही, न यहां, न दिल्ली में।’ वह बोले, ‘लेकिन घबराने और रोने की बात नहीं। कल ही मैं पत्रकार को हड़काता हूं। दो-एक अफसरों से बतियाता हूं। कि डेट डिक्लेयर करो!’ वह थोड़ा अकड़े और बोले, ‘ख़ाली सम्मान डिक्लेयर करने से का होता है?’ फिर वह लोक कवि के पास ही अपनी कुर्सी खींच कर बैठ गए। और लोक कवि से बोले, ‘लेकिन तुम धीरज काहे को खोते हो। सम्मान डिक्लेयर हुआ है तो डेट भी डिक्लेयर होगा ही। सम्मान भी मिलेगा ही।’

‘लेकिन कब ?’ लोक कवि अकुलाए, ‘दुई महीना त हो गया।’

‘देखो ज्यादा उतावलापन ठीक नहीं।’ चेयरमैन साहब बोले, ‘तुम्हीं कहा करते हो कि ज्यादा कसने से पेंच टूट जाता है तो का होगा ? जइसे दो महीना बीता चार छः महीना और सही।’

‘चार छः महीना !’ लोक कवि भड़के।

‘हां भई, ज्यादा से ज्यादा।’ चेयरमैन साहब लोक कवि को दिलासा देते हुए बोले, ‘एसे ज्यादा का सताएंगे साले।’

‘यही तो दिक्कत है चेयरमैन साहब।’

‘का दिक्कत है ? बताओ भला ?’

‘आप कह रहे हैं न कि ज्यादा से ज्यादा चार छः महीना !’

‘हां, कह रहा हूं।’ चेयरमैन साहब सिगरेट जलाते हुए बोले।

‘तो यही तो डर है कि का पता छः महीना इ सरकार रहेगी भी कि नहीं। कहीं गिर गिरा गई तो ?’

‘बड़ा दूर का सोचता है तुम भई।’ चेयरमैन साहब दूसरी सिगरेट सुलगाते हुए बोले, ‘कह तुम ठीक रहे हो। इ साले रोज तो अखाड़ा खोल रहे हैं। कब गिर जाए सरकार कुछ ठीक नहीं। तुम्हारी चिंता जायज है कि यह सरकार गिर जाए और अगली सरकार जिस भी किसी की आए, क्या गारंटी है कि इस सरकार के फैसलों को वह सरकार भी माने ही!’

‘तो ?’

‘तो का। कल ही कुछ करता हूं।’ कह कर घड़ी देखते हुए चेयरमैन साहब उठ गए। बाहर आए। लोक कवि के साथ और लोग भी आ गए।

चेयरमैन साहब की एंबेसडर स्टार्ट हो गई और इधर दारू महफिल बर्खास्त।

दूसरी सुबह चेयरमैन साहब ने पत्रकार से इस विषय पर फोन पर चर्चा की, रणनीति के दो तीन गणित बताए और कहा कि, ‘क्षत्रिय हो कर भी तुम इस अहिर मुख्यमंत्री के मुंहलगे हो, अफसरों की ट्रांसफर-पोस्टिंग करवा सकते हो, लोक कवि के लिए सम्मान डिक्लेयर करवा सकते हो, पचासियों और काम करवा सकते हो लेकिन लोक कवि के सम्मान की डेट नहीं डिक्लेयर करवा सकते?’

‘का बात करते हैं चेयरमैन साहब। बात चलाई तो है डेट के लिए भी। डेट भी जल्दी एनाउंस हो जाएगी।’ पत्रकार निश्चिंत भाव से बोला।

‘कब एनाउंस होगी डेट जब सरकार गिर जाएगी तब ? उधर लोक कविया अफनाया हुआ है।’ चेयरमैन साहब भी अफनाए हुए बोले।

‘सरकार तो अभी नहीं गिरेगी।’ पत्रकार ने, गहरी सांस ली और बोला, ‘अभी तो चेयरमैन साहब, चलेगी यह सरकार। बाकी लोक कवि के सम्मान की डेट एनाउंसमेंट ख़ातिर कुछ करता हूं।’

‘जो भी करना हो भाई जल्दी करो।’ चेयरमैन साहब बोले, ‘यह भोजपुरिहों के आन की बात है। और फिर कल यही बात कर के लोक कवि रो पड़ा।’ वह बोले, ‘और सही भी यही है कि इस अहिर मुख्यमंत्री ने किसी और भोजपुरिहा को तो अभी तक इ सम्मान दिया नहीं है। तुम्हारे कहने सुनने से लोक कवि को अहिर मान कर जो कि वह है नहीं किसी तरह सम्मान डिक्लेयर कर दिया लेकिन डेट डिक्लेयर करने में उसकी क्यों फाट रही है?’

‘ऐसा नहीं है चेयरमैन साहब।’ वह बोला, ‘जल्दी ही मैं कुछ करता हूं।’

‘हां भाई, जल्दी कुछ करो कराओ। आखि़र भोजपुरी के आन-मान की बात है!’

‘बिलकुल चेयरमैन साहब !’

अब चेयरमैन साहब को कौन बताता कि इन पत्रकार बाऊ साहब के लिए भी लोक कवि के सम्मान की बात उन की जरूरत और उनके आन की भी बात थी। यह बात चेयरमैन साहब को भी नहीं, सिर्फ लोक कवि को ही मालूम थी और पत्रकार बाऊ साहब को। पत्रकार ने कहीं इसकी फिर चर्चा नहीं की। और लोक कवि ने इस बात को किसी को बताया नहीं। बताते भी कैसे भला? लोक कवि खुद ही इस बात को भूल चुके थे।

डांसर निशा तिवारी की बात !

लेकिन पत्रकार को यह बात याद थी। चेयरमैन साहब से फोन पर बात के बाद पत्रकार की नसें निशा तिवारी के लिए फिर तड़क गई। नस-नस में निशा का नशा दौड़ गया। और दिमाग को भोजपुरी के आन के सवाल ने डंस लिया।

पत्रकार चाहता तो जैसे मुख्यमंत्री से कह कर लोक कवि का सम्मान घोषित करवाया था, वैसे ही उन से कह कर तारीख़ भी घोषित करवा सकता था। पर जाने क्यों ऐसा करने में उसे हेठी महसूस हुई। सो चेयरमैन साहब की बताई रणनीति को तो पत्रकार ने ध्यान में रखा ही खुद भी एक रणनीति बनाई। इस रणनीति के तहत उसने कुछ नेताओं से फोन पर ही बात की। और बात ही बात में लोक कवि के सम्मान का जिक्र चलाया और कहा कि आप अपने क्षेत्र में ही क्यों नहीं इस का आयोजन करवा लेते? कमोवेश हर नेता से उसके क्षेत्र के मुताबिक गणित बांध कर लगभग अपनी ही बात नेता के मुंह में डाल कर उस से पत्रकार ने प्रतिक्रियात्मक टिप्पणी ले ली। एक मंत्री से कहा कि बताइए उसका गृह जनपद और आपका क्षेत्र सटे-सटे हैं तो क्यों नहीं सम्मान समारोह आप अपने क्षेत्र में करवाते हैं, आपकी धाक बढ़ेगी। किसानों के एक नेता से कहा कि बताइए लोक कवि तो अपने गानों में किसानों और उनकी माटी की ही बात गाते हैं और सही मायने में लोक कवि का श्रोता वर्ग भी किसान वर्ग है। किसानों, मेड़, खेत खलिहानों में गानों के मार्फत जितनी पैठ लोक कवि की है, उतनी पैठ है और किसी की? नहीं न, तो आप इसमें पीछे क्यों हैं? और सच यह है कि इस सम्मान समारोह के आयोजन का संचालन सूत्र सही मायने में आपके ही हाथों होना चाहिए। जब कि मजदूरों की एक बड़ी महिला नेता और सांसद से कहा कि शाम को थक हार कर मजदूर लोक कवि के गानों से ही थकावट दूर करता है तो मजदूरों की भावनाओं को समझने वाले गायक का सम्मान मजदूरों के ही शहर में होना चाहिए। और जाहिर है सभी नेताओं ने लोक कवि के सम्मान की क्रेडिट लेने, वोट बैंक पक्का करने के फेर में लोक कवि का सम्मान अपने-अपने क्षेत्रों में कराने की गणित पर अपनी-अपनी टिप्पणियों में जोर मारा। बस पत्रकार का काम हो गया था। उसने दो एक दिन और इस चर्चा को हवा दी और हवा ने चिंगारी को जब शोला बनाना शुरू कर दिया तभी पत्रकार ने अपने अख़बार में एक स्टोरी फाइल कर दी कि लोक कवि के सम्मान की तारीख़ इस लिए फाइनल नहीं हो पा रही है कि क्यों कि कई नेताओं में होड़ लग गई है। अपने-अपने क्षेत्र में लोक कवि का सम्मान हर नेता करवाना चाहता है। तब जब कि पत्रकार भी जानता था कि योजना के मुताबिक लोक कवि का सम्मान उनके गृह जनपद में ही संभव है फिर भी लगभग सभी नेताओं की टिप्पणियों को वर्बेटम कोड करके लिखी इस ‘स्टोरी’ से न सिर्फ लोक कवि के सम्मान की तारीख़ जल्दी ही घोषित हो गई बल्कि उन के गृह जनपद की जगह भी घोषित हो गई। साथ ही लोक कवि की ‘लोकप्रियता’ की पब्लिसिटी भी हो गई।

लोक कवि की लय इन दिनों कार्यक्रमों में देखते ही बनती थी। ऐसे ही एक कार्यक्रम में पत्रकार भी पहुंच गया। ग्रीन रूम में बैठ कर शराब पीते हुए बार-बार कपड़े बदलती हुई लड़कियों की देह भी वह कभी कनखियों से तो कभी सीधे देखता रहा। पत्रकार की मयकशी में मंच से आते-जाते लोक कवि भी शरीक होते रहे। दो तीन लड़कियों को भी चोरी छुपे पत्राकर ने दो एक पेग पिला दी। एक लड़की पर दो चार बार हाथ भी फेरा। इस फेर में डांसर निशा तिवारी को भी उसने पास बुलाया। लेकिन वह पत्रकार के पास नहीं फटकी। उलटे तरेरने लगी। पत्रकार ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और शराब पीता रहा। जाने उसकी ठकुराई उफना गई कि शराब का सुरूर था कि निशा की देह की ललक, चद्दर ओढ़ कर कपड़े बदलती निशा को पत्रकार ने अचानक लपक कर पीछे से दबोच लिया। वह उसे वहीं लिटाने के उपक्रम में था कि निशा तब तक संभल चुकी थी और उसने पलट कर ठाकुर साहब को दो तीन थप्पड़ धड़ाधड़ रसीद किए और दोनों हाथों से पूरी ताकत भर ढकेलते हुए बोली, ‘कुत्ते, तेरी यह हिम्मत!’ ठाकुर साहब पिए हुए तो थे ही निशा के ढकेलते ही वह भड़भड़ा कर गिर पड़े। निशा ने सैंडिल पैर से निकाले और ले कर बाबू साहब की ओर लपकी ही थी कि मंच पर इस बारे में ख़बर सुन कर ग्रीन रूम में भागे आए लोक कवि ने निशा के सैंडिल वाले हाथों को पीछे से थाम लिया। बोले, ‘ये क्या कर रही है ?’ वह उस पर बिगड़े भी, ‘चल पैर छू कर माफी मांग।’

‘माफी मैं नहीं ये मुझसे मांगें गुरु जी!’ निशा बिफरी, ‘बदतमीजी इन्होंने मेरे साथ की है।’

‘धीरे बोलो ! धीरे।’ लोक कवि खुद आधे सुर में बोले, ‘मैं कह रहा हूं माफी मांगो।’

‘नहीं, गुरु जी।’

‘मांग लो मैं कह रहा हूं।’ कह कर लोक कवि बोले, ‘यह भी तुम्हारे लिए गुरु हैं।’

‘नहीं गुरु जी !’

‘जैसा कह रहा हूं फौरन करो!’ वह बुदबुदाए, ‘तमाशा मत बनाओ। और जैसा यह करें करने दो।’ लोक कवि और धीरे से बोले, ‘जैसा कहें, वैसा करो।’

‘नहीं !’ निशा बोली तो धीरे से लेकिन पूरी सख़्ती से। लोक कवि ने यह भी गौर किया कि इस बार उसने ‘नहीं’ के साथ ‘गुरु जी’ का संबोधन भी नहीं लगाया। इस बीच पत्रकार बाबू साहब तो लुढ़के ही पड़े रहे पर आंखों में उनकी आग खौल रही थी। ग्रीन रूम में मौजूद बाकी लड़कियां, कलाकार भी सकते में थे पर ख़ामोशी भरा गुस्सा सबकी आंखों में सुलगता देख लोक कवि असमंजस में पड़ गए। उन्होंने अपनी एक ‘लेफ्टीनेंट’ लड़की को आंखों ही आंखों में निशा को संभालने के लिए कहा और खुद पत्रकार की ओर बढ़ गए। एक कलाकार की मदद से उन्होंने पत्रकार को उठाया। बोले, ‘आप भी ई सब का कर देते हैं बाबू साहब?’

‘देखिए लोक कवि मैं और बेइज्जती बर्दाश्त नहीं कर सकता।’ बाबू साहब दहाड़े, ‘जरा सा पकड़ लिया इस छिनार को तो इसकी ये हिम्मत।’

‘धीरे बोलिए बाबू साहब।’ लोक कवि बुदबुदाए, ‘बाहर हजारों पब्लिक बैठी है। का कहेंगे लोग !’

‘चाहे जो कहें। मैं आज मानने वाला नहीं।’ बाबू साहब बोले, ‘आज यह मेरे नीचे सोएगी। बस! मैं इतना ही जानता हूं।’ नशे में वह बोले, ‘मेरे नीचे सोएगी और मुझे डिस्चार्ज करेगी। इससे कम पर कुछ नहीं!’

‘अइसेहीं बात करेंगे?’ लोक कवि बाबू साहब के पैर छूते हुए बोले, ‘आप बुद्धिजीवी हैं। ई सब शोभा नहीं देता आप को।’

‘आप को शोभा देता है ?’ बाबू साहब बहकते हुए बोले, ‘आपका मेरा सौदा पहले ही हो चुका है। आपका काम तो डन हो गया और मेरा काम ?’

बाबू साहब की बात सुन कर लोक कवि को पसीना आ गया। फिर भी वह बुदबुदाए, ‘अब इहां यही सब चिल्लाएंगे ?’ वह भुनभुनाए, ‘ई सब घर चल कर बतियाइएगा।’

‘घर क्यों ? यहीं क्यों नहीं !’ बाबू साहब लोक कवि पर बिगड़ पड़े, ‘बोलिए आज यह मुझे डिस्चार्ज करेगी कि नहीं ? मेरे नीचे लेटेगी कि नहीं ?’

‘इ का-का बोल रहे हैं ?’ लोक कवि हाथ जोड़ते हुए खुसफुसाए।

‘कोई खुसफुस नहीं।’ बाबू साहब बोले, ‘क्लियर-क्लियर बता दीजिए हां कि ना!’

‘चुप भी रहेंगे कि अइसेही बेइज्जती कराएंगे?’

‘मैं समझ गया आप अपने वायदे से मुकर रहे हैं।’

लोक कवि चुप हो गए।

‘ख़ामोशी बता रही है कि वादा टूट गया है।’ बाबू साहब ने लोक कवि को फिर कुरेदा।

लेकिन लोक कवि फिर भी चुप रहे।

‘तो सम्मान कैंसिल !’ बाबू साहब ने बात जरा और जोर से दोहराई, ‘लोक कवि आपका सम्मान कैंसिल ! मुख्यमंत्री का बाप भी अब आप को सम्मान नहीं दे पाएगा।’

‘चुप रहीं बाबू साहब !’ लोक कवि के एक साथी कलाकार ने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘बाहर बड़ी पब्लिक है।’

‘कुछ नहीं सुनना मुझे !’ बाबू साहब बोले, ‘लोक कवि ने निशा कैंसिल की और मैंने सम्मान कैंसिल किया। बात ख़त्म।’ कह कर बाबू साहब शराब की बोतल और गिलास एक-एक हाथ में लिए उठ खड़े हुए। बोले, ‘मैं चलता हूं।’ और वह सचमुच ग्रीन रूम से बाहर निकल गए। माथे पर हाथ रखे बैठे लोक कवि ने चैन की सांस ली। कलाकारों को हाथ के इशारे से आश्वस्त किया। निशा के सिर पर हाथ रख कर उसे आशीर्वाद दिया, ‘जीती रहो।’ फिर बुदबुदाए, ‘माफ करना !’

‘कोई बात नहीं गुरु जी।’ कह कर निशा ने भी अपनी ओर से बात ख़त्म की। लेकिन लोक कवि रो पड़े। भरभर-भरभर। लेकिन जल्दी ही उन्होंने कंधे पर रखे अंगोछे से आंख पोंछी, धोती की निचली कोर उठाए, हाथ में तुलसी की माला लिए मंच के पीछे पहुंच गए। उन्हीं का लिखा युगल गीत उन के साथी कलाकार गा रहे थे, ‘अंखिया बता रही है लूटी कहीं गई है।’ लोक कवि ने पैरों को गति दे कर थोड़ा थिरकने की कोशिश की और एनाउंसर को इशारा किया कि मुझे मंच पर बुलाओ।

एनाउंसर ने ऐसा ही किया। लोक कवि मंच पर पहुंचे और इशारा कर कंहरवा धुन पकड़ी। फिर भरे गले से गाने लगे, ‘नाचे न नचावै केहू पइसा नचावेला।’ गाते-गाते पैरों को गति दी पर पैर तो क्या मन ने भी साथ नहीं दिया। अभी वह पहले अंतरे पर ही थे कि उनकी आंख से आंसू फिर ढलके। लेकिन वह गाते ही रहे, ‘नाचे न नचावै केहू पइसा नचावेला।’ इस समय उनकी इस गायकी की लय में ही नहीं, उन के पैरों की थिरकन में भी अजीब सी करुणा, लाचारी और बेचारगी समा गई थी। वहां उपस्थित श्रोताओं दर्शकों ने ‘इस सब’ को लोक कवि की गायकी का एक अविरल अंदाज माना लेकिन लोक कवि के संगी साथी भौचक्के भी थे और सन्न भी। लेकिन लोक कवि असहज होते हुए भी गायकी को साधे हुए थे। हालांकि सारा रियाज रिहर्सल धरा का धरा रहा गया था संगतकार साजिंदों का। लेकिन जैसे लोक कवि की गायकी ने बेचारगी की लय थाम ली थी संगतकार भी ‘फास्ट’ की जगह ‘स्लो’ हो गए थे बिन संकेत, बिन कहे।

और यह गाना ‘नाचे न नचावै केहू पइसा नचावेला’ सचमुच विरल ही नहीं, अविस्मरणीय भी बन रहा था। ख़ास कर तब और जब वह ठेका दे कर गाते, ‘हमरी न मानो….’ बिलकुल दादरा का रंग टच दे कर तकलीफ का जो दंश वह बो दे रहे थे अपनी गायकी के मार्फत वह बिसारने वाला था भी नहीं। वह जैसे बेख़बर गा रहे थे, और रो रहे थे। लेकिन लोग उन का रोना नहीं देख पा रहे थे। कुछ आंसू माइक छुपा रहा था तो काफी कुछ आंसू उनकी मिसरी सी मीठी आवाज में बहे जा रहे थे। कुछ सुधी श्रोता उछल कर बोले भी कि, ‘आज तो लोक कवि ने कलेजा निकाल कर रख दिया।’ उनकी गायकी सचमुच बड़ी मार्मिक हो गई थी।

यह गाना अभी ख़त्म हुआ भी नहीं था कि लोक कवि एक दूसरे गाने पर आ गए, ‘माला ये माला बीस, आने का माला!’ फिर कई भगवान, देवी देवताओं से होते हुए वह कुछ महापुरुषों तक माला महिमा का बखान करते इस गाने में तंज, करुणा और सम्मान का कोलाज रचने लग गए। कोलाज रचते-रचते अचानक वह फिर से पहले वाले गाने, ‘नाचे न नचावै केहू पइसा नचावेला।’ पर आ गए। सुधी लोगों ने समझा कि लोक कवि एक गाने से दूसरे गाने में फ्यूजन जैसा कुछ कर रहे हैं। या कुछ नया प्रयोग, नई स्टाइल गढ़ रहे हैं। पर सच यह था कि लोक कवि माला को सम्मान का प्रतीक बता उसे पैसे से जोड़ कर अपने अपमान का रूपक रच रहे थे। अनजाने ही। अपने मन के मलाल को धो रहे थे।

….जारी….

दयानंद पांडेयउपन्यासकार दयानंद पांडेय से संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. इसके पहले के भागों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- 1 2 3

सभ्य मोहल्ला और एक बदचलन की मौत

अजय प्रकाश: वह तो मुसलमान ही था जो इन बच्चों का पेट पाल रहा था, इससे पहले पंजाबी से भी इसीलिए शादी की क्योंकि बिहारी कुछ करता ही नहीं था, सिवाय बच्चा पैदा करने के… : परसों की बात है। दिन के करीब दस बज रहे थे। दुबारा लौट आयी ठंड के बाद मेरी हिम्मत ठंडे पानी से नहाने की नहीं हुई तो सोचा क्यों न धूप में खड़े होकर थोड़ा गरम हो लिया जाये। धूप की गरमी से अगर हिम्मत बंध गयी तो नहा लूंगा, नहीं तो कंपनियों ने महकने का इंतजाम तो कर ही रखा है।

यह सोचकर मैं बालकनी से लगकर सड़क की हरियाली देखने लगा। तभी एक आटो आकर रुका। उसमें से दो औरतें उतरीं। आगे वाली औरत उतरते ही छाती पीटते हुए गला फाड़ रोने लगी। आवाज लोगों के घरों तक पहुंची तो सेकेंडो में सभी घरों की बालकनी बच्चों और महिलाओं से भर गयी। काम पर नहीं गये कुछ मेरे जैसे मर्द भी झांकने लगे। जिनके कमरे नीचे के फ्लोर में थे, वो रोने वाली के आसपास मंडराने लगे। मेरी मां से नहीं रहा गया तो वह नीचे मौका-मुआयना करने के लिए चल दी।

मां के नीचे जाते देख बीबी ने पूछा, कहां जा रही हैं? मां जवाब दिये बगैर चलते बनीं तो सामने से पड़ोसी की बीबी ने कहा, ‘ये देहात से आयी हैं, इसलिए वो तो जाये बिना नहीं मानेंगी। मेरी सास भी ऐसी ही हैं।’ इस बीच दहाड़ मारती औरत आटो से आगे बढ़ते हुए अपने कमरे की ओर चिल्लाते हुए चल पड़ी, ‘अरे हमार बछिया कौन गति भईल तोहार (ओह, मेरी बेटी तेरा क्या हाल हुआ)।’ मेरी बीबी ने उसकी आवाज सुन मुझसे कहा- जरा सुनना तो क्या कह रही है भोजपुरी में। मैं अभी कुछ कहता उससे पहले ही कोने वाली मकान मालकिन अपनी बालकनी से बोल पड़ीं, ‘बिहार की हैं- छपरा की।’ फिर मैंने कहा, ‘उसकी बेटी को कुछ हुआ है।’

अब उस औरत के रोने-घिघियाने की आवाज शब्दों में बदल चुकी थी। सड़क से ग्राउंड फ्लोर और ग्राउंड फ्लोर से फर्स्ट फ्लोर होते हुए हम तक बड़ी जानकारी ये आयी कि रोने वाली औरत की बेटी की लाश चार दिन से किसी सरकारी हॉस्पीटल में पड़ी है। बड़ी जानकारी मिलते ही क्यों…क्यों…क्यों, की आवाज तमाम बालकनियों और फ्लोरों पर गूंजने लगी।

अबकी बड़ी जानकारी का विस्तार आया। वह इस प्रकार से कि रोने वाली औरत की मरने के बाद सड़ रही बेटी चार बच्चों की मां है और वह गली की चौथी मकान में बायें तरफ किराये पर रहती है। इसी मकान में रहते हुए एक सप्ताह पहले बीमार हुई तो किसी ने ले जाकर सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया था और मरने के बाद वहीं पड़ी है। इसके बाद यह सवाल उठा कि क्या वह औरत अकेले ही अस्पताल गयी थी। इस सवाल पर जवाब मिला, ‘नहीं। बीमारी की हालत में औरत ने किसी को फोन कर बुलाया था और वही उसे अस्पताल ले गया था। मगर ईलाज के दौरान औरत मर गयी तो वह छोड़कर भाग गया। तबसे लाश अस्पताल में ही पड़ी है। और, मृत औरत का कोई खोज-खबर रखने वाला नहीं आया तो अगले दिन अस्पताल प्रशासन ने पुलिस को सूचना दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने खोजबीन में औरत के पास से मिले कागज पर लिखे मोबाइल नंबर को मिलाया। पता चला मोबाइल नंबर मृत महिला के पति का है और वह बिहार के छपरा जिला के किसी ब्लॉक का रहने वाला है।’

अब बालकनी पर खड़े मुझ जैसे दुखितों का इंट्रेस्ट सस्पेंस में था कि चार बच्चों की मां, ऊपर से बीमार और चार दिन से अस्पताल में पड़ी सड़ रही और पति यहां से हजार-बारह सौ किलोमीटर दूर पड़ा। आखिर माजरा क्या है? तो अब माजरे की पुख्ता जानकारी कुछ इस प्रकार से पसरी- ”दरअसल जो आदमी उसे अस्पताल में भरती कराने ले गया था वह उसका तीसरा और अंतिम पति था। इससे पहले वह करीब तीन साल एक पंजाबी के साथ रही थी, जबकि शादी उसकी छपरा वाले से हुई थी जो अब उसके मरने के बाद उसकी मां को लेकर दिल्ली आया था।”

यह विशेष जानकारी नीचे वाली चाची ने दिया। बकौल चाची- ”थोड़े दिन पहले एक पंजाबी बैग लेकर आया था और उनसे कह रहा था कि वह अपना बच्चा लेने आया है।” उसने चाची को यह भी बताया कि चैथे नंबर का बच्चा उसी का है और सिर्फ वह उसी को ले जाने आया है। पंजाबी से ही चाची को पता चला था कि चार बच्चों की मां बीमार है और अस्पताल में भर्ती है। तभी किसी महिला ने चाची से पूछ लिया, ‘यानी उसे जो अस्पताल ले गया था वह न पंजाबी था न बिहारी। फिर वह कौन था।’ इसका जवाब एक दूसरी महिला ने दिया जिसके होंठ खूनी आत्माओं की तरह टहटह लाल हो रहे थे- ”अरे वह एक मुसलमान था जिसके साथ वह पिछले कुछ महीनों से रह रही थी।”

इसके बाद बालकनी दुखितों ने हां-हूं करते हुए उस औरत के अस्पताल में सड़ने को भगवान का जायज फैसला माना और औरत की मौत को एक बदचलन की महिला को पापों की मिली सजा से हुई मौत करार दिया। हालांकि उसे जानने वाली एक औरत ने ऐसा कहने पर ऐतराज जताया। कहा भी अगर वह दूसरी-तीसरी शादी नहीं करती तो उसके चार बच्चों की लाश यहां भूख से पड़ी रहती। वह तो मुसलमान ही था जो इन बच्चों का पेट पाल रहा था। इससे पहले पंजाबी से भी इसीलिए शादी की क्योंकि बिहारी कुछ करता ही नहीं था, सिवाय बच्चा पैदा करने के।

बहस थोड़ी और आगे बढ़ी तो पता चला बिहारी पहले किसी रबर की फैक्ट्री में काम करता था मगर काम छूट जाने के बाद पिछले तीन वर्षों से उसे काम ही नहीं मिला। सड़ रही लाश के पक्ष में बोलने वाली महिला ने आगे कहा, ‘किसी की जवानी नहीं फटती है कि वह बेवजह इस गोद से उस गोद में कूदे। बच्चों का मुंह देख लोग पता नहीं क्या-क्या करते हैं।’

तभी किसी ने फिक्र बिखेरी, ‘बेचारे बच्चों को कौन देखेगा।’ बच्चों की बात आयी तो पता चला दो बेटियां और दो बेटे हैं। सबसे बड़ी बेटी करीब 12 साल की है और बाकी सभी बच्चे उससे छोटे हैं। सामने वाले की बीबी ने नीचे परचून की दूकान के पास इशारा कर दिखाया, ‘बड़ी बैठी है उसकी बड़ी बेटी। बाकी तीनों भाई-बहनों को चाय मट्ठी खिला रही है।’ इस दृश्य को महत्वपूर्ण मान सभी ने बालकनी से सिर झुका-झुका कर चाय-मट्ठी का लाइव देखा।

अब बारी लाश को फूंके जाने के बहस को लेकर थी। सड़ रही लाश की मां ने बेटी को एक बार देखने की इच्छा जाहिर की और कहा उसे घर लाया जाये। इस पर सभी बिपर पड़े। तमाशबीनों ने करीब आदेशात्मक ढंग से कहा, ‘सड़ी हुई लाश मुहल्ले में क्यों लानी है, पहले से क्या बिमारियां कम हैं।’ कुछ ने कहा, उस बदचलन ने ऐसा कौन सा महान काम किया है कि अंतिम दर्शन को लाया जाये। आखिरकार तय हुआ कि लाश को अस्पताल से सीधे मशान ले जाया जायेगा।

इस प्रस्ताव पर अस्पताल जाने को लिए दो-चार लोग तैयार हो गये। तैयार होने वालों में मानद पति के क्षेत्र और जाति के लोग थे। इसके अलावा जो लोग मौके पर पहले से खड़े थे, उन्होंने नौकरी या अन्य जरूरी कामों का वास्ता देकर जा पाने में असमर्थथा जाहिर की। हालांकि चलन में ऐसा नहीं है। गाड़ी का इंतजाम हो जाने पर अंतिम संस्कार में जाने वालों से गाड़ी आमतौर पर भर जाती है।

खैर! अब हमारे बीच से सड़ी लाश को राख हुए दो दिन बीत चुके हैं और राख का मानद पति ‘छपरा वाला’, राख का कर्मकांड करने गांव जा चुका है। इस बीच मुहल्लेवालों ने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते हुए मानद पति को ‘रखवाला’ का तमगा दे, राख के बाकी दो पतियों को मजावादी करार दे दिया है। मानद के जाते-जाते एक औचक सवाल मुहल्ले वालों ने उसके लिए जरूर छोड़ा था, ‘मानद, क्या कभी चारों बच्चों में से किसी एक पर भी अपनी औलाद होने का फक्र कर सकेगा।’

और इसी सवाल के साथ कहानी का इंड हो गया था। लोग बालकनी से इस सकून के साथ वापस लौटे थे कि एक बदचलन औरत के मरने, सड़ने और अंततः राख होने में मुहल्ला भागीदार नहीं हुआ और सभ्य बना रहा।

लेखक अजय प्रकाश छात्र राजनीति, मजदूर आन्दोलन से होते हुए पिछले छह वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. फिलहाल हिंदी पाक्षिक पत्रिका ‘द पब्लिक एजेंडा’ में वरिष्ठ संवाददाता और जनज्वार डॉट कॉम के माडरेटर के तौर पर काम कर रहे हैं. इनसे ajay.m.prakash@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता है.

HR vs Hanumaanji

A story told by an IIM professor regarding the side effects of non-systematic working :- After completion of Lanka War Hanumanji was enjoying LTA with his friends. He got an email on his laptop from Accounts requesting him to clear his dues before 31st March – dues related to his tour for bring Sanjivani Booti for Laxmanji. He ignored the first mail. But after 3 – 4 reminders in two days time & receiving a call on CUG Mobile from Accounts Dept., he had to fly to Ayodhya canceling his leave.

He submitted:- TA, DA Bill, Bills of Sushen Vaidya, Hospital Charges incurred for Bharatji when met with an accident during his travel, Cost of Sanjeevani Booti for Laxmanji, (Transport charges)

(1) Where is your tour sanction report ? Asked the HR & ADMIN Dept. Hanumanji got it done sting to concerned officials 2 or 3 times.

(2) Hanumanji claimed T.A. bill for air travel – but he as given only second class sleeper charges. And all other expenses on medical, Sanjeevani Booti, ee of Sushen Vaidya were not reimbursed.
When he asked for the reasons, he was told that:

(a) As per his designation, he is entitled for IInd class sleeper only.

(b) He caot get claim for other things as he does not have bills.

Hanumanji approached Shri Rama and explained him about the deduction on his tour expense report : Ramji ordered the related official to pay for Air travel & other charges as claimed by Hanumanji. The officer came with the rule book & told Shri Ramji “These rules r created by grand father of Dasharathji, If u want to overrule ur forefathers I don’t have any roblem.”

Ramji became speechless. So he thought for another way to compensate Hanuman. He called Hanumanji & gave him the claimed amount in cash, But how can Hanumanji take cash money from Ramji ?

Hanumanji said “How can I take money from you for treating Laxmanji? Laxmanji is equally reverend to me as you are.” Later in his heart of hearts Hanumanji thought “Why he listened to accounts fellow, cut short his LTA, completed all the formalities & put Shriram in such an awkward position where he has to offer money to me!!!”

Hanumanji continued his work with the same attachment as he used to after this incidence also.

Hanumanji was a God, but for us, mortals, learnt a different  lesson & that was “NOT to do anything without proper sanctions FROM HR & IMMEDIATE BOSS : Whatever may be the urgency or importance of the job”

(भड़ास4मीडिया के पास पहुंची एक मेल पर आधारित)

सीधा प्रसारण

क्षमा शर्मा लिखित कहानी ‘सीधा प्रसारण’ मीडिया पर केंद्रित है. इसका प्रकाशन वर्ष 1997 में जनसत्ता के साहित्य विशेषांक ‘सबरंग’ में हो चुका है. लंबा अरसा बीत चुका है. एक बार फिर पढ़ने की जरूरत है इस कहानी को. खासकर नई पीढ़ी को बहुत कुछ समझ में आएगा इस कहानी को पढ़कर. -एडिटर


सीधा प्रसारण

-क्षमा शर्मा-

खाड़ी युद्ध के बाद यह पहला मौका था जब एक अंतरराष्ट्रीय टेलीविजन कंपनी ने अन्य दुनिया की बड़ी कंपनियों को पीछे छोड़ बाजी जीत ली थी। लोकतांत्रिक भारत सरकार से इजाजत लेकर कंपनी ने दिखा दिया था कि वह सचमुच किसी प्रेशर टैक्टिक्स में यकीन नहीं करती, बल्कि खुद लोकतांत्रिक मूल्यों की वाहक है। वह किसी देश की आस्थाओं और विश्वासों पर चोट कर कोई नई मुसीबत नहीं मोल लेना चाहती। वह तो सिर्फ सूचना दे रही है। सूचना के निहितार्थ लोग खुद निकालें। अच्छा-बुरा वे खुद तय करें।

जब सरकार को बार-बार लानतें भेजी गईं और प्रच्छन्न रूप से ये आरोप भी लगाए गए कि सरकार के एक बड़े नुमाइंदे ने उक्त कंपनी से कमीशन के रूप में करोड़ों डकारे हैं तो सरकारी प्रवक्ता ने कहा, “एक तरफ हम पर सेंसरशिप लगाने का आरोप लगाया जाता है। सरकार को प्रेस और सूचना माध्यमों का नंबर एक दुश्मन घोषित किया जाता है और दूसरी ओर, जब सरकार ने सभी तरह की पाबंदियां हटा ली हैं तो भी भला-बुरा कहा जा रहा है। हम किसी भी प्रकार की सूचना पर कोई पाबंदी नहीं लगाना चाहते है। हां ये लोगों पर निर्भर है कि वे कौन-सी सूचना पसंद करते हैं, कौन-सी नहीं। हमें लोगों की समझदारी पर पूरा भरोसा है। बाबा तुलसीदास पुराने जमाने में कह गए हैं कि भय बिन होय न प्रीत। इस तरह सरेआम फांसी दिए जाते देख अपराधियों के मन में भी डर बैठेगा और अपराधों में कमी आएगी।”

सरकार की कृपापात्र कंपनी ने चौराहे-चौराहे होर्डिंग लगवाकर, अखबारों, दूरदर्शन के कई चैनलों, आकाशवाणी पर बड़े-बड़े विज्ञापन देकर अपनी स्पर्धी कंपनियों को जवाब दिया था। कहा गया था कि चूंकि गत वर्षों में इस कंपनी का टर्न ओवर लगातार बढ़ा है, इसलिए उसकी विरोधी कंपनियां इकट्ठी होकर उस पर हमले कर रही हैं। जबकि कंपनी का टर्न ओवर बढ़ने का कारण उसकी किसी प्रकार की बेईमानी नहीं, बल्कि उसकी कुशल प्रबंधन क्षमता, अपने मुनाफे को दोबारा मुनाफे में बदलने की काबिलियत और दक्ष कर्मचारियों का प्रदर्शन है। हमारी वन अपमैनशिप तो खाड़ी युद्ध के दौरान ही जगजाहिर हो चुकी है। हम चाहे जो हों वो नहीं है, जैसा कि हमारी विरोधी कंपनियां हमें चित्रित कर रही हैं। इसके बाद कंपनी सींग मारने को आतुर एक भारी-भरकम काले सांड को दिखाती थी जो सींग मारने दौड़ता था, फिर स्क्रीन की तरफ मुंह करके नथुने फुलाता था और अचानक हंसने लगता था। हंसते ही उसके मुंह से बहुत-से गुलाब नीचे गिरकर ढेर लगा देते थे।

“कितना क्रूड विज्ञापन है।” एक छात्रा ने कहा था।

“तुमने देखा नहीं, कंपनी ने एक झटके में अपने इस कार्यक्रम में सांड और गुलाब को दिखा पर्यावरण प्रेमियों को भी अपने साथ जोड़ लिया है।”

दूसरी छात्रा बोली, “वह कैसे? कंपनी जो करने जा रही है उससे पर्यावरण का क्या संबंध?”

“यही की कार्बन डाइआक्साइड से लेकर आक्सीजन, दूध से लेकर सिंथेटिक दूध, मसालों से लेकर हरी सब्जियों, दालों, पानी, टूथपेस्ट और मनुष्य-सबमें हम शुद्धता देखना चाहते हैं। हमारा मन शुद्ध होगा, किसी के लिए दुर्भावना नहीं रखेंगे। सभी लोग ऐसा करने लगेंगे तो कोई किसी का बुरा नहीं सोचेगा। सारी मार-काट खत्म हो जाएगी। लोग मिलावट करना, चोरी करना, चुगली करना, पर निंदा में रस लेना सब भूल जाएंगे। जब बुरे विचार नहीं रहेंगे तो बुरे काम तो अपने-आप खत्म हो जाएंगे। जब मनुष्य, मनुष्य को नहीं मारेगा तो पेड़ काटने की बात तो भला वह सोचेगा भी कैसे?”

“अच्छा! तो कंपनी द्वारा प्रसारित इस कार्यक्रम का मूल उद्देश्य पर्यावरण को शुद्ध करना है!”

“चाहो तो यही समझ लो।”

आज महीने का दूसरा शनिवार किसी अन्य शनिवार की तरह ही था, सिवाय इसके कि सड़कों पर कुछ-कुछ कर्फ्यू जैसी हालत थी। मदर डेयरी वाला बूथ पर बैठा मक्खियां मार रहा था। दूर-दूर तक कोई आदमी दिखाई नहीं देता। बस चिड़ियों की चहचहाट थी। एक बच्चे के रोने की, कुत्ते के भौंकने की आवाज सुनाई देती थी। गरमी की सुबह के छह बजे थे और लोगों की रसोइयों से कुकर की सीटियों की आवाजें ऐसे आ रही थीं कि लंच का वक्त कब का बीत गया हो और वे भूख से बिलबिलाकर जल्दी खाना खा लेना चाहते हों।

बात असल में यह थी कि आज तीन अपराधियों को फांसी लगने वाली थी। अपराधियों ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया था। कई अखबारों में उनके लंबे-लंबे इंटरव्यू भी छपे थे, जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्होंने अपराध किया ही नहीं। उन्हें तो जान-बूझकर फंसाया गया है। बच्चों की हत्या में कुछ ऐसे लोगों का हाथ है जिनके हाथ बहुत लंबे हैं। उन्हें तो पकड़ा नहीं गया, उन्हें पकड़ लिया गया, जिन्होंने अपराध किया ही नहीं था।

एक अपराधी जिसकी खिचड़ी दाढ़ी थी, जो कपड़ों के नाम पर सिर्फ एक लुंगी पहने था, उसका इंटरव्यू कुछ अधिक लंबा था। बीस साल की संवाददाता ने उससे पूछा था, “तुम कहां के हो?”

“बिहार का।”

“यहां कब आए?”

“पांच साल पहले।”

“क्या करते थे?”

“रिक्शा चलाता था।”

“क्या तुमने उन बच्चों को मारा?”

“पता नहीं।”

“क्या कोर्ट में भी तुम ऐसे ही बोले थे।”

“पता नहीं।”

“तुम्हारी बीवी-बच्चे हैं?”

यह सुनकर वह जमीन पर उकड़ूं बैठ गया और फफक-फफककर रोने लगा। जब महिला संवाददाता ने अपना प्रश्न दोहराया तो उसने कहा, “याद नहीं।”

अपराधियों के इन भावुक इंटरव्यू को पढ़कर बहुत-से लोग ऐसे थे जिन्हें दु:ख भी हुआ था। फांसी के औचित्य-अनौचित्य पर बहस भी चलाई गई थी। एक बारगी ऐसा लगा भी था कि राष्ट्रपति शायद अपराधियों को क्षमादान दे दें। तब बहुत-से माता-पिताओं ने बयान दिए थे कि अपराधियों के अधिकारों के लिए तो लोग आंसू बहा रहे हैं, लेकिन उन बच्चों का क्या जिन्हें खिलने से पहले ही डाल से नोच फेंका गया! और याद कीजिए उन दिनों को जब इन अपराधियों के डर से लोगों ने अपने बच्चों को स्कूल तक भेजना बंद कर दिया था। कइयों का कहना था कि दरअसल यह बहस उसी कंपनी ने इंस्टीगेट की है जिसने फांसी के सीधे प्रसारण के अधिकार खरीदे हैं, जिससे कि ज्यादा से ज्यादा लोग उसके प्रसारण को देखें।

इन बातों के जवाब में कंपनी के अधिकारियों ने एक बयान में कहा था कि दरअसल वे इस विवाद में पड़ना नहीं चाहते कि क्या सही है, क्या गलत? वे तो वही दिखा रहे हैं जो हो रहा है…

प्रसारण ठीक छह बजे से शुरू होने वाला था। कई अखबारों ने संपादकीय में इस बात की निंदा की थी कि फांसी को लाइव दिखाया जा रहा है। ठीक है कि वे अपराधी हैं लेकिन जान के बदले जान लेना है तो बर्बर समाज का नियम ही। एक कंपनी ने फांसी को फांसीघर से निकालकर सीधे हमारे घरों में पहुंचा दिया है और हमें कुछ नहीं हो रहा। हममें और उन देशों में क्या फर्क रह गया जहां लोग खाने की मेजों पर बैठकर दूरदर्शन पर लोगों का सिर धड़ से अलग होता हुआ देखते हैं। दु:ख की बात यह भी है कि एक तरफ फांसी दी जा रही है, दूसरी तरफ उसी फांसी को दिखाने वाली कंपनी करोड़ों बटोर रही है। कोई वजह नहीं कि कल महामारियों को फैलाने, उनसे मरते लोगों के बयान लेने और फिर उन्हें सीधे प्रसारित करने के अधिकार भी ऐसी कंपनियां खरीद लें। जैविक हथियारों के भंडारों से पैसे बनाने के तरीके भी आज नहीं तो कल बहुराष्ट्रीय निगम खोज ही लेंगे।
जब टेलीविजन की घड़ीं ने पिप-पिप की और एनाउंसर महोदया नमूदार हुईं तो लोगों की सांस रुक गई, “इस विशेष सभा में हम अपने दर्शकों का स्वागत करते हैं। कुछ ही देर में ब्रेक के बाद हम आपको वहां ले चलेंगे. जिस कार्यक्रम की आपको प्रतीक्षा है।”

एनाउंसर का चेहरा गायब होने के बाद एक मोटी, हर शब्द को साफ बोलती आवाज गूंजी। इस कार्यक्रम के प्रायोजक हैं-मिलटन टाफी, नाना काफी और लच्छेदार पेय। टाफी का बच्चा हाऊ हप्प हप्प कर रहा था, काफी के सिप पर लोग ठहाके लगा रहे थे और पेय की बोतल को विजेताओं के अंगूठों की तरह दिखा रहे थे।

प्राइम टाइम के लिए विज्ञापनदाताओं में होड़ लगी है। अपराधी किस कंपनी के कुर्ता-पाजामा पहनेगा। कौन-सी कंपनी का दही खाएगा? किस प्रेस से छपी रामचरितमानस पढ़ेगा। कौन-सी कंपनी का बना कनटोप पहनेगा। कंपनियां दूरदर्शन पर दबाव डाल रही हैं कि वह अपनी प्रसारण-नीति में परिवर्तन करे। दस प्रतिशत विज्ञापन-समय को बढ़ाकर तीस प्रतिशत कर दिया जाना चाहिए। इस एक कार्यक्रम से ही दूरदर्शन और कंपनी का भारी आय होने की संभावना है।

बच्चे इस पूरे कार्यक्रम को ध्यान से देख रहे हैं। अगले हफ्ते उनका क्विज होने वाला है। हो सकता है उसमें इस कार्यक्रम के बारे में सवाल पूछे जाएं। कितने अपराधी थे? कितने बच्चों को मारा? अपराधियों ने इंटरव्यू में क्या कहा? प्रसारण कितने घंटे चला? किस कंपनी ने इसे प्रायोजित किया था? कितने विज्ञापन दिखाए गए? सबसे ज्यादा विज्ञापन किसके थे? फांसी देने में कितना समय लगता है?

उधर स्टूडियो में कैमरामैन, एडीटर, निदेशक सबमें बहस चल रही है-कैमरा कितने वक्त कहां रहना है? कितने वक्त फंदे पर? कितने वक्त कैदियों पर? कितने वक्त जल्लाद पर? कितने वक्त फांसी का आदेश देने वाले जेलर की उंगली पर…काल कोठरी पर…अन्य कैदियों के रिएक्शंस पर…

इस प्रसारण के लिए ऐसे कैमरामैनों को बुलाया गया है। आखिर दूरदर्शन की इज्जत का सवाल है।

विज्ञापनों के एक से एक गर्वीले चेहरे…फलां जूता…घप्प आंखों से टपकता अहंकार…स्क्रीन पर फैली आंखें दुनिया को मक्खी-मच्छर की नजर से देखती थीं। नारंगी पेपो पर झपटते नारंगी लौह हाथ…पल में खाली होती बोतल…फ्रिज में भरी बोतलें…रोबोट्स के पेटू, लालची, झूठ और फरेब का प्रमाण देती थीं। चमकीले स्याही के बाल झंडे की तरह लहराते थे…अब देशों को झंडों की जगह बालों को ही लटका लेना पड़ेगा…रंगों की बारिश हो रही है…तीन प्राइम रंग पचासों रंगों में बदलकर कैसा चमत्कार दिखाते हैं कि मौत भी इंद्रधनुषी दिखाई देने लगती है!

विज्ञापन को देखकर एक लड़के ने कहा था, “कंपनी ने शायद अपने विज्ञापनदाताओं से कहा होगा-तुम हमें विज्ञापन दो, हम तुम्हें फांसी देंगे।”

अचानक सारे रंग गायब हो गए, कोई जादूगर सारे रंगों को अपनी पोटली में समेट एकाएक यह जा, वह जा…कार्यक्रम की शुरुआत हो रही थी। प्रसारण करने वाली कंपनी की तरफ से दर्शकों के लिए संदेश लिखा आता था-इस विशेष सभा में हम अपने 50 करोड़ दर्शकों का स्वागत करते हैं।

उधर कैमरा सीधे कालकोठरी में जा पहुंचा। वहां दिखती है-सफेद नए कपड़े पहने एक कैदी की पीठ। वह कुछ खा रहा है। ‘कुछ’ नहीं, दही खा रहा है। तभी पोथी-पत्रा लिए पंडित आता है। वह श्लोक पढ़ रहा है। अचानक कैदी मुड़ता है और उसकी भावहीन आंखें कुछ अधिक फैली दिखाई देती हैं।

“अंतिम इच्छा?”

अंतिम इच्छा…जीवन…जीवन की…

क्या वह पूरी हो सकती है? जैसे कैदी ने कहा। लेकिन क्या सचमुच कहा…किसी ने सुना या नहीं, सुना भी तो कहा गया था क्या? कैदी का इंटरव्यू? कमरे में सन्नाटा…सब आंखें फाड़े देख रहे हैं।

कैमरा दौड़ न लगाता उन बच्चों के माता-पिता के पास पहुंच गया है, जिन्हें इस आदमी ने मार दिया था।

रिपोर्टर एक बच्चे के पिता से पूछता है, “कैसा लग रहा है?”

पिता तत्काल जवाब नहीं देता। उसके पीछे फोन बजता है। उसके नथुने फड़कते हैं, “कैसा लगेगा? मेरे बच्चों को इस आदमी ने निर्दयता से मारा। क्या कुसूर था उनका? उन्होंने किसी का क्या बिगाड़ा था?”

“क्या आप फांसी के इस तरह के प्रसारण से खुश हैं?”

“खुशी या दु:ख की कोई बात ही नहीं है। लोग देखेंगे। कम से कम इस तरह मासूमों को तो नहीं…” पिता की आवाज रुंध जाती है। बच्चों की मां हथेलियों में अपना चेहरा छिपा लेती है। छोटे से घर की दीवारें उदास हो रोने लगती हैं।

फिर कैमरा उस मां के पास पहुंचता है, जिसके सबसे छोटे बेटे को फांसी दी जा रही है…वह कुछ नहीं बोलती, सिर्फ आसमान की तरफ हाथ उठा-उठाकर चुप रह जाती है।

“यह पैदा हुआ था तो जरा-सा मैं पास से हटी नहीं कि…”

टी.वी. देखती एक औरत रोने लगती है। बच्चे पूछतें हैं तो कहती है, “आखिर है तो वह उसका बेटा ही। एक मां के लिए तो बच्चा बच्चा ही होता है। लेकिन क्या इसने मारा होगा? गांधी के अहिंसा के देश में इतनी हिंसा!”

दूसरी औरत कहती है, “जिनको इसने मार दिया वे भी तो किसी के बच्चे ही थे।”

“हां वे बेचारे भी रो रहे हैं।” पहली औरत कहती है।

“तीन जीवन बेकार में नष्ट हुए।”

“यहां तो उन बच्चों के माता-पिता रो रहे हैं। हमने सुना है कि अमेरीका में एक हत्यारे की फांसी की सजा देखने के लिए उस व्यक्ति के माता-पिता आए थे, जिसकी हत्या कर दी गई थी। वे खूब खुश हो रहे थे।”

“इसका मतलब…अमेरीका और सऊदी अरब में भला क्या अंतर है?”

“कुछ नहीं। यह कंपनी जो फांसी का सीधा प्रसारण कर रही है, वह भी तो अमेरीकी है।”

“लेकिन एक बात बताओ, आखिर इसमें अनहोनी क्या हो गई? फिल्मों और सीरियलों में भी तो हम फांसी लगते देखते हैं।”

“हां, लेकिन हमें पता होता है कि यह सब ड्रामा है। सचमुच में कोई किसी की जान नहीं ले रहा। यहां हम कोई ड्रामा नहीं देख रहे। वास्तव में किसी की जान जा रही है।”

“जान जा रही है तो ऐसी क्या बात है! उसने भी किसी की जान ली है। और इस देश में जान की कीमत ही क्या है? रोड एक्सीडेंट्स में हर साल कितने लोग मरते हैं, कुछ खबर है।”

“लेकिन मुद्दा यह नहीं है, मुद्दा तो यह है कि फांसी के सीधे प्रसारण में पैसे की कमाई…”

“जब कोई पैसे लगाएगा तो पैसा कमाएगा भी।”

“तुम्हें याद होगा कि इसी कंपनी की एक बहन ने खाड़ी युद्ध का सीधा प्रसारण किया था। लोग हथियारों की मारक क्षमता और एक्यूरेसी से दंग रह गए थे। उस जादू में वे भूल गए थे कि पश्चिम ने एक एशियाई देश को तहस-नहस करके आने वाले सौ सालों के लिए अपने हथियारों का परीक्षण कर लिया। युद्ध बिना तो हथियार का महत्व पता नहीं चल सकता। इस फांसी का प्रसारण भी ऐसा ही है कि देख लें, लोगों की संवेदनाएं कहां तक जाती हैं। वे कितना, किस हद तक रिएक्ट करते हैं। मौत में आनंद मनाना खुद की मौत को निमंत्रित करना है।”

“चुप्प!” रोती हुई महिला, जो अब तक चुप हो गई थी, दहाड़ी, “न कुछ सुनने देते हैं, न देखने।”

बहस करते लड़के चुप हो गए।

“यार! इस वक्त भी इसे खाने की पड़ी है। कैसे गपागप दही खा रहा है।”

“अगले जन्म का कोई चक्कर होगा।”

“इस जन्म में बड़ा अच्छा काम किया जो अगले में करेगा।”

“यही तो बात है! इस जन्म में बुरा किया है तो अगले में जरूर अच्छा करेगा, यही तो समझा जाता है।”

“तो फिर जो इस जन्म में जो इसकी जान ले रहे हैं, यह अगले जन्म में उनकी लेगा!”

“फिर शुरू हो गए, चुप नहीं रह सकते थोड़ी देर।”

विज्ञापन शुरू हो जाते हैं, “यू नो द रीअल टेस्ट” विज्ञापन में कमर मटकाता लड़का पूछता है?

कि सामने बैठे लड़के लगभग चीखते हैं, “यस, वी नो द रीअल टेस्ट नाउ गेट लॉस्ट।” लेकिन स्क्रीन के लड़के पर जैसे इनकी डांट का असर नहीं होता। वह फिर मुसकुराता है और छालांग लगाकर हवा में गायब हो जाता है।

कैमरा बार-बार फांसीघर में लटके रस्सी के फंदे को दिखा रहा है कि अचानक उन तीन बच्चों के चित्रों से स्क्रीन भर उठती है, जिन्हें मारा गया था।

बड़ी आंखें, हलका-सा खुला मुंह, संसार को देखकर जैसे चकित हैं। काजल के दिठोने! ऐसे चित्रों को देखकर ऐसा क्यों लगता है कि ये बच्चे अभी-अभी टी.वी. स्क्रीन से निकलकर अपनी-अपनी मांओं की गोद में जा छिपेंगे।

इनको मारने से समाज में किस शोषण का अंत हो गया?

अपराधी कहते हैं, हमने नहीं मारा…बच्चों के माता-पिता कहते हैं-उन्हीं ने मारा…अपराधियों की मांएं…उनका दिल न धड़कता होगा कि काश कोई चमत्कार होता, कोई घटना हो जाती, जेल में बम गिर जाता…राजा-महाराजाओं के जन्मदिन पर जैसे आम माफी दी जाती थी, वैसे ही कोई नियम कायदा-कानून होता? लेकिन कुछ नहीं होगा…एक अपराधी की मां…हत्यारे की मां…उसने हजार बार कह दिया हो कि उसका उससे कोई संबंध नहीं, फिर भी बेटे के लिए तो दिल तो धड़कता ही है।
अड़ोसी-पड़ोसियों की नजर में बेटे के अपराधी साबित होने से बहुत-बहुत पहले वह अपराधिनी साबित हो गई थी। अब भी वह समझ नहीं पाती कि क्या सचमुच उसके बेटे ने उन मासूम बच्चों की जान ली होगी? क्यों उसने ऐसा किया होगा…
लोग परेशान हैं, कैमरा बार-बार इधर-उधर टप्पे खा रहा है।

पान की दुकान पर खड़ा लड़का कह रहा है, “इनसे अच्छा तो अफगानिस्तान है। न किसी जेल की जरूरत, न जल्लाद की। बस, पकड़ो और लैंपपोस्ट पर लटका दो। जो देखना चाहे देख ले, नहीं तो जय गंगा की।”

“पर यह कौन-सा न्याय का तरीका है कि न कोई मुकदमा, न पैरवी। बस, संयुक्त राष्ट्र मिशन से पकड़ा और लटका दिया।” दूसरा कहता है।

“हम कोई इसकी अच्छाई आ बुराई पर बहस नहीं कर रहे हैं। न ही हम यह कह रहे हैं कि यह बहुत अच्छा हुआ। मैं तो यह कह रहा हूं कि यह जो टी.वी. का अरेंजमेंट है, हाय-हूय है, क्या फायदा? जान के बदले जान कैसे भी ली जा सकती है। यहां तो जान के बदले पैसे कमाए जा रहे हैं!” पहले वाला लड़का कहता है।

“जान के बदले पैसे कमाता कौन नहीं है? जो दवाइयां तुम खाते हो, उनको विकसित करने में कितनी जानें जाती हैं। उनसे कितना पैसा कंपनियां कमाती हैं?”

दूसरा कहता है तो पहले वाला पान थूक देता है, “छोड़ो, छोड़ो यह तमाशा खत्म कब होगा?”

सत्ता तो लोगों का विश्वास पैदा करने के लिए अपनी ताकत दिखा रही है और स्पांसर्स एनकैश करने के लिए! उनके विज्ञापन की भाषा भी फांसी से जुड़ गई है!

शहरों की जिन सड़कों पर कर्फ्यू-सा लग गया था, उन पर मानो पूरी जनसंख्या टूट पड़ी है।

इमारतें हैरान हैं। पेड़ परेशान। न जाने क्या बात है? पता नहीं क्या हो गया! भूकंप तो आया नहीं कि सारे के सारे लोग बाहर निकल आए। हुआ क्या है?

बिजली चली गई है टी.वी. सेंटर की। लोगों के घरों की।

एन.टी.पी.सी. ने बकाया न भरने के कारण डेसू की बिजली काट दी है। अब जितना चाहो, देख लो फांसी को। लोगों के हाथ में रस्सियां हैं। वे बिजली कर्मियों को ढूंढ़ रहे हैं। लैंपपोस्ट के बहुत-से सिरे हवा में उड़े जा रहे हैं।

ठीक उस वक्त बिजली गई है जब फंदा गले में डाला जा चुका था। जेलर की उंगली उठने वाली थी, लीवर खिंचने वाला था, जरूर इसमें कोई साजिश है। कहीं जिसे फांसी दी जा रही थी वह दाऊद इब्राहीम का आदमी तो नहीं था! उसे निकालने के लिए उन्होंने जेल और डेसू दफ्तरों में बम ब्लास्ट कर दिया हो।

बिजली कर्मचारियों का कहीं पता नहीं है। लोग हाथों में रस्सी लिए उनका इंतजार कर रहे हैं।

डा. क्षमा शर्मा
डा. क्षमा शर्मा
अक्तूबर 1955 में जन्मीं डा. क्षमा शर्मा ने काफी कुछ लिखा है. उनके लेखन व साहित्य यात्रा पर कई विश्वविद्यालयों में शोध हो चुका है और हो रहा है. उनकी रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है. कई संस्थाओं, अकादमियों द्वारा पुरस्कृत हो चुकीं क्षमा शर्मा वर्तमान में हिंदुस्तान टाइम्स की बाल पत्रिका ‘नंदन’ में कार्यकारी संपादक के रूप में कार्यरत हैं. डा. क्षमा द्वारा लिखित आठ कहानी संग्रह हैं- काला कानून, कस्बे की लड़की, घर-घर तथा अन्य कहानियां, थैंक्यू सद्दाम हुसैन, लव स्टोरीज, इक्कीसवीं सदी का लड़का, नेम प्लेट और रास्ता छोड़ो डार्लिंग. उनके चार उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं- दूसरा पाठ, परछाई अन्नपूर्णा, शस्य का पता और मोबाइल. स्त्री विषयक चार किताबें आ चुकी हैं. ‘स्त्री का समय’ नामक किताब के चार संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं. इस किताब के लिए डा. क्षमा शर्मा को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की तरफ से भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार के अंतर्गत प्रथम लेखिका का पुरस्कार मिल चुका है. स्त्री विषयक अन्य किताबें हैं- स्त्रीत्ववादी विमर्शः समाज और साहित्य, औरतें और आवाजें, बंद गलियों के विरुद्ध-  महिला पत्रकारिता की यात्रा (मृणाल पांडेय का साथ सह संपादन) और बाजार ने पहनाया बारबी को बुर्का. ‘व्यावसायिक पत्रकारिता का कथा-साहित्य के विकास में योगदान’ नामक किताब पत्रकारिता पर केंद्रित है. इसकी लेखिका क्षमा शर्मा ही हैं. वे 13 बाल उपन्यास और 12 बाल कहानी संग्रह भी लिख चुकी हैं. बच्चों के लिए बीस वर्ल्ड क्लासिक्स का रूपांतरण किया है.

सूखा सूखा कितना सूखा

अभिज्ञात: पत्रकारिता की दुनिया में व्याप्त विसंगतियों को उजागर करती एक कहानी : वह अदना सा अंशकालिक पत्रकार था। एक बड़े अख़बार का छोटा सा स्ट्रिंगर। उसका ख़बरों की क़ीमत शब्दों के विस्तार पर तय होती थी, ख़बरों की गहराई और महत्त्व पर नहीं। जिस ख़बर के जुगाड़ में कई बार उसका पूरा दिन लग जाता उसकी लम्बाई कई बार तीन-चार कालम सेंटीमीटर होती।

ऐसा होने पर वह अपने आपको ठगा सा महसूस करता। जिन दिनों अख़बार के विज्ञापन की दरें 215 रुपये प्रति कालम सेंटीमीटर हुआ करती थी उसके छपे समाचार पर 2 रुपये 15 पैसे प्रति कालम सेंटीमीटर मिलता था अर्थात सौंवा हिस्सा। पांच बरस बीत गये विज्ञापन की दरें बदलीं मगर नहीं बदला तो उसका मानदेय। इसके अलावा एक सुनिश्चित मानदेय रिटेनरशिप के नाम पर तीन सौ रुपये प्रतिमाह मिलता था। यह अनायास नहीं था कि स्ट्रिंगर ने स्फीति को अपनी पत्रकारिता का गुण बना लिया। ख़बर में अनावश्यक फैलाव और दुहराव न होता तो उसकी दैनिक कमाई एक रिक्शावाले के बराबर भी न हो।

और उधर डेस्क की ड्यूटी इस काम के लिए लगी होती थी कि स्ट्रिंगरों की ख़बरों की स्फीति और अनावश्यक हिस्सों को काटा-छांटा जाये। काट-छांट करने वाले मज़े में थे। कम्पनी की तरफ़ से उन्हें तमाम सुविधाएं थीं। वे एसी युक्त कार्यालय में बैठे-बैठे स्ट्रिंगरों की मूर्खताओं की चर्चा कर फूले न समाते और अपने को विद्वान मानने का वहम पाले रहते। एक ही ख़बर पर दोहरी मेहनत होती थी। सब कुछ अरसे से ठीक-ठाक चल रहा था किन्तु एक दिन स्ट्रिंगर की पेशागत ज़िन्दगी में उथल-पुथल मच गयी।

हुआ यूं कि उस दिन उसके पास ख़बरों का खासा टोटा था और उसने जिले के कुछ हिस्सों में सूखे की एक खबर गढ़ दी। यूं भी बारिश के दिनों में कई दिन से बारिश नहीं हुई थी। उसने अनुमान लगाया था कि यह हाल रहा तो सूखा पड़ सकता है। उसने ख़बर बहुत हल्के तौर पर लिखी थी उसे क्या पता था कि डेस्क उसे खासा तूल दे देगा। डेस्क पर एक अति उत्साही जीव आये
हुए थे। स्ट्रिंगर कोलकाता के एक दूर-दराज़ जिले का था जो जिला मुख्यालय से भी काफी दूर एक क़स्बे में रहता था जहां से वह अपनी खबरें फ़ैक्स से भेजता था।

फ़ैक्स करने के लिए उसे तीन किलोमीटर दूर बाज़ार में आना पड़ता था। सूखे की ख़बर को फ़ैक्स तो उसने किया था किन्तु दूसरे दिन वह ख़बर लगी नहीं। अगले दिन वह अन्य ख़बरें फ़ैक्स करने गया तो वहीं से फ़ोन कर सूखे की स्टोरी के सम्बंध में डेस्क से पूछा तो कहा गया-‘तुम लोगों को क्या पता कि ख़बर किसे कहते हैं और कैसे बनती है? तुम तो बस वह करो, जो कहा जा रहा है। यह बहुत बड़ी ख़बर है जिसे तुमने बहुत मामूली ढंग से लिखी है।’

स्ट्रिंगर किन्तु-परन्तु करता रह गया और दूसरी ओर से फ़ोन काट दिया गया। अगले दिन उसने वही किया जो कहा गया था। सरकारी महकमे से जिले में सूखे से सम्बंधित पिछले रिकार्ड जुटाये और भेज दिया। अगले दिन सूखे को लेकर जो समाचार छपा उससे वह खुद हैरत में पड़ गया और उसका कलेजा कांप गया। खबर पहले पेज़ पर थी और कहीं इंटरनेट आदि से मैनेज किया गया फ़ोटो था दरकी हुई ज़मीन का। ख़बर की विषयवस्तु के साथ खिलवाड़ किया गया था और जो सूखे की आशंका उसने व्यक्त की थी उसे डेस्क ने बदलकर सूखा पड़ा कर दिया था। उसे लगा कि अब तो उसकी स्ट्रिंगरशिप गयी। रोज़गार का यह रास्ता भी बन्द। वह आशंका से बुरी तरह त्रस्त हो गया।

कोलकाता के दूसरे अखबारों में सूखे की ख़बर सिरे से नदारत। सिर्फ़ एक अख़बार में ख़बर थी। उसे एक्सक्लूसिव माना गया और किन्तु बाक़ी अख़बारों से संवाददाता और फ़ोटोग्राफ़र भेजे गये सूखे के कवरेज के लिए। चूंकि वह सुदूर जिला था अधिकतर अख़बारों में स्टाफ़ रिपोर्टर नियुक्त नहीं थे इसीलिए स्टाफ़ रिपोर्टर भेजे गये थे। जिले में कुछ दिनों तक सूखे के
कवरेज के लिए।

पत्रकारों ने एक-दूसरे से सम्पर्क किया और एक साथ एक ही ट्रेन से सूखाग्रस्त जिले में पहुंचे। इलेक्ट्रानिक मीडिया भी साथ था। रास्ते में ही तय हो गया था कि क्या करना है। जिस स्ट्रिंगर ने यह ख़बर सबसे पहले ब्रोक की है उससे सम्पर्क साधना है। उस अख़बार का फ़ोटोग्राफ़र इस ट्रेन से जा रहा था, जिसे वहां पहुंचते ही स्ट्रिंगर स्टेशन पर रिसीव करने वाला था। बाक़ी पत्रकार भी उसी के भरोसे थे कि वह प्रभावित इलाके का बासिन्दा है इसलिए स्थिति से पूरी तरह वाक़िफ होगा और उन सबकी मदद करेगा।

स्टेशन के पास ही के होटल में सारे पत्रकार ठहरने वाले थे जहां से वे स्टोरी कवर करके फ़ोन और ईमेल व अन्य साधनों से भेजने वाले थे। इतने सारे रिपोर्टर-फोटोग्राफ़र जब स्टेशन पर एक साथ उतरे कोस्ट्रिंगर के पैरों तले ज़मीन खिसक गयी। वह मन ही मन भगवान को याद करने लगा जबकि वह विचारधारा से किसी हद तक मार्क्सवादी था। होटल में जब सब फ्रेश हो लिए और नाश्ते-पानी के बाद उसके साथ कूच करने के लिए तैयार हुए तो उन्हें बताया गया कि यह जिला अत्यंत पिछड़ा हुआ है और ज़्यादातर गांवों में सड़कें नहीं पहुंची हैं सो उन्हें पैदल ही चलना होगा।

स्ट्रिंगर बेमतलब उन्हें खेतों और पतली पगडंडियों पर देर तक चलाता रहा फिर एक बड़े से तालाब के पास ले गया जो अरसे से सूखा पड़ा था। उसने बताया –‘यह तालाब पानी से लबालब भरा रहता था जो अब सूख गया है।’ उसने वह परती ज़मीनें दिखायी जिस पर कभी खेती हुई ही न थी और दरारें पड़ी हुई थीं और कहा-‘इसमें फसलें लहलहाती हैं जो अब सूखे की वज़ह से बेहाल हैं।’

शहरी पत्रकारों को ग्राम्य जीवन की न तो पूरी जानकारी थी और ना ही जानकारी हासिल करने की ललक और ना ही कोई दूसरा चारा। वह दो-एक ऐसे नलकूपों तक ले गया जो सरकारी खानापूरी के लिए लगाये तो गये थे लेकिन जिनमें लगने के बाद भी कभी पानी नहीं आया था। एक सूखा कुंआ भी उसने दिखाया जो बरसों से उसी अवस्था में था किन्तु उसके बारे में जानकारी दी कि वह इस सूखे के कारण ही इस अवस्था में है। उसकी बतायी गयी सूचनाएं मीडिया के लोग दर्ज़ करते रहे। तस्वीरें उतारी गयीं।

टीवी वालों ने भी स्थलों की बाइट ली। उन्हें एक पेड़ की छांह में बिठाकर स्ट्रिंगर पास ही के गांव में गया और लोगों को समझा-बुझाकर वहां ले आया जो सूखे की गवाही देने को तैयार थे। गांव वालों को उसने समझाया था कि यदि वे सूखे की गवाही देंगे तो उन्हें सरकार से पैसे मिलेंगे। लोग खुशी-खुशी गढ़ा हुआ झूठ बोलने को तैयार हो गये। दो-तीन युवक साइकिल से पड़ोस के गांव भी दौड़ा दिये गये जो गढ़े झूठ का साथ देने के लिए तैयार किये जाने के मक़सद से भेजे गये। फिर क्या था सूखे के पुराने दिनों को गांव वाले याद करते और इस सूखे के बारे में भी वैसा ही बयान देते। ख़बरें बनने लगीं। कैमरों के फ़्लैश चमकने लगे। टीवी वाले अलग-अलग लोगों के बयान लेते रहे।

अगले दिन सारे अख़बारों में सूखा और उसकी तस्वीरें छा गयीं। टीवी पर भी सूखा दिखा। मीडिया ने दूसरे दिन अपनी कलाकारी दिखायी लोगों से कहा गया कि वे वर्षा के लिए पूजा-अर्चना करें, नमाज़ पढ़ें ताकि उसका कवरेज शानदार दिखायी दे। गांव वालों ने ऐसा ही किया। मीडिया के वहां होने की ख़बर पाकर स्थानीय विधायक, सांसद और कलेक्टर सहित तमाम अधिकारी वहां पहुंच गये। उन सबके चेहरे पर रौनक थी। उनके मन में पिछले सूखे से हुई कमाई की याद ताज़ा हो आयी थी। और इस बार तो सूखा छप्पर फाड़ कर आया था। बैठे बिठाये। सरकारी राहत का ज़्यातातर माल ज़ेब में आने की संभावना बन रही थी। उन्हें तो पता ही न था कि कब सूखे ने यूं उनके यहां दस्तक़ दी थी। अख़बारों के रास्ते।

सब मीडिया के सामने सूखे की भयावहता का बढ़-चढ़ कर वर्णन कर रहे थे और सरकार से खासी मदद मांग रहे थे। टीवी पर ही उन्होंने सुना कि सम्बंधित मंत्री ने पहले तो मीडिया की ख़बरों के आधार पर प्रधानमंत्री को तत्काल पत्र लिखा था और सूखा से निपटने और राहत के लिए करोड़ों रुपयों की पुरज़ोर मांग कर दी थी। वे ज़ल्द ही इलाके के दौरे पर आने वाले थे। मुख्यमंत्री राहत कोष से भी राहत राशि की घोषणा कर दी गयी थी।

प्रधानमंत्री ने भी आश्वासन दिया था। तीन दिन से मीडिया में सूखे की ख़बरों का ज़बर्दस्त कवरेज रहा। खेत का दरकी हुई ज़मीन, सूखे तालाब, नलों की सूखी हुई टोंटियां, चारे के अभाव में दुबले हुए मवेशी न्यूज़ चैनलों और अख़बारों में दिखायी दे रही थीं। सूखे के प्रचार दौड़ में मीडिया एक-दूसरे को पछाड़ने में लगे थे और यह स्ट्रिंगर के होश उड़ाये हुए था। उसका दिल रह-रह कर डूबता-उतराता रहा। यह सब उसी की ग़ल्तियों का नतीज़ा है। उसका फ़रेब सामने आया तो क्या होगा? क्या पता उसे लम्बी सज़ा ही न हो जाये? तीस-चालीस रुपये की हवाई स्टोरी उसे कितनी महंगी पड़ेगी वह सोच नहीं सकता था। और अब सच स्वीकार करने का कोई रास्ता न बचा था।

यह सब कुछ चल रहा था कि अचानक सब कुछ बदल गया एकाएक तेज़ बारिश होने लगी। अधिकारियों के चेहरे उतर गये। सांसद और विधायक की गाड़ियां एकाएक वहां से नदारत हो गयीं लेकिन जो निराश नहीं था वह था स्ट्रिंगर। चलो सूखे से पीछा छूटा। उसने चैन की सांस ली। खुश था मीडिया भी। स्टोरी में ट्विस्ट आ गया था।

लोगों से मीडियाकर्मियों ने गुजारिश की कि वे बारिश में नाचें। लोगों  की बारिश में नाचती तस्वीरें और टीवी फुटेज लिये गये। यह सूखे से निज़ात पाये लोगों का उल्लास था जो मीडिया की नज़रों से दुनिया ने देखा। इसी बीच स्ट्रिंगर के आफ़िस से मोबाइल पर फ़ोन आया। फ़ोन पर स्ट्रिंगर को सूखे के कवरेज में पहल के लिए बधाई दी गयी और बताया गया कि पुरस्कार स्वरूप उसका रिटेनरशिप दो सौ रुपये प्रतिमाह तत्काल प्रभाव से बढ़ा दिया गया है।

पेशे से पत्रकार डॉ.अभिज्ञात के छह कविता संग्रह, दो उपन्यास एवं एक कहानी संग्रह ‘तीसरी बीवी’ प्रकाशित है। यह कहानी ‘तीसरी बीवी’ में संकलित है। लेखक का फोन नम्बर है- 09830277656

‘देश का मीडिया बाजार की रखैल बन गया’

प्रदीप सौरभ‘मुन्नी मोबाइल’ में पत्रकारिता का भी कच्चा चिट्ठा है : बहुत दिनों बाद हिन्दी वालों के पास एक अलग टेस्ट का हिन्दी उपन्यास आ रहा है। नाम है ‘मुन्नी मोबाइल’। लेखक हैं वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सौरभ। इस उपन्यास में लंदन-शिकागो से लेकर बिहार-यूपी, दिल्ली-एनसीआर, पत्रकारिता-राजनीति, समाज-दंगा, नक्सलवाद-आंदोलन, कालगर्ल-कालसेंटर सब कुछ है। जिन लोगों ने इस उपन्यास के कच्चे रूप (प्रिंट होने से पहले) को पढ़ा है, उनका मानना है कि इस उपन्यास में ‘हिंदी बेस्ट सेलर’ बनने की संभावना है। उपन्यास तो इस महीने के आखिर में छपकर बाजार में आएगा लेकिन भड़ास4मीडिया उपन्यास के प्रकाशक वाणी प्रकाशन के सौजन्य से एक हिस्सा, खासकर वो हिस्सा जो पत्रकारिता से संबंधित है, यहां प्रकाशित कर रहा है। उपन्यास के इस हिस्से में गुजरात दंगों के दौरान मीडिया के रोल और मीडिया की आंतरिक बुनावट पर काफी कुछ कहा-लिखा गया है। तो आइए, ‘मुन्नी मोबाइल’ के एक अंश को पढ़ें-


मुन्नी मोबाइल

…..दंगाइयों की रणनीति से लग रहा था कि गोधरा अग्निकांड न भी होता, तो भी गुजरात में दंगों की भूमिका तैयार थी। दंगाई वोटरलिस्ट लेकर मुसलमानों के घरों पर हमला कर रहे थे। दिल्ली दरवाजा के बाहर बनी दुकानों का वाक्या है। दंगाइयों ने दुकानों में आग लगा दी। इस बीच पता चला कि इन दुकानों में एक हिन्दू की दुकान है, तो वे उसे बुझाने में जुट गये। दुकान में लगे फोन से दुकानदार को आग लगने की सूचना भी दी। बताया कि आकर आग बुझा लो। मुसलमानों की आर्थिक तरक्की भी दंगाइयों की आंख में खटक रही थी। चेलिया समुदाय के लोगों के होटलों को खोज-खोज कर आग के हवाले कर दिया। ये चेलिया वे लोग हैं, जिन्होंने गुजरात में पंजाबी और उत्तर भारतीय भोजन को सस्ते में परोसकर अपनी एक अलग पहचान बनाई है।

गुजरात में मुसलमान होना गाली बन गया था। मुसलमान पाकिस्तानी हो गये थे और हिन्दू राजा हिन्दुस्तानी। एक देश में दो देश। खास तरह की दाढ़ी और टोपी किसी की भी मौत का सबब बन सकती थी। आनंद भारती भी दाढ़ी रखते थे। उसके शुभचिंतक उसे फोन कर दाढ़ी कटाने की सलाह दे रहे थे। दाढ़ी कटवाना विकल्प नहीं था। गुजराती अखबारों को छोड़ कर राष्ट्रीय अखबार मोदी के कारनामों का खुलासा कर रहे थे। इसीलिए वे हिन्दू ब्रिगेड के निशाने पर थे। उन्हें धमकी भरी गुमनाम चिटिठियां भेजी जा रही थीं। जान बचाकर गुजरात से भागने की सलाह दी जा रही थी। पत्रकारों पर हमले किये जा रहे थे। टीवी पत्रकारों की ओबी वैन्स को भी कई बार निशाना बनाया गया। आनंद भारती की कार पर भी हमला हुआ। एक बार उन्हें दंगाइयों ने पकड़कर कहा- बोलो, भारत माता की जय। वंदेमातरम।

गुजरात का मीडिया दो भागों में बंट गया था। एक दंगों के गुनहगारों की पहचान कर रहा था, तो दूसरा दंगाइयों की हौसलाअफजाई करने में मशगूल था। मीडिया का यह हिस्सा आग में घी डालने का काम पूरी शिद्दत से कर रहा था। अफवाहें फैलाने में दंगाइयों से बड़ी भूमिका स्थानीय मीडिया की थी।  गुजराती ‘लोक समाचार’ और ‘जनसंदेश’ में प्रतिस्पर्धा थी। यदि गुजराती ‘लोक समाचार’ एक दिन यह छापता कि मुसलमानों ने छः हिन्दू लड़कियों के वक्ष काट लिए, तो ‘जन संदेश’ एक दर्जन हिन्दू लड़कियों के साथ बलात्कार की खबर छाप देता था। हिन्दू ब्रिगेड के मुखपत्र बन गये थे ये अखबार। दंगा उनके व्यावसायिक हितों को बखूबी पूरा कर रहा था। इनकी प्रसार संख्या भी बढ़ रही थी। सरकार का भी इन्हें समर्थन प्राप्त था। उनकी खबरों की सत्यता पर सवालिया निशान लगाते हुए इन अखबारों के खिलाफ दंतविहीन संस्था प्रेस काउन्सिल में भी शिकायतें की गईं। लेकिन कुछ नहीं हुआ।

इन अखबारों के पत्रकारों का हिन्दू ब्रिगेड के मंचों पर अभिनन्दन किया जाने लगा। वहीं दंगाइयों की खबर ले रहे मीडिया पर हमले तेज होने लगे। दंगा विरोधी मीडिया ने गुजरात के बाहर दंगों के सच को बखूबी रखा। देश में गुजरात सरकार और मोदी के खिलाफ माहौल बनने लगा। केन्द्र की वाजपेयी सरकार पर भी हमले तेज होने लगे। मोदी को हटाने की मांग होने लगी।

गुजरात दंगों के खिलाफ अभियान चला रहे मीडिया भी इंसानियत की सेवा नहीं कर रहा था। वह भी अपने व्यावसायिक हितों को साध रहा था। उसके पाठक वैसा ही पढ़ना चाहते थे। दंगों का विरोध करने वाले अखबार भी मूल्यों के प्रति निष्ठावान हों, ऐसा नहीं हैं। औरत की नंगी तस्वीरें पेश करना उनकी प्राथमिकताओं में है। बाजार की शक्तियों के आगे वह भी नतमस्तक है। उसके अपने संस्थानों में पत्रकारों और गैर पत्रकारों की स्थिति अच्छी नहीं है। बड़ी संख्या में कर्मचारियों को रातोंरात निकाल देना उनके शगल में शामिल है।

असल में आजादी के बाद विकसित हुआ देश का मीडिया बाजार की रखैल बन गया। उसके पास न तो कोई सपना है और न ही समाज के प्रति कोई प्रतिबद्धता। वह एक उद्योग में तब्दील हो चुका है। लाभ कमाना और सत्ता के गलियारों में दबाव बनाना उसका एकमात्र उद्देश्य है।

कवर पेजटीवी चैनलों में तो और दुर्गति है। नासमझ टाइप के लोग जमा हो गये हैं। दूसरों का स्टिंग आपरेशन करने वाले चैनलों का अगर स्टिंग कर दिया जाये तो जलजला आ जाये। एंकर बनने के लिए लड़कियों को क्या-क्या नहीं करना पड़ता है। इसके लिए बॉस के साथ शराब पीने से लेकर बिस्तर गर्म करने तक कोई भी कीमत चुकानी पड़ती है। बॉस का अगर किसी पर दिल आ गया है तो उसे आत्मसमर्पण करना ही होगा। वरना कई- कई महीनों नाइट ड्यूटी करनी पड़ेगी। रातोंरात यहां दस-दस हजार के इनक्रीमेन्ट हो जाते हैं। कल की आई लड़की आपकी बॉस बन सकती है। बॉस जो चाहे वह सब सच। चैनलों की चमक के चक्कर में तो कई लड़कियां पहले से ही सोचकर आती हैं कि उन्हें अपनी खूबसूरती को अपनी तरक्की के लिए इस्तेमान करना है। इसमें उन्हें नैतिकता और अनैतिकता कुछ नहीं दिखती है। कुछ जो सोच कर नहीं आती हैं, उन्हें तरक्की का यह शॉर्टकट जल्दी समझ आ जाता है। लेकिन कुछ समझौता नहीं करती हैं। नतीजतन वे ज्यादा दिन चैनल में नहीं रहती हैं या फिर उन्हें नेपथ्य में ऐसा काम मिलता है जो उनकी योग्यता से बहुत कम होता है।

चैनलों में इतनी व्यस्तता है कि सुबह-दोपहर का फर्क ही नहीं रह जाता है। कितने तो अपने घरों में सिर्फ सोने के लिए आते हैं। इसलिए एक नई प्रथा चल पड़ी है यहां। अधिकांश न्यूजमैन और अन्य टेकनिकल स्टॉफ आपस में ही शादी कर लेते हैं और चैनल को ही अपना घर मान लेते हैं। लेकिन ऐसी शादियों की सफलता का ग्राफ काफी नीचा है। यही सब वजह है कि अब न्यूज चैनलों में खबरों के अलावा सब कुछ मिल जाता है। नाग-नागिन के प्यार से लेकर भुतही हवेली के जिन्न का सच आदि- आदि। बावजूद इस सड़ांध के गुजरात दंगों के दौरान राष्ट्रीय अखबारों की कारगर भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है।

दंगे गुजरात की किस्मत बन गये थे। जगह जगह राहत शिविरों की फसल उग आई थी। राहत शिविरों में भी लोग महफूज नहीं थे। दंगाई राहत शिविरों को भी निशाना बना रहे थे। जूहापुरा और गुप्ता नगर कालोनी के बीच बार्डर जैसा माहौल था। जूहापुरा अहमदाबाद के बड़े मुस्लिम बहुल इलाकों में था। जूहापुरा पाकिस्तान बन गया था और उसके सामने की गुप्ता कालोनी हिन्दुस्तान। गुप्ता कालोनी में लोगों ने घरों में बड़ी संख्या में पत्थर जमा कर लिए थे। लोग पाषाण युग की तरफ लौटते दिख रहे थे। रात को एक साथ घरों में बर्तन बजने लगते थे। बर्तन का बजना संकेत होता था कि पत्थरबाजी शुरू करो। हमलावार आ गये हैं। बर्तन बजा-बजा कर गुप्ता कालोनी के लोगों ने बर्तनों की शक्ल बदल दी थी।

आनंद भारती के घर काम करने वाली महिला कमला बेन भी गुप्ता कालोनी में रहती थी। एक दिन न आने पर आनंद भारती ने कमला बेन से पूछा- ‘कल क्यों नहीं आई?’

‘बॉर्डर पर हमारी बारी थी ड्यूटी की।’ -कमला बेन ने जवाब दिया।

‘मतलब?’- आनंद भारती ने हैरान होते हुए पूछा।

‘जूहापुरा बॉर्डर है। मुसलमान हमारे ऊपर हमला न कर दें, इसलिए सबकी बारी-बारी से रात को ड्यूटी लगती है।’- कमला ने इस अंदाज से जवाब दिया, जैसे सचमुच देश की सीमा-सुरक्षा की ड्यूटी पर तैनात हो।

‘कभी हमला किया क्या?’ – आनंद भारती की जिज्ञासा बढ़ गई थी।

‘अभी तक तो नहीं किया। धमाल चल रहा है। पता नहीं कब हमला बोल दें।’- कह कर कमला बेन काम में जुट गई।

कमला बेन की बात सुनने के बाद अचानक आनंद भारती को दिल्ली के अपने मित्र के. के. कोहली का विभाजन के समय का वह किस्सा याद आ गया…देश विभाजन के पहले कोहली का परिवार रावलपिंडी के गोलड़ा शरीफ गांव में रहता था। विभाजन की मांग को लेकर दंगे-फसाद शुरू हो चुके थे। कोहली के घर के सामने वाली दीवार पर लिखा था- हाथ में बीड़ी, मुंह में पान, नहीं बनेगा पाकिस्तान। उस वक्त उनकी उम्र सात साल की रही होगी। हॉफ पैंट पहनते थे। घर वाले दंगाइयों के डर से उनकी जेब में कुछ पैसे और ड्राई फ्रूट भर देते थे, ताकि हमले के बाद परिवार बिखरे तो भूख मिटाई जा सके और पैसे से मदद हासिल की जाए। उस दौर में भी हिन्दू पत्थर नहीं रखते थे। लेकिन गुजरात के बॉर्डर में पत्थरों के पहाड़ खड़े कर दिए गए।

सामाग्री सौजन्य : वाणी प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली



‘मुन्नी मोबाइल’ के लेखक प्रदीप सौरभ कौन है?

प्रदीप सौरभ : निजी जीवन में खरी-खोटी हर खूबियों से लैस। खड़क, खुरदुरे, खुर्राट और खरे। मौन में तर्कों का पहाड़ लिये इस शख्स ने कब, कहां और कितना जिया इसका हिसाब-किताब कभी नहीं रखा। बंधी-बंधाई लीक पर नहीं चले। पेशानी पर कभी कोई लकीर नहीं, भले ही जीवन की नाव ‘भंवर’ में अटकी खड़ी हो।  कानपुर में जन्मे लेकिन समय इलाहाबाद में गुजारा। वहीं विश्वविद्यालय से एमए किया। कई नौकरियां करते-छोड़ते दिल्ली पहुंचकर साप्ताहिक हिन्दुस्तान के संपादकीय विभाग से जुड़े। कलम से तनिक भी ऊबे तो कैमेर की आंख से बहुत कुछ देखा। कई बड़े शहरों में फोटो प्रदर्शनी लगाई और अखबारों में दूसरों पर कॉलम लिखने वाले, खुद कॉलम पर छा गए। मूड आवा तो चित्रांकन भी किया। पत्रकारिता में पच्चीस वर्षों से अधिक समय पूर्वोत्तर सहित देश के कई राज्यों में गुजारा। गुजरात दंगों की बेबाक रिपोर्टिंग के लिए पुरस्कृत हुए। देश का पहला हिन्दी का बच्चों का अखबार और साहित्यिक पत्रिका ‘मुक्ति’ का संपादन किया।  पंजाब के आतंकवादियों और बिहार के बंधुआ मजदूरों पर बनी लघु फिल्म के लिए शोध किया। बसेरा धारावाहिक के मीडिया सलाहकार भी रहे। कई विश्वविद्यालयों के पत्रकारिता विभाग की विजिटिंग फैकल्टी हैं। इनके हिस्से कविता, बच्चों की कहानी, संपादित आलोचना की पांच किताबें हैं। फिलवक्त दैनिक हिन्दुस्तान के सहायक संपादक हैं।

संपर्क : 334, वार्तालोक, वसुंधरा, गाजियाबाद-201012

मेल : pradeep.saurabh@gmail.com


‘मुन्नी मोबाइल’ के बारे में क्या कहते हैं दिग्गज-

रवीन्द्र कालिया (सुप्रसिद्ध कथाकार) : ‘मुन्नी मोबाइल’ समकालीन सच्चाइयों के बदहवास चेहरों की शिनाख्त करता उपन्यास है। धर्म, राजनीति, बाजार और मीडिया आदि के द्वारा सामाजिक विकास की प्रक्रिया किस तरह प्रेरित व प्रभावित हो रही है, इसका चित्रण प्रदीप सौरभ ने अपनी मुहावरेदार रवां-दवां भाषा के माध्यम से किया है। प्रदीप सौरभ के पास नये यथार्थ के प्रामाणिक और विरल अनुभव हैं। इनका कथ्यात्मक उपयोग करते हुए उन्होंने यह अत्यंत दिलचस्प उपन्यास लिखा है। मुन्नी मोबाइल का चरित्र इतना प्रभावी है कि स्मृति में ठहर जाता है।

मृणाल पांडेय (प्रमुख सम्पादक, दैनिक हिन्दुस्तान) : लेखक-पत्रकार आनंद भारती व्यासपीठ से निकली ‘मुन्नी मोबाइल’ की कथा पिछले तीन दशकों के भारत का आइना है। इसकी कमानी मोबाइल क्रांति से लेकर मोदी (नरेन्द्र) की भ्रांति तक और जातीय सेनाओं से लेकर लंदन के अप्रवासी भारतीयों के जीवन को माप रही है। दिल्ली के बाहरी इलाके की एक सीधासादी घरेलू नौकरानी का वक्त की हवा के साथ क्रमशः एक दबंग और सम्पन्न स्थानीय ‘दादा’ बन जाना और फिर लड़कियों की बड़ी सप्लायर में उसका आखिरी रूपांतरण, एक भयावह कथा है, जिसमें हमारे समय की अनेक अकथनीय सच्चाइयां छिपी हुई हैं। मुन्नी के सपनों की बेटी रेखा चितकबरी पर समाप्त होने वाली यह गाथा, खत्म होकर भी खत्म कहां होती है?

सुधीश पचौरी (सुप्रसिद्ध आलोचक) : ‘मुन्नी मोबाइल’ एकदम नई काट का, एक दुर्लभ प्रयोग है!  प्रचारित जादुई तमाशों से अलग, जमीनी, धड़कता हुआ, आसपास का और फिर भी इतना नवीन कि लगे आप उसे उतना नहीं जानते थे। इसमें डायरी, रिपोर्टिंग, कहानी की विधाएं मिक्स होकर ऐसे वृत्तांत का रूप ले लेती हैं जिसमें समकालीन उपद्रवित, अति उलझे हुए उस यथार्थ का चित्रण है, इसे पढ़कर आप गोर्की के तलछटिए जीवन के जीवंत वर्णनों और ब्रेख्त द्वारा जर्मनी में हिटलर के आगाज को लेकर लिखे गए ‘द रेसिस्टीबिल राइज आफ आर्तुरो उई’ जैसे विख्यात नाटक के प्रसंगों को याद किए बिना नहीं रह सकते! पत्रकारिता और कहानी कला को मिक्स करके अमरीका में जो कथा-प्रयोग टॉम वुल्फ ने किए हैं, प्रदीप ने यहां किए हैं!