हां, अति स्थानीयता हमें सीमित करती है

विनय बिहारी सिंहअमिताभ ठाकुर ने ठीक ही लिखा है… अति स्थानीयता या कूपमंडूकता?। मेरे जनसत्ता के अलावा ज्यादातर अखबार अति स्थानीय हो गए हैं। यह अपने अखबार की तारीफ नहीं है। यह सच्चाई है। अगर अखबार में स्थानीय खबरें ही भरी रहेंगी, तो देश- दुनिया में क्या हो रहा है, इसकी जानकारी कैसे मिलेगी? और अगर आप देश- दुनिया की खबरों से अनजान हैं तो फिर सूचनाओं के इस युग में क्या आप पीछे नहीं हैं? लेकिन एक अच्छी बात है।

विनय बिहारी सिंह की दो टिप्पणियां

विनय बिहारी सिंहजाति पाति पूछे नहिं कोई, हरि का भजे सो हरि का होई : ये लोकतंत्र है। किसी को भी किसी के खिलाफ या पक्ष में कुछ भी बोलने का हक मिला हुआ है। यह जो ‘हक’ है, ‘अधिकार’ है, बहुत बड़ी चीज है पर हम इसका इस्तेमाल जब नफे-नुकसान से प्रेरित होकर करने लगते हैं तो यह आजादी और अधिकार अपनी गरिमा खोने लगते हैं। कुछ लोगों ने हरिवंश जी को जातिवादी कहते हुए उन पर शाब्दिक प्रहार करने की कोशिश पिछले दिनों की। मैं प्रभात खबर में रहा हूं और हरिवंश जी को अच्छी तरह जानता हूं। वे कहीं से भी जातिवादी नहीं हैं। वे एक अखबार के प्रधान संपादक औऱ मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। जाति देख कर काम करते तो उनका अखबार इतना चर्चित नहीं होता।

डरावनी फिल्मों का विरोध क्यों नहीं होता?

विनय बिहारी सिंहजब बात अंधविश्वास की चल रही है तो डरावनी फिल्मों की बात क्यों नहीं होती?  कोई घर भयानक और भूतहा दिखा कर उसमें तरह- तरह की घटनाएं दिखाई जाती हैं। असली जीवन में क्या किसी ने ऐसा कोई घर देखा है? मेरा जवाब है- बिल्कुल नहीं। मैं ऐसे घर के बगल में वर्षों रात को सोया हूं जिसमें एक व्यक्ति की हत्या कर दी गई थी। मुझे कभी कोई भूत या प्रेत नहीं दिखा। मेरे बचपन में मेरी मां की जब मृत्यु हुई थी तो इस ललक में उन जगहों पर भी गया था जहां भूत-प्रेत होने की बात प्रसिद्ध थी। इस उम्मीद में कि मां शायद मर कर भूत ही बन गई हो। शायद उससे वहां भेंट हो जाए।