‘हिंदुस्तान’ ने पूर्णिया को शर्मसार कर दिया

मेरी उम्र 78 साल है. ये उम्र मैंने अपने घर के बंद कमरों में नहीं काटी. पूर्णिया की तमाम साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों से हर दिन का साबका रहा है. कचहरी चौक पर धरना-प्रदर्शन से लेकर छोटे-बड़े तमाम मंच पर सक्रिय रहा हूं.

संवेदनहीन विनोद बंधु के पास कोई जवाब है?

ट्रक-टैम्पो भिड़े (तीन कॉलम, पेज-3), युवा कांग्रेस का चक्का जाम (फोटो सहित 2 कॉलम, पेज-3), इसी हेडिंग के साथ एक और खबर (3 कॉलम, पेज-5), जागरुकता से जनसंख्या पर नियंत्रण संभव (फोटो सहित 2 कॉलम, पेज-4), बाबा स्वामी रामदेव के कार्यक्रम को ले बैठक (2 कॉलम), किसानों को दी खाद व कीटनाशक की जानकारी (फोटो सहित 2 कॉलम). 29 अगस्त 2010 को भागलपुर से प्रकाशित हिंदुस्तान के पूर्णिया संस्करण में ऐसी कई खबरें थीं पर वो नहीं थी जिसे देखने को हम कई साथियों ने अखबार खरीदा।

विनय उस अन्याय से पटरी नहीं बिठा पाया

: क्षेत्रीय पत्रकारों का हाल- न्यूनतम वेतन, काम का बोझ और बदनामियां : आज हम अपने साथी विनय तरुण को याद करने के लिये यहां जमा हुए हैं, हम सब जानते हैं कि वह एक प्रॉमिसिंग जर्नलिस्ट था. एक ऐसा पत्रकार था जिसने कई संवेदनशील मुद्दों पर बेहतरीन रिपोर्टिंग की और जिसकी रिपोर्टों को पूरे देश में सराहना मिली. मगर मैं उसके जीवन का सबसे कड़वा सच बयान करूं तो आप हैरत से अवाक रह जायेंगे. उसने अपने करियर का लंबा वक्त उन हालातों में गुजारा जब उसे पेशे से पत्रकार माना ही नहीं जाता था.

हिंदुस्तान वाले प्रेस रिलीज का करते रहे इंतजार

‘हिंदुस्तान’ के दिवंगत पत्रकार विनय तरूण की याद में पूर्णिया में पिछले दिनों एक कार्यक्रम हुआ। ‘हिंदुस्तान’ के पत्रकारगण एक प्रेस रिलीज का इंतजार करते रहे। पूर्णिया दफ्तर में कार्यरत पत्रकारों की विवशता ये रही कि कार्यक्रम के दिन हिंदुस्तान के उप स्थानीय संपादक विनय बंधु ने पूर्णिया में मीटिंग रख दी। भागलपुर से जब खुद संपादक महोदय हाजिर हों तो फिर भला कोई क्या करे? सवाल कौंधता है कि कहीं ये विनोद बंधु का निर्देश ही तो नहीं था कि विनय तरुण की याद में आयोजित कार्यक्रम का कोई कवरेज न किया जाए?

रुलाता तो है लेकिन बल देता है विनय

अपने साथी विनय तरुण को याद करने देश भर से कई पत्रकार 28 अगस्त को उसके पैतृक शहर पूर्णिया पहुंचे. दैनिक हिंदुस्तान, भागलपुर में कार्यरत मेधावी पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता विनय तरुण की मौत इसी साल जून महीने में रेल हादसे से हुई थी. आयोजन की रिपोर्ट आपको प्रेषित कर रहा हूं. कोशिश होगी कि इस मौके पर प्रकाशित स्मारिका उपलब्ध करा सकूं. इस अवसर पर साहित्यकार चंद्रकिशोर जायसवाल ने भी मीडिया की विसंगतियों पर एक आलेख लिखा है वह भी जल्द आपके सामने लाने की कोशिश होगी. -पुष्यमित्र

भूकंप में परीक्षा, बाढ़ में नौकरी छोड़ दी थी

‘थ्री इडियट’ का ‘रणछोड़दास चांचड’ था विनय तरूण : ऐसा लिखना पड़ रहा है, जो भगवान किसी से नहीं लिखवाए। विनय तरूण….. जितना प्यारा नाम, उतना ही सरल स्वभाव। लड़ाई-झगड़ा तो उससे कोसों दूर था, लेकिन धुन का इतना पक्का, जो कहना हो, उसे कहकर ही दम लेता था, दोस्तों से तो हर रोज उसकी किसी न किसी विषय पर बहस होती ही रहती थी, लेकिन क्या मजाल कोई उसे निरूत्तर कर सके. यहां तक कि माखनलाल चतुर्वेदी पत्राकारिता यूनिवर्सिटी में हर पीरियड में उसकी किसी भी विषय पर बाल की खाल उतारने की आदत से टीचर भी परेशान रहते थे.

‘बंदर मस्त कलंदर’ का ‘गोडसे’ उड़नछू हो गया

: माखनलाल चतुर्वेदी का पूर्व छात्र, दस्तक का साथी, हिंदुस्तान भागलपुर का पत्रकार और सबसे बढ़कर सबका प्यारा विनय चला गया, हमेशा-हमेशा के लिए : मंगलवार की रात 9 बजे फास्ट ट्रैक का बुलेटिन चल रहा था। मैं पीसीआर में बुलेटिन करवा रहा था। इसी दौरान प्रवीण का फोन आया, मैंने काट दिया।